Law Archive

दिया हुआ उपहार वापस नहीं मांगा जा सकता।

April 7, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

भावेश जैन ने उदयपुर राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


2010 में मैंने अपनी गर्लफ्रेंड को मेरे नाम पर पर एक मोबाइल सिम खरीद कर दी, व्यक्तिगत उपयोग के लिए।  उस सिम को मैंने 2011 में पोस्ट पेड करवा दिया तथा उसके बिल का भुगतान भी में करता था।  जिसके बिल भुगतान की रसीदें मेरे पास हैं। 2016 में उसने मेरे से ब्रेकअप कर लिया तो मैंने उसकी सिम बंद करवा कर उसी नंबर की नयी सिम इशू करवाकर उपयोग करने लग गया हूँ।  क्या मैं ने कोई अपराध किया है? मैं ने उसे एक मोबाइल गिफ्ट किया था क्या मैं उस मोबाइल की मांग कर सकता हूँ ?


समाधान-

सिम अर्थात मोबाइल कनेक्शन आप के नाम था। उस पर आप का स्वामित्व था। आप ने वह अपने पास ले लिया। कोई अपराध नहीं किया।

लेकिन फोन इन्स्ट्रूमेंट आप ने गिफ्ट अर्थात उपहार में दिया था। उपहार का कानून यह है कि वह वापस नहीं होता। उपहारकर्ता अपने उपहार को वापस नहीं मांग सकता।  इस लिए आप का उसे वापस मांगना किसी भी तरह से न तो उचित है और न ही कानूनी।

 

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विश्राम के बाद

March 29, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

मित्रों!

नमस्ते!

एक माह से अधिक समय से तीसरा खंबा निष्क्रियता के दौर में रहा। आप जानते हैं कि यह वेबसाइट दो व्यक्तियों के संयुक्त प्रयास का परिणाम है।  हमें इस वेबसाइट पर इतने सवाल मिलते हैं कि उन सब का उत्तर दे पाना हमारी क्षमता के बाहर है। हम भी इस जीवजगत के ही प्राणी हैं जिन्हें बीच बीच में कुछ विश्राम लेना भी आवश्यक है। हम विश्राम से लौट आए हैं। हम आज से फिर उपस्थित हैं। प्रतिदिन एक समस्या का समाधान हम प्रस्तुत करते रहेंगे। जिन के समाधान संक्षेप में सुझाए जा सकते हैं उन्हें हम अपना समाधान उन के द्वारा दिए गए मेल पते पर प्रेषित कर देते हैं। अनेक लोग अपना मेल पता लिखते समय सावधानी नहीं बरतते और वह गलत हो जाता है। उन्हें इस तरह का समाधान भेजा जाना संभव नहींं होता। अनेक मित्र अपनी समस्या का समाधान प्राप्त करने के बाद भी लगातार परामर्श करते रहना चाहते हैं। यह वेबसाइट के वर्तमान स्वरूप में संंभव नहीं है। लगातार परामर्श निशुल्क दिया जाना संभव नहीं है। इस के लिए तीसरा खंबा कीअलग से प्रीमियम सेवाएँ आरंभ करने की योजना है। उस पर काम जारी है। वह जल्दी ही आप के सामने होगा।

आप लोगों ने पिछले वर्षों में तीसरा खंबा को बहुत प्यार दिया है। आशा है आप का यह प्यार, स्नेह इस वेबसाइट पर बना रहेगा।

संचालक

तीसरा खंबा

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समस्या-

राकेश कुमार ने अलवर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी ओर मेरे भाई की शादी फऱवरी 2015 में हुई। शादी के 1 साल तक सही रहा।  इसके बाद हम दोनों भाई की उनसे बनी नहीं वो बिना बात पे ही हम से लड़ाई करती थी।  फिर वो दोनों चली गई, हम लेने गए तो दोनो नहीं आई।  बड़ी बहन गर्भ से थी। हम ने धारा 9 का केस डाल दिया। चार माह बाद जब डिलीवरी होने का टाइम आया तो उन्होने कहा कि इनको ले जाओ।  हम दोनों को ले आए। डिलीवरी के दो माह बाद छोटी बहन, मेरी घरवाली कहती है कि मुझे नहीं रहना तलाक चाहिए। हम ने उसको कई बार रहने को बोला लेकिन वो अपने माँ बाप के पास चली गई और उसके बाद उसने मुझे नोटरी करवा कर रुपए 100 के स्टांप पर तलाक़ दे दिया और बड़ी बहन अभी रह रही है, क्या ये तलाक़ मान्य है।

समाधान-

प खुद हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर चुके हैं। इस का अर्थ है कि आप हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होते हैं। इस अधिनियम में कोई भी तलाक केवल तभी मान्य होता है जब कि न्यायालय से डिक्री पारित हो जाए।

आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है और उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पर आप को तलाकनामा लिख भेजा है। यह अपने आप में क्रूरता पूर्ण व्यवहार है। आप इसी स्टाम्प के आधार पर तथा अन्य आधारों पर परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को तुरन्त कर ही देनी चाहिए। न्यायालय से डिक्री पारित होने और निर्धारित अवधि में उस की कोई अपील दाखिल न होने पर यह तलाक अन्तिम हो सकता है।

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पिता की संपत्ति में हिस्सा?

December 15, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

partition of propertyसमस्या-

सुबाला देवी ने रांची, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मैं एक शादीशुदा महिला हूँ। मैं अपने पिताजी के चल-अचल संपति में हिस्सा चाहती हूँ। लेकिन मेरे पिताजी माँ और मेरे भाई हिस्सा नहीं देना चाहते हैं।  इसके लिए मुझे क्या करना होगा? मेरे पास कोई कगजात भी नहीं हैं।

समाधान-

किसी भी पुत्र या पुत्री को अपने पिता या माता की स्वअर्जित सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। जब तक वे जीवित हैं यह संपत्ति उन की है और वे अपनी इच्छानुसार इस का उपयोग कर सकते हैं। यदि माता या पिता में से किसी का देहान्त हो जाए और मृतक ने अपनी संपत्ति या उस का भाग वसीयत न किया हो तो ऐसी संपत्ति का स्वामित्व मृत्यु के साथ ही उस के उत्तराधिकारियों में निहीत हो जाता है। सभी उत्तराधिकारी उस संपत्ति के संयुक्त स्वामी हो जाते हैं। ऐसे संयुक्त स्वामियों में से कोई भी संपत्ति के बंटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकता है।

यदि आप के पिता के पास कोई पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति है तो उस में जन्म से ही पुत्रों का अधिकार होता है। 2005 से पुत्रियों का अधिकार भी होने लगा है। तब आप उस संपत्ति की संयुक्त स्वामी हो सकती हैं और उस में आप का हिस्सा हो सकता है। आप चाहें तो बँटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकती हैं।

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Muslim-Girlसमस्या-

पवन ने नरवाना, हरियाणा से पूछा है-

मेरे नाना की अचल संपत्ति है जो पुश्तैनी है। मेरे नाना के एक पुत्र और तीन पुत्रियाँ हैं। पुत्र की मृत्यु हो गयी है। उस की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है। क्या दूसरा विवाह करने के बाद भी वह स्त्री मेरे नाना की अचल संपत्ति में हिस्सा प्राप्त कर सकती है?

समाधान-

जिस क्षण एक सहदायिकी के किसी सदस्य का देहान्त होता है उस के हिस्से की संपत्ति का उत्तराधिकार निश्चित हो जाता है और उस के उत्तराधिकारी हिस्सेदार बन जाते हैं।

आप की मामी मामा का देहान्त होते ही उस सहदायिकी का हिस्सा बन गयी है जिस में आप के मामा का हिस्सा था अर्थात आप के नाना की पुश्तैनी संपत्ति में। एक बार वह हिस्सेदार हो गयी तो फिर उस के द्वारा फिर से विवाह कर लेने से उस की सहदायिकी की सदस्यता समाप्त नहीं होगी। वह अपने हिस्से के बंटवारे की मांग कर सकती है और न दिए जाने पर वह न्यायालय से बंटवारा करवा सकती है।

यदि आप के नाना की संपत्ति पुश्तैनी न हो और उन की स्वअर्जित हो तब भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप की मामी उन का हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी हैं। उन के दूसरा विवाह कर लेने से उन का यह अधिकार समाप्त नहीं होगा। इस संदर्भ में मद्रास उच्च न्यायालय का श्रीमती यमुना देवी बनाम श्रीमती डी नलिनी के प्रकरण में दिया गया निर्णय पढ़ा जा सकता है।

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दत्तक के सांपत्तिक अधिकार …

October 3, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

Hindu succession actसमस्या-

कृष्णगोपाल शर्मा ने देवगुढा बावडी, वाया जाहोता, तहसील आमेर,  जिला जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादाजी को उनके चाचाजी ने गोद ले रखा था। मेरे दादाजी की म़त्‍यु सऩ् 2003 में हो गई। हमने पंचायत से एक म़त्‍यु प्रमाण पत्र बनवाया जिसमें उनके दत्‍तक पिताजी का अंकन था,  कुछ समय बाद पता चला कि इनके (दादाजी के चाचाजी) पास कोई पैत़ृक जमीन नहीं है सो हमने अपने निज पिताजी के नाम से दूसरा म़ृत्यु प्रमाण पत्र बनवा लिया तथा उसके आधार पर हमारा जमीन में से नामांतकरण खुल गया। क्‍या इस तरह से एक ही व्यक्ति का म़त्‍यु प्रमाण पत्र दो अलग अलग पिताओं के नाम से बनना कानून की नजर में अपराध है? और क्‍या मेरे दादाजी को अपने वास्‍तविक पिताजी व दत्‍तक पिताजी दोनों की सम्‍पत्ति मिल सकती है या कानून केवल एक पिता की सम्‍पत्ति ही लेने के लिए कहता है।

समाधान-

जिस ने भी दादाजी की मृत्यु का प्रमाण पत्र बनवाया वह प्रक्रिया के अधीन बनवाया। इस प्रक्रिया में मृतक के संबंधी कुछ सूचनाएँ जन्म-मृत्यु पंजीयक को देते हैं उस के आधार पर मृत्यु दर्ज हो जाती है। जब उस से लाभ न हुआ तो कुछ सूचनाएँ परिवर्तित कर दूसरा प्रमाण पत्र बनाया इस का अर्थ है आप ने एक ही व्यक्ति की मृत्यु को दो बार रिकार्ड में अंकित करवाया। यह दंडनीय अपराध है और शिकायत होने पर इस मामले में कार्रवाई हो सकती है।

यदि कोई व्यक्ति गोद चला जाए और किसी सहदायिक (पुश्तैनी) संपत्ति में उस का कोई हिस्सा हो तो वह उसी का बना रहता है। गोद जाने से उस के उस हिस्से के स्वामित्व में कोई अंतर नहीं आता। लेकिन गोद जाने के बाद अपने मूल पिता से उत्तराधिकार प्राप्त करने का अधिकार खो देता है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि गोद जाने वाला व्यक्ति दोनों तरह की संपत्ति प्राप्त करने का अधिकारी होता है। लेकिन ऐसा नहीं है।

हर व्यक्ति को ऐसा अधिकार होता है। यदि कोई सहदायिक संपत्ति हो तो उस में तो किसी व्यक्ति का हिस्सा जन्म से ही मिल जाता है। जब कि उस के पिता, व माता की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार का उस का अधिकार उन की मृत्यु पर उत्पन्न होता है। इसी तरह गोद गए व्यक्ति को जिस सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार मिल गया है वह तो उसी तरह बना रहता है। लेकिन उसे अपने गोद पिता व माता की स्वअर्जित संपत्ति में उत्तराधिकार तो प्राप्त होता ही है लेकिन गोद पिता की सहदायिकी में भी हिस्सा प्राप्त करने का उस का अधिकार गोद लेते ही उत्पन्न हो जाता है।

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rp_gavel-1.pngसमस्या-

रोहित ने पटना, बिहारसे पूछा है-

मैं एक निजी संस्थान में बतौर शिक्षक कार्यरत हूँ। मेरी उम्र 31 वर्ष है, इसी वर्ष फ़रवरी में विवाह हुआ है। मेरी माँ की मृत्यु 1994 में हो गयी थी। उस माँ से मेरी एक छोटी बहन (अब विवाहित) तथा एक छोटा भाई है। मेरे पिताजी ने 1995 में पुनर्विवाह किया जिस से उन्हें एक पुत्र है। हम भाई बहन ने हमेशा उनमें माँ ढूंढा मगर उन्हें हमारे लिए कोई वात्सल्य न था, ना आब तक है। मुझे पढ़ाई और कैरियर के नाम पर हमेशा घर से दूर रखा गया। किसी तरह 2016 में मेरी और मेरी बहन की शादी (उनकी मर्ज़ी से ही) हुई। उनकी मर्ज़ी से और पूरी तरह सामाजिक रीति रिवाजों के साथ विवाह करने के बावजूद आज की तारीख में मेरे पिताजी का रवैया मेरा और मेरी पत्नी के प्रति पूरी तरह बदला हुआ है। वे (साथ ही उनकी पत्नी भी) हमे अपने घर से निकल जाने को अक्सर धमकाते रहते हैं। मेरा प्रश्न है कि क्या मेरा कोई क़ानूनी हक़ नहीं है इस घर में रहने का ? मेरे पिता की सम्पत्ति में क्या मेरा कोई हक़ नहीं ? यह घर 2003 में पिताजी ने अपनी दूसरी पत्नी के नाम से बनवाया है।

समाधान-

पुत्र, पुत्री का अपने पिता की संपत्ति में पिता के जीवित रहते कोई अधिकार नहीं होता।  किसी भी व्यक्ति के पुत्र, पुत्री, पत्नी, माता और पिता को स्वयं का भरण पोषण करने में सक्षम न होने पर उस से भरण पोषण का अधिकार है। इस में भी पुत्र को वयस्क होने तक, पुत्री को स्वावलम्बी होने या विवाह होने तक ही यह अधिकार प्राप्त है। यदि कोई सहदायिक संपत्ति है जिस में पिता का हिस्सा है तो पिता के उस हिस्से में पुत्र और अब पुत्रियों को पिता के जीवित रहते बंटवारे का अधिकार प्राप्त है। यह न पूछें कि सहदायिक संपत्ति क्या है इस के लिए आप इस साइट को सर्च कर सकते हैं जवाब मिल जाएगा।

कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति को जीते जी किसी को भी हस्तान्तरित कर सकता है, वसीयत कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति मृत्यु के समय अपनी संपत्ति को निर्वसीयती छोड़ दे तो उस में उत्तराधिकार के कानून के हिसाब से उत्तराधिकारियों को हिस्सा प्राप्त होता है।

आप के मामले में जो संपत्ति आप के पिता ने आप की सौतेली माता के नाम से खरीदी है उस पर उन का खुद का कोई अधिकार नहीं है उस की स्वामिनी केवल आप की सौतेली माता ही हैं।

 

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agricultural-landसमस्या-

मनोज राठौर ने भीलवाड़ा, राजस्थान से पूछा है-

मेरी नानाजी के 3 पीढ़ी पुरानी कृषि भूमिं है  जिसको मेरे मामा और नानी ने नामांतरण कर अपने नाम कर दिया है मेरे नानाजी की मृत्यु 2004 से पहले हो गयी है मेरी नानीजी अभी जीवित है.क्या मेरी मम्मी अपने पिता की यानि मेरे नानाजी की पुश्तेनी कृषि भूमि पर अपना हक जता सकती है ?

 

समाधान-

मीन  पुश्तैनी हो, या न हो। 2004 से पहले आप के नानाजी के देहान्त के बाद उक्त जमीन का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार ही निर्धारित होगा। 2005 के संशोधन के पूर्व भी कानून यह था कि यदि कोई संपत्ति पुश्तैनी/  सहदायिक हो तब भी यदि किसी व्यक्ति के पुत्री मौजूद है तो धारा -8 से ही उत्तराधिकार निर्धारित होगा। धारा 8 में पत्नी, पुत्र व पुत्री प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी हैं।

आप की माताजी को इस आधार पर नामान्तरण को चुनौती देते हुए नामांतरण आदेश की अपील प्रस्तुत करनी चाहिए।

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rp_constition-of-india1.jpgसमस्या-

राहुल शर्मा ने बंसल कालोनी, जीरापुर मध्यप्रदेश से पूछा है-

क्या एक ब्राम्हण जाति के हिंदु धर्म के व्यक्ति को बौद्ध धर्म ग्रहण करने के बाद आरक्षण का लाभ मिल पायेगा या नही?

समाधान-

मारे संविधान में आरक्षण की व्यवस्था अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग को प्राप्त है। जिन जातियों को इन श्रेणियों में रखा गया है उन की एक सूची है। उस सूची में दर्ज जाति में जन्म लिए व्यक्ति को आरक्षण का लाभ मिलता है अन्य किसी को भी नहीं मिलता। जन्म लेने के पहले ही भारत में जाति निर्धारित हो जाती है। जाति परिवर्तन आसानी से नहीं होता और हो जाने पर भी यह आवश्यक नहीं है कि बदली हुई जाति को आरक्षण का लाभ मिलने पर भी जाति परिवर्तित कर शामिल हुए व्यक्ति को आरक्षण का लाभ मिल ही जाए।

आरक्षण के लिए जाति का निर्धारण करते समय यह देखा जाएगा कि व्यक्ति उस जाति में पैदा हुआ है या नहीं। धर्म परिवर्तन से जाति परिवर्तित नहीं होती केवल धर्म बदलता है जो कि एक मान्यता मात्र है। सभी बौद्धों को आरक्षण का लाभ प्राप्त नहीं है। केवल पिछड़ी जाति के बौद्धों को ही आरक्षण का लाभ प्राप्त है। एक ब्राह्मण को धर्म परिवर्तन के उपरान्त इन तीनों ही श्रेणियों में आरक्षण प्राप्त नहीं हो सकता।

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rp_gavel-1.pngसमस्या-

द्वारका ने बीकानेर राजस्थान से पूछा है-

मेरे परदादा जी ने सन 1926  में एक घर ख़रीदा।  परदादा जी की मृत्य 1930  के आस पास हो गई।   परदादा जी के एक लड़के मेरे दादाजी हुए।   दादाजी के चार लड़के तीन लडकियाँ हुईं।  दादाजी की मृत्यु सन 1983 में हो गई। अंकल ने सन 1988 में अपना हिस्सा लेने के लिए मेरे पिताजी पर विभाजन का मुकदमा किया। मुकदमा ख़ारिज हो गया।  अब अंकल के लड़के ने सन 2008 में मेरे दादा जी के नाम से अपने पिता के पक्ष में सन 1981 की एक फर्जी वसीयत बना कर घर को 2009 में बेच दिया। वसीयत में मेरी एक भुआ को 1981 में मरा हुआ बताया गया है जबकि मेरी भुआ मेरे दादा जी के 3 साल  बाद 1986 में  मरी है ,लेकिन  पुलिस ने इस बात को जाँच में शामिल नहीं किया।  हिन्दू उत्तराधिकार 1925 और हिन्दू उत्तराधिकार 1956  के अनुसार तो पुस्तैनी घर की वसीयत करने का दादा जी को अधिकार ही नहीं था।  दादाजी को उत्तराधिकार, परदादा जी की मृत्यु होने के बाद 1930 के आस पास में ही मिल गया था।   मामला 2009 से कोर्ट में चल रहा है। क्या घर पुस्तैनी कहलायेगा?  क्या दादा जी को पूरे घर की वसीयत करने का अधिकार था?  क्या कोर्ट इस तरफ भी ध्यान देगी कि घर तो पुस्तेनी है?

समाधान-

प का मकान पुश्तैनी और सहदायिक संपत्ति है। यह आप के दादा जी की निजि संपत्ति नहीं थी। जो भी दीवानी वाद अदालत में लंबित है उस में आप को वसीयत को भी चुनौती देनी चाहिए। क्यों कि वसीयत के कंटेंट गलत हैं और कोई भी पिता अपनी जीवित पुत्री को मृत घोषित नहीं कर सकता। उस के गवाह आदि को जिरह करने पर वसीयत भी गलत साबित हो सकती है।

सहदायिक संपत्ति में पुत्रों का जन्म से अधिकार होता है। इस कारण आप के दादा जी द्वारा की गयी संपूर्ण सम्पत्ति की वसीयत कानून के विपरीत है। आप के दादाजी उन के अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे, पूरी संपत्ति की नहीं।

फिर भी इस प्रकरण में अन्य अनेक जटिल बिन्दु आ सकते हैं, बल्कि अनिवार्य रूप से आएंगे। इस कारण आप का वकील ऐसा होना चाहिए जो कानून की नवीनतम व्याख्याओं की जानकारी रखता हो और लगातार नयी जानकारियाँ हासिल कर पैरवी करता हो। आप को भी विशेष रूप से एलर्ट रहने की जरूरत है। अनेक बार मुवक्किल की सुस्ती और नवीनतम कानूनी व्याख्याओं की जानकारी न होने से भी मुकदमें में हार का मुहँ देखना पड़ता है।

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