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पति-पत्नी को साथ रहने या रखने को बाध्य नहीं किया जा सकता।

July 21, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

प्रभाकर कुमार ने  झारखण्ड राज्य के गोड्डा जिले में गुलजारबाग, जिला गोड्डा, झारखंड से पूछा है-

मेरी एक बहन है, जिसका नाम प्रियंका है। जन्म से ही प्रियंका थोड़ी मंदबुध्दि की है। जब वो विवाह योग्य हुई तो उसके विवाह संबंधी चर्चा समाज में की जाने लगी। चूँकि प्रियंका मंदबुध्दि की थी इसलिए व्यवहारिक है उससे कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति विवाह को तैयार नहीं था। पिताजी द्वारा इस बात की भी घोषणा की गयी कि यदि कोई ऐसा लड़का जो गरीब हो और पढ़ा-लिखा हो प्रियंका से विवाह करेगा तो उसकी आगे की पढाई लिखाई का पूरा खर्च पिताजी द्वारा दिया जायेगा। एक लड़का प्रियंका से विवाह संबंधी बातचीत के लिए सामने आया। नयंजय भारती (उर्फ़ श्रीकांत मंडल) जो बिहार राज्य के बाँका जिले के बाराहाट प्रखंड में ग्राम- बेलटिकरि का निवासी है। वो गुलजारबाग मोहल्ले में ही रहकर बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता था। उसे उसके माता-पिता द्वारा पढ़ाई हेतु पैसा नहीं दिया जा रहा था अतः वह बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपने पढ़ाई का खर्च पूरा किया जा रहा था। नयंजय भारती प्रियंका के मानसिक दशा से भली-भाँति परिचित था, वो सारी बातें जानते हुए भी वह प्रियंका से विवाह को तैयार हुआ। मेरे पूरे परिवार द्वारा भी नयंजय भारती को प्रियंका के मानसिक दशा से परिचित कराया गया। नयंजय भारती ने इस बात को स्पष्ट किया कि वह प्रियंका के साथ सामन्जस्य बिठा लेगा।

अंततः दोनों परिवारों की रजामन्दी से इस रिस्ते की अनुमति प्रदान की गयी। प्रियंका और नयंजय भारती का विवाह 2005 में हुआ। शादी के कुछ हफ्ते बाद मेरे पिताजी द्वारा नयंजय भारती को पटना प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी हेतु भेजा गया। वह पटना में  2008 तक रहा। इस दौरान उसके सभी प्रकार के जरूरतों को पूरा मेरे पिताजी द्वारा किया गया। इसके बाद नयंजय भारती नोएडा (दिल्ली) चला गया और वहां किसी प्राईवेट कंपनी में नौकरी करने लगा।  उसी क्रम में 2012 में उसका चयन रेलवे विभाग में ग्रुप डी के पद पर हुआ। उसके बाद नयंजय द्वारा प्रियंका को मेरे माता-पिता के पास पहुंचा दिया गया। उसके कुछ दिनों बाद नयंजय भारती के जीजा का एक दिन फोन आया और उसने पिताजी से सवाल किया कि प्रियंका के साथ नयंजय का जीवन कैसे गुजरेगा? साथ ही अप्रत्यक्ष रूप से उसने दूसरी शादी की भी बात कह दी। पिताजी द्वारा इस बात की सूचना मुझे प्राप्त हुई। इसके बाद नयंजय भारती से बात करने के लिए उसे गोड्डा बुलाया गया, जहाँ उसने रुपयों की मांग रख दी, उसे मेरे परिवार के सदस्यों द्वारा काफी समझाया गया किन्तु वह कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हुआ। बाद में मैं पुनः अपने मित्र और फुआ के दामाद यानि जीजा जी के साथ नयंजय भारती के घर गया। वहां पर उसके परिवार के सभी सदस्यों ने ये स्पष्ट कहा कि वह नयंजय की दूसरी विवाह करायेंगें।

अंततः बाध्य होकर मैं न्यायालय की शरण में गया। न्यायालय में नयंजय से सहमति बनी तथा प्रियंका को नयंजय भारती अपने साथ जगाधरी, हरियाणा ले गया जहाँ वह कार्यरत है।  किन्तु  बार बार प्रताड़ित करना जारी रखा । इस वर्ष नयंजय भारती दूसरी शादी करने के लिए घर आया हुआ था जिसकी सूचना मेरी बहन द्वारा मुझे प्राप्त हुई। मैंने इसकी सूचना बाँका के पुलिस अधीक्षक को दिया। जिससे विवाह की रात्रि में पुलिस उनके घर गयी। लेकिन उसी दिन शाम को नयंजय प्रियंका को मेरे आवास गोड्डा पहुंचाकर चला गया। मुझे बाद में पता चला कि नयंजय का विवाह मंदिर में होना था किन्तु जब पुलिस उनके घर गयी तो उसकी शादी रुक गयी। मेरी बहन अभी तक संतान सुख से वंचित है, जब मेरे परिवार द्वारा 2012 में प्रियंका का मेडिकल चेकअप कराया गया तो मेडिकल रिपोर्ट में रिजल्ट सामान्य आया और डॉक्टर ने नयंजय को भी अपना चेकअप कराने को कहा किन्तु उसने नहीं कराया। जब मेरे परिवार द्वारा नयंजय को IVF करने की बात की तो वह तैयार नहीं।  इस विषय पर नयंजय का कहना है कि वह IVF (टेस्ट ट्यूब बेबी) तकनीक का उपयोग नहीं करने वाले है बल्कि दूसरी विवाह करेंगे। हम सभी नयंजय को पूर्ण सहयोग करने को तत्पर हैं किन्तु नयंजय भारती केवल दूसरी विवाह कर मेरी बहन के साथ साथ मेरे पूरे परिवार को मानसिक दवाव व तनाव बनाये हुए हैं, जिस कारण मेरी माँ और पिताजी की तबियत बराबर ख़राब रहने लगी है।

ये बात तो स्पष्ट है कि उसने मेरे पिताजी की अच्छाइयों का और मेरी बहन की कमजोर मानसिक स्थिति का गलत लाभ उठाया है.. उसे न तो कानून का डर है और ना ही हमलोगों की बातों की कोई कदर। वो पुनः विवाह करने के लिए बातचीत करना प्रारम्भ कर दिया है। वो सारी बातें गुपचुप तरीके से करता है जिसके बारे में उसके करीबी कुछ लोगों को ही पता रहता है। उसकी पिछली शादी कहाँ तय हुई ये हमलोगों को सप्ताह भर बाद पता चला था। वह पुनः विवाह के प्रयास में है कृपया मार्गदर्शन करने की कृपा करें।अतः अनुरोध है कि कृपया मार्ग दर्शन करने की कृपा करें।

समाधान-

प की बहिन मंदबुद्धि थी, उस से कोई विवाह नहीं करेगा,  यह आप के परिवार को आशंका थी। इस कारण उन्हों ने विवाह के लिए लालच रखा कि कोई युवक उस से विवाह करेगा तो आप के पिता उसे विद्याध्ययन और रोजगार प्राप्त करने में भरपूर मदद करेंगे। इस तरह आप के पिता ने बेटी को ट्राफी बना दिया कि जो कोई इसे ले जाएगा उसे बड़ा ईनाम मिलेगा। एक जरूरतमंद आदमी ने इस ट्राफी को ले जा कर अपनी जरूरतें पूरी कर लीं। उस का विद्याध्ययन हो गया, उसे रोजगार मिल गया जो अब स्थायी भी है और कमाई भी अच्छी है। अब उसे आप की बहिन बोझा लगने लगी है। अब वह चाहता है कि किसी सामान्य स्त्री से विवाह कर के सामान्य जीवन बिताए, और अपनी ट्राफी पत्नी के बोझे से छुटकारा प्राप्त कर ले।  आप को लगता है कि नयंजय ने आप के साथ धोखाधड़ी की है। उस ने एक कांट्रेक्ट के तहत आप की बहिन से विवाह किया था और वह उस कांट्रेक्ट को तोड़ रहा है, यह न केवल गैर कानूनी है बल्कि अनैतिक भी है।

कोई मंदबुद्धि स्त्री भी स्त्री और मनुष्य ही होती है। उस में भी शारीरिक और मानसिक सौंदर्य हो सकता है, वह स्वयं भी प्रेम कर सकती है और उस से प्रेम भी किया जा सकता है। यदि हमारे समाज में लड़के लड़कियों का आपस में मिलने जुलने और एक दूसरे को समझने के सामान्य अवसर उपलब्ध होते तो शायद कोई लड़का ऐसा भी मिलता जो आप की बहिन से प्यार कर सकता था और उस से प्रेम के वश विवाह कर सकता था। तब ऐसी स्थिति संभवतः नहीं आती जो आज खड़ी है। आप के पिता ने जो लालच रखा था वह नयंजय की तात्कालिक जरूरत थी। उस ने उसे सीढ़ी बनाया और दुमंजिले पर चढ़ गया। वह अब भी आप की बहिन को सीढ़ी बनाए रखना चाहता है। इसी कारण उस ने आप के बात करने पर आप के पिता के सामने रुपयों की मांग रख दी। जिस व्यक्ति ने आप की बहिन को सदैव सीढ़ी बना कर रखा है, वह कभी उसे न तो प्रेम कर सकता है और न ही उसे सम्मान दे सकता है, न ही स्वैच्छा से उस के भरण पोषण का दायित्व उठा सकता है। एक व्यक्ति ने आप के पिता के दिए लालच का लाभ उठाया और उस के जो दायित्व थे उन्हें नहीं निभाया। लेकिन आप के पिता ने खुद लालच परोस कर अपनी बेटी के जीवन को नर्क बना दिया यह भी सही है।

अब हम कानूनी स्थिति पर विचार करते हैं। प्रियंका नयंजय की विवाहिता पत्नी है, जो मंदबुद्धि है। वह तब भी थी जब उस का विवाह हुआ था और यह बात नयंजय को पता होते हुए उस ने विवाह किया था। यह विवाह या तो सहमति से तलाक ले कर समाप्त हो सकता है या फिर किसी एक पक्ष द्वारा विवाह विच्छेद के लिए दिए गए प्रार्थना पत्र पर दोनों पक्षों की सुनवाई की जा कर न्यायालय की डिक्री से समाप्त हो सकता है। इस विवाह के समाप्त हुए बिना नयंजय दूसरा विवाह करता है तो वह अवैध होगा और धारा-494 आईपीसी के अंतर्गत दंडनीय अपराध भी होगा। लेकिन यदि आप उसका दूसरा विवाह होना साबित नहीं कर सकते हैं या फिर नयंजय  बिना विवाह किए किसी भी स्त्री को पत्नी की तरह साथ रह कर रहने लगता है तो यह किसी तरह का अपराध नहीं होगा। केवल ऐसा जारकर्म होगा जो अपराध तो नहीं होगा लेकिन जिस के कारण आप की बहिन को तलाक लेने का अधिकार मिल जाएगा। आप की बहिन को तलाक लेने का लाभ तभी है जब कि उस से कोई दूसरा व्यक्ति विवाह करने को तैयार हो या फिर वह एक तलाकशुदा स्त्री के रूप में आप के साथ रहने और आप उसे अपने साथ रहने को तैयार रहें। वैसे वह अभी आप के साथ ही रह रही है।

कानून में किसी भी व्यक्ति को व्यक्तिगत सेवा के लिए बाध्य करने का कोई आदेश न तो पारित किया सकता है और न ही पारित हो जाने पर उस का निष्पादन कराया जा सकता है। किसी पत्नी या पति को अपने पार्टनर के साथ रहने या उसे साथ रखने को बाध्य नहीं किया जा सकता। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा-9 में यह उपबंधित किया गया है कि यदि कोई दाम्पत्य अधिकारों को मानने से इन्कार कर दे तो इस के लिए डिक्री पारित की जा सकती है। लेकिन इस डिक्री के आधार पर कोई अपने पार्टनर के साथ रहने या उसे साथ रखने से इन्कार कर दे तो उसे बाध्य नहीं किया जा सकता। उस से भी आप की बहिन को केवल तलाक प्राप्त करने का अधिकार ही प्राप्त हो सकता है।

अब इन परिस्थितियों में आप को अभी यह करना चाहिए कि आप की बहिन की ओर से धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के लिए आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए। प्रताड़ना के लिए और आप की बहिन के स्त्रीधन के लिए धारा 498-ए व धारा 406 में पुलिस को रिपोर्ट दे कर या न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर नयंजय और उस के रिश्तेदारों के विरुद्ध अपराधिक मुकदमा दर्ज कराया जा सकता है। दूसरा विवाह करना और पति के रिश्तेदारों का उस के लिए प्रयत्न करना भी प्रताडऩा में आता है धारा 498-ए का अपराध बनता है। आप कीबहिन की ओर से भरण पोषण प्राप्त करने के लिए स्त्रियों के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम तथा धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में भी कार्यवाही करना चाहिए। इस के बाद क्या परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं इस पर दोबारा से विचार कर के निर्णय किया जा सकता है।

हमारी राय में प्रियंका के हक में सब से बेहतर यह है कि उसे भरण पोषण दिलाया जाए जिस के लिए न्यायालय अवश्य आदेश करेगा। यह भरण पोषण उसे नयंजय के जीवनकाल में तब तक मिलेगा जब तक कि वह तलाक ले कर दूसरा विवाह नहीं कर लेती। बेहतर तो यही है कि उक्त तमाम मुकदमों के हो जाने के बाद जब आप बारगेंनिंग करने की स्थिति में हों नयंजय और उस के परिवार से साफ बात करें कि वह प्रियंका के भविष्य के जीवन के लिए कितना धन एक मुश्त दे सकता है? यदि वह एक बड़ी धनराशि उसे देने को तैयार हो तो सहमति से तलाक ले लिया जाना चाहिए। प्राप्त धनराशि को प्रियंका के नाम जमा करना चाहिए या उस से कोई ऐसी संपत्ति बनानी चाहिए जिस से प्रियंका को इतनी स्थायी आय हो जाए जिस से उस का जीवन भर खर्च आराम से चलता रहे। तलाक हो जाने के बाद कोशिश की जाए कि प्रियंका को प्रेम करने वाला कोई सही जीवनसाथी मिल जाए। यदि नहीं भी मिलता है तो वह आपके परिवार के साथ जीवन बिताए।  नयंजय को उस के हाल पर छोड़ दिया जाए।

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समस्या-

मखदूमपुर गोमती नगर विस्तार लखनऊ से संतपाल ने पूछा है-

मेरे पिता जी पिता के नाम एक ४ बिस्वा प्लाट है।  पर उस प्लाट मे एक व्यक्ति ३५ साल से घर बनवाकर रह रहा है । अब वह अपना हक बताता है इस स्थिति मे उसे किस प्रकार घर से बेदखल किया जाये।

समाधान-

मारे पास अक्सर आप के जैसे सवाल आते है ंकि हमारी पुश्तैनी, या दादा जी की, या पिताजी की जमीन है उस पर कुछ लोगों ने कब्जा कर के 15, 20, 25, 35 या अधिक वर्ष से मकान बना लिया है या उस पर खेती कर रहे हैं या फिर और कुछ कर रहे हैं।

भाई जब किसी ने आप की जमीन पर कब्जा किया और वहाँ अपना निर्माण या काम करने लगा तब क्या आप सोए हुए थे? और फिर उस के बाद अभी तक 12-13 या उस से अधिक सालों से क्या आप और आप के तमाम परिवार वाले सोए रहे? आपने सुना होगा कि सोते रहने वाले सब कुछ खो देते हैं।

आप बताइए कि आप की सम्पत्ति पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया है लेकिन संपत्ति अभी तक आप के स्वामित्व की है तो आप को चाहिए क्या? आप उस का कब्जा ही तो वापस लेना चाहते हैं? यदि आप कब्जा वापस लेना चाहते हैं तो आप को अचल संपत्ति के कब्जे के लिए वाद संस्थित करना पड़ेगा। वैसी स्थिति में कब्जा आप के हाथ से निकल जाने की तिथि से केवल 12 वर्ष की अवधि में आप ऐसा कर सकते हैं।  इस से अधिक अवधि हो जाने पर आप का अचल संपत्ति के कब्जे का वाद इसलिये खारिज हो जाएगा कि आप ने दावा करने की निर्धारित अवधि में यह दावा पेश नहीं किया।

आप सभी इसे ठीक से पढ़ लें, और हमें ऐसे सवाल न भेजें जिन में आप अपनी अचल संपत्ति पर 12 वर्ष से पहले हो चुके कब्जे को वापस लेना चाहते हों। हम आज के बाद से इस तरह के सवालों का कोई उत्तर नहीं देंगे।

Women rights

समस्या-

रघुनदंन सोलंकी ने विजयनगर, सवाईमाधोपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मारी पुस्तैनी जमीन है।  मेरे पिताजी के हम तीन पुत्र हैं, कोई पुत्री नहीं है। मेरे पिताजी का देहान्त हो चुका है, तथा हमारी माताजी जीवित हैं।  हमारे दोनो बड़े भाईयो की शादी हो चुकी है।  परन्तु शादी के 1 साल बाद हमारे मंझले भाई की निसंतान अवस्था मे मृत्यु हो गई। उसके 1 माह बाद हमारी भाभी मायके चली गई,  6 माह बाद उनके घरवालो ने बिना हमें बताये उनका नाता किसी के साथ कर दिया (नाता प्रथानुसार)।  मेरी भाभी और उनके दूसरे पति ने हम बताये बिना धोखे से हमारी पुस्तैनी जमीन पर नामांतरण खुलवाकर 1/4 में से 1 हिस्सा स्वंय के नाम कर लिया।  नामांतरण 2015 में खुलवाया गया जबकि उनका नाता 2013 में हुआ, जिसके सबूत के रुप मे हमारे पास 2014 में बनाये गये आधार, पहचान पत्र, राशन कार्ड की प्रति है जिनमे पति के रुप में उनके दूसरे पति का नाम है।  उसे दूसरे पति से एक पुत्र भी है।  तो क्या इस स्थिति में भी वह हमारी पुस्तेनी जमीन मे हिस्सेदार है?  क्योंकि हमे डर है कि कहीं वो जमीन बेच न दे? कृपया मदद करें।

समाधान-

प की निस्संतान विधवा भाभी ने नाता विवाह कर लिया है और उस के बाद उस ने आप की पुश्तैनी जमीन का नामान्तरण राजस्व रिकार्ड में करवा लिया है। जिस के अनुसार एक चौथाई संपत्ति उस के नाम दर्ज हो गयी है। इन तथ्यों के साथ मूलतः आप की समस्या यह है कि कही विधवा भाभी उस के नाम नामान्तरित एक चौथाई संपत्ति को  विक्रय न कर दे? क्या उसे नाता करने के बाद भी पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने और नामान्तरण कराने का अधिकार था?

सब से पहले तो आप को यह समझना चाहिए कि पुश्तैनी संपत्ति क्या है?  पुश्तैनी संपत्ति जिन संपत्तियों के सम्बंध में कहा जाता है उन्हें हमें सहदायिक संपत्ति कहना चाहिए। ऐसी संपत्ति जो कि किसी हिन्दू पुरुष को उस के पिता, दादा या परदादा  से उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। ऐसी संपत्ति में उत्तराधिकारी के पुत्र का हिस्सा जन्म से ही निश्चित हो जाता था। लेकिन 17 जून 1956 से हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू हो गया। इस तरह किसी भी स्वअर्जित संपत्ति का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम से शासित होने लगा। जिस में पुत्रों के साथ साथ पुत्रियोँ, पत्नी और माँ को बराबर का हिस्सा दिया गया था।  इस का अर्थ यह हुआ कि उक्त तिथि 17.06.1956 के बाद से कोई भी संपत्ति सहदायिक संपत्ति बनना बन्द हो गयी। इस कारण यदि कोई संपत्ति दिनांक 17 जून 1956 के पहले किसी हिन्दू पुरुष को उसके पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तो वह सहदायिक होगी। लेकिन इस तिथि के बाद कोई भी स्वअर्जित संपत्ति सहदायिक नहीं हो सकती थी।तो पहले आप जाँच लें कि जिसे आप अपनी पुश्तैनी संपत्ति बता रहे है वह वास्तव में सहदायिक संपत्ति भी है या नहीं है।

आप का मामला 2005 के बाद का है। इस कारण आप की इस संपत्ति पर 2005 के संशोधन के बाद का हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होगा। उस की धारा 6(3) में यह उपबंध है कि किसी सहदायिक संपत्ति मेंं हि्स्सेदार हिन्दू (पुरुष और स्त्री दोनों) की मृत्यु हो जाती है तो यह माना जाएगा कि सहदायिक संपत्ति में उस का जो हिस्सा था वह संपूर्ण सहदायिक संपत्ति का विभाजन हो कर उसे मिल चुका था और उस का उस हिस्से का उत्तराधिकार उत्तरजीविता के आधार पर नहीं बल्कि हिन्दू उतराधिकार अधिनियम के उपबंधों के अनुसार निश्चित किया जाएगा।

उक्त नियम के अनुसार जिस दिन आप के पिता जी की मृत्यु हुई उस दिन उन का हिस्सा तीन भाइयों और माँ को बराबर के चार हिस्सों में मिल गया अर्थात संपत्ति में सभी का 1/4 हिस्सा हो गया। अब एक विवाहित निस्संतान भाई की मृत्यु हो गयी तो उस का हिस्सा उस की पत्नी के हिस्से में उसी दिन चला गया जिस दिन आप के भाई की मृत्यु हो गयी थी। उस भाभी ने बाद में नाता कर लिया। उस ने नाता किया। विधवा होने के बाद तो वह  वैधानिक विवाह भी कर सकती थी। इस नाते को भी वैधानिक विवाह ही माना जाएगा। लेकिन नाता होने से या विवाह कर लेने से  किसी विधवा को उस के पति से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति वापस अन्य उत्तराधिकारियों में जाने की कोई विधि या कानून नहीं है। पति से उत्तराधिकार प्राप्त कर लेने से विधवा के विवाह में भी किसी तरह की रोक नहीं है।

इस तरह आप की विधवा भाभी ने नाता करने के उपरान्त भी जो नामान्तरण खुलवाया है वह विधिपूर्वक है। वह आज भी उस 1/4 हिस्से की स्वामिनी है। वह जमीन का बंटवारा करवा कर अपने हिस्से को अलग करवा कर अपना खाता अलग खुलवा सकती है अपने हिस्से पर अलग से कब्जा प्राप्त कर सकती है और उसे विक्रय या किसी भी प्रकार से हस्तान्तरित कर सकती है। वह बिना बंटवारा कराए भी अपने हिस्से की भूमि का विक्रय कर सकती है।

 

दत्तक ग्रहण कैसे होगा?

March 19, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

किशन बास वाला ने जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मैं एक हिंदू परिवार से हूं और मेरे दो बच्चे हैं मेरी छोटी वाली बच्ची जिसका जन्म अभी हुआ है, उसको मेरे माता पिता गोद ले रहे हैं।  क्या मैं बच्ची को गोद दे सकता हूँ और यदि गोद देता हूं तो उसकी प्रक्रिया क्या होगी? अभी बच्ची का जन्म सर्टिफिकेट नहीं बना है तो जन्म सर्टिफिकेट बच्ची का किस नाम से बनेगा मेरे नाम से या मेरे माता पिता के नाम से बनेगा? बच्ची का जन्म हॉस्पिटल में हुआ है?

समाधान-

बेटी का जन्म अस्पताल में हुआ है, वहाँ आप की पत्नी और आप का नाम दर्ज है। वे प्रमाण पत्र में भी वही नाम लिखेंगे जिस के आधार पर जन्म मृत्यु पंजीयक के यहाँ से जन्म-प्रमाण पत्र जारी होगा। वैसे भी जन्म के समय तो दत्तक नहीं हुआ था इस कारण जन्म प्रमाण पत्र में तो जन्मदाता माता पिता का नाम ही अंकित किया जाएगा। यदि कोई जुगाड़ कर के आपके माता पिता का नाम दर्ज करा दें तो यह गलत होगा और दर्ज कराने वाला परेशानी में पड़ सकता है कि उस ने गलत तथ्य बता कर जन्म प्रमाण पत्र बनवाया है। ऐसे अनेक अपराधिक मुकदमे राजस्थान में चल भी रहे हैं।

आप अपनी पत्नी की सहमति से बेटी को अपने माता पिता को गोद दे सकते हैं। इस के लिए आप व आप की पत्नी तथा आप के माता-पिता द्वारा दत्तक ग्रहण विलेख निष्पादित कर आपके क्षेत्र के उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत कराना होगा।

गोदनामा और वसीयत दोनों ही प्रभावी रहेंगे।

March 4, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अंकित ने ग्राम सेथवाल, रानी की सराय, जिला आजमगढ़ (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरी नानी ने अपनी दो बेटियों को वसीयत करने के बाद मुझे पंजीकृत विलेख से दत्तक ग्रहण किया है। उनकी छोटी पुत्री मेरी जन्मदात्री माता है।  मैं जानना चाहता हूँ कि सम्पत्ति के लिए गोदनामा प्रभावी है या वसीयत?

समाधान-

गोदनामा और वसीयत दोनों विलेख अपने अपने तरीके से प्रभावी होंगे। वसीयत तो वसीयत करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त प्रभावी होती है। वसीयत को मृत्यु के पहले तक कभी भी बदला जा सकता है। एक ही विषय में अनेक वसीयतें होने पर एक व्यक्ति की अन्तिम वसीयत सभी को सुपरसीड करेगी।

गोदनामा से आप अपनी नानी के गोद पुत्र हो गए हैं। यदि परिवार में पहले से कोई पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति हो तो जो संपत्ति नाना की मृत्यु के बाद नानी को मिली है उस में आप के गोद लेने से नानी के साथ साथ आप का हिस्सा भी तय हो चुका है। अब यदि आप की नानी की मौजूदा वसीयत बनी रहती है तो नानी के हिस्से की जो भी संपत्ति होगी वह वसीयत में आप की माँ व मौसियों को मिलेगी। इस संबंध में आप को सभी दस्तावेज बता कर किसी स्थानीय दीवानी विधि के जानकार वकील से परामर्श करना चाहिए।

अचल संपत्ति पर कब्जे से सम्बन्धित अथिकार क्या हैं?

February 19, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मेरे दादाजी एक भूमि पर 25 साल से आधिक समय से कोई किराया दे कर रहते हैं, या जानवर वगैरह बांधते हैं, तो क्या इस भूमि पर हमारा कोई कानूनी अधिकार है?

– सागर पटेल, निवासी -261, तिलक नगर कोंच, जिला जालौन, 285205 , उत्तर प्रदेश

समाधान-

कोई भी व्यक्ति यदि किसी भूमि या अचल संपत्ति पर काबिज है अर्थात अपना आधिपत्य रखता है तो उसे यह कानूनी अधिकार प्राप्त है कि कोई भी उस व्यक्ति से उस संपत्ति के कब्जे से बिना किसी कानूनी प्रक्रिया से प्राप्त आदेश के बिना बेदखल नहीं कर सकता। यदि उसे जबरन बेदखल किया जाता है तो वह बेदखल किए जाने की तिथि से 60 दिनों की अवधि में अपने क्षेत्र के कार्यपालक दंडनायक (एक्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट) के न्यायालय में धारा 145 दंड प्रक्रिया संहिता में आवेदन प्रस्तुत कर सकता है। मजिस्ट्रेट दोनों पक्षों को नोटिस जारी कर के अपना अपना पक्ष रखने को कहेगा। यदि यह पाया गया कि आवेदन प्रस्तुत करने की तिथि से 60 दिन पहले की अवधि में किसी व्यक्ति को कब्जे से बिना किसी कानूनी प्रक्रिया किया गया है तो वह उस संपत्ति का कब्जा वापस उसी व्यक्ति को दिलाएगा जिस का उस संपत्ति पर कब्जा था।
इस तरह के मामलों में जिस व्यक्ति का किसी भी संपत्ति पर कब्जा है उसे इतना सक्षम होना चाहिए कि किसी तरह का विवाद हो तो वह मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य से यह साबित कर सके कि विवाद के पूर्व उस का उस संपत्ति पर वास्तविक कब्जा था।
यदि कोई व्यक्कि किसी संपत्ति पर लायसेंसी, या किराएदारी के कारण कब्जे में है तो भी उस से बिना कानूनी प्रक्रिया के संपत्ति का कब्जा जबरन नहीं लिया जा सकता। उस के लिए भी अदालत का निर्णय होना चाहिए और कानूनी प्रक्रिया से बेदखल किया जाना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति संपत्ति के स्वामी की अनुमति के बिना किसी संपत्ति पर काबिज है और इस कब्जे को 12 वर्ष से अधिक समय हो गया है तो फिर संपत्ति का स्वामी अपने स्वामित्व के आधार पर उस व्यक्ति के विरुद्ध कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद नहीं ला सकता और इस तरह कहा जाता है कि जो व्यक्ति संपत्ति पर इतने अधिक समय से काबिज है उस का उस संपत्ति पर प्रतिकूल कब्जा हो चुका है। लेकिन यह संपत्ति किसी व्यक्ति की न हो कर सरकार या किसी सरकारी संस्था की हो तो 12 वर्ष की अवधि 30 वर्ष मानी जाएगी।

बँटवारा और पृथक कब्जा ही समस्या का हल है।

December 25, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

रामकुमार महतो ने ग्राम बाहेरी, जिला दरभंगा, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा के पिताजी तीन भाई थे, उन तीनों के नाम से एक जमीन है। जिसके पहले कॉलम मे बहिस्सा बराबर लिखा हुआ है, और कैफियत खाना में तीनों के नाम से अलग-अलग खेसरा नं देकर उनके आगे कब्जा दिखाया गया है। जिसके अनुसार सभी अपने हिस्से के जमीन पर बिना किसी विवाद के लगभग 80 वर्षों से रहते चले आ रहे हैं। उस हिस्से में किसी के पास कम जमीन है तो किसी के पास अधिक जमीन है। आगे चलकर कुछ लोगों ने अपने हिस्से की जमीन का कुछ हिस्सा बेच भी दिया है जिस पर किसी को भी कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन कुछ लोगों के कहने पर मेरे विपक्षी ने 2012 से मेरे साथ सम्पत्ति को बराबर हिस्से में बटवारा को लेकर विवाद करने लगे। अब उनके साथ ग्राम पंचायत के पूर्व सरपंच का समर्थन भी है। वे लोग जबरदस्ती मेरे हिस्से की जमीन पर (जिस पर मकान बनाकर हम लोग लगभग 50 वर्ष पूर्व से बिना किसी विवाद के रहते चले आ रहे हैं ) कब्जे की कोशिश करते हैं। जिससे जान माल के नुकसान का भय हमेशा बना रहता है। कृप्या सही सलाह दें?

समाधान-

प की उक्त वर्णित संपत्ति पुश्तैनी है और वह अभी भी आप के परदादा और उन के भाइयों के नाम दर्ज है। जब भी जमीन के किसी खातेदारी की मृत्यु हो जाती है तो उस के उत्तराधिकारियों का यह दायित्व होता है कि वे मृतक का नाम खारिज करवा कर उस के उत्तराधिकारियों के नाम और उन के हिस्से रिकार्ड में दर्ज कराएँ। यदि उत्तराधिकारी उन के नाम और हिस्से दर्ज करवा भी दें तो केवल यह दर्ज होता है कि कुल जमीन में उन का हिस्सा कितना है। उन का पृथक हिस्सा कौन सा है यह दर्ज नहीं होता। उस के लिए किसी भी जमीन के सभी मौजूदा हिस्सेदारों को आवेदन दे कर अपने अपने खाते अलग कराने चाहिए और हिस्से भी अलग अलग करा लेने चाहिए जिस से भविष्य में समस्या न हो।

आपने जो रिकार्ड भेजा है उस में पूरी संपत्ति किस की है यह दर्ज है उन के हिस्से भी दर्जै हैं साथ ही यह भी दर्ज है कि जमीन के कौन से हिस्से पर किस का कब्जा है। जब किसी कब्जे दार ने अपने हिस्से की जमीन का कोई हिस्सा विक्रय किया तो उस ने अपने कब्जे की जमीन में से उतना हिस्सा खऱीददार के कब्जे में दे दिया। जब कि विक्रय या तो खाते में दर्ज ही नहीं हुआ और दर्ज हुआ होगा तब भी वह आप के साथ संयुक्त खातेदार रहेगा जब तक कि सभी खातेदारों / हिस्सेदारों का विभाजन हो कर उन के पृथक पृथक हिस्से दर्ज हो कर उन्हें उन के हिस्सों पर कब्जा न दे दिया जाए।  इस तरह समस्या तो बनी हुई है और इस का समाधान भी आसान नहीं है। इस समस्या का हल या तो आपसी सहमति से हो सकता है या फिर अदालत में विवाद के निर्णय और निष्पादन से। अदालत में विभाजन होना और उस का निष्पादन होना बहुत लंबी प्रक्रिया है। लेकिन वही सही हल है।

आप के कब्जे में जो जमीन और मकान है वह स्पष्ट रूप से रिकार्ड में दर्ज है। इस कारण कोई भी आप को अपने कब्जे से बिना किसी अदालत के निर्णय और निष्पादन के बेदखल नहीं कर सकता। यदि किसी को बंटवारा करवा कर अपना हिस्सा अलग करवाना है तो वह अदालत में विभाजन का दावा करे। जो लोग आप को बेदखल करने का प्रयास कर रहे हैं उन से आप कह सकते हैं कि वे पहले अदालत से फैसला करवाएँ। फिर भी आप यदि परेशानी से बचना चाहते हैं तो किसी वकील से मिल कर राजस्व रिकार्ड में दर्ज आप के कब्जे की जमीन से जबरन बेदखल किए जाने के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त करने के लिए दावा करा सकते हैं। एक बार निषेधाज्ञा प्राप्त हो जाने पर बेदखली के विरुद्ध आप को सुरक्षा मिल जाएगी।

समस्या-

अश्विनि कुमार ने एमक्यू119, दीपिका कालोनी, पोस्ट- गेवरा प्रोजेक्ट, जिला कोरबा (छत्तीसगढ़) से समस्या भेजी है कि-

मै एवं मेरी पत्नी भी कोरबा के ही हैं। मेरी पत्नी के द्वारा मेरे ऊपर धारा 498क (जून 2012), धारा 125 (अगस्त 2012), घरेलू हिंसा (अक्तूबर 2013)2013 मे केस किए हैं। धारा 125 में अन्तरिम भरण पोषण के लिए फरवरी 2014 से 5000.00 रुपये प्रति माह मेरे द्वारा दिया जा रहा है। सभी केस अभी अंतिम दौर मे चल रहा है। मेरी पत्नी जून 2017 से केन्द्रीय विद्यालय मे शिक्षिका के पद पर नियुक्त होकर 27500.00 रुपए वेतन प्राप्त कर रही है। मुझे जानकारी होने पर मेरे द्वारा केन्द्रीय विद्यालय से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने पर तीसरे पक्ष की जानकारी देने से मना किया गया। अपील में गया तो अपील अधिकारी के द्वारा मेरी पत्नी को पूछे जाने पर मेरी पत्नी ने जानकारी देने से मना कर दिये जाने की जानकारी देते हुये मुझे जानकारी नहीं दी गयी। सूचना के अधिकार के तहत दी गयी जानकारी आपकी ओर प्रेषित कर रहा हूँ। मुझे मेरी पत्नी से संबन्धित जानकारी कैसे प्राप्त हो सकती है?

समाधान-

प यह जानकारी इस कारण से प्राप्त करना चाहते हैं जिस से आप न्यायालय के समक्ष इन दस्तावेजों के प्रस्तुत कर यह साबित कर सकें कि आप की पत्नी को भरण पोषण के लिए किसी राशि की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन किसी भी न्यायिक कार्यवाही में यदि कोई तथ्य साबित करना है तो उस में उस के लिए इस तरह के प्रावधान हैं कि न्यायालय स्वयं उस पक्ष को वे तथ्य प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है या फिर किसी दस्तावेज को जो न्यायालय में लंबित मुकदमे का निर्णय करने के लिए आवश्यक हो उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है। इस सम्बन्ध में दीवानी और अपराधिक प्रक्रिया संहिताओं में उपबंध हैं।

दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 में दस्तावेज प्रस्तुत कराने तथा विपक्षी को परिप्रश्नावली दे कर उन के उत्तर प्रस्तुत करने के उपबंध हैं इसी प्रकार धारा 91 दंड प्रक्रिया संहिता में दस्तावेज प्रस्तुत कराने संबंधित उपबंध हैं। आप अपने वकील से संपर्क कर के उन्हें इन उपबंधों में से उपयोगी उपबंध में आवेदन प्रस्तुत कर उक्त दस्तावेज संबंधित स्कूल प्रशासन को प्रस्तुत करने का आदेश न्यायालय से कराएँ। जरूरत होने पर सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त उत्तरों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

समस्या-

लक्ष्मी नारायण ने मोहल्ला शीतलगंज, पूर्वा, जिला उन्नाव से भेजी है कि-

मेरे पिता 3 भाई थे, सबसे बडे भाई की 3 बेटियाँ, दूसरे नं. पर मेरे पिता थे और सबसे छोटे भाई ने शादी नहीं की थी। सबसे पहले मेरे पिता का देहांत हो गया और प्रोपर्टी का 1/3 हिस्सा मेरे नाम दर्ज हो गया। इसके बाद सबसे छोटे भाई का देहांत हुआ जो कि अविवाहित थे और इनकी 1/3 हिस्से की प्रौपट्री सबसे बडे भाई के नाम सन् 1985 में दर्ज हो गयी। अंत में सबसे बडे भाई का देहांत हुआ और सन् 1992 में प्रौपट्री का (1/3+1/3=2/3) हिस्सा उनकी बेटियों के नाम दर्ज हो गया जो कि सारी विवाहित हो चुकी थीं। क्या 1992 में बेटियों को प्रोपर्टी में हिस्सा मिलता था? और मुझे मेरे पिता के सबसे छोटे भाई की प्रोपर्टी में 1/2 हिस्सा नहीं मिलेगा क्या?

समाधान-

दि आप के द्वारा कथित संपत्ति में कोई कृषि भूमि सम्मिलित नहीं है तो अब तक जो भी हुआ है वह सही हुआ है।

आप के पिता की मृत्यु पर उन के हिस्से की सम्पत्ति आप के हिस्से में आ गयी। जब आप के छोटे चाचा का देहान्त हुआ तो आप के पिता जीवित नहीं थे इस कारण उन के बड़े भाई को उन की संपत्ति प्राप्त हुई। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की अनुसूची में भाई को ही उत्तराधिकार का अधिकार है मृत भाई की संतान को नहीं। चूंकि उन की संपत्ति बड़े भाई को मिल गयी तो बड़े भाई की मृत्यु पर उन की तीन बेटियों को उन की संपत्ति मिली जो सही मिली है।

उत्तर प्रदेश में खेती की संपत्ति के सिवा सभी प्रकार की संपत्ति पर बेटियों को चाहे वे विवाहित हों या अविवाहित हो पिता का उत्तराधिकार प्राप्त करने का अधिकार है, बाकी सभी राज्यों में खेती की संपत्ति पर भी सभी बेटियों को उत्तराधिकार प्राप्त है।

 

प्रत्येक पक्षकार को दावे की सूचना होना जरूरी है।

October 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मनोज ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ ने अपने स्वर्गीय पिता की कृषि भूमि पर अपना उतराधिकार का दावा कर रखा है। कोर्ट ने मेरी माँ की अन्य बहनों को नोटिस भेजा है, उनको भी दावा करने हेतु हिदायत दी है ताकि एक एक करके न आये और केस में लम्बी प्रक्रिया ना हो। दो बार नोटिस भेजे गये हैं लेकिन उन्होंने कोर्ट में अपनी उपस्थिति नहीं दी। दो नोटिस भेजने में 2 साल हो गए हैं। वैसे में ये जानना चाहता हूँ कि कानूनन रूप से कितनी बार नोटिस भेजा जाता है? और अन्य क्या प्रक्रिया करने के बाद, कोर्ट स्वतंत्र रूप से उनकी गैर हाजरी में अपना फैसला सुना सकता है?

समाधान-

किसी भी मुकदमे में सभी संबंधित लोगों को पक्षकार बनाना जरूरी होता है जिन का हित प्रभावित होने वाला हो। आप की माताजी के इस मुकदमे में उन के पिता के सभी उत्तराधिकारियों को पक्षकार बनाना जरूरी था क्यों कि माताजी के पिताजी की संपत्ति का बंटवारा सभी उत्तराधिकारियों के मध्य होना है। इस के लिए सभी को दावे का समन भी भेजा जाना जरूरी है और इस समन का सभी पक्षकारों को मिलना भी जरूरी है।

आम तौर पर समन एक ही बार भेजा जाता है। यदि समन के संबंध में कोर्ट को यह रिपोर्ट प्राप्त हो कि समन संबंधित व्यक्ति ने प्राप्त कर लिया है या उसे सम्यक प्रकार से समन और दावे की सूचना मिल गयी है तो दुबारा समन नहीं भेजा जाता है। इस तरह यह आवश्यक है कि समन जिस व्यक्ति को भेजा गया है उसे मिल जाए और उस की सूचना भी पर्याप्त रूप से न्यायालय को मिल जाए। जब तक समन संबधित व्यक्ति को नहीं मिलता है तब तक यह प्रक्रिया चालू रहती है। एक बार प्रतिवादी को समन मिल जाने पर यदि वह अदालत में उपस्थित नहीं होता है तो अदालत उस के विरुद्ध एक तरफा कार्यवाही कर सकती है। एक तरफा कार्यवाही हो जाने पर उपस्थित पक्षकारों की साक्ष्य प्राप्त कर निर्णय किया जाता है।

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