Legal History Archive

समस्या-

गुलाम मोहम्मद ने रायपुर छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है-

मैं ने 30 जनवरी 2016 को अपनी बहन की शादी की है। 3 दिनों तक शादी का कार्यक्रम चला। मैं ने नवम्बर 2015 को शादी में फोटोग्राफी और वीडियो के लिए रायपुर के ही एक फोटोग्राफर को फोटोग्राफी का कुल 15000/- रू. में और वीडियो का 8000/- रू. में बुक करवाया। मैं फोटोग्राफर को एडवांस राशि के रूप में दोनों काम के लिए 3000/- रू. दिया। जिसकी रसीद मेरे पास है। जून 2016 में मैंने उनको 10000/- रू. दिया। मगर इस राशि का रसीद मेरे पास नहीं है। फिर मैंने उनको बोला कि जब फोटो एलबम और वीडियो सीडी आप देंगे तब मैं आपको आपका बचा हुआ 10000/- रू. दूंगा तब उसने स्वीकार कर लिया। फोटोग्राफर ने मुझे फोटो का एलबम बना के तो दे दिया है मगर वह कहता है कि जो वीडियो उन्होने शादी में लिया था वह पुरा वीडियो धोखे से डिलिट हो गया है। उनका यह कहते ही मेरा दिमाग खराब हो गया। जब मैं उनको इस लापरवाही के लिए डांटा तो वो मुझसे ही झगड़ने लग गया और उनको अपनी गलती का एहसास ही नहीं है। वीडियो डिलिट हो गया है कहॉ से लाकर दूँ जाओ जो करना है कर लो कहता है। अभी मैं ने उनको उनकी बची हुई राशि नहीं दी है। यहाँ बात यह है कि मैंने अपनी बहन की शादी बड़े धूम-धाम से करवायी है। व्यक्ति फोटो एलबम और वीडियो वगैरह इस पल की यादों को जिन्दगी भर के लिये सँजोये रखने के लिए करवाता है। शादी जैसे कार्यक्रम में फोटोग्राफी, वीडियो भी अहम होते हैं। मैं उस फोटोग्राफर की लापरवाही, गैरजिम्मेदराना रवैय्ये और उनके अपशब्द व्यवहार से दुखी हूँ। मैं उनको अच्छे से सबक सिखाना चाहता हूँ ताकि वह भविष्य में किसी व्यक्ति के ऐसे अहम पलो के यादो को संजोये रखने के इरादे और सपनों को ना तोड़े और धोखा ना दे सकें। मैं आपसे यह पूछना चाहता हूँ। कि मैं उस फोटोग्राफर के खिलाफ क्या कदम उठा सकता हॅू? क्या किसी प्रकार का मानसिक क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकता हूँ? क्या किसी प्रकार से उसको हर्जाना/जुर्माना या सजा दिलवा सकता हूँ? आपकी राय से मुझे उनके खिलाफ क्या कार्यवाही करना चाहिए?

समाधान-

प ने फोटोग्राफर से वीडियो रिकार्डिंग तथा फोटोग्राफ लेने की सेवाएँ प्रदान करने के लिए कांट्रेक्ट किया था। उस ने फोटोग्राफ तो बना दिए। लेकिन वीडियो रिकार्डिंग उस से डिलिट हो गयी। आप फोटोग्राफर के एक उपभोक्ता हैं और फोटोग्राफर ने वीडियो रिकार्डिंग को गलती से या किसी लापरवाही के कारण डिलिट कर के अपनी सेवा में गंभीर त्रुटि की है। इस से आप को गहरा मानसिक संताप भी हुआ है। ऐसी क्षति हुई है जिस की धन से पूर्ति संभव नहीं है। फिर भी फोटोग्राफर का यह दोष ऐसा नहीं है जिस से वह कोई अपराध हो। इस कारण फोटोग्राफर को किसी तरह के कारावास या जुर्माने का दंड नहीं दिया जा सकता है।

लेकिन उस के सेवादोष से हुई अपार क्षति के लिए तथा मानसिक संताप के लिए उस से हर्जाना मांगा जा सकता है। आप इस सेवा दोष से हुई क्षति तथा मानसिक संताप की अपने हिसाब से रुपयों में मूल्यांकन कर सकते हैं और एक लीगल नोटिस के माध्यम से उस से क्षतिपूर्ति की मांग कर सकते हैं। क्षतिपूर्ति की मांग को पूर्ण न करने पर उस के विरुद्ध जिला उपभोक्ता मंच में अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं। बेहतर है कि इस परिवाद को तैयार कर प्रस्तुत करने और आप की पैरवी करने के लिए किसी अच्छे वकील की सेवाएँ प्राप्त करें।

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ससुर की संपत्ति में पुत्र वधु का कोई अधिकार नहीं।

June 26, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_Flats.jpgसमस्या-

सीमा ने छत्तीसग़ढ़ से पूछा है-

मेरे पति से मैं सात वर्ष से अलग हूँ। मेरा 14 वर्ष का पुत्र भी है। मेरा तलाक नहीं हुआ है। मेरे ससुर जी का देहान्त हो चुका है अब उन की संपत्ति का बंटवारा हो रहा है जिस में मेरे पति उन के बड़े भाई व दो बहनों को हिस्सा दिया जा रहा है। क्या इस संपत्ति में मेरा या मेरे पुत्र का भी अधिकार है?

समाधान-

प के ससुर जी की संपत्ति का बंटवारा हो रहा है। यदि इस संपत्ति में कोई संपत्ति ऐसी हुई जो कि पुश्तैनी /सहदायिक संपत्ति है तो उस में आप के पुत्र का हिस्सा हो सकता है। ससुर की संपत्ति में केवल विधवा पुत्रवधु का अधिकार हो सकता है, आप के पति जब तक जीवित हैं आप का कोई हिस्सा नहीं हो सकता।

अपने पुत्र के अधिकार की जाँच करने के लिए आप को पहले पता लगाना होगा कि आप के पति के परिवार में कोई संपत्ति ऐसी है या नहीं जो कि पुश्तैनी हो। पुश्तैनी संपत्ति वही है जो कि 17 जून 1956 के पूर्व किसी पुरुष को अपने पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो और उस के पश्चात उत्तराधिकार में ही उस पुरुष के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हुई हो और उस के बाद उस उत्तराधिकारी के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हुई हो।

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कृषि भूमि के बँटवारे का वाद प्रस्तुत कराएँ।

May 14, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

विक्की ने नागौर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी की मृत्यु १९९७ में होने के बाद मेरे पिताजी एवं मेरे ताउजी जो की दो ही संतान थी बंटवारा करते समय एक असिचिंत खेत लगभग १० बीघा है का भी सहमति से बिना नाप बंटवारा किया गया बाद में सीमा ज्ञान कराने पर पता चला की ताउजी के पास कुछ हिस्सा लगभग १ बीघा ज्यादा है अब वो नाप में बराबर नहीं करवाना चाहते कहते हैं कि यही सही है। अब हमें सलाह दें कि बिना उनके राजीनामा के यह नाप अनुसार बंटवारा करा सके किस न्यायलय में आवेदन करना होगा?

समाधान-

प की कृषि भूंमि का जो बंटवारा हुआ है वह या तो मौखिक है या लिखित है तो भी पंजीकृत नहीं। हो सकता है आप के पिता जी और ताऊजी के नाम नामान्तरण हो गया हो लेकिन रिकार्ड में बँटवारा नहीं हुआ होगा। यदि ऐसा है तो आप को बँटवारे के लिए न्यायालय के समक्ष वाद संस्थित करना होगा।

प को एसडीएम या एसीएम कोर्ट में बँटवारे का वाद संस्थित करना पड़ेगा जिस में आप को यह आवेदन करना होगा कि बराबर हिस्से किए जाएँ और दोनों को भूमि का नाप कर के उन के हिस्से पर पृथक कब्जा दिलाया जाए।

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house lockedसमस्या-

अंकित ने इन्दौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

म जिस मकान में रहते है वो मेरे दादाजी ने सन १९५८ में ख़रीदा था। मेरे दादाजी के चार बेटे हैं। दादाजी की वसीयत के मुताबिक उस मकान के चार हिस्से हुए जो कि चारों बेटो में बांट दिए जिस में से एक हिस्सा मेरे पिताजी को भी मिला और उस हिस्से में हम रहते हैं। बाकि तीनो भाई अपने-अपने हिस्से में उस मकान में कभी नहीं रहे। मेरे पिताजी का देहांत हो चुका है और अब मैं उस हिस्से को जो की मेरे पिताजी को मिला था उसे अपने नाम पर रजिस्टर्ड कराना चाहता हूँ। दादाजी और दादीजी का भी देहांत हो चुका है कृपया सुझाव दीजिये।

समाधान-

प के दादा जी ने मकान खरीदा था। उस का विक्रय पत्र आप के पास होगा। यदि नहीं है तो उस की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त की जा सकती है। वसीयत से उस का एक हिस्सा आप के पिताजी को प्राप्त हुआ है। वसीयत आप के पास होगी अन्यथा उस की प्रमाणित प्रति अपने पास रखिए। पिताजी की मृत्यु के उपरान्त मकान का पिताजी का हिस्सा उन के सभी उत्तराधिकारियों के हिस्से में आ चुका है। अर्थात आप की माताजी और भाई बहन यदि कोई हों तो उनका हिस्सा भी उस में है। यदि कोई नहीं है तो मकान का हिस्सा स्वतः ही आप के नाम है। यदि मकान इन्दौर में है तो आप नगर निगम में आवेदन दे कर उस हिस्से को अपने नाम करवा सकते हैं। इस तरह मकान आप को उत्तराधिकार में मिला है उस के लिए किसी प्रकार के रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता नहीं है।

दि आप की माताजी, भाई बहन भी हैं तो उन का हिस्सा भी मकान में आप के पिता वाले हिस्से में हिस्सा है। यदि आप के अतिरिक्त मकान के उस हिस्से के हिस्सेदार अपने हिस्से को को आप के नाम रिलीज करते हुए रिलीज डीड पंजीकृत करवा दें तो मकान के आप के पिता वाले हिस्से के आप एक मात्र स्वामी हो जाएंगे। उक्त सब दस्तावेजों के आधार पर आप इन्दौर नगर निगम में मकान के उक्त हिस्से का नामान्तरण करवा सकते हैं।

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RTIसमस्या-

शैलेश प्रकाश ने बेगूसराय, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मैं आईओसीएल बरौनी रिफाइनरी में जून 2010 से पर्मनेंट एमपलोई हूँ। मेरा प्रमोशन 2014 के जुलाई में होना था, पर नही हुआ। मेरा कॉनफिडेंशियल रिपोर्ट (पर्फॉर्मेन्स रिपोर्ट) 2011, 2012, 2013, 2014 का हुआ था यह कैसे पता लगेगा। क्योंकि मैं ने जब अपनी कॉनफिडेंशियल रिपोर्ट (पर्फॉर्मेन्स रिपोर्ट) संबंधित ऑफीसर से जानना चाहा तो ओफिसर ने नहीं बताया। उन का कहना था कि ये नहीं बताया जाएगा। इस का क्या रास्ता है जिस से मुझे अपना कॉनफिडेंशियल रिपोर्ट (पर्फॉर्मेन्स) का पता लगे। जिस से मुझे पता लगे कि मेरा इस वर्ष की पर्फॉर्मेन्स कैसी रही?

समाधान-

प का संस्थान सार्वजनिक क्षेत्र का संस्थान है जिस में सूचना का अधिकार अधिनियम प्रभावी है। आप सूचना के अधिकार के अन्तर्गत आवेदन दे कर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं कि आप के विगत वर्षों की परफोरमेंस (कॉन्फिडेंशियल) रिपोर्ट दी गई है या नहीं।

लेकिन आप कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट को देख नहीं सकते न ही पढ़ सकते हैं क्यों कि वह एक गोपनीय प्रलेख है। यदि आप को वह रिपोर्ट दे दी जाए या पढ़ा दी जाए तो वह गोपनीय नहीं रह जाएगी।

स संबंध में यह नियम है कि यदि आप की कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट में कोई नकारात्मक टिप्पणी होगी तो उसे प्रबंधन को आप को सूचित करना पड़ेगा। यदि आप की गोपनीय रिपोर्ट दी गई है और किसी नकारात्मक टिप्पणी की सूचना आप को नहीं दी गई है तो आप को यही समझना चाहिए कि आप के विरुद्ध कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं दी गई है। यदि दी भी गई हो तो उस का कोई उपयोग नहीं किया जा सकता। क्यों कि उस की सूचना आप को नहीं दी गई है। आप की पदोन्नति जुलाई 2014 में नहीं हो सकी है तो उस का कोई अन्य कारण रहा होगा। जब आप सूचना के अधिकार के अन्तर्गत सूचना मांगे तो आप यह सूचना भी मांग सकते हैं कि आप को जुलाई 2014 में पदोन्नत किया जाना था वह किस कारण से नहीं किया गया है।

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समस्या-

शिमला, हिमाचल प्रदेश से कृष्ण ने पूछा है –

मेरा मित्र 100 प्रतिशत दृष्टिहीन है, उसका विवाह 2006 में एक दृष्टिवान लड़की से हुआ।  वो प्रारंभ से ही उसके साथ मानसिक उतपीड़न करती थी, आज उनके 2 बच्चे हैं।  मेरा मित्र हिमाचल सरकारी कर्मचारी है। उसकी पत्नी के कई लोगों के साथ अवैध शारीरिक संबंध है। जिसका प्रमाण कई बार मिल चुका है। अपनी गलती उसने सादे कागज पर भी स्वीकार की है। 30 जून 2012 को वो तहसीलदार के सामने उसे तलाक देकर चली गई थी। पर 3-4 महिने बाद वो पुनः आ गई।  मजबूरन उसे वो फिर रखनी पड़ी। उनके दो बच्चे 1 बेटा 1 बेटी जिन्हें वह जो  मेरे मित्र के पास छोड़कर चली जाती है। उसके कुछ दिनों बाद वह पुनः पंचायत के समक्ष उसे तलाक देकर चलई गई। यह तलाक जनवरी 2013 को हुआ था। पर मैंने उसे सलाह दी थी कि वो सेशन कोर्ट में तलाक के लिए आवेदन करे। दोनों बच्चे उसके पास हैं। वो उसे धमकी देती है कि अगर तू अदालत में गया तो वो उस से खर्चे के रूप में आधा वेतन लेगी। जिससे मेरा मित्र बहुत परेशान है।  दृष्टिहीनता तथा दो बच्चों के कारण वो खुद ही खर्चे से तंग है। मेरा मित्र काफी मानसिक तनाव में है। मैं कुछ जानकारियाँ आप से चाहता हूँ।
1  क्या मेरा मित्र तहसीलदार व पंचायत के तलाक के बाद विवाह कर सकता है? तलाक में उसकी पत्नी ने उसे इसकी स्वतंत्रता दी है।
2 जैसा कि मैं कह चुका हूं कि उसने पंचायत के समक्ष व तहसिलदार ने तलाक में उसके हस्ताक्षरों को सत्यापित किया है, क्या वो फिर भी अदालत में मेरे मित्र के विरुद्ध मुकदमा कर सकती है?
3 अगर मेरा मित्र विवाह करता है तो क्या उसके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही हो सकती है? पंचायत के तलाक के बाद उसका नाम मेरे मित्र के परिवार रजिस्टर से काट दिया गया है।
4. अगर वो खर्चे का दावा करती है तो उसे कितना खर्चा देना होगा, वो आज कल प्राईवेट कंपनी में कार्य कर रही है। दोनों बच्चे मेरे मित्र के पास है।

समाधान-
Blind father with children

प के मित्र की पत्नी ने उसे पंचायत और तहसीलदार के समक्ष तलाक दिया है। हिन्दू विधि में तलाक नहीं होता, यह शब्द केवल पुरुष द्वारा मुस्लिम विवाह विच्छेद के लिए है। हिन्दू विधि में पूर्व में तलाक जैसा कोई प्रावधान नहीं होने से बाद में जब हिन्दू विवाह अधिनियम के द्वारा विवाह विच्छेद अस्तित्व में आया तो लोग उसे भी तलाक कहने लगे हैं। हिन्दू विधि में विवाह विच्छेद केवल सक्षम न्यायालय की डिक्री से ही मान्य है।  इस के लिए सक्षम न्यायालय परिवार न्यायालय और उस के न होने पर जिला न्यायालय है। चूंकि जिला न्यायाधीश ही सेशन कोर्ट का भी पीठासीन अधिकारी होता है इस कारण से कई लोग उसे भी सेशन न्यायाधीश कह देते हैं। आप के मित्र को तुरन्त जिला न्यायालय या परिवार न्यायालय यदि वहाँ हो तो विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए। मित्र की पत्नी के लिखे हुए पत्र और तहसीलदार या पंचायत के सरपंच और उन व्यक्तियों की गवाही से जिन के उन तलाकनामों पर हस्ताक्षर हैं प्रमाणित किया जा सकता है कि मित्र की पत्नी का दूसरे पुरुष से संबंध है और विवाह विच्छेद हासिल किया जा सकता है। क्रूरता का आधार भी लिया जा सकता है।

क्षम न्यायालय से डिक्री प्राप्त होने से पहले आप के मित्र को विवाह नहीं करना चाहिए। क्यों कि तहसीलदार और पंचायत के समक्ष दिया गया तलाक विवाह विच्छेद नहीं है और कानूनन मित्र की पत्नी अभी भी उस की पत्नी है। यदि ऐसा किया तो उसे एक हथियार मित्र के विरुद्ध मिल जाएगा। मित्र की पत्नी नौकरी करती है इस कारण वह भरण पोषण प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है। लेकिन आप के मित्र को उस के विरुद्ध यह साबित करना होगा कि वह नौकरी करती है और उस का वेतन उस के जीवन निर्वाह के लिए पर्याप्त है। यदि किसी तरह निर्वाह भत्ते का आदेश वह प्राप्त कर भी ले तो भी उसे एक तिहाई वेतन से अधिक नहीं मिलेगा क्यों कि उन के दोनों बच्चे आप के मित्र के साथ रहते हैं।

प के मित्र की कानूनी और तथ्यात्मक स्थिति अच्छी है। पत्नी मुकदमे तो कर सकती है लेकिन उस से उसे कुछ नहीं मिलेगा। इसलिए आप के मित्र को घबराने की जरूरत नहीं है। बस कानूनन विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त करनी होगी तथा उस के विरुद्ध कोई मुकदमा या मुकदमे होते हैं तो उन का मुकाबला करना होगा।

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भारत के संविधान ने सर्वोच्च न्यायालय को कुछ विशेष शक्तियाँ भी दी हैं। वह अनुच्छेद 71 के अंतर्गत  राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव के संबंध में उत्पन्न विवाद का निपटारा कर सकता है और ऐसे मामले में उस का निर्णय अंतिम माना जाएगा। अनुच्छेद 317 के अंतर्गत राष्ट्रपति द्वारा लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष या उस के किसी सदस्य के दुराचरण का मामला  सर्वोच्च न्यायालय को निर्दिष्ट किया जाता है और सर्वोच्च न्यायालय इस नतीजे पर पहुँचता है कि संबंधित सदस्य या अध्यक्ष को उस के पद से हटा दिया जाना चाहिए तो उसे पद से हटा दिया जाएगा। सर्वोच्च न्यायालय के पास मामला लंबित रहने के दौरान राष्ट्रपति ऐसे सदस्य को निलंबित रख सकते हैं।
र्वोच्च न्यायालय द्वारा घोषित विधि को संविधान के अनुच्छेद 141 के द्वारा भारत के सभी न्यायालयों के लिए आबद्धकर घोषित किया गया है। इस तरह सर्वोच्च न्यायालय को विधि के एक स्रोत के रूप में स्वीकार किया गया है। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय को अपने स्वयं के निर्णय को उलटने की शक्ति प्रदान की गई है। लेकिन किसी निर्णय को उलट दिए जाने तक वह निर्णय अन्य न्यायालयों पर आबद्धकर रहेगा। 
र्वोच्च न्यायालय संसद या राज्य की विधानसभाओं द्वारा निर्मित की गई विधियों को यदि वे उन की सूची के नहीं हैं तो असंवैधानिक घोषित कर सकता है। दांडिक विधि प्रशासन के मामले में सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपराधिक मामलों की अपीलों को एक उच्च न्यायालय से दूसरे उच्च न्यायालय को स्थानांतरित कर सकता है। न्याय प्रशासन की संपूर्णता के लिए सर्वोच्च न्यायालय वह कोई डिक्री या आदेश जारी कर सकता है। वह ऐसी डिक्री और आदेशों के संबन्ध में नियम भी बना सकता है। वह किसी भी व्यक्ति को स्वयं के समक्ष उपस्थित होने का आदेश दे सकता है।
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संविधान के अनुच्छेद 145 ने सर्वोच्च न्यायालय को न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया के सामान्य विनियमन के संबंध में नियम बनाने की शक्ति प्रदान की है जिस के अंतर्गत वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए राष्ट्रपति के अनुमोदन से नियम बना सकता है। इस शक्ति के अंतर्गत (1) सर्वोच्च न्यायालय अपने यहाँ विधि-व्यवसाय करने वाले व्यक्तियों के संबंध में, (2) अपीलें सुनने की प्रक्रिया और उन्हें ग्रहण किए जाने की अवधि के संबंध में, (3) संविधान के भाग 3 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों में से किसी का प्रवर्तन कराने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में कार्यवाहियों के बारे में, (4) सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए किसी निर्णय या आदेश के पुनार्विलोकन की शर्तों, उस की प्रक्रिया और अवधि जिसके भीतर ऐसे पुनार्विलोकन के लिए आवेदन उस न्यायालय में ग्रहण किए जाने हैं के संबंध में, (5) उस न्यायालय में अन्य कार्यवाहियों और उनके आनुषंगिक खर्चों के बारे में, तथा उस की कार्यवाहियों के संबंध में प्रभारित की जाने वाली फीसों के बारे में (6) जमानत मंजूर करने के बारे में (7) कार्यवाहियों को रोकने के बारे में (8) तुच्छ या तंग करने वाली प्रतीत होने वाली या विलंब करने के प्रयोजन से की गई अपीलों के संक्षिप्त अवधारण के लिए उपबंध करने वाले नियम बना सकता है।

सुप्रीम कोर्ट संविधान के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए नियमों के द्वारा किसी प्रयोजन के लिए बैठने वाले न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या तथा एकल न्यायाधीशों और खंड न्यायालयों की शाक्तियों के सम्बंध में नियम बना सकता है।

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अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति
र्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 129 के अंतर्गत एक अभिलेख न्यायालय है। इसी कारण से इस न्यायालय को अपनी ही अवमानना के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करने की शक्ति प्राप्त है। अवमानना के लिए दंडित करने की इस शक्ति का प्रयोग केवल न्यायालय के न्याय प्रशासन के संबंध में ही किया जा सकता है, किसी न्यायाधीश के व्यक्तिगत अपमान के संबंध में इस शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता। 
इस शक्ति के अधीन सर्वोच्च न्यायालय ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही कर सकता है जो अवांछित उपायों से न्यायाधीशों को प्रभावित करने और न्याय की प्रक्रिया में प्रतिकूल प्रभाव डालने का प्रयत्न करता है। 
न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए अनुच्छेद 121 में यह उपबंध किया गया है कि किसी भी न्यायाधीश के आचरण और निर्णय के संबंध में संसद में चर्चा नहीं की जा सकती है। लेकिन किसी समाचार पत्र में या अन्यथा प्रकाशित किसी आलोचनात्मक आलेख या कथन से स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय प्रशासन के प्रति समुदाय के विश्वास को क्षति पहुँची हो या उस कथन या आलोचना से न्यायिक प्रशासन में अवरोध उत्पन्न हुआ हो तो उक्त कथन अथवा आलोचना को सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। 
सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति
संविधान के अनुच्छेद 145 के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को अपनी प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त नियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई है। सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की यह शक्ति संसद द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन है। वह केवल वे ही नियम बना सकता है जो कि संसद द्वारा नहीं बनाए गए हों। इस तरह संसद द्वारा निर्मित विधि और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्मित नियमों में किसी भी तरह के संघर्ष की संभावना को समाप्त कर दिया गया है।
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र्वोच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 137 के अंतर्गत शक्ति प्रदान की गई है कि वह अपने ही निर्णयों और आदेशों का पुनर्विलोकन कर सकेगा। लेकिन उस की यह शक्ति संसद द्वारा इस संबंध में बनाए गए नियमों और संविधान के अनुच्छेद 145 के अंतर्गत स्वयं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन रहेगी।
स सम्बंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्मित नियमों में कहा गया है कि किसी भी दीवानी मामले में पुनर्विलोकन आवेदन दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 47 के आधारों के अतिरिक्त आधारों पर स्वीकार नहीं किया जाएगा तथा किसी भी दांडिक मामले में अभिलेखमुख पर दृष्टिगोचर त्रुटि के अतिरिक्त आधार पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। पुनर्विलोकन हेतु कोई भी आवेदन आलोच्य निर्णय या आदेश के तीस दिनों की अवधि में ही प्रस्तुत किया जा सकेगा तथा इस में पुनर्विलोकन किए जाने के आधारों को स्पष्ट रूप से अंकित किया जाएगा। यदि स्वयं न्यायालय कोई आदेश नहीं दे देता है तो यह आवेदन निर्णय प्रदान करने वाले न्यायाधीशों को वितरित कर, बिना मौखिक बहस सुने ही निर्णीत किया जाएगा, लेकिन आवेदक चाहे तो साथ में लिखित बहस संलग्न कर सकता है। 
न्यायालय उस के समक्ष प्रस्तुत किए गए पुनर्विलोकन आवेदन को निरस्त कर सकता है या विपक्षी पक्षकारों को नोटिस जारी कर सकता है। यदि किसी निर्णय या आदेश के विरुद्ध न्यायालय के समक्ष कोई पुनर्विलोकन आवेदन प्रस्तुत किया जाता है और न्यायालय द्वारा निर्णीत कर दिया जाता है तो उस मामले में कोई भी अन्य पुनर्विलोकन आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जा सकेगा।
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