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र्वोच्च न्यायालय को संविधान के अनुच्छेद 137 के अंतर्गत शक्ति प्रदान की गई है कि वह अपने ही निर्णयों और आदेशों का पुनर्विलोकन कर सकेगा। लेकिन उस की यह शक्ति संसद द्वारा इस संबंध में बनाए गए नियमों और संविधान के अनुच्छेद 145 के अंतर्गत स्वयं सर्वोच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन रहेगी।
स सम्बंध में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्मित नियमों में कहा गया है कि किसी भी दीवानी मामले में पुनर्विलोकन आवेदन दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 47 के आधारों के अतिरिक्त आधारों पर स्वीकार नहीं किया जाएगा तथा किसी भी दांडिक मामले में अभिलेखमुख पर दृष्टिगोचर त्रुटि के अतिरिक्त आधार पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। पुनर्विलोकन हेतु कोई भी आवेदन आलोच्य निर्णय या आदेश के तीस दिनों की अवधि में ही प्रस्तुत किया जा सकेगा तथा इस में पुनर्विलोकन किए जाने के आधारों को स्पष्ट रूप से अंकित किया जाएगा। यदि स्वयं न्यायालय कोई आदेश नहीं दे देता है तो यह आवेदन निर्णय प्रदान करने वाले न्यायाधीशों को वितरित कर, बिना मौखिक बहस सुने ही निर्णीत किया जाएगा, लेकिन आवेदक चाहे तो साथ में लिखित बहस संलग्न कर सकता है। 
न्यायालय उस के समक्ष प्रस्तुत किए गए पुनर्विलोकन आवेदन को निरस्त कर सकता है या विपक्षी पक्षकारों को नोटिस जारी कर सकता है। यदि किसी निर्णय या आदेश के विरुद्ध न्यायालय के समक्ष कोई पुनर्विलोकन आवेदन प्रस्तुत किया जाता है और न्यायालय द्वारा निर्णीत कर दिया जाता है तो उस मामले में कोई भी अन्य पुनर्विलोकन आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जा सकेगा।
र्वोच्च न्यायालय भारत का अंतिम न्यायालय है जहाँ किसी न्यायार्थी को न्याय प्राप्त हो सकता है। इसे सभी प्रकार के मामलों में अपीलीय शक्तियाँ प्राप्त हैं।

संवैधानिक मामले-
संविधान के अनुच्छेद 132 में यह उपबंधित किया गया है कि भारत के किसी उच्च न्यायालय की सिविल, दांडिक या अन्य कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है यदि वह उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134क के अधीन प्रमाणित कर दे कि उस मामले में कानून का ऐसा सारवान प्रश्न अंतरवलित है जिस में संविधान के किसी भाग की व्याख्या की जानी है तो सर्वोच्च न्यायालय को अपील प्रस्तुत की जा सकती है।
स तरह का प्रमाण पत्र उच्च न्यायालय द्वारा जारी कर दिए जाने पर अपील इस आधार पर भी प्रस्तुत की जा सकती है कि उस मामले में किसी प्रश्न को गलत निर्णीत कर दिया गया है।

दीवानी मामले-
संविधान के अनुच्छेद 133 में संवैधानिक प्रश्नों के अलावा अन्य दीवानी मामलों का उल्लेख किया गया है जिस के अनुसार भारत के किसी भी उच्च न्यायालय की सिविल कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय को की जा सकती है यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर दे कि –
1. उस मामले में विधि का सार्वजनिक महत्व का कोई सारवान प्रश्न अंतर्वलित है और उच्च न्यायालय की राय में उस प्रश्न का सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विनिश्चय आवश्यक है।
2. संविधान के अनुच्छेद में संविधान की व्याख्या के संबंध में उपबंध होने पर भी इस अनुच्छेद के अंतर्गत उच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणपत्र जारी किए जाने पर की गई अपील में यह आधार भी लिया जा सकता है कि संविधान के किसी उपबंध की व्याख्या से संबंधित विधि का कोई सारवान प्रश्न अंतरवलित है।
3. लेकिन इस अनुच्छेद के उपबंधों के अधीन किसी उच्च न्यायालय की एकल पीठ के किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय को तब तक नहीं की जा सकेगी जब तक कि ससंद विधि द्वारा इस बारे में कोई उपबंध न कर दे।

दांडिक मामले –
नुच्छेद 134 के अंतर्गत भारत के किसी उच्च न्यायालय की दांडिक कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, अंतिम आदेश या दंडादेश की अपील सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है  यदि–
1. उस उच्च न्यायालय ने अपील में किसी अभियुक्त या व्यक्ति की दोषमुक्ति के आदेश को उलट दिया है और उसको मॄत्यु दंडादेश दिया है ; या
2. उस उच्च न्यायालय ने अपने प्राधिकार के अधीनस्थ किसी न्यायालय से किसी मामले को विचारण के लिए अपने पास मंगा लिया है और ऐसे विचारण में अभियुक्त या व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराया है और उसको मॄत्यु दंडादेश दिया है ; या
3. वह उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134क के अधीन प्रमाणित कर देता है कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में अपील किए जाने योग्य है।
स के अतिरिक्त संसद विधि द्वारा उपबंध कर के सर्वोच्च न्यायालय को भारत के किसी उच्च न्यायालय की दांडिक कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, अंतिम आदेश या दंडादेश की अपील ऐसी विधि में उपबंधित शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए अपील ग्
रहण करने और सुनने की अतिरिक्त शक्ति दे सकती है।

क्त संवैधानिक, दीवानी और दांडिक मामलों में किसी उच्च न्यायालय द्वारा अपील योग्य होने का प्रमाणपत्र जारी होने पर भी सर्वोच्च न्यायालय यदि यह समझता है कि उच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणपत्र जारी करने के उपबंध का उचित रूप में प्रयोग नहीं किया गया है तो वह मामले को वापस उच्च न्यायालय को पुनःप्रेषित कर सकता है या फिर अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए उस अपील को विशेष अनुमति से की गई अपील मान कर ग्राह्य कर सकता है।
भारत में जब पहली बार जब 1726 के चार्टर द्वारा प्रेसीडेंसी नगरों में मेयर के न्यायालय स्थापित किए गए यह उपबंधित किया गया था कि 1000 पैगोडा से अधिक मूल्य के मामलों की अपील प्रिवी कोंसिल में की जा सकेगी। यहीं से प्रिवी कौंसिल से भारत का संबंध स्थापित हुआ। 1973 के विनियम अधिनियम के अंतर्गत कलकत्ता में सुप्रीमकोर्ट की स्थापना हुई। इस अधिनियम के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट के सभी निर्णयों की अपील प्रिवी कौंसिल में किए जाने का उपबंध किया गया था। मद्रास और बम्बई में अभिलेख न्यायालय तथा बाद में सुप्रीम कोर्ट स्थापित हो जाने पर कलकत्ता सुप्रीम कोर्ट की ही तरह उन के निर्णय की अपील प्रिवी कौंसिल में की जा सकती थी। बम्बई सुप्रीम कोर्ट के मामले में 3000 हजार पैगोड़ा से अधिक मूल्य के मामले की अपील ही प्रिवी कौंसिल में की जा सकती थी, जब कि अन्य सुप्रीम कोर्ट के मामले में यह सीमा 1000 पैगोडा से अधिक की थी।

प्रिवी कौंसिल

1781 में सदर दीवानी अदालत की स्थापना पर यह उपबंध किया गया था कि 5000 पौण्ड से अधिक मूल्य के दीवानी मामलों की अपील प्रिवी कौंसिल को की जा सकती है। 1797 में यह उपबंध किया गया था कि निर्णय की अपील केवल छह माह की अवधि में ही प्रस्तुत की जा सकती थी। 1802 में मद्रास में सदर दीवानी अदालत की स्थापना होने पर यह उपबंध किया गया था कि उस के किसी भी निर्णय की अपील प्रिवी कौंसिल में की जा सकती है। 1812 में स्थापित बम्बई सदर दीवानी अदालत के निर्णयों पर भी यह प्रतिबंध था कि केवल 5000 पाउण्ड से अधिक मूल्य के मामलों में ही अपील प्रिवी कौंसिल के समक्ष की जा सकती थी।
1862 में प्रेसीडेंसी नगरों में उच्च न्यायालयों की स्थापना हो गई। इन उच्च न्यायालयों के 10000 हजार रुपए से अधिक मूल्य के दीवानी मामलों में दिए गए निर्णयों की अपील प्रिवी कौंसिल को किए जाने का उपबंध रखा गया। लेकिन इस के लिए हाईकोर्ट से मामले के अपील योग्य होने का प्रमाण पत्र प्राप्त करना आवश्यक किया गया।  लेटर्स पेटेण्ट में यह स्पष्ट किया गया था कि उच्च न्यायालय द्वारा प्रमाण पत्र दे दिए जाने पर उस के किसी भी आरंभिक अधिकारिता के मामले में आदेश, डिक्री अथवा दण्ड के विरुद्ध अपील प्रिवी कौंसिल में की जा सकती थी। उच्च न्यायालयों द्वारा निर्णीत केवल उन अपराधिक मामलों की अपील प्रिवी कौंसिल को की जा सकती थी जो उसकी आरंभिक अधिकारिता के थे या फिर जिन्हें उच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालयों को निर्देशित किया गया था तथा जिन में विधि का प्रश्न अंतर्वलित होता था।
1935 के भारत सरकार अधिनियम के अंतर्गत भारत में फेडरल न्यायालय का गठन किया गया था। अधिनियम में उपबंध था कि इस की आरंभिक अधिकारिता के मामलों के निर्णयों की अपील प्रिवी कौंसिल को की जा सकती थी और उस के लिए किसी तरह की अनुमति की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन अन्य निर्दिष्ट मामलों में प्रिवी कौंसिल को अपील फेडरल न्यायालय अथवा प्रिवी कौंसिल की पूर्व अनुमति से ही की जा सकती थी। इन के अतिरिक्त स्वयं प्रिवी कौंसिल किसी भी मामले में अपील की  विशेष अनुमति दे कर अपील सुन सकती थी। लेकिन इस तरह के मामले वे ही होते थे जिन में विधि के प्रश्न अंतर्वलित होते थे, या न्याय का हनन हुआ होता था या फिर जनहित के तथ्य निहित होते थे। अपराधिक मामलों में विशेष अनुमति प्राप्त करना अत्यन्त दुष्कर होता था। केवल दंड प्रक्रिया संहिता
के किसी उपबंध की व्याख्या के मामले ही विशेष अनुमति अपील के योग्य समझे जाते थे।

ब्रिटिश प्रिवी कौंसिल : भारत में विधि का इतिहास-87

May 28, 2010 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
ब्रिटिश सम्प्रभुता के क्षेत्रों के लिए ब्रिटिश सम्राट को ही न्याय का उच्चतम स्रोत माना जाता है। इसी कारण से ब्रिटिश सम्राट को उच्चतम अपील न्यायालय के रूप में मान्य किए जाने की परंपरा विद्यमान है। ब्रिटिश सम्राट उन के समक्ष प्रस्तुत याचिकाओं को अपनी कौंसिल के सहायता से निर्णीत करते हैं। यह कौंसिल ही किंग-इन-कौंसिल या प्रिवी कौंसिल के नाम से जानी जाती रही है। प्रिवि कौंसिल का इतिहास 1066 नॉर्मन जाति की इंग्लेंड पर विजय के साथ आरंभ हुआ था। तब सारे प्रशासन का केंद्रीकरण राजा में हो गया था। राजा ने प्रशानिक कार्यों के लिए एक विशाल सामन्ती निकाय की रचना की थी जो ‘मैंग्नम’ या कॉमन काउन्सिलियम कहलाती थी। जिस की सदस्यता का आधार सामन्ती प्रथाएँ थी। लेकिन बाद में भू-स्वामित्व की शर्त अनिवार्य हो जाने पर केवल सामंत ही इस के सदस्य हो सकते थे। मैग्नम काउन्सिलियस ही हाउस ऑफ लॉर्डस् के रूप में विकसित हुई, यही इंग्लेंड का सर्वोच्च अपील न्यायालय बनी।  मैग्नम काउन्सिलियस अधिक उपयोगी सिद्ध न होने पर सम्राट हेनरी प्रथम ने क्यूरिया रेजिस नाम  की एक छोटी संस्था गठित की गई जिस में चुने हुए शासकीय सदस्य ही हुआ करते थे। धीरे-धीरे इस संस्था ने प्रशासन और न्याय के क्षेत्र में महत्व प्राप्त कर लिया। इसी से चांसरी कोर्ट, किंग्स कोर्ट, प्रिवी कौंसिल आदि संस्थाओं का उदय हुआ। प्रिवी कौंसिल में प्रारंभ में 12 सदस्य थे बाद में इन की संख्या बढ़ती गई, लेकिन 1679 में इस की संख्या 30 तक सीमित कर दी गई।
रंभ में प्रिवी कोंसिल की अधिकारिता सीमित थी। किन्तु जैसे जैसे ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार होता गया वैसे-वैसे उस का क्षेत्र भी व्यापक होता गया। ब्रिटिश उपनिवेशों की प्रजा को भी ब्रिटिश प्रजा माने जाने के कारण सम्राट उन को उन की याचिकाएँ सुनने का अधिकार भी था। इन याचिकाओं का निर्णय सम्राट प्रिवी कौंसिल की सलाह से करता था।पहले प्रिवी कौंसिल के सदस्य विधि में दक्ष व्यक्ति नहीं होते थे लेकिन 1833
 के अधिनियम से प्रिवी कौंसिल में विधिवेत्ताओं का प्रवेश होने लगा। 
ब्रिटिश प्रिवि कौंसिल
ब्रिटिश संसद में 1833 में पारित न्यायिक समिति अधिनियम से प्रिवी कौंसिल की एक स्थाई समिति का गठन किया गया। जिसे उपनिवेशों से आने वाली अपीलों की सुनवाई का काम सौंपा गया। इस समिति का अध्यक्ष कोई लॉर्ड चांसलर होता था तथा अन्य सदस्य. उच्च न्यायिक अधिकारी होते थे। इस समिति की बैठक की गणपूर्ति के लिए चार सदस्य होना आवश्यक था। 1844 में यह संख्या घटा कर तीन कर दी गई तथा समिति में उपनिवेश देशों के दो सदस्यों को स्थान दिया गया। ये सदस्य उस देश की विधि के सम्बन्ध में परामर्श दे सकते थे। 1895 में उपनिवेश देशों के प्रतिनिधियों की संख्या 5 और 1913 में 7 कर दी गई। 
1833 के अधिनियम में यह व्यवस्था की गई थी कि किसी प्रथा, संविधि या अन्य किसी विधि के अधीन किसी भी न्यायालय के किसी भी आदेश की अपील ब्रिटिश सम्राट या किंग-इन-कौंसिल के समक्ष प्रस्तुत की जा सकती थी। जहाँ से यह समिति को सुनवाई के लिए भेजी जाती थी। समिति सुनवाई कर के अपनी रिपोर्ट सम्राट को निर्णय के लिए प्रेषित कर देती थी। अंतिम निर्णय ब्रिटिश सम्राट का ही होता था। आरंभ में प्रिवि
कौंसिल की कृपा पर ही अपील किए जाने की व्यवस्था थी। लेकिन बाद में नियम बन जाने पर विशेष अनुमति से अपील प्रस्तुत की जा सकती थी।
भारत शासन अधिनियम की धारा 229 (1) में उच्च न्यायालय स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई थी। इस शक्ति का प्रयोग करते हुए मध्य प्रान्त के लिए नागपुर में उच्च न्यायलय स्थापित करने हेतु 2 जनवरी 1936 को लेटर्स पेटेंट जारी किया गया। नागपुर उच्च न्यायालय के गठन, अधिकारिता, शक्तियाँ आदि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समान ही निरुपित की गई। 
ब्रिटिश भारत में स्थापित होने वाला यह अंतिम उच्च न्यायालय था। बाद में नागपुर को महाराष्ट्र राज्य में सम्मिलित कर लिया गया और वह मध्य प्रान्त से पृथक हो गया। उस स्थिति में मध्य प्रान्त के लिए  जबलपुर में पृथक से उच्च न्यायालय स्थापित किया गया जिस की दो पीठें इंदौर औऱ ग्वालियर में गठित की गईं।
गस्त 1935 में ब्रिटिश संसद ने भारत शासन अधिनियम 1935 पारित किया। इस अधिनियम ने 1919 के अधिनियम का स्थान लिया। इस अधिनियम के उपबंधों से भारत में विधान मंडल, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों को विनियमित करने का उल्लेखनीय प्रयत्न किया गया था। न्याय और विधि के क्षेत्र में इस अधिनियम द्वारा उच्च न्यायालयों की रचना, गठन, अधिकारिता और शक्तियों क नए सिरे से निर्धारण किया गया।
स अधिनियम से उच्च न्यायालयों को अभिलेख न्यायालयों के रूप में मान्यता प्रदान की गई। इस के द्वारा ब्रिटिश सम्राट को उच्च न्यायालयों के लिए मुख्य न्यायाधीश सहित यथोचित संख्या में न्यायाधीश नियुक्त करने का प्राधिकार प्रदान किया गया। साथ ही सम्राट को न्यायाधीशों को पदच्युत करने की शक्ति भी प्रदान की गई थी। इस अधिनियम के अंतर्गत गवर्नर जनरल को किसी भी उच्च न्यायालय के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त करने का प्राधिकार भी दिया गया था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 60 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रह सकते थे। नई व्यवस्था में न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया था। पहले की व्यवस्था में न्यायाधीश ब्रिटिश सम्राट की इच्छा पर्यंत अपने पद पर बने रह सकते थे, जब  कि इस अधिनियम के द्वारा उन का कार्यकाल निश्चित कर दिया गया था। न्यायाधीशों पर किसी भी प्रकार का दबाव प्रभावी नहीं हो सकता था और वे स्वतंत्र रूप से न्याय प्रदान कर सकते थे। न्यायाधीशों को हटाने के मामले में प्रिवी कौंसिल ब्रिटिश सम्राट को निर्दिष्ट कर सकती थी। 
न्यायाधीशों की योग्यता भी नए सिरे से विनिर्दिष्ट की गई थी। इस के लिए दस वर्ष तक के अनुभवी बैरिस्टर, भारतीय सिविल सेवा में 10 वर्ष की सेवा पूर्ण कर लेने वाले अधिकारी जिस ने न्यूनतम दो वर्ष जिला न्यायाधीश के रूप में कार्य किया हो, 10 वर्ष से अधिक की अवधि तक लघुवाद न्यायालय में  सहायक न्यायाधीश अथवा न्यायाधीश के कार्य का अनुभव रखने वाले या ऐसे व्यक्ति जो 10 वर्ष तक उच्च न्यायालय में प्लीडर के रूप में कार्य कर चुके हैं उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होने के लिए अर्हता रखते थे। 
न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय ब्रिटिश सम्राट को उन के वेतन, भत्ते और पेंशन आदि लाभों को निर्धारित करने का प्राधिकार दिया गया था। यह स्पष्ट किया गया था कि इस व्यवस्था में न्यायाधीश की नियुक्ति के उपरांत कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा। इस तरह न्यायाधीशों को सेवा सुरक्षा प्रदान की गई थी जो स्वतंत्र न्यायपालिका के विकास के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुई थी।
पटना उच्च न्यायालय
पटना उच्च न्यायालय
बिहार और उड़ीसा कलकत्ता प्रेसीडेंसी के ही भाग थे। 1912 में बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग कर एक अलग प्रांत बनाया गया। तभी यह निश्चित हो गया था कि इस प्रांत के लिए अलग उच्च न्यायालय होना आवश्यक है। 22 मार्च 1912 को पटना में उच्च न्यायालय की स्थापना के लिए घोषणा पत्र जारी कर दिया गया। 1 दिसंबर 1913 को पटना हाईकोर्ट की इमारत के निर्माण के लिए शिलान्यास हुआ। 1916 में इस इमारत का निर्माण पूर्ण हो जाने पर 3 फरवरी 1916 को उच्च न्यायालय की स्थापना कर दी गई। पटना उच्च न्यायालय में वास्तविक रूप से कार्य 1 मार्च 1916 को ही आरंभ हुआ। पटना उच्च न्यायालय को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समान ही अधिकारिता प्रदान की गई थी। उड़ीसा को बिहार प्रांत से 1936 में पृथक कर दिया गया। हालांकि उड़ीसा उच्च न्यायलय की स्थापना भारत स्वतंत्र हो जाने के उपरांत 1948 में ही हो सकी। तब तक पटना उच्च न्यायालय की अधिकारिता उड़ीसा पर भी बनी रही। 
लाहौर उच्च न्यायालय
लाहौर हाईकोर्ट
पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह ने सदर अदालत की स्थापना की थी। जैसे ही अंग्रेजों ने पंजाब पर अधिकार किया, पूर्व की परंपरा के अनुसार वहाँ चीफ कोर्ट के नाम से सदर अदालत को चालू रखा इसे ही बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन कहा जाता था। 1853 में बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन  को चीफ कमिश्नर की कोर्ट में बदल दिया गया। इस न्यायालय में  एक एडमिनिस्ट्रेशन कमिश्नर और  एक जुडिशियल कमिश्नर हुआ करता था। 1919 में लेटर्स पेटेंट के अंतर्गत लाहौर में उच्च न्यायालय की स्थापना हुई। जिस के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट द्वारा की गई थी। 21 मार्च 1919 को स्थापित किए गए लाहौर उच्च न्यायालय की अधिकारिता में पंजाब और दिल्ली के क्षेत्र सम्मिलित थे। लाहौर उच्च न्यायालय को भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तरह ही शक्तियाँ प्रदान की गई थीं। स्वतंत्रता के साथ ही देश का विभाजन हो जाने से लाहौर उच्च न्यायालय पाकिस्तान में चला गया। तब पंजाब के लिए पृथक उच्च न्यायालय की स्थापना की गई। 1966 में संघ राज्य दिल्ली के लिए उच्च न्यायालय की पृथक स्थापना तक पंजाब उच्च न्यायालय की अधिकारिता दिल्ली के क्षेत्र पर भी बनी रही।

न् 1861 के अधिनियम की धारा 16 के अंतर्गत ब्रिटिश क्राउन ने 17 मार्च 1886 को एक लेटर्स पेटेंट जारी कर उत्तर पश्चिमी प्रांतों के लिए आगरा में एक उच्च न्यायालय स्थापित करने का उपबंध किया गया था। 1875 में यह उच्च न्यायालय इलाहाबाद अंतरित कर दिया गया। इस तरह इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना हुई। इस उच्च न्यायालय को भी प्रेसीडेंसी नगरों के उच्च न्यायालयों की भांति ही दीवानी और दांडिक अधिकारिता प्रदान की गई थी। लेकिन उसे उन की तरह नौकाधिकरण विषयक और दीवाला विषयक अधिकारिता प्रदान नहीं की गई। प्रेसीडेंसी नगरों के उच्च न्यायालयों को प्रेसीडेंसी नगरों के लिए आरंभिक अधिकारिता प्रदान की गई थी। जब कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय को कोई आरंभिक दीवानी और दांडिक अधिकारिता नहीं दी थी। 
सपरिषद गवर्नर जनरल को उच्च न्यायालयों की अधिकारिता परिवर्तन का अधिकार
च्च न्यायालय अधिनियम, 1865 के उपबंधों के अधीन सपरिषद गवर्नर जनरल को 1861 के अधिनियम के अंतर्गत स्थापित उच्च न्यायालयों की अधिकारिता में उपयुक्त परिवर्तन करने का अधिकार दिया गया। लेकिन उक्त शक्ति का उपयोग ब्रिटिश क्राउन द्वारा अनुमोदन के पश्चात ही किया जा सकता था।
उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि
भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम 1911 के द्वारा 1861 के अधिनियम में आवश्यक संशोधन किए गए। इन के द्वारा मुख्य न्यायाधीश सहित उच्च न्यायालयों में 16 के स्थान पर 20 न्यायाधीश नियुक्त किए जा सकते थे। सपरिषद गवर्नर जनरल उच्च न्यायालय में दो वर्ष के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त कर सकता था। इस अधिनियम में स्पष्ट कर दिया गया था कि न्यायाधीशों को वेतन आदि का संदाय भारतीय राजस्व से ही किया जा सकता था। 
भारत शासन अधिनियम 1915
च्च न्यायालयों के पुनर्गठन और ब्रिटिश भारत में अन्य स्थानों पर उच्च न्यायालय स्थापित करने के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा भारत शासन अधिनियम-1915 पारित किया गया। इस के द्वारा 1861 और  1911 के अधिनियमों का निरसन कर दिया गया। इस अधिनियम के उपबंधों के अंतर्गत न्यायाधीशों की संख्या की सीमा समाप्त कर दी गई और ब्रिटिश सम्राट को उपयुक्त संख्या में मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीश नियुक्त करने का प्राधिकार प्रदान किया गया। उच्च न्यायालयों को उन्मुक्त समुद्र पर होने वाले अपराधों और नौकाधिकरण विषयक अधिकारिता सहित अपीली दीवानी और दांडिक अधिकारिता दे दी गई। इस अधिनियम के द्वारा उच्च न्यायालयों को अभिलेख न्यायालय का स्तर प्रदान किया गया और उन्हें न्यायालयों के कामकाज को विनियमित करने के लिए नियम बनाने का प्राधिकार प्रदान किया गया। उच्च न्यायालयों को राजस्व संकलन संबंधी कार्यों के लिए जो स्थानीय प्रथाओं और रूढ़ियों के अनुसार किए गए हों उन पर भी अधिकारिता प्रदान की गई थी। 
स अधिनियम से उच्च न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण का अधिकार प्रदान किया गया। वे अधीनस्थ न्यायालयों को उपयुक्त विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकते थे और किसी भी मामले को उचित समझने पर स्वयं के समक्ष अंतरित कर सकते थे। अब उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों की कार्यवाही और प्रक्रिया के संबंध में आवश्यक नियम, विनियम व प्रपत्र जारी कर सकते थे, लेक

प्रेसीडेंसी नगरों में उच्च न्यायालयों की स्थापना भारत में न्यायिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव था। इस से पूर्व में प्रचलित दोहरी न्यायिक प्रणाली का अंत हो गया था। यह व्यवस्था व्यावहारिक और सरल थी। पूर्ववर्ती सुप्रीमकोर्ट और सदर दीवानी और सदर निजामत अदालतों की अधिकारिता उच्च न्यायालय में निहित हो जाने से उस का कार्यक्षेत्र अत्यंत विस्तृत हो गया था। पहले सुप्रीम कोर्ट में केवल ब्रिटिश व्यक्ति ही न्यायाधीश हो सकते थे, लेकिन 1861 के अधिनियम से भारतीय व्यक्तियों के हाईकोर्ट में न्यायाधीश बनने का मार्ग खुल गया था। इस अधिनियम से स्थानीय विधियों, प्रथाओं और परंपराओं का न्याय करने में समुचित उपयोग का मार्ग भी खुल गया था। 
पूर्व में अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा जिस विधि का उपयोग किया जाता था, सुप्रीमकोर्ट में उस से भिन्न विधि का उपयोग किया जाता रहा था। उच्च न्यायालयों की स्थापना से विधि और साम्य के सिद्धांतों का सभी न्यायलयों में एक जैसा उपयोग आरंभ हो चला था। उच्च न्यायालय अपनी अपीली अधिकारिता में अधीनस्थ न्यायालयों में अपनाई जाने वाली विधि और साम्य के सिद्धांतों का ही उपयोग करने लगे थे। इस से विधि और साम्य के सिद्धांतों में एक रूपता दृष्टिगोचर होने लगी थी। इस ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता में वृद्धि की थी। हालांकि अधिनियम में न्यायाधीशों को सद्विवेक से काम लेने की हिदायत दी गयी थी लेकिन इसे परिभाषित न करने के कारण कोई भी न्यायाधीश सद्विवेक का उपयोग किसी भी तरह कर सकता था और इस से कुछ कठिनाइय़ाँ बढ़ गई थीं। 
च्च न्यायालयों की स्थापना के उपरांत ही सिविल प्रक्रिया संहिता दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता के निर्माण को बल मिला और इन के निर्माण से संपूर्ण भारत में दंड व्यवस्था और दीवानी और दांडिक न्याय में प्रक्रिया संबंधी एकरूपता स्थापित हो सकी थी। जिन क्षेत्रों में स्पष्ट विधि संहिताएँ नहीं बनाई गई थीं वहाँ विधि की दुविधा बनी रहती थी। इस तरह 1861 के अधिनियम से भारत में उच्च न्यायालयों की स्थापना विधि और न्याय के क्षेत्र में एक युगांतरकारी घटना हो गई थी। इस व्यवस्था से न्याय प्रशासन के अंतर्विरोधों के समाप्त कर सामंजस्य स्थापित करने का प्रयत्न किया गया था। उच्च न्यायालयों की स्थापना से आंग्ल-भारतीय संहिताओं के सृजन की राह बन गई थी। लेकिन यह सब यूँ ही नहीं हो गया था। इस के पीछे 1857 का आजादी का असफल आँदोलन था जिसे अंग्रेजी सत्ता ने एक विद्रोह के रूप में देखा था। और जब जब भी विद्रोह हुए हैं उस का एक प्रमुख कारण तत्कालीन न्याय व्यवस्था पर से जनता का विश्वास उठना रहा है।
दिसंबर 1885 में जारी लेटर्स पेटेंट के द्वारा उच्च न्यायालयों की दांडिक अधिकारिता भी निश्चित कर दी गई थी। जो इस प्रकार थी-
1- साधारण आरंभिक दांडिक अधिकारिता- उच्च न्यायालयों की साधारण दांडिक अधिकारिता का विस्तार प्रेसीडेंसी नगर की सीमा में निवास करने वाले समस्त व्यक्तियों और इस सीमा से बाहर रहने वाले ब्रिटिश नागरिकों पर किया गया था। इस अधिकारिता के अंतर्गत उच्च न्यायालय ऐसे सभी व्यक्तियों का विचारण कर सकता था जो विधि की प्रक्रिया द्वारा उस के समक्ष लाए गए हों। इस तरह उच्च न्यायालयों को सुप्रीम कोर्ट की समस्त आरंभिक दांडिक अधिकारिता अंतरित कर दी गई थी। 
2- असाधारण आरंभिक दांडिक अधिकारिता- इस के द्वारा कलकत्ता उच्च न्यायालय को अपने अधीक्षण के अंतर्गत आने वाले किसी भी अधीनस्थ न्यायालय की अधिकारिता के अधीन कहीं भी निवास करने वाले व्यक्तियो का विचारण करने की आरंभिक दी गई थी। इस के अंतर्गत उच्च न्यायालय एडवोकेट जनरल, मजिस्ट्रेट या सरकार द्वारा सक्षम बनाए गए अधिकारी द्वारा उस के समक्ष प्रस्तुत किए गए व्यक्ति पर विचारण कर सकता था। यह उपबंध बिलकुल नया था। इस से पहले सदर निजामत अदालत को इस प्रकार की शक्ति प्राप्त नहीं थी। इस तरह कलकत्ता उच्च न्यायालय की शक्तियों का असीमित विस्तार हो गया था।
3- दांडिक अपीली अधिकारिता- इस के अंतर्गत उच्च न्यायालय अपने अधीक्षण के अंतर्गत अधीनस्थ दांडिक न्यायालयों के निर्णयों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई कर सकते थे। लेकिन उसे उच्च न्यायालय की एकल अथवा खंड पीठ के निर्णयों की अपील की सुनवाई का अधिकार नहीं दिया गया था। लेकिन वह ऐसे मामलों में पुनरीक्षण कर सकता था। 
 4- निर्दिष्ट मामलों की सुनवाई और पुनरीक्षण- उच्च न्यायालयों को निर्देशन और पुनरीक्षण का अधिकार दिया गया था। जिस के अंतर्गत वे अपने अधीन सत्र न्यायाधीस या मामलों को निर्दिष्ट करने के लिए नियुक्त अधिकारी द्वारा निर्दिष्ट मामलों की सुनवाई कर सकते थे। वह किसी सक्षम न्यायालय द्वारा मामलों का विचारण किए जाने के उपरांत भी उन के निर्णयों का पुनरीक्षण कर सकता था और दण्ड में उपयुक्त परिवर्तन कर सकता था।
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