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समस्या-

अभी जैसवाल ने 14/459,भोली नगर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

ड़की का परिवार अपनी जाति (जब रिश्ता लेकर आते हैं तब खुद को लड़के का जाति का ही हूँ कहते हैं), धर्म (शायद आदिवासी क्रिश्चियन होते हुए सब छुपाते हैं, खुद को हिन्दू कहते हैं। बाद में लड़के द्वारा लड़की की माँ (नानाजी का नाम और उनका गाँव आदि तथा रिश्तेदार आदि) और पिताजी के रिश्तेदार कहाँ हैं पूछने पर कुछ बताने के जगह लड़की धमकी देती है टार्चर करने का केस कर दूंगी तथा उसके घर वाले गाली गलोज करते हैं जिसका आडिओ रिकार्डिंग भी है! जन्मपत्री में उम्र कम बताते हैं मगर बाद में लड़के को पता चलता है की लड़की लड़के से बड़ी है। साथ ही लड़का जब उनके यहाँ लड़की देखने गया था तब 4 दिन लड़के को रोके रहे तथा दबाव देकर अकेले लड़के (लड़के का परिवार से कोई नहीं था) को रिंग सेरामनी करने को को विवेश किये थे जहाँ सिर्फ लड़की परिवार ही था बाकी और कोई नहीं। एक तरह से लड़के को फंसा दिए थे और उसी दवाब में लड़का मजबूर हो शादी को बाध्य हुआ था। शादी को 10 साल से ऊपर हो गया है उन दोनों के एक लड़का भी है और लड़की यहीं ससुराल में ही रहती है। बातें तो बहुत लम्बी हैं। मगर यहाँ संक्षेप में सारी बात कह चुका अब इसमें लड़की के परिवार पर किस तरह और क्या केस किया जा सकता है?

समाधान-

प की समस्या है कि भिन्न जाति, धर्म, जन्मपत्री में कम उम्र बताना, लड़के से लड़की का बड़ा होना, रिंग सेरेमनी दबाव से करवा देना जिस के दबाव में विवाह कर लेना, विवाह से एक संतान पैदा होना, अभी तक लड़की का ससुराल में रहते रहना फिर भी विवाह के 10 वर्ष बाद तक किसी अदालत में किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं उठाना।

महोदय, आप किस दुनिया में रहते हैं? विवाह के लिए कानूनन जाति, धर्म, उम्र का कोई बंधन नहीं है इन के आधार पर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती। फिर 10 वर्ष तक लड़की विवाहित जीवन निबाह कर अपनी ससुराल में रह रही है, उस से एक संतान पैदा हो जाती है। आप आपत्ति नहीं करते। अब आपत्ति का कोई नया कारण नहीं है। भाई क्या अब एक स्त्री से मन  भर गया है या कोई दूसरी भा गयी है?

आप रुपया उधार देते हैं और तीन साल तक अदालत में कोई दावा नहीं करते तो फिर अदालत में दावा नहीं कर सकते। अब विवाह पर दस साल बाद आपत्तियाँ उठा रहे हैं इस दुनिया की तो कोई अदालत आप को सुनेगी नहीं। बल्कि यह कहेगी कि आप खुद दोषी हैं। आप के लिए इस शादी से निकल भागने का कोई रास्ता नहीं है। आपकी हर कोशिश आ बैल मुझे मार वाली होगी।

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समस्या-

इति श्रीवास्तव ने रांची , झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी माता का देहांत 2013 में हुआ, वे माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापिका के पद पर पिछले 30 सालों से अधिक से कार्यरत थीं। 2015 में वह रिटायर होने वाली थीं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी तीन पुत्रियों में से किसी को भी अब तक उनके सेवा से जुड़ी कोई भी राशि प्राप्त नहीं हुई है। जब मैं जे.डी. ऑफिस गई तो मुझे यह बताया गया कि तीनों लड़कियों में से किसी एक को नौकरी मिलेगी और मेरे पिता को पेंशन मिलेगी हालांकि मेरी माता के अन्य बकाया के सम्बंध में कोई बात नहीं की गई। मेरी माता का मेरे पिता से कोई लेना-देना नहीं था, हालांकि दोनों में तलाक नहीं हुआ था, और माँ की सेवा पंजिका में भी उनका नाम है जिसे वो हटाना चाहती थीं लेकिन हटा नहीं सकीं। मेरे पिता कोऑपरेटिव सोसायटी, इलाहाबाद में क्लर्क हैं। मेरी माँ की मृत्यु के समय हम तीनों बहने बेरोजगार थीं और माँ के रिश्तेदारों के घर में रहती थीं। हालांकि 2015 में मुझे केंद्र सरकार में नौकरी मिल गई। पर अन्य दोनों बहनें कम सैलरी पर प्राइवेट जॉब करती हैं और कभी-कभी छोड़ना भी पड़ता है। माँ की जगह पर नौकरी हम तीनों ही नहीं करना चाहते हैं। हम तीनों अविवाहित हैं। अभी हमारी माँ की एक पैतृक अचल सम्पत्ति बिकी उसमें से माँ के रिश्तेदारों, जिनका हिस्सा भी उस सम्पत्ति में था, ने यह कहकर की कानून के अनुसार उनको एक हिस्सा मिलेगा, हमारे शेयर में से पिता को एक हिस्सा दिया जबकि हमलोग उनसे कोई मतलब नहीं रखते। अब मेरे सवाल हैं कि, मेरी माँ के विभाग से नियमतः हम तीनों को किस-किस मद में पैसे मिलने हैं। और एल आई सी तो मुझे पता क्या उनका कोई और भी देय बनता है? उनके पैसे को प्राप्त करने के लिए क्या कागजी कार्रवाई करनी होगी? कैसे मैं अपने पिता को कुछ भी लाभ प्राप्त होने से रोक सकती हूँ, क्योंकि मेरी माँ उनको पैसे नहीं देना चाहती थीं, उनका नाम सेवा पंजिका में सिर्फ इसलिए देना पड़ा क्योंकि हमतीनों नाबालिग थे। और पिता के नाम के नीचे हमतीनों के नाम भी लिखे हैं। एक महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि क्या मैं माध्यमिक शिक्षा परिषद, इलाहाबाद के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती हूं कि उन्होंने हमारा देय अभी तक नहीं दिया, मेरी माँ की मृत्यु के 4 साल बाद भी! यदि मेरी नौकरी न लगती तो हम तीनों बहनों की हालत दयनीय होती क्योंकि हमारे पिता ने कभी हम पर या माँ पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि हम लड़कियां थे। लेकिन मेरी माँ के सारे पैसे लेने के लिए वो प्रयास कर रहे हैं।

समाधान-

प की समस्या और आप के तर्क वाजिब हैं लेकिन संपत्ति आदि का जो भी निपटारा होना है वह कानून के अनुसार ही होना है। आप की माताजी की मृत्यु के समय तक उन का आप के पिता से तलाक नहीं हो सका था। इस कारण आप की माताजी के उत्तराधिकारियों में आप तीनों बहनों के साथ साथ आप के पिता भी शामिल हैं। उन की जो भी बकाया राशि विभाग, बीमा विभाग, जीवन बीमा, प्रावधायी निधि विभाग और बैंक आदि में मौजूद हैं उन्हें प्राप्त करने का अधिकार आप चारों को है। आप चारों प्रत्येक ¼ हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

यदि आप की माताजी का पिता से विवाद चल रहा था तो उन्हें चाहिए था कि वे अपनी वसीयत लिख देतीं जिस में अपनी तमाम संपत्ति को आप तीनों बेटियों को वसीयत कर सकती थीं और आप के पिता को उत्तराधिकार से वंचित कर सकती थीं। लेकिन उन्हों ने ऐसा नहीं किया जिस के कारण आपके पिता भी उत्तराधिकार प्राप्त करने के अधिकारी हैं। उन्हें यह सब राशियाँ प्राप्त करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं हो सकता है लेकिन वे कानूनी रूप से अधिकारी हैं।

यदि कहीं या सभी स्थानों पर नामांकन आप के पिता का है तो वे यह सारी राशि प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि नोमिनी हमेशा एक ट्रस्टी होता है औऱ उस का कर्तव्य है कि वह राशि को प्राप्त कर के मृतक के सभी उत्तराधिकारियों में उन के अधिकार के हिसाब से वितरित करे। लेकिन अक्सर देखा गया है कि नोमिनी सारी राशि प्राप्त कर के उस पर कब्जा कर के बैठ जाता है और बाकी उत्तराधिकारियों को अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। इस कारण आप को चाहिए कि आप अपनी माताजी के विभाग, प्रावधायी निधि विभाग, कर्मचारी बीमा विभाग और जीवन बीमा व बैंक आदि को तीनों संयुक्त रूप से लिख कर दें कि नोमिनी होने पर भी आपके पिता को किसी राशि का भुगतान नहीं किया जाए क्यों कि ऐसा करने पर वे आप को आप के अधिकार से वंचित कर सकते हैं।

आप स्वयं अपनी माता जी के विभाग में जा कर संबंधित विद्यालय या जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से पता कर सकती हैं कि आप की माताजी की कौन कौन सी राशियाँ विभाग के पास बकाया हैं। उन राशियों का मूल्यांकन भी आप पता सकती हैं। यदि समस्या आए तो आप सूचना के अधिकार का उपयोग कर के विभाग से ये सूचनाएं प्राप्त कर सकती हैं। जब आप को पता लग जाए कि कौन कौन सी राशिया विभाग और अन्यत्र बकाया हैं तो आप उन सब के लिए जिला न्यायालय में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकती हैं।  इस के साथ ही जिला न्यायालय में आवेदन कर के विभाग/ विभागों के विरुद्ध यह आदेश भी जारी करवा सकती हैं उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बनने के पहले किसी को भी आप की माताजी की बकाया राशियों का भुगतान नहीं किया जाए।

इस मामले में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आप को स्थानीय वकील की मदद लेनी होगी। इस कारण बेहतर है कि किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह करें और उस के मुताबिक यह काम करें।

आप तीनों अनुकम्पा नियुक्ति नहीं चाहती हैं, आप के पिता की अनापत्ति के बिना आप  में से किसी बहिन को अनुकम्पा नियुक्ति मिल भी नहीं सकती थी। आप की अनापत्ति के बिना आप के पिता को नहीं मिलेगी। वैसे भी वे अब नौकरी प्राप्त करने की उम्र के नहीं रहे होंगे।

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समस्या-

प्रभात झा ने आरा, प्रतापगंज, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पापा दो भाई हैं। मेरे पापा और बड़े चाचा ने मिलकर जमीन खरीदी परंतु सारी ज़मीन बड़े चाचा ने अपने नाम से ले ली और पापा भी इस पर ध्यान नहीं दे सके क्योंकि वो बाहर रहकर काम करते थे। अब मेरे चाचा जी ने मौखिक रूप से जमीन बँटवारा किया है। लेकिन वो लिखित रूप से जमीन देने के लिए तैयार नही हैं, वो मनमाना ढंग से जमीन का बटवारा करना कहते हैं, साथ ही जेठांस की भी मांग करते हैं। हम लोगों के जोर देने पे वो सारा ज़मीन अपने बेटों के नाम से करने की धमकी देते हैं। हम लोगों के पास जमीन से सम्बंधित कोई दस्तावेज भी नहीं है। मैं जानना चाहता हूँ कि उस जमीन पर पापा का कितना हक़ है और क्या वह जमीन क़ानूनी रूप से दोनों भाई में बटवारा हो सकता है। अगर हाँ तो अब हमें क्या करना चाहिए? साथ ही अगर मेरे चाचा ने जमीन धोखे से अपने बेटों के नाम पर कर दी तो उस स्थिति में हम लोग जमीन पे दावा कर सकते हैं या नहीं।

समाधान-

ब भी कोई संपत्ति संयुक्त रूप से खरीदी जाए तो उस के विक्रयपत्र में इस बात का उल्लेख किया जाना चाहिए कि विक्रय मूल्य की राशि में किस का कितना योगदान है, और खरीददार कौन कौन हैं। लेकिन भारत में अक्सर ये होता है कि रिश्तेदार एक दूसरे के भरोसे में इस तरह के सौदे करते हैं और बाद में उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ता है। हमारा कहना है कि विश्वासघात वहीं होता है जहाँ विश्वास होता है। इस कारण कम से कम चल-अचल संपत्ति और नकदी के मामलों में सहज विश्वास नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि कैसे भी नहीं किया जाना चाहिए। आप के पिता ने आँख मूंद कर अपने भाई का विश्वास किया और अब उस की परेशानी न केवल वे भुगत रहे हैं बल्कि आप सभी भुगत रहे हैं।

आपके मामले में जमीन के कागजात अर्थात विक्य पत्र में आपके पिता का नाम नहीं है। लेकिन यदि उस जमीन को खरीदने में उन का भी आर्धिक योगदान है तो उस धन को जुटाने और जमीन के लिए भाई को देने के संबंध में कुछ न कुछ सबूत अवश्य होंगे। ये सबूत दस्तावेजी भी हो सकते हैं और मौखिक साक्ष्य से उन्हें साबित किया जा सकता है। य़दि आप के पिता जमीन खरीदने के लिए धन भाई को देना साबित करने की स्थिति में हों तो आप के पिता को तुरन्त भाई के विरुद्ध धोखाधड़ी के लिए पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। यदि पुलिस रिपोर्ट लिखने और कार्यवाही करने से मना करे तो वकील की सहायता ले कर सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर अन्वेषण के लिए पुलिस थाने को भेजे जाने का की प्रार्थना करना चाहिए। यही एक मात्र रास्ता है जिस से आप के पिता अपनी संपत्ति को वापस प्राप्त कर सकते हैं।

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प्रत्येक पक्षकार को दावे की सूचना होना जरूरी है।

October 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मनोज ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ ने अपने स्वर्गीय पिता की कृषि भूमि पर अपना उतराधिकार का दावा कर रखा है। कोर्ट ने मेरी माँ की अन्य बहनों को नोटिस भेजा है, उनको भी दावा करने हेतु हिदायत दी है ताकि एक एक करके न आये और केस में लम्बी प्रक्रिया ना हो। दो बार नोटिस भेजे गये हैं लेकिन उन्होंने कोर्ट में अपनी उपस्थिति नहीं दी। दो नोटिस भेजने में 2 साल हो गए हैं। वैसे में ये जानना चाहता हूँ कि कानूनन रूप से कितनी बार नोटिस भेजा जाता है? और अन्य क्या प्रक्रिया करने के बाद, कोर्ट स्वतंत्र रूप से उनकी गैर हाजरी में अपना फैसला सुना सकता है?

समाधान-

किसी भी मुकदमे में सभी संबंधित लोगों को पक्षकार बनाना जरूरी होता है जिन का हित प्रभावित होने वाला हो। आप की माताजी के इस मुकदमे में उन के पिता के सभी उत्तराधिकारियों को पक्षकार बनाना जरूरी था क्यों कि माताजी के पिताजी की संपत्ति का बंटवारा सभी उत्तराधिकारियों के मध्य होना है। इस के लिए सभी को दावे का समन भी भेजा जाना जरूरी है और इस समन का सभी पक्षकारों को मिलना भी जरूरी है।

आम तौर पर समन एक ही बार भेजा जाता है। यदि समन के संबंध में कोर्ट को यह रिपोर्ट प्राप्त हो कि समन संबंधित व्यक्ति ने प्राप्त कर लिया है या उसे सम्यक प्रकार से समन और दावे की सूचना मिल गयी है तो दुबारा समन नहीं भेजा जाता है। इस तरह यह आवश्यक है कि समन जिस व्यक्ति को भेजा गया है उसे मिल जाए और उस की सूचना भी पर्याप्त रूप से न्यायालय को मिल जाए। जब तक समन संबधित व्यक्ति को नहीं मिलता है तब तक यह प्रक्रिया चालू रहती है। एक बार प्रतिवादी को समन मिल जाने पर यदि वह अदालत में उपस्थित नहीं होता है तो अदालत उस के विरुद्ध एक तरफा कार्यवाही कर सकती है। एक तरफा कार्यवाही हो जाने पर उपस्थित पक्षकारों की साक्ष्य प्राप्त कर निर्णय किया जाता है।

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कानूनी कदम उठाने में देरी आपके मामले को कमजोर करेगी

October 8, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

 समस्या-

राशि सिंह ने उन्‍नाव, यूपी से सवाल पूछा है कि- 

र् मेरी शादी फरवरी 2015 में हुई थी कुछ दिन तो सब ठीक रहा लेकिन कुछ दिन बाद से मेरे ससुराल वालों का व्यवहार चेंज हो गया मेरे पति नोएडा में जॉब करते है।उनका पहले से किसी और लड़की से संबंद्ध था जो मुझे पता चला जिसका मैन विरोध किया परंतु किसी ने भी मेरा साथ नही दिया ।उल्टामुझे ही गलत ठहराया गया और मुझसे गाली गलौज हर हफ्ते लड़ाई झगड़े करने लगे इन सब ने केवल दहेज के लिये शादी की थी बस मेरा जीवन इन सब ने नरक बना दिया है मैं केवल घर मे कहना बनाने वाली की हैसियत से रहती हूं।जब तब मुझे और मेरे घर वालो को अपशब्द कहते है ।घर पर मैंने ये बात बताई तो घर वाले मुझे ले गए फिर इसी बीच इन सब ने मेरे घर आकर हंगामा किया जिसके कारण मेरे पिता को हार्ट अटैक आ गया उनकी नवंबर 2016 में मृत्यु हो गयी मैं और मेरे घर वाले अवसाद में चले गए । फिर मेरे चाचा लोगो ने बीच मे पड़कर फिर से एक मौका देने की बात कही उनकी बात मॉनकर मैं अप्रैल 2017 को फिर अपने ससुराल आ गयी कुछ दिन ठीक रहा फिर वही सब शुरू हो गया इस बार तो और ज्यादा अत्याचार शुरू हुए उनको लगा बिना बाप की बेटी है अब कंहा जाएगी सहते सहते मैं 31 aug 2017 को अपने घर आ गयी अब मैं क्या करूँ मुझे अलग होना है तालाक लेकर और इनको सज़ा भी हो कृपया सही कानूनी मार्गदर्शन करें ।मेरे सारे जेवर भी उन लोगो के पास ही हैं।

समाधान-

हम ने इस समस्या को तीसरा खंबा के सहयोगी श्री भुवनेश शर्मा को प्रेषित किया था। उन्हों ने इस पर परामर्श दिया है जिसे आप उन के ब्लाग विवाह परामर्श पर जा कर पढ़ सकते हैं।

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समस्या-

अक्कू यादव ने प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मको हमारे पिता के चाचा ने 2012 में कानून के अनुसार सब रजिस्ट्रार के सामने गोद लिया गया था। उनकी दो शादी शुदा बेटी है, जिन की गोद लेने के पहले शादी हो गयी थी। उनकी पत्नी का देहांत 2008 में हो गया। तब उन्होने अपनी सेवा और वंशज के लिए हमको पंजीकृत गोद ले लिया, वे सरकारी सेवा पर कार्यरत थे। सेवा के दौरान उनकी 2016 में देहांत हो गया। उनकी जो दो बेटियाँ हैं उन्होंने गोद नामा कैंसल करवाने के लिए मुकदमा किया है। जब गोद लिया गया था तब उनको कोई समस्या नहीं थी। परन्तु अब मरने के बाद बोल रही 30 लाख रुपये दो तब अनुकम्पा के लिए सहमति पत्र दूँगी। अनुकम्पा के लिए मैने बिभाग में अबेदन किया तो बोले बिना सहमति के अनुकम्पा नहीं मिल सकती है तो क्या हम हाईकोर्ट में बिभाग के खिलाफ याचिका कर सकते हैं? हमको अनुकंपा कैसे मिल सकती है और क्या पंजीकृत गोद नामा कैंसल हो सकता है? जब कि सभी दस्तावेज में पिता के स्थान पर दत्तक पिता का नाम है और नॉमिनी फॉर्म भी मेरे नाम है जिला अधिकारी द्वारा वारिस पत्र भी है हम क्या करें हमे बतायें?

समाधान-

प को सही प्रकार से गोद लिया गया है और गोदनामा निरस्त होना असंभव प्रतीत होता है। लेकिन अनुकंपा नियुक्ति के लिए बहिनों की सहमति आवश्यक है। गोद लिए जाने से आप को गोद पुत्र के रूप में वही अधिकार प्राप्त हुए हैं जो एक पुत्र को होते। यदि आपके गोद पिता के कोई पुत्र होता तब भी यही स्थिति बनती। ऐसा लगता है कि आप कुछ छिपा रहे हैं। आप के गोद पिता ने और भी संपत्ति छोड़ी होगी। उस की कीमत भी कम नहीं होगी। बहनें उस संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी हैं और अनापत्ति देने के पहले उस संपत्ति का हिस्सा आप से प्राप्त कर लेना चाहती हैं जिस के कारण बाद में उन्हें बंटवारे आदि की कार्यवाही न करनी पड़े।

आप ने यह नहीं बताया कि आप किस विभाग में नौकरी चाहते हैं। यदि अनुकंपा नियुक्ति के नियमों में विवाहित बहनें आश्रित हैं तो यह स्पष्ट है कि बिना बहनों की अनापत्ति के अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिल सकती। वैसे भी अनुकंपा नियुक्ति मात्र अनुकंपा है कोई अधिकार नहीं है और इस कारण दी जाती है कि परिवार को सहारा मिले। लेकिन आपके मामले में परिवार तो है ही नहीं। बहने शादीशुदा हैं। और आप के अलावा परिवार में कोई अन्य नहीं। तो सरकार वैसे भी नौकरी देने से इन्कार कर सकती है। यह दूसरी बात है कि उस स्थिति में आप उच्च न्यायालय में रिट याचिका कर सकते हैं।

हमारी राय है कि यदि आप की विवाहित बहनें आश्रित अनुुकंपा नियुक्ति नियमों में आश्रित की परिभाषा में हैं तो आप को बहनों से कोई समझौता कर लेना चाहिए और सहमति प्राप्त कर अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करने की कोशिश करें। अन्यथा अनुकंपा नियुक्ति को भूल जाएँ तो बेहतर है। यदि विवाहित बहने आश्रित की श्रेणी में नहीं आती हैं और विभाग आप से उन की अनापत्ति मांग रहा है तो आप विभाग के पत्र के आधार पर रिट याचिका उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।

 

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कोशिश करें और लोक अदालत की भावना से मुकदमे को निपटाएँ!

October 2, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

स्वाती ठाकुर ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरा कोर्ट मे एक केस चल रहा है 294, 323, 506 आईपीसी की धाराओँ में, जिसमे मैं और मेरी ३ सहेलियाँ भी शामिल हैं। जो सामने वाली लड़की है, जिसने हमारे खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई है, वो एक बार भी कोर्ट नहीं आयी है और मेरे साथ जो ३ लड़कियाँ हैं वो भी कोर्ट नहीं आती हैं। सिर्फ़ मैं ही हर महीने पेशी में जाती हूँ इस केस में आगे क्या होगा? वक़ील भी मुझे कुछ नहीं बताते हैं? मैं क्या करूँ? क्या जैसे सब इस केस में कोई और लड़की नहीं आती हैं मैं भी जाना बंद कर दूँ? इस केस को एक साल होने जा रहा है, कृपया राह दिखाएँ।

समाधान-

प के विरुद्ध जो मुकदमा है उस में धारा 294 आईपीसी संज्ञेय भी है और इस में आपस में राजीनामा भी नहीं हो सकता। इस धारा के कारण आप के विरुद्ध जिस लड़की ने रिपोर्ट की है उस की रिपोर्ट पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया, अन्वेषण किया और आप चारों के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा प्रस्तुत कर दिया है। अब वह लड़की केवल फरियादी है लेकिन अभियोग राज्य सरकार की ओर से है इस कारण उसे हर पेशी पर आने की जरूरत नहीं है। उसे तो न्यायालय तब बुलाएगा जब उस की गवाही अदालत को दर्ज करनी होगी।

इस मुकदमे में शिकायतकर्ता लड़की से सुलह हो जाए तो भी राजीनामा संभव नहीं है। यह हो सकता है कि 294 के सिवा दो अन्य धाराओं में राजीनामा पेश कर दिया जाए और 294 को स्वीकार कर के आइंदा ऐसी हरकत नहीं करने की चेतावनी के आधार पर न्यायालय लोकअदालत की भावना से मुकदमे का निपटारा कर दे। इस संबंध में आप को अपने वकील से बात करनी चाहिए। आप उन से बात करने की जिद करेंगी तो वे आप को सब बताएंगे। यदि नहीं बताएँ तो आप वकील बदल सकती हैं।

यदि तीन सहेलियाँ मुकदमे में पेशी पर हाजिर नहीं होती हैं तो उन की हाजरी माफी का आवेदन हर तारीख पर पेश किया जाता होगा या फिर उन की जमानत जब्त हो कर उन के वारंट निकल चुके होंगे। आप पेशी पर नहीं आएंगी तो आप के भी गिरफ्तारी के वारंट निकल जाएंगे।

सब से बेहतर तरीका यह है कि यदि इस मामले में अपना अपराध स्वीकार करना किसी लड़की के कैरियर को प्रभावित न करता हो तो आप चारों अपना अपराध स्वीकार कर लें और अदालत से कहें कि इस मामले में लोक अदालत की भावना से निर्णय कर दिया जाए। वैसी स्थिति में आप को चेतावनी के दंड से दंडित कर के या थोड़ा बहुत जुर्माना कर के मुकदमे का निर्णय हो सकता है। बेहतर है कि आप इस मामले में अपने वकील से बात कर के तय करें कि क्या करना चाहिए।

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समस्या-

शशि भूषण कुमार ने समस्तीपुर, झितकाही, बिहार वैशाली से समस्या भेजी है कि-

दो बच्चों की विधवा माँ से शादी कर लिया और उसके दोनों बच्चों को अपना लिया। पुनर्विवाह के बाद दो और बच्चा हुआ है। पूर्वजों ने किसी के नाम वसीयत ना की। इस संपत्ति का अधिकार सब बच्चो को बराबर मिलेगा या उस विधवा के पुनर्विवाह होने के बाद जन्में बच्चो को मिलेगा?

समाधान-

पूर्वजों से चली आई संपत्ति को सहदायिक संपत्ति कहा जाता है। इस संपत्ति में केवल पुरुष संतानों को ही अब तक अधिकार मिलता था। 2005 में हुए हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के बाद से इस संपत्ति में पुत्रियों को भी अधिकार मिलना आरंभ हुआ है। इस संपत्ति में से केवल पुरुष की औरस तथा गोद ली हुई संतानो को ही उत्तराधिकार प्राप्त हो सकता है अन्य किसी को नहीं।

विधवा के पूर्व विवाह से जन्मी संतानों को किसी प्रकार का कोई अधिकार अपनी माँ के नए पति की संपत्ति या उस के पूर्वजों की संपत्ति में प्राप्त नहीं होगा। विधवा के नए पति ने बच्चों को अपनाया है तो वह उन का लालन पालन कर सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में से कुछ भी अपनी इच्छा से दे सकता है लेकिन बच्चों को उत्तराधिकार का कोई अधिकार माता के नए पति या पूर्वजों से चली आई सहदायिक संपत्ति में उत्पन्न नहीं होता है।

विधवा की मृत्यु के बाद जो भी संपत्ति वह छोड़ कर जाएगी उस संपत्ति में उस के पूर्व पति तथा पुनर्विवाह के बाद वर्तमान पति दोनों से जन्मी संतानों को समान रूप से उत्तराधिकार प्राप्त होगा।

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समस्या-

विशाल कुमार ने मवई कलाँ, मलीहा बाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या यह है कि मेरे पापा ने दो शादियाँ की थी। उनकी पहली पत्नी के लडका पैदा हुआ, उसके बाद किसी बीमारी के कारण पहली पत्नी की मृत्यु हो गई उसके बाद मेरे पापा ने दूसरी शादी की जिनका पुत्र मै हूँ।  कुछ समय बाद मेरे पापा की भी मृत्यु हो गयी। उसके बाद मेरे पापा की सारी संपत्ति 1/3 हो गई जिसमें पहले पत्नी के लडके व मेरी माँ को एवम मुझे अधिकार प्राप्त हुआ था अब मेरी माता जी की भी मृत्यु हो गई है क्या मेरी माता जी की संपत्ति मुझे अकेले को प्राप्त होगी।

समाधान-

प की माता जी को जो संपत्ति आपके पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई वह उन की व्यक्तिगत संपत्ति हो चुकी थी। अब आप की माता जी के देहान्त के उपरान्त आप के माताजी का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-15 व 16 से शासित होगा।

इन धाराओं के अनुसार सब से पहले स्त्री की संपत्ति उस के पुत्रों व पुत्रियों को प्राप्त होगी। इस तरह यदि आप के अपनी माता से कोई भाई व बहिन नहीं हैं तो फिर उनकी सारी संपत्ति आप को ही प्राप्त होगी। धारा 15 की उपधारा (2) (बी) में यह उपबंध है कि स्त्री को कोई संपत्ति यदि उस के पति या ससुर से प्राप्त हुई थी तो वह मृतका की संतानों को प्राप्त होगी। निश्चित रूप से आप का सौतेला भाई आप की माँ की संतान नहीं है। इस कारण उसे आप की माता से उत्तराधिकार के रूप में कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

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समस्या-

राजेश ने इसराना, पानीपत, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

म चार भाई बहन हैं हमारे पिता जी एक सरकारी अधिकारी थे उनकी मृत्यु के बाद, nomination होने के कारण सारे पैसे मेरी माँ के नाम हो गए हैं। बहन की शादी हो चुकी है मेरी माँ हम दोनों छोटे भाइयों के पास रहती है। बड़ा भाई 10 साल से अलग है, वो सरकारी नौकरी पर है और अलग राशन कार्ड है, और अलग मकान है। हम दोनों छोटे भाई बेरोजगार हैं पिता की खरीदी हुई गाड़ी भी वही चलाता है जो कि मेरी माँ के नाम है और अब पिता की मृत्यु के एक महीने बाद वो हमसे अपना हिस्सा मांगने लगा है, जबकि वो हमसे 10 साल से अलग है तो क्या पिता के retirement वाले और pension वाले पेसों में उसका हिस्सा है? बताइये हमें क्या करना चाहिये?.

समाधान-

प के भाई ने आप के पिता की संपत्ति में क्या क्या अधिक ले लिया है यह एक अलग विषय है। पिता की संपत्ति में आप की माँ, आप तीनों भाई और आप  की बहन सब का बराबर का हिस्सा है। आप को बराबरी से बांटने की बात करना चाहिए था। यदि आपके भाई इस से अधिक ले लिए हैं तो गलत है, यदि शादी होने के बाद बहिन को कम दिया गया है या कुछ नहीं दिया गया है तो वह भी गलत है।

किसी भी मामले में नोमिनेशन का अर्थ होता है कि नामिनेशन करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उस के नोमिनी को उस की राशि दे दी जाए। लेकिन इस राशि को प्राप्त करने वाला केवल एक ट्रस्टी होता है उसे वह राशि मृत व्यक्ति के उत्तराधिकारियों में समानता से बाँटनी होती है।

पेंशन पर को आप की माता जी के सिवा किसी का अधिकार नहीं है क्यों कि आप भाई बहनों में कोई भी नाबालिग नहीं है। रहा सवाल रिटायर होने पर मिलने वाली ग्रेच्युटी व भविष्य निधि और अन्य राशियों की तो यह सभी उत्तराधिकारियों तीनों भाइयों, माँ और बहिन में बराबर बाँटी जानी चाहिए।

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