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नामान्तरण से स्वामित्व तय नहीं होता।

June 24, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अभिषेक राय ने देवरिया,  उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

चाचा की कोई औलाद नहीं थी। 1978 में चाचा ने मुझे रजिस्टर्ड वसीयत किया। 1996 में उनकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद मैंने दाखिल-खारिज करवाने के लिए नोटिस भेजा, उस में मेरे चाचा के भाई को आपति हुई, केस 1 साल तहसीलदार के वहाँ चला और केस मैं जीत गया, और मेरा नाम खतौनी में चढ़ गया। 20 साल बाद 2016 मेरे 3 अन्य भाई दीवानी में अपील किए कि रजिस्टर्ड वसीयत फ़र्ज़ी है और हमारा भी शेयर हुआ चाचा की संपत्ति में।  2 गवाह में से एक गवाह जो मेरे मामा हैं जिन्हों ने केस कराया है और कहता है कि मैं कोर्ट मे विपरीत बयान दूंगा कि वसीयत फ़र्ज़ी है और मेरे साइन नहीं हैं या चाचा की तबियत ठीक नहीं थी आदि।

समाधान-

प ने 1996 में वसीयत के आधार पर नामान्तरण कराया। लेकिन नामान्तरण से स्वामित्व तय नहीं होता। इस कारण आप के भाइयों ने वसीयत को अब दीवानी न्यायालय में चुनौती दी गयी है। इस दावे में अनेक बिन्दु होंगे जिन के आधार पर यह दावा निर्णीत होगा। केवल वसीयत ही एक मात्र बिन्दु नहीं होगा। इस कारण यदि वसीयत का एक गवाह बदल रहा है तो कम से कम एक गवाह और होगा। इस के अलावा रजिस्टर्ड वसीयत में रजिस्ट्रार के सामने वसीयत होती है वह उसे तस्दीक करता है। 1978 में जो दस्तावेज रजिस्टर्ड हो वह पुराना होने के कारण ही सही माना जाएगा। उस में गवाह की ये बातें नहीं मानी जाएंगी। इस कारण से आप वसीयत को दूसरे गवाह और वसीयत ड्राफ्ट करने वाले के बयान करवा कर भी साबित कर सकते हैं। लेकिन इन सब बिन्दुओँ का जवाब मौके पर आप के वकील ही तलाशेंगे। इस मामले में आप को उन्हीं से बात करनी चाहिए। यदि मामला उन के बस का न हो तो किसी स्थानीय सीनियर वकील की इस मामले में सलाह ले कर मुकदमे को आगे बढ़ाना चाहिए

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आप घरेलू हिंसा अधिनियम में कार्यवाही कर सकती हैं।

June 22, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नेहा सक्सेना ने बरेली, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 14 एप्रिल 2015 में हुई है और मेरी 14 माह की एक बेटी है।  मेरे पति बरेली के अच्छे सीबीएसई पैटर्न स्कूल में टीचर हैं और मैं भी टीचिंग जॉब में ही हूँ। मेरी शादी के दूसरे माह से ही प्रॉब्लम्स स्टार्ट हो गई थी। मेरे पति मेरी मदर-इन-लॉ की हर बात मानते हैं, यहाँ तक कि हमारे पर्सनल रिलेशन्स कैसे रहेंगे ये भी वही डिसाइड करती है। शादी के पहले से ही मेरी ननद जो कि शादीशुदा है और उस के दो बच्चे हैं रोज़ सुबह मेरे घर आ जाती है और शाम को 8-9 बजे तक वापस जाती है। बेटी होने वाली थी तब भी मेरी सास ननद और पति ने मुझे बहुत टॉर्चर किया इतना कि मैं अपने मायके वापस आ गयी। लगभग 3-4 माह मैं मायके रही तब भी मेरे पति ने मुझे ले जाने की कोई कोशिश नहीं की तब मेरे पक्ष के लोगों ने पंचायत बैठा कर मुझे ससुराल भेजा। अब फिर वही परिस्थिति है और अब मेरी सास सभी से ये कह रही है कि मैं इस को किसी भी कीमत पर अपने बेटे के साथ नहीं रहने दूँगी क्यूंकि मैंने अपनी ननद के रोज़ आने पर आपत्ति  उठाई थी। मेरे पति हमेशा की तरह अपने घरवालों के साथ हैं। मैं अपनी बेटी के साथ मायके में हूँ और पति से किसी तरह का कोई सम्पर्क नहीं है। मैं अपने पति के साथ ही रहना चाहती हूँ लेकिन सास ननद और पति के टोर्चर के साथ नहीं। इसकी वजह से ही पुलिस में अभी तक कोई कंप्लेंट  नहीं की है। मैं जानना चाहती हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए।. क्या मैं पति से क़ानूनी तौर पर पेरेंट्स से अलग होने की माँग कर सकती हूँ? क्या मैं अपने ससुराल मे ननद के रोज़ रोज़ आने पर रोक लगाने के लिए कोई कानूनी कार्यवाही कर सकती हूँ? साथ ही मेरे पति मुझे खर्च के लिए कुछ नहीं देते तो साथ रहते हुए क्या क़ानूनी तौर पर पति से अपने और बेटी के खर्च के लिए डिमांड कर सकती हूँ? मैं परेशानी में हूँ, मुझे सही रास्ता सुझाएँ। मायके से कोई भी सपोर्ट नहीं है, पिता की मृत्यु हो चुकी है बस मम्मी और छोटी बहिन है।

समाधान-

ति पत्नी का रिश्ता ऐसा है कि वह दोनों के चलाने से चलता है। कानून के हस्तक्षेप से उस में बहुत मामूली सुधार संभव है, अधिक नहीं। मामला अधिक गंभीर होने पर तलाक के सिवा कोई चारा नहीं रहता है।  पूरी कहानी में आप के पति आप के साथ खड़े कभी नहीं दिखाई देते हैं। जब कि ननद का अपना घर है और माताजी के सिवा कोई अन्य दायित्व उन पर नहीं है। लेकिन जैसी उन का स्वभाव है वे अपनी माँ और बहिन के विरुद्ध कुछ नहीं बोलेंगे और आप को अभी भी वे अपना नहीं पराये परिवार का प्राणी समझते हैं। जब तक पति स्वयं आप के साथ माँ और बहिन के सामने नहीं खड़े होते आप का ससुराल जा कर रहना मुनासिब नहीं वर्ना वही पुरानी स्थितियाँ झेलनी पड़ेगी।

आप के साथ जो व्यवहार हुआ है वह घरेलू हिंसा है और आप घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं। आप इस अधिनियम में अलग आवास की सुविधा की मांग कर सकती हैं, आप अपने लिए और अपनी बेटी के लिए खर्चे की मांग कर सकती हैं। हमारा सुझाव है कि पहले आप इस अधिनियम के अंतर्गत इन दोनों राहतों के लिए आवेदन करें। आप खुद कमाती हैं, हो सकता है आप की कमाई बहुत कम हो लेकिन फिर भी मितव्ययता बरतते हुए माँ और बहिन के साथ रहते हुए अपने आत्मसम्मान को बनाए रख सकती हैं। इस अधिनियम में न्यायालय अंतरिम राहत भी प्रदान कर सकता है। जिस से आप को एक राशि हर माह मिलना आरंभ हो सकती है। जब तक खुद आप के पति अपने साथ रहने को नहीं बोलें और माँ, बहिन की क्रूरता के विरुद्ध आप के साथ खड़े होने तथा खुद क्रूरता करने का वादा न करें तब तक आप को उन के साथ जा कर नहीं रहना चाहिए। जरूरी होने पर पुलिस में 498ए के अंतर्गत रिपोर्ट करायी जा सकती है। अभी इतना करें। फिर प्रतिक्रिया देखें और आगे की कार्यवाही तय करें।

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समस्या-

अनिल कुमार ने नागदा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैंने एक इंदौर के दुकानदार को ऑनलाइन पेमेंट किया, फिंगर प्रिंट डिवाइस के लिए रू=२३००/-। लेकिन उस दुकानदार ने वो सामान मुझे नहीं भेजा और लगभग 1 माह बीत जाने के बाद उसने मुझे उतनी ही राशी का एक चेक दिया, /जो की बाउंस हो गया और मेरे खाते से लगभग २०० रू कटे  बैक चार्ज के रूप में। अब मैं उस दुकानदार पर क्या कार्यवाही कर सकता हूँ?

समाधान-

दि चैक बाउंस हुए 30 दिन नहीं हुए हैं तो चैक बाउंस होने की तिथि से 30 दिनों में एक नोटिस दुकानदार को रजिस्टर्ड एडी डाक से भेजें कि वह नोटिस मिलने से 15 दिन में चैक की रकम, बैंक द्वारा काटे गए चार्ज और हर्जाने की राशि ( जो भी आप खुद तय करें) सहित नकद आप को भुगतान कर के रसीद प्राप्त कर ले अन्यथा आप धारा 138 परक्राम्य अधिनियम में परिवाद दाखिल करेंगे। यदि चैक बाउंस होने की सूचना मिले 30 दिन से अधिक हो गए हों और चैक पर दर्ज तारीख को तीन माह न हुए हों तो चैक को दुबारा बैंक में प्रस्तुत करें। यदि फिर भी चैक बाउंस हो जाए तो यही सब करें।

यदि वह यह राशि दे दे तो ठीक वर्ना  नोटिस देने के 45 दिनों के भीतर अपना परिवाद न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर दें। इस परिवाद मे न्यायालय आप को चैक की रकम के साथ साथ उतनी ही राशि हर्जाने के रूप में दिला सकती है और उस दुकानदार को कारावास की सजा भी दे सकती है। यदि चैक पर दर्ज तारीख पुरानी होने से दुबारा बैंक में प्रस्तुत न किया जा सकता हो तो धारा 420 के अंतर्गत धोखाधड़ी की शिकायत पुलिस थाने में कर सकते ैहैं, कार्रवाई न होने पर एसपी को शिकायत करें और फिर भी कार्यवाही न होने पर इस धारा के अंतर्गत परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

 

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आप क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकती हैं।

June 20, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

सुशीला ने पोकरण, जैसलमेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति का व्यवहार मेरे और मेरे पैतृक परिवार के प्रति अच्छा नहीं है। जिस के कारण अब मैं मैं मानसिक रूप से बीमार हूँ। मेरे पति मेरे इलाज के लिए कुछ नहीं करते। मैं इस से परेशान हो कर अपने मायके आ गयी हूँ। अब मेरा पति मुझे और मेरे मायके के परिजनों को फोन कर के धमकियाँ दे रहा है वह मेरे रिश्तेदारों और जाति के लोगों को मेरे बारे में गलत बातें लिख कर मैसेज कर रहा है। जिस से मैं  वापस उस के पास जा कर रहने लगूँ। लेकिन मैं वापस नहीं जाना चाहती और तलाक लेना चाहती हूँ। मुझे बताएँ मैं तलाक कैसे ले सकती हूँ।

समाधान-

प के पति का व्यवहार आप के प्रति क्रूरता पूर्ण है, बीमार पत्नी का इलाज नहीं कराना और उसे बुरा भला कहना क्रूरता है। इस कारण आप का मायके आना पूरी तरह जायज था। उस के बाद उस का धमकियाँ देना और लोगों को आप को बदनाम करने वाले फोन मैसेज भेजना क्रूरता की इन्तेहा है। आप क्रूरता के इस आधार पर तलाक के लिए अर्जी उस जिले के परिवार न्यायालय मे प्रस्तुत कर सकती हैं जिस जिले में आप के विवाह की रस्म संपन्न हुई थी अथवा जिस जिले में आप अपने पति के साथ अन्तिम बार निवास कर रही थी।

इस के अतिरिक्त आप अपने स्त्री-धन की मांग अपने पति से कर सकती हैं नहीं देने पर यह धारा 406 आईपीसी का अपराध होगा। क्रूरता कर के और आप का इलाज न करा के वह धारा 498ए आईपीसी का अपराध कर ही चुका है। आप इन दोनों धाराओँ के अन्तर्गत पुलिस में रिपोर्ट कराएँ, यदि पुलिस कार्यवाही न करे तो एसपी को शिकायत करें और फिर भी कार्यवाही न होने पर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में इस संबंध में परिवाद प्रस्तुत करें। इस के अलावा आप अपने लिए भऱण पोषण का खर्चा प्राप्त करने के लिए धारा 125 दं.प्र.संहिता और महिलओँ के प्रति घरेलू हिंसा का प्रतिषेध अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं।

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परित्याग व अन्य आधारों पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें।

June 19, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मनोज ने भोपाल, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे मित्र का विवाह 30 अप्रेल 2005 को चित्तौड़गढ़ राजस्थान में हुआ था। मित्र मध्य प्रदेश का है, बारात राजस्थान गई थी। उसकी पत्नी 2006 में बिना कारण उसे छोड़ के अपने मायके चली गई। मेरे मित्र ने वहाँ जाकर उसे समझाने का बहुत प्रयास किया, पर वह अपनी ज़िद्द पर अड़ी रही। उसकी ज़िद्द थी कि वह घर दामाद बनकर रहे। पर मेरा मित्र ये बात नही माना, क्योंकि वह सेना में सेवारत है और उसके भी मां, बाप, बहन है जिसकी जिम्मेदारी उस पर है। इसी बीच 2007 में मेरे मित्र का एक बेबी हो गया अब बच्चा होने के बाद मेरे मित्र के सास, ससुर, साला बच्चे से मिलने नहीँ देते थे। पर उसने बार बार मिलने का प्रयास किया पर उसे  मिलने नही दिया जाता, जब वह छुट्टियां खत्म होने के बाद वह सेना में बापिस आ जाता। इसी बीच उसकी पत्नी ने 2010 में भाग कर रायपुर छत्तीसगढ़ में एक युवक से विवाह कर लिया। पर मेरे मित्र को मालूम नहीं चला। जब वह 6 माह में छुट्टी ले के जाता तो उसे ये कहा कर लौटा देते कि वह नही मिलना चाहती और वह जॉब करने लगी है। ये सिलसिला चलता रहा जब मित्र ने वहाँ के थाने में रिपोर्ट दर्ज करने गया तो वहाँ के एसएचओ ने रिपोर्ट दर्ज नही की। वह बोला वह जॉब करती है उसे परेशान मत करो नहीं उसकी कंप्लेन में बंद हो जाओगे और कोई छुड़ाने नहीं आएगा, और army की नौकरी चली जायेगी। वह वापिस गया अभी मई 2017 में उसे मालूम पड़ा कि उसने दूसरा विवाह कर लिया है। रायपुर में किसी अजय नाम के व्यक्ति से और मित्र के बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट में दूसरे पति अजय का नाम डलवा दिया है। मित्र का लड़का 5वीं में पढ़ता है और उन दोनो का रायपुर में वोटर आई डी बना हुआ है जो कि वोटर लिस्ट में है, और उन दोनों के कुछ फोटो मिले है गले मे हाथ डाले हुए और मांग में सिन्दूर है। उधर पुछा गया तो मालूम पड़ा कि उन दोनों ने प्रेम विवाह किया है। आप बताइए कि मेरा मित्र क्या करे? जिससे उसकी समस्या हल होजाये उन दोनों को सबक सिखाया जाए उसे सजा मिल सके साथ मे मित्र का बच्चा भी मिल जाये मित्र की पत्नी के दूसरी शादी का बस फ़ोटो और वोटर लिस्ट का सबूत है इन के आधार पर क्या कार्यवाही करें?

समाधान-

प के मित्र की पत्नी को छोड़ कर गए हुए 11 वर्ष हो चुके हैं और आप के मित्र ने अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की है। 11 वर्ष से आप के मित्र की पत्नी अलग रहती है और उस ने घर भी बसा लिया है। आप का मित्र चाहता तो अभी तक परित्याग के आधार पर तलाक ले सकता था।  देरी से न्यायालय तक जाने पर राहत मिलना कठिन होता है। अब भी आप के मित्र को सभी संभव आधारों पर तलाक के लिए आवेदन करना चाहिए।

आप का मित्र फौज में है, केवल अवकाश में घर आता है। एक लंबे समय तक उस की पत्नी को अकेले उस के ससुराल में रहना होता था। जब पत्नी को अकेले ही रहना होता था तो वह आप के मित्र के परिवार के साथ क्यों रहती? अपने मायके में क्यों नहीं। यही दोनों के बीच विवाद है।

मित्र की पत्नी सैटल हो चुकी है। बच्चा अब तक उस के साथ रहा है, वह अपने पिता को नहीं जानता या पिता के रूप में किसी दूसरे व्यक्ति को जानता है। ऐसी स्थिति में बच्चे की कस्टडी मिलना कठिन है जब कि आप का मित्र खुद फौज में रहता है।

आप के मित्र को पत्नी के विरुद्ध तलाक की और बच्चे की कस्टडी का मुकदमा करना चाहिए। इन मुकदमों के दौरान अदालत दोनों के बीच राजीनामा कराने की कोशिश करेगी। दोनों का साथ रहना तो मुमकिन नहीं फिर भी जो भी आपसी रजामंदी से हो सके वह करना चाहिए। कम से कम तलाक ले लेना चाहिए जिस से आप का मित्र दूसरा विवाह कर सके। पत्नी को सबक सिखाने की बात मन से निकाल दें। कानूनी स्थिति जो भी है वह ऐसी है कि सबक सिखाने के चक्कर में आप के मित्र ही कहीं चकरी न हो जाएँ।

 

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समस्या-

संध्या कश्यप ने रेलवे पाड़ा, अडावल, जगदलपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

35 वर्ष से हमारे ससुर ने घर के समीप एक जमीन पर कब्जा कर रका था। उस समय पर वहाँ कोई मकान नहीं था। अब सरपंच पंचायत की जमीन बता कर दूसरो को बेच रहे हैं और हमें क्या तुम्हारे पास पट्टा है कह कर डरा रहे हैं। क्या यह जमीन हमें मिल सकती है? क्या हम लोग कोई कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं? सरपंच का काम पंचायत के लोगों को सुरक्षित करना है कि उन्हें लूटें।

समाधान-

प का घर के पास की किसी जमीन पर इतना पुराना कब्जा है इस का अर्थ ये तो नहीं कि आप उस जमीन के स्वामी हो गए हैं। यदि जमीन पंचायत की है तो वह सार्वजनिक है और उस पर कब्जा हटाने की कार्यवाही पंचायत को करने का अधिकार है। वे आप का कब्जा हटाने की कार्यवाही कर सकते हैं और किसी जरूरतमंद को जमीन मकान बनाने के लिए बेच सकते हैं। आखिर गाँव में जमीन सीमित होती है और लगातार आबादी बढ़ने से मकानों के लिए जमीन की जरूरत होती है।

लेकिन किसी भी व्यक्ति का कब्जा यदि 30 वर्ष से अधिक का है तो उसे हटाया जाना संभव नहीं है। यदि आप को आशंका है कि आप का कब्जा जबरन हटा दिया जाएगा तो आप दीवानी न्यायालय में जा कर कब्जा हटाए जाने के विरुद्ध पंचायत तथा उस के द्वारा जिस को विक्रय की जाए दोनों के विरुद्ध स्थगन आदेश प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन फिर भी उस जमीन पर आप का स्वामित्व स्थापित नहीं होगा।   उस के लिए जमीन पंचायत से खरीदनी होगी या पट्टा बनवाना पड़ेगा।

 

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समस्या-

धर्मेन्द्र सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी का मकान है जिनकी मृत्यु हो गयी है। अब इस मकान पर उनका छोटा पुत्र कब्जा करना चाहता है। मेरी दादीजी जिंदा है वो यह मकान नहीं देना चाहती हैं। ये मकान दादीजी के नाम करवाना है और उनके छोटे पुत्र को बाहर निकलना है। इसके लिए मैं क्या करुँ?

समाधान-

प के दादा जी का देहान्त होने के पहले उन्हों ने कोई वसीयत नहीं की है। आप के दादा जी के देहान्त के साथ ही उन का उत्तराधिकार खुल गया है औोर उन की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो चुकी है। आप के दादा जी के उत्तराधिकारी, उन के पुत्र, पुत्रियाँ, मृत पुत्र/ पुत्रियों की पत्नी/ पति और उन की संतानें, उन की पत्नी (आप की दादीजी) हैं। ये सभी उस मकान के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। आप के दादाजी के छोटे पुत्र को भी उस मकान के स्वामित्व में हिस्सेदारी प्राप्त हुई है। इस हिस्सेदारी से उसे अलग नहीं किया जा सकता।

आप की दादी या अन्य कोई भी उत्तराधिकारी यह कर सकता है कि मकान के बंटवारे का दावा करे और सब को अलग अलग हिस्सा देने की राहत प्रदान करने की मांग करे, या फिर यह भी राहत मांगी जा सकती है कि आप के दादाजी के छोटे पुत्र को उस के हिस्से की कीमत अदा कर के उस मकान से बेदखल करने की डिक्री की मांग की जाए। इस बीच अस्थाई निषेधाज्ञा जारी कराई जा सकती है कि दादाजी का छोटा पुत्र न्यूसेंस पैदा न करे। यदि वह फिर भी कुछ गड़बड़ करता है या तंग करता है तो दादी जी की ओर से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा का प्रतिषेध अधिनियम में कार्यवाही की जा सकती है।

 

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हक तर्क करना या रिलीज डीड निष्पादित करना क्या है?

June 15, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

सुरेन्द्र पाल सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या किसी नाबालिग (18 वर्ष से कम) के नाम जमीन का हक तर्क किया जा सकता हे? हक तर्क करने के नियम क्या है ?  हक तर्क से सम्बंधित नियम और कानून की जानकारी कौन सी किताब या नियमावली या अधिनियम में मिल सकती है? जानकारी प्रदान करवाने की कृपा करावे।

समाधान-

क तर्क करना अथवा रिलीजी डीड निष्पादित करने का अर्थ है किसी संपत्ति में अपने अधिकार को किसी दूसरे के हक में छोड़ देना है। लेकिन  इस के लिए जरूरी है कि जो हक तर्क कर रहा है और जिस के हक में हक तर्क किया जा रहा है दोनों एक ही सम्पत्ति में हिस्सेदार हों और संपत्ति संयुक्त हो। जैसे किसी व्यक्ति के देहान्त के उपरान्त उत्तराधिकार में संपत्ति उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाती है। तब कोई एक या अधिक उत्तराधिकारी किसी दूसरे उत्तराधिकारी के हक में अपना हक छोड़ सकते हैं। दो लोगों ने संयुक्त रूप से संपत्ति खरीदी हो और दोनों संयुक्त स्वामी हों तो उन में से एक दूसरे के हक में हक त्याग कर सकता है।
हक तर्क करने वाले का वयस्क होना जरूरी है।  जिस के हक में हक तर्क किया जा रहा है उस का बालिग होना जरूरी नहीं है वह नाबालिग हो सकता है। हक तर्क करना एक प्रकार से संपत्ति का हस्तान्तरण है और 100 रुपए से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति के हस्तान्तरण का पंजीकरण होना जरूरी है। यदि हक तर्क की जाने वाली सम्पत्ति का मूल्य यदि 100 रुपए से अधिक है और वह अचल संपत्ति है तो हक तर्क करने के दस्तावेज का पंजीकृत होना जरूरी है।
हक तर्क करने / रिलीज डीड निष्पादन के मामले में दो अधिनियम सामने हैं। एक तो संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम और दूसरा पंजीकरण अधिनियम। पंजीकरण के लिए स्टाम्प ड्यूटी और फीस का पता करना भी जरूरी है क्यों कि रिलीज डीड पर पंजीकरण शुल्क अन्य हस्तान्तरणों से कम है।

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व्यर्थ मुकदमे में भी प्रतिरक्षा करना जरूरी है।

June 14, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

शिवानी ने इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे ताऊजी का अपनी पत्नी से 2008 से घरेलू हिंसा का मुकदमा चल रहा है, जिस में न्यायालय ने सितम्बर 2016 में निर्णय देते हुए भरण पोषण के लिए 5000 रूपये प्रति माह देने और 20000 रुपए एक मुश्त क्षतिपूर्ति देने के लिए कहा है। ताऊजी सेंट्रल गवर्नमेंट के पेंशनर है और चलने फिरने उठने बैठने में असमर्थ है। उनके कोई संतान नहीं है। लड़का था, उसकी मृत्यु 2005 में रोड एक्सीडेंट में हो गयी थी। ताऊजी की देखभाल मेरी माँ करती है । वह भी केंद्रीय कर्मचारी है । मेरे पिताजी की भी मृत्यु हो चुकी है 1994 में। मेरे चाचा भी हैं हम सभी एक घर में रहते हैं। चाचा ने बटवारे का मुकदमा दर्ज किया था 2008 में, जिस में  प्राथमिक डिक्री 2011 में हुई जिसमें चाचा का एक तिहाई हिस्सा घोषित किया गया। फाइनल डिक्री के लिए मेरी माँ की तरफ से 2017 जनवरी में आवेदन दिया गया है जो विचाराधीन है। मैं जानना चाहती हूँ की क्या ताऊ जी के हिस्से में ताईं जी का भी हिस्सा बनता है? ताऊजी के मरने के बाद ताऊ जी ने अपनी रजिस्टर्ड वसीयत मेरे यानि अपनी भतीजी के नाम कर रखी है। ताईजी क्या हिस्से की मांग कर सकती है। डाइवोर्स का केस ख़ारिज हो चुका है। ताई जी का कहना है कि वह परेशान करने के लिए ये सब कर रही है, मुझे कुछ मिले न मिले वकीलो को दिलवाऊंगी और भरना पोषण के लिए और ज्यादा पैसों की मांग के लिए 127 में केस करुंगी। ताऊजी की जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है मार्गदर्शन करें।क्योंकि मेरी माँ ही उनकी देखभाल करती है तो यदि ताऊजी को कुछ हो जाता है तो उसमें मेरी माँ को तो कोई दिक्कत नहीं हो जायेगी। क्योंकि ताई जी ने माँ के ऊपर भी ताऊजी से सम्बन्ध के आरोप लगाए हैं।

समाधान-

केवल आरोप लगा देने से कोई चीज सिद्ध नहीं हो जाती। और कानूनी निर्णय और अधिकार ठोस सबूतों पर निर्भर करते हैं। आप की माँ पर आरोप लगा देने से उन का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। उन्हें कानून की तरफ से कोई परेशानी नहीं होगी। ताऊजी का जो हिस्सा है यदि उन्हों ने उसे वसीयत कर दिया है तो उस का दाय वसीयत के अनुसार होगा बशर्ते कि ताऊजी और कोई वसीयत न करें या की हुई वसीयत में अपने जीवनकाल में कोई बदलाव न करें।

जहाँ तक नाराज और बदले पर उतारू ताईजी का प्रश्न है तो वे कुछ भी कर सकती हैं। वे जितने चाहें मुकदमे करें। आप और आप की माँ पर उस का कोई असर नहीं होगा। हाँ वे यह कर सकती हैं ताऊजी के जीवनकाल के उपरान्त वसीयत को चुनौती दे दें। तब आप को फिजूल में मुकदमा लड़ना पड़ सकता है। आप को कोई अन्य फर्क नहीं पड़ेगा। पर यह भी याद रखें कि यदि किसी के विरुद्ध बेकार और बेदम मुकदमा भी होता है और उस में प्रतिरक्षा ठीक से न की जाए तो उस से नुकसान भी हो सकता है। इस लिए सावधान रहना और अपनी प्रतिरक्षा करने की सजगता रखना आप के लिए आवश्यक है।

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बिना रसीद के किराया अदा करना पैसे को पानी में फैंकना है।

June 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

विकास सिंह ने आजादपुर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

म 3० दुकादार पिछले 9 सालों से एक कॉम्पलेक्स में शॉप चला रहे हैं। जिसका किराया 5000 है और एग्रीमेंट 36 महीने का (बिना रजिस्टर्ड वाला) होता था। किराया हर एग्रीमेंट के ख़त्म होने के बाद 10% बढ़ता था। हमारा वो एग्रीमेंट ख़तम हो गया, लेकिन नया नहीं बना रहा। मकान मालिक सबको बहुत परेशान करता था और अब हम सबको दुकाने खाली करने की धमकी दे रहा है। किराया लेना भी बंद कर दिया। उसने किसी को भी पिछले 3 सालो में किराये की रसीद नहीं दी, न कभी चेक से किराया लिया। हमेशा बहाने बनाता था। अब हम क्या करें। क्या कोर्ट में किराया जमा करवायें? या उसके नोटिस का इंतज़ार करे। क्या वो हम सबसे दुकानें खली करवा सकते हैं।

समाधान-

प लोगों की सब से बड़ी गलती है कि आप ने मकान मालिक को बिना रसीद के किराया दिया है। बिना रसीद के दिया हुआ किराया भुगतान किया हुआ नहीं माना जा सकता। बिना रसीद के किराया अदा करना पैसे को पानी में फैंकना है। मकान मालिक 3 साल से अधिक के किराए की मांग नहीं कर सकता।  लेकिन वह 3 साल का किराया बकाया बता कर किराया अदायगी में कानूनी चूक के आधार पर दुकान खाली कराने का दावा कर सकता है। इस तरह आप को 3 साल का किराया जो आप दे चुके हैं वह दुबारा देना पड़ सकता है।

हमारी राय यह है कि आप सभी दुकानदार न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर चालू किराया यह कह कर अदालत में जमा करवा दें कि दुकानदार किराया ले कर रसीद नहीं देता। पहले हम उस के विश्वास पर थे पर अब जब उस से रसीद मांगी तो उस ने मना कर दिया इस कारण बकाया किराया जमा करवा रहे हैं।

हो सकता है मकान मालिक नोटिस दे कर पिछला किराया बकाया बताए। बाद में दुकान खाली करने का दावा करे। उस स्थिति में न्यायालय दावे में बकाया किराए का निर्धारण करे। तब यदि न्यायालय आदेश देता है तो आप को पिछले तीन वर्ष के किराए में से उतना किराया दुबारा देना पड़ेगा जितना न्यायालय निर्धारित करती है। यदि कोर्ट द्वारा निर्धारित किराया  आदेश से एक माह में जमा नहीं करवाएंगे तो दुकान किराया अदायगी में चूक के आधार पर खाली करने का निर्णय हो सकता है।

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