Legal Remedies Archive

बैनामा कैसे खारिज कराएँ?

January 21, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राकेश  जिला-प्रतापगढ़  उत्तर प्रदेश ने समस्या भेजी है कि-

हम तीन भाई थे।सबसे बड़े बेऔलाद थे।उन्होने सितंबर के प्रथम हप्ते में मेरे एक बेटे को अपनी चल अचल संपत्ति का वारिस(रजिस्टर्ड) बनाया था।इसका पता चलने पर मझला भाई जो लखनऊ में सपरिवार रहता है आकर उन्हें बहला फुसलाकर लखनऊ ले गया(१५सितंबर2017)और सितंबर केआख़िरी हप्ते मे छल और धोखे से उनकी समस्त संपत्ति बैनामा करवा लिया (खुद और अपनी पत्नी के नाम पर)।इस बैनामे में एक गवाह खुद वकील है और दूसरा गवाह उनका बेटा है।बाज़ार में स्थित मकान का बैनामा मकान दर्शाए बिना खाली जमीन के रूप में एक लाख नकद दिखा कर करवा लिया जबकि उसकी बाजार में कीमत25 लाख रुपए है।शेष जमीन का बैनामा 9 लाख रुपए में करवाया है और पेमेंट के रूप में केवल एक चेक का नम्बर लिखा है और बैनामे के दिन की तारीख लिखी है।चेक की फ़ोटो कापी भी संलग्न नहीं है।फिर उन्हें लखनऊ लेकर चले गए।पता चलने पर मैं एक रिश्तेदार के साथ 9अक्टूबर2018कोगया तो वह बोले कि जबर्दस्ती और छल से ऐसा किया।मैं इसको ख़ारिज कराऊंगा लेकिन मुझे घर नहीं जाने दे रहे हैं।इस पर उन लोगों ने कहा कि हम खुद ख़ारिज करवा देंगे और इनको दो दिन में घर पहुंचा देंगे।उन्होंने पैसा नहीं पाने की बात भी कबूली।लेकिन उन लोगों ने पहुँचाया नहीं और21अक्टूबर18को उनकी मौत की खबर आती है।पोस्टमार्टम न कराने के प्रार्थना पत्र पर मेरा दस्तखत लेकर थाने में जमा कर दिये और मुझे दिसम्बर में समाधान करने की बात कह कर टाल दिये।मुझे ऐसा लगता है कि उन लोगों ने भेद खुलने के डर और पैसा भी हड़पने के चक्कर में उनकी हत्या कर दी।भाई ने धोखा और छल की बात कुछ और लोगों को फोन पर बताया था।
क्या अब उनकी मौत की जांच करवाई जा सकती है?यदि हाँ तो कैसे?
इस संबंध में और क्या कदम उठाए जा सकते हैं।ये जमीन पुश्तैनी है।बातचीत की मोबाइल रिकार्डिंग क्या साक्ष के रूप में अदालत में मान्य हो सकती है?
कृपया मार्ग दर्शन करें।
राकेश

 समाधान-

आप के पास पर्याप्त तथ्य और सबूत हैं जिन के आधार पर आप बैनामा खारिज कराने का वाद संस्थित कर सकते हैं। पोस्टमार्टम न कराने के आवेदन पर आप को हस्ताक्षर नहीं करने थे। इस से वे यह साबित करने का प्रयत्न करेंगे कि आप खुद आश्वस्त थे कि उ नकी मृत्यु संदेहास्पद नहीं है। पुश्तैनी जमीन  होने पर और वारिस न होने पर वसीयत की जा सकती है और संपत्ति को विक्रय भी किया जास कता है इस तरह पुश्तैनी संपत्ति होने का कोई फर्क इस मामले पर नहीं पड़ेगा। बेहतर तो यही है कि आप बैनामा खारिज कराएं जिस से वसीयत को लागू किया जा सके। बैनामा खारिज कराने के लिए आप को दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा जिस में आप को बैनामा के मूल्य पर कोर्ट फीस भी देनी होगी।

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हम अपने पाठकों से प्राप्त सभी समस्याओं पर अपनी राय ई-मेल से दे रहे हैं।
हम उन्हें यहाँ भी प्रस्तुत कर सकते हैं, जिस से अन्य पाठकों को भी लाभ हो। हम जानना चाहते हैं कि समस्याओं के समाधान इस तरह प्रस्तुत करने का यह प्रारूप आप को कैसा लगा। आशा है आप की टिप्पणियाँ हमें प्राप्त होंगी।
-दिनेशराय द्विवेदी

 

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दरवाजा व रास्ता कैसे बनाए रखें?

January 21, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अन्नू पांडे ने पूछा है-

नमस्ते!
मेरे घर के पीछे कुछ खाली ग्राम समाज की जमीन है।
मेरे पिता के चाचा जी जो की मेरे घर से 200 मीटर दूर मकान मे रहते है।
मेरे घर के दवाज़े को लेकर रोज़ झगड़ा करते है की मैं उस दरवाज़े को बन्द कर दूँ।उनका कहना है के ये जमनीं उनकी है।जबकि वो ग्राम समाज है। और मेरे पिता के चाचा जी के पास 15 बीघा से ज्यादा का खेत और बाग अलग से है।
तो अब आप हमे बताइये की में अपना निर्माण कार्य किस प्रकार बिना दरवज़ा बन्द किये जारी रख सकता हूँ???

सलाह  

आप का दरवाजा पहले से है आप उसे कायम रखें।
बन्द करने की कहने वाले को कहें कि वह अदालत में जा कर नालिश करे।
यदि वह आप को तंग करता है तो पुलिस में रिपोर्ट कराएँ,  और फिर भी काम न बने तो अदालत में निषेधाज्ञा का वाद दाखिल कर  निर्माण कार्य तथा रास्ते में बाधा उत्पन्न न करने के लिए विपक्षी के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने का प्रयत्न करें।


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-दिनेशराय द्विवेदी

 

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अनुकंपा नियुक्ति केवल नियमों केअनुरूप ही संभव है।

January 14, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राजेश ढंगारे ने नासिक, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी पशु संवर्धन में परिचर पद पर थे। उन का देहान्त 8 अगस्त 2000 को हुआ। मेरे पिताजी के दो पत्नियाँ थीं। उन्हों ने दूसरा विवाह लड़का न होने के कारण किया था। मैंने पापा के गुजरने के बाद 2001 में अनुकम्पा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। 2008 में उन्हों ने पत्र भेजा कि आप की माँ शासकीय सेवा में परिचर थी इस कारण आप को अनुकम्पा नियुक्ति नहीं मिल सकती। मम्मी को 2008 में पैरालीसिस हुआ तो उन्हों ने स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति प्राप्त कर ली। क्या मुझे पिताजी या माताजी के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति मिल सकती है?

समाधान-

प को और सभी लोगों को यह जान लेना चाहिए कि अनुकंपा नियुक्ति कोई अधिकार नहीं है बल्कि केवल अनुकंपा मात्र है। सुप्रीम कोर्ट बार बार यह कह चुका है कि सरकारी और सरकारों के नियंत्रम वाले नियोजनों में नियोजन खुले निमंत्रण द्वारा योग्यता के आधार पर दिया जाना चाहिए। अनुकंपा नियुक्ति भी केवल परिवार को तुरन्त आर्थिक संकट से बचाने के लिए नियमों के अनुसार ही दी जानी चाहिए। अन्यथा ऐसी नियुक्तियाँ असंवैधानिक होंगी।

आप के पिता का देहान्त हुआ तब आप की माता जी राजकीय सेवा में थी इस कारण नियमों के अंतर्गत अनुकम्पा नियुक्ति आप प्राप्त नहीं कर सकते थे। आप की माताजी ने उन्हें पैरालिसिस हो जाने के कारण सेवा निवृत्ति प्राप्त कर ली। स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति पर अनुकम्पा नियुक्ति दिए जाने का कोई नियम नहीं है। इस कारण आप को नौकरी मिलना संभव नहीं है।

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बँटवारा और पृथक कब्जा ही समस्या का हल है।

December 25, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

रामकुमार महतो ने ग्राम बाहेरी, जिला दरभंगा, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा के पिताजी तीन भाई थे, उन तीनों के नाम से एक जमीन है। जिसके पहले कॉलम मे बहिस्सा बराबर लिखा हुआ है, और कैफियत खाना में तीनों के नाम से अलग-अलग खेसरा नं देकर उनके आगे कब्जा दिखाया गया है। जिसके अनुसार सभी अपने हिस्से के जमीन पर बिना किसी विवाद के लगभग 80 वर्षों से रहते चले आ रहे हैं। उस हिस्से में किसी के पास कम जमीन है तो किसी के पास अधिक जमीन है। आगे चलकर कुछ लोगों ने अपने हिस्से की जमीन का कुछ हिस्सा बेच भी दिया है जिस पर किसी को भी कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन कुछ लोगों के कहने पर मेरे विपक्षी ने 2012 से मेरे साथ सम्पत्ति को बराबर हिस्से में बटवारा को लेकर विवाद करने लगे। अब उनके साथ ग्राम पंचायत के पूर्व सरपंच का समर्थन भी है। वे लोग जबरदस्ती मेरे हिस्से की जमीन पर (जिस पर मकान बनाकर हम लोग लगभग 50 वर्ष पूर्व से बिना किसी विवाद के रहते चले आ रहे हैं ) कब्जे की कोशिश करते हैं। जिससे जान माल के नुकसान का भय हमेशा बना रहता है। कृप्या सही सलाह दें?

समाधान-

प की उक्त वर्णित संपत्ति पुश्तैनी है और वह अभी भी आप के परदादा और उन के भाइयों के नाम दर्ज है। जब भी जमीन के किसी खातेदारी की मृत्यु हो जाती है तो उस के उत्तराधिकारियों का यह दायित्व होता है कि वे मृतक का नाम खारिज करवा कर उस के उत्तराधिकारियों के नाम और उन के हिस्से रिकार्ड में दर्ज कराएँ। यदि उत्तराधिकारी उन के नाम और हिस्से दर्ज करवा भी दें तो केवल यह दर्ज होता है कि कुल जमीन में उन का हिस्सा कितना है। उन का पृथक हिस्सा कौन सा है यह दर्ज नहीं होता। उस के लिए किसी भी जमीन के सभी मौजूदा हिस्सेदारों को आवेदन दे कर अपने अपने खाते अलग कराने चाहिए और हिस्से भी अलग अलग करा लेने चाहिए जिस से भविष्य में समस्या न हो।

आपने जो रिकार्ड भेजा है उस में पूरी संपत्ति किस की है यह दर्ज है उन के हिस्से भी दर्जै हैं साथ ही यह भी दर्ज है कि जमीन के कौन से हिस्से पर किस का कब्जा है। जब किसी कब्जे दार ने अपने हिस्से की जमीन का कोई हिस्सा विक्रय किया तो उस ने अपने कब्जे की जमीन में से उतना हिस्सा खऱीददार के कब्जे में दे दिया। जब कि विक्रय या तो खाते में दर्ज ही नहीं हुआ और दर्ज हुआ होगा तब भी वह आप के साथ संयुक्त खातेदार रहेगा जब तक कि सभी खातेदारों / हिस्सेदारों का विभाजन हो कर उन के पृथक पृथक हिस्से दर्ज हो कर उन्हें उन के हिस्सों पर कब्जा न दे दिया जाए।  इस तरह समस्या तो बनी हुई है और इस का समाधान भी आसान नहीं है। इस समस्या का हल या तो आपसी सहमति से हो सकता है या फिर अदालत में विवाद के निर्णय और निष्पादन से। अदालत में विभाजन होना और उस का निष्पादन होना बहुत लंबी प्रक्रिया है। लेकिन वही सही हल है।

आप के कब्जे में जो जमीन और मकान है वह स्पष्ट रूप से रिकार्ड में दर्ज है। इस कारण कोई भी आप को अपने कब्जे से बिना किसी अदालत के निर्णय और निष्पादन के बेदखल नहीं कर सकता। यदि किसी को बंटवारा करवा कर अपना हिस्सा अलग करवाना है तो वह अदालत में विभाजन का दावा करे। जो लोग आप को बेदखल करने का प्रयास कर रहे हैं उन से आप कह सकते हैं कि वे पहले अदालत से फैसला करवाएँ। फिर भी आप यदि परेशानी से बचना चाहते हैं तो किसी वकील से मिल कर राजस्व रिकार्ड में दर्ज आप के कब्जे की जमीन से जबरन बेदखल किए जाने के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त करने के लिए दावा करा सकते हैं। एक बार निषेधाज्ञा प्राप्त हो जाने पर बेदखली के विरुद्ध आप को सुरक्षा मिल जाएगी।

समस्या-

गोपाल ने पूना, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरे एक मित्र का एक मैसेज एक अज्ञात मोबाइल नंबर पर 2015 में गया था। जो कि मोबाइल में नंबर गलत सेव होने से हो गया था। लेकिन वह जिस का नंबर था वह एक किसी विवाहित महिला का था जिस से मेरे मित्र का कोई संबंध नहीं था। उस महिला ने पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी जिस के कारण 354 डी आईपीसी में मुकदमा कायम हुआ और अदालत में जमानत हुई। फिर धारा 107 दंड प्रक्रिया संहिता में भी पाबंद किया गया। लेकिन मेरा मित्र जमानत के बाद अदालत में हाजिर न हुआ क्यों कि वह किसी दूसरे गाँव में रहता है। इस से मेरे मित्र को क्या नुकसान हो सकता है?

समाधान-

प के मित्र की 354 आईपीसी के प्रकरण में जमानत हुई थी इस का सीधा अर्थ है कि पुलिस ने अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया था। जमानत इसी बात की थी कि आप का मित्र सुनवाई के लिए हर पेशी पर अदालत में हाजिर होता रहेगा। अब आप का मित्र अदालत में पेशियों पर हाजिर नहीं हुआ है तो उस के द्वारा पेश किए गए जमानत व मुचलके की राशि को जब्त कर के उस के नाम से गिरफ्तारी वारंट जारी हो चुका होगा। आप के मित्र का वर्तमान पता न्यायालय के रिकार्ड पर न होने से वारंट उस तक नहीं पहुंच पा रहा है। कई पेशी पर भी वारंट तामील न होने पर आप के मित्र को फरार घोषित कर उस की संपत्ति को कुर्क करने का आदेश तथा स्थायी गिरफ्तारी वारंट जारी किया जा सकता है। आप के मित्र के मिल जाने पर पुलिस गिरफ्तार कर के अदालत के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है जहाँ से अदालत यदि फिर से जमानत पर न छोड़े तो जेल भेजा जा सकता है। जब तक मुकदमे का निर्णय न हो या वही अदालत या उस से ऊँची अदालत जमानत पर छोड़े जाने का आदेश पारित न करे और जमानत पेश न हो तब तक जेल में रहना पड़ सकता है।

इस का समाधान ये है कि आप के मित्र को जमानत कराने वाले वकील से मिलना चाहिए और उस अदालत में जहाँ उस की जमानत हुई थी जा कर उस मुकदमे में फिर से जमानत करानी चाहिए। पुरानी जमानत जब्ती का जुर्माना जो भी हो वह जमा करना चाहिए और पेशियों पर हाजिर हो कर मुकदमे को समाप्त कराना चाहिए। इस तरह के मुकदमे लोक अदालत में गलती स्वीकार करने पर मामूली जुर्माना जमा कर के भी समाप्त कराए जा सकते हैं।

समस्या-

अश्विनि कुमार ने एमक्यू119, दीपिका कालोनी, पोस्ट- गेवरा प्रोजेक्ट, जिला कोरबा (छत्तीसगढ़) से समस्या भेजी है कि-

मै एवं मेरी पत्नी भी कोरबा के ही हैं। मेरी पत्नी के द्वारा मेरे ऊपर धारा 498क (जून 2012), धारा 125 (अगस्त 2012), घरेलू हिंसा (अक्तूबर 2013)2013 मे केस किए हैं। धारा 125 में अन्तरिम भरण पोषण के लिए फरवरी 2014 से 5000.00 रुपये प्रति माह मेरे द्वारा दिया जा रहा है। सभी केस अभी अंतिम दौर मे चल रहा है। मेरी पत्नी जून 2017 से केन्द्रीय विद्यालय मे शिक्षिका के पद पर नियुक्त होकर 27500.00 रुपए वेतन प्राप्त कर रही है। मुझे जानकारी होने पर मेरे द्वारा केन्द्रीय विद्यालय से सूचना के अधिकार के तहत जानकारी मांगने पर तीसरे पक्ष की जानकारी देने से मना किया गया। अपील में गया तो अपील अधिकारी के द्वारा मेरी पत्नी को पूछे जाने पर मेरी पत्नी ने जानकारी देने से मना कर दिये जाने की जानकारी देते हुये मुझे जानकारी नहीं दी गयी। सूचना के अधिकार के तहत दी गयी जानकारी आपकी ओर प्रेषित कर रहा हूँ। मुझे मेरी पत्नी से संबन्धित जानकारी कैसे प्राप्त हो सकती है?

समाधान-

प यह जानकारी इस कारण से प्राप्त करना चाहते हैं जिस से आप न्यायालय के समक्ष इन दस्तावेजों के प्रस्तुत कर यह साबित कर सकें कि आप की पत्नी को भरण पोषण के लिए किसी राशि की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन किसी भी न्यायिक कार्यवाही में यदि कोई तथ्य साबित करना है तो उस में उस के लिए इस तरह के प्रावधान हैं कि न्यायालय स्वयं उस पक्ष को वे तथ्य प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है या फिर किसी दस्तावेज को जो न्यायालय में लंबित मुकदमे का निर्णय करने के लिए आवश्यक हो उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है। इस सम्बन्ध में दीवानी और अपराधिक प्रक्रिया संहिताओं में उपबंध हैं।

दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 में दस्तावेज प्रस्तुत कराने तथा विपक्षी को परिप्रश्नावली दे कर उन के उत्तर प्रस्तुत करने के उपबंध हैं इसी प्रकार धारा 91 दंड प्रक्रिया संहिता में दस्तावेज प्रस्तुत कराने संबंधित उपबंध हैं। आप अपने वकील से संपर्क कर के उन्हें इन उपबंधों में से उपयोगी उपबंध में आवेदन प्रस्तुत कर उक्त दस्तावेज संबंधित स्कूल प्रशासन को प्रस्तुत करने का आदेश न्यायालय से कराएँ। जरूरत होने पर सूचना के अधिकार के अंतर्गत प्राप्त उत्तरों को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।

पति को कानूनन संपत्ति का केवल चौथाई हिस्सा ही प्राप्त होगा।

December 16, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

श्रुति शर्मा ने सीतापुरा, जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे ससुर जो की एक सरकारी नौकरी में थे ओर उनकी नौकरी में रहते हुए मृत्यु हो गई। मेरे पति के छोटे भाई को उन के स्थान पर अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त हुई है। मेरे पति से सब रिश्तेदारों ने जबरदस्ती दबाव दे कर अनापत्ति लिखाई कि उन्हें संपत्ति दे दी जाएगी। लेकिन मेरे पति को कोई संपत्ति नहीं दी गयी है। अब हमारी कोई आर्थिक सहायता भी नहीं करता है।  मेरी सास के नाम एक मकान है जो कि मेरे ससुर  ने ही किया था। उस मकान को वो 4 हिस्सों में बाटने को बोलती है। एक बेटी का, एक खुद का, एक मेरे पति का और एक हिस्सा उसे देगी जो नौकरी लग चुका है। मैं सिर्फ़ ये जानना चाहती हूँ कि ऐसा क्या करें जो कि वो पूरा मकान मेरे पति का हो जाए। क्योंकि की मेरी सास को पेंशन मिलती है ओर ननद की शादी के पैसे पहले ही जमा हैं मेरे देवर को नौकरी मिल गई। लेकिन मेरे पति अभी बेरोज़गार हैं। एक मकान मेरे ससुर के नाम का है जो कि कच्ची बस्ती में आता है उसे में भी सिर्फ़ हम रहते थे। हम अब हम सीतापुरा वाले मकान में आए हैं जो कि मेरी सास के नाम का है उसमें भी सिर्फ़ रहते ही हैं। जबकि मेरे पति के पास कुछ भी नहीं है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

ब आप के पति ने अनापत्ति की थी तभी उन्हें रिश्तेदारों को कहना चाहिए था कि पहले संपत्ति मेरे नाम करवा दें। जो भी संपत्ति आप के नाम हस्तांतरित हो जाती हो जाती। अब तो आप के पति अपनी अनापत्ति दे चुके हैं और देवर की नौकरी भी लग चुकी है। अब आप के पति को केवल उन के हिस्से की संपत्ति प्राप्त हो सकती है। आप की सास यदि उन के नाम के मकान का बंटवारा करना चाहती हैं तो जो वे कर रही हैं वह कानूनी रूप से सही है। आप के पति का एक चौथाई हिस्सा बनता है। वह उन्हें ले लेना चाहिए। इस के अलावा आप के पति कच्ची बस्ती वाले मकान को अपने नाम करवा सकते हैं इस के लिए जिन रिश्तेदारों ने आप पर दबाव बनाया था उन्हें फिर से इकट्ठा कर के आप की सास, देवर व ननद पर दबाव बनाया जा सकता है। यदि आप के पति कुछ नहीं करते तो यह सब से बड़ी कमी है। उन्हें कुछ न कुछ तो करना होगा। कुछ नहीं करने वालों के पास जो कुछ भी होता है वह भी चला जाता है। अपने परिवार के जीवन यापन के लिए उन्हें पर्याप्त कमाई करना चाहिए। अब तो स्थिति यह है कि कानूनी रूप से आप के पति का सारी संपत्ति में जो चौथाई हिस्सा है वही मिल सकता है अन्य कोई संपत्ति नहीं मिल सकती। ऐसा कुछ नहीं किया जाना संभव नहीं है जिस से पूरा मकान आप के पति को मिल जाए।

समस्या-

निशी ने उदयपुर राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या 25 वर्ष पूर्व शपथ पत्र के माध्यम से बक्शीश या दान में दी गई अचल सम्पत्ति जिसे ग्रहिता ने स्वीकार कर निर्माण किया और वर्तमान में भी काबिज है को दानदाता अपने जीवन में किसी अन्य के नाम पंजीकृत कर सकता या सकती है? जिसका पता ग्रहिता को दाता की मौत के बाद चले, तो क्या उससे वह सम्पत्ति पंजीकृत कराये दूसरे व्यक्ति को मिल जायेगी या होगी जबकि दानग्रहिता जीवित है और सम्पत्ति पर काबिज है?

समाधान-

चल संपत्ति का दान या बख्शीश शपथ पत्र के माध्यम से नहीं हो सकता। दान और बख्शीश संपत्ति का अंतरण हैं और संपत्ति का मूल्य 100 रुपए से अधिक होने के कारण उस का पंजीकृत होना आवश्यक है। आप  दान या बख्शीश पंजीकृत विलेख से नहीं होने के कारण अमान्य है। लेकिन यह दस्तावेज बताता है कि दान प्राप्तकर्ता को उक्त संपत्ति का कब्जा खुद उस के मालिक ने दिया था। कब्जे को 25 वर्ष हो चुके हैं। 25 वर्ष का अबाधित कब्जा होने तथा उस पर ग्रहीता द्वारा निर्माण कार्य भी कराया गया है।

यदि उक्त संपत्ति मूल स्वामी के द्वारा किसी को पंजीकृत विलेख से हस्तांतरित कर भी दी गयी हो तब भी उस का कब्जा तो वास्तविक रूप से नहीं दिया गया है। हस्तांतरण से संपत्ति का स्वामित्व प्राप्त करने वाले को ग्रहीता से संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित करना होगा। यह वाद मियाद के बाहर होने के कारण निरस्त हो सकता है। क्यों कि 25 वर्ष का अबाधित कब्जा होने से ग्रहीता का कब्जा प्रतिकूल हो चुका है और उस से संपत्ति का कब्जा मूल स्वामी या हस्तान्तरण से स्वामित्व प्राप्त व्यक्ति मियाद के बाहर होने से प्राप्त करने में अक्षम रहेगा।

बिना न्यायालय की डिक्री के हिन्दू विवाह विच्छेद संभव नहीं है।

October 30, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

प्रियंका जैन ने उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी नवंबर 2016 में हुई थी शादी के कुछ दिनों बाद ही मुझे ससुराल में मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताण्डित किया जाने लगा। एक दो महीने तक तो बर्दाश्त किया लेकिन फिर मैं ने अपने माता पिता को यह बात बताई और शादी के 5 महीने बाद अलग हो जाने का निर्णय लिया। आपसी रज़ामंदी एवं सामाजिक स्तर पर स्टाम्प वगैरह लिखवाकर हम अलग हो गए। न्यायालय का इस में कोई योगदान नहीं था। अब घरवाले मेरे लिए लड़का ढूंढ रहे हैं, मुझे इस बात का डर है कि मेरा तलाक वैध है या नहीं? कहीं इस तरह शादी कर के मैं अपने होने वाले पति की मुसीबत तो नही बढ़ा रही हूँ?  डिक्री क्या है? इसका होना आवश्यक है क्या? कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प जैन हैं और आप पर हिन्दू विवाह विधि प्रभावी है। हिन्दू विवाह विधि में कोई भी विवाह विच्छेद बिना न्यायालय के निर्णय और डिक्री के संभव नहीं है। आपसी समझौते से आप लोग अलग हो गए हैं लेकिन वैवाहिक संबंध वैध रूप से समाप्त नहीं हुआ है। अभी भी कानूनी रूप से आप के पूर्व पति ही आप के पति हैं और आप उन की पत्नी हैं। यदि आप विवाह विच्छेद के न्यायालय के निर्णय व डिक्री के बिना विवाह करती हैं तो वह पूरी तरह अवैध होगा। क्यों कि इस के बाद आप के नए पति से यौन संबंध स्थापित होंगे जो आप के पूर्व पति की सहमति के बिना होंगे तो आप के नए पति भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अंतर्गत दोषी माने जाएंगे। इस कारण आप के लिए यह आवश्यक है कि आप न्यायालय से विवाह विच्छेद का निर्णय व डिक्री प्राप्त करें।

न्यायालय का निर्णय कई पृष्ठ का होता है। उस में विस्तार से दोनों पक्षों के अभिकथन, साक्ष्य व उन की विवेचना के साथ निर्णय अंकित होता है। जब कि डिक्री किसी भी दीवानी (सिविल) मामले में हुए निर्णय की प्ररूपिक अभिव्यक्ति है जिस में वाद के पक्षकारों के अधिकारों को प्रकटीकरण होता है। किसी विवाह विच्छेद के मामले में डिक्री दो पृष्ठ की होगी जिस में पक्षकारों का नाम पता लिखा होगा तथा यह लिखा होगा कि इन दोनों के बीच विवाह विच्छेद हो चुका है। कहीं भी आप को बताना हो कि आप का विवाह समाप्त हो गया है तो दो पृष्ठ की इस डिक्री की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करना पर्याप्त होगा।

किसी भी मामले में सामान्य रूप से विवाह के एक वर्ष तक विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। इस कारण आप के मामले में भी नवंबर 2017 में पूरा एक वर्ष व्यतीत हो जाने तक यह आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यदि दोनो पक्ष सहमत हों तो जिस समय आप के विवाह को एक वर्ष पूर्ण हो आप और आपके पति मिल कर सहमति से विवाह विच्छेद के लिए न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करें। आवेदन प्रस्तुत करने के छह माह बाद न्यायालय से विवाह विच्छेद का निर्णय व डिक्री मिल जाएगी। यदि दोनो पक्ष सहमति से तलाक के लिए अर्जी प्रस्तुत नहीं करते तो फिर आप को अकेले किसी आधार पर संभवतः क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना होगा। उस में विवाह विच्छेद में समय लग सकता है।

दादी उन के पति से मिले हिस्से की वसीयत कर सकती है।

October 29, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

योगेश सोलंकी ने नामली (रतलाम), मध्य्प्रदेश से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मारे दो मकान ओर एक खेत हैं। कुछ महीनों पूर्व ही मेरी दादी की मृत्यु हुई है और मेरी दादी ने एक रजिस्टर्ड वसीयतनामा किया है उसमें एक बड़ा मकान और वो खेत मेरे चाचा के नाम किया गया और सिर्फ छोटा मकान मेरे पापा को दिया गया। जबकि खेत मेरी दादी के नाम का था और दोनों मकान नगर परिषद में के रजिस्टर में और रजिस्ट्री भी मेरे दादाजी के नाम से है और कानूनी तौर पर भी दोनों मकान मेरे दादा जी के नाम से है। वसीयत सिर्फ खुद की खरीदी हुई या स्वअर्जित संपत्ति पर ही की जाती है। तो ये जो वसीयत की गई वो सही है या गलत और मुझे क्या करना चाहिये?

समाधान-

प बिलकुल सही हैं। दादाजी के नाम की जो संपत्ति है उस का उत्तराधिकार तो दादाजी के समय ही निश्चित हो गया। यदि आप के दादाजी के दो पुत्र ही हैं और कोई पुत्री नहीं थी तो उन की समूची संपत्ति उन के देहान्त पर तीन हिस्सों में विभाजित हो कर एक एक हिस्सा दादी और आप के पिता और चाचा को मिलना चाहिए। इस तरह दोनों मकानों का एक तिहाई हिस्सा आप के पिता को मिला, एक चाचा को और एक दादी को। अब यदि दादी उन मकानों की वसीयत नहीं कर सकती है तो भी वह अपने हिस्से की वसीयत कर सकती है। इस तरह मकानों का 2/3 हिस्सा चाचा को मिलेगा और जमीन दादी के नाम होने से वसीयत से चाचा को मिलेगी।

अब आप को खुद सोचना चाहिए कि अभी जो मकान मिला हुआ है वह दोनों मकानों के मूल्य के एक तिहाई से अधिक मूल्य का है तो कुछ भी करने में कोई लाभ नहीं है। और यदि लड़ाई लड़ी जाए और फिर भी इतना ही अधिक मिले की उस से केवल लड़ाई का खर्च भी न निकले तो लड़ाई लड़ने से कोई लाभ नहीं।

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