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समस्या-

वेद ने बादशाहपुर, हरयाणा से समस्या भेजी है कि-

मैं एक मध्यम परिवार से ताल्लुक रखता हूँ। मेरे दादा जी ने जो हमारा घर था ,उसको किसी के नाम नही किया, वो स्वर्ग सिधर गये। मेरे दादा जी के तीन लड़के हैं। मेरे पिता जी सब से छोटे हैं। मेरे पिताजी और ताउजी ने अपना अपना बटवारा कर लिया। मेरे पिता जी को जो हिस्सा मिला वो उन्होने सन् 1997 में बेच दिया।  दादा जी के नाम से जो हिस्सा मेरे पिता जी ने बेचा इस में उन्होने मेरे सिग्नेचर करा लिए और अलग जगह पर उस पैसे से ज़मीन लेकर मकान बनाया। जो मकान बनाया वो मेरे पिता जी के नाम पर है। मेरे पिता जी के हम चार बच्चे हैं . जिसमे हमारी दो बहनो की शादी सन् 1993 में और हम दोनों भाइयों की शादी सन् 1996 में हो गई। अभी हम सभी इसी नये मकान मे रहते हैं। हमारे घर मे लड़ाई होती रहती है। बात बात पर मेरे पिता जी और माँ हमें परेशान करते हैं। एक बार मेरे पिता जी ने लड़ाई के बाद जब कुछ लोगों के माध्यम से फ़ैसला किया। जिसमें उन्होने मुझे मकान में तीसरा हिस्सा दिया। जो कि एक लाइन वाली कॉपी के पेज पर लिखा है और रसीदी टिकट लगा कर मेरे पिता जी ने सिग्नेचर किए हैं।  साथ मे दो हमारे दोनो के रिलेटिव है उनके भी सिग्नेचर हैं। लेकिन वो पेपर मेरी अलमारी से गुम / चोरी हो गया। उसकी एक फोटो कॉपी मेरे पास है। अब मेरे पिता जी हमे इस घर से निकलना चाहते हैं। इसलिए हमारे साथ लड़ाई करते हैं कि ये यहाँ से घर छोड़ कर चला जाए। इस घर में बिजली का बिल मेरे नाम से आता है। मेरे पिता जी का एलेक्ट्रिसिटी बिल /मीटर अलग है। क्या मुझे इस मकान मे सिर छुपाने के लिए जगह मिल सकती है।

समाधान-

प के तथ्यों से लग रहा है कि मकान पुश्तैनी संपत्ति है जिसे न्यायालय में साबित किया जा सकता है, जिस का हिस्सा आप को पिताजी पहले ही दे चुके हैं। आप अपने पिताजी से कह सकते हैं कि आप ने मुझे इस मकान में अलग हिस्सा दे चुके हैं और सब को शान्ति से रहना चाहिए। आप को जो हिस्सा मिला है उसे बनाए रखने की कार्यवाही आप को करनी है।

यदि फिर भी बात नहीं बनती है तो आप मकान से निष्कासन पर रोक के लिए स्थाई निषेधाज्ञा का दीवानी वाद प्रस्तुत कर दीवानी न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस के लिए आप को अपने शहर के किसी अच्छे दीवानी वकील से सलाह कर के कार्यवाही करना चाहिए। पिताजी का लिखा जो कागज आप से खो गया है या चोरी हो गया है उस की फोटो प्रति न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है और उसे द्वितीयक साक्ष्य के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। उस पर गवाहों के रूप में जिन रिश्तेदारों के हस्ताक्षर हैं उन के बयान करवा कर उसे साबित किया जा सकता है।

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संपत्ति पर आप का कब्जा है तो आप को अदालत जाने की जरूरत नहीं।

January 17, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

महेश ने खंडवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे नानाजी का तीन कमरो का पुराना मकान था। अब उसे तोड़कर मेरी मौसी और माताजी के सहयोग से ये मकान नया बना लिया। मेरे तीनो मामाओ ने जब  मकान बन रहा था तब किसी ने आपत्ति नही ली। मैं उस वक्त पढ़ाई के लिये इंदौर गया था। अब हम उस मकान में चार साल से रह रहे हैं। मेरा बड़ा मामा कह रहा है कि तुम कब्जा करने आ गये हो, तुम्हारा क्या हे यहाँ से निकलो। हमारी मकान की रजिस्ट्री भी नहीं है अब हम क्या कानूनी कार्यवाही करें?

समाधान-

कान तो नाना जी का था जिसे गिराया गया था। फिर आप की माता जी और मौसी के सहयोग से बनाया गया। मामाओं का भी कुछ तो सहयोग रहा होगा। उस मकान में अब कौन कौन रहते हैं यह भी आपने नहीं बताया। जब तक पूरा विवरण न हो पूरा समाधान भी संभव नहीं है। नानाजी अब शायद नहीं हैं। यदि हैं तो मामाजी आप को उस मकान से नहीं निकाल सकते। यदि नहीं हैं तो उस मकान के जितने हिस्से का स्वामी हर मामा है उतने ही हिस्से के मालिक आप की माँ और मौसी हैं। इस कारण यदि उस मकान पर कब्जा है तो वे आप को उस मकान से नहीं निकाल सकते। जैसे बड़े मामान ने कहा है वैसे आप की माँ और मौसी कह सकती हैं कि तुम निकलो मकान हमने बनाया है। जिस के पास संपत्ति का कब्जा है उसे अदालत में जाने की जरूरत नहीं है। जिस के पास संपत्ति का कब्जा नहीं है उसे अदालत जाने दें।

यदि मामाजी कुछ गड़बड़ करें तो मौसी और माताजी अदालत में इस आशय का वाद संस्थित कर सकती हैं कि वे भी मकान में हिस्सेदार हैं और उन्हें मकान से न निकाला जाए। पह हमारी राय है कि अदालत में आप की माँ व मौसी न जाएँ। मामा को अदालत में जाने दें। मौसी व माताजी ने निर्माण में जो खर्च किया उस का हिसाब और सबूत हो तो संभाल कर रखें। मुकदमे में काम आएंगे।

हिस्सेदार अधिक से अधिक मकान के बंटवारे की मांग कर सकते हैं और बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं।

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समस्या-

राकेश कुमार ने अलवर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी ओर मेरे भाई की शादी फऱवरी 2015 में हुई। शादी के 1 साल तक सही रहा।  इसके बाद हम दोनों भाई की उनसे बनी नहीं वो बिना बात पे ही हम से लड़ाई करती थी।  फिर वो दोनों चली गई, हम लेने गए तो दोनो नहीं आई।  बड़ी बहन गर्भ से थी। हम ने धारा 9 का केस डाल दिया। चार माह बाद जब डिलीवरी होने का टाइम आया तो उन्होने कहा कि इनको ले जाओ।  हम दोनों को ले आए। डिलीवरी के दो माह बाद छोटी बहन, मेरी घरवाली कहती है कि मुझे नहीं रहना तलाक चाहिए। हम ने उसको कई बार रहने को बोला लेकिन वो अपने माँ बाप के पास चली गई और उसके बाद उसने मुझे नोटरी करवा कर रुपए 100 के स्टांप पर तलाक़ दे दिया और बड़ी बहन अभी रह रही है, क्या ये तलाक़ मान्य है।

समाधान-

प खुद हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर चुके हैं। इस का अर्थ है कि आप हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होते हैं। इस अधिनियम में कोई भी तलाक केवल तभी मान्य होता है जब कि न्यायालय से डिक्री पारित हो जाए।

आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है और उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पर आप को तलाकनामा लिख भेजा है। यह अपने आप में क्रूरता पूर्ण व्यवहार है। आप इसी स्टाम्प के आधार पर तथा अन्य आधारों पर परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को तुरन्त कर ही देनी चाहिए। न्यायालय से डिक्री पारित होने और निर्धारित अवधि में उस की कोई अपील दाखिल न होने पर यह तलाक अन्तिम हो सकता है।

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पंजीकृत बैनामा को रद्द कराना आसान नहीं होगा।

January 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

विजयलक्ष्मी ने झिंझक, कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम विजय लक्ष्मी है। हम तीन बहिनें हैं, मेरी माँ के पास ६ बीघा जमीन थी। मेरी माँ ने मुझे सबसे पहिले 2 बीघा खेत का बैनामा किया, उसके बाद अन्य दो को। मुझे जो जमीन मिली वह माँ के नाम थी और अन्य दो को मिली वह मेरे पिता की मरने के बाद माँ के नाम हो गयी थी।  मेरी माँ ने मेरी ऊपर दीवनी वाद कर दिया कि बैनामा फर्जी तरीके से किया गया है। मेरी माँ को दिखाई नहीं देता है। मेरी दोनों बहिने माँ को गुमराह करके बैनामा निरस्त करवाना चाहती हैं। क्या बैनामा निरस्त हो सकता है? मेरे बैनामा में मेरी बहिन गवाह भी है, दूसरा गवाह भी माँ की तरफ है।  क्या मैं भी पिता की जमीन में हिस्सा मांग सकती हूँ बैनामा को ३ साल हो चुके हैं।  मैंने लव मैरिज की है, क्या लव मैरिज करने के कारण क्या किसी अपने हक़ से बहिष्कृत क्या जा सकता है मेरे दो बच्चै हैं।

समाधान-

दि बैनामा पंजीकृत है तो उसे निरस्त किया जाना आसान नहीं है वह भी तब जब कि बैनामे को पंजीकृत हुए तीन वर्ष हो चुके हों।

यदि माँ को दिखाई नहीं देता है तो रजिस्ट्री कराते समय रजिस्ट्रार कार्यालय ने सारी पूछताछ के बाद ही उसे रजिस्टर किया होगा तो उस का निरस्त होना और भी दुष्कर है। पर कोई दीवानी वाद हुआ है तो अच्छा वकील करें। कभी कभी वकीलों की गलती से भी जीता हुआ मुकदमा मुवक्किल हार बैठता है।

पिता की जमीन कृषि भूमि होगी तो उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के उत्तराधिकार का कानून भिन्न है। इस संबंध में अपने दस्तावेज दिखा कर किसी स्थानीय वकील से सलाह करें तो बेहतर होगा।

लव मैरिज या परिवार को छोड़ कर अपनी मर्जी से विवाह करने से परिवार बहिष्कार कर सकता है लेकिन उसे उस के हकों से बेदखल नहीं कर सकता।

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पिता की संपत्ति में सन्तान का हिस्सा …

January 11, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

रश्मि ने भोपाल मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी को अपने पिता जी से संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी अब पिताजी उस की वसीयत सिर्फ मेरे भाई के नाम करना चाहते हैं। हम तीन बहनें हैं क्या इस संपत्ति में हम बहनों का भी अधिकार है।

 

 

समाधान-

दि आप के पिताजी को प्राप्त यह संपत्ति उन के पिताजी या दादा जी को उन के किसी पूर्वज से उत्तराधिकार में 17 जून 1956 के पूर्व प्राप्त हुई थी और तब से लगातार उत्तराधिकार में ही प्राप्त होती रही है तो वह संपत्ति सहदायिक हो सकती है और उस में आप का हिस्सा हो सकता है।

लेकिन 17 जून 1956 के बाद कोई भी व्यक्तिगत संपत्ति उत्तराधिकार के आधार पर सहदायिक नहीं हो सकती। यदि ऐसा है तो आप के पिता जी को उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति उन की व्यक्तिगत हो सकती है, उस में उन के जीवनकाल में किसी का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होगा और उसे वे जिसे चाहें वसीयत कर सकते हैं। वैसी स्थिति में आप बहनों या भाई को कोई अधिकार उक्त संपत्ति में प्राप्त नहीं होगा। जिसे भी प्राप्त होगा वसीयत के कारण प्राप्त होगा।

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स्त्री के उत्तराधिकार में पति का हिस्सा

January 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अभिलाषा प्रसाद ने मुरी, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ ने अपनी शादी में मिले गहनों को बेच कर जमीन खरीदी अपने नाम से और उस पर घर भी बनाया। लेकिन कुछ दिनों बाद बीमारी से उनकी मृत्यु हो गई है। इस के बाद मेरे पिता ने दूसरी शादी कर ली है। अब वह मेरे माता की सम्पत्ति मांग रहा है क्या मेरे पिता या सौतेले भाई को इस सम्पत्ति में हिस्सा मिलेगा। मेरी माता के हम चार सन्तान हैं तीन बेटी और एक बेटा। एक सौतेला बेटा है। कैसे हिस्से होंगे?

समाधान-

किसी भी स्त्री की संपत्ति उस की संपत्ति होती है। उस में किसी का अधिकार नहीं होता। यदि वह स्त्री कोई वसीयत नहीं करती है तो उस संपत्ति उत्तराधिकार के नियमों से उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाती है।

आप की माता की संपत्ति उन की स्वयं की स्वअर्जित है। उन्हों ने कोई वसीयत नहीं की थी। इस कारण वह संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी।

आप की माता जी के उत्तराधिकारियों में आप के पिता, आप स्वयं और आप की तीन बहनें, कुल पाँच उत्तराधिकारी हैं। सौतेला पुत्र आप की माँ का उत्तराधिकारी नहीं है। इस तरह माँ की संपत्ति के पाँच समान हिस्से होंगे और उन में से एक हिस्सा अर्थात कुल संपत्ति का पाँचवा हिस्सा ही आप के पिता प्राप्त करने अधिकारी हैं। एक एक हिस्सा आप चारों भाई बहन प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

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गोद गया भाई परिवार का सदस्य नहीं है।

January 5, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

डाडम चन्द रैदास ने पनमोदी, प्रतापगढ़, राजस्थान समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी पशुपालन विभाग में कार्यरत थे, जिनका सेवाकाल के दौरान ही निधन हो गया। हम तीन भाई हैं, मेरा छोटा भाई जो मेरे चाचा जी के सन्तान नहीं होने से उनके दत्तक पुत्र के रूप में उनके पास ही रह रहा है। जो कि पशुपालन विभाग में ही डॉ. के पद पर कार्यरत है वह हमारे साथ नहीं रहता है।  मेरे पिताजी के देहान्त के दौरान मैंने अनुकम्पा नियुक्ति के लिए आवेदन किया है। लेकिन मुझे यह कह कर मना कर दिया कि आपका भाई पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत हैं। क्या मुझे यह अनुकम्पा नियुक्ति मिल सकती है।

समाधान-

दि परिवार का कोई सदस्य पहले से सरकारी या अर्धसरकारी सेवा में हो तो अनुकम्पा नियुक्ति नहीं दी जा सकती। ऐसा करना नियम विरुद्ध होगा। आप ने कहा है कि आप का भाई चाचा के यहाँ गोद चला गया था। यदि वह गोद चला गया था तो उसे आप के परिवार का सदस्य नहीं माना जा सकता है।

लेकिन उस के गोद जाने के सबूत के रूप में पंजीकृत व वैध गोदनामा होना चाहिए। मुझे लगता है कि आप ऐसा कोई सबूत प्रस्तुत नहीं कर पाए जिस से आप के भाई को गोद चले जाना सिद्ध हो सकता।

यदि आप के पिताजी के देहान्त के पूर्व कोई गोदनामा रजिस्टर हुआ हो तो आप अब उच्च न्यायालय में रिट याचिका कर सकते हैं और गोदनामा के आधार पर भाई को चाचा के परिवार का सदस्य सिद्ध करते हुए अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं।

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समस्या-

नीरज ने इन्दौर मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे चाचा की पुश्तैनी जमीन है, उनके कोई संतान नहीं थी और उनका देहांत हो गया। उन्होंने अपनी जमीन मेरे नाम से ‍रजिस्ट्री कर दी थी अर्थात रजिस्ट्री में बेचे जाने का उल्लेख किया गया है।‍ मतलब उसको मेरे द्वारा खरीदा गया है जिसे चार साल हो गये हैं।  उस जमीन पर मेरे दूसरे चाचा के लडके ने दावा कर दिया है तो क्या वह जमीन मेरे दूसरे चाचा के लडके भी ले सकते है।

समाधान-

प के चाचा की जमीन पुश्तैनी थी और दूसरे चाचा के लड़के ने उस में हिस्से का दावा किया है। जब कि आप के चाचा अपनी जमीन को अपने जीवन काल में ही आप को विक्रय कर चुके थे।

किसी भी व्यक्ति को पुश्तैनी जमीन में अपने हिस्से को भी बेच देने का अधिकार होता है। चाहे उस जमीन का बँटवारा हो कर वह उस के अलग खाते में आई हो या नहीं आई हो। वह अपने हिस्से की जमीन को बेच कर उस के अधिकार से वंचित हो सकता है। यदि जमीन का बँटवारा हो कर खाता न खुला हो तो अलग खाता खोले जाने के लिए खरीददार बँटवारे का दावा कर सकता है और बँटवारा करवा कर अपना हिस्सा अलग करवा सकता है।

आप के मामले में ऐसा लगता है कि पुश्तैनी जमीन का बंटवारा हो कर वह आप के चाचा के अलग खाते में आ गयी थी। उसे बेचने का उन्हें अधिकार था। उन्हों ने अपने जीवनकाल में ही वह जमीन आप को बेच दी थी। इस प्रकार आप उनके जीवनकाल में ही उक्त जमीन के स्वामी हो चुके थे। आप के दूसरे चाचा के लड़के का दावा सही नहीं है। इस वाद में आप को अच्छा वकील कर के मुस्तैदी से मुकदमा लड़ना चाहिए। आप से उस जमीन को कोई नहीं ले सकेगा।

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समस्या-

हितेश गोयल ने भोपाल, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी का देहांत 2002 में हो गया है तथा मेरे दादा जी का देहांत वर्ष 2014 में हो गया मेरे दादा जी ने वर्ष 2013 में अपनी रजिस्टर्ड वसीयत की थी जिसमे उन्होंने इस बात का उल्लेख किया की उनकी चारो पुत्रियों के विवाह उन्होंने सम्पन्न करा दिया है तथा उनके कर्तव्यों का निर्वहन हो चूका है तथा मेरे पिता जी के अलावा मेरे अन्य दो ताऊ जी को कुछ भी नहीं देना है तथा जो पक्का बना मकान है वो मेरे नाम हो तथा एक जमीन है जो मेरी माता जी के नाम हो! इस वसीयत में नामंतरण करवाने की लिए सभी वारिसों के हस्ताक्षर की बात कही जा रही है तथा मेरे दोनों ताऊजी को तथा एक बुआ को इस पर आपत्ति है! मैंने ऐसा सुना है की यदि इसे प्रोबेट करा लिया जाये तो यह संपत्ति बिना आपति के हस्तांतरित करवाई जा सकती है! कृपया उचित मार्गदर्शन प्रदान करे जिस से हम इस प्रकरण को जल्द से जल्द निपटा सके!

समाधान-

ब भी किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो उस की संपत्ति उस के उत्तराधिकारियों को समान रूप से प्राप्त होती है। लेकिन यदि मृतक ने वसीयत कर दी हो तब वसीयत के अनुसार प्राप्त होती है। नामांतरण की कार्यवाही में वसीयत के आधार पर नामांतरण का आवेदन आने पर यदि आपत्तियाँ प्राप्त होती हैं तो राजस्व विभाग को यह अधिकार नहीं है कि वह इन आपत्तियों का निस्तारण कर सके। वसीयत को प्रमाणित करने पर वसीयत उचित है या नहीं यह केवल दीवानी न्यायालय ही तय कर सकता है। इसी कारण से प्रोबेट कराना उचित है। आप को प्रोबेट की यह सलाह स्वयं नामान्तरण करने वाले अधिकारी ने ही दी होगी।

प्रोबेट में सभी उत्तराधिकारियों के साथ साथ एक सामान्य सूचना समाचार पत्र के माध्यम से भी प्रकाशित होगी। उस के उपरान्त आप वसीयत को उस के गवाहों और उप पंजीयक या उस के कार्यालय के कर्मचारी के बयानों के आधार पर प्रमाणित करवा सकते हैं। प्रोबेट हो जाने पर राजस्व विभाग वसीयत के आधार पर नामान्तरण दर्ज कर देगा।

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समस्या-

हेमन्त प्रताप सिंह ने कानपुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 2014 में हुई थी, मेरी ससुराल वाले धनी परिवार से हैं। मैं एक प्राइवेट फर्म में काम करता हूँ। हमारे विचार एक दूसरे से कभी नहीं मिले। मेरा ससुराल पक्ष मेरे ऊपर दबाव डालता है कि आप अपने भाई से अलग रहो। छह छह माह एक दूसरे से दूर रहते हैं और मुझे कोई कमी भी महसूस नहीं होती। मेरा उन के साथ इंटीमेट होने का मन भी नहीं करता। मेरे मन में डाइवोर्स का ख्याल आया कि क्यों न हम कानूनी तौर पर अलग हो जाएँ। लेकिन घर वाले डरते हैं कि वे धनी लोग हैं हमें दहेज एक्ट में फँसा देंगे। मेरा मार्गदर्शन करें।

समाधान-

मुझे नहीं लगता कि आप के बीच कोई बड़ी समस्या है। आप ने यह तो बताया कि ससुराल पक्ष आप पर दबाव डालता है कि आप भाई से अलग रहें। लेकिन आप ने यह नहीं बताया कि जब वे यह बात करते हैं तो क्या तर्क देते हैं कि भाई से अलग क्यों रहना चाहिए। वे कुछ तो कहते होंगे कि भाई के साथ रहने में फलाँ बुराई है और इस कारण से अलग होना चाहिए। हो सकता है उन की इस बात के पीछे कोई गंभीर वजह हो। आप को अपने ससुराल पक्ष से पूछना चाहिए कि इस का कारण क्या है। यदि कारण पता लग जाए और वह वाजिब हो तो आप को उस कारण को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि कारण ऐसा है कि उसे दूर करना संभव नहीं हो तो ससुराल पक्ष का सुझाव स्वीकार कर लेना चाहिए।

ऐसा तो अक्सर होता है कि पति पत्नी के बीच के विचारों में पर्याप्त अंतर हो। लेकिन उस के बाद भी वे साथ रहते हैं। यह सब आपसी समझदारी से होता है। आप दोनों भी इस तरह अपने बीच आपसी समझदारी विकसित कर सकते हैं।  जो कि समय के साथ हो जाती है। यदि छह माह दूर रहने पर भी आप को कोई कमी महसूस नहीं होती, पत्नी के साथ इंटीमेट होने का मन नहीं होता तो यह आप के अंदर किसी तरह की हार्मोनल गड़बड़ी के कारण भी हो सकता है और यह अन्य कोई यौन समस्या भी हो सकती है। आप को चाहिए कि इस संबंध में किसी अच्छे मनोचिकित्सक से मिलें वह आप की समझाइश कर के तथा कुछ दवाएँ आदि दे कर आप के अंदर की इस उदासीनता को समाप्त कर सकता है।

यदि इन सब के बाद भी आप समझते हैं कि आप दोनों को अलग होना ही अच्छा हल है तो इस संबंध में खुल कर अपनी पत्नी से बात करें। उसे सारी समस्या बताएँ। हो सकता है आप की पत्नी इस समस्या का कोई अच्छा हल सुझा सके। हो सकता है वह भी इस समस्या को समझ कर आप से अलग होने को तैयार हो जाए। यदि ऐसा होता है तो सहमति से तलाक की अर्जी न्यायालय में दाखिल की जा सकती है। आप को यह भी सोचना चाहिए कि तलाक अपने आप में अनेक नई समस्याएँ खड़ी करता है। आप सोचें कि क्या क्या समस्याएँ तलाक से उत्पन्न होंगी और उन से कैसे निपटा जाएगा। आप यह भी सोचें कि आप के तलाक देने से आप की पत्नी के जीवन में क्या समस्याएँ पैदा होंगी और उन का क्या हल निकल सकता है।

मेरे विचार में आप और आप की पत्नी के बीच कोई बड़ी समस्या नहीं है जिसे किसी तरीके से हल न किया जा सके। इस कारण आप को इस मामूली समस्या को हल करना चाहिए। विवाहित जीवन मे डाइवोर्स तो अंतिम हल होता है इस कारण आप को फिलहाल डाइवोर्स का विचार त्याग देना चाहिए।

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