Legal Remedies Archive

समस्या-

भावेश जैन ने उदयपुर, राजस्थान से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-


किसी डॉक्यूमेंट की फ़ोटो कॉपी को जो कि प्रमाणित नहीं है न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है क्या? द्वितीय पक्षकार इस पर किस प्रकार आपत्ति दर्ज करवा सकता है?


समाधान-

भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अन्तर्गत केवल मूल दस्तावेज ही साक्ष्य में ग्राह्य हैं। एक दस्तावेज की फोटो कापी प्रस्तुत की जा सकती है लेकिन उसे साक्ष्य में सीधे ग्रहण नहीं किया सकता उसे प्रदर्शित नहीं किया जा सकता।

कोई भी फोटो कापी हमेशा किसी मूल दस्तावेज की होती है। आप को न्यायालय को यह बताना होगा कि यह मूल दस्तावेज कहाँ निष्पादित हुआ था और वह किस के कब्जे में होना चाहिए। जिस के कब्जे में मूल दस्तावेज हो उस से उस दस्तावेज को न्यायालय के सामने लाना चाहिए। यदि मूल दस्तावेज यदि मुकदमे के किसी पक्षकार के कब्जे में होने की संभावना हो तो आप न्यायालय को यह आवेदन कर सकते हैं कि उस पक्षकार से कहा जाए कि वह न्यायालय के समक्ष शपथ पर यह प्रकट करे कि वह दस्तावेज उस के कब्जे में है या नहीं है। यह आवेदन सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 12 में प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि पक्षकार प्रकट करता है कि उस के कब्जे में दस्तावेज है तो न्यायालय आदेश 11 नियम 14 में उस पक्षकार को मूल दस्तावेज न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता है।

यदि ऐसा मूल दस्तावेज मुकदमे के पक्षकार से भिन्न किसी व्यक्ति के शक्ति और आधिपत्य में हो तो न्यायालय यह समझे कि दस्तावेज का मुकदमें के निर्णय के लिए उस के सामने लाया जाना आवश्यक है तो न्यायालय उस व्यक्ति को वह दस्तावेज ले कर न्यायालय में उपस्थित होने का समन भेज सकता है।

यदि किसी भी तरह ऐसा मूल दस्तावेज नहीं मिल रहा हो तो यह माना जाएगा कि वह नष्ट हो चुका है वैसी स्थिति में न्यायालय धारा 65 साक्ष्य अधिनियम के अन्तर्गत फोटो प्रति को एक द्वितीयक साक्ष्य के रूप में साक्ष्य में ग्रहण करने की अनुमति दे सकता है।

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समस्या-

रमेश कुमार ने श्री विजय नगर, राजस्थान से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-


मेरे पड़ोस में 4-5 घर है जिनका व्यवसाय बकरी पालन व मीट की दुकानें है, समस्या यह है कि ये बकरियों को घर और घर के बाहर गली के बीच में खुले में बांधते हैं। पूरा रास्ता रोक देते हैं। गली में कोई साधन बड़ी मश्किल से निकल पाता है। कई बार ये बकरियाँ लोगो के घरों में चली जाती है नुकसान पहुँचाती हैं। गली में सड़क पर इन के कारण गंदगी बनी रहती है। मैं नगरपालिका इलाके में रहता हूंँ ।क्या इस समस्या के बारे में कोई कानून  है।  कृपया इस समस्या का समाधान बताये।


समाधान-

मारे यहाँ गरीबी और बेरोजगारी बहुत है। वैसी स्थिति में लोग अपने सीमित साधन के आधार पर स्वरोजगार का सृजन करते हैं। एक छोटी दुकान किराए पर ले कर उस में व्यवसाय आरंभ करते हैं और सड़क की 10 फुट जमीन पर अपना व्यवसाय फैला देते हैं। सारे बाजार इसी कारण संकरे हो चुके हैं। सड़क के किनारे किसी भी वस्तु को बेचने के लिए फैला देते हैं फिर धीरे धीरे उस का विस्तार करते जाते हैं। सड़कें वाहनों के लिए छोटी हो जाती हैं। गर्मी के दिनों में सड़क किनारे गन्ने के रस के ठेले खड़े होते हैं और सड़क पर उन की कुर्सियाँ, मूढ़े सज जाते हैं। सड़क वहाँ भी अवरुद्ध हो जाती है। इन लोगों को रोजगार का स्थान देने की कोई योजना न तो नगरपालिका और पंचायतों के पास है और न ही सरकारों के पास है। सब अपना अपना समय काटते हैं। सरकारों में बैठे राजनितिज्ञों को चुनाव के पहले कुछ सुध आती है तो वे वादे करते हैं और फिर सरकार में पहुँच कर मनमर्जी का करते हैं। किसी केन्द्र सरकार से ले कर ग्राम पंचायत तक किसी संस्था पर जनता का वास्तविक नियंत्रण नहीं है। इस कारण ये समस्याएँ  फैलती जा रही हैं। एक दिन वे इतनी फैलती जाएंगी कि गृहयुद्ध का रूप ले सकती हैं।

जहाँ तक आप की समस्या का विवरण है उस से पता लगता है कि आप के कुछ पड़ौसी जो कि बकरी पालन और मीट के धंधे से अपना गुजारा करते हैं उन की इन व्यवसायिक गतिविधियों से गली में न्यूसेंस (कंटक) उत्पन्न हो रहा है। दंड प्रक्रिया संहिता ( क्रिमिनल प्रोसीजर कोड या सीआरपीसी) की धारा 133 में सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट को यह शक्ति दी हुई है कि यदि कहीं न्यूसेंस की शिकायत उसे प्राप्त होती है तो वह सभी पक्षों की सुनवाई कर के न्यूसेंस हटाने का आदेश दे सकता है। आप के मामले में भी आप एसडीएम के न्यायालय में न्यूसेंस फैलाने वाले पड़ौसियों के विरुद्ध धारा 133 में आवेदन प्रस्तुत कर कार्यवाही आरंभ कर सकते हैं। एसडीएम न्यूसेंस हटाने का आदेश दे सकता है। इस आदेश से आप के पड़ौसियों को परेशानी होती है तो वे अपने रोजगार के लिए कोई स्थान विशेष नगर पालिका से आवंटित करने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

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हिस्से के लिए विभाजन का वाद करें।

February 23, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

हेमन्त मिश्रा ने अजमेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं जिस मकान में रहता हूँ वो मेरे दादाजी के नाम है। उनकी कोई वसीयत नहीं है, रजिस्ट्री की कॉपी मेरे पास है। ओरिजनल रजिस्ट्री मेरी दादी और बुआ ने गायब कर दी है। मेरे दादाजी का देहांत 1992 में हो गया था। मेरे पिताजी का देहांत भी 2015 में हो गया है। अब घर में मैं, दादी, मम्मी, एक क्वांरी बहिन, मेरी पत्नी और मेरा बच्चा रहता है। हम यहाँ लगभग 30 साल से रह रहे हैं। अब दादी कहती है कि मैं अपनी लड़कियों को हिस्सा या इस मकान को बेच कर पैसे दूंगी। तुम सब जाओ यहाँ से ये मेरे पति का घर है। जबकि मेरे पिताजी ने अपनी बहनों (5) में से (3) की शादी की। अपने जीवित समय तक सारी रस्में निभाई। पर अब दादी अपनी उम्र का फायदा उठा कर मुझे और बाकी सब को परेशान करती रहती है। उन्होंने मेरी छोटी बुआ के साथ मिलकर मेरे खिलाफ झूठी पुलिस कंप्लेन भी की थी। इसके कारण मैं बहुत परेशान रहता हूँ। मैंने घर का हिस्सा करने की बात भी कह दी उनसे पर न तो दादी हिस्सा कर रही है न कोई वसीयत और न ही घर में कुछ मरम्मत करवाती है। घर भी जर्जर हो रहा है। मैं इसमें पैसे लगाने से डरता हूँ क्यूंकि कब दादी और बुआ मिलकर क्या कर दे कुछ पता नहीं। कुछ समाधान बताये।

समाधान-

दि मकान की रजिस्ट्री की मूल प्रति आप को नहीं मिल रही है तो उस की फोटो कॉपी में दर्ज विवरण के आधार पर रजिस्ट्री की प्रमाणित प्रतिलिपि सहायक कलेक्टर स्टाम्प के यहाँ से प्राप्त की जा सकती है।

मकान दादा जी के नाम था। इस कारण उन की मृत्यु के उपरान्त आप की दादी, आप के पिता और आप की 5 बुआओं के कुल सात हिस्से हुए। इस में से एक हिस्सा आप का है। आप के पिता ने अपनी बहनों का विवाह किया है तो वह उन का पारिवारिक दायित्व था। इस से बहनों का अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा कम नहीं हो जाता है।

आप की दादी आप के कहने पर भी हिस्से नहीं कर रही है तो आप न्यायालय में विभाजन का वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि आप की बुआओं में से कोई अपना हिस्सा नहीं लेना चाहती है तो उस से आप अपने नाम या अपनी माँ के नाम रिलीज डीड करवा सकते हैं। यदि आप विभाजन का वाद प्रस्तुत करने के पहले बुआओं से रिलीज डीड पंजिकृत करवा लेते हैं तो बेहतर होगा।

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समस्या-

बबीता सक्रे ने बैतूल मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ने बैतूल सिटी की चौकी गैंग पर पुलिस को मेरे पड़ौसी के विरुद्ध रिपोर्ट दी थी। लेकिन पुलिस ने पड़ौसी का पक्ष लिया। उस ने मुझे गालियाँ दीं, अश्लील शब्द कहे, घर के अन्दर घुस कर मेरा हाथ पकड़ा और बलात्कार करने की धमकी दी। उस की माँ ने रोड के बीच जा कर जाति से संबंधित गालियाँ दीं। पर पुलिस का कहना है कि गवाह ले कर आओ, वह लड़का भी वहीं था। जबकि मैं ने वीमेन  हेल्पलाइन पर शिकायत की था इस के बाद एसपी को शिकायत की। तब पुलिस ने 294,323, 506 का मुकदमा बनाया तो मैं ने एफआईआर पर हस्ताक्षर नहीं किए। दूसरे दिन फिर एसपी साहब के पास गयी तो 452 और लगा दी। पर छेड़छाड़ और जाति से संबंधित गाली गलौच का केस नहीं बनाया। इस के चार दिन बाद उस लड़के की बहन की रिपोर्ट पर मेरे पति के विरुद्ध झूठी रिपोर्ट लिख ली जब कि पति उस दिन शहर में ही नहीं थे। पुलिस ने धमकी दी कि राजीनामा नहीं करोगे तो मेरे पति पर 354 का मुकदमा बना देंगे। पुलिस घर आ कर हमें परेशान कर रही है। जिस की शिकायत 181 पर की। एसडीओपी जाँच कर रहे हैं पर पड़ौसी अभी भी हम को धमकी देता है और पुलिस गवाह सबूत लाने को कहती है।

समाधान-

प की समस्या से पता लगता है कि आप के पड़ौसी की मिली भगत पुलिस के साथ है। पुलिस आप की शिकायत पर आप से सबूत और गवाहों के लिए कह रही है। पुलिस का यह कथन सही है यदि अपराध का कोई सबूत और गवाह नहीं मिलते हैं तो पुलिस द्वारा की गयी कार्यवाही न्यायालय में जा कर समाप्त हो सकती है। इस कारण आप को कम से कम परिस्थितिजन्य सबूत तो देने होंगे।

आप के विपक्षी की मिथ्या शिकायत पर पुलिस आप के पति के विरुद्ध कार्यवाही कर रही है तो इस कारण कि आप के विपक्षी ने पुलिस को झूठे ही सही पर कुछ गवाह उपलब्ध कराए होंगे। पुलिस उन की गवाही के आधार पर आप के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती है। आप के पति अपना प्रतिवाद पुलिस के समक्ष पेश कर सकते हैं पुलिस द्वारा आप के पति के विरुद्ध न्यायालय में कोई आरोप दाखिल किया जाता है तो आप के पति वहाँ बचाव कर सकते हैं।

आपकी शिकायत पुलिस नहीं सुन रही है। एसपी को भी आप शिकायत कर चुकी हैं। यदि आप के पास परिस्थितिजन्य सबूत हैं तो आप सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं और वहाँ अपने गवाहों के बयान करवा कर तथा परिस्थिति जन्य साक्ष्य प्रस्तुत कर मुकदमा दर्ज करवा सकती हैं। इस के लिए बेहतर है कि आप अपराधिक मामले देखने वाले किसी स्थानीय वकील की मदद लें।

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समस्या-

वेद ने बादशाहपुर, हरयाणा से समस्या भेजी है कि-

मैं एक मध्यम परिवार से ताल्लुक रखता हूँ। मेरे दादा जी ने जो हमारा घर था ,उसको किसी के नाम नही किया, वो स्वर्ग सिधर गये। मेरे दादा जी के तीन लड़के हैं। मेरे पिता जी सब से छोटे हैं। मेरे पिताजी और ताउजी ने अपना अपना बटवारा कर लिया। मेरे पिता जी को जो हिस्सा मिला वो उन्होने सन् 1997 में बेच दिया।  दादा जी के नाम से जो हिस्सा मेरे पिता जी ने बेचा इस में उन्होने मेरे सिग्नेचर करा लिए और अलग जगह पर उस पैसे से ज़मीन लेकर मकान बनाया। जो मकान बनाया वो मेरे पिता जी के नाम पर है। मेरे पिता जी के हम चार बच्चे हैं . जिसमे हमारी दो बहनो की शादी सन् 1993 में और हम दोनों भाइयों की शादी सन् 1996 में हो गई। अभी हम सभी इसी नये मकान मे रहते हैं। हमारे घर मे लड़ाई होती रहती है। बात बात पर मेरे पिता जी और माँ हमें परेशान करते हैं। एक बार मेरे पिता जी ने लड़ाई के बाद जब कुछ लोगों के माध्यम से फ़ैसला किया। जिसमें उन्होने मुझे मकान में तीसरा हिस्सा दिया। जो कि एक लाइन वाली कॉपी के पेज पर लिखा है और रसीदी टिकट लगा कर मेरे पिता जी ने सिग्नेचर किए हैं।  साथ मे दो हमारे दोनो के रिलेटिव है उनके भी सिग्नेचर हैं। लेकिन वो पेपर मेरी अलमारी से गुम / चोरी हो गया। उसकी एक फोटो कॉपी मेरे पास है। अब मेरे पिता जी हमे इस घर से निकलना चाहते हैं। इसलिए हमारे साथ लड़ाई करते हैं कि ये यहाँ से घर छोड़ कर चला जाए। इस घर में बिजली का बिल मेरे नाम से आता है। मेरे पिता जी का एलेक्ट्रिसिटी बिल /मीटर अलग है। क्या मुझे इस मकान मे सिर छुपाने के लिए जगह मिल सकती है।

समाधान-

प के तथ्यों से लग रहा है कि मकान पुश्तैनी संपत्ति है जिसे न्यायालय में साबित किया जा सकता है, जिस का हिस्सा आप को पिताजी पहले ही दे चुके हैं। आप अपने पिताजी से कह सकते हैं कि आप ने मुझे इस मकान में अलग हिस्सा दे चुके हैं और सब को शान्ति से रहना चाहिए। आप को जो हिस्सा मिला है उसे बनाए रखने की कार्यवाही आप को करनी है।

यदि फिर भी बात नहीं बनती है तो आप मकान से निष्कासन पर रोक के लिए स्थाई निषेधाज्ञा का दीवानी वाद प्रस्तुत कर दीवानी न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस के लिए आप को अपने शहर के किसी अच्छे दीवानी वकील से सलाह कर के कार्यवाही करना चाहिए। पिताजी का लिखा जो कागज आप से खो गया है या चोरी हो गया है उस की फोटो प्रति न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है और उसे द्वितीयक साक्ष्य के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। उस पर गवाहों के रूप में जिन रिश्तेदारों के हस्ताक्षर हैं उन के बयान करवा कर उसे साबित किया जा सकता है।

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संपत्ति पर आप का कब्जा है तो आप को अदालत जाने की जरूरत नहीं।

January 17, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

महेश ने खंडवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे नानाजी का तीन कमरो का पुराना मकान था। अब उसे तोड़कर मेरी मौसी और माताजी के सहयोग से ये मकान नया बना लिया। मेरे तीनो मामाओ ने जब  मकान बन रहा था तब किसी ने आपत्ति नही ली। मैं उस वक्त पढ़ाई के लिये इंदौर गया था। अब हम उस मकान में चार साल से रह रहे हैं। मेरा बड़ा मामा कह रहा है कि तुम कब्जा करने आ गये हो, तुम्हारा क्या हे यहाँ से निकलो। हमारी मकान की रजिस्ट्री भी नहीं है अब हम क्या कानूनी कार्यवाही करें?

समाधान-

कान तो नाना जी का था जिसे गिराया गया था। फिर आप की माता जी और मौसी के सहयोग से बनाया गया। मामाओं का भी कुछ तो सहयोग रहा होगा। उस मकान में अब कौन कौन रहते हैं यह भी आपने नहीं बताया। जब तक पूरा विवरण न हो पूरा समाधान भी संभव नहीं है। नानाजी अब शायद नहीं हैं। यदि हैं तो मामाजी आप को उस मकान से नहीं निकाल सकते। यदि नहीं हैं तो उस मकान के जितने हिस्से का स्वामी हर मामा है उतने ही हिस्से के मालिक आप की माँ और मौसी हैं। इस कारण यदि उस मकान पर कब्जा है तो वे आप को उस मकान से नहीं निकाल सकते। जैसे बड़े मामान ने कहा है वैसे आप की माँ और मौसी कह सकती हैं कि तुम निकलो मकान हमने बनाया है। जिस के पास संपत्ति का कब्जा है उसे अदालत में जाने की जरूरत नहीं है। जिस के पास संपत्ति का कब्जा नहीं है उसे अदालत जाने दें।

यदि मामाजी कुछ गड़बड़ करें तो मौसी और माताजी अदालत में इस आशय का वाद संस्थित कर सकती हैं कि वे भी मकान में हिस्सेदार हैं और उन्हें मकान से न निकाला जाए। पह हमारी राय है कि अदालत में आप की माँ व मौसी न जाएँ। मामा को अदालत में जाने दें। मौसी व माताजी ने निर्माण में जो खर्च किया उस का हिसाब और सबूत हो तो संभाल कर रखें। मुकदमे में काम आएंगे।

हिस्सेदार अधिक से अधिक मकान के बंटवारे की मांग कर सकते हैं और बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं।

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समस्या-

राकेश कुमार ने अलवर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी ओर मेरे भाई की शादी फऱवरी 2015 में हुई। शादी के 1 साल तक सही रहा।  इसके बाद हम दोनों भाई की उनसे बनी नहीं वो बिना बात पे ही हम से लड़ाई करती थी।  फिर वो दोनों चली गई, हम लेने गए तो दोनो नहीं आई।  बड़ी बहन गर्भ से थी। हम ने धारा 9 का केस डाल दिया। चार माह बाद जब डिलीवरी होने का टाइम आया तो उन्होने कहा कि इनको ले जाओ।  हम दोनों को ले आए। डिलीवरी के दो माह बाद छोटी बहन, मेरी घरवाली कहती है कि मुझे नहीं रहना तलाक चाहिए। हम ने उसको कई बार रहने को बोला लेकिन वो अपने माँ बाप के पास चली गई और उसके बाद उसने मुझे नोटरी करवा कर रुपए 100 के स्टांप पर तलाक़ दे दिया और बड़ी बहन अभी रह रही है, क्या ये तलाक़ मान्य है।

समाधान-

प खुद हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर चुके हैं। इस का अर्थ है कि आप हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होते हैं। इस अधिनियम में कोई भी तलाक केवल तभी मान्य होता है जब कि न्यायालय से डिक्री पारित हो जाए।

आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है और उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पर आप को तलाकनामा लिख भेजा है। यह अपने आप में क्रूरता पूर्ण व्यवहार है। आप इसी स्टाम्प के आधार पर तथा अन्य आधारों पर परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को तुरन्त कर ही देनी चाहिए। न्यायालय से डिक्री पारित होने और निर्धारित अवधि में उस की कोई अपील दाखिल न होने पर यह तलाक अन्तिम हो सकता है।

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पंजीकृत बैनामा को रद्द कराना आसान नहीं होगा।

January 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

विजयलक्ष्मी ने झिंझक, कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम विजय लक्ष्मी है। हम तीन बहिनें हैं, मेरी माँ के पास ६ बीघा जमीन थी। मेरी माँ ने मुझे सबसे पहिले 2 बीघा खेत का बैनामा किया, उसके बाद अन्य दो को। मुझे जो जमीन मिली वह माँ के नाम थी और अन्य दो को मिली वह मेरे पिता की मरने के बाद माँ के नाम हो गयी थी।  मेरी माँ ने मेरी ऊपर दीवनी वाद कर दिया कि बैनामा फर्जी तरीके से किया गया है। मेरी माँ को दिखाई नहीं देता है। मेरी दोनों बहिने माँ को गुमराह करके बैनामा निरस्त करवाना चाहती हैं। क्या बैनामा निरस्त हो सकता है? मेरे बैनामा में मेरी बहिन गवाह भी है, दूसरा गवाह भी माँ की तरफ है।  क्या मैं भी पिता की जमीन में हिस्सा मांग सकती हूँ बैनामा को ३ साल हो चुके हैं।  मैंने लव मैरिज की है, क्या लव मैरिज करने के कारण क्या किसी अपने हक़ से बहिष्कृत क्या जा सकता है मेरे दो बच्चै हैं।

समाधान-

दि बैनामा पंजीकृत है तो उसे निरस्त किया जाना आसान नहीं है वह भी तब जब कि बैनामे को पंजीकृत हुए तीन वर्ष हो चुके हों।

यदि माँ को दिखाई नहीं देता है तो रजिस्ट्री कराते समय रजिस्ट्रार कार्यालय ने सारी पूछताछ के बाद ही उसे रजिस्टर किया होगा तो उस का निरस्त होना और भी दुष्कर है। पर कोई दीवानी वाद हुआ है तो अच्छा वकील करें। कभी कभी वकीलों की गलती से भी जीता हुआ मुकदमा मुवक्किल हार बैठता है।

पिता की जमीन कृषि भूमि होगी तो उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के उत्तराधिकार का कानून भिन्न है। इस संबंध में अपने दस्तावेज दिखा कर किसी स्थानीय वकील से सलाह करें तो बेहतर होगा।

लव मैरिज या परिवार को छोड़ कर अपनी मर्जी से विवाह करने से परिवार बहिष्कार कर सकता है लेकिन उसे उस के हकों से बेदखल नहीं कर सकता।

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पिता की संपत्ति में सन्तान का हिस्सा …

January 11, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

रश्मि ने भोपाल मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी को अपने पिता जी से संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी अब पिताजी उस की वसीयत सिर्फ मेरे भाई के नाम करना चाहते हैं। हम तीन बहनें हैं क्या इस संपत्ति में हम बहनों का भी अधिकार है।

 

 

समाधान-

दि आप के पिताजी को प्राप्त यह संपत्ति उन के पिताजी या दादा जी को उन के किसी पूर्वज से उत्तराधिकार में 17 जून 1956 के पूर्व प्राप्त हुई थी और तब से लगातार उत्तराधिकार में ही प्राप्त होती रही है तो वह संपत्ति सहदायिक हो सकती है और उस में आप का हिस्सा हो सकता है।

लेकिन 17 जून 1956 के बाद कोई भी व्यक्तिगत संपत्ति उत्तराधिकार के आधार पर सहदायिक नहीं हो सकती। यदि ऐसा है तो आप के पिता जी को उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति उन की व्यक्तिगत हो सकती है, उस में उन के जीवनकाल में किसी का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होगा और उसे वे जिसे चाहें वसीयत कर सकते हैं। वैसी स्थिति में आप बहनों या भाई को कोई अधिकार उक्त संपत्ति में प्राप्त नहीं होगा। जिसे भी प्राप्त होगा वसीयत के कारण प्राप्त होगा।

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स्त्री के उत्तराधिकार में पति का हिस्सा

January 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अभिलाषा प्रसाद ने मुरी, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ ने अपनी शादी में मिले गहनों को बेच कर जमीन खरीदी अपने नाम से और उस पर घर भी बनाया। लेकिन कुछ दिनों बाद बीमारी से उनकी मृत्यु हो गई है। इस के बाद मेरे पिता ने दूसरी शादी कर ली है। अब वह मेरे माता की सम्पत्ति मांग रहा है क्या मेरे पिता या सौतेले भाई को इस सम्पत्ति में हिस्सा मिलेगा। मेरी माता के हम चार सन्तान हैं तीन बेटी और एक बेटा। एक सौतेला बेटा है। कैसे हिस्से होंगे?

समाधान-

किसी भी स्त्री की संपत्ति उस की संपत्ति होती है। उस में किसी का अधिकार नहीं होता। यदि वह स्त्री कोई वसीयत नहीं करती है तो उस संपत्ति उत्तराधिकार के नियमों से उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाती है।

आप की माता की संपत्ति उन की स्वयं की स्वअर्जित है। उन्हों ने कोई वसीयत नहीं की थी। इस कारण वह संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त होगी।

आप की माता जी के उत्तराधिकारियों में आप के पिता, आप स्वयं और आप की तीन बहनें, कुल पाँच उत्तराधिकारी हैं। सौतेला पुत्र आप की माँ का उत्तराधिकारी नहीं है। इस तरह माँ की संपत्ति के पाँच समान हिस्से होंगे और उन में से एक हिस्सा अर्थात कुल संपत्ति का पाँचवा हिस्सा ही आप के पिता प्राप्त करने अधिकारी हैं। एक एक हिस्सा आप चारों भाई बहन प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

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