Legal Remedies Archive

समस्या-

पंकज पच्चीगर ने सूरत, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरे मामाजी जो अविवाहित थे, उनकी डेथ हो चुकी है, उनकी संपति के 6 हिस्सेदार हैं ,उन में से 1 हिस्सेदार को ज्यादा हिस्सा चाहिये। ये बहाना करके हिस्सा बांटने को मना कर रहा है क्यों कि कुल संपत्ति के १५% जो शेयर्स और बैंक डिपोजिट है उस में नोमिनी के तौर पर उसका नाम है। अब उस के मना करने के बाद हम कैसे अपना हिस्सा पाएँ?

समाधान-

मृतक की 15% संपत्ति में एक उत्तराधिकारी के नोमिनी होने के कारण संपत्ति में ज्यादा हिस्सा चाहना पूरी तरह अनुचित है। नोमिनी वस्तुतः मृतक की संपत्ति का ट्रस्टी मात्र होता है। वह संपत्ति को बैंक आदि से प्राप्त तो कर सकता है लेकिन संपत्ति पर स्वामित्व सभी उत्तराधिकारियों का बना रहता है। यह नॉमिनी का दायित्व है कि वह संपत्ति को प्राप्त कर उस के उत्तराधिकारियों को कानून के अनुसार प्रदान करे। पर बेईमानी आ जाने के कारण हो सकता है कि वह व्यक्ति चुपचाप इस जुगाड़ में लगा हो कि जितनी जल्दी हो उतना वह इस 15% संपत्ति पर कब्जा कर ले।

आप को चाहिए कि आप उक्त संपत्ति जिस में वह नौमिनी है उस का उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए जिला न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर दें उस के साथ ही मृतक की संपत्ति के विभाजन का वाद भी जिला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें और इस वाद में संपत्ति को खुर्द-बुर्द न करने की निषेधाज्ञा सभी उत्तराधिकारियों के विरुद्ध प्राप्त करें। इसी वाद में बंटवारा होने तक संपत्ति को किसी रिसीवर के आधिपत्य में रखे जाने व संपत्ति के लाभों को सुरक्षित रखे जाने के लिए भी आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।

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गवाह की समन और वारंट से तलबी

May 21, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

निधि जैन ने उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं किसी व्यक्ति की गवाही कोर्ट में करवाना चाहता हूँ। मुझे विश्वास है कि वह व्यक्ति मेरे पक्ष में बयान देगा, लेकिन पारिवारिक विवाद की वजह से मेरे कहने पर वह व्यक्ति मेरा गवाह नहीं बनेगा। मैं आप से यह जानना चाहता हूँ कि क्या किसी केस में कोर्ट से समन जा सकता है कि वह व्यक्ति गवाही अथवा अपने बयान देवे? अगर ऐसा कोई प्रावधान है तो इसके लिए क्या किया जा सकता है?

समाधान-

किसी भी व्यक्ति की गवाही अदालत में कराये जाने के लिए उस का नाम गवाह की सूची में होना चाहिए। यदि है तो आप अदालत से निवेदन कर सकते हैं कि उस गवाह को समन भेज कर अदालत में गवाही देने के लिए बुलाया जाए। अदालत उसे समन जारी कर के गवाही के लिए बुलाएगी। समन तामील हो जाने पर भी गवाह न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता है तो ऐसे गवाह को जमानती वारंट से और जमानती वारंट से भी अदालत में न आने पर गिरफ्तारी वारंट से उसे बुलाया जा सकता है। इस संबंध में दंड प्रक्रिया संहिता तथा दीवानी प्रक्रिया संहिता दोनों में उपबंध हैं।

यदि किसी वजह से गवाह सूची पेश न हो या सूची में गवाह का नाम न हो तो न्यायालय को आवेदन दे कर गवाह का नाम सूची में बढ़ाया जा सकता है।

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समस्या-

सत्नू राजपूत ने लखनऊ उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी सासू माँ के मकान में चार दुकानदारों ने दुकान किराए पर ले रखी है। मेरी सासू माँ वेवा महिला है। मेरे ससुर की मृत्यु हो चुकी है। घर पर कमाने वाला कोई नहीं है। उन के दो लड़कियाँ हैं एक की शादी मेरे साथ हो चुकी है एक अभी अविवाहित है। लड़के नहीं हैं। 1-पहले दुकानदार के बड़े भाई ने बिना लिखा के दुकान किराए पर ली थी और बिजली कनेक्शन अपने नाम पर लिया था बीमारी की वजह से दुकान उनका छोटा भाई कर रहा है। अब बड़े भाई की मृत्यु हो चुकी है। बड़े भाई के बच्चे भी साथ नहीं रहते हैं। वो अलग रहते हैं क्या छोटे भाई का अधिकार बनता है। दुकान खाली करने के लिए कहने पर दुकान खाली नहीं कर रहा है, किराया भी बहुत कम देता है। 2-दूसरा दुकानदार 14-15 साल पहले 11माह के एग्रीमेंट पर दुकान किराए पर ली थी। बिना अनुमति के दुकान के अंदर टाइल्स लगवा लिया है। मना करने पर दबँगई दिखाते हैं, किराया भी बहुत कम देता हैं, कहने पर दुकान खाली नही कर रहा है। 3-तीसरे दुकानदार के बड़े भाई ने बिना लिखा पढ़ी के दुकान किराए पर ली थी जो अब दुकान नहीं चलाता है उनका छोटा भाई दुकान चलाता है। खाली करने को कहो तो नहीं कर रहा है। दुकान मिल जाएगी तब खाली करूँगा लगभग 5-6 सालों से कहता चला आ रहा है। बिजली का कनेक्सन भी नही है. 4-चौथा दुकानदार 14-15 साल पहले पीसीओ चलाने के लिए 11 माह के एग्रीमेंट पर दुकान किराए पर ली थी. लगभग 7-8 सालो से पीसीओ की दुकान बंद है। 3-4 सालों से दुकान बंद है। अब दुकान के सामने एक सब्जी वाले को लगा रक्खा है जो बिजली बिल का भुगतान करता है वह सब्जी देता हैं किराया भी नहीं देता है।. अब मेरी सासू मा अपना स्वयं का बिजनेस करना चाहती है। जिसके लिए दुकानों की आवश्यकता है। दुकान खाली करने के उपाय बताएँ।

समाधान-

प की सासू माँ की चारों दुकानें उन का खुद का बिजनेस करने की जरूरत के आधार पर खाली हो सकती हैं। बिजनेस ऐसा हो जिस के लिए चारों दुकानों की जरूरत हो। चारों दुकाने तोड़ कर शो रूम बनाया जा सकता है।

आप वास्तव में सासू माँ की मदद करना चाहते हैं तो तुरन्त दीवानी मामले के किसी वकील से मिलें और चारों के विरुद्ध किराया बढ़ाने, बकाया किराया वसूली और दुकान खाली कराने के लिए मुकदमे दायर कर दे। कई लोग ये सोचते हैं कि अदालत में दुकान मकान को खाली कराने का मुकदमा करेंगे तो कई साल लगेंगे। कई साल तो इस कारण लगते हैं कि अदालतों की संख्या पर्याप्त नहीं है। लेकिन उपाय अन्य कोई नहीं है दुकान मकान खाली कराने का एक मात्र उपाय अदालत के जरीए खाली कराना ही है। आप मुकदमा करने में जितनी देरी करेंगे उतनी ही देरी से आप को राहत मिलेगी। इस कारण देरी न करें।

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समस्या-

रेणु भदोरिया ने अहमदाबाद गुजरात से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

म उत्तर प्रदेश के जसमई गाँव के निवासी थे पिछले 25 सालों से हम अहमदाबाद में निवास कर रहे हैं। हमारे गांव में हमारी पुश्तैनी ज़मीन है घर बनाने की उस में से कुछ ज़मीन पर हमारे परिवार के लोगों ने कब्जा कर लिया था, और हमारे घर के निकालने का रास्ता सिर्फ़ 2.5 फुट छोड़कर अपना निर्माण कर लिया और वो लोग कहते है हमने तुम्हारे ज़मीन पर कब्जा नहीं किया। हमारी घर की ज़मीन का बटवारा प्रधान द्वारा किया गया था, जो बाद में प्रतिपक्ष वालों ने मानने से इनकार कर दिया। इसके अलावा परिवार के दूसरे लोगों द्वारा भी हमारी ज़मीन निर्माण कर लिया गया है। अब मैं चाहती हूँ कि बिना लड़ाई झगड़े के हमें हमारी ज़मीन क़ानून के नियम के हिसाब से मिल जाए। मैं सरकारी बटवारा करना चाहती हूँ। उसके लिए हमें क्या करना पड़ेगा?

समाधान-

प का कहना सही है आप की संयुक्त संपत्ति का बँटवारा नहीं हुआ है। हमारे यहाँ ऐसे ही चलता रहता है। परिवार के कुछ लोग गाँव से बाहर चले जाते हैं। जो रह जाते हैं वे आपस में संपत्ति के अधिक से अधिक भाग पर कब्जा बनाए रखने की कोशिश करते हैं। जब बाहर जाने वाला बंधु वापस आता है तो वह फिर बंटवारे की बात करता है। लेकिन संपत्ति का बंटवारा बिना अदालत जाए नहीं हो पाता।

आप बंटवारा कराना चाहती हैं तो आप को जिला न्यायाधीश के न्यायालय में बंटवारे का वाद प्रस्तुत करना होगा। संयुक्त संपत्ति के सभी स्वामी उस वाद में पक्षकार बनेंगे। अदालत सभी पक्षों को सुन कर बंटवारा कर देगा। यह बंटवारा स्थाई होगा। इस के लिए आप जिला मुख्यालय के किसी दीवानी  मामलों के वकील से मिलें और उस की सहायता से संपत्ति के विभाजन तथा अपने हिस्से का अलग कब्जा दिलाए जाने का वाद संस्थित करें।

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बेनामी संपत्ति व्यवहार क्या है?

May 18, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जितेन्द्र ने  मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे बाबा ने अपनी दो ऐकड जमीन मेरे मामा के नाम बसीयत 1985 में करदी थी। यदि मामा वह जमीन मेरे नाम वसीयत करदे, तो यह जमीन बेनामी सम्पत्ति अधिनियम के अन्तर्तगत तो नहीं आएगी।


समाधान-

बेनामी संपत्ति व्यवहार वह संपत्ति व्यवहार है जिस में संपत्ति किसी के नाम पर खरीदी जाए और जिस का मूल्य किसी और ने चुकाया हो तथा वह संपत्ति जिसे कोई अपने नाम पर किसी अन्य के लाभ के लिए रखता है लेकिन उस संपत्ति का मूल्य चुकाया हो।  इस प्रकार वसीयत और दान आदि व्यवहार किसी तरह के बेनामी व्यवहार नहीं हैं।

आपके मामा को वसीयत में प्राप्त संपत्ति यदि मामा द्वारा आप को वसीयत की जाती है तो यह किसी भी प्रकार से बेनामी संपत्ति नहीं कही जाएगी।

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रजिस्टर्ड बंटवारानामा संपत्ति के स्वत्व का दस्तावेज है।

May 17, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जितेन्द्र ने उज्जैन, से मध्य प्रदेश -समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी की मुत्यु हो चुकी है। मेरे दादाजी की स्वंय अर्जित सम्पत्ति का एक मकान जो कि हॉउसिंग बोर्ड द्वारा लीज होल्ड है एवं नगर निगम सीमा में है जिसका सम्पत्ति कर वगैरह उस सम्पत्ति पर निवासरत् दादाजी के 3 पुत्रों द्वारा सम्मिलित रूप से जमा किया जाता है। दादीजी का भी देहान्त दिनांक हो गया है। दादाजी की कुल 7 संतानें (5 पुत्र एवं 2 पुत्रियां) हैं। दादाजी ने अपनी मृत्यु के पूर्व कोई भी वसियत भी नहीं की थी। इस सम्पत्ति पर वर्तमान में 3 पुत्रों के परिवार निवासरत है, अन्य में से 1 पुत्र लापता है, 1 पुत्र अन्यत्र निवासरत है, 1 पुत्री का देहान्त कुछ समय पूर्व हो चुका है एवं 1 पुत्री अन्यत्र निवासरत होकर अविवाहित है। इस सम्पत्ति का बंटवारा किस प्रकार किया जा सकता है? सभी संतानों का मालिकाना हक किस प्रकार इस सम्पत्ति पर हो सकता है? मालिकाना हक से संबंधित क्या दस्तावेज तैयार करवा सकते हैं? कृपया बतायें- 1. क्या इस सम्मत्ति की रजिस्ट्री होगी? 2. हॉउसिंग बोर्ड इस सम्पत्ति में क्या कार्यवाही कर सकता है ? 3. रजिस्टर्ड बंटवारा ओर रजिस्ट्री में क्या कोई अंतर है? क्या रजिस्टर्ड बंटवारा में रजिस्ट्री के सभी अधिकार प्राप्त होते है या नहीं?

समाधान-

ब आप रजिस्ट्री शब्द का उल्लेख करते हैं तो आम तौर पर उसका अर्थ पंजीकृत विक्रय पत्र से या पंजीकृत लीज डीड से होता है। लेकिन पंजीकरण का कानून यह है कि यदि 100 रुपए से अधिक कीमत की कोई अचल संपत्ति का हस्तांतरण हो तो उस की रजिस्ट्री होना जरूरी है। बंटवारा भी ऐसा ही एक विलेख है। पंजीकरण कानून कहता है कि बंटवारे के विलेख का पंजीकृत होना जरूरी है वर्ना वह विलेख जरूरत पड़ने पर किसी कार्यवाही में नहीं पढ़ा जाएगा।

संपत्ति के सभी साझेदारों के बीच आपसी सहमति से बंटवारा होता है तो उसे पंजीकृत कराना जरूरी है। यह पंजीकृत विलेख ही संपत्ति के स्वामित्व का विलेख होगा। हाउसिंग बोर्ड या नगर निगम में जहाँ संपत्ति का रिकार्ड रहता है वे अपने रिकार्ड में नामान्तरण करते हैं लेकिन नामान्तरण हो जाने से किसी को स्वत्वाधिकार प्राप्त नहीं होता है। नामान्तरण गलत होने पर न्यायालय के आदेश से उसे हटाया या दुरुस्त किया जा सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में सभी पुत्रों और पुत्रियों का समान हिस्सा है। यदि किसी का देहान्त हो गया है तो उस की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को जाएगी। किसी के मर जाने से या गायब हो जाने से उस का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता है।

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समस्या-

रवि ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-


मेरा भाई और उसकी पत्नी शादी के 3 महीने बाद से ही घर से अलग रह रहे हैं। उनका आपस मे कोई विवाद हुआ और फिर 498/ 406 125 498और 406 में अभी कोर्ट में नहीं लगा है, एफआर्ईआर  हुए 2 साल हो गए हैं।  गुजारा भत्ता का केस कोर्ट में है जिस में 2500 प्रति माह खर्च देना होगा और पिछले 32000 भी। भाई हिप जुआइन्ट की बीमारी के कारण कुछ काम नहीं कर पाता, उसका खर्च भी दोस्त मिल कर उठाते हैं।  गुज़ारा भत्ता न देने पर कोर्ट ने 30 दिन का समय दिया है, नहीं तो कुर्की की कार्यवाही की जाएगी। भाई के पास कोई सम्पत्ति नहीं है। वह किराये के मकान में रहता है।  क्या कुर्की में माता पिता या भाई की सम्पत्ति को भी जप्त किया जा सकता है क्या?


समाधान-

त्नी का भरण पोषण करने की जिम्मेदारी पति की है न कि पति के रिश्तेदारों की। यह जिम्मेदारी भी पति की वर्तमान आय और संपत्ति पर  निर्भर करती है। यदि इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने आदेश नहीं दिया है तो उस आदेश के विरुद्ध अपील या रिविजन करना चाहिए और वसूली पर स्थगन प्राप्त करना चाहिए। यह तभी संभव हो सकता है जब संपत्ति और वर्तमान आय तथा शारीरिक स्थिति के संबंध में दस्तावेजी सबूत अपील या रिविजन कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए जाएँ।

जहाँ तक वसूली के लिए संपत्ति को कुर्क करने का प्रश्न है तो केवल पति की या उस की साझेदारी वाली किसी संपत्ति को ही कुर्क किया जा सकता है, अन्य किसी संपत्ति को नहीं। यदि किसी गलत फहमी के अंतर्गत किसी अन्य संपत्ति को कुर्क किया भी जाए तो उस संपत्ति का स्वामी संबंधित न्यायालय में अपनी आपत्तियाँ प्रस्तुत कर सकता है।

 

 

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समस्या-

नीलम खन्ना ने मनीमाजरा, चंडीगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी को उनके पिताजी से साल 1911 में संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। मेरे पिताजी को दादा जी से उनकी संपत्ति साल 1971 में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। हम दो भाई बहन हैं। मेरे पिताजी ने सारी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के बेटे के नाम कर दी, मेरे पिताजी के देहांत के बाद सारी संपत्ति मेरे भतीजे के नाम हो गई। मैंने जुलाई 2016 में अपने हिस्से के लिए केस दायर किया, मैंने संपत्ति को बेचने से रोकने के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन किया, लेकिन उस समय मेरे पास संपत्ति का पिछला रिकॉर्ड ना होने के कारण अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन रद्द हो गया। मैंने अब पिछला सारा रिकॉर्ड निकलवा लिया है क्या मैं अब दोबारा अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन कर सकती हूँ? क्या मुझे अपना हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

प के द्वारा दिए गए विवरण से यह स्पष्ट है कि उक्त संपत्ति सहदायिक है। आप ने विवरण में यह नहीं बताया है कि आप के पिताजी की मृत्यु कब हुई है। यदि आप के पिता जी की मृत्यु. 2005 के बाद हुई है तब आप को 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में हुए संशोधन से इस सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त हो चुका था। उस वक्त आप के पिता केवल अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे न कि पूरी संपत्ति की। इस प्रकार आप का हिस्से का दावा सही है आप को हिस्सा मिलना चाहिए।

दावा तो पहले भी हिस्से का ही हुआ होगा। अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन तो उसी दावे में प्रस्तुत किया गया होगा। यदि वह दावा अभी चल रहा है तो उसी दावे में अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र पुनः प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि दावा भी आप ने खारिज करवा लिया है या अदम हाजरी अदम पैरवी में खारिज हो चुका है तो उस का रिकार्ड देख कर तय करना पड़ेगा कि उसे दुबारा किस प्रकार किया जा सकता है। बेहतर है आप वहीं दीवानी मामलों के किकसी अच्छे वकील से सलाह कर आगे कार्यवाही करें।

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समस्या-

प्रशान्त ने ग्राम नूरपुर, गाजियाबाद, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे दादाजी चार भाई थे जिस में एक निस्सन्तान थे। मेरे दादा जी से पहले उन के दो भाइयों की मृत्यु हो गयी। उन के हिस्से कि संपत्ति उन के उत्तराधिकारियों को मिल गयी। 2004 में निस्सन्तान दादाजी की संपत्ति मेरे दादाजी को मिल गयी।  अब 2012 में मेरे दादाजी की भी मृत्यु हो गयी। उन की संपत्ति हमारे नाम आ गयी। अब मेरे दादा जी के भाई का लड़का बोलता है कि मेरा भी हिस्सा था इस में, तो क्या 29.06.2004 को  भाई का हक भतीजे को भी मिलता था?

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में कोई व्यक्ति निस्सन्तान मर जाए और उस की पत्नी और पिता भी जीवित न हों तो फिर उस की सम्पत्ति जीवित भाई को ही प्राप्त होगी।  इस तरह आप के दादा जी के भाई की मृत्यु पर आप के दादा जी को प्राप्त हुई वह सही थी। उस में मृत भाई के पुत्र का का कोई हिस्सा नहीं था।

लेकिन यदि दादाजी के निस्संतान भाई की संपत्ति में उत्तरप्रदेश में स्थित कोई कृषि भूमि है तो उस भूमि का उत्तराधिकार उ.प्र. जमींदारी विनाश अधिनियम से तय होगा और उस स्थिति में पूर्व मृत भाई के पुत्र को भी हि्स्सा पाने का अधिकार है। यह विधि 29.06.2004 को भी प्रचलित थी।

 

 

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हकत्याग विलेख को पंजीकृत कराए बिना हकत्याग संभव नहीं है।

May 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

छैल कँवर ने मेवानगर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं  मेरे पिता और माता की एकमात्र सन्तान हूँ। मेरे पिता का देहांत मेरे जन्म से पहले ही हो गया था। जिससे समस्त जमीन मेरे माताजी के नाम हो गई। मेरी माताजी का देहांत 1883 में हो गया उस समय में ससुराल में थी। मेरे कोई भाई या बहन नहीं है, जिसके कारण जमीन का नामानतरण मेरे नाम होना था। लेकिन मेरे दादाजी के भाई के बेटे ने जो उस समय सरपंच थे वे मेरे ससुराल आये और मुझे ये कहा कि आप मेरे साथ चलो आपकी जमीन आपके नाम करवा रहे हैं। वो मुझे एक वकील के पास लेकर गए और एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया। मुझे अब पता चला हे की उन्होंने उस स्टाम्प के आधार पर मेरी समस्त जमीन अपने बेटे के नाम हकतर्क करवा ली जो उस समय मात्र 14 साल का था। जब मैंने रिकॉर्ड निकलवाया तो उसके फोतगी में पटवारी ने लिखा था की “असन कँवर (माताजी) के फौत होने पर उनकी बेटी छेल कँवर (स्वयं) इकरार नामा 7 रूपये के स्टाम्प पर मनोहरसिंह (जिसके नाम हकतर्क किया गया उम्र 14 साल) के हक में ओथ कमिश्नर द्वारा 28.1.1983 को तस्दीक दस्तावेज पर नामान्तरण खोला गया।” श्रीमान में निम्न सवालों के जवाब जानना चाह रही हूँ- 1. क्या 1983 मैं ओथ कमिश्नर द्वारा जारी स्टाम्प के आधार पर नामन्तरण खोला जा सकता था? 2. क्या मेरे दादाजी के भाई के बेटे के बेटे के नाम हक तर्क हो सकता था जो उस समय 14 साल का था?  न ही वो मेरे पिताजी द्वारा गोद लिया पुत्र है। 3.श्रीमान मैं एक निरक्षर महिला हूँ। मुझे धोखे से एक बार वकील के आगे एक स्टाम्प पर अंगूठा लगवाया था इसके अलावा मैंने न तो किसी पटवारी, तहसीलदार, या रजिस्ट्रार के आगे कोई अंगूठा लगाया हे। 4. मेरी माताजी का देहांत मेरे ननिहाल में 1983 में हुआ था, में अब उनका मृत्यू प्रमाण पत्र बनवाना चाहती हूँ लेकिन मेरे पास उनकी मृत्यु या उनसे सम्बंधित कोई दस्तावेज नहीं है? उचित सलाह प्रदान करें।

समाधान-

नामान्तरण से कभी भी किसी संपत्ति का टाइटल निर्धारित नहीं होता। चूंकि आप को अब पता लगा है कि नामान्तरण आप के नाम होने के स्थान पर आप के दादा जी भाई के पुत्र ने अपने पुत्र के नाम नामान्तरण खुलवा लिया है। इस कारण अब आप तुरन्त नामान्तरण के आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर उस आदेश के विरुद्ध अपील कर सकती हैं।

हकत्याग एक प्रकार का अचल संपत्ति का हस्तान्तरण है इस कारण उस का उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत होना अनिवार्य है। इस तरह नोटेरी के यहाँ तस्दीक किए गए हकत्याग के विधि विपरीत विलेख के आधार पर नामान्तरण खोला जाना पूरी तरह गलत है।

आप को चाहिए कि राजस्व (खेती-बाड़ी) की जमीनों का काम देखने वाले किसी अच्छे वकील को अपने सारे दस्तावेज दिखाएँ और नामान्तरण की अपील प्रस्तुत करें। आप टाइटल के आधार पर भी राजस्व रिकार्ड में संशोधन और जमीन का कब्जा दिलाए जाने के लिए दावा प्रस्तुत कर सकती हैं। लेकिन जो भी करें अपने वकील को समस्त दस्तावेज दिखा कर उन की राय के अनुसार काम करें।

हक त्याग सिर्फ और सिर्फ किसी भी संपत्ति के सहस्वामी के हक में किया जा सकता है। उक्त भूमि की आप एक मात्र स्वामी थीं। इस कारण से किसी भी व्यक्ति के नाम आप के दादा जी के भाई के पोते के नाम  भी हकत्याग होना संभव नहीं था। इस कारण भी वह हक त्याग वैध नहीं है।

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