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समस्या-

मेरे पिताजी दो भाई थे, जिनके पास एक पुश्तैनी जमीन 14×70 स्क्वायर फुट की थी जिसके खसरे में मेरे दादा का  नाम दर्ज है। दोनों भाइयों ने आपसी रजामंदी से 40 वर्ष पूर्व जमीन का बंटवारा आधा-आधा कर लिया किन्तु कोई विलेख नही लिखवाया। मेरे पिताजी ने अपने हिस्से के 14×35 के प्लाट पर स्वयं के खर्च से 40 वर्ष पूर्व मकान बनवा लिया था तथा जिसका किसी ने विरोध नही किया था, जिसका गृहकर 38 वर्षो से पिताजी के नाम से ही जमा होता है, पिताजी जी की मृत्यु के बाद मेरे नाम से गृहकर जमा होता है और मकान पर मेरा ही कब्जा है। मेरे चाचा जिनके हिस्से में 14×35 का प्लाट था उन्होंने अपने हिस्से के प्लाट में अभी तक कोई निर्माण नही करवाया  और उनकी मृत्यु भी हो चुकी है। अब विवाद का विषय ये है कि चाचा का पुत्र 40 वर्ष पूर्व हुए आपसी बंटवारे को नही मान रहा, उसका कहना है कि चूंकि 14×70 के पूरे प्लाट का खसरा उसके दादा के (पिता के पिता) नाम पर है और बंटवारे का कोई विलेख नही इसलिए घर का और खाली जमीन का बंटवारा करो और अपने घर मे से हमको भी हिस्सा दो। छोटे दादा के पुत्र द्वारा झूठे केस में फसाने की साजिश की जा रही और मारने की धमकी दी जा रही। क्या कानूनी तौर पर वह मेरे दादा जी का मकान हड़प सकता है? सर हमारे पास घर के 38 वर्षों का गृहकर की रसीद (जो पिताजी के नाम से है), घर का 12 वर्षों का बिजली का बिल (मेरे स्वयं के नाम से),16 वर्षो का जलकर की रसीद (पिताजी के नाम पर), पिताजी का राशन कार्ड, माताजी का राशन कार्ड और मेरे दादाजी के नाम वाला नगर पंचायत आफिस से जारी 14×35 स्क्वायर फुट के प्लाट (जिसमे पिताजी के द्वारा बनवाया मकान है) का खसरा है। क्या कानूनी तौर पर चाचा का पुत्र मेरे मकान पर कब्जा पा सकता है?

-मोनू अहमद,  नगर पंचायत रुद्रपुर, जिला-देवरिया, (उ. प्र.)

समाधान-

दि 40 वर्ष पूर्व बंटवारा हो चुका था तो उस के गवाह अवश्य होंगे। आवश्यकता पड़ने पर साक्षियों  के बयान करवा कर बंटवारे को साबित किया जा सकता है। इस संबंध में आप Karpagathachi And Ors vs Nagarathinathachi 1965 AIR 1752 के प्रकरण को देखें। आप के पास पिताजी के नाम से 38 वर्ष से गृहकर की रसीद है। घर बनाने के बाद ही तो गृहकर आरंभ हुआ है यह एक सहायक सबूत है जो कहता है कि मकान बने हुए हिस्से पर आपका इतने लंबे समय से कब्जा है। 16 वर्षों का जलकर र 12 वर्ष से बिजली के बिल भी सहायक सबूत हैं। आप अच्छे से बंटवारा और मकान का निर्माण साबित कर सकते हैं। प्रतिकूल कब्जे (एडवर्स पजेशन) के तर्क का भी सहारा लिया जा सकता है। इस तरह कानूनी रूप से आपके मकान को हड़प करना इतना आसान नहीं है।

आप अपने चचेरे भाई को कह दीजिए कि वह दुबारा से बंटवारा चाहता है तो बंटवारे का दावा कर दे। फैसला अदालत में हो। आप यदि मुकदमे को मुस्तैदी से लड़ेंगे तो आप की संपत्ति आपके पास ही रहेगी।

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समस्या-

मेरे साथ गाँव मे कुछ विवाद हो गया था और मैंने पुलिस को शिकायत की मुझे सिपाही  फर्जी केस में फँसा देने की धमकी दे रहा है  और मुझे जाति सूचक गाली देता है कहता है कि दुबारा गाँव में दिखाई मत देना। आये दिन परेशान करता रहता है। क्या ऐसा कोई उपाय है जिससे उस पर कार्यवाही कर सकूँ? मैं अपने पिता व भाइयों व बहनों से सभी कानूनी, गैर कानूनी व सामाजिक सम्बन्ध समाप्त करना चाहता हूँ। मेरे द्वारा किये गये समस्त कृत्यों के लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूँ। मेरे परिवार के किसी सदस्य का इससे कोई लेना देना नहीं है और न कोई जिम्मेदार है। कृपया बताएँ कि मैं परिवार के समस्त लोगो से सम्बन्ध विच्छेद कैसे कर सकता हूँ?

-अवनीश कुमार, हरपालपुर, जनपद हरदोई, उत्तर प्रदेश

समाधान-

सा प्रतीत होता है कि आप के साथ कोई घटना हुई है जिस से आप बहुत डर गए हैं। हालांकि आप ने घटना का विवरण नहीं दिया है। खैर जो भी हुआ हो। सब से पहले तो आप अपने मन से हर तरह के डर को निकाल बाहर करें। क्यों कि डरना किसी समस्या का हल नहीं हो सकता। उस से समस्या बढ़ेगी, कम नहीं होगी।

आप यह चाहते हैं कि अपने परिवार वालों से संबंध विच्छेद कर दें और जो आपदा आप पर आने वाली है उस का प्रभाव परिवार पर न पड़े। तो ऐसा आप सोचते हैं, लेकिन यह संभव नहीं है। आप के परिवार के लोग जो आप को बहुत प्यार करते हैं क्या आप को मुसीबत में देख कर परेशान नहीं होंगे। किसी कानूनी कार्यवाही से उन की परेशानी समाप्त होना संभव नहीं है।

संबध विच्छेद करने और बेदखल करने का प्रश्न है तो आप के परिवार में आप के माता, पिता, भाई, बहिन व अन्य रक्त संबंधी हैं। इन का आप के साथ रिश्ता रक्त संबंध से बना है वह कानून द्वारा या किसी घोषणा से समाप्त होना संभव नहीं है। आप कितनी ही घोषणाएँ कर दें जो आप के माता, पिता, भाई, बहिन, चाचा, ताऊ वगैरा हैं उन के साथ रक्त संबंध तो बने ही रहेंगे वे किसी भी तरह से समाप्त नहीं हो सकते। आप तौर पर अखबारों में इस तरह की घोषणाएँ प्रकाशित होती रहती हैं कि हमने अपने पुत्र, पुत्री या माता पिता से संबंध विच्छेद कर लिया है। लेकिन इस तरह की घोषणाओं से किसी तरह का कोई कानूनी प्रभाव नहीं होता। यदि किसी तरह के कोई दायित्व आने होते हैं तो वे आते ही हैं उन से इस तरह की घोषणाओं के द्वारा नहीं बचा सकता।

जहाँ तक पुलिस द्वारा आप की रिपोर्ट दर्ज न करने और किसी सिपाही द्वारा आपको धमकाने का प्रश्न है तो आप इस संबंध में एस.एस.पी. को लिखित परिवाद रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से भेज सकते हें। ऐसी शिकायत की प्रति, रजिस्ट्री की रसीद और ए.डी. लौट कर आए तो उसे सुरक्षित रखें और पुलिस द्वारा फिर भी कोई कार्यवाही आपकी रिपोर्ट पर न करने  आप न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

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समस्या-

मेरी पत्नी बबीता देवी (68 वर्ष) एक पैर से विकलांग है। मेरे बाबा अंबिका सिंह जिनको 1940 में 7 एकड़ 42 डिसमिल जमीन उनके हिस्से में प्राप्त हुआ था। मेरे पिता दो भाई थे मेरे पिता का नाम वेशर सिंह और मेरे चाचा का नाम वादों सिंह। मेरी चाचा वादों सिंह ने विवाह नहीं किया था। मेरे चाचा वादों सिंह ने 3 एकड़ 42 डिसमिल जमीन 1948 में खरीदा था मेरे चाचा वादों सिंह की मृत्यु 2004 में हुई। उनके मरणोपरांत वह जमीन अभी मेरे पास है। क्या मेरे चाचा के द्वारा जो जमीन मुझे मिला उस पर मेरे पुत्र या पुत्री का अधिकार है। जिस वक्त मेरे चाचा ने जमीन खरीदा था उस वक्त वो संयुक्त परिवार के ही सदस्य थे किंतु उनके द्वारा खरीदे गए जमीन के केवाला पर सिर्फ उन्हीं का नाम है, मेरे पिताजी का नाम नहीं है। मुझे 3 पुत्र पैदा हुऐ परंतु तीनो जन्म के समय मृत पाए गए, तीनों की मृत्यु पेट में ही हो गई थी। फिर मुझे दो पुत्रियां हुई। क्या उन मृत पुत्रों का भी कोई हिस्सा हमारे संपत्ति में होता है? यदि हां तो फिर क्या वह हिस्सा मेरी पत्नी को स्थानांतरित होगा? मेरी पुत्री ने मुझ पर टाइटल पार्टीशन सूट किया है। उसका हिस्सा इस संपत्ति में कितना हो सकता है । जबकि 7 एकड़ 42 डिसमिल जो कि मेरे बाबा का हिस्सा था, उस में मेरे चाचा का जो हिस्सा होता है वह तो मेरा पर्सनल प्रॉपर्टी कहलायेगा।

उमेश सिंह vishnukr1506@gmail.com

समाधान-

आप के दादा अम्बिका सिंह को 2014 में जो जमीन उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है वह आप की पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति है। इस संपत्ति का उत्तराधिकार उत्तरजीविता से तय होगा। 2005 से पुत्रियाँ भी सहदायिक संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार रखने लगी हैं। इस कारण आप की पुत्री आप की सहदायिक संपत्ति में अपना हिस्सा अलग कराने की अधिकारी है। आप के पुत्र मृत पैदा हुए इस कारण उन का कोई अलग से हिस्सा नहीं है। वह हिस्सा आपकी पत्नी को प्राप्त नहीं होगा।  दादा की जमीन में आप के चाचा का हिस्सा भी आप को मिल गया है। लेकिन वह फिर भी आप की स्वअर्जित संपत्ति नहीं है क्यों कि वह आपको उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ है।  आप की पुत्री इस भूमि में अपना हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है। उस का हिस्सा कुल जमीन में 1/3 ही होगा। आप के चाचा ने जो हिस्सा खुद खरीदा है और जिस का केवाला उन के नाम है वह जमीन आप की स्वअर्जित मानी जाएगी और आप के जीतेजी उस में किसी को हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। इस जमीन में आप की पुत्री कोई भी हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

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Nullity

समस्या-

मेरी छोटी बहन प्रियंका तोमर ने  4 जनवरी 2018  को शुभम सूर्यवंशी से प्रेम विवाह किया था। मेरी बहन सामान्य वर्ग से है और शुभम एसी/एसटी वर्ग से। शादी के बाद मेरी बहन को पता चला की शुभम पहले से ही शादीशुदा है और  डिवोर्स के लिए तारीख पर जाता है! लेकिन शुभम के परिवार वालों ने उस लड़की के बारे में कुछ नहीं बताया है जिससे शुभम की पहले शादी हुई थी। अब मेरी बहन मेरे घर वापस आ चुकी है और वह शुभम से तलाक लेना चाहती है तो उसके तलाक लेने की क्या विधि रहेगी? या हम इसकी शादी को शून्य घोषित करवा सकते हैं? दोनों ही स्थिति में क्या प्रोसेस रहेगी? मेरी मम्मी द्वारा उन्हें सोने के कुछ जेवर भी दिए गए थे, वह भी उन्होंने वापस नहीं किए। हमने थाने में जाकर रिपोर्ट करने की कोशिश की। लेकिन थाने वालों ने हमारी रिपोर्ट नहीं लिखी और कहा कि वह तुम्हें एसी/एसटी केस में फंसा देंगे। तुम उनके ऊपर कोई कार्यवाही मत करो और कोर्ट में जाकर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करो या फिर आपसी सहमति से तलाक ले लो। कृपया आप हमारा मार्गदर्शन करें।

– गोलू तोमर, एम/23, रतन आवा न्यूज

समाधान-

किसी हिन्दू विवाह में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 5 की उपधारा (i), (iv) तथा (v) की शर्तों का उल्लंघन किया गया हो तो वह विवाह शून्य होता है। इन तीन शर्तों में पहली (i) शर्त यही है कि विवाह के किसी भी पक्षकार का जीवनसाथी जीवित नहीं होना चाहिए। आप की बहिन के मामले में यही हुआ है। जब विवाह हुआ तब आप की बहिन के पति की पहली पत्नी जीवित थी और उस से तलाक नहीं हुआ था। जिस के कारण आप की बहिन का विवाह शून्य है। इस के लिए आप की बहिन हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 11 के अंतर्गत परिवार न्यायालय में विवाह की शून्यता की डिक्री पारित करने के लिए आवेदन कर के डिक्री प्राप्त कर सकती है। इस के लिए चाहिए कि आप बहिन के पति का जिस अदालत में मुकदमा चल रहा है उस अदालत से उस मुकदमे की पत्रावली की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर आवेदन के साथ ही न्यायालय में प्रस्तुत करें।

प की माँ के द्वारा आप की बहिन को जो सोने के बिस्कुट दिए थे वे तथा अन्य सभी उपहार जो आप की बहिन को विवाह या उस के उपरान्त दिए गए हों आप की बहिन का स्त्री-धन हैं। आप की बहिन उन्हें वापस मांग सकती हैं और नहीं लौटाने पर यह धारा 406 आईपीसी का अपराध है। पुलिस को इस मामले में रिपोर्ट दर्ज कर लेना चाहिए। लेकिन पूरे भारत में पुलिस का रवैया उस के पास किसी अपराध की रिपोर्ट दर्ज करने जाने वाले व्यक्ति के प्रति यही रहता है कि वे उसे रिपोर्ट न करने और मामले को बाहर ही सलटाने के लिए कहते हैं इस के लिए वे तरह तरह के डर भी दिखाते हैं। आप की बहिन के साथ जिस तरह का अपराध उस के कथित पति और उस के परिवार ने किया है उस के बाद वे एससी एसटी एक्ट के अंतर्गत कोई रिपोर्ट करेंगे भी तो उस का कोई मूल्य नहीं होगा। पुलिस केवल अपने यहाँ दर्ज अपराधों की संख्या को कम रखने के लिए इस तरह करती है। यदि पुलिस थाने ने रिपोर्ट दर्ज करने से मना किया है तो आप रजिस्टर्ड एडी डाक से अपना परिवाद एस.पी. पुलिस को प्रेषित करें। उस की रसीद और प्राप्ति स्वीकृति यदि लौट आए तो सुरक्षित रखें और एक सप्ताह में कार्यवाही न होने पर सीधे न्यायालय में अपना परिवाद प्रस्तुत करें। न्यायालय आप की रिपोर्ट दर्ज करने के लिए पुलिस को आदेश दे देगा। एस.पी. और न्यायालय को प्रस्तुत होने वाले परिवाद में स्पष्ट रूप से कहें कि पुलिस ने एससी एसटी एक्ट की कार्यवाही होने का डर दिखाते हुए रिपोर्ट दर्ज करने से मना कर दिया है।

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समस्या-

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 251(1)  के अंतर्गत जिस खातेदार पर रास्ते के लिये वाद दायर करते हैं उसी में से रास्ता दिया जाता है या किसी दूसरे  की खातेदारी में से रास्ता दिया जा सकता है,  यदि रास्ते में आने वाली दूरी कम हो।

– राहुल चौधरी, अजमेर

समाधान-

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 में कृषि भूमि में जाने के लिए रास्ते के संबंध में धारा 251 तथा धारा 251-क हैं। धारा 251 में आपका पहले से उपभोग में लिया जा रहा रास्ता किसी के द्वारा बंद कर देने या उस में बाधा पहुँचाने के संबंध में है तथा धारा 251-क किसी काश्तकार के खेत में आने जाने का रास्ता न होने पर नया रास्ता देने के संबंध में है। ये दोनों धाराएँ निम्न प्रकार हैं-

धारा- 251.

रास्ते तथा अन्य निजी सुखाचार के अधिकार- (1) उस दशा में जब कोई भूमिधारी जो वस्तुतः रास्ते के अधिकार या अन्य सुखाचार या अधिकार का उपभोग कर रहा हो, अपने उक्त उपभोग में बिना उसकी सहमति के, विधि विहित प्रणाली से भिन्न तरीके से, बाधित किया जाय, तहसीलदार उक्तरूपेण बाधित भूमिधारी के प्रार्थना-पत्र पर तथा उक्त उपभोग एवं बाधा के विषय में सरसरी जाँच करने के पश्चात् बाधा को हटायेजाने की अथवा बंद किये जाने की और प्रार्थी भूमिधारी को पुनः उक्त उपभोग करने की आज्ञा, कर सकेगा चाहे उक्तरूपेण पुन: उपयोग किये जाने के विरुद्ध तहसीलदार के समक्ष अन्य कोई हक स्थापित किया जाय।

(2) इस धारा के अन्तर्गत पारित कोई आज्ञा किसी व्यक्ति को ऐसे अधिकार या सुखाचार को स्थापित करने से विवर्जित नहीं करेगी जिसके लिये वह सक्षम सिविल न्यायालय में नियमित रीति से वाद प्रस्तुत करके दावा कर सकता हो।

251-क.

अन्य खातेदार की जोत में से होकर भूमिगत पाइपलाइन बिछाना या नया मार्ग खोलना या विद्यमान मार्ग का विस्तार करना.-(1) जहाँ

(क) कोई अभिधारी, अपनी जोत की सिंचाई के प्रयोजन के लिए किसी अन्य खातेदार की जोत में से होकर भूमिगत पाइपलाइन बिछाना चाहता है; या

(ख) कोई अभिधारी या अभिधारियों का कोई समूह अपनी जोत या, यथास्थिति, उनकी जोतों तक पहुंचने के लिए अन्य खातेदार की जोत में से होकर एक नया मार्ग बनाना चाहता है या किसी विद्यमान मार्ग को विस्तारित या चौड़ा करना चाहता है

और मामला पारस्परिक सहमति से तय नहीं होता है। तो ऐसा अभिधारी या, यथास्थिति, ऐसे अभिधारी ऐसी सुविधा के लिए संबंधित उप-खण्ड अधिकारी को आवेदन कर सकेंगे और उप-खण्ड अधिकारी, यदि संक्षिप्त जांच के पश्चात् उसका समाधान हो जाता है कि-

(i) यह आवश्यकता आत्यंतिक आवश्यकता है और यह जोत के केवल सुविधाजनक उपभोग के लिए नहीं है; और

(ii) अन्य खातेदार की जोत में से होकर, विशिष्ट रूप से नये मार्ग के मामले में, पहुंचने के वैकल्पिक साधन का अभाव सिद्ध किया गया है

तो आदेश द्वारा, आवेदक को, अभिधारी, जो उस | भूमि को धारित करता है, द्वारा सीमांकित या दर्शित लाईन के साथ-साथ भूमि की सतह से कम से कम । तीन फुट नीचे पाइपलाइन बिछाने के लिए या ऐसे ट्रैक | पर, जो उस अभिधारी द्वारा जो उस भूमि को धारित – करता है, दर्शाया जाये, भूमि में से होकर, और यदि ऐसा ट्रैक दर्शित नहीं किया जाये तो लघुतम या निकटतम रूट से होकर एक नया मार्ग जो तीस फुट से अधिक चौड़ा न हो, बनाने के लिए या विद्यमान मार्ग को तीस फुट से अनधिक तक विस्तारित या चौड़ा

करने के लिए, उस अभिधारी को, जो उस भूमि को धारित करता है, जिसमें से होकर पाइपलाइन बिछाने या एक नया मार्ग बनाने या विद्यमान मार्ग को चौड़ा करने का अधिकार मंजूर किया जाये, ऐसे प्रतिकर के संदाय पर जो विहित रीति से उप-खण्ड अधिकारी द्वारा अवधारित किया जाये, अनुज्ञात कर सकेगा।

(2) जहाँ उप-धारा (1) के अधीन नया मार्ग बनाने या किसी विद्यमान मार्ग को विस्तारित करने या चौड़ा करने का अधिकार मंजूर किया जाये वहाँ ऐसे मार्ग | को समाविष्ट करने वाली उस भूमि के संबंध में अभिधृति निर्वापित की हुई समझी जायेगी और वह भूमि राजस्व अभिलेखों में “रास्ता’ के रूप में अभिलिखित की जायेगी।

(3) वे व्यक्ति, जिनको उप-धारा (1) में निर्दिष्ट सुविधाओं में से किसी भी सुविधा के उपभोग के लिए अनुज्ञात किया गया है, उक्त सुविधा के आधार पर उस जोत में, जिसमें से होकर ऐसी सुविधा मंजूर की जाये, कोई भी अन्य अधिकार अर्जित नहीं करेंगे।’

उक्त दोनों धाराओं के उपबंधों से आप समझ गए होंगे कि आप का मामला धारा 251 (1) का न हो कर धारा 251-क का है।

आप का सवाल यह था कि जिस पड़ौसी की भूमि में से रास्ता मांगा गया है और प्रकरण में पक्षकार बनाया गया है क्या उस के अलावा किसी अन्य जिसे प्रकरण में पक्षकार न बनाया गया हो उस की भूमि में से भी रास्ता दिया जा सकता है क्या? तो हमारा कहना है कि जिस से रास्ता मांगा ही नहीं गया उस से रास्ता नहीं दिलाया जा सकता है। जिस से रास्ता दिलाया जाए उस का प्रकरण में पक्षकार होना आवश्यक है। जिस की जमीन में से रास्ता दिया जाएगा उस का पक्ष सुना जाना आवश्यक है अन्यथा रास्ता दिए जाने का आदेश ही गैर कानूनी होगा। यदि ऐसी कार्यवाही लंबित है तो आप जिस के खेत में से आप रास्ता चाहते हैं वह यदि पक्षकार नहीं है तो उसे प्रकरण में पक्षकार बनाए जाने के लिए आप आवेदन कर सकते हैं।

समस्या-

मेरा विवाह तलाकशुदा लड़की से हुआ है जिसकी आयु 38 वर्ष है मेरी 28 वर्ष है। विवाह का पंजीयन नगर पालिका में हुआ है, जिस में डिवोर्स का कोई हवाला नहीं दिया गया है। मेरी पत्नी सरकारी अध्यापिका हे और मैं बेरोजगार हूँ। मेरी शादी में मैंने किसी प्रकार का दहेज नहीं लिया है, एक बैड एक चादर तक नहीं ली। बस एक अंगूठी ली बस। वह ससुराल में बहुत कम आती है। ज्यदा खुद के माता पिता के पास रहती है और मैं भी उन के माता पिता के पास ही रहता हूँ। वह खुद के रिकॉर्ड में कहीं पति का नाम मांगते हैं तो नहीं भरती। इनकम टैक्स में रिबेट के लिए कोई पालिसी करती है तो रिबेट के लिए परामर्श लेते हैं और कहते हैं कि पति पत्नी के नाम पालिसी ले लो, उसमें वह अपने पापा को नामिनी बनाती है, कहीं भी नॉमिनी में मेरा नाम नहीं भरती। उस की आय 40000 रुपए प्रतिमाह से अधिक है। यदि ऐसे में तलाक मेरी ओर लिया जाता है तो भरण पोषण या आर्थिक दंड देना होगा क्या?

-दौलतराम, खंडवा, म.प्र.

समाधान-

पने विवाह अपनी मर्जी से किया। आप बेरोजगार थे तो आपत्ति आप की पत्नी को होनी चाहिए थी। पत्नी की उम्र अधिक है तो आप को पता था। वह सरकारी कर्मचारी है यह भी आप को पता था। वह तलाकशुदा है यह भी आप को पता था। वह अपने माता पिता के साथ रहती है, आप भी उस के साथ रहते हैं इस में क्या परेशानी है। आप का सारा खर्च आप की पत्नी उठाती है तो इस में आपको कोई आपत्ति नहीं है। जो वह कमाती है उस की सम्पत्ति है। उसे वह कैसे रखती है या उस में किस को वह नोमिनी बनाती है यह उस का अधिकार है। न तो किसी पति को और न ही किसी पत्नी को यह अधिकार है कि वह अपने जीवनसाथी को बाध्य कर सके कि वह उसे नोमिनी बनाए। आप नोमिनी क्यों बनना चाहते हैं? नोमिनी तो पालिसी लेने वाले की मृत्यु पर पालिसी का पैसा लेने वाला होता है लेकिन वह उस धन का मालिक नहीं होता। धन तो उसी को मिलता है जो उत्तराधिकारी होता है। आप के इस तरह के सवाल करने से तो ऐसा लगने लगेगा कि आप बिना कुछ किए धरे अपनी पत्नी की कमाई पर अपना जीवन जीना चाहते हैं और यह भी चाहते हैं कि पत्नी अपनी सारी संपत्ति आप के नाम कर दे। विवाह में यह उचित नहीं है। आप अपनी पत्नी पर किसी तरह का संदेह करने के स्थान पर उस पर भरोसा करते हुए उस के साथ प्रेम पूर्वक एक अच्छे जीवनसाथी की तरह रह सकते हैं।

आप को और तो कोई शिकायत अपनी पत्नी से है नहीं। आप के पास तलाक का कोई आधार नहीं है। नोमिनी नहीं बनाना कोई आधान नहीं हो सकता। यदि पति या पत्नी को ही नोमिनी बनाने या न बनाने के नाम पर तलाक होने लगें तो देश की आधी शादियाँ अब तक टूट जानी चाहिए थीं। आप को तलाक मिल ही नहीं सकता। वह तभी मिल सकता है जब कि आपकी पत्नी सहमति से आपको तलाक देने को तैयार हो। ऐसे में तो आप दोनों तय करेंगे कि भऱण पोषण किस को कितना देना है और देना है या नहीं देना है।

समस्या-

अभी मेरी बुआ ने मेरे पिताजी के साथ तीनों भाइयो पर केस किया है खेती की जमीन पर जो मेरे दादा जी से मिली है। यह जमीन मेरे दादा जी को मेरे पड़दादा जी से गोद के रूप में मिली थी। मेरे दादा जी की मृत्यु 2000 में हुई और मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद सभी खसरा में मेरे पापा और तीनों भाइयों का नाम आ गया। जब प्रशासन हमारे गांव में आये तब मेरी बुआ ने कॉल पर जमीन लेने से मना कर दिया। उस समय ना हमने उनसे किसी पेपर पर सिग्नेचर करवाया। इतने सालों बाद में मेरी बुआ ने केस फ़ाइल किया है। मैंने सुना है कि हिन्दू उत्तराधिकारी कानून 2005 में बेटी का जमीन पर अधिकार नही होता। अब आगे हम क्या करे कृपया आप हमें बताएं।

– गजेंद्र सिंह, पाली, राजस्थान

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार और सहदायिक संपत्ति के संबध में बहुत गलत धारणाएँ लोगों के बीच पैठी हुई हैं। यह माना जाता रहा है कि यदि किसी हिन्दू पुरुष को कोई संपत्ति उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में मिली है तो वह पुश्तैनी संपत्ति है और उस में पुत्रियो को कोई अधिकार नहीं है और यह अधिकार 2005 में ही उन्हें प्राप्त हुआ है।

यह पुश्तैनी शब्द ही हमें भ्रम में डालता है। तो आप को समझना चाहिए कि वह पुश्तैनी संपत्ति जिसमें पुत्र का जन्म से अधिकार होता है वह क्या है? इस के लिए आप को तीसरा खंबा की पुश्तैनी संपत्ति से संबंधित महत्वपूर्ण पोस्ट “पुश्तैनी, सहदायिक संपत्तियाँ और उन का दाय” पढ़नी चाहिए। जिस से आप समझ सकें कि यह पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति क्या है। आप इसे लिंक को क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

उक्त पोस्ट पढ़ कर आप को पता लग गया होगा कि आप ने जिस संपत्ति पर प्रश्न किया है वह पुश्तैनी है या नहीं है।

यह सही है कि पुत्रियों को 2005 के संशोधन से ही पुत्रों के समान सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार प्राप्त हुआ है, लेकिन 2005 के पहले भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 मे यह उपबंध था कि यदि किसी सहदायिकी के किसी पुरुष सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो उस का दाय उत्तरजीविता से तय होगा। लेकिन यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई भी स्त्री हुई तो उस के सहदायिक संपत्ति में हिस्से का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से तय होगा न कि मिताक्षर विधि के उत्तरजीविता के नियम के आधार पर। इस तरह 2005 के पूर्व भी पिता की मृत्यु पर पुत्री को उस की संपत्ति में धारा-8 के अनुसार हिस्सा मिलता था लेकिन वह सहदायिकी की सदस्य नहीं होती थी।

इस तरह पूर्व में जो नामान्तरण हुआ है वह गलत हुआ क्यों कि उस में आप की बुआ का हिस्सा तय नहीं हुआ था। आप की बुआ ने जो मांग की है वह सही है वह हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है।

समस्या-

विवाहित हिन्दू स्त्री का इस्लाम धर्म अपनाने के बाद क्या उसके पहले पति से विवाह रहता है या टूट जाता है, वह दूसरी शादी के लिए तलाक ले या नहीं?

-सुलेमान,  तहसील नोहर जिला हनुमानगढ़ राज्य राजस्थान

समाधान-

को भी हिन्दू स्त्री-पुरुष जब एक बार हिन्दू विधि से विवाह कर लेते हैं तो वे दोनों उस विवाह में तब तक रहते हैं जब तक कि उस विवाह के विच्छेद की डिक्री पारित नहीं कर दी जाती है। यदि उन में से कोई भी धर्म परिवर्तन कर लेता है तब भी यह विवाह बना रहता है, वे साथ साथ रह सकते हैं।।  किन्तु धर्म परिवर्तन से धर्म परिवर्तन करने वाले के पति या पत्नी को यह अधिकार उत्पन्न हो जाता है कि वह धर्म परिवर्तन के आधार पर अपने साथी से विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सके और वह  हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(ii) में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकता है और साथी के धर्म परिवर्तन के आधार पर उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित हो सकती है। तब वह दूसार विवाह कर सकता/ सकती है।

यदि आप का प्रश्न यह है कि किसी स्त्त्री द्वारा इस्लाम ग्रहण कर लेने के बाद उसे दूसरा विवाह करने के लिए अपने पूर्व पति से तलाक लेना जरूरी तो नहीं? तो उस का उत्तर यह है कि उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करा कर अपने पूर्व पति से  विवाह विच्छेद करना होगा। इस्लाम धर्म के अनुसार भी एक स्त्री एक विवाह में रहते हुए निकाह नहीं कर सकती। उसे पहले पूर्व विवाह से तलाक लेना पड़ेगा और फिर इद्दत की अवधि भी व्यतीत करनी होगी। इस मामले में हिन्दू स्त्री को धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम हो जाने के बाद भी अपने हिन्दू पति से हिन्दू विधि से विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करनी होगी। डिक्री पारित होने के उपरान्त इद्दत की अवधि गुजर जाने पर ही वह इस्लामी शरीयत के अनुसार निकाह कर सकती है।

 

समस्या-

मेरी उम्र लगभग 40 वर्ष है। हम लोग 4 भाई और एक बहन हैं, जिसमे दो भाई मुझसे बड़े हैं और बहन मुझसे छोटी है, शेष एक भाई सबसे छोटा है। मेरे पिता जी की 1984 में ही मृत्यु हो गई थी और क्योंकि मेरे पिताजी बिहार के विद्युत विभाग मे सरकारी नौकरी करते थे और नौकरी में रहते हुए ही उनकी मृत्यु हुई थी, तो मेरी माताजी को पिताजी के स्थान पर अनुकंपा के आधार पर 1987 में नौकरी हुई और वो लगभग 29 साल नौकरी करने के बाद 2016 मे रिटायर हो गई हैं। वो अभी जीवित हैं। मैं यह जानना चाहता हूँ कि मेरी माता जी ने 29 साल की नौकरी में बैंक मे जो भी रुपया जमा कर रखा है और उनको जो रिटायरमेंट के समय जो पैसा मिला है या अभी जो प्रति महीने पेंशन मिल रही है उसमे मेरा कोई क़ानूनी अधिकार है या नहीं? क्या मैं अपना अधिकार लेने के लिए कोई क़ानूनी उपाय कर सकता हूँ या नहीं? क्योंकि बॅंक मे जो भी पैसा जमा है उसमे कहीं पर भी मेरा नाम ना तो नॉमिनी में दिया गया है और ना ही सेकेंड नाम में जब कि मुझे छोड़ कर बाकी सभी भाइयों का नाम नॉमिनी में दिया गया है। सारा बैंक का पैसे में माता जी के साथ सेकेंड नाम में किसी भाई का नाम दिया गया है मेरा नाम कहीं भी नहीं दिया गया है। सब ही भाई मुझे जान मारने की धमकी देते हैं और कहते हैं की तुमको बँटवारा में एक पैसा भी नहीं मिलेगा। माता जी भी मेरा विरोध ही करती हैं और कहती हैं की तुम घर से निकल जाओ। मेरे चार भाई में सिर्फ़ एक भाई सेकेंड वाले की शादी हुई है लेकिन उसकी पत्नी उससे झगड़ा करके अपने घर चली गयी है और तलाक़ मांगती है। मेरी बहन की शादी 2005 में हो चुकी है और उसके दो बच्चे हैं। मुझे अपने हिस्से का का पैसा लेने का मेरा कोई क़ानूनी अधिकार है या नहीं और क्या हम अपनी माता जी क़ानूनी प्रक्रिया करके पैसा ले सकते हैं या नहीं?

– प्रकाश कुमार सिन्हा, जहानाबाद (बिहार)

समाधान-

किसी भी स्त्री की संपत्ति उस की एब्सोल्यूट संपत्ति होती है। आप की माता जी के पास जो भी धन है वह उन का स्वयं का अर्जित धन है। उस धन पर जीतेजी केवल माता जी का अधिकार है। उस के अलावा किसी भाई का कोई अधिकार नहीं है। नोमिनी बनाए जाने के लिए किसी पर कोई दबाव नहीं डाला जा सकता है। आप की माताजी चाहें तो किसी को भी आप के भाई बहिन के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को भी नोमिनी बना सकती हैं। आप की माताजी जीतेजी अपनी इस संपत्ति को किसी को दे सकती हैं या उसे विक्रय कर सकती हैं उन्हें रोकने का अधिकार किसी को नहीं है। वे चाहे तो अपनी समस्त संपत्ति को किसी को भी वसीयत भी कर सकती हैं। आप को उन के जीतेजी उन की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है।

हाँ यदि आप की माताजी कोई वसीयत नहीं करती हैं और उन की मृत्यु हो जाती है तो अन्य बहिन भाइयों की तरह आप को भी उत्तराधिकार में उतनी ही संपत्ति प्राप्त करने का अधिकार होगा जितना कि अन्य भाई बहिनों को होगा अर्थात आप भी 1/5 संपत्ति के अधिकारी होंगे। बैंक, बीमा आदि संस्थाओं में नोमिनी बनाने का अर्थ यह नहीं है कि उस में जमा धन उस नोमिनी का हो जाएगा। नोमिनी केवल ट्रस्टी होता है और उस की यह जिम्मेदारी होती है कि वह इस तरह प्राप्त धन को सभी उत्तराधिकारियों में उनके हिस्से के अनुसार बांट दे। पर कभी कभी इस तरह नोमिनी धन ले कर अपने पास रख लेता है और किसी को नहीं देता। लेकिन इस तरह खुद धन रख लेना धारा 406 आईपीसी का अपराध है जिस के लिए उसे दंडित किया जा सकता है। आप अपने हिस्से के धन के लिए नोमिनी के विरुद्ध दावा कर सकते हैं। आप यह भी कर सकते हैं कि जहाँ जहाँ धन जमा है और नोमिनी द्वारा धन प्राप्त कर लेने की संभावना है वहाँ तुरन्त पत्र दें कि उत्तराधिकारियों में विवाद है इस कारण नोमनी को धन का भुगतान नहीं किया जाए आप उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर रहे हैं, न्यायालय द्वारा प्रमाण पत्र मिल जाने पर उसी के अनुसार धन का भुगतान किया जाए। आप यह कर सकते हैं कि मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त होते ही उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए जिला न्यायाधीश के न्यायालय के समक्ष उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर दें।

समस्या-

मेरा एक चैक दिनांक 8-3-2016 को बैंक जाते हुए रास्ते में गिर गया था और काफी ढूढंने पर भी नहीं मिला, कुछ मिनटो बाद मेने उस चेक के गुम की होने लिखित में सूचना बैंक में देकर उस चेक का भुगतान रोक दिया। अब डेढ साल बाद वह चैक किसी लङके को मिला और भुगतान के लिये मेरे खाते मे लगाकर बाउंस करा दिया। उसने मेरे को सूचना देकर केस भी कर दिया। अब   आप ही हल बतायें मैं क्या करूं?

-रवि कामरानी, डन्डापुरा सिन्धी कालोनी, विदिशा-464001 (म.प्र.)

समाधान-

ब आप को चैक बाउंस का नोटिस मिला तो उस के जवाब में यह बात लिखनी चाहिए थी और पुलिस को सूचना देनी चाहिए थी कि आप के खोए हुए चैक का कोई गलत इस्तेमाल कर रहा है। आप अब भी इस मामले में पुलिस में मुकदमा दर्ज करवा सकते हैं। यदि पुलिस कोई कार्यवाही न करे तो अदालत में परिवाद के माध्यम से मामला दर्ज कराएँ।

आप के विरुद्ध यदि मुकदमा हो गया है तो आप को लड़ना पड़ेगा। प्रतिरक्षा में अच्छा वकील खड़ा करें। आप बैंक से अपनी सूचना की प्रति मांगें जिसे आप अपनी प्रतिरक्षा मे प्रस्तुत कर सकते हैं, बैंक के शाषा प्रबंधक को अपनी गवाही में प्रस्तुत कर सकते हैं, क्यों की डेढ़ वर्ष पहले जो पत्र बेंक को दिया था वह बहुत बढ़िया सबूत है। जब कि चैक की तारीख अधिक से अधिक चार छह माह पहले की रही होगी। आप चिन्ता न करें आप का पक्ष मजबूत है।

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