Legal Remedies Archive

समस्या-

ईशा ने झारिया, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मैं एक 2 साल की लड़की को गोद लेना चाहती हूूँ जो मेरे रिश्ते में ही आती है,  लेकिन कानूनी रूप से नहीं। मैं उसे हायार एजुकेशन देकर सेल्फ़ डिपेंड बनाना चाहती हूँ और विवाह का दायित्व लेना चाहती हूँ। लेकिन भविष्य में अपनी संपत्ति का कोई अधिकार उसे नहीं देना चाहती हूँ। मेरा स्वयं का एक बेटा है। क्या ऐसा संभव है।

समाधान-

क्यों कि आप का स्वयं का एक पुत्र है इस कारण से आप किसी भी संतान को विधिक रुप से गोद नहीं ले सकती हैं। आप ऐसा खुद भी नहीं करना चाहती हैं। इस कारण इसे गोद लेना तो कहा नहीं जा सकता। लेकिन जो कुछ आप उस के लिए करना चाहती हैं वह भी एक उत्तम विचार है। इस के लिए यदि उस लड़की के माता पिता तैयार हों तो ऐसा आपस में संविदा के माध्यम से किया जा सकता है।

लड़की के माता पिता और आप व आपके पति के मध्य एक लिखित संविदा निष्पादित हो जाए जो एग्रीमेंट के लिए आवश्यक स्टाम्प पर लिखी जाए और बाद में नोटेरी से तस्दीक करा ली जाए। इस दस्तावेज को उप पंजीयक के यहाँ भी एक संविदा के रूप में पंजीकृत कराया जा सकता है। इस संविदा के अनुसार लड़की के माता पिता लड़की की अभिरक्षा उस के विवाह तक के लिए आप को देंगे। आप लड़की की परवरिश अपनी स्वयं की संतान की तरह करेंगी, उसे स्वावलंबी बनाने की कोशिश करेंगी और उस के विवाह योग्य होने पर विवाह का व्यय उठाएंगी। बदले में उस के माता पिता अपनी बेटी की अभिरक्षा का दावा नहीं करेंगे। इस एग्रीमेंट की एक शर्त यह भी होगी कि वह लड़की कभी भी स्वयं को आप की पुत्री होने का दावा नहीं करेगी, आप की संपत्ति पर अथवा बाद में उत्तराधिकारी के रूप में किसी तरह का दावा नहीं करेेगी। इस तरह की संविदा होने के बाद आप लड़की को अपनी अभिरक्षा में ला सकती हैं।

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विधवा द्वारा ग्रहण की गई दत्तक संतान का पिता कौन कहलाएगा?

August 3, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

पुरुषोत्तम शर्मा ने हनुमानगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

श्रीमती कमला पत्नी स्व. लालचन्द कमला देवी की आयु 45 वर्ष थी और कमला देवी के कोई औलाद नहीं थी और ना ही होने की सम्भावना थी। कमला के पति लालचन्द की मृत्यु हो चुकी.थी। कमला.ने अपने जेठ लक्ष्मीनारायण के लड़के धर्मवीर को हिन्दू रीति रिवाज के अनुसार बचपन से गोद ले रखा है। गोदनामा बना हुआ है कमला.ने अपनी सम्पति का त्याग कर धर्मवीर के नाम कर दी है। तो आप मुझे ये बताएँ कि पहले सभी डाँक्यूमेन्ट में धर्मवीर पुत्र श्री  लक्ष्मीनारायण था अब पि.मु./दत्तक पुत्र होने के बाद भविष्य में सभी धर्मवीर के डाक्युमेन्ट में क्या नाम करवाया जाए? लालचन्द की मृत्यु के बाद कमला ने धर्मवीर को गोद लिया था। अब.पहचान पत्र, आधार कार्ड, राशन कार्ड, भामाशाह कार्ड, बैक खाता, लाईसेन्स, सभी डाक्युमेन्ट में क्या नाम करवाया जाए, जो भविष्य मे पूर्ण रुप से सही हो और कोई समस्या ना आए? कोई कहता है. धर्मवीर पि.मु./दत्तक पुत्र कमला करवा लो और कोई कहता है धर्मवीर पि.मु./दत्तक पुत्र लालचन्द करवा लो। तो आप ही बताएँ कि भविष्य में क्या नाम पूर्ण रूप से सही होगा? आपका सुझाव यह था कि बच्चे का दत्तक ग्रहण होने के उपरान्त उस के पिता के स्थान पर उस के दत्तक पिता का ही नाम होना चाहिए। अन्यथा अनेक प्रकार की परेशानियाँ हो सकती हैं। मुझे थोड़ा समझने मे समस्या आ रही है कि धर्मवीर को कमला देवी ने गोद लिया था, ना कि लालचन्द ने। धर्मवीर को गोद लेने से पहले ही लालचन्द की मृत्यु हो चुकी थी। लालचन्द की मृत्यु होने के कुछ समय बाद कमला देवी ने धर्मवीर को गोद लिया था।

समाधान-

मारा जो सुझाव था वही सही है। यदि विधवा किसी पुत्र को दत्तक ग्रहण करती है तो उस का दत्तक पिता दत्तक ग्रहण करने वाली स्त्री का पति ही होगा। उस के पिता के स्थान पर उस के जन्मदाता पिता का नाम तो इस कारण अंकित नहीं किया जा सकता कि वह तो अपनी पत्नी की सहमति से अपने पुत्र को दत्तक दे चुका होता है और पिता होने की हैसियत को त्याग देता है।

हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम 1956 की धारा 14 की उपधारा (4) में उपबंधित किया गया है कि जब एक विधवा या अविवाहित स्त्री किसी बालक को दत्तक ग्रहण करती है और बाद में किसी पुरुष से विवाह करती है तो जिस पुरुष से वह विवाह करती है वह उस दत्तक बालक का सौतेला पिता कहलाएगा।

इस उपबंध से स्पष्ट है कि किसी विधवा द्वारा दत्तक ग्रहण करने पर दत्तक ग्रहण किए गए बालक का पिता उस विधवा स्त्री का मृत पति ही होगा। इस मामले में दत्तक ग्रहण किए गए बालक के दस्तावेजों में धर्मवीर पुत्र स्व. श्री लालचंद लिखवाना होगा। जो कि दत्तक ग्रहण विलेख की प्रति प्रस्तुत कर परिवर्तित कराया जा सकता है। हर दस्तावेज में परिवर्तन की प्रक्रिया भिन्न भिन्न हो सकती है जो आप संबंधित विभाग से पता करें।

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नामान्तरण निरस्ती को दीवानी न्यायालय में चुनौती दें।

August 1, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

डॉ. मोहन कुमार वर्मा ने उज्जैन, मध्यप्रेदश से  समस्या भेजी है कि-

मैंने नगरपालिका सीएमओ को नामांतरण हेतु आवेदन किया, जिसमें मैंने पिता की पंजीकृत वसियत एवं अनुप्रमाणित गवाह की फोटोकॉपी प्रस्तुत की। इस पर मेरे भाई बहनों ने आपत्ति दर्ज कराई।  उन्होंने बटवारा विलेख नोटरी का प्रस्तुत किया जिस पर सलाहकार ने टीप दिया कि आवेदक ने पंजिकृत वसीयत दिया जिस पर न्यायालय का स्टे नहीं है अतः नामांतरण में आपत्ति नहीं है। न.पा.शुजालपुर पी.आइ.सी. की बैठक में नामांतरण स्वीकार हो मेरा नामांतरण होगया। तत्पश्चात मैंने वर्ष 2011-12 से 2016-17 तक संपत्ति कर प्रति वर्ष जमा किया। वर्ष 17-18 का सं.कर जमा करने गया तो मालुम हुआ कि मेरा नामांतरण निरस्त कर मेरे पिताजी का नाम अंकित कर दिया गया। शायद आपत्तिकर्ताओं ने अधिकारियों से साठगांठ करके मेरे नामांतरण अवैध रूप से निरस्त करा दिया अब मुझे क्या कार्यवाही करना चाहिए?

समाधान-

क बार आप के पक्ष में हो चुका नामान्तरण बिना आप को सुनवाई का अवसर दिए निरस्त नहीं हो सकता था। नगरपालिका ने गलती की है। आप नगर पालिका को इस मामले में नगरपालिका अधिनियम के अंतर्गत नोटिस दें कि उन्हों ने नामान्तरण को निरस्त कर के गलती की है। यदि वे नामान्तरण निरस्तीकरण का आदेश वापस न ले कर नामान्तरण आप के नाम नहीं करते हैं तो आप दीवानी अदालत में नगर पालिका के विरुद्ध दीवानी वाद संस्थित करेंगे।

नोटिस देने के उपरान्त दो माह की अवधि व्यतीत हो जाने पर आप नगर पालिका के विरुद्ध उक्त नामान्तरण निरस्तीकरण को हटाने का व्यादेश पारित करने तथा इस आशय की घोषण करने का वाद संस्थित करें कि पंजीकृत वसीयत से पिता की मृत्यु के बाद आप स्वामी हो गए हैं। इस मामले में वाद संस्थित करने के लिए किसी अच्छे वकील की सेवाएँ प्राप्त करें।

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समस्या-

मोहम्मद जीशान ने सीतापुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

क घर का बैनामा है, उस पर ६ लोगो के नाम अंकित हैं। परन्तु ५ लोग उस मकान में १३ सालों से नहीं रह रहे हैं। अब वो ५ लोग अपना हिस्सा बेचना चाहते हैं। जिसका छठा हिस्सा है वो जबरदस्ती कब्ज़ा किये है, कृपया बेचने के लिए कानूनी हल बताएँ।

समाधान-

किसी भी संयुक्त संपत्ति के सारे साझेदार मिल कर आपसी सहमति से ही पूरी संपत्ति को विक्रय कर सकते हैं या फिर एक या एक से अधिक साझेदार उस संपत्ति में अपना हिस्सा विक्रय कर सकते हैं। यदि उन के पास कब्जे में संपत्ति का कोई भाग हो तो उस का कब्जा दे सकते हैं। इस तरह करने पर खरीददार को उस संपत्ति के एक भाग पर कब्जा मिल जाता है तथा पूरी संपत्ति के उतने हिस्से का वह साझीदार हो जाता है जितने हिस्से उसने खरीदे हैं। यहाँ समस्या यह आती है कि इस तरह के विक्रय में खरीददार नहीं मिलता। खरीददार को अपने हिस्सा अलग करने के लिए बंटवारे का मुकदमा करना पड़ता है।

आप के मामले में जिस के पास कब्जा है वह मकान बेचना नहीं चाहता। जो बेचना चाहते हैं उन के पास कब्जा नहीं है। बिना कब्जे के कोई हिस्सा खरीदने को तैयार नहीं होगा। वैसी स्थिति में बेचने के इच्छुक साझीदारों को बंटवारे का दावा करने तथा अपने हिस्से का कब्जा दिलाने के लिए दावा करना होगा और बंटवारा कराना होगा। एक बार बंटवारे की प्राथमिक डिक्री पारित होने पर अंतिम डिक्री पारित करने के दौरान वे चाहें तो छठे व्यक्ति का हिस्सा खरीद सकते हैं और पूरी संपत्ति के स्वामी हो जाने पर संपत्ति विक्रय कर सकते हैं।

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नामान्तरण सही समय पर कराएँ जिस से गलफहमियाँ न पनपें।

July 29, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राकेश कुमार ने ग्राम पोस्ट माकतपुर जिला कोडरमा, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी फुआ (गुंजारी देवी) शादी के तुरंत बाद बिना कोई औलाद के बल बिधवा हो गई। मेरी फुआ अपने पति की मृत्यु के बाद अपने मायके में अपने भाई भतीजों के साथ रहने लगी। प्रश्नगत भूमि को राज्य सरकार द्वारा गुंजारी देवी के नाम से बंदोबस्ती वाद संख्या 14/75-76 के माध्यम से 1.40 डी (गैर मजरुआ खास) जमीन बंदोबस्त किया गया एवं सरकारी लगान रसीद गुंजारी के से कट रहा है गुंजारी देवी को प्राप्त भूमि जिला निबंध, कोडरमा के कार्यालय से दान पत्र संख्या 7252 दिनांक 09/06/1986 के माध्यम से अपने भाई एवं भतीजों के नाम से कर दिया।  जो आज तक गुंजारी देवी के नाम से रसीद कटवाते आ रहे हैं उक्त जमीन पर माकन दुकान एवं कुआं बनाकर रहते चले आ रहे हैं | गुंजारी देवी की मृत्यु सन 1993 में हो गई। गांव के कुछ लोगों का कहना है की गुन्जरी देवी को वारिस नहीं होने के कारण उनकी मृत्यु के बाद यह जमीन सरकार के खाते में वापस चली गई इसलिए इस जमीन को हम लोग सामाजिक कार्य के लिए उपयोग करेंगे। क्या गावं वालों का आरोप सही है? क्या ऐसा संभव है? उक्त जमीन पर अपनी दावेदारी मजबूत कैसे करें?

समाधान-

गाँव वालों का आरोप सही नहीं है पर इस आरोप के पीछे गलती गाँव वालों की नहीं गुञ्जारी देवी के भाई भतीजों की है। जंगल में मोर नाचता है तो कोई नहीं देखता। जब शहर गाँव में नाचता है तो लोग देखते हैं और कहते हैं आज मोर नाचा है। गुञ्जारी देवी ने दान पत्र अपने भाई भतीजों के नाम निष्पादित कर रजिस्टर कराया तो उस का नामान्तरण राजस्व रिकार्ड में होना चाहिए था। इस नामान्तरण के न होने से राजस्व रिकार्ड में आज भी भूमि गुञ्जारी देवी के नाम है। यदि उस रिकार्ड को देख कर गाँव के लोग आरोप लगाते हैं और जमीन को सार्वजनिक काम में लेने के लिए कहते हैं तो वे गलत कैसे  हो सकते हैं। सही समय पर नामान्तरण न होने से अनेक गलतफहमियाँ उत्पन्न होती हैं।

अब इस समस्या का निदान यह है कि उक्त पंजीकृत दान पत्र के आधार पर नामान्तरण के लिए आवेदन करें और नामान्तरण कराएँ जब राजस्व रिकार्ड में यह जमीन गुञ्जारी देवी के खाते में आ जाएगी तो गाँव वाले अपने आप यह आरोप लगाना बंद कर देंगे। वैसे भी जब गाँव को सार्वजनिक कार्यों के लिए भूमि की जरूरत हो और भूमि उपलब्ध न हो तो सार्वजनिक कार्यों के लिए उपलब्ध होने वाली भूमि पर उन की निगाह रहेगी। इस कारण तुरन्त नामान्तरण कराया जाना जरूरी है।

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प्रिय  पाठकों¡

            हमें प्रतिदिन 15 से 20 समस्याएँ पाठकों से समाधान हेतु कानूनी सलाह फार्म पर प्राप्त होती हैं। हम उन में से एक चुनिन्दा समस्या को समाधान हेतु प्रतिदिन प्रकाशित करते हैं। हमारा प्रयत्न होता है कि हम शेष सभी पाठकों को ई-मेल द्वारा समाधान सुझाएँ। लेकिन अनेक समस्याओं के साथ ई-मेल ठीक से लिखा नहीं होता है, या गलत लिखा होता है। जिस के कारण उन्हें सुझाए गए समाधान उन तक नहीं पहुँचते और भेजा गया मेल अनडिलीवर्ड वापस आ जाता है। इस के कारण जरूरी है कि पाठक अपनी समस्या भेजते समय ई-पता बिलकुल सही अंकित करें। हमें अपना नाम, जिले व राज्य का नाम भी सही सही सही बताएँ और समस्या जिस राज्य और जिले से संबंधित है उसे भी बताएँ। समस्या का विवरण ठीक से लिखें। घटनाओं की तिथियाँ सही सही लिखें। जिस से हम समस्या का समाधान ठीक से सुझा सकें। यदि कोई यह चाहे कि उस की समस्या यहाँ प्रकाशित न की जाए तो उस का उल्लेख भी कर दें।

आज ऐसी ही कुछ समस्याओँ का हम संक्षिप्त समाधान यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं। भविष्य में ऐसी समस्याओं का समाधान हम नहीं दे सकेंगे। किसी व्यक्ति की समस्या का समाधान यदि दो सप्ताह में न मिले और प्रकाशित भी न हो तो वह अपनी समस्या में विवरण की कमी पर ध्यान दे कर दुबारा प्रेषित करे।

समस्या-1

राम ने जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी द्वितीय श्रेणी अध्यापक थे, उन की सेवा काल में मृत्यु हो गयी। अनुकंपा नियम के अन्तर्गत मैं पिताजी के स्थान पर नौकरी के लिए आवेदन करता लेकिन मेरी पत्नी सरकारी सेवा में है तो क्या अनुकंपा नियुक्ति के लिए पात्र हूँ? पिताजी की सेवा पुस्तिका मैं माताजी, मैं और मेरी बहिन आश्रित हैं, उन में मेरा नाम नहीं है। आप बताएँ मैं क्या करूँ?

समाधान-

आप अनुकंपा नौकरी हेतु आवेदन करने के पात्र हैं और आप को नौकरी मिल सकती है। यदि परिवार में कोई अन्य व्यक्ति इस योग्य नहीं है तो आप को यह आवेदन अवश्य करना चाहिए।

समस्या-2

हनुमान ने पचार, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

समाधान-

मुझे पैरामिलीटरी फोर्स से 124 दिन अवकाश से लेट होने के कारण डिसमिस कर दिया गया है, क्या अब मैं दूसरी सरकारी नौकरी के लिए आवेदन कर सकता हूँ।

आप किसी अन्य राजकीय सेवा के लिए आवेदन कर सकते हैं। आप को पैरा मिलीटरी फोर्स के कठोर सेवा नियमों की पालना न कर पाने के कारण सेवा से पृथक किया गया है। जो हो सकता है डिसमिसल नहीं हो कर स्वैच्छा से सेवा त्याग हो। यदि आप को आरोप पत्र जारी कर दंडित नहीं किया गया है तो नौकरी में पूर्व सेवा के कारण कोई परेशानी नहीं होगी। बस इतना करें कि पूर्व नौकरी और वहाँ से सेवा से हटाने का कारण जानबूझ कर न छिपाएँ।

समस्या-3

रितेश ने बैकुंठपुर, छतीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे पापा इस केस में बहुत परेशान है।  टेंसन के कारण खाना पीना नही खाते हैं। कृपया मेरे पापा की समस्या का समाधान करें । मेरे पापा लोग तीन भाई है । मेरे पापा उनमें सबसे छोटे है। हमारे दादा जी के पास कुल 28 एकड़ जमीन है। जिसमे खेती की जाती है। दादा जी के देहांत के बाद बड़े चाचा पूरी ज़मीन की देख-रेख करते थे। अब पापा ने जमीन मांगी तो बोलते हैं नहीं दूंगा। पॉवर ऑफ एटार्नी से पूरी जमीन अपने नाम पर करवा लिए हैं वो। केस चल रहा है, पूरी जमीन में स्टे लगवा सकते हैं कि नहीं ये जानना था। हमारे वकील बोलते हैं कि मैं ये कर रहा,वो कर रहा, लेकिन कुछ करते नही हैं। कृपया समाधान बताएँ बहुत परेशान है हम सब।

समाधान-

आप के पिताजी ने न्यायालय में मुकदमा किया हुआ है। इस मुकदमे में न्यायालय रिसीवर की नियुक्ति कर सकता है। यदि आपका वकील ठीक से ध्यान नहीं दे रहा है तो किसी अन्य स्थानीय वकील से सलाह करें और वह कहे कि वह यह काम करवा देगा तो अपने वर्तमान वकील के साथ उसे भी अपना वकील नियुक्त करें और रिसीवर नियुक्ति के लिए आवेदन दे कर उसे निर्णीत कराएँ। यदि न्यायालय रिसीवर नियुक्त न करे तो उस आदेश के विरुद्ध रिवीजन या अपील जो भी हो सकती हो वह ऊपरी अदालत को कराएँ।

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धमकी दे कर धन संपत्ति की वसूली उद्दापन का अपराध है।

July 27, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मन मोहन ने पूर्वी जोहरीपुर पूर्वी दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

पिछले दो महीने पूर्व मेरी रिश्ता पक्का हो गया था, पर इस रिश्ते से मेैं खुश नहीं था। मुझ पर रिश्ते के लिए कई माह से दबाव बनाया गया था। जिस में लड़की वालों की तरफ से बिचौलिए शामिल हैं। पर अब रिश्ते के लिए मेैंने किसी प्रकार लड़की के भाई से मना कर दी है,पर वो रिश्ता तोड़ने को तेयार नहीं हैं और शादी का दबाव बना रहा है। हमारे फ़ोटो लड़की के घर पर गोद भराई की रस्म में खींचे हुए हैं जिस से वे अब रिश्ता तोडने के लिए तीन लाख की मांग कर रहे हैं। जबकि मुश्किल से उनका ख़र्चा 20 से 30 हज़ार हुआ है, लेकिन लड़की का भाई कह रहा है शादी न होने के कारण पिताजी बीमार हो गए थे और डेढ़ लाख पिताजी की बीमारी में, और डेढ लाख प्रोग्राम मे लग गया,  इतनी रकम दो वर्ना हम आदमी इकट्ठा कर के तुम्हारे घर पर हंगामा करेंगे।

समाधान-

गाई या गोद भराई विवाह का अनुबंध हो सकता है विवाह नहीं। विवाह का अनुबंध तोड़ा जा सकता है। इस अनुबंध को तोड़ने वाले से दूसरा पक्ष खर्चा और हर्जाना मांग सकता है। पर मुझे नहीं लगता कि आप के मामले में खरचा और हरजाना इतना अधिक हो सकता है। आप दूसरे पक्ष को कह सकते हैं कि वे बहुत अधिक मांग रहे हैं जो आप को मंजूर नहीं है। वे चाहें तो खर्चे और हर्जाने के लिए अदालत में दावा कर सकते हैं।

उन्हों ने आप के घर पर हंगामा करने की धमकी दी है। यह धमकी है। इस तरह किसी को धमका कर उस से धन वसूल करना उद्दापन का अपराध है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 383 में दण्डनीय है। इस कारण इस धमकी की सूचना आप अपने इलाके के पुलिस थाने को दें और कहें कि वे इस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करें। इस की सूचना लिखित में एस पी को भी दें। यदि आप को लगे कि पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर रही है तो आप धमकी देने वाले और उस के परिवार के वे लोग जो इस धमकी में शामिल हैं के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर पुलिस को जाँच के लिए भिजवाने हेतु निवेदन करें।

 

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समस्या-

वत्सला कुमारी ने पटना, बिहार से  समस्या भेजी है कि-

म लोग तीन बहन और एक भाई है। तीनों बहन औार भाई की शादी हो चुकी है। भाई का एक बेटा है। एक बहन की एक बेटी है। एक बहन की कोई संतान नहीं है। हमारे दो संतान है, एक बेटा और बेटी है। हमारे दादा जी के दो मकान हैं। एक मकान जिला-पटना, राज्य-बिहार में है जो पटना पीपुल्स कॉपरेटिव से सन् 1968 में खरीदी गई थी, और दूसरा मकान जिला-मुंगेर, राज्य-बिहार में है जो सन् 1969 में मेरे दादा जी ने अपने भाई से खरीदा था जो खास महल की जमीन पर बनाया हुआ है। मेरे दादा जी को एक ही संतान मेरे पिताजी थे। मेरे दादा जी का देहांत सन 1983 में, पिताजी का देहांत सन 1999 में तथा मेरे माता जी की देहांत सन 2017 में हुई। मेरे भाई ने पिताजी की देहांत के बाद पटना के मकान जो पिपुल्स कॉपरेटीव में हैं बिना किसी सूचना के अपना नाम सन् 2000 में अपना नाम से करबा लिया। उक्त मकान का विभाजन किस प्रकार किया जा सकता है। मेरा भाई दोनों मकान पर अपना दावा करता है। क्या उक्त मकान पर हमारा अधिकार है?

समाधान-

दोनों मकान आप के दादा जी ने 1956 के बाद खरीदे थे। आप के दादाजी और पिता जी की संपत्ति का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 के अनुसार तय होगा। आप के दादाजी के देहान्त के बाद यदि दादी जीवित रही होंगी तो इन दोनों मकानों के दो हिस्सेदार आप के पिता और आप की दादी हुईं। दादी के देहान्त के बाद केवल आप के पिता उस के स्वामी हुए। अब पिता के तीन बेटियाँ और एक पुत्र है। माताजी का देहान्त भी हो चुका है। ऐसी स्थिति में तीनों पुत्रियाँ और एक पुत्र कुल संपत्ति के ¼ एक चौथाई हिस्से के स्वामी हैं। बंटवारा होने पर चारों को बराबर के हिस्से प्राप्त होंगे।

आप ने लिखा है कि भाई ने मकान अपने नाम करा लिया है। तो अधिक से अधिक यह हुआ होगा कि भाई ने नगर पालिका या नगर निगम में नामान्तरण करवा लिया होगा। लेकिन नामान्तरण से किसी अचल संपत्ति का स्वामित्व निर्धारित नहीं होता है। आप के पिता के देहान्त के साथ ही संपत्ति चारों संतानों की संयुक्त हो चुकी थी। चारों का यह स्वामित्व केवल किसी स्थानान्तरण विलेख ( विक्रय पत्र, दानपत्र, हकत्याग पत्र) आदि के पंजीयन से ही समाप्त हो सकता है अन्यथा नहीं। इस तरह सभी संतानें एक चौथाई हिस्से की अधिकारी हैं।

हमारी राय है कि आप को आप के पिता की समस्त चल अचल संपत्ति के विभाजन के लिए वाद संस्थित कर देना चाहिए। यह वाद पटना या मुंगेर दोनों स्थानों में से किसी एक में किया जा सकता है। आप पटना रहती है  तो वहाँ यह  वाद संस्थित करना ठीक रहेगा। इस काम में जितनी देरी करेंगी उतनी ही देरी से परिणाम प्राप्त होगा। इस कारण बिना देरी के यह काम करें।

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समस्या-

राजीव गुप्ता ने सकरा, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा के नाम से कुछ ज़मीन और मकान की ज़मीन है, मगर सारी पुश्तैनी है। मेरे पापा 4 भाई हैं दादा गुज़र चुके हैं मेरे पापा ओर चाचा को ज़मीन घर बनाने के लिए मौखिक रूप से बाँट दिया गया। हम सबका 20 साल से मकान पर समान रूप से क़ाबिज हैं। दिल्ली में भी ह्मारा 1 मकान है जो मेरी माँ के नाम है मेरे छोटे चाचा ने उसपर दावा किया था। लेकिन हम केस जीत गये अब चाचा और दादी मिलकर उस मकान का बदला लेने के लिए गाँव की ज़मीन चाचा के नाम करना चाहती है। क्या मेरी दादी का भी मेरे दादा की पुश्तैनी ज़मीन में अधिकार है? वो ऐसा बदला लेने के लिए कर रही है। एक बात और ह्मारा मकान पर 20 सालों से क़ब्ज़ा तो है मगर ज़्यादा प्रूफ सर्टिफिकेट नहीं हैं। चुनाव का पहचान पत्र, ओर स्कूल सर्टिफिकेट हैं। हम दादी का पूरा खर्च उठाने को भी तैयार हैं, मगर वो अब तैयार नहीं है। इससे पहले 20 साल तक हमने ही उनकी सेवा की है। क्या हमें अब मकान बनाने के बाद इस में से दादी को हिस्सा देना होगा?

समाधान-

दि आप के गाँव की संपत्ति पुश्तैनी है तो उस में दादी का हिस्सा तो अवश्य है। लेकिन पुश्तैनी संपत्ति में जिसे वास्तव में सहदायिक संपत्ति कहा जाता है। पुरुष संतानों का जन्म से ही अधिकार होता है, 2005 से पुत्रियों का भी जन्म से अधिकार हो गया है। यदि संयुक्त /सहदायिक संपत्ति में हिस्सेदार की मृत्यु होती है तो उस का उत्तराधिकार वसीयत से अथवा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार होगा न कि उत्तरजीविता के पुराने नियमों से। इस कारण दादी का उस में हिस्सा है।

आप के पिता का कुछ तो हिस्सा तब भी था जब दादाजी जीवित थे। फिर दादा जी की मृत्यु के समय कुछ हिस्सा उन से उत्तराधिकार में मिला है। इस तरह आप के अधिकार में काफी हिस्सा आ सकता है। दादी का हिस्सा भी बहुत थोड़ा होगा। आप बंटवारे में कह सकते हैं कि आप के पिता को यह जमीन दादा ने मकान बनाने के लिए दी थी।  मकान आप के पिताजी ने अपनी आय से बनाया है। आप यह साबित कर देते हैं कि मकान आप के पिता ने अपनी निजी आय से बनाया है तो बंटवारे में उस का भी ध्यान रखा जा सकता है।

बेहतर तो यह है कि आप इस तरह अंदाज लगाना बंद करें। यदि दादी चाचा के नाम वसीयत करती हैं या दादी बंटवारे का वाद करती हैं तो आप के पिताजी अपने अधिकार के लिए लड़ सकते हैं। बंटवारा भी होता है तो हमारी राय में आप के पिता दादी के आंशिक हिस्से की राशि का भुगतान कर के अपना बनाया हुआ मकान पर अपना पूर्ण स्वामित्व प्राप्त कर सकते हैं।

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समस्या-

जमीला खातून ने सीतापुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति ने एक जमीन 1998 में खरीदी थी। मेरे पति की मृत्यु हो गयी। उन से मेरी चार लड़कियाँ हैं। मेरा और मेरी लड़कियों का जमीन में कितना कितना हिस्सा होगा। मेरे देवर जो मेरे पति के सगे भाई हैं उन का क्या हक है, जब कि वह जमीन उन की पुश्तैनी नहीं है यह जमीन मेरे पति ने अकेले ही खरीदी थी। कृपया मुस्लिम ला के मुताबिक पूरी जानकारी दें।

समाधान-

मुस्लिम व्यक्तिगत विधि में पुश्तैनी जमीन जैसा कोई सिद्धान्त नहीं है और कोई संपत्ति पुश्तैनी नहीं होती। जो भी संपत्ति होती है वह व्यक्तिगत होती है हाँ यदि किसी मृतक व्यक्ति की संपत्ति का बंटवारा न हो और किसी उत्तराधिकारी की पहले ही मृत्यु हो जाए तो वैसी संपत्ति में मृतक का हित बना रहता है और वह उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाता है। इस तरह आप के पति की जमीन चाहे उन्हों ने खुद खरीदी हो या पूर्वजों से प्राप्त हुई है वह व्यक्तिगत ही है।

मुस्लिम विधि के अनुसार आप के पति की संपत्ति में से 1/8 आप को, 2/3 सभी लड़कियों को मिला कर और 1/6 हिस्सा आप के पति के भाई अर्थात आप के देवर को मिलेगा। शेष बचा हुआ हिस्सा भी लड़कियों को मिलेगा। आप अपने पति की संपत्ति के 24 हिस्से बनाएँ, उस में से 3 हिस्से आप के, 4 हिस्से आप के देवर के तथा 17 हिस्से लड़कियों को संयुक्त रूप से प्राप्त होंगे।। प्रत्येक लड़की को कुल संपत्ति का 4.25 हिस्सा मिलेगा।

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