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बिना न्यायालय की डिक्री के हिन्दू विवाह विच्छेद संभव नहीं है।

October 30, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

प्रियंका जैन ने उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी नवंबर 2016 में हुई थी शादी के कुछ दिनों बाद ही मुझे ससुराल में मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताण्डित किया जाने लगा। एक दो महीने तक तो बर्दाश्त किया लेकिन फिर मैं ने अपने माता पिता को यह बात बताई और शादी के 5 महीने बाद अलग हो जाने का निर्णय लिया। आपसी रज़ामंदी एवं सामाजिक स्तर पर स्टाम्प वगैरह लिखवाकर हम अलग हो गए। न्यायालय का इस में कोई योगदान नहीं था। अब घरवाले मेरे लिए लड़का ढूंढ रहे हैं, मुझे इस बात का डर है कि मेरा तलाक वैध है या नहीं? कहीं इस तरह शादी कर के मैं अपने होने वाले पति की मुसीबत तो नही बढ़ा रही हूँ?  डिक्री क्या है? इसका होना आवश्यक है क्या? कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प जैन हैं और आप पर हिन्दू विवाह विधि प्रभावी है। हिन्दू विवाह विधि में कोई भी विवाह विच्छेद बिना न्यायालय के निर्णय और डिक्री के संभव नहीं है। आपसी समझौते से आप लोग अलग हो गए हैं लेकिन वैवाहिक संबंध वैध रूप से समाप्त नहीं हुआ है। अभी भी कानूनी रूप से आप के पूर्व पति ही आप के पति हैं और आप उन की पत्नी हैं। यदि आप विवाह विच्छेद के न्यायालय के निर्णय व डिक्री के बिना विवाह करती हैं तो वह पूरी तरह अवैध होगा। क्यों कि इस के बाद आप के नए पति से यौन संबंध स्थापित होंगे जो आप के पूर्व पति की सहमति के बिना होंगे तो आप के नए पति भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अंतर्गत दोषी माने जाएंगे। इस कारण आप के लिए यह आवश्यक है कि आप न्यायालय से विवाह विच्छेद का निर्णय व डिक्री प्राप्त करें।

न्यायालय का निर्णय कई पृष्ठ का होता है। उस में विस्तार से दोनों पक्षों के अभिकथन, साक्ष्य व उन की विवेचना के साथ निर्णय अंकित होता है। जब कि डिक्री किसी भी दीवानी (सिविल) मामले में हुए निर्णय की प्ररूपिक अभिव्यक्ति है जिस में वाद के पक्षकारों के अधिकारों को प्रकटीकरण होता है। किसी विवाह विच्छेद के मामले में डिक्री दो पृष्ठ की होगी जिस में पक्षकारों का नाम पता लिखा होगा तथा यह लिखा होगा कि इन दोनों के बीच विवाह विच्छेद हो चुका है। कहीं भी आप को बताना हो कि आप का विवाह समाप्त हो गया है तो दो पृष्ठ की इस डिक्री की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करना पर्याप्त होगा।

किसी भी मामले में सामान्य रूप से विवाह के एक वर्ष तक विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। इस कारण आप के मामले में भी नवंबर 2017 में पूरा एक वर्ष व्यतीत हो जाने तक यह आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यदि दोनो पक्ष सहमत हों तो जिस समय आप के विवाह को एक वर्ष पूर्ण हो आप और आपके पति मिल कर सहमति से विवाह विच्छेद के लिए न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करें। आवेदन प्रस्तुत करने के छह माह बाद न्यायालय से विवाह विच्छेद का निर्णय व डिक्री मिल जाएगी। यदि दोनो पक्ष सहमति से तलाक के लिए अर्जी प्रस्तुत नहीं करते तो फिर आप को अकेले किसी आधार पर संभवतः क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना होगा। उस में विवाह विच्छेद में समय लग सकता है।

समस्या-

अभी जैसवाल ने 14/459,भोली नगर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

ड़की का परिवार अपनी जाति (जब रिश्ता लेकर आते हैं तब खुद को लड़के का जाति का ही हूँ कहते हैं), धर्म (शायद आदिवासी क्रिश्चियन होते हुए सब छुपाते हैं, खुद को हिन्दू कहते हैं। बाद में लड़के द्वारा लड़की की माँ (नानाजी का नाम और उनका गाँव आदि तथा रिश्तेदार आदि) और पिताजी के रिश्तेदार कहाँ हैं पूछने पर कुछ बताने के जगह लड़की धमकी देती है टार्चर करने का केस कर दूंगी तथा उसके घर वाले गाली गलोज करते हैं जिसका आडिओ रिकार्डिंग भी है! जन्मपत्री में उम्र कम बताते हैं मगर बाद में लड़के को पता चलता है की लड़की लड़के से बड़ी है। साथ ही लड़का जब उनके यहाँ लड़की देखने गया था तब 4 दिन लड़के को रोके रहे तथा दबाव देकर अकेले लड़के (लड़के का परिवार से कोई नहीं था) को रिंग सेरामनी करने को को विवेश किये थे जहाँ सिर्फ लड़की परिवार ही था बाकी और कोई नहीं। एक तरह से लड़के को फंसा दिए थे और उसी दवाब में लड़का मजबूर हो शादी को बाध्य हुआ था। शादी को 10 साल से ऊपर हो गया है उन दोनों के एक लड़का भी है और लड़की यहीं ससुराल में ही रहती है। बातें तो बहुत लम्बी हैं। मगर यहाँ संक्षेप में सारी बात कह चुका अब इसमें लड़की के परिवार पर किस तरह और क्या केस किया जा सकता है?

समाधान-

प की समस्या है कि भिन्न जाति, धर्म, जन्मपत्री में कम उम्र बताना, लड़के से लड़की का बड़ा होना, रिंग सेरेमनी दबाव से करवा देना जिस के दबाव में विवाह कर लेना, विवाह से एक संतान पैदा होना, अभी तक लड़की का ससुराल में रहते रहना फिर भी विवाह के 10 वर्ष बाद तक किसी अदालत में किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं उठाना।

महोदय, आप किस दुनिया में रहते हैं? विवाह के लिए कानूनन जाति, धर्म, उम्र का कोई बंधन नहीं है इन के आधार पर कोई आपत्ति नहीं की जा सकती। फिर 10 वर्ष तक लड़की विवाहित जीवन निबाह कर अपनी ससुराल में रह रही है, उस से एक संतान पैदा हो जाती है। आप आपत्ति नहीं करते। अब आपत्ति का कोई नया कारण नहीं है। भाई क्या अब एक स्त्री से मन  भर गया है या कोई दूसरी भा गयी है?

आप रुपया उधार देते हैं और तीन साल तक अदालत में कोई दावा नहीं करते तो फिर अदालत में दावा नहीं कर सकते। अब विवाह पर दस साल बाद आपत्तियाँ उठा रहे हैं इस दुनिया की तो कोई अदालत आप को सुनेगी नहीं। बल्कि यह कहेगी कि आप खुद दोषी हैं। आप के लिए इस शादी से निकल भागने का कोई रास्ता नहीं है। आपकी हर कोशिश आ बैल मुझे मार वाली होगी।

समस्या-

इति श्रीवास्तव ने रांची , झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी माता का देहांत 2013 में हुआ, वे माध्यमिक शिक्षा परिषद, उत्तर प्रदेश में सहायक अध्यापिका के पद पर पिछले 30 सालों से अधिक से कार्यरत थीं। 2015 में वह रिटायर होने वाली थीं। उनकी मृत्यु के बाद उनकी तीन पुत्रियों में से किसी को भी अब तक उनके सेवा से जुड़ी कोई भी राशि प्राप्त नहीं हुई है। जब मैं जे.डी. ऑफिस गई तो मुझे यह बताया गया कि तीनों लड़कियों में से किसी एक को नौकरी मिलेगी और मेरे पिता को पेंशन मिलेगी हालांकि मेरी माता के अन्य बकाया के सम्बंध में कोई बात नहीं की गई। मेरी माता का मेरे पिता से कोई लेना-देना नहीं था, हालांकि दोनों में तलाक नहीं हुआ था, और माँ की सेवा पंजिका में भी उनका नाम है जिसे वो हटाना चाहती थीं लेकिन हटा नहीं सकीं। मेरे पिता कोऑपरेटिव सोसायटी, इलाहाबाद में क्लर्क हैं। मेरी माँ की मृत्यु के समय हम तीनों बहने बेरोजगार थीं और माँ के रिश्तेदारों के घर में रहती थीं। हालांकि 2015 में मुझे केंद्र सरकार में नौकरी मिल गई। पर अन्य दोनों बहनें कम सैलरी पर प्राइवेट जॉब करती हैं और कभी-कभी छोड़ना भी पड़ता है। माँ की जगह पर नौकरी हम तीनों ही नहीं करना चाहते हैं। हम तीनों अविवाहित हैं। अभी हमारी माँ की एक पैतृक अचल सम्पत्ति बिकी उसमें से माँ के रिश्तेदारों, जिनका हिस्सा भी उस सम्पत्ति में था, ने यह कहकर की कानून के अनुसार उनको एक हिस्सा मिलेगा, हमारे शेयर में से पिता को एक हिस्सा दिया जबकि हमलोग उनसे कोई मतलब नहीं रखते। अब मेरे सवाल हैं कि, मेरी माँ के विभाग से नियमतः हम तीनों को किस-किस मद में पैसे मिलने हैं। और एल आई सी तो मुझे पता क्या उनका कोई और भी देय बनता है? उनके पैसे को प्राप्त करने के लिए क्या कागजी कार्रवाई करनी होगी? कैसे मैं अपने पिता को कुछ भी लाभ प्राप्त होने से रोक सकती हूँ, क्योंकि मेरी माँ उनको पैसे नहीं देना चाहती थीं, उनका नाम सेवा पंजिका में सिर्फ इसलिए देना पड़ा क्योंकि हमतीनों नाबालिग थे। और पिता के नाम के नीचे हमतीनों के नाम भी लिखे हैं। एक महत्वपूर्ण प्रश्न ये है कि क्या मैं माध्यमिक शिक्षा परिषद, इलाहाबाद के खिलाफ कोई कार्रवाई कर सकती हूं कि उन्होंने हमारा देय अभी तक नहीं दिया, मेरी माँ की मृत्यु के 4 साल बाद भी! यदि मेरी नौकरी न लगती तो हम तीनों बहनों की हालत दयनीय होती क्योंकि हमारे पिता ने कभी हम पर या माँ पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि हम लड़कियां थे। लेकिन मेरी माँ के सारे पैसे लेने के लिए वो प्रयास कर रहे हैं।

समाधान-

प की समस्या और आप के तर्क वाजिब हैं लेकिन संपत्ति आदि का जो भी निपटारा होना है वह कानून के अनुसार ही होना है। आप की माताजी की मृत्यु के समय तक उन का आप के पिता से तलाक नहीं हो सका था। इस कारण आप की माताजी के उत्तराधिकारियों में आप तीनों बहनों के साथ साथ आप के पिता भी शामिल हैं। उन की जो भी बकाया राशि विभाग, बीमा विभाग, जीवन बीमा, प्रावधायी निधि विभाग और बैंक आदि में मौजूद हैं उन्हें प्राप्त करने का अधिकार आप चारों को है। आप चारों प्रत्येक ¼ हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

यदि आप की माताजी का पिता से विवाद चल रहा था तो उन्हें चाहिए था कि वे अपनी वसीयत लिख देतीं जिस में अपनी तमाम संपत्ति को आप तीनों बेटियों को वसीयत कर सकती थीं और आप के पिता को उत्तराधिकार से वंचित कर सकती थीं। लेकिन उन्हों ने ऐसा नहीं किया जिस के कारण आपके पिता भी उत्तराधिकार प्राप्त करने के अधिकारी हैं। उन्हें यह सब राशियाँ प्राप्त करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं हो सकता है लेकिन वे कानूनी रूप से अधिकारी हैं।

यदि कहीं या सभी स्थानों पर नामांकन आप के पिता का है तो वे यह सारी राशि प्राप्त कर सकते हैं। हालांकि नोमिनी हमेशा एक ट्रस्टी होता है औऱ उस का कर्तव्य है कि वह राशि को प्राप्त कर के मृतक के सभी उत्तराधिकारियों में उन के अधिकार के हिसाब से वितरित करे। लेकिन अक्सर देखा गया है कि नोमिनी सारी राशि प्राप्त कर के उस पर कब्जा कर के बैठ जाता है और बाकी उत्तराधिकारियों को अपना हिस्सा प्राप्त करने के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। इस कारण आप को चाहिए कि आप अपनी माताजी के विभाग, प्रावधायी निधि विभाग, कर्मचारी बीमा विभाग और जीवन बीमा व बैंक आदि को तीनों संयुक्त रूप से लिख कर दें कि नोमिनी होने पर भी आपके पिता को किसी राशि का भुगतान नहीं किया जाए क्यों कि ऐसा करने पर वे आप को आप के अधिकार से वंचित कर सकते हैं।

आप स्वयं अपनी माता जी के विभाग में जा कर संबंधित विद्यालय या जिला शिक्षा अधिकारी के कार्यालय से पता कर सकती हैं कि आप की माताजी की कौन कौन सी राशियाँ विभाग के पास बकाया हैं। उन राशियों का मूल्यांकन भी आप पता सकती हैं। यदि समस्या आए तो आप सूचना के अधिकार का उपयोग कर के विभाग से ये सूचनाएं प्राप्त कर सकती हैं। जब आप को पता लग जाए कि कौन कौन सी राशिया विभाग और अन्यत्र बकाया हैं तो आप उन सब के लिए जिला न्यायालय में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकती हैं।  इस के साथ ही जिला न्यायालय में आवेदन कर के विभाग/ विभागों के विरुद्ध यह आदेश भी जारी करवा सकती हैं उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बनने के पहले किसी को भी आप की माताजी की बकाया राशियों का भुगतान नहीं किया जाए।

इस मामले में उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए आप को स्थानीय वकील की मदद लेनी होगी। इस कारण बेहतर है कि किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह करें और उस के मुताबिक यह काम करें।

आप तीनों अनुकम्पा नियुक्ति नहीं चाहती हैं, आप के पिता की अनापत्ति के बिना आप  में से किसी बहिन को अनुकम्पा नियुक्ति मिल भी नहीं सकती थी। आप की अनापत्ति के बिना आप के पिता को नहीं मिलेगी। वैसे भी वे अब नौकरी प्राप्त करने की उम्र के नहीं रहे होंगे।

कानूनी कदम उठाने में देरी आपके मामले को कमजोर करेगी

October 8, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

 समस्या-

राशि सिंह ने उन्‍नाव, यूपी से सवाल पूछा है कि- 

र् मेरी शादी फरवरी 2015 में हुई थी कुछ दिन तो सब ठीक रहा लेकिन कुछ दिन बाद से मेरे ससुराल वालों का व्यवहार चेंज हो गया मेरे पति नोएडा में जॉब करते है।उनका पहले से किसी और लड़की से संबंद्ध था जो मुझे पता चला जिसका मैन विरोध किया परंतु किसी ने भी मेरा साथ नही दिया ।उल्टामुझे ही गलत ठहराया गया और मुझसे गाली गलौज हर हफ्ते लड़ाई झगड़े करने लगे इन सब ने केवल दहेज के लिये शादी की थी बस मेरा जीवन इन सब ने नरक बना दिया है मैं केवल घर मे कहना बनाने वाली की हैसियत से रहती हूं।जब तब मुझे और मेरे घर वालो को अपशब्द कहते है ।घर पर मैंने ये बात बताई तो घर वाले मुझे ले गए फिर इसी बीच इन सब ने मेरे घर आकर हंगामा किया जिसके कारण मेरे पिता को हार्ट अटैक आ गया उनकी नवंबर 2016 में मृत्यु हो गयी मैं और मेरे घर वाले अवसाद में चले गए । फिर मेरे चाचा लोगो ने बीच मे पड़कर फिर से एक मौका देने की बात कही उनकी बात मॉनकर मैं अप्रैल 2017 को फिर अपने ससुराल आ गयी कुछ दिन ठीक रहा फिर वही सब शुरू हो गया इस बार तो और ज्यादा अत्याचार शुरू हुए उनको लगा बिना बाप की बेटी है अब कंहा जाएगी सहते सहते मैं 31 aug 2017 को अपने घर आ गयी अब मैं क्या करूँ मुझे अलग होना है तालाक लेकर और इनको सज़ा भी हो कृपया सही कानूनी मार्गदर्शन करें ।मेरे सारे जेवर भी उन लोगो के पास ही हैं।

समाधान-

हम ने इस समस्या को तीसरा खंबा के सहयोगी श्री भुवनेश शर्मा को प्रेषित किया था। उन्हों ने इस पर परामर्श दिया है जिसे आप उन के ब्लाग विवाह परामर्श पर जा कर पढ़ सकते हैं।

समस्या-

नताशा ने खंडवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी के 4 महीने बाद से मेरी सास और पति मुझ से मारपीट करते थे क्यूं की मेरे पति को कोई और लडकी पसन्द थी। उन्होने मुझ से दहेज के लिए शादी की थी।  अखिर मे मुझे उन लोगों ने इतना सताया कि मूझे उन का घर छोड कर अना पडा। मैं ने आपने पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का केस भी कर दिया है। जिस से मेरे पति एक दिन के लिऐ जेल भी जा चुके हैं ओर दूसरी पेशी पर अदालत सबूत मांग रही है। पर मेरे पास सबूत नहीं हैं कयूं कि मेरे पास ना फोन था ना कोई पड़ौसी मेरी मदद कर रहे है। एसे मे मैं कया करूं? मे खुद ही गवाह हूं कया अदालत मुझ पर यकीन करेगा? मे एक बार पेशी पर भी नहीं गई हूं। पेशी पर नहीं जाने से कया होता है? मूझे उन जालिमों से छूटकारा चाहिए मैं कया करूं? मेरा दहेज केसे मिलेगा? मेरा आगे पीछे कोइ सहारा नहीं है जिस कारन मुझे मेरे पति से रवानगी चाहिये मैं कया करूं?

समाधान-

प के प्रश्न से यह स्पष्ट नहीं है कि आप ने दहेज प्रताड़ना का मुकदमा कैसे किया है। यदि यह मुकदमा 498ए, व धारा 406 आईपीसी में है तो इसे देखने की जिम्मेदारी पुलिस की है। इस में तो जब आप को गवाही के लिए बुलाया जाए आप अपना बयान करवा दें। बाकी सब कुछ पुलिस और सरकारी अभियोजन पक्ष देखेगा। बयान देने के सिवाय अन्य किसी भी दिन इस मुकदमे पर आप के जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

406 आईपीसी के केस में ही पुलिस को आपका दहेज का सामान बरामद कर के आप के सुपुर्द कर देना चाहिए था। वह क्यों नहीं हुआ यह बात आप उस पुलिस स्टेशन से पता करें जिस में आप ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी और जिस ने आप के मामले में आप के पति को गिरफ्तार किया था।

आप को विवाह से छुटकारा प्राप्त करने के लिए अपने पति से तलाक के लिए मुकदमा करना पड़ेगा। इसी मुकदमे में आप अपना स्त्रीधन (जिसे आप दहेज का सामान कहती हैं) मांग सकती हैं और न्यायालय आप को दिला सकता है।) इस मामले में बेहतर होगा कि आप किसी स्थानीय विश्वसनीय वकील से संपर्क कर के सलाह करें।

समस्या-

मनोज राठोड़ ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या ऐसा कोई प्रावधान है? जिस में पत्नी पति के साथ 5 वर्षो से साथ न रहती हो तो लिव इन रिलेशनशिप के तहत किसी अन्य महिला के साथ कानूनी रूप से एक नियत समय के एग्रीमेंट के साथ वह पुरुष रह सके? यदि ऐसा हो सकता है  तो किस कानून के तहत और ना तो किस कानून के तहत नहीं रह सकते?

समाधान-

ह समस्या बड़ी व्यापक है। पहले इस के कारणों पर कुछ रोशनी डाना चाहूंगा। यदि पति पत्नी के बीच विवाद हो और पति पत्नी का साथ रहना संभव नहीं रहा हो तो दोनों के बीच इन सब समस्याओं का हल केवल और केवल न्यायालय के माध्यम से ही संभव है। इस के लिए पति या पत्नी दोनों में से कोई एक को या दोनों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी। अब आप की जो समस्या है उस का मूल इस तथ्य में है कि न्यायालय कम समय में वैवाहिक विवादों का हल नहीं कर पा रहे हैं। यदि वे एक दो साल में विवाद को अंतिम रूप से हल कर दें तो यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

एक बार जब यह तय हो गया है कि न्यायालय की मदद के बिना कोई वैवाहिक विवाद हल नहीं किया जा सकता और न्यायालयों के संचालन के लिए साधन जुटाने की जिम्मेदारी सरकार की है तो उसे पर्याप्त संख्या में पारिवारिक न्यायालय स्थापित करने चाहिए जिस से किसी भी वैवाहिक विवाद का समापन कम से कम समय में व अधिकतम एक वर्ष की अवधि में अन्तिम रूप से किया जा सके। यदि ऐसा हो सके तो यह आदर्श स्थिति होगी। लेकिन न तो इस आदर्श स्थिति में देश को पहुँचाने की मानसिकता किसी राजनैतिक पार्टी और सरकार में है और न ही सिविल सोसायटी या जनता की ओर से इस तरह का कोई आंदोलन है। इस कारण यह स्थिति फिलहाल कई सालों तक बने रहने की संभावना है। यह भी सही है कि जब हमारी न्याय व्यवस्था किसी समस्या का हल कम समय में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहती है तो लोग न्याय व्यवस्था से इतर  उस के लिए अस्थाई हल तलाशने लगते हैं। अनेक बार ये अस्थायी हल ही लगभग स्थायी हल का रूप ले लेते हैं। लिव इन रिलेशन वैवाहिक मामलों में वर्तमान विधि और न्याय व्यवस्था की असफलता का ही परिणाम हैं।

आप ने समस्या का जो हल सुझाया है उस पर विचार करें तो पाँच वर्ष से पत्नी किसी पति से अलग रह रही है और यह अकारण है तो यह विवाह विच्छेद का एक मजबूत आधार है। यदि पृथक रहने का कोई कारण भी है तो भी इस से सप्ष्ट है कि विवाह पूरी तरह से असफल हो चुका है और न्यायालय को तलाक की डिक्री पारित कर देनी चाहिए। लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था यह सब समय रहते नहीं कर सकती उस के पास इन कामों के लिए जज बहुत कम लगभग चौथाई हैं और समस्याएँ चार गुनी। इस कारण ऐसे पति और पत्नी लिव इन रिलेशन की बात सोचते हैं। यदि आप एग्रीमेंट के साथ किसी स्त्री के साथ लिव इन रिलेशन बनाते हैं तो उस में यौन संबंध बनना अनिवार्य होगा और आप का तलाक नहीं हुआ है तो विवाह में रहते हुए दूसरी स्त्री से यौन संबंध बनाना ऐसा कृत्य होगा जिस के कारण तलाक के लिए आप की पत्नी के पास एक मजबूत आधार तैयार हो जाएगा। चूंकि आप एक नियत समय के लिए यह एग्रीमेंट कर रहे हैं इस कारण इसे विवाह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वैसी स्थिति में यह आईपीसी या किसी अन्य कानून के अंतर्गत  किसी तरह का अपराध  तो नहीं होगा, लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता की श्रैणी में रखा जा सकता है। जिस से पत्नी या पति मानसिक रूप से पीड़ित हो कर आत्महत्या के लिए प्रेरित हो सकता/ सकती है।  तब यह धारा 498-ए का अपराध हो सकता है। हमारी राय यह है कि तलाक होने के पूर्व किसी भी तरह किसी भी पक्ष द्वारा एग्रीमेंट के माध्यम से लिव इन रिलेशन में रहना अपराध हो सकता है। इस से बचना चाहिए।

फिर भी जो वर्तमान परिस्थितियाँ हैं उन में लोग ऐसे वैकल्पिक मार्ग निकालते रहेंगे जिन से जीवन को कुछ आसान बनाया जा सके। यह तब तक होता रहेगा जब तक हमारी न्याय व्यवस्था पर्याप्त और कानून सामाजिक परिस्थितियों के लिए पूरी तरह उचित नहीं हो जाएंगे।

पति को प्रतिबंधित करना पड़ेगा।

September 3, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

कविता ने इन्दौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी को 14 साल हो गए हैं 2 बच्चे हैं। शादी बहुत जल्दी मे हुई थी दोनों परिवार आपस में एक दूसरे को समझ नहीं पाए। मेरे पापा ने अपनी क्षमता अनुसार शादी की परन्तु ससुराल वालों को व्यवस्थाओं मे भारी कमी लगी। ससुराल वाले मुझसे पहले दिन से ही शिकायत करने लगे। पति को काफी भड़काया ना पति का व्यवहार मेरे साथ ठीक था ना परिवार का। मेरे पति सरकारी नौकरी में थे परन्तु उन्होंने मुझे अपने साथ नही रखा, मुझसे कहते थे तुम्हे मम्मी पापा के साथ ही रहना होगा। देवर ननद दोनों की शादी पहले ही हो चुकी थी। देवर भी अपनी पत्नी को साथ ले गया था। पति हर शनिवार आते थे और जब भी आते थे शादी की कमियों को लेकर झगड़ा करते थे। मै नौकरी भी छोड़ चुकी थी। मेरे पास रोने के अलावा कोई रास्ता नही था फिर भी माता पिता और मैं रिश्ते को सामान्य करने के लिए कोशिश करते रहे। एक साल तक सिर्फ़ झगड़े होते रहे। विवाह विच्छेद जैसी बात कभी दिमाग में ही नही थी। मैने इन सब के साथ भी पढ़ाई जारी रखी मेरा अब बड़े पद पर चयन हो गया। लेकिन पति और ससुराल वाले नौकरी के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने शर्त रखी यदि नौकरी करेगी तो हम रखेंगे नही। मेरे ससुराल वाले ना तो मेरा कोई खर्च उठा रहे थे। कम दहेज के लिए ताने मारते रहते थे। उस समय मै तीन महीने के गर्भ से थी जीवन भर मैं अपने पापा पर निर्भर नहीं रहना चाहती थी इसलिए मैने मेरे परिवार की हिम्मत से नौकरी कर ली। तब से अभी तक ससुराल वाले मुझसे कोई रिश्ता नही रखते। धीरे धीरे पति आने लगे लेकिन मुझे ससुराल नहीं ले जाते थे। फिर मैंने महिला परामर्श केन्द्र में शिकायत की फिर ससुराल वालों ने पति के साथ घर में आने की इजाजत दी। पति अब साथ में ही रहते हैं लेकिन ससुराल वाले अभी भी रिश्ता नहीं रखते। मै जब भी जाने की कोशिश करती हूँ ससुराल में सास देवर देरानी ताने मारते हैं। कभी कोई बात नहीं करते। देवर ननद को फोन करती हूँ तो भी बात नहीं करते हैं। पति के अपने परिवार से सामान्य रिश्ते हैं परन्तु मुझसे अभी भी वैसे ही हैम मै यदि शिकायत करती हूँ तो कहते हैं, तुम बहू हो तुम्हें ऐसे ही रहना होगा। मै 14 सालों से उपेक्षित हूँ। लगातार अपमान सह सह कर मैं मानसिक रूप से परेशान हो गयी हूँ। पति कहते हैं तुम्हे हमेशा ऐसे ही रहना है। मै कुछ नहीं कर सकता। पति का बेटियों के प्रति प्रेम देखकर मै कोई कानूनी कदम नहीं उठाना चाहती परन्तु अब यह अपमान की जिन्दगी जीते नहीं बन रही है। समझ नहीं आ रहा है क्या करूँ?

समाधान-

प का अपमान सास, ननद और देवर ही नहीं कर रहे हैं। आप के पति भी कर रहे हैं। आप की सास, ननद और देवरों से अधिक कर रहे हैं। पति का बेटियों के प्रति प्रेम है तो कुछ उन्हें भी उस के लिए त्याग करना चाहिए। आप आत्मनिर्भर हो कर भी इतने बरसों से क्यों सहन कर रही हैं यह हमारी भी समझ से परे हैं।

आप कानूनी कार्यवाही नहीं करना चाहती हैं तो न करें। लेकिन मानसिक परेशानी से बचने के लिए पति को स्पष्ट रूप से कह दें कि उन्हें अपने परिवार और आप में से एक को चुनना पड़ेगा। यदि वे परिवार को चुनना चाहते हैं तो आप से और बेटियों से रिश्ता समाप्त समझें और आपसे व बेटियों से मिलने आना बन्द करें। वे फिर भी नहीं मानते हैं तो हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत न्यायिक पृथक्करण के लिए आवेदन अवश्य कर दें। उस आवेदन में अन्तरिम रूप से यह आवेदन भी प्रस्तुत करें कि आप के पति को आदेश दिया जाए कि वह आप से दूर रहें। इस के बाद देखें कि क्या होता है? आगे का रास्ता आप के पति की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।

तलाक का आधार हो तो दूसरे पक्ष की सहमति की जरूरत नहीं।

August 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नवीन ने साईखेड़ा, नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी को एक  साल हो चुका है। मेरी पत्नी छत से कूदने की, फाँसी लगाने की धमकी देती है। काम करने की मना कर चुकी है। शादी से पहले उसका अफ़ेयर रह चुका है। घर से 2 बार व मायके से 1 बार भाग चुकी है। एक रात कहीं रह चुकी है। 4 माह से उसका मानसिक इलाज़ करा रहा हूँ। दूसरों के सामने अच्छा व्यवहार करती है। तलाक की याचिका लगा दी है पर वो तलाक देने को तैयार नहीं है। क्या करूँ?

समाधान-

प के सवाल का छोटा सा जवाब है कि “मुकदमा लड़िए”।

आप की ही तरह मेरे पास ऐसे बहुत लोग समस्या ले कर आते हैं, जो यही कहते हैं कि मेरी पत्नी या पति तलाक के लिए राजी नहीं है। 1955 में हिन्दू मैरिज एक्ट प्रभावी होने के पहले तो भारत में कोई भी इस बात पर राजी नहीं था कि हिन्दू विवाह में तलाक होना चाहिए।

फिर हिन्दू मैरिज एक्ट आया तो उस में तलाक के प्रावधान आए जिन के अनुसार कुछ आधारों पर पति या पत्नी तलाक की मांग कर सकते थे, कुछ ऐसे मुद्दे थे जिन पर केवल पत्नी तलाक की मांग कर सकती थी। लेकिन कानून के अनुसार इस के लिए अदालत में आवेदन देना अनिवार्य था। पति की अर्जी पर पत्नी या पत्नी की मर्जी पर पति अदालत में सहमत भी होता था तो तलाक होना असंभव था। स्थिति यह थी कि जो भी तलाक लेना चाहता/ चाहती थी उसे जिस आधार पर तलाक चाहिए था उसे साक्ष्य के माध्यम से साबित करना जरूरी था। आधार मुकम्मल रूप से साबित होने पर ही तलाक मिल सकता था। तलाक का यह तरीका हिन्दू मैरिज में अभी भी मौजूद है।

फिर  1976 में सहमति से तलाक का प्रावधान आया। पहले यदि पति पत्नी दोनों सहमत होते हुए भी तलाक लेने जाते थे तब भी कम से कम एक पक्ष को विपक्षी के विरुद्ध तलाक के आधार को साक्ष्य से साबित करना पड़ता था। अब दोनों पक्षों के सहमत होने पर इस की जरूरत नहीं रह गयी। बस सहमति से तलाक का आवेदन पेश करें और छह माह बाद भी सहमति बनी रहे तो अदालत तलाक की डिक्री प्रदान करने लगी।

तो नवीन जी¡ तो कुछ समझ आया? आप के पास तलाक के लिए आधार मौजूद है। आपने अपनी समस्या में जो बातें लिखी हैं उन में से शादी के पहले के अफेयर की बात के सिवा सारी बातें अदालत में साबित कर देंगे तो आप को तलाक की डिक्री मिल जाएगी। उस के लिए पत्नी की सहमति की जरूरत नहीं है। बस ये है कि कुछ समय अधिक लगेगा।

समस्या-

निर्वेश ने गॉव कुम्हारिया राव, तह. सोनकच्छ, जिला देवास, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं म.प्र.पुलिस में आरक्षक के पद पर पदस्थ हूँ|  मेरी शादी को 4 वर्ष बीत चुके हैं, मेरा एक 3 वर्षीय बालक भी है और मेरी पत्नी प्रेगनेंट है। मेरी पत्नी का मायका मेरे गाँव से केवल 12 किलोमीटर दूर है। उसी के गाँव के एक लडके से उसका अवैध सम्बध है, अवैध सम्बध की बात को लेकर जब मैं उसे उसके घर छोडने जा रहा था। तब वह मेरी बाइक से मेरे 3 वर्षीय बालक को लेकर कूद गई। जिसके कारण उसे मामूली एवं लडके को गम्भीर चोट आई। मेने उसके बाइक से कूदने की बात डाक्टर को नहीं बताया व ना ही थाने में इसकी रिपोर्ट दर्ज करवाई। मेरी सेलेरी 18000 है व ईलाज में मेरा 150000 रुपया खर्च हो चुका है। मैं मेरी पत्नी को रखना नहीं चाहता और वह मुझे छोडना नहीं चाहती।  मुझे तलाक लेने के लिए क्या करना चाहिए?  अगर वे मुझ पर 498a का केस करते हैं तो मेरी नौकरी में मुझे क्या समस्या आएगी? व भरण पोषण कितना देना होगा?

समाधान-

प को कैसे पता लगा कि आप की पत्नी के उस के गाँव के लड़के से अवैध संबंध हैं? हो सकता है कि यह आप की गलफहमी ही हो। यदि ये संबंध विवाह के पहले थे और अब नहीं हैं और आप की पत्नी आप के साथ पूरी ईमानदारी से रहना चाहती है तो हमें नहीं लगता कि आप को तलाक लेना चाहिए।

यदि आप यह साबित नहीं कर सकते कि आप की पत्नी का विवाह के बाद किसी अन्य पुरुष से कोई संबंध है तो आप अवैध संबंध के आधार पर तलाक नहीं ले सकते। आप किसी अन्य आधार पर तलाक ले सकते हैं या नहीं यह केवल तथ्यों पर निर्भर करेगा।

आप की पत्नी बच्चे की कस्टडी ले सकती है, वह गर्भवती है तो दूसरी संतान भी जन्म लेगी। यदि वह भऱण पोषण मांगती है तो आप को दोनों बच्चों और पत्नी के लिए भरण पोषण देना होगा जो कि आप के आधे या उस से अधिक वेतन के बराबर तक हो सकता है।

498ए में यदि आप की गिरफ्तारी होती है और आप 24 घंटों से अधिक हिरासत में रहते हैं तो आप का स्वतः ही निलम्बन हो जाएगा। तब विभाग कब आप को बहाल करेगा कोई नहीं बता सकता। यदि 498ए में आप को दंडित कर दिया जाए तो आप की सरकारी नौकरी भी जा सकती है।

विवाह के पूर्व जीवन के सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिए।

July 14, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

दिशा शर्मा ने मुजफ्फरपुर उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ने 7.3.2017 को घऱ से छिप कर रजिस्टर्ड मैरिज की, दो साल से हमारे बीच प्यार था। उस का घर बनारस में बहुत दूर था, हम ट्रेन में मिले थे। हमने सोचा था कि एक साल बाद घर वालों को बताएंगे। मैं शादी के दिन ही घर आ गई किसी को पता नहीं चला। लेकिन मेरे पति ने शादी के 5 दिन बाद ही ड्रामा कर दिया। मेरे घर आ कर घरवालों और सभी रिश्तेदारों को धमकी और गालियाँ दीं। सोशल साइट पर मैरिज की फोटो डाल दी। मेरे घर पुलिस भी भेज दी कि मेरी पत्नी को मार रहे हैं। मुझे थाने जाना पड़ा। पूरे एरिया को पता चल गया। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही व्यक्ति है। मैंने उस से बात की तो कहने लगा उस ने ड्रिंक कर ली थी इस कारण यह सब हो गया। मेरे घर वाले बोले कि घर वालों के साथ आ कर विदाई करा लो। पर वह नहीं आया। उस का परिवार शादी के खिलाफ है उन्हों ने उसे घर से निकाल दिया है। वह फिर भी मेरे घर वालों को धमकी देता है। मैं ने उसे कहा है कि तुमने जो कुछ किया है उस के बाद मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकती। फिर वह मुझे बहुत बुरा भला बोला और फिर कहा कि ड्रिंक कर ली थी। अभी 100 नंबर पर काल कर के फिर से पुलिस भेज दी है। अभी धारा 9 का केस कर दिया है। मेरे पापा नहीं हैं, माँ है और दो छोटे भाई हैं। मामा मदद कर रहे हैं। मैं क्या करूँ आप बताएँ। मैं घर वालों के साथ रहना चाहती हूँ।

समाधान-

प शायद पहले भी अपनी समस्या लिख चुकी हैं। उसी दिन आप के श्रीमान जी ने भी हमें अपनी समस्या लिख भेजी थी। हम ने शायद दोनों को उत्तर भी दिया था या हो सकता है न दिया हो।

शादी इतनी हलकी चीज नहीं होती कि छोटी मोटी घटना से टूट जाए। इस कारण वह हलके में नहीं करना चाहिए। आपने केवल लड़के का बनावटी व्यवहार और बातों, वायदों पर ध्यान दिया। जिन्दगी के अन्य पहलुओं पर सोचा ही नहीं। माँ के बाद आप ही परिवार में जिम्मेदार व्यक्ति थीं। आप को अपनी माँ और छोटे भाइयों के बारे में सोचना चाहिए था। भाइयों के आत्मनिर्भर होने तक आप को परिवार को सपोर्ट करना था यह भी भूल गयीं। धारा 9 के प्रकरण में कुछ नहीं होगा। डिक्री भी हो जाएगा तो भी कोई जबरन आप को उस के साथ रहने को बाध्य नहीं कर सकता। अधिक से अधिक आप न जाएंगी तो उसे तलाक लेने का अधिकार मिल जाएगा। वह तो आप भी चाहने लगी हैं। लेकिन आप को भी तलाक के पहले खूब सोचना चाहिए। मेरी राय में अपने छोटे भाइयों के पैरों पर खड़े होने तक की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

विवाह से एक वर्ष तक की अवधि में तलाक का आवेदन नहीं दिया जा सकता। उस ने जो हरकतें की हैं वे क्रूरता की श्रेणी में आती हैं और विवाह का एक वर्ष पूर्ण होने पर इस आधार पर आवेदन दिया जा सकता है।

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