Marriage Archive

समस्या-

सुनील ने अहमदाबाद, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी फरवरी 2014 में हुई थी मेरी पत्नी को मिर्गी का रोग है। जो हमको बताए बिना शादी की थी। मुझे यह बात नवम्बर 2014 में पता चली। फिर मेरी पत्नी मायके गई तो मैंने उसे तलाक की नोटिस भेजी। तलाक की नोटिस भेजने के बाद में उसने मुझ पर दहेज का झूठा केस लगाया जिसके कारण मुझे और मेरी फैमिली को लॉकअप में रहना पड़ा। उस केस को हमने हाईकोर्ट में रखा मार्च 2017 में हाईकोर्ट ने मेरी पत्नी की पूरी FIR रद्द की और हमको बरी कर दिया। मेरी वाइफ ने सूरत में 125 भरण पोषण के लिए और डोमेस्टिक वायलेंस का केस घरेलू हिंसा के लिए किया है वे अभी चल रहे हैं और अहमदाबाद में तलाक का केस चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला दिया है अगर दहेज का केस झूठा निकलता है तो पति को तलाक का पूरा अधिकार है। उसके तहत और मेरी पत्नी को मिर्गी की बीमारी है उसको छुपाकर शादी की है उसके तहत में तलाक लेना चाहता हूं। लेकिन कोर्ट की प्रक्रिया बहुत ही धीमी है। मैं आपसे यह जानना चाहता हूं कि मैं तलाक की प्रक्रिया फास्ट करने के लिए क्या कर सकता हूँ। जिसके कारण तलाक के केस की जल्दी तारीख पड़े मेरा केस जल्दी पूरा हो। हाई कोर्ट ने मेरी वाइफ की 498 की जो FIR रद्द की है उस पर मुझे डोमेस्टिक वायलेंस यानी घरेलू हिंसा अधिनियम में क्या फायदा हो सकता है? कृपया कर अपना सुझाव दीजिए। मैं नवंबर 2015 से अपने भाई, बुआ के लड़के के घर पर रह रहा हूँ और मेरी अभी पीएचडी की पढ़ाई चालू है। अगर कोर्ट भरण पोषण की रकम तय करती है तो मुझे पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी और कहीं जॉब ढूंढना पड़ेगा क्या? कोर्ट फैसला दे सकती है कि तुम अपनी पढ़ाई छोड़ कर अपनी पत्नी की जिम्मेदारी उठाओ? क्योंकि मैं अपने मम्मी पापा से अलग हो गया हूँ वह मुझे अपने घर में नहीं रखते, मेरी पढ़ाई लिखाई का खर्चा मेरे भाई उठाते हैं।

समाधान-

मुकदमा निपटने की प्रक्रिया फास्ट होने का कोई माकूल तरीका नहीं है। देरी इस कारण होती है कि देश में पर्याप्त मात्रा में न्यायालय नहीं हैं। न्यायालयों की कमी को केवल राज्य सरकारें ही पूरी कर सकती हैं। फिलहाल आप यह कर सकते हैं कि उच्च न्यायालय में रिट लगवा कर अदालत के लिए यह निर्देश जारी करवा सकते हैं कि आप के मुकदमे में सुनवाई जल्दी की जाए और नियत समय में आप के मुकदमे में निर्णय पारित किया जाए।

498 ए की प्रथम सूचना रिपोर्ट रद्द होने के निर्णय की प्रतियाँ आप अपने सभी मामलों में प्रस्तुत करें। वह आप को लाभ देगी। इस से यह साबित होगा कि आप की पत्नी की ओर से मिथ्या तथ्यों के आधार पर आप के विरुद्ध मुकदमे करने का प्रयत्न किया गया है। इस से आप को लाभ प्राप्त होगा।

न्यायालय भरण पोषण की राशि तय कर सकती है लेकिन इस के लिए वह आप को पढ़ाई छोड़ने के लिए नहीं कह सकती। वह यह कह सकती है कि जब आप कमाते नहीं थे, अध्ययनरत थे और पत्नी का खर्च नहीं उठा सकते थे तो आप को विवाह नहीं करना चाहिए था। वैसे इस परिस्थिति में पत्नी का भरण पोषण इतना नहीं होगा कि उसे अदा करने के लिए आप को पढ़ाई छोड़नी पड़े।

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समस्या-

मोहम्मद असलम ने मया बाजार, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरी बहन जिसका नाम काल्पनिक जोया की शादी 3 साल पहले अहमदाबाद निवासी फिरोज के साथ हुई थी, मेरी बहन की भी दूसरी शादी है और फिरोज की भी यह दूसरी शादी है, दोनों की एक-एक तलाक हो चुका है। पिछले 3 सालों से लगातार मेरी बहन के पति का व्यवहार क्रूरतम से क्रूरतम रहा है, उसका पति और उसके पूरे परिवार वाले उसको प्रतिदिन प्रताड़ित करते हैं, उन लोगों के मारपीट से तंग हो कर मेरी बहन अब उस घर में रहना नहीं चाहती और अपने पति से तलाक चाहती है। मेरा घर फैजाबाद उत्तर प्रदेश में है मेरी बहन के हस्बैंड का घर अहमदाबाद जिला गुजरात में है। अगर हम कानूनी रुप से तलाक लेना चाहें और मेरी बहन का हस्बैंड तलाकनामे पर साइन ना करें और वह जाकर दूसरी औरत के साथ शादी कर ले तो इस पोजीशन में मेरी बहन क्या कर सकती है? क्योंकि मुस्लिम में पुरुष तो शादी कर सकता है,  और मेरी बहन को जब तक तलाकनामा नहीं मिलेगा तब तक यह तीसरी शादी कर नहीं सकती ऐसी स्थिति में मेरी बहन के लिए क्या कानून है?


समाधान-

मुस्लिम समाज में यह अज्ञान है कि मुस्लिम महिला को विवाह विच्छेद कराने का अधिकार नहीं है। यह एक तरह का भ्रम है जो जानबूझ कर फैलाया जाता है। मुस्लिम महिलाओं को भी तलाक लेने का हक है और वे कुछ निश्चित आधारों पर तलाक की डिक्री पारित करने के लिए दीवानी न्यायालय (जहाँ पारिवारिक न्यायालय हैं वहाँ पारिवारिक न्यायालय) के समक्ष विवाह  विच्छेद कराने के लिए दावा प्रस्तुत कर सकती हैं और न्यायालय विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर सकता है।

दी डिसोल्यूशन ऑव मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939 की धारा 2 में उन आधारों का वर्णन किया गया है जिन पर एक मुस्लिम महिला अपने विवाह विच्छेद की डिक्री पारित कर सकती है। इन आधारों में एक आधार क्रूरतापूर्ण व्यवहार का भी है। आपकी बहिन के साथ क्रूर से क्रूरतम व्यवहार हुआ है तो वे इस आधार पर खुद विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करने के लिए आवेदन कर सकती हैं। इस वाद में न्यायालय का क्षेत्राधिकार दो तथ्यों से तय होगा पहला यह कि जहाँ प्रतिवादी रहता है, दूसरा वहाँ जहाँ वाद कारण पूरी तरह व आंशिक रूप से उत्पन्न हुआ है। तो इस मामले में वाद कारण भी अहमदाबाद में ही उत्पन्न हुआ है। दोनों ही आधारो पर यह वाद अहमदाबाद में दाखिल करना पड़ेगा। लेकिन वाद दाखिल करने के उपरान्त सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगा कर वाद को फैजाबाद स्थानान्तरित कराने का प्रयत्न किया जा सकता है।

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तलाक के अन्तिम होने के पहले सगाई किसी भी प्रकार उचित नहीं है।

April 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

गुरुमुख सिंह ने आगरा उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


क्या आपसी रजामंदी के तलाक मैं तलाक होने से पहले सगाई की जा सकती है?   हमें तलाक के लिए अर्जी दाखिल किये हुए करीब तीन महीने हो गए हैं और करीब तीन महीने बाद फिर हमारा तलाक होगा।


समाधान-

ह सही है कि सगाई के बारे में कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। लेकिन हमारी राय में सगाई भी वही कर सकता है जो कि विवाह करने की योग्यता रखता हो। जब तक तलाक की डिक्री पारित न हो जाए। यहाँ तक कि उस की अपील का समय व्यतीत न हो जाए तब तक सगाई भी नहीं करना चाहिए। क्यों कि सगाई विवाह करने का वादा है, लेकिन यह तभी किया जा सकता है जब विवाह की योग्यता हासिल हो जाए।

आप कल्पना करें कि आप की पत्नी तीन माह बाद जब न्यायालय में बयान होने वाले हैं उस दिन तलाक की सहमति से इन्कार कर दे। वह न्यायालय से कहे कि मुझे सोचने के लिए दो माह का अतिरिक्त समय चाहिए और न्यायालय समय दे दे। क्यों कि तीन माह बाद भी डिक्री तो तभी पारित हो सकेगी जब पति-पत्नी दोनों के बीच तलाक के मामले में सहमति बनी रहती है। ऐसी स्थिति जब आप सगाई कर लेते हैं तो जिस स्त्री से आप सगाई करते हैं उस स्त्री की सामाजिक स्थिति बहुत खराब हो जाएगी। यदि किसी कारण से तलाक में बाधा हो गयी और आप उस स्त्री से विवाह नहीं कर पाते हैं तो वह इस के लिए आप को दोष दे सकती है कि आप की वजह से उसे यह सब नुकसान उठाना पड़ा है। इस के लिए वह आप से क्षतिपूर्ति की मांग कर सकती है और इस के लिए वह वाद भी संस्थित कर सकती है और अपराधिक मुकदमा भी कायम हो सकता है।

हमारा अपना कहना यह है कि सगाई की रस्म अपने आप में गलत है। यदि स्त्री-पुरुष के बीच यह सहमति हो गयी है कि उन्हें विवाह कर लेना चाहिए। वे सारी बातों और शर्तों पर सहमत हो चुके हैं तो फिर सगाई बेमानी है सीधे विवाह ही कर लेना चाहिए। अब जब धीरे धीरे स्थितियाँ समाज में ऐसी बनने लगी हैं कि स्त्री-पुरुष विवाह के स्थान पर लिव इन पसंद करते हैं और इस तरह के लोगों की संख्या बढ़ रही है, सगाई की रस्म निरर्थक हो चुकी है उसे समाप्त हो जाना चाहिए। यह रस्म सुविधा पैदा करने के स्थान पर संकट अधिक उत्पन्न करती है। अनेक विवाहों में तो वह एकदम औपचारिक रस्म हो कर रह गयी है। विवाह की अंतिम रीति होने के केवल कुछ घंटों या एक दिन पहले होने लगी है। इस कारण इस प्रथा का अंत हो जाना चाहिए।

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प्रेम कोई अपराध नहीं, मन से हर तरह का भय निकाल दें।

April 7, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

संदीप ने उत्तम नगर,दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मेरा एक लड़की से रीलेशन था। वो मुझसे शादी भी करना चाहती थी। लेकिन उसके घर में मेरे बारे में पता लग गया और उसके मामा ने ओर माँ-बाप ने लड़की को डरा कर मुझ पर धारा 354 आईपीसी का मुकदमा दर्ज करवा दिया। क्योंकि हमारा रीलेशन इंटरकास्ट है ओर पुलिस भी उन्हीं का साथ दे रही है। जिस दिन एफआईआर हुई उस दिन भी बात हुई थी लेकिन शाम को ये जब हो गया,  मैं उनके घर पे शादी की बात करने गया।  उन्होने मुझे घर आने से पहले ये सब कर दिया। 2 महीने हो गये एफाईआर की कॉपी भी नहीं मिली थाने में जमानत हुई है। फोन भी जमा है।  लड़की वालों को जब थाने में उसके मेरे बारे में पूरा सच पता चला तो वो केस वापस लेने की कहने लगे। पुलिस वाले मुझे ही डरा रहे हैं। अब मैं क्या करूँ?

समाधान-

संदीप जी, सब से पहले तो आप डरना बंद कर दीजिए। आप ने लड़की से प्रेम किया है तो करते रहिए। पुलिस ने जब थाने में जमानत ले ली है तो अब वह अधिक से अधिक न्यायालय में आरोप पत्र प्रस्तुत करेगी। वहाँ भी आप की जमानत हो कर मुकदमा चलेगा। मुकदमा लड़िए, अच्छा वकील कीजिए। मुकदमा फर्जी है तो एक दिन खारिज हो जाएगा। आप का प्रेम देख कर हो सकता है लड़की को भी हिम्मत आ जाए और वह अदालत में सच बोले और कहे कि मैं तो संदीप से विवाह करना चाहती हूँ। लेकिन अन्तर्जातीय होने के कारण मेरे परिवार वालों ने मुझे धमका कर यह मुकदमा चलाया है। हो सकता है वह खुद अदालत से कहे कि वह अब अपने माता पिता के साथ नहीं आप के साथ विवाह कर के रहना चाहती है मुझे और संदीप को सुरक्षा प्रदान की जाए।

जो मैं ने बताया वह अच्छी वाली संभावनाएँ हैं। यदि लड़की को हिम्मत न आई तो  एक दिन यह मुकदमा खारिज हो जाएगा। लड़की का विवाह किसी दूसरे व्यक्ति के साथ हो जाएगा। आप उसे फिर भी प्रेमं करते रह सकते हैं। लेकिन इस का अर्थ यह नहीं कि आप किसी अन्य स्त्री से विवाह न करें, अपना घर न बसाएँ। बस आप के प्रेम में जो देह का मिलन था वही नहीं हो सकेगा। प्रेम में यह जरूरी भी नहीं। और यह भी किसी किताब में नहीं लिखा है कि एक व्यक्ति  किसी एक से ही प्रेम करे। प्रेम का अर्थ दैहिक संबंध नहीं है। अंत में एक बार और कहूंगा कि आप ने कोई अपराध नहीं किया है इस कारण किसी भी तरह का भय मन से निकाल दें और समस्या का मुकाबला करें।

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किसी भी पंजीयन के लिए झूठे तथ्यों का शपथ पत्र देना अपराध है।

April 3, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मुरारी ने रामगढ़ पचवाड़ा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


मेरा विवाह 2003 में हुआ था, 1989 जन्म तिथि है। तब में 14 वर्ष का था। तो क्या में 21 वर्ष 2010 में होने पर 21 वर्ष की डेट में विवाह पंजीयन करा सकता हूँ?  ये गलत होगा या सही? इससे पहले मेरे दो बच्चे भी हो गए अगर 2010 की डेट में करवाता हूँ तो शादी से पहले दो बच्चे नौकरी में अयोग्यता का आधार तो नही होंगे? उचित सलाह दें।


समाधान-

ब से बड़ी गलत बात तो यह है कि आप विवाह की एक ऐसी तारीख चुन रहे हैं जो सही नहीं है। जिस तिथि को आप का विवाह हुआ था उस के सिवा किसी भी अन्य तारीख का विवाह का पंजीयन कराना गलत होगा। क्यों कि इस के लिए आप झूठ बोलेंगे, झूठा शपथ पत्र देंगे जो अपराध होगा जिस के लिए आप को सजा हो सकती है। यदि नौकरी लग भी जाए तो इसी कारण छूट भी सकती है और आप को कारावास का दंड भी भुगतना पड़ सकता है।

यह सही है कि आप की शादी हुई तब आप नाबालिग थे, या विवाह की उम्र के नहीं थे। विवाह हुए 14 वर्ष से अधिक हो चुके हैं। यदि वह बाल विवाह किसी के लिए आप के व आप की माता की पत्नी का अपराध था भी तो अब इतना समय गुजर चुका है कि उस मामले में पुलिस या कोई भी उन के वि्रुद्ध कोई कार्यवाही नहीं कर सकता। इस कारण किसी का अपराध छुपाने के लिए झूठ बोलने की  जरूरत ही नहीं है और बोलते हैं तो अपराध छुपाना भी अपराध है। इस कारण से आप को झूठ नहीं बोलना चाहिए।

कोई भी हिन्दू विवाह यदि संपन्न हो जाता है तो वह गलत हो सकता है लेकिन समाप्त नहीं होता और वैध होता है। इस कारण कम उम्र में किया गया आप का विवाह पूरी तरह से वैध है और आप उस का पंजीयन करवा सकते हैं। मेरी राय में आप को विवाह का पंजीयन उसी तिथि का करवाना चाहिए जिस तिथि में आप का विवाह हुआ है। इस से आप को किसी तरह का कोई नुकसान नहीं होगा। यदि पंजीयक पंजीयन करने से  मना करे तो न्यायालय से पंजीयक के विरुद्ध घोषणा व आदेशात्मक व्यादेश का वाद प्रस्तुत कर डिक्री पारित कराई जा सकती है और पंजीयन करवाया जा सकता है।

 

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समस्या-

राकेश कुमार ने अलवर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी ओर मेरे भाई की शादी फऱवरी 2015 में हुई। शादी के 1 साल तक सही रहा।  इसके बाद हम दोनों भाई की उनसे बनी नहीं वो बिना बात पे ही हम से लड़ाई करती थी।  फिर वो दोनों चली गई, हम लेने गए तो दोनो नहीं आई।  बड़ी बहन गर्भ से थी। हम ने धारा 9 का केस डाल दिया। चार माह बाद जब डिलीवरी होने का टाइम आया तो उन्होने कहा कि इनको ले जाओ।  हम दोनों को ले आए। डिलीवरी के दो माह बाद छोटी बहन, मेरी घरवाली कहती है कि मुझे नहीं रहना तलाक चाहिए। हम ने उसको कई बार रहने को बोला लेकिन वो अपने माँ बाप के पास चली गई और उसके बाद उसने मुझे नोटरी करवा कर रुपए 100 के स्टांप पर तलाक़ दे दिया और बड़ी बहन अभी रह रही है, क्या ये तलाक़ मान्य है।

समाधान-

प खुद हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर चुके हैं। इस का अर्थ है कि आप हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होते हैं। इस अधिनियम में कोई भी तलाक केवल तभी मान्य होता है जब कि न्यायालय से डिक्री पारित हो जाए।

आप की पत्नी आप के साथ नहीं रहना चाहती है और उस ने 100 रुपए के स्टाम्प पर आप को तलाकनामा लिख भेजा है। यह अपने आप में क्रूरता पूर्ण व्यवहार है। आप इसी स्टाम्प के आधार पर तथा अन्य आधारों पर परिवार न्यायालय में तलाक की अर्जी प्रस्तुत कर सकते हैं। आप को तुरन्त कर ही देनी चाहिए। न्यायालय से डिक्री पारित होने और निर्धारित अवधि में उस की कोई अपील दाखिल न होने पर यह तलाक अन्तिम हो सकता है।

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समस्या-

हेमन्त प्रताप सिंह ने कानपुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 2014 में हुई थी, मेरी ससुराल वाले धनी परिवार से हैं। मैं एक प्राइवेट फर्म में काम करता हूँ। हमारे विचार एक दूसरे से कभी नहीं मिले। मेरा ससुराल पक्ष मेरे ऊपर दबाव डालता है कि आप अपने भाई से अलग रहो। छह छह माह एक दूसरे से दूर रहते हैं और मुझे कोई कमी भी महसूस नहीं होती। मेरा उन के साथ इंटीमेट होने का मन भी नहीं करता। मेरे मन में डाइवोर्स का ख्याल आया कि क्यों न हम कानूनी तौर पर अलग हो जाएँ। लेकिन घर वाले डरते हैं कि वे धनी लोग हैं हमें दहेज एक्ट में फँसा देंगे। मेरा मार्गदर्शन करें।

समाधान-

मुझे नहीं लगता कि आप के बीच कोई बड़ी समस्या है। आप ने यह तो बताया कि ससुराल पक्ष आप पर दबाव डालता है कि आप भाई से अलग रहें। लेकिन आप ने यह नहीं बताया कि जब वे यह बात करते हैं तो क्या तर्क देते हैं कि भाई से अलग क्यों रहना चाहिए। वे कुछ तो कहते होंगे कि भाई के साथ रहने में फलाँ बुराई है और इस कारण से अलग होना चाहिए। हो सकता है उन की इस बात के पीछे कोई गंभीर वजह हो। आप को अपने ससुराल पक्ष से पूछना चाहिए कि इस का कारण क्या है। यदि कारण पता लग जाए और वह वाजिब हो तो आप को उस कारण को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि कारण ऐसा है कि उसे दूर करना संभव नहीं हो तो ससुराल पक्ष का सुझाव स्वीकार कर लेना चाहिए।

ऐसा तो अक्सर होता है कि पति पत्नी के बीच के विचारों में पर्याप्त अंतर हो। लेकिन उस के बाद भी वे साथ रहते हैं। यह सब आपसी समझदारी से होता है। आप दोनों भी इस तरह अपने बीच आपसी समझदारी विकसित कर सकते हैं।  जो कि समय के साथ हो जाती है। यदि छह माह दूर रहने पर भी आप को कोई कमी महसूस नहीं होती, पत्नी के साथ इंटीमेट होने का मन नहीं होता तो यह आप के अंदर किसी तरह की हार्मोनल गड़बड़ी के कारण भी हो सकता है और यह अन्य कोई यौन समस्या भी हो सकती है। आप को चाहिए कि इस संबंध में किसी अच्छे मनोचिकित्सक से मिलें वह आप की समझाइश कर के तथा कुछ दवाएँ आदि दे कर आप के अंदर की इस उदासीनता को समाप्त कर सकता है।

यदि इन सब के बाद भी आप समझते हैं कि आप दोनों को अलग होना ही अच्छा हल है तो इस संबंध में खुल कर अपनी पत्नी से बात करें। उसे सारी समस्या बताएँ। हो सकता है आप की पत्नी इस समस्या का कोई अच्छा हल सुझा सके। हो सकता है वह भी इस समस्या को समझ कर आप से अलग होने को तैयार हो जाए। यदि ऐसा होता है तो सहमति से तलाक की अर्जी न्यायालय में दाखिल की जा सकती है। आप को यह भी सोचना चाहिए कि तलाक अपने आप में अनेक नई समस्याएँ खड़ी करता है। आप सोचें कि क्या क्या समस्याएँ तलाक से उत्पन्न होंगी और उन से कैसे निपटा जाएगा। आप यह भी सोचें कि आप के तलाक देने से आप की पत्नी के जीवन में क्या समस्याएँ पैदा होंगी और उन का क्या हल निकल सकता है।

मेरे विचार में आप और आप की पत्नी के बीच कोई बड़ी समस्या नहीं है जिसे किसी तरीके से हल न किया जा सके। इस कारण आप को इस मामूली समस्या को हल करना चाहिए। विवाहित जीवन मे डाइवोर्स तो अंतिम हल होता है इस कारण आप को फिलहाल डाइवोर्स का विचार त्याग देना चाहिए।

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समस्या-

रणधीर सिंह ने गोरखपुर, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम रणधीर है और मैं एक प्राइवेट जॉब करता हूँ। मेरी पत्नी सरकारी टीचर है हमारी शादी 20/05/2013 को हुई थी। हमारा एक ११ माह का बेटा भी है जिसे वो अपना साथ लेकर ८ माह से अपने मायके में रह रही है। शादी के बाद से ही उसका व्यवहार मेरे और मेरे घर वालो के प्रति ठीक नहीं था। शादी के १५ दिन बाद जब वो अपने घर गई और बाद में जब मैंने उसे आने के लिए कहा तो उसने मना कर दिया । उस ने कहा कि जब आना होगा तो बता देंगे। फिर कुछ दिन बाद जब मैं उसके घर जा के बात किया तो वो आयी। कुछ दिन तक ऐसे ही चलता रहा वो हमेशा अपने घर चली जाती है और बार बार कहने पर ही आती है। जब वो मेरे घर पे रहते तो उसके घर से किसी न किसी बहाने लोग लेने चले आते थे जिस वजह से हम में कई बार झगड़ा भी हो जाता था। उसने बिना हमें बताये बच्चे का मुंडन करा दिया है। जब इस बात को ले कर हमारा झगड़ा हो गया जिसके बाद से वो और उसके भाई मुझे बच्चे से नहीं मिलने दे रहे हैं। जब मैं बच्चे से मिलने के लिए जाता हूँ तो वो गाली गलौज करते हैं और बच्चे को कमरे में बंद कर देते हैं। वे धमकी देते हैं कि वो मुझ पे पुलिस केस कर देंगे। अभी मैंने 20/11/2016 को हिन्दू विवाह अधिनियम से विदाई का दावा किया है जिसकी तारीख  03/02/2017 को है। मैं ये जानना चाहता हूँ कि मैं अपने बच्चे से मिलने के लिए क्या कर सकता हूँ? जिससे मैं अपने बच्चे से कुछ समय के लिए मिल सकूँ? और यदि वो हम पे 498 और घरेलू हिंसा का केस करती है और हम उस से बरी हो जाते है तो मैं उस पे आपराधिक मानहानि का केस कर सकता हूँ या नहीं?

समाधान-

आप के मामले में सारा झगड़ा बराबरी के व्यवहार का प्रतीत होता है। आप की पत्नी स्वावलंबी है और आप से ही नहीं आप के परिवार के लोगों से भी समानता का व्यवहार चाहती है। लेकिन आप के पारिवारिक सेटअप में वह संभव प्रतीत नहीं हो रहा है। यदि आप और आप का परिवार समान व्यवहार की बात को स्वीकार कर ले तो आप दोनों के बीच की समस्या हल हो सकती है अन्यथा आप के पास विवाह विच्छेद का ही मार्ग रह जाएगा।

आप ने धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत प्रकरण प्रस्तुत कर दिया है। इस कारण से आप को अधिकार है कि आप बच्चे की कस्टडी और उस से मिलने के लिए समय और तरीका निर्धारित करने हेतु न्यायालय में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 26 के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

यदि आप के विरुद्ध आप की पत्नी घरेलू हिंसा में कोई आवेदन प्रस्तुत करती है और वह मिथ्या सिद्ध होता है तो आप उस के विरुद्ध अपराधिक मानहानि का मुकदमा कर सकते हैं साथ ही आप दुर्भावना पूर्ण अभियोजन के लिए वाद प्रस्तुत कर हर्जाने की मांग भी कर सकते हैं।

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rp_CUSTODY-OF-CHILD-254x300.jpgसमस्या-

धीरज मिश्रा ने उत्तर प्रदेश के गाँव-बहेड़वा, पोस्ट-मिर्जामुराद, जिला-वाराणसी से पूछा है-

मेरे बेटे आर्यन से स्कूल में मिलने पर उसकी नानी चंदा देवी ने स्कूल के प्रबंधक को लिखकर रोक लगा रखा है।  परंतु मैं अपने बेटे से स्कूल में मिलने का अधिकार चाहता हूँ ताकि उसकी काउंसलिंग करवा सकूँ।  कृपया उचित सलाह दें।

समाधान-

र पिता अपने पुत्र का नैसर्गिक संरक्षक है और उसे अपने पुत्र से मिलने का अधिकार है। यदि आप के पुत्र का स्कूल प्रबंधन आप को अपने पुत्र से मिलने नहीं दे रहा है तो आप स्कूल को लीगल नोटिस दे सकते हैं और कह सकते हैं कि स्कूल प्रबंधन इस तरह गलती कर रहा है।

यदि स्कूल नोटिस के बाद भी पुत्र से मिलने नहीं देता है तो आप स्कूल प्रबंधन के विरुद्ध दीवानी वाद प्रस्तुत कर के न्यायालय से स्थायी व्यादेश जारी करवा सकते हैं।

यदि आप के और आप की पत्नी के बीच किसी तरह का विवाद है और परिवार न्यायालय में हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत किसी तरह का मुकदमा चल रहा है तो आप हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 26 के अन्तर्गत इस तरह का आदेश उसी न्यायालय से प्राप्त कर सकते हैं जहाँ यह मुकदमा चल रहा है।

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संदेह करने के स्थान पर सीधे पत्नी से बात करें।

November 30, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_love2.jpgसमस्या-

राहुल ने केरल से अपनी उत्तर प्रदेश की समस्या लिखी है-

मैं उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ और केन्द्रीय सरकार की नौकरी में हूँ। मेरे विवाह को 14 वर्ष हो गए हैं। मेरे 8 साल का एक पुत्र है। मेरी समस्या यह है की मेरी बीबी जो कि ज़्यादातर अपने मायके में ही रहती है। जब मैं लीव में होता हूँ तभी मेरे घर पर आती है और मेरे ड्यूटी आने पर कोई न कोई बहाना बना कर फिर मायके चली जाती है शुरू में तो हम लोगों ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया लेकिन अभी कुछ दिनों पहले पता चला कि वह किसी से बात करती है और उसके साथ घूमती है, जिससे मुझे बहुत तकलीफ़ हुई और मैं ने कई दिनों तक खाना नहीं खाया। मैं बहुत परेशान रहता हूँ।मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि क्या करूँ। क्या मुझे उससे तलाक़ मिल सकता है और यदि मुझे उसको गुज़ारा भत्ता देना पड़ा तो वो कितना होगा? या फिर मुझे क्या करना चाहिए कोई अच्छी सलाह बताएँ मैं उस को छोड़ना नहीं चाहता हूं लेकिन कहीं वह फिर से दुबारा उस से बातें करने लगे तो क्या होगा?

समाधान-

प के मामले में तलाक जैसा कुछ भी नहीं है। न तो तलाक का कोई आधार उत्पन्न हुआ है और न ही ऐसी कोई बात जिस से पत्नी से आप को किसी प्रकार की नाराजगी हो।  आप नौकरी पर चले जाते हैं उस के बाद पत्नी आप के घर रहे या फिर उस के पिता के यहाँ इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पत्नी ने विवाह की शर्तों का कहीं भी उल्लंघन किया हो ऐसा कोई तथ्य आप की समस्या में नहीं है।

आप एक लंबे समय तक बाहर रहते हैं। पत्नी अपने मायके चली जाती है तो इस में तो कोई दोष नहीं है। वहाँ वह किसी पुरुष से मिलती है उस के साथ बाहर आती जाती है।  उस के साथ फोन आदि पर बात भी करती है तो यह तो हर नागरिक का अधिकार है। कोई भी कैसे किसी को इस अधिकार से वंचित कर सकता है?

मुझे तो लगता है कि समस्या की जड़ आप के विचारों में है। आप को लगता है कि एक पत्नी को ऐसा नहीं करना चाहिए। जब वह ऐसा करती है तो आप को धक्का लगता है और आप परेशान होने लगते हैं। सब से पहले तो आप को अपने आप को समझाना चाहिए कि आप जो शक कर रहे हैं वह गलत है। फिर भी निवारण न हो तो पत्नी के साथ इस विषय पर खुल कर बात करें। यदि वह व्यक्ति आप की पत्नी का शुभचिंतक है तो उसे आप का भी शुभचिंतक होना चाहिए। आप पत्नी से कहें कि यदि वह उस का दोस्त है तो उस से परिचय प्राप्त करने का उसे भी हक है वह उस से आप को मिलाए। आप भी उस से बात करें और पत्नी व अन्य पुरूष के संबंध को बिना किसी शक और शुबहे के समझने की कोशिश करें। फिर यदि कहीं लगता है कि इस संबंध में कुछ बुराई है तो पत्नी से बातचीत कर के उस समस्या का हल निकालें। इस तरह शक के आधार पर तलाक की सोचना और उस समस्या पर पत्नी से बात न करना उचित नहीं है। हमारी समझ में तो आप खुद पत्नी से अपनी समस्या पर बात करेंगे तो आप की समस्या खुद हल हो लेगी।

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