Marriage Archive

आप घरेलू हिंसा अधिनियम में कार्यवाही कर सकती हैं।

June 22, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नेहा सक्सेना ने बरेली, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 14 एप्रिल 2015 में हुई है और मेरी 14 माह की एक बेटी है।  मेरे पति बरेली के अच्छे सीबीएसई पैटर्न स्कूल में टीचर हैं और मैं भी टीचिंग जॉब में ही हूँ। मेरी शादी के दूसरे माह से ही प्रॉब्लम्स स्टार्ट हो गई थी। मेरे पति मेरी मदर-इन-लॉ की हर बात मानते हैं, यहाँ तक कि हमारे पर्सनल रिलेशन्स कैसे रहेंगे ये भी वही डिसाइड करती है। शादी के पहले से ही मेरी ननद जो कि शादीशुदा है और उस के दो बच्चे हैं रोज़ सुबह मेरे घर आ जाती है और शाम को 8-9 बजे तक वापस जाती है। बेटी होने वाली थी तब भी मेरी सास ननद और पति ने मुझे बहुत टॉर्चर किया इतना कि मैं अपने मायके वापस आ गयी। लगभग 3-4 माह मैं मायके रही तब भी मेरे पति ने मुझे ले जाने की कोई कोशिश नहीं की तब मेरे पक्ष के लोगों ने पंचायत बैठा कर मुझे ससुराल भेजा। अब फिर वही परिस्थिति है और अब मेरी सास सभी से ये कह रही है कि मैं इस को किसी भी कीमत पर अपने बेटे के साथ नहीं रहने दूँगी क्यूंकि मैंने अपनी ननद के रोज़ आने पर आपत्ति  उठाई थी। मेरे पति हमेशा की तरह अपने घरवालों के साथ हैं। मैं अपनी बेटी के साथ मायके में हूँ और पति से किसी तरह का कोई सम्पर्क नहीं है। मैं अपने पति के साथ ही रहना चाहती हूँ लेकिन सास ननद और पति के टोर्चर के साथ नहीं। इसकी वजह से ही पुलिस में अभी तक कोई कंप्लेंट  नहीं की है। मैं जानना चाहती हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए।. क्या मैं पति से क़ानूनी तौर पर पेरेंट्स से अलग होने की माँग कर सकती हूँ? क्या मैं अपने ससुराल मे ननद के रोज़ रोज़ आने पर रोक लगाने के लिए कोई कानूनी कार्यवाही कर सकती हूँ? साथ ही मेरे पति मुझे खर्च के लिए कुछ नहीं देते तो साथ रहते हुए क्या क़ानूनी तौर पर पति से अपने और बेटी के खर्च के लिए डिमांड कर सकती हूँ? मैं परेशानी में हूँ, मुझे सही रास्ता सुझाएँ। मायके से कोई भी सपोर्ट नहीं है, पिता की मृत्यु हो चुकी है बस मम्मी और छोटी बहिन है।

समाधान-

ति पत्नी का रिश्ता ऐसा है कि वह दोनों के चलाने से चलता है। कानून के हस्तक्षेप से उस में बहुत मामूली सुधार संभव है, अधिक नहीं। मामला अधिक गंभीर होने पर तलाक के सिवा कोई चारा नहीं रहता है।  पूरी कहानी में आप के पति आप के साथ खड़े कभी नहीं दिखाई देते हैं। जब कि ननद का अपना घर है और माताजी के सिवा कोई अन्य दायित्व उन पर नहीं है। लेकिन जैसी उन का स्वभाव है वे अपनी माँ और बहिन के विरुद्ध कुछ नहीं बोलेंगे और आप को अभी भी वे अपना नहीं पराये परिवार का प्राणी समझते हैं। जब तक पति स्वयं आप के साथ माँ और बहिन के सामने नहीं खड़े होते आप का ससुराल जा कर रहना मुनासिब नहीं वर्ना वही पुरानी स्थितियाँ झेलनी पड़ेगी।

आप के साथ जो व्यवहार हुआ है वह घरेलू हिंसा है और आप घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं। आप इस अधिनियम में अलग आवास की सुविधा की मांग कर सकती हैं, आप अपने लिए और अपनी बेटी के लिए खर्चे की मांग कर सकती हैं। हमारा सुझाव है कि पहले आप इस अधिनियम के अंतर्गत इन दोनों राहतों के लिए आवेदन करें। आप खुद कमाती हैं, हो सकता है आप की कमाई बहुत कम हो लेकिन फिर भी मितव्ययता बरतते हुए माँ और बहिन के साथ रहते हुए अपने आत्मसम्मान को बनाए रख सकती हैं। इस अधिनियम में न्यायालय अंतरिम राहत भी प्रदान कर सकता है। जिस से आप को एक राशि हर माह मिलना आरंभ हो सकती है। जब तक खुद आप के पति अपने साथ रहने को नहीं बोलें और माँ, बहिन की क्रूरता के विरुद्ध आप के साथ खड़े होने तथा खुद क्रूरता करने का वादा न करें तब तक आप को उन के साथ जा कर नहीं रहना चाहिए। जरूरी होने पर पुलिस में 498ए के अंतर्गत रिपोर्ट करायी जा सकती है। अभी इतना करें। फिर प्रतिक्रिया देखें और आगे की कार्यवाही तय करें।

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आप क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकती हैं।

June 20, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

सुशीला ने पोकरण, जैसलमेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति का व्यवहार मेरे और मेरे पैतृक परिवार के प्रति अच्छा नहीं है। जिस के कारण अब मैं मैं मानसिक रूप से बीमार हूँ। मेरे पति मेरे इलाज के लिए कुछ नहीं करते। मैं इस से परेशान हो कर अपने मायके आ गयी हूँ। अब मेरा पति मुझे और मेरे मायके के परिजनों को फोन कर के धमकियाँ दे रहा है वह मेरे रिश्तेदारों और जाति के लोगों को मेरे बारे में गलत बातें लिख कर मैसेज कर रहा है। जिस से मैं  वापस उस के पास जा कर रहने लगूँ। लेकिन मैं वापस नहीं जाना चाहती और तलाक लेना चाहती हूँ। मुझे बताएँ मैं तलाक कैसे ले सकती हूँ।

समाधान-

प के पति का व्यवहार आप के प्रति क्रूरता पूर्ण है, बीमार पत्नी का इलाज नहीं कराना और उसे बुरा भला कहना क्रूरता है। इस कारण आप का मायके आना पूरी तरह जायज था। उस के बाद उस का धमकियाँ देना और लोगों को आप को बदनाम करने वाले फोन मैसेज भेजना क्रूरता की इन्तेहा है। आप क्रूरता के इस आधार पर तलाक के लिए अर्जी उस जिले के परिवार न्यायालय मे प्रस्तुत कर सकती हैं जिस जिले में आप के विवाह की रस्म संपन्न हुई थी अथवा जिस जिले में आप अपने पति के साथ अन्तिम बार निवास कर रही थी।

इस के अतिरिक्त आप अपने स्त्री-धन की मांग अपने पति से कर सकती हैं नहीं देने पर यह धारा 406 आईपीसी का अपराध होगा। क्रूरता कर के और आप का इलाज न करा के वह धारा 498ए आईपीसी का अपराध कर ही चुका है। आप इन दोनों धाराओँ के अन्तर्गत पुलिस में रिपोर्ट कराएँ, यदि पुलिस कार्यवाही न करे तो एसपी को शिकायत करें और फिर भी कार्यवाही न होने पर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में इस संबंध में परिवाद प्रस्तुत करें। इस के अलावा आप अपने लिए भऱण पोषण का खर्चा प्राप्त करने के लिए धारा 125 दं.प्र.संहिता और महिलओँ के प्रति घरेलू हिंसा का प्रतिषेध अधिनियम के अंतर्गत कार्यवाही कर सकती हैं।

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परित्याग व अन्य आधारों पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें।

June 19, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मनोज ने भोपाल, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे मित्र का विवाह 30 अप्रेल 2005 को चित्तौड़गढ़ राजस्थान में हुआ था। मित्र मध्य प्रदेश का है, बारात राजस्थान गई थी। उसकी पत्नी 2006 में बिना कारण उसे छोड़ के अपने मायके चली गई। मेरे मित्र ने वहाँ जाकर उसे समझाने का बहुत प्रयास किया, पर वह अपनी ज़िद्द पर अड़ी रही। उसकी ज़िद्द थी कि वह घर दामाद बनकर रहे। पर मेरा मित्र ये बात नही माना, क्योंकि वह सेना में सेवारत है और उसके भी मां, बाप, बहन है जिसकी जिम्मेदारी उस पर है। इसी बीच 2007 में मेरे मित्र का एक बेबी हो गया अब बच्चा होने के बाद मेरे मित्र के सास, ससुर, साला बच्चे से मिलने नहीँ देते थे। पर उसने बार बार मिलने का प्रयास किया पर उसे  मिलने नही दिया जाता, जब वह छुट्टियां खत्म होने के बाद वह सेना में बापिस आ जाता। इसी बीच उसकी पत्नी ने 2010 में भाग कर रायपुर छत्तीसगढ़ में एक युवक से विवाह कर लिया। पर मेरे मित्र को मालूम नहीं चला। जब वह 6 माह में छुट्टी ले के जाता तो उसे ये कहा कर लौटा देते कि वह नही मिलना चाहती और वह जॉब करने लगी है। ये सिलसिला चलता रहा जब मित्र ने वहाँ के थाने में रिपोर्ट दर्ज करने गया तो वहाँ के एसएचओ ने रिपोर्ट दर्ज नही की। वह बोला वह जॉब करती है उसे परेशान मत करो नहीं उसकी कंप्लेन में बंद हो जाओगे और कोई छुड़ाने नहीं आएगा, और army की नौकरी चली जायेगी। वह वापिस गया अभी मई 2017 में उसे मालूम पड़ा कि उसने दूसरा विवाह कर लिया है। रायपुर में किसी अजय नाम के व्यक्ति से और मित्र के बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट में दूसरे पति अजय का नाम डलवा दिया है। मित्र का लड़का 5वीं में पढ़ता है और उन दोनो का रायपुर में वोटर आई डी बना हुआ है जो कि वोटर लिस्ट में है, और उन दोनों के कुछ फोटो मिले है गले मे हाथ डाले हुए और मांग में सिन्दूर है। उधर पुछा गया तो मालूम पड़ा कि उन दोनों ने प्रेम विवाह किया है। आप बताइए कि मेरा मित्र क्या करे? जिससे उसकी समस्या हल होजाये उन दोनों को सबक सिखाया जाए उसे सजा मिल सके साथ मे मित्र का बच्चा भी मिल जाये मित्र की पत्नी के दूसरी शादी का बस फ़ोटो और वोटर लिस्ट का सबूत है इन के आधार पर क्या कार्यवाही करें?

समाधान-

प के मित्र की पत्नी को छोड़ कर गए हुए 11 वर्ष हो चुके हैं और आप के मित्र ने अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की है। 11 वर्ष से आप के मित्र की पत्नी अलग रहती है और उस ने घर भी बसा लिया है। आप का मित्र चाहता तो अभी तक परित्याग के आधार पर तलाक ले सकता था।  देरी से न्यायालय तक जाने पर राहत मिलना कठिन होता है। अब भी आप के मित्र को सभी संभव आधारों पर तलाक के लिए आवेदन करना चाहिए।

आप का मित्र फौज में है, केवल अवकाश में घर आता है। एक लंबे समय तक उस की पत्नी को अकेले उस के ससुराल में रहना होता था। जब पत्नी को अकेले ही रहना होता था तो वह आप के मित्र के परिवार के साथ क्यों रहती? अपने मायके में क्यों नहीं। यही दोनों के बीच विवाद है।

मित्र की पत्नी सैटल हो चुकी है। बच्चा अब तक उस के साथ रहा है, वह अपने पिता को नहीं जानता या पिता के रूप में किसी दूसरे व्यक्ति को जानता है। ऐसी स्थिति में बच्चे की कस्टडी मिलना कठिन है जब कि आप का मित्र खुद फौज में रहता है।

आप के मित्र को पत्नी के विरुद्ध तलाक की और बच्चे की कस्टडी का मुकदमा करना चाहिए। इन मुकदमों के दौरान अदालत दोनों के बीच राजीनामा कराने की कोशिश करेगी। दोनों का साथ रहना तो मुमकिन नहीं फिर भी जो भी आपसी रजामंदी से हो सके वह करना चाहिए। कम से कम तलाक ले लेना चाहिए जिस से आप का मित्र दूसरा विवाह कर सके। पत्नी को सबक सिखाने की बात मन से निकाल दें। कानूनी स्थिति जो भी है वह ऐसी है कि सबक सिखाने के चक्कर में आप के मित्र ही कहीं चकरी न हो जाएँ।

 

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जो भी करें पत्नी को विश्वास में ले कर करें।

June 1, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मनीश ने मरु मंदिर, सीकर, राजस्थान  से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी जनवरी 2015 में हुई और मुझे एक 9 महीने की बच्ची भी है। मेरी पत्नी मार्च से अपने पीहर में है। उस का ओर मेरा रिश्ता अच्छा नहीं चल रहा है। उससे मेरी बात होती है, वो मेरे परिवार से खुश नहीं है वो कहती है कि मेरी माँ और बहन उसके घर वालों के नाम से उसे गालियां देते हैं और उनकी वजह से वह परेशान है। उसके पिताजी मुझे धमकियाँ दे रहे हैं कि वो मेरे परिवार सहित मुझे जेल में डलवा देंगे। लेकिन चार महीने बाद क्योकि उनके लड़के की शादी होने के बाद अब उसके मामाजी का कॉल आया है कि उसे जाकर ले आऊँ। तो में किसी भी कानूनी समस्या में तो न फंस जाऊंगा? कहीं उसे लेकर आने के बाद ओर कोई समस्या हो जाये और परिवार किसी मुसीबत न फंस जाए कोई तरीका बताएँ कि अब उसे लेकर आना चाहिये या नहीं। अगर लेकर आऊँ तो फिर वो क्या कर सकते हैं मेरे ओर परिवार के साथ किस तरीके से मैं बच सकता हूँ?

समाधान-

प की पत्नी की शिकायत की ओर आप को ध्यान देना चाहिए। यदि किसी स्त्री को उस के माता पिता को गालियाँ देते हुए अक्सर सास ननद प्रताड़ित करें तो यह तो कोई भी स्त्री सहन नहीं कर सकती। यदि आप की पत्नी की बात सही है जिस का पता आप सहज ही लगा सकते हैं तो आप को अपने परिवार में अपनी पत्नी की तरफदारी करते हुए बात करनी चाहिए कि ऐसा गलत व्यवहार आप अपनी पत्नी के साथ सहन नहीं करेंगे। यह अच्छी बात है कि पत्नी के साथ आप की बातचीत है। इस का अर्थ यह भी है कि वह सच बोल रही है। आप को अपनी पत्नी को आश्वस्त करना चाहिए कि उस के साथ ऐसा व्यवहार अब नहीं होगा। यदि होता है तो हम अलग रहेंगे।

आप को चाहिए कि आप पत्नी से बात करें। उस के आश्वस्त होने पर ही उसे ले कर आएँ। यदि आप अपनी पत्नी में विश्वास पैदा कर पाते हैं और प्रताड़ना के विरुद्ध उस का साथ देते हैं तो पत्नी भी आप के साथ खड़ी हो जाएगी। यदि पत्नी आप के विरुद्ध कुछ नहीं करती है तो उस के परिजन भी आपके विरुद्ध कुछ नहीं कर पाएंगे। इस कारण सब से पहले आप स्वयं अपने और अपनी पत्नी के बीच आपसी विश्वास अर्जित करें। इस के लिए आप को कई बार आप की ससुराल जाना पड़े तो भी जाइए।

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समस्या-

रवि ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-


मेरा भाई और उसकी पत्नी शादी के 3 महीने बाद से ही घर से अलग रह रहे हैं। उनका आपस मे कोई विवाद हुआ और फिर 498/ 406 125 498और 406 में अभी कोर्ट में नहीं लगा है, एफआर्ईआर  हुए 2 साल हो गए हैं।  गुजारा भत्ता का केस कोर्ट में है जिस में 2500 प्रति माह खर्च देना होगा और पिछले 32000 भी। भाई हिप जुआइन्ट की बीमारी के कारण कुछ काम नहीं कर पाता, उसका खर्च भी दोस्त मिल कर उठाते हैं।  गुज़ारा भत्ता न देने पर कोर्ट ने 30 दिन का समय दिया है, नहीं तो कुर्की की कार्यवाही की जाएगी। भाई के पास कोई सम्पत्ति नहीं है। वह किराये के मकान में रहता है।  क्या कुर्की में माता पिता या भाई की सम्पत्ति को भी जप्त किया जा सकता है क्या?


समाधान-

त्नी का भरण पोषण करने की जिम्मेदारी पति की है न कि पति के रिश्तेदारों की। यह जिम्मेदारी भी पति की वर्तमान आय और संपत्ति पर  निर्भर करती है। यदि इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने आदेश नहीं दिया है तो उस आदेश के विरुद्ध अपील या रिविजन करना चाहिए और वसूली पर स्थगन प्राप्त करना चाहिए। यह तभी संभव हो सकता है जब संपत्ति और वर्तमान आय तथा शारीरिक स्थिति के संबंध में दस्तावेजी सबूत अपील या रिविजन कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए जाएँ।

जहाँ तक वसूली के लिए संपत्ति को कुर्क करने का प्रश्न है तो केवल पति की या उस की साझेदारी वाली किसी संपत्ति को ही कुर्क किया जा सकता है, अन्य किसी संपत्ति को नहीं। यदि किसी गलत फहमी के अंतर्गत किसी अन्य संपत्ति को कुर्क किया भी जाए तो उस संपत्ति का स्वामी संबंधित न्यायालय में अपनी आपत्तियाँ प्रस्तुत कर सकता है।

 

 

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समस्या-

मितेश पालीवाल ने नाथद्वारा, जिला राजसमन्द , राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


मेरी शादी 5 साल पूर्व हिन्दू रीती से हुई थी। हम दोनों ने शादी से पूर्व b.ed. की थी। मेरे एक लड़का भी है जिसे मेरी पत्नी मुझे देना नहीं चाहती क्योंकि मेरी पत्नी मुझसे सिर्फ सरकारी नौकरी पाने के इरादे से मुझसे तलाक चाहती है। मेरे द्वारा मना करने पर उसने मेरे व मेरे परिवार पर दहेज़, महिला उत्पीडन, मेन्टेनेंस आदि केस कर दिए हैं कोर्ट ने 4000 की डिग्री भी कर दी है। मेरी पत्नी ने RPSC सेकण्ड ग्रैड में ऑनलाइन आवेदन भी कर दिया है। जिसमें उसने अपने आप को तलाकशुदा बताया है।  उसका कहना है कि जब तक rpsc का exam होगा तब तक तो वो मुझ से तलाक भी ले लेगी,  मेने उस तलाक के फॉर्म को ऑनलाइन निकाल कर कोर्ट में पेश कर दिया है कोर्ट ने भी उसे गलत माना। साथ ही उसे आगे से एसा नहीं करने की नसीहत दी। श्रीमान मेरी पत्नी व सास-ससुर लालची प्रवृत्ति के हैं,  ये सब मुझसे पैसों की डिमांड करते रहते हैं।   मेरा सवाल है की मेरी पत्नी ने तलाक नहीं होने के बावजूद rpsc में तलाकशुदा का आवेदन किया है क्या यह गैरक़ानूनी है। अगर है तो किस धारा के अंतर्गत साथ ही और कोई उपाय हो तो अवगत करावे। मैं अपनी बात को मिडिया में भी बताना चाहता हूँ।

समाधान-

प की पत्नी नौकरी करना चाहती है और आत्मनिर्भर बनना चाहती है, यह एक अच्छी बात है। पर उस ने नौकरी पाने के लिए जो कदम उठाया है खुद को तलाकशुदा बता कर, वह गलत है और इस तरह वह नौकरी प्राप्त करती है तो वह धारा 420 आईपीसी का अपराध होगा। इस से प्राप्त की हुई नौकरी भी जा सकती है और उस पर अपराधिक मुकदमा चलाया जा कर उसे कारावास के दंड से दंडित भी किया जा सकता है।

मुझे नहीं लगता कि आप की पत्नी ने आप का घर छोड़ा है वह केवल इस कारण छोड़ा है कि वह तलाक की डिक्री प्राप्त कर नौकरी कर सके। लगता है यह योजना बाद में दिमाग में आई हो। आप के बीच विवाद का कारण कुछ और है जो आप यहां बताना नहीं चाहते। मीडिया में इस तथ्य को उजागर करना आप के लिए ठीक नहीं होगा। आप उस के पति हैं और यह पूरी तरह दुर्भावनापूर्ण होगा। मेरे  विचार से आप को अपनी पत्नी को ऐसा गलत कदम उठाने से रोकना चाहिए। जब तक वाकई तलाक नहीं  हो जाता है तब तक आप की ओर से कोई कदम ऐसा नहीं उठाया जाना चाहिए जो पत्नी के प्रति दुर्भावना को व्यक्त करता हो।

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मिथ्या प्रकरणों के आधार का उपयोग करने में जल्दबाजी न करें।

May 7, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

रवि ने जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी जनवरी 2015 मे हुई थी, जुलाई 2016 में मुझे उसके प्रेम प्रसंग के बारे मे पता चला, जो शादी से पहले से ही था। लड़का उसकी भाभी का चचेरा भाई है। 9 अगस्त 2016 को लड़की के घर वाले लड़की को ले गये।  23 अगस्त 2016 को मेने अवैध संबंध के आधार तलाक का केस कर दिया। उसके कुछ दिन बाद मुझे पता चला कि लड़की वालों ने मुझपर और मेरे परिवार पर झूठा 498ए का दहेज का केस कर दिया है।  7 सितम्बर 2016 को पुलिस ने समझाइश को बुलाया, उस दिन दोनों परिवारों की पंचायत हुई, उस दिन 1150000 रुपये, 14 सितम्बर तक पंचो को देने की बात हुई तथा केस वापसी व तलाक की बात मौखिक रूप से तय हुई।  7 सितम्बर 2016 को एक स्टाम्प दहेज केस में कार्रवाई न करवाने बाबत दिया, हमने कुछ दिन बाद पंचो को रूपए दे दिए।  इसके कुछ दिन बाद जिस पंच के पास रूपए जमा थे उसने लड़की वालो को पैसे दे दिए, और उसने लड़की के बाप से एक स्टाम्प लिखवा लिया कि इस 1150000 रूपए मैंने प्राप्त कर लिए हैं, जो परिवार, समाज कहेगा वो मेैं करुंगा।  लड़की वालों ने उसके बाद झूठे 498ए, 406, व 125 के केस दर्ज करवा दिए। वो पंच गवाही देने को पुलिस स्टेशन नहीं आया।  दहेज केस मे पुलिस ने मुझे मुलजिम बनाया।  दहेज केस में मुझे जमानत मिल गई। उसके बाद लड़की वालों ने लड़की के द्वारा दिसम्बर 2016 के लास्ट वीक मे मेरे छोटे भाई पर बलात्कार (अक्टूबर 2015 में ) का झूठा केस व मेरी मम्मी, मुझ पर सबूत मिटने का झूठा केस कोर्ट के जरिये दर्ज करवा दिया। मार्च 2017 मे 376 केस को पुलिस झूठा केस मानकर कोर्ट मे अपनी जाँच रिपोर्ट दे दी।  लड़की वालों की सभी को मुलजिम बनाने की 190 की एप्लीकेशन निरस्त कर दी।

१. क्या मैं 376 के झूठे केस के आधार पर तलाक पा सकता हूँ, तो उसका क्या प्रोसेस है? २. 125 का केस तो झूठा है क्युँकि हमने तो पहले ही 1150000 रूपए दे चुके हैं। तो इस में हमको क्या करना चाहिए, कैसे उन पंचो को अदालत मे बुलायें?  ३. 376 case में मानहानि का क्या प्रोसेस है और इसके साथ और क्या क्या किया जा सकता है? इसमें ४. 498a मे 190 की एप्लीकेशन निरस्त होने का तलाक के केस में कोई यूज़ है क्या?


समाधान-

प ने जारता के आधार पर विवाह विच्छेद का मुकदमा पत्नी के विरुद्ध किया है। विवाह के पूर्व क्या संबंध स्त्री के किसी पुरुष से थे इस से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह तलाक का आधार नहीं हो सकता। जारता के लिए आप को प्रमाणित करना होगा कि विवाह के उपरान्त आप की पत्नी ने किसी अन्य पुरुष से यौन संबंध स्थापित किया है। इसे साबित करना आसान नहीं होता।

पहले 498ए में केवल पुलिस को शिकायत दर्ज हुई है, केस दर्ज नहीं हुआ होगा। उसी में आपने समझौता कर लिया। आप के रुपये दे देने के बाद लड़की और उस का पिता बदल गया। इस कारण उस ने दुबारा 498ए का केस दर्ज कराया हैं, वह अभी न्यायालय के पास लंबित है यह साबित नहीं हुआ है कि आप निर्दोष हैं। तीसरे उस ने आप के भाई पर 476 तथा आप व माँ पर सबूत छुपाने का केस लगाया है जिस में पुलिस ने अभी न्यायालय को अंतिम रिपोर्ट प्रस्तुत की है। अभी आपकी पत्नी उसमें आपत्तियाँ कर सकती है कि पुलिस ने आप से मिल कर ठीक जाँच नहीं की। न्यायालय उस में सुनवाई कर के उसे दर्ज कर के आप के विरुद्ध समन जारी कर सकता है। इस कारण जब तक न्यायालय उस में पुलिस की अंतिम रिपोर्ट को मंजूर न कर ले तब तक अंतिम रूप से उसे झूठा केस नहीं कहा जा सकता।

यदि आप साबित कर देते हैं कि पत्नी पहले ही आजीवन भरण पोषण के लिए 11,50,000/- रुपए प्राप्त कर चुकी है तो धारा 125 दं.प्र.संहिता का प्रकरण खारिज हो सकता है। लेकिन उस के लिए आप को उस का लिखा एग्रीमेंट साबित करना होगा। गवाह (पंच) को न्यायालय में बुलाने के लिए न्यायालय को आवेदन दे कर समन भेज कर गवाह को अदालत में बुलाया जा सकता है। मुझे यह समझ नहीं आया कि आप ने कैसे पंच तय किए जो पुलिस में बयान तक देने नहीं आ सके।

यदि बलात्कार के केस में एफआर न्यायालय द्वारा मंजूर हो जाती है और 498ए में आप बरी हो जाते हैं तो यह विवाह विच्छेद के लिए एक नया आधार होगा। आप को चाहिए कि तब आप अपने वर्तमान विवाह विच्छेद के प्रकरण में संशोधन करवा कर इन नए आधारों को शामिल करें। या फिर एक नया विवाह विच्छेद आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करें। मान हानि के संबंध में भी जब तक किसी प्रकरण में अन्तिम रूप से सिद्ध न हो जाए कि आप के विरुद्ध की हुई रिपोर्ट मिथ्या थीं हमारी राय में कोई कार्यवाही करना  उचित नहीं है। समय से पहले की गयी कार्यवाही कभी कभी  खुद के गले भी पड़ जाती है।

 

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समस्या-

घनश्याम पाण्डेय ने सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


 मेरे पड़ोस में मेरी मुँह बोली बहन रहती है। जिसका विवाह मात्र १२ वर्ष के उम्र १९९८ में ही कर दिया गया। यह बाल विवाह ही था, लड़के की उम्र १२ साल ही थी।  खैर यह शादी मात्र चार वर्ष ही चली और २००२ में पंचायत के सामने तलाक करवा दिया गया और उनसे कोई संतान नहीं हुई।  बहन का दूसरा विवाह लगभग १८ की उम्र में २००४ में हुआ, जहाँ पर उसे दो लड़की संताने भी हुई, साल २०११ में उसे दूसरी लड़की पैदा होने पर घर से निकाल दिया गया। अतः वह तब से मायके में ही रहती है। उसके ननद, देवर और पति सभी उस पर अत्याचार करते हैं। जब वह जाती है, बड़ी बेरहमी से पति, देवर मार कर उसे भगा देते हैं।  बहन के मायके वाले भी ज्यादा सहयोगी नहीं। अतः पुनः २०१५ के एक साधारण समारोह द्वारा उसका तीसरी जगह जबरदस्ती घरवालों ने विवाह करवा दिया।  जो कि वैवाहिक संस्कार करके नहीं किये गए थे, उसे कुछ भी नाम दिया जा सकता है। लेकिन यह विवाह भी मात्र २ महीने न चला। अब बहन आज भी बार बार दूसरे विवाह के पति के घर जाती है, जहाँ पर उसकी बड़ी बेटी ले ली गयी, जब कि दूसरी बेटी को पति अपनी संतान स्वीकार नहीं करता है। जब उसका जन्म पति के घर में ही हुआ। अतः ऐसी परिस्थिति में बच्चों के क्या अधिकार अपने नैसर्गिक पिता से बनते हैँ तथा बहन भी क्या अपने दूसरे पति के अधिकार प्राप्त कर सकती है। वह अत्यंत गरीब अवस्था में है, माँ-बाप तथा पति सभी उसके खिलाफ हो गए। वह अपनी छोटी बेटी के साथ किसी तरह गुजारा कर रही है। अतः बच्चों और बहन का क्या अपने दूसरे पति के ऊपर क़ानूनी अधिकार बनता है। बहन आज भी अपने पति के घर जाना चाहती है तथा लगभग पागलपन की अवस्था पर पहुँच गयी है।

समाधान-

हिन्दू विवाह केवल और केवल न्यायालय की डिक्री से ही समाप्त हो सकता है इस कारण से आप की मुहँबोली बहिन यदि अनुसूचित जनजाति से नहीं है तो उस का पहला विवाह आज तक भी समाप्त नहीं हुआ है। उस का पहला पति ही उस का वैधानिक पति है। पहले पति से विवाह विच्छेद वैधानिक न होने से दूसरा विवाह वैध नहीं था। इस कारण आपकी बहिन का दूसरे पति से कोई अधिकार नहीं है। लेकिन उस की दोनों संतानें दूसरे पति से हैं इस कारण संतानों को अपने पिता से भरण पोषण पाने का अधिकार है। तीसरे पति के साथ आप की बहिन दो माह से भी कम समय रही है वह रिश्ता एक लघु अवधि का लिव इन था। इस कारण इस संबंध से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं हुआ है।

अभी तक आपकी मुहँ बोली बहिन का पहले पति से रिश्ता समाप्त नहीं हुआ है इस कारण वह पहले पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है। इस के लिए न्यायालय में अर्जी दाखिल कर सकती है। इस के साथ ही वह अपनी छोटी पुत्री के लिए अपने दूसरे पति से भरण पोषण की मांग कर सकती है।

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बहिन को वापस उस के ससुराल कैसे भेजा जाए?

May 2, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अनिल सिंह ने कन्नोज, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरी विवाहित बहन के कमरे और चेंजिंग रूम में ससुराल वालों ने सीसीटीवी कैमरा लगाया।  जिस पर विवाद हुआ और पुलिस को लिखित सूचना देने के बाद मैं उसको अपने घर ले आया। इसकी रिकॉर्डिंग है मेरे पास। दहेज़ उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का मुकदमा कर दिया है।  परंतु मै चाहता हूँ कि किसी भी तरीके से मेरी बहन ससुराल पहुँच जाये। क्या मेरी बहन बगैर ससुराल वालों की मर्ज़ी के ससुराल में रह सकती है।


समाधान-

ह एक जटिल समस्या है। किसी भी घर में उस घर के स्वामी की इ्च्छा के विरुद्ध निवास करना संभव नहीं है। विशेष रूप से उस स्थिति में जब कि उस घर के स्वामी आप की बहिन पर इतनी निगाह रखते हों कि उस के निजी कमरे व चेंजिंग रूम में सीसीटीवी लगा कर रखते हों। यह तो ऐसा क्रूर कृत्य है जिस के आधार पर कोई भी स्त्री अपने पति से विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त की जा सकती है। सीसीटीवी कैमरे से प्राप्त वीडियों व चित्रों के माध्यम से आपकी बहन को आप की बहन के पति व उस के ससुराल वाले ब्लेकमेल कर सकते हैं और उसे किसी भी तरह का घिनौना कृत्य करने पर बाध्य कर सकते हैं।

आप की बहिन ने घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत मुकदमा किया है। इस अधिनियम की धारा 19 में निवास का आदेश दिए जाने की शक्ति मजिस्ट्रेट को प्रदान की गयी है। आपकी बहिन के आवेदन में इस तरह की प्रार्थना नहीं की गयी है तो आप की बहिन उक्त आवेदन में संशोधन के माध्यम से यह प्रार्थना कर सकती है कि उसे ससुराल में अपने कमरे में निवास करने से न रोका जाए। यदि परिस्थितियाँ ऐसी हों कि यह संभव न हो तो उसे ससुराल वालों, पति से ऐसा आवास उपलब्ध कराया जाए जिस में वह निवास कर सके।

इतना कुछ हो जाने के बाद आप की बहिन का क्या उस घर में रहना सुरक्षित होगा? इस प्रश्न पर विचार अवश्य करें। आप की बहिन धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम में भी दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना काआवेदन कर सकती है। धारा 125 दंड प्रकिया संहिता में भरण पोषण के आदेश के लिए आवेदन कर सकती है। तमाम परिस्थितियों में पति के साथ उस का रह पाना तभी संभव है जब कि आपसी सहमति बने। धारा9 के प्रकरण में न्यायालय इस तरह के प्रयत्न करता है। शायद उस से बात बन जाए। दोनों के बीच वैधानिक समझौता हो कर शर्तें तय हों तभी बहिन को ससुराल भेजना संभव हो सकता है।

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समस्या-

नेहा सोनी ने इंदौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति मुझे मेरे मायके छोड़ कर चले गये और मुझे आने के लिए भी मना कर दिया। वो मुझे साथ रखना नहीं चाहते। मैं ने कोर्ट में 125 और 498 ए के मुकदमे लगा रखे हैं।  मेरे पति प्राइवेट कॉलेज मे प्रोफसर हैं। मेरे पास  उन की सैलरी का प्रमाण नहीं है।   मेरा अंतरिम मेंटेनेन्स 1700 रुपए प्रतिमाह तय हुआ है। जबकि मेरे ससुराल वाले काफ़ी संपन्न हैं। वो मुकदमे की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं, ना ही कोई हाल निकालना चाहते हैं।  क्या करूँ बहुत परेशान हूँ। मेरी मदद करें।

समाधान-

भारत में अदालतों की संख्या आबादी के मुकाबले बहुत कम है। दस लाख की आबादी पर अमरीका में 140 अदालतें हैं और ब्रिटेन में 55 जब कि भारत में इसी जनसंख्या पर केवल 12 अदालतें हैं। वैसी स्थिति में न्याय में देरी होना स्वाभाविक है। 498ए की कार्यवाही तो धीमे ही चलेगी उस पर आपका नियंत्रण नहीं हो सकता। वहाँ अभियोजक सरकार होती है। आपको केवल गवाही के लिए बुलाया जाएगा।

धारा 125 दं.प्र.सं. के भरण पोषण के मामले में आप को अंतरिम राहत न्यायालय ने दे दी है। अब जब भी अन्तिम निर्णय होगा तब जो भी गुजारा भत्ता आप का तय होगा वह आप के द्वारा आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने की तिथि से प्रभावी होगा। इस तरह यदि आप का गुजारा भत्ता 5000 प्रतिमाह तय होता है तो 1700 के अलावा जितना गुजारा भत्ता बकाया होगा वह आप को बाद में मिल जाएगा। इस लिए आप को चाहिए कि आप 125 दं.प्र.सं. के प्रकरण में उचित गुजारा भत्ता तय होने पर अधिक ध्यान दें। गुजारा भत्ता का आधार हमेशा पति की आर्थिक स्थिति और मासिक आय होती है। मासिक आय तो आप को प्रमाणित  करनी होगी।

आप को चाहिए कि आप पति के निजी कालेज का पता लगाएँ अपने स्तर पर उन की सेलरी की जानकारी करें और आर्थिक स्थिति का ज्ञान करें। धारा 125 दं.प्र.संहिता का प्रकरण अपराधिक कानून का हिस्सा होने के साथ साथ दीवानी प्रकृति का है। इस कारण से दीवानी प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के प्रावधान सिद्धान्त रूप में इस प्रकरण में प्रभावी होते हैं। इकबाल बानो बनाम स्टेट ऑफ यूपी के मामले में 05.06. 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दीवानी प्रकृति का माना है।आप इस मामले में सीपीसी के प्रावधानों केअनुरूप प्रतिपक्षी को देने के लिए प्रश्नावली दे सकती हैं और न्यायालय उन का उत्तर देने का आदेश प्रतिपक्षी को दे सकता है इसी तरह आप कोई भी दस्तावेज जो प्रतिपक्षी के शक्ति और आधिपत्य में है उसे प्रकट और प्रस्तुत कराने के लिए आवेदन न्यायालय को दे सकती हैं। दं.प्र.संहिता में भी धारा 91 में दस्तावेज प्रतिपक्षी से अथवा किसी से भी मंगाया जा सकता है और दस्तावेज लाने वाले को दस्तावेज साथ ला कर बयान देने के लिए कहा जा सकता है। इस तरह जिस संस्था में आप के पति काम करते हैं उस संस्था के प्रमुख को दस्तावेज ले कर न्यायालय में बुलाने के लिए समन जारी किया जा सकता है। आप इस मामले में अपने वकील से बात करें कि वह सीपीसी और दं.प्र.सं. के प्रावधानों में ऐसे आवेदन प्रस्तुत करे और इस संबंध में न्यायालयों के निर्णय तलाश कर उन का उपयोग करते हुए वस्तु स्थिति को न्यायालय के समक्ष रखे जिस से उचित रूप से आप का गुजारा भत्ता न्यायालय तय कर सके।

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