Muslim Law Archive

गलतियों की माफी से ही आगे का रास्ता बनेगा।

September 22, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_two-vives.jpgसमस्या-

रशीद वारसी ने आगरा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरी शादी 2012 में हुई थी। 3 साल बाद मैं ने अपनी बीवी को कुछ गलतफहमियों की वजह से छोड़ दिया और मैं किसी और के साथ लिव इन में रहने लगा। मुझे पता लगा कि मेरी बीवी मुझ पर केस करने जा रही है तो मैं ने बिना पूछे 10 रुपए के स्टाम्प पेपर पर उसे तीन बार तलाक लिख कर भेज दिया। क्या मेरी तलाक हो गयी? मेरी उस से एक बेटी भी है। वो मुझे उस से भी नहीं मिलने देती। मैं क्या करूँ? मैं अपनी बीवी को वापस लाना चाहता हूँ। कोई कानूनी तरीका हो तो बताएँ।

समाधान-

प बड़े अजीब आदमी हैं। आप ने गलतफहमी के चलते अपनी बीवी को छोड़ दिया। किसी अन्य महिला के साथ लिव इन में रहने लगे। गलतफहमी आप को थी बीवी को नहीं। बीवी ने बिना किसी कसूर के दंड भुगता। जब आप को पता लगा कि वह मुकदमा करेगी तो डर के मारे आप ने 10 रुपए के स्टाम्प पेपर पर तीन बार तलाक लिख कर भेज दिया। अब आप को बेटी याद आ रही है। आप औरतों और लड़कियों को समझते क्या है? तीन औरतों को आप ने परेशान कर दिया है। बीवी को छोड़ा, बेटी को पिता के स्नेह से वंचित किया और जिस के साथ लिव इन में रहे हैं उस का क्या उस की तो कोई चिन्ता तक आप ने इस सवाल में व्यक्त नहीं की है। यदि आप धार्मिक व्यक्ति हैं तो खुद सोचिए इन तीन इंसानों के साथ जो गुनाह आपने किए हैं क्या आप का खुदा उन्हें माफ कर देगा? क्या वे माफ कर दिए जाने के काबिल हैं? और यदि नहीं हैं तो उस की सजा आप को क्या मिलनी चाहिए?

आप को सब से पहले तीनों से अपने रिश्ते तय करने होंगे। आप अब अपनी लिव इन वाली स्त्री के साथ किस तरह के संबंध रखने चाहेंगे। यदि आप उस से संबंध न ऱखेंगे तो क्या वह बखेड़ा नही ख़ड़ा करती रहेगी। आप को उस से माफी मांग कर उस से अपने संबंध समाप्त करने होंगे। अपनी पत्नी से भी आप को माफी मांगनी चाहिए। उस के बाद यदि वह वाकई आप को माफ कर दे तो ठीक वर्ना आप अपनी बीवी को कभी साथ नहीं रख पाएंगे और जीवन भर बीवी और बेटी के लिए भरण पोषण का खर्च देते रहने पड़ेगा।

आप ने पूछा है कि क्या आप का तलाक हो गया है? यदि आप ने एक ही स्टाम्प पेपर पर तीन जगह तलाक लिख कर भेजा है तो इसे शरीयत के मुताबिक तलाक नहीं माना जा सकता। भारतीय न्यायालयों की व्याख्या यह है कि तीनों के तलाकों के बीच में पर्याप्त अंतर होना चाहिए जिस से खाविंद और बीवी दोनों को सोचने का अवसर मिले और दोनों के बीच समझौते की बात चल सके। इस तरह यदि आप अदालत जाएंगे तो आप का तलाक अवैध माना जाएगा। इस तरह आप की बीवी अब भी आप की बीवी है। उसे वापस लाने के लिए आप को हलाला की जरूरत नहीं पड़ेगी। पर आप की समस्या का हल यही है कि आप अपनी लिव इन को छोड़ें, बीवी और बेटी के साथ न्याय पूर्वक अपना जीवन बिताएँ। इस के लिए आप को प्रयास करने होंगे। आप फिलहाल आप के दाम्पत्य जीवन की पुनर्स्थापना के लिए वाद संस्थित कर सकती हैं। जब एक बार दावा अदालत में जाएगा तो बातचीत और समझौते का मार्ग भी निकलेगा।

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हिबानामा पंजीकृत होना जरूरी नहीं।

September 14, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

gift propertyसमस्या-

इमरान ने बसना, रायपुर छत्तीसगढ़ से पूछा है-

म लोग 5 साल हुआ मेरे नाना जी के साथ रहते हैं…मेरे नाना age 65 और उनकी अम्मी age ७५ ..और मेरे नानी जी और मामा 40 साल से अलग ररहते थे…..और मेरे नाना जी के पास नहीं आते थे और ओ लोग बोहत तकलीफ उठाते थे …तब मेरे नाना जी ने मेरे अम्मी को बुलाया और हम उनको 4 साल से केयर किआ तो मेरे नाना जी ने खुश होके उनका आबादी मकान मेरे अम्मी के नाम कर दिए हैं …१०० का स्टाम्प में नोटरी करके दिए हैं .अब ओ इस दुनिया में नहीं हैं।  तो मेरे मामा और नानी .. जो मकान नाना जी ने हम को दे दिए हैं उस पर हम से हिस्सा मांग ‘रहे हैं …और परेसान कर रहे हैं ….अब हम क्या करें सर? …. …..और नाना जी ने स्टाम्प पे उल्लेख किए हैं कि … मैं हाजी कदर अपनी राजी खुसी से @ … मेरी बेटी अमरीन बनो को अपना मकान दे रहा हूँ। मेरे चलने फिरने में तकलीफ होती है इसलिए मेरी सेवा मेरी बेटी अमरीन बानो ने की है इस से उस को खुस होके दे रहा हूँ …आज १२-३-२०१२ से उक्त मकान की मालिक अमरीन होगी और मेरा नाम राजस्व अभिलेख और पटवारी अभिलेख से हटा कर खुद का नाम जोड़ लें …………. हम लोगों ने नगर पंचायत से उनका नाम हटा कर अम्मी का नाम जोड़ लिए हैं .. …पर पटवारी अभिलेख में उनका नाम हटा कर अम्मी का नाम कैसे कैसे जोड़े …पटवारी के पास जाने से ओ जबाब नहीं दे रहा है …उस को मेरे मामा पैसा खिला दिया है …. हम को क्या करना होगा।

समाधान-

प के नानाजी ने मकान अपनी बेटी, आप की माँ के नाम तहरीर कर दिया। यह हिबा है। आप की माँ उसी मकान में निवास भी कर रही है इस कारण से उस का कब्जा भी उस मकान पर है। इस तरह यह हिबानामा अन्तिम हो चुका है। आप के नानाजी चाहें तो वे स्वयं भी इस मकान को वापस नहीं ले सकते।

आप को जो परेशानी आ रही है वह इस कारण से कि हिबा एक दान भी है और दान पत्र का पंजीकरण होना जरूरी है। लेकिन यदि हिबा किया गया हो और हिबा की गयी संपत्ति पर कब्जा भी प्राप्त कर लिया गया हो तो ऐसे मामले में हिबानामा को पंजीकृत होना कतई जरूरी नहीं है।

हालांकि आप के नाना जीवित हैं और आप चाहें तो उन से इस हिबानामा को उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवाया जा सकता है। उस के बाद इस संपत्ति का स्वामित्व आप की माँ का होने के मामले में किसी तरह की कोई शंका शेष नहीं रहेगी। बस यही है कि इस संपत्ति के बाजार मूल्य पर आप को स्टाम्प ड्यूटी व पंजीयन शुल्क अदा करना होगा।

यदि आप पंजीयन न भी करा पाएँ तो भी आप की माँ के इस संपत्ति पर स्वामित्व को उन से नहीं छीना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हफीजा बीबी बनाम शेख फरीद के मामले में यह निर्धारित किया है कि इस तरह के हिबानामा का पंजीकृत होना जरूरी नहीं है।

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rp_gavel9.jpgसमस्या-

अरशद ने नवाबगंज, सहारनपुर, उत्तरप्रदेश से पूछा है-

मेरे पिताजी के पास एक मकान है जो उन को मेरे दादा जी से विरासत में मिला था। मेरे पिताजी के पीछे एक आदमी पड़ा है जो उस मकान को खरीदना चाहता है वह पिताजी को दारू पिला देता है पिताजी भी मकान बेचने को तैयार हैं। हमारे घर वालों को क्या कदम उठाने चाहिए कि वे मकान न बेचें।

 

समाधान-

मुस्लिम विधि में सभी संपत्तियाँ वैयक्तिक होती हैं अर्थात संपत्ति पर उसी का अधिकार होता है जिस के वह नाम होती है। यह संपत्ति आप के पिता जी के नाम है तो उन की व्यक्तिगत संपत्ति है और उन्हें इसे बेचने का अधिकार है। वे इस संपत्ति को बेच सकते हैं।

इस संपत्ति को बेचने से रोकने का कोई कानूनी रास्ता नहीं है। कानून तरीके से न आप न आप का परिवार इस संपत्ति को बेचने से आप के पिता को नहीं रोक सकता है। यह आप और आप के परिवार पर निर्भर करेगा कि आप कैसे अपने पिता को इस काम को करने से रोक सकते हैं।

यदि आप या आप के परिवार के लोग उस संपत्ति को परिवार के किसी सदस्य या एक से अधिक सदस्यों के नाम हस्तांतरित करवा लें तो ही यह संपत्ति बिकने से रुक सकती है अन्यथा नहीं।

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mother_son1समस्या-

साहिला असलम ने हरदोई, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरा पति शराब पीकर मुझको मारता पीटता था‚ मैंने उसके विरूद्ध धारा 498ए‚ 323‚ 504‚ 506 भादवि व 3⁄4 डीपी एक्ट में एफआईआर दर्ज करायी‚ मामले को सुलह एवं मध्यस्थता केन्द्र भेजा गया जहॉं मैंने अपने भविष्य के कारण सुलह कर ली परन्तु मेरे पति द्वारा अपनी हरकतों में कोई बदलाव नहीं किया गया और मुझे शराब के लिए पैसे मांगते हुए मारने पीटने लगा‚ इस कारण मैं अपने घर चली अायी लेकिन इसके बाद भी उसने अपने कुछ साथियों के साथ मेरे घर में घुसकर मुझे व मेरी माँ को मारा पीटा जिससे मेरे माँ के हाथ की हडडी अपनी जगह से हट गयी‚ मेरे द्वारा इस सम्बन्ध में धारा 452‚ 323‚ 504‚ 506‚ 498ए भादवि व 3⁄4 डीपीएक्ट में मुकदमा पंजीकृत कराया है‚ जिसकी विवेचना प्रचलित है‚ लेकिन पुलिस कोई कार्यवाही नहीं कर रह है। मैं अपने पति से छुटकारा चाहती हूँ लेकिन वह तलाक भी नहीं दे रहा है‚ मेरा एक तीन वर्ष का पुत्र भी है। कृपया मुझे सरल प्रक्रिया बताये कि मुझे उससे कैसे छुटकारा मिल सकता है एवं कितना समय लगेगाॽ

 

समाधान-

प ने पुलिस के समक्ष जो शिकायत की है उस पर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई है या नहीं पहले यह तलाश करें। यदि पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं की है तो आप एक पत्र पंजीकृत डाक से एस.पी. को प्रेषित करें जिस के साथ अपनी मूल शिकायत की प्रति भी भेजें। इस से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो कर कार्यवाही आरंभ हो जाएगी। यदि तब भी न हो तो किसी स्थानीय वकील की मदद से आप सीधे न्यायालय को परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं।

यदि पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर ली तो उन के लिए कार्यवाही करना जरूरी है। या तो वे आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करेंगे या फिर यह रिपोर्ट की कोई मामला नहीं बनता है। यदि वे मामला न बनने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत करेंगे तो न्यायालय आप को सूचित करेगा तब आप अपनी आपत्तियाँ प्रस्तुत कर सकती हैं अपना व अपने गवाहों के बयान करवा सकती हैं जिस पर न्यायालय प्रसंज्ञान ले सकता है।

जिस तरह का आप के पति का व्यवहार है उस से आप को अलग रहने का हक मिल गया है। आप अपने पुत्र के साथ अलग रह सकती हैं। आप स्वयं अपने लिए और अपने पुत्र के लिए धारा 125 दण्ड प्रकिया संहिता में तथा घरेलू हिंसा अधिनियम में भरण पोषण के खर्चे के लिए स्वयं वकील की मदद से न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं। फिलहाल आप इतना करें।। इतना सब होने के बाद आप का पति आप को तलाक देने पर विचार कर सकता है। आगे की स्थिति पर बाद में विचार किया जा सकता है।

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तलाक़ और दूसरा निक़ाह भी शरीयत के कायदे से ही करें।

May 29, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

यूसुफ ने जयपुर राजस्थान से पूछा है-

मेरा निकाह 2012 में अहमदाबाद में हुआ था। शादी के छह माह बाद ही वह बच्चेदानी का इलाज करवाने के बहाने अपने पिता के साथ अहमदाबाद चली गयी। अब आने से इन्कार कर दिया है और दस लाख की मांग की। फिर मैं ने उसे आने के लिए तीन नोटिस भी दिए मगर उस ने लेने से इनकार कर दिया। बाद में मैं ने 4 फरवरी 2015 को तलाक भिजवा दिया। मगर उस ने तलाक भी नहीं लिया और इद्दत के पैसे भी नहीं लिए। तीन माह बाद मैं ने उसे अपना सामान ले जाने के लिए नोटिस दिया वह भी नहीं लिया। अब मैं दूसरा निकाह करना चाहता हूँ। क्या मैं दूसरा निकाह कर सकता हूँ। मुझे क्या करना होगा?

समाधान-

प ने कायदे से निकाह किया है तो तलाक भी कायदे से ही होना चाहिए। कायदा ये है कि पहला तलाक हो जाने के बाद दोनों पक्षों के प्रतिनिधि आपस में बात करें और समझाइश कराएँ, समझाइश से बात न बने तो तीसरा तलाक भी हो जाए। जिन काजी साहब ने आप का निकाह पढ़ाया था और तब जो वकील आप की बीवी के थे उन से बात की जा सकती है।

खैर, यह तो बात हुई तलाक की। दूसरा निकाह तो आप तलाक के बिना भी पढ़ सकते हैं। उस के लिए यह जरूरी है कि आप की दो बीवियाँ हों तो दोनों के प्रति प्रत्येक व्यवहार में समानता बरतें। जब आप की पहली बीवी साथ रह ही नहीं रही है तो यह तो हो नहीं सकता। दूसरी बात कि पहली बीवी की अनुमति या सहमति हो। वह भी नहीं ली जा सकती। बेहतर है कि आप अपनी बीवी को नोटिस दें कि वह साथ आ कर रहने को तैयार नहीं है और दस लाख रुपए मांगती है जो नाजायज है। इस कारण आप दूसरा निकाह पढ़ने को तैयार हैं, यदि एक हफ्ते में उस का कोई जवाब न मिला तो आप निकाह पढ़ लेंगे। यह नोटिस रजिस्टर्ड डाक से भेजा जा सकता है, बीवी के रहने की जगह अखबार में शाया कराया जा सकता है और दो गवाहों के सामने बीवी के रहने के मकान और पड़ौस के मकानों पर चस्पा किया जा सकता है। ऐसा करने के बाद आप बेशक दूसरा निकाह पढ़ सकते हैं।

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बीवी के साथ रहने से इन्कार कर देने पर तलाक दिया जा सकता है।

December 7, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

पति पत्नी और वोसमस्या-

युसुफ ने जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा निकाह 17 जून 2012 को अहमदाबाद, गुजरात में हुआ था। मैं एक पैर से विकलांग हूँ (40%) और मेरी बीवी की एक आँख खराब है। निकाह से पहले उसके घरवालों ने उसे स्वस्थ बताया था। मगर निकाह होने के बाद जब वो 6-7 माह बाद भी गर्भवती नहीं हुई तो उसने मुझे बताया कि उसे कभी महावारी नहीं हुई है और सिर्फ़ दवा लेने के बाद ही महावारी आती है। उसके घर से एक मैसेज भी आया कि इसे यह दवा लाकर देना, इसे बिना दवा माहवारी नहीं आती क्योंकि इसकी बच्चेदानी छोटी है और यह कभी माँ नहीं बन सकती। यह सुन कर मुझे दुख हुआ। मैं उससे नाराज़ भी रहने लगा। इस बीच उसके पिता जी घर पर आकर उसे ले गए और कहा कि मैं इसका इलाज करवाकर भेज दूँगा। मगर जब 2 साल गुजर गये। हमने कहा कि मैं लेने आ रहा हूँ तो उन्होने कहा की हमें लड़की भेजनी नहीं है। हमें तो 10 लाख रुपए चाहिए। मैं ने उसे वकील के ज़रिए नोटिस भिजवाया। मैं तुझे रखना चाहता हूँ मगर उन्होंने जवाब नहीं दिया। दूसरा नोटिस भेजा तो लेने से इनकार कर दिया। मैं क्या करूँ मैं दोनो तरह से राज़ी हूँ। अगर जवाब नहीं आता है तो क्या मैं उसे तलाक़ भेज सकता हूँ।

समाधान-

प दो नोटिस भेज चुके हैं। उस के बाद भी आप की बीवी आप के साथ आ कर रहने को तैयार नहीं है। आप ने उसे लेने आने के लिए कहा तो उस ने आप के पास आने से इन्कार कर दिया। वैसी स्थिति में आप का अपनी पत्नी को तलाक देना वाजिब है। लेकिन अब भारत में कानूनी स्थिति यह है कि तलाक तीन बार में होना चाहिए। इन तीन तलाकों के बीच दोनों पक्षों के बीच सुलह का मौका होना चाहिए। दोनों पक्षों के एक एक प्रतिनिधि इस का प्रयत्न करें और प्रयत्न असफल होने पर तीसरा तलाक दिया जाए।

स के लिए आप स्थानीय काजी साहब या फिर अहमदाबाद के काजी साहब की मदद भी ले सकते हैं। तीनों तलाक के गवाह होने चाहिए। जिन काजी साहब ने आप का निकाह पढ़ाया हो पहला तलाक देने के साथ ही पहले तलाक के दस्तावेज की कापी उन्हें भेजते हुए आप अलग से पत्र में लिख कर कह सकते हैं कि वे समझौता कराने की कोशिश करें। दूसरे और तीसरे तलाक की कापियाँ भी उन्हें भेज सकते हैं। तीनों तलाकों पर गवाहों के दस्तखत होने चाहिए।

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मुस्लिम विधि में उत्तराधिकारी पुत्र और पुत्रियों के अधिकार

November 30, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

muslim inheritanceसमस्या-

शाहिद अली खान ने झुन्झुनूं, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा के चार बेटे और चार बेटियां हैं जिनका विवाह हो चुका है। मेरे दादा का देहांत हो चुका है तथा अब मेरे चाचा मेरे दादा जी के पूरे मकान और दुकानों पे कब्ज़ा कर के बैठे हैं और अपने भाइयों को हिस्सा नहीं दे रहे। कृपा कर के बताएं मुस्लिम कानून के अनुसार किस तरह बंटवारा करवाया जाये। क्या इसमें विवाहित बेटियां भी हिस्सा लेंगी?

समाधान-

मुस्लिम विधि में यदि किसी व्यक्ति के पुत्र न हो तो पुत्रियों को शेयरर माना जाता है, लेकिन यदि पुत्र हो तो वे रेजीड्युअरी हो जाती हैं। पुत्र और पुत्रियाँ दोनों होने पर पिता की संपत्ति में पुत्रों और पुत्रियों को प्राप्त होने वाली संपत्ति का अनुपात 2:1 होगा। लेकिन यदि अन्य क्यो शेयरर हुआ तो इस हिस्से में परिवर्तन हो जाएगा। इस कारण आप को यह बताना होगा कि दादा जी की मृत्यु के समय उन के कौन कौन से शेयरर तथा रेजीड्युअरी जीवित थे।

दि दादा जी के उत्तराधिकारियों में केवल 2 पुत्र और 4 पुत्रियाँ ही जीवित थीं तो चार हिस्से पुत्रियों के और 4 हिस्से पुत्रों के इस तरह कुल संपत्ति के 8 हिस्से होंगे।  दोनों पुत्रों में से प्रत्येक को 2/8 अर्थात 1/4 हिस्सा प्राप्त होगा।  जब कि प्रत्येक पुत्री को 1/8 हिस्सा प्राप्त होगा।

प के मामले में आप के चाचा ने सारी संपत्ति पर कब्जा कर लिया है तो आप के पिता को या किसी भी अन्य उत्तराधिकारी को उक्त समस्त संपत्ति के बँटवारे के लिए दीवानी वाद संस्थित करना पड़ेगा। यदि चाचा संपत्ति को कब्जे में ले कर उस की आय को स्वयं के पास रख रहे हैं तो जो भी व्यक्ति बँटवारे का वाद संस्थित करे वह संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने अर्थात हस्तांतरित करने पर रोक लगाने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने का प्रयत्न कर सकता है और संपूर्ण संपत्ति पर रिसीवर नियुक्त करवा सकता है जिस से संपूर्ण संपत्ति रिसीवर के आधिपत्य में रहे और जो भी आय हो वह उस के पास संग्रहीत होती रहे। जब बँटवारा हो जाए तो संपत्ति के साथ साथ रिसीवर के पास उस संपत्ति से जो भी आय हो उसे भी बाँट दिया जाए।

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पिता की संपत्ति में हिस्से के लिए बँटवारे का वाद संस्थित करें।

November 22, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

partition of propertyसमस्या-

तनवीर खान ने बलरामपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे नाना के एक बेटा और एक बेटी हैं। नाना की मृत्यु 2001 में हो चुकी है,मामा और मेरी माँ जीवित हैं। अभी तक सारे सम्पति नाना के पिताजी के नाम है। 1998 में मामाजी 50000 रुपए का जमीन देकर उसी ज़मीन के रजिस्ट्री पेपर पे मम्मी से लिखवा लिए कि “मैं अपना हिस्सा प्राप्त कर चुकी” जब कि सम्पति करोड़ों की है। नानाजी और मामाजी पूरी ज़िन्दगी ज़मीन बेचकर ही गुज़ारा किये हैं, परंतु अभी भी काफी ज़मीन और उस से अर्जित सम्पति बाकी है। हम लोग मुस्लिम समुदाय से हैं, क्या उस सम्पति पर मेरी माँ का अधिकार है? यदि हाँ, तो सही मार्गदर्शन कर मेरी मदद करें।

समाधान-

मुस्लिम विधि के अनुसार पिता के उत्तराधिकार में यदि केवल एक पुत्री व एक पुत्र हो तो पुत्र को 2/3 तथा पुत्री को 1/3 हिस्सा प्राप्त होता है। इस तरह आप की माताजी को जिस दिन आप के नाना का देहान्त हुआ नानाजी की संपत्ति मे 1/3 एक तिहाई हिस्से का अधिकार प्राप्त हुआ था।

स में से आप की माँ को भूमि का एक हिस्सा दिया गया है। उस की रजिस्ट्री भी हुई है। रजिस्ट्री किस दस्तावेज की हुई है यह आप ने स्पष्ट नहीं किया है। उस में यह लिखा हुआ है कि आप की माँ ने अपना हिस्सा प्राप्त कर लिया है। लेकिन उस दस्तावेज का अध्ययन कर के कोई अच्छा वकील ही बता सकता है कि इसे बंटवारा कहा जा सकता है अथवा नहीं। आप उस दस्तावेज का किसी अच्छे वकील से अध्ययन करवाएँ।

प की माताजी यह कर सकती हैं कि मामा के विरुद्ध पिता की संपत्ति के बंटवारे का वाद संस्थित कर दें। आप के मामा इस पर यह आपत्ति अवश्य करेंगे कि आप की माताजी अपना हिस्सा ले चुकी हैं। तो यह साबित करने की जिम्मेदारी आप के मामा की है। उक्त दस्तावेज की व्याख्या न्यायालय कर देगा। अधिक संभावना इस बात की है कि इस तरह का दस्तावेज बंटवारे का विकल्प नहीं हो सकता। आप की माताजी अपना शेष हिस्सा प्राप्त करने में सफल हो सकती हैं।

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मिथ्या मुकदमों से डरे बिना सचाई के साथ वाजिब कार्यवाही करें।

November 13, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_judicial-sep.jpgसमस्या-

अहमद ने इलाहाबाद उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी केवल 15 दिन मेरे साथ रही और उस ने मेरे साथ कोई संबंध नहीं बनाने दिया। उस के बाद मायके चली गयी। मैं ने रिश्तेदारो को भेज कर मामले को सुलझाने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली। क्या मैं मुस्लिम रीति से तलाक दूँ। वह दहेज का मुकदमा लगा कर मेरा वेतन बाँटने की धमकी दे रही है। मुझे क्या करना चाहिए। मैं बिना 498ए व धारा 125 के मुकदमों से बच कर कैसे अलग हो सकता हूँ?

समाधान-

म अनेक बार कह चुके हैं कि 498ए भारतीय दंड संहिता, घरेलू हिंसा अधिनियम और धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के डर से लोग उन्हें जो वाजिब कार्यवाही करना चाहिए वह भी नहीं करते हैं। नतीजा यह है कि मामला उलझता जाता है। कोई भी कानूनी कार्यवाही किसी के करने से होती है और किसी को कोई भी कार्यवाही करने से रोका नहीं जा सकता। वह आज होगी तो होगी भविष्य में होगी तो होगी। लोग इस कारण से वाजिब कार्यवाही करने से रुके रहते हैं। फिर वही तथ्य जब वे बचाव में प्रस्तुत करते हैं तो वे देरी के कारण उतने कामयाब नहीं होते।

मारी राय में आप को इस्लामी रीति से तलाक की कार्यवाही करनी चाहिए। लेकिन यह अच्छी तरह समझ लें कि शरिया के हिसाब से तलाक कैसे होना चाहिए। भारत में एक साथ तीन बार तलाक कह देने से अब तलाक संभव नहीं है। शरिया कहता है कि पहले तलाक और तीसरे तलाक के बीच पर्याप्त समय होना चाहिए और दोनों पक्षों के चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से दोनों के बीच सुलह कराने का अवसर मिलना चाहिए।

स विधि को अपनाने के लिए आप अपनी पत्नी को पत्नी द्वारा आप के साथ संबंध बनाने से इन्कार करने के कारण तलाक कह रहे हैं लेकिन सुलह चाहते हैं इसी नोटिस में आप अपनी ओर से प्रतिनिधि नियुक्त कर पत्नी से कहें कि वह अपनी ओर से प्रतिनिधि नियुक्त करे जो दोनों के मध्य सुलह कराने का प्रयत्न करें। आप यह काम उस काजी के माध्यम से भी कर सकते हैं जिस ने आप का निकाह पढ़ाया है।

दि कोई सुलह हो जाती है तो ठीक है और नहीं होती है तो आप दूसरा और तीसरा तलाक कहते हुए अपनी पत्नी को तलाक दे दें। आप यह सब कर रहे हैं उस का सारा दस्तावेजी सबूत होना चाहिए तथा हर तलाक के वाजिब गवाह होने चाहिए।

स बीच या तलाक के बाद यदि आप की पत्नी की ओर से 498ए भारतीय दंड संहिता, घरेलू हिंसा अधिनियम और धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता की कोई कार्यवाही होती है तो आप अपनी स्पष्टता से उन कार्यवाहियों में अपनी प्रतिरक्षा कर सकते हैं। आप को यह सब बिना किसी डर के करना चाहिए और इस बात का विश्वास करना चाहिए कि जब आप सच्चे हैं और आप के पास सब सबूत हैं तो आप का बाल भी बांका नहीं हो सकता।

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मुस्लिम विधि में बेटी को उत्तराधिकार

September 29, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_muslim-women-common2.jpgसमस्या-

रशिद नाईकवाडे ने आआजरा, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरी माता मुस्लिम है। क्या उन्हें उनके पिता की जमीन में हिस्सा मिल सकता है?

समाधान

मुस्लिम विधि में पुश्तैनी संपत्ति नाम की कोई संपत्ति नहीं होती। जो संपत्ति जिस की होती है उसी का उस पर स्वामित्व होता है और कोई भी उस की संपत्ति में हिस्सा नहीं मांग सकता। यदि किसी संपत्ति के स्वामी की मृत्यु हो जाए तो मुस्लिम विधि के अनुसार मृतक के कर्जों, मेहर व अन्तिम संस्कार का खर्च चुकाने के उपरान्त जो संपत्ति बचे उस का उत्तराधिकार तय होता है। जिन जिन लोगों को विधि के अनुसार मृतक की संपत्ति का हिस्सा मिलता है उस का वे बँटवारा नहीं करें तब तक वह उन उत्तराधिकारियों की संपत्ति बनी रहती है। अनेक बार उत्तराधिकारियों में से कुछ का देहान्त बँटवारे हो जाता है। तब उस उत्तराधिकारी के हिस्से में उस के उत्तराधिकारियों के हिस्से निहित हो जाते हैं। इस कारण संयुक्त संपत्ति का जितनी जल्दी बँटवारा हो जाए अच्छा है।

कोई भी मुस्लिम वसीयत भी कर सकता है। लेकिन यह वसीयत उस की एक तिहाई संपत्ति की ही की जा सकती है तथा किसी भी उत्तराधिकारी के नाम नहीं की जा सकती, जब तक कि अन्य उत्तराधिकारियों से वसीयत करने वाला अनुमति प्राप्त नहीं कर ले।

मुस्लिम विधि में उत्तराधिकार में बेटी का हिस्सा बेटे के हिस्से से आधा है। यदि आप की माता जी के पिता की मृत्यु हो चुकी है तो उन की संपत्ति में उन का हिस्सा है और वे इसे प्राप्त करने के लिए संयुक्त संपत्ति के बँटवारे का वाद संस्थित कर सकती हैं।

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