Muslim Law Archive

पिता की संपत्ति में हिस्से के लिए बँटवारे का वाद संस्थित करें।

November 22, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

partition of propertyसमस्या-

तनवीर खान ने बलरामपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे नाना के एक बेटा और एक बेटी हैं। नाना की मृत्यु 2001 में हो चुकी है,मामा और मेरी माँ जीवित हैं। अभी तक सारे सम्पति नाना के पिताजी के नाम है। 1998 में मामाजी 50000 रुपए का जमीन देकर उसी ज़मीन के रजिस्ट्री पेपर पे मम्मी से लिखवा लिए कि “मैं अपना हिस्सा प्राप्त कर चुकी” जब कि सम्पति करोड़ों की है। नानाजी और मामाजी पूरी ज़िन्दगी ज़मीन बेचकर ही गुज़ारा किये हैं, परंतु अभी भी काफी ज़मीन और उस से अर्जित सम्पति बाकी है। हम लोग मुस्लिम समुदाय से हैं, क्या उस सम्पति पर मेरी माँ का अधिकार है? यदि हाँ, तो सही मार्गदर्शन कर मेरी मदद करें।

समाधान-

मुस्लिम विधि के अनुसार पिता के उत्तराधिकार में यदि केवल एक पुत्री व एक पुत्र हो तो पुत्र को 2/3 तथा पुत्री को 1/3 हिस्सा प्राप्त होता है। इस तरह आप की माताजी को जिस दिन आप के नाना का देहान्त हुआ नानाजी की संपत्ति मे 1/3 एक तिहाई हिस्से का अधिकार प्राप्त हुआ था।

स में से आप की माँ को भूमि का एक हिस्सा दिया गया है। उस की रजिस्ट्री भी हुई है। रजिस्ट्री किस दस्तावेज की हुई है यह आप ने स्पष्ट नहीं किया है। उस में यह लिखा हुआ है कि आप की माँ ने अपना हिस्सा प्राप्त कर लिया है। लेकिन उस दस्तावेज का अध्ययन कर के कोई अच्छा वकील ही बता सकता है कि इसे बंटवारा कहा जा सकता है अथवा नहीं। आप उस दस्तावेज का किसी अच्छे वकील से अध्ययन करवाएँ।

प की माताजी यह कर सकती हैं कि मामा के विरुद्ध पिता की संपत्ति के बंटवारे का वाद संस्थित कर दें। आप के मामा इस पर यह आपत्ति अवश्य करेंगे कि आप की माताजी अपना हिस्सा ले चुकी हैं। तो यह साबित करने की जिम्मेदारी आप के मामा की है। उक्त दस्तावेज की व्याख्या न्यायालय कर देगा। अधिक संभावना इस बात की है कि इस तरह का दस्तावेज बंटवारे का विकल्प नहीं हो सकता। आप की माताजी अपना शेष हिस्सा प्राप्त करने में सफल हो सकती हैं।

मिथ्या मुकदमों से डरे बिना सचाई के साथ वाजिब कार्यवाही करें।

November 13, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_judicial-sep.jpgसमस्या-

अहमद ने इलाहाबाद उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी केवल 15 दिन मेरे साथ रही और उस ने मेरे साथ कोई संबंध नहीं बनाने दिया। उस के बाद मायके चली गयी। मैं ने रिश्तेदारो को भेज कर मामले को सुलझाने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली। क्या मैं मुस्लिम रीति से तलाक दूँ। वह दहेज का मुकदमा लगा कर मेरा वेतन बाँटने की धमकी दे रही है। मुझे क्या करना चाहिए। मैं बिना 498ए व धारा 125 के मुकदमों से बच कर कैसे अलग हो सकता हूँ?

समाधान-

म अनेक बार कह चुके हैं कि 498ए भारतीय दंड संहिता, घरेलू हिंसा अधिनियम और धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के डर से लोग उन्हें जो वाजिब कार्यवाही करना चाहिए वह भी नहीं करते हैं। नतीजा यह है कि मामला उलझता जाता है। कोई भी कानूनी कार्यवाही किसी के करने से होती है और किसी को कोई भी कार्यवाही करने से रोका नहीं जा सकता। वह आज होगी तो होगी भविष्य में होगी तो होगी। लोग इस कारण से वाजिब कार्यवाही करने से रुके रहते हैं। फिर वही तथ्य जब वे बचाव में प्रस्तुत करते हैं तो वे देरी के कारण उतने कामयाब नहीं होते।

मारी राय में आप को इस्लामी रीति से तलाक की कार्यवाही करनी चाहिए। लेकिन यह अच्छी तरह समझ लें कि शरिया के हिसाब से तलाक कैसे होना चाहिए। भारत में एक साथ तीन बार तलाक कह देने से अब तलाक संभव नहीं है। शरिया कहता है कि पहले तलाक और तीसरे तलाक के बीच पर्याप्त समय होना चाहिए और दोनों पक्षों के चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से दोनों के बीच सुलह कराने का अवसर मिलना चाहिए।

स विधि को अपनाने के लिए आप अपनी पत्नी को पत्नी द्वारा आप के साथ संबंध बनाने से इन्कार करने के कारण तलाक कह रहे हैं लेकिन सुलह चाहते हैं इसी नोटिस में आप अपनी ओर से प्रतिनिधि नियुक्त कर पत्नी से कहें कि वह अपनी ओर से प्रतिनिधि नियुक्त करे जो दोनों के मध्य सुलह कराने का प्रयत्न करें। आप यह काम उस काजी के माध्यम से भी कर सकते हैं जिस ने आप का निकाह पढ़ाया है।

दि कोई सुलह हो जाती है तो ठीक है और नहीं होती है तो आप दूसरा और तीसरा तलाक कहते हुए अपनी पत्नी को तलाक दे दें। आप यह सब कर रहे हैं उस का सारा दस्तावेजी सबूत होना चाहिए तथा हर तलाक के वाजिब गवाह होने चाहिए।

स बीच या तलाक के बाद यदि आप की पत्नी की ओर से 498ए भारतीय दंड संहिता, घरेलू हिंसा अधिनियम और धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता की कोई कार्यवाही होती है तो आप अपनी स्पष्टता से उन कार्यवाहियों में अपनी प्रतिरक्षा कर सकते हैं। आप को यह सब बिना किसी डर के करना चाहिए और इस बात का विश्वास करना चाहिए कि जब आप सच्चे हैं और आप के पास सब सबूत हैं तो आप का बाल भी बांका नहीं हो सकता।

मुस्लिम विधि में बेटी को उत्तराधिकार

September 29, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_muslim-women-common2.jpgसमस्या-

रशिद नाईकवाडे ने आआजरा, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मेरी माता मुस्लिम है। क्या उन्हें उनके पिता की जमीन में हिस्सा मिल सकता है?

समाधान

मुस्लिम विधि में पुश्तैनी संपत्ति नाम की कोई संपत्ति नहीं होती। जो संपत्ति जिस की होती है उसी का उस पर स्वामित्व होता है और कोई भी उस की संपत्ति में हिस्सा नहीं मांग सकता। यदि किसी संपत्ति के स्वामी की मृत्यु हो जाए तो मुस्लिम विधि के अनुसार मृतक के कर्जों, मेहर व अन्तिम संस्कार का खर्च चुकाने के उपरान्त जो संपत्ति बचे उस का उत्तराधिकार तय होता है। जिन जिन लोगों को विधि के अनुसार मृतक की संपत्ति का हिस्सा मिलता है उस का वे बँटवारा नहीं करें तब तक वह उन उत्तराधिकारियों की संपत्ति बनी रहती है। अनेक बार उत्तराधिकारियों में से कुछ का देहान्त बँटवारे हो जाता है। तब उस उत्तराधिकारी के हिस्से में उस के उत्तराधिकारियों के हिस्से निहित हो जाते हैं। इस कारण संयुक्त संपत्ति का जितनी जल्दी बँटवारा हो जाए अच्छा है।

कोई भी मुस्लिम वसीयत भी कर सकता है। लेकिन यह वसीयत उस की एक तिहाई संपत्ति की ही की जा सकती है तथा किसी भी उत्तराधिकारी के नाम नहीं की जा सकती, जब तक कि अन्य उत्तराधिकारियों से वसीयत करने वाला अनुमति प्राप्त नहीं कर ले।

मुस्लिम विधि में उत्तराधिकार में बेटी का हिस्सा बेटे के हिस्से से आधा है। यदि आप की माता जी के पिता की मृत्यु हो चुकी है तो उन की संपत्ति में उन का हिस्सा है और वे इसे प्राप्त करने के लिए संयुक्त संपत्ति के बँटवारे का वाद संस्थित कर सकती हैं।

मुस्लिम विधि में कोई पैतृक या सहदायिक संपत्ति नहीं।

August 9, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

muslim inheritanceसमस्या-

आर एस ध्रुव ने धमतरी, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

क्या एक मुस्लिम अपने जीवनकाल में अपनी सारी संपत्ति का बँटवारा कर सकता है? उसे संपत्ति अपने पिता से वसीयत में मिली है।

समाधान

मुस्लिम विधि में कोई भी संपत्ति पैतृक या सहदायिक नहीं होती। केवल संयुक्त संपत्ति हो सकती है। लेकिन उस संयुक्त संपत्ति में किसी भी व्यक्ति का हिस्से पर उस का संपूर्ण अधिकार होता है न की उस में किसी अन्य का कोई अधिकार। इस तरह किसी भी मुस्लिम की संपत्ति उस की निजि संपत्ति होती है। इसी तरह किसी भी व्यक्ति को वसीयत में मिली संपत्ति उस की निजि संपत्ति होती है।

पिता से किसी मुस्लिम को वसीयत में प्राप्त संपत्ति उस की व्यक्तिगत संपत्ति है न कि संयुक्त या पैतृक या सहदायिक संपत्ति। इस कारण उस का बँटवारा किया जाना संभव नहीं है। हाँ एक मुस्लिम अपनी संपत्ति को दान कर सकता है, या विक्रय कर सकता है। यदि किसी मुस्लिम को अपनी संपत्ति का बँटवारा कुछ लोगों में करना है तो वह ऐसा केवल संपत्ति हस्तान्तरण की किसी विधि द्वारा कर सकता है। जब कि वह केवल अपने अंतिम संस्कार के खर्च और कर्जों को चुकाने के बाद बची हुई संपत्ति का एक तिहाई ही उन लोगों को वसीयत कर सकता है जो उस के उत्तराधिकारी नहीं हों। यदि किसी उत्तराधिकारी को वसीयत करना हो तो उस के शेष सभी उत्तराधिकारियों की सहमति आवश्यक होगी। इस तरह एक मुस्लिम द्वारा अपनी संपत्ति का बँटवारा किया जाना संभव नहीं है।

rp_muslim-women-common2.jpgसमस्या-

साइमा परवेज ने दरियागंज, नई दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मेरा ये सवाल है की एक विधवा औरत जब किसी से शादी कर लेती है तो उसका अपने पहले पति की प्रॉपर्टी में क्या हक़ रहता है? और अगर वह प्रॉपर्टी भी किसी के नाम न हो मतलब पुराने समय में D.D.A. की जगह में बाप दादाओ ने घर लिया था और वो किसी के नाम करके नहीं मरे हैं बेटे सब यूँ ही उस पर कमरे बनवाकर रहने लग गए तो उस प्रॉपर्टी पर हक़ है या नहीं? उनके अगर जवान बच्चे है तो क्या उनका कोई हक़ है इस प्रॉपर्टी पर?

समाधान

प के नाम से पता लगता है कि आप मुस्लिम व्यक्तिगत विधि से शासित होती हैं। मुस्लिम विधि में किसी तरह की कोई पुश्तैनी प्रोपर्टी नहीं होती। कोई भी संपत्ति सिर्फ व्यक्तिगत होती है। हाँ, संयुक्त संपत्ति हो सकती है जिस में व्यक्तियों के हिस्से हो सकते हैं। मसलन डीडीए की जगह में जिस व्यक्ति के नाम से घर आवंटित हुआ वह उस की संपत्ति हुई तथा उस की मृत्यु के उपरान्त उस के उत्तराधिकारियों की संयुक्त संपत्ति रहेगी जब तक कि उत्तराधिकार के नियमों के अनुसार उस का विभाजन न कर दिया जाए। यदि उन में से किसी हिस्सेदार की मृत्यु हो जाती है तो उस के हिस्से पर फिर से उस के उत्तराधिकारियों का संयुक्त स्वामित्व स्थापित हो जाता है। इस तरह विभाजन न होने के कारण किसी भी संपत्ति में हिस्सेदारों की संख्या बढ़ती जाती है। सही तो यह है कि सम्पत्ति के स्वामी या उस के किसी हिस्सेदार की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकारियों के हिस्से तय कर के अलग कर दिए जाने चाहिए जिस से संपत्ति के स्वामित्व की जटिलता न बढ़े।

क मुस्लिम विधवा को अपने पति की संपत्ति में अधिकार पति की मृत्यु के उपरान्त ही प्राप्त हो जाता है। किसी मुस्लिम पुरुष की मृत्यु पर उस की संपत्ति से सब से पहले उस के अन्तिम संस्कार का खर्चा, पत्नी की महर यदि बकाया हो और अन्य देनदारियाँ चुकाई जाती हैं। शेष संपत्ति में उत्तराधिकारियों को उत्तराधिकार प्राप्त होता है। उत्तराधिकार में भी विधवा पत्नी को यदि उस के कोई सन्तान नहीं हो तो मृत पति की चौथाई संपत्ति और यदि कोई संतान या संतानों की संतान हों तो उसे पति की संपत्ति का 1/8 हिस्सा प्राप्त होता है। यह हिस्सा विधवा को उस के पति की मृत्यु के साथ ही मिल चुका होता है तथा वह उस की स्वामिनी होती है। यदि वह दूसरा विवाह कर भी लेती है तो भी वह उस हिस्से की स्वामिनी बनी रहती है। इसी प्रकार पिता की मृत्यु के साथ ही उत्तराधिकार के नियमों के अनुसार संतानों का भी मृत पिता की संपत्ति में हिस्सा निहीत हो जाता है तथा बना रहता है। लेकिन जब तक कानून के अनुसार विभाजन नहीं होता संयुक्त रूप से उत्तराधिकारी उस संपत्ति का आपसी सहमति से उपयोग करते रहते हैं। कोई अपना हिस्सा अलग प्राप्त करना चाहे तो उसे विभाजन का वाद न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए।

आप को ठोस सबूतों से साबित करना पड़ेगा कि आप की कोई आय नहीं है।

July 10, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_anxietysymptoms12.jpgसमस्या-

सलमा ने सूरत, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरा सूरत परिवार न्यायालय में धारा 125 दं.प्र.संहिता का मुकदमा चल रहा है। शादी से पहले से मेरे नाम पर मेरे पापा आयकर का रिटर्न फाइल करते थे। जिस के कारण मुझे न्यायालय ने भरण पोषण खर्चा नहीं दिलाया और केवल मेरे बच्चे को 7500 रुपय़ा खर्चा दिलाया गया है और मुझे कुछ नहीं दिलाया गया है। अब रिटर्न भरना बन्द कर दिया है और मेरी कोई आय नहीं है। क्या मेरी भरण पोषण की अर्जी मंजूर हो सकती है। मेरे पति का वेतन 50000 प्रतिमाह है, उसे पीएफ कट कर 47000 रुपए मिलते हैं। उन के पास जमींदारी भी है। मुझे और मेरे बच्चे को कितना भरण पोषण प्रतिमाह मिल सकता है।

समाधान-

प के पापा आप के नाम से रिटर्न फाइल करते थे। इस का सीधा अर्थ था कि आप की स्वयं की आय थी। इस कारण से आप को भरण पोषण नहीं दिलाया गया। केवल आप की सन्तान को दिलाया गया। आप के पति ने आप और बच्चे के सिवा भी अपने परिवार के अन्य व्यक्तियों को जैसे माता, पिता और भाई बहन को अपना आश्रित बताया होगा इसी कारण आप के बच्चे का खर्चा 7500 रुपए प्रतिमाह निश्चित किया गया है।

ब आप को चाहिए के न्यायालय में सीधे तौर पर यह बयान दें कि आप के पापा आप के नाम से व्यापार करते थे इस कारण से आप की आय थी। उस आय से एकत्र हुए धन को आप के पापा ने आप के विवाह में खर्च कर दिया और व्यवसाय को विक्रय कर के उसे समाप्त कर दिया है और अब आप की कोई आय नहीं है। इस कारण आप को खर्चा दिलाया जाए। आप की कोई आय नहीं रह गयी है इसे आप को ठोस सबूतों से साबित करना पड़ेगा और आप के पापा का भी बयान कराना पड़ेगा। तभी आप को भरण पोषण मिल सकता है।

प को भरण पोषण कितना मिलेगा इस का कोई अनुमान भी तब तक नहीं लगाया जा सकता जब तक कि आप का आवेदन उस का जवाब तथा दोनों पक्षों की साक्ष्य किसी के सामने न हो। फिर भी इतना कहा जा सकता है कि आप के पति की कुल आय जो न्यायालय माने उस की आधी राशि तक आप को व आप के पुत्र को कुल भरण पोषण के रूप में प्राप्त हो सकती है, इस से अधिक नहीं।

भारत में मुस्लिम पुरुष द्वारा पत्नी को तलाक़ देने की विधि …

June 26, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_women.jpgसमस्या-

सलीम ने शहडोल, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं अपनी पत्नी को तलाक़ देना चाहता हूँ, हमारा रिश्ता नहीं चल पा रहा है। अगर मैं कॉल कर के उस को तलाक़ ३ बार बोल दूँ तो क्या हमारा तलाक़ हो जाएगा या मैसेज करूँ? उस के बाद उस के क्या हक़ हैं? और मेरे क्या हक़ हैं?

समाधान-

मुस्लिम विधि में तिहरे तलाक़ की व्यवस्था है। इस का आधार कुऱआन है। लेकिन इस तलाक़ की व्याख्या अनेक बार हुई है। आम धारणा यह है कि यदि पति तीन बार पत्नी को तलाक कह दे या लिख कर दे दे तो तलाक़ सम्पन्न हो जाता है। पर यह धारणा गलत है।

भारत में तलाक़ को यदि पत्नी द्वारा या अन्य किसी व्यक्ति द्वारा न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जाए तो हमेशा पति को न्यायालय में यह साबित करना पड़ता है कि उस ने अपनी पत्नी को जो तलाक़ दिया है वह विधि के अनुरूप है।

पाकिस्तान में 1961 में तलाक़ के सम्बन्ध में एक अध्यादेश Muslim Family Laws Ordinance, 1961 पारित किया गया जो पाकिस्तान व वर्तमान बंगलादेश में प्रभावी हैं। उस की धारा-7 के प्रावधान निम्न प्रकार हैं-

  1. कोई भी पुरुष जो अपनी पत्नी को तलाक देना चाहता है, जैसे ही किसी भी रूप में तलाक़ की घोषणा करता है, (बेसिक डेमोक्रेटिक ऑर्डर, 1959 के अनुसार गठित यूनियन कौंसिल के) चेयरमेन को लिखित में नोटिस देगा और उस की एक प्रति अपनी पत्नी को भेजेगा।
  2. जो उपधारा 1 का उल्लंघन करेगा वह एक वर्ष के साधारण कारावास से या पाँच हजार रुपए के अर्थदण्ड से या दोनों से दण्डित किया जा सकेगा।
  3. उपधारा 5 के अतिरिक्त यदि तलाक़ किसी भी प्रकार से पहले वापस नहीं लिया गया हो तो चेयरमेन को नोटिस प्राप्त होने के 90 दिनों की समाप्ति के पूर्व प्रभावी नहीं होगा।
  4. चेयरमेन तलाक़ का नोटिस प्राप्त होने के 30 दिनों की अवधि में दोनों पक्षों के मध्य पुनर्विचार हेतु एक समझौता समिति गठित करेगा जो दोनों पक्षों के मध्य पुनर्विचार की कार्यवाही करगी।
  5. यदि पत्नी तलाक की घोषणा होने के समय गर्भधारण काल में हो तो उपधारा 3 में वर्णित अवधि या गर्भकाल तक जो भी बाद में समाप्त हो तलाक प्रभावी नहीं होगा।

स अध्यादेश से यह स्पष्ट है कि कुऱआन की व्यवस्था यही है कि एक ही समय में किसी भी विधि से तीन बार तलाक़ दे देने मात्र से तलाक़ नहीं हो सकता। तलाक़ के पहले कथन व अन्तिम कथन के मध्य दोनों पक्षों में विवाह को बचाए जाने के लिए समझाइश होनी चाहिए।

र्तमान में भारतीय न्यायालय भी इसी सिद्धान्त की पालना करते हैं। भारत के उच्चतम न्यायालय ने शमीम आरा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के मुकदमे में गौहाटी उच्च न्यायालय द्वारा रुकैया ख़ातून [Rukia Khatun Vs. Abdul Khalique Laskar, (1981) 1 GLR 375] के मामले में दिए गए निर्णय और व्याख्या को सर्वाधिक उचित बताया है। जिस में कहा गया है कि तलाक़ में दो बातें होना जरूरी हैं। (1) तलाक़ किसी उचित कारण से दिया गया हो, (2) तलाक़ के पहले एक समझौता परिषद द्वारा जिस में एक प्रतिनिधि पति पक्ष से तथा दूसरा प्रतिनिधि पत्नी पक्ष से हो समझैता संपन्न कराने की वास्तविक कोशिश होनी चाहिए और इस कोशिश के असफल होने पर ही तलाक प्रभावी होना चाहिए।

स तरह आप समझ सकते हैं कि मुहँ से सामने या फोन पर तीन बार तलाक़ बोल देने या तीन बार एसएमएस कर देने मात्र से यह तिहरा तलाक संपन्न नहीं होगा। कोई भी भारतीय न्यायालय ऐसे तलाक़ को वैध नहीं मानेगी और उस स्त्री को पत्नी ही माना जाएगा।

दि आप को तलाक देना है तो उस के लिए कोई उचित कारण होना चाहिए जो प्रदर्शित किया गया हो और एक समझौता परिषद द्वारा जिस में आप का और आप की पत्नी का प्रतिनिधि हो जिन्हें लिखित रूप में दोनों द्वारा नियुक्त किया गया हो और गवाहों के हस्ताक्षर हों, और इस समझौता परिषद के दोनों व्यक्तियों ने समझौते के वास्तविक प्रयास करने के उपरान्त लिखित में दे दिया हो कि उन के प्रयास असफल रहे हैं। तभी आप तीसरा तलाक कह सकते हैं और उसे विधि पूर्वक तलाक माना जाएगा।

विधिपूर्वक तलाक हो जाने के उपरान्त पति के पास पत्नी के प्रति कोई अधिकार नहीं रह जाता है। पत्नी इद्दत की अवधि में पति से अपने भरण पोषण प्राप्त कर सकती है। भारत में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 पत्नी, बच्चों व माता पिता के भरण पोषण के दायित्व के सम्बन्ध में है। उच्चतम न्यायालय का निर्णय है कि तलाक़शुदा पत्नी जब तक दूसरा विवाह नहीं कर लेती है तब तक उस की अपनी और अपने पूर्व पति की हैसियत के मुताबिक भरण पोषण की राशि प्रति माह प्राप्त कर सकती है।

मुस्लिम विधि में पुत्री का उत्तराधिकार में हिस्सा …

June 17, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

lawसमस्या-

चमन ने बिहार , बिहार से बिहार राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे नाना जी को पांच बेटे और एक बेटी है और नाना और नानी जी का इंतेक़ाल हो गया है। मेरी नानी की माँ ने अपनी जमीन मेरी नानी के नाम कर दी, और नानी मरने से पहले जमीन किसी के नाम कर के नही गयी है। मुझे पता करना है कि मुस्लिम लॉ के हिसाब से लड़की का हिस्सा अपनी माँ के जायदाद में कितना मिलेगा है और बाप के जायदाद में कितना हिस्सा मिलेगा।

समाधान-

मुस्लिम विधि में उत्तराधिकार गणितीय तो है ही उस के साथ साथ अनेक प्रकार की शरायतें भी उस में हैं। एक खास परिस्थिति में किसी भी उत्तराधिकारी का शेयर बदल जाता है। उस में उत्तराधिकारियों की तीन श्रेणियाँ हैं। शेयरर, रेजिड्युअरी और डिस्टेंट किंड्रेड। सबसे पहले मृतक की संपत्ति से उस के अंतिम संस्कार का व्यय, मेहर, कर्जा आदि का भुगतान किया जाता है। इन के बाद बची हुई संपत्ति शेयरर के बीच उन के हिस्सों के हिसाब से बाँटी जाती है। उन के शेयर्स का भुगतान होने के बाद शेष संपत्ति या कोई भी शेयरर उपलब्ध न होने पर रेजीड्युअरियों के मध्य बाँटी जाती है। यदि किसी मृतक/ मृतका के कोई पुत्र नहीं है तो पुत्री शेयरर्स में सम्मिलित हो जाती है। लेकिन यदि पुत्र जीवित है तो फिर पुत्र और पुत्रियाँ दोनों ही शेयरर्स नहीं होते अपितु रेजिड्यूअरी हो जाते हैं। पुत्रों को जितना मिलता है उस का आधा पुत्री को प्राप्त होता है।

प के मामले में जैसा कि आप ने विवरण दिया है कोई शेयरर मौजूद नहीं है इस कारण पाँच पुत्रों के दस शेयर होंगे तथा एक शेयर पुत्री का होगा। इस तरह माता की संपत्ति में प्रत्येक पुत्र को 2/11 हिस्सा प्राप्त होगा और पुत्री (आप की माता जी) को 1/11 हिस्सा प्राप्त होगा।dA

मुस्लिम पुरुष का दूसरा विवाह कानून से रोक पाना संभव नहीं।

May 20, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_Muslim_Women1.jpgसमस्या-
फऱहा ने सूरत गुजरात से समस्या भेजी है कि –
मैं मुस्लिम लड़की हूँ। मैं ने अपने पति पर 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत केस किया है।  उन्होंने मुझे कुछ समय पहले तलाक़ नामा भेजा वो इस्लाम के हिसाब से सही तलाक़ नहीं है। मैं जानना चाहती हूँ कि क्या मैं उन को दूसरी शादी करने से रोक सकती हूँ? वो दूसरी लड़कियाँ देख रहे हैं और शादी करेंगे। तो क्या क़ानूनी या किसी भी तरह से मैं उन को रोक सकती हूँ? उन का वेतन 45000 प्रतिमाह है उन की जिम्मेदारी में उन की माँ है और उन के 5 भाई दूसरे भी हैं ओर मेरा एक 3 साल का बेटा है तो मुझे कितना पैसा मिल सकता है।

समाधान-

दि आप का तलाक इस्लाम के हिसाब से सही नहीं है तो न्यायालय भी इसे तलाक नहीं मानेगा। भारतीय न्यायालयों का मानना है कि पहले तलाक के उपरान्त बिना समझाइश की प्रक्रिया के अन्तिम तलाक देने से तलाक नहीं होता। ऐसे तलाकों को भारतीय न्यायालयों ने अकृत तलाक माना है।

स्लामी विधि शरीया के अनुसार है। जिस में एक पुरुष एक साथ चार पत्नियाँ रख सकता है। इस तरह एक मुस्लिम पुरुष एक विवाहिता के होते हुए भी तीन और विवाह कर सकता हैं। दूसरा विवाह करने के लिए किसी मुस्लिम पुरुष को उस की पहली पत्नी की अनुमति लेना भी जरूरी नहीं है। इस कारण से किसी प्रक्रिया के द्वारा किसी मुस्लिम पुरूष द्वारा किए जाने वाले दूसरे निकाह को रोक पाना संभव नहीं है।

प के पति पर उस की माँ और आप के पुत्र की जिम्मेदारी है। पाँच भाई यदि अवयस्क हैं तो उन की जिम्मेदारी भी मानी जाएगी। यदि सब के पालन पोषण की जिम्मेदारी भी आप के पति की मानी जाए तब भी धारा 125 के अन्तर्गत रुपये 5000 से 10,000 तक भरण पोषण राशि प्रतिमाह आप को अपने पति से प्राप्त हो सकती है।

मुस्लिम विधि में तलाक पुरुष का अधिकार है।

December 22, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

domestic-violenceसमस्या-

नीलोफर ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

क्या किसी मुसलमान शिया लड़की का पति उसकी मर्ज़ी के बिना या यह बहाना बना कर कि उस की पत्नी अपने मायके में रहना चाहती है, तलाक़ दे सकता है? मेरी पति सरकारी एम्प्लायी हैं उन पर कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती क्या? मेरी 2 साल की बेटी भी है, उन्हों ने मुझ से पुलिस स्टेशन में प्लैन पेपर पर लिख कर दिया कि मैं अपनी मर्जी से तलाक़ चाहती हूँ। पर उन्हों ने अभी तक तलाक़ के पेपर ना दे कर मौलाना से मेसेज करवा दिया था कि तलाक़ के लिए आप के पापा तैयार हैं क्या? मैं ने मौलाना से पहले मौखिक व मैसेज से कहा था कि मुझे तलाक नहीं चाहिए। वह मुझे दहेज के लिए तंग करता था इसलिए मैं गर्भावस्था में अपने घर आ गई थी।

समाधान-

प के पति बिना किसी आधार के भी तलाक दे सकते हैं। मुस्लिम विधि में तलाक देना पति का अधिकार है। लेकिन उन्हें तलाक के पहले एक बार दोनों के बीच समझाइश की कार्यवाही की जानी चाहिए। अन्यथा तलाक न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किया जा सकता है। यदि वे दहेज के लिए तंग करते हैं और आप के साथ उन का व्यवहार ठीक नहीं है तो आप इस के लिए कार्यवाही कर सकती हैं।

दि उन्हों ने आप को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया है तो आप धारा 498ए के अन्तर्गत कार्यवाही कर सकती हैं। इस के अलावा आप धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता व महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण के कानून के अन्तर्गत अपने व अपनी बेटी के भरण पोषण की राशि प्राप्त करने के लिए भी आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं.

दि आप के पति तलाक देते भी हैं तो उन्हें तत्काल आप की न चुकाई गई मेहर तो चुकानी ही होगी। तलाक के उपरान्त जब तक आप दूसरा विवाह नहीं कर लेती हैं तब तक भरण पोषण का खर्च देना होगा। बेटी के भरण पोषण का खर्च भी उन्हें तब तक देना होगा जब तक कि उस का विवाह नहीं हो जाता है।

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