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समस्या-

धर्मेन्द्र सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी का मकान है जिनकी मृत्यु हो गयी है। अब इस मकान पर उनका छोटा पुत्र कब्जा करना चाहता है। मेरी दादीजी जिंदा है वो यह मकान नहीं देना चाहती हैं। ये मकान दादीजी के नाम करवाना है और उनके छोटे पुत्र को बाहर निकलना है। इसके लिए मैं क्या करुँ?

समाधान-

प के दादा जी का देहान्त होने के पहले उन्हों ने कोई वसीयत नहीं की है। आप के दादा जी के देहान्त के साथ ही उन का उत्तराधिकार खुल गया है औोर उन की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो चुकी है। आप के दादा जी के उत्तराधिकारी, उन के पुत्र, पुत्रियाँ, मृत पुत्र/ पुत्रियों की पत्नी/ पति और उन की संतानें, उन की पत्नी (आप की दादीजी) हैं। ये सभी उस मकान के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। आप के दादाजी के छोटे पुत्र को भी उस मकान के स्वामित्व में हिस्सेदारी प्राप्त हुई है। इस हिस्सेदारी से उसे अलग नहीं किया जा सकता।

आप की दादी या अन्य कोई भी उत्तराधिकारी यह कर सकता है कि मकान के बंटवारे का दावा करे और सब को अलग अलग हिस्सा देने की राहत प्रदान करने की मांग करे, या फिर यह भी राहत मांगी जा सकती है कि आप के दादाजी के छोटे पुत्र को उस के हिस्से की कीमत अदा कर के उस मकान से बेदखल करने की डिक्री की मांग की जाए। इस बीच अस्थाई निषेधाज्ञा जारी कराई जा सकती है कि दादाजी का छोटा पुत्र न्यूसेंस पैदा न करे। यदि वह फिर भी कुछ गड़बड़ करता है या तंग करता है तो दादी जी की ओर से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा का प्रतिषेध अधिनियम में कार्यवाही की जा सकती है।

 

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बंटवारे का वाद प्रस्तुत कर न्यायालय से बंटवारा कराएँ।

June 10, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

उमाकान्त ने देवी तहसील सौसर, जिला छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

दादाजी ने अपने जीवनकाल में कोई बंटवारा नहीं किया और न ही नाप के हिसाब से जोतने के लिए दिया। लेकिन उन की मृत्यु के बाद जिन्हें जोतने को ज्यादा मिला वे बंटवारा नहीं चाहते लेकिन बाकी हिस्सेदार बंटवारा चाहते हैं। हमन कुछ कानूनी कार्यवाही की लेकिन उन्हों ने जानपहचान से रद्द करवा दी। बताए हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

प ने क्या कानूनी कार्यवाही की यह नहीं बताया। हमें लगता है कि आप ने कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की बल्कि आप राजस्व अधिकारियों को फिजूल मैं आवेदन देते रहे। अब आप की समस्या का हल न्यायालय द्वारा बंटवारे में है। आप ने यह भी नहीं बताया है कि दादाजी के देहान्त के बाद नामान्तरण भी हुआ है या नहीं। यदि नहीं हुआ है तो नामान्तरण कराना चाहिए।

यदि नामान्तरण हो गया है तो ठीक वर्ना नामान्तरण की कार्यवाही के साथ साथ आप को चाहिए कि आप राजस्व न्यायालय में अपनी जमीन के बंटवारे, खाते अलग अलग करने और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा दिलाए जाने के लिए वाद प्रस्तुत करें। बाकी सभी हिस्सेदार और राज्य सरकार जरिए तहसीलदार पक्षकार बनेंगे। यह वाद तब तक चलेगा जब तक कि बंटवारा हो कर सब को अपने अपने हिस्से पर अलग कब्जा न मिल जाए।

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समस्या-

रोहन ने लुधियाना, पंजाब से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे नाना का देहान्त2015 में हुआ। वो हमारे साथ लुधियाना ही रहते थे। सारी संपत्ति हरदोई उत्तर प्रदेश में है। मृत्यु के पहले उन्हों ने वसीयत की इच्छा की थी, वो हमने करवाई। उन्हों ने 4 हिस्सों में अपनी सम्पति वसीयत की क्यों कि उनके 3 लड़के थे। चौथा हिस्सा उन्हों ने हमारी मां को वसीयत किया। उत्तराधिकार में उस सम्पति का नामान्तरण नायब की कोर्ट से 3 लोगो के हक़ में था। बाद में वसीयत दाखिल की हमने और तहसीलदार ने पंजीकृत वसीयत के आधार पर मेरी माँ का नाम भी नामान्तरण करवा दिया। समस्या ये है कि आर्डर के 70 दिन बाद एक मामा ने आर्डर के खिलाफ अपील की है। क्या अपील अवधि बाधित नहीं है?  क्या नामान्तरण हो जाने से भी हमें कोई लाभ नहीं मिलेगा? नाना ने चौथा हिस्सा हमारे नाम किया है क्या उस पे हम कब्जा नहीं ले सकते।  वसीयत के समय छोटे मामा साथ थे, उन्होंने हमारे हक़ में एफिडेविट भी लगाया था । क्या एसडीएम ऑर्डर बदल सकते हैं। हम को कब्जा कैसे मिलेगा एग्रीकल्चर लैंड का,वो 14 बीघा का है? उसका पार्टीशन कैसे करवाए? उसका अलग खाता कैसे करवाएँ?

समाधान-

दि  किसी नामान्तरण के मामले में वसीयत प्रस्तुत हो और  उसे चुनौती दी जाए तो तहसलीदार या नायब उस मामले में नामान्तरण नहीं कर सकता। वैसी स्थिति में नामान्तरण कराने के लिए न्यायालय ही जाना होगा। इस  मामले में आप ने जब वसीयत पेश की तो तहसलीदार ने अन्य पक्षकारों को बुलाया या नहीं या आपत्तियाँ ली या नहीं उस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अपील तो व्यथित पक्षकार का अधिकार है, इस कारण उस पर सुनवाई होगी और तभी उस का निर्णय होगा। अपील यदि अवधि बाधित है तो आप अपील में यह आपत्ति ले सकते हैं। यदि वसीयत में कोई खेोट नहीं है तो अपील भी आप की माँ के पक्ष में निर्णीत हो जाएगी। लेकिन अपील आप के हक में निर्णीत हो जाने मात्र से आप को जमीन का कब्जा नहीं मिल जाएगा। .

नामान्तरण से किसी भी कृषि भूमि में उस के हिस्सेदारो का हिस्सा निर्धारित हो जाता है लेकिन भूमि संयुक्त बनी रहती है उस पर सभी हिस्सेदारों का संयुक्त स्वामित्व बना रहता है। अलग अलग खाता करने के लिए और अपने खाते की भूमि पर अलग कब्जा प्राप्त करने के लिए आप की माता जी को संयुक्त स्वामित्व की भूमि के बंटवारे और अपने हिस्से पर कब्जा दिलाए जाने का दावा करना पड़ेगा। चूँकि नामान्तरण आज भी आप के पक्ष में है इस कारण आप यह दावा तुरन्त कर सकते हैं। आप को अपील का निर्णय होने का इन्तजार किए बिना बंटवारे का दावा कर देना चाहिए।

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समस्या-

अनिल ने भोपाल, मध्य प्रदेश से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी के नाम एक मकान है। मेरे पिता वर्ष २००३ से लापता हैं। मेरे पिता ४ भाई हैं। तीनों भाइयों ने मुझे ये मकान मौखिक हिस्से में दे दिया था। मैं २० बर्षो से इस मकान कि देख रेख व टेक्स देता आ रहा हूँ।  मकान पर मेरा कब्ज़ा है तथा किरायेदार भी मुझे ही किराया देते हैं। वर्ष २०१२ में मैंने मकान का नामांतरण अपनी माँ के नाम से करा लिया था।  अब उन्होंने उससे निरस्त करा के उसे मेरी दादी के नाम करा लिया है? क्या वे उसे बेच सकती हैं? उन्हें कैसे रोका जाये?

समाधान-

नामान्तरण किसी भी प्रकार से स्वामित्व और स्वामित्व के हस्तांतरण को प्रकट नहीं करता है। आप का उस मकान पर 20 वर्षों से कब्जा है, इस कारण कोई आप को उस मकान से बेदखल नहीं कर सकता। किन्तु मौखिक बंटवारे में आप को मकान मिला था इसे साबित करना आसान नहीं होगा। देख-रेख करना और टैक्स जमा करने मात्र से यह उपधारणा नहीं ली जा सकती है कि वह मकान आप को मौखिक बंटवारे में दे दिया गया था। यदि यह साबित होता है कि कोई बंटवारा नहीं हुआ था तो दादाजी के मकान और शेष संपत्ति का बंटवारा होना चाहिए और उस स्थिति में उन के सभी उत्तराधिकारियों को उस का हिस्सा मिलना चाहिए।

आप के पिता 2003 से लापता हैं तो आप दीवानी न्यायालय में घोषणा का दावा कर के उन्हें मृत घोषित करवा सकते हैं और इस घोषणा के आधार पर मृत्यु प्रमाण पत्र आप को मिल सकता है। वैसी स्थिति में आप अपने पिता के उत्तराधिकारी हो जाएंगे। चूंकि दादी के नाम मकान का नामान्तरण हो जाने से वह मकान दादी का नहीं हो जाता बल्कि संयुक्त संपत्ति बना रहता है। इस कारण उन्हें इस मकान को बेचना तो नहीं चाहिए। फिर भी ऐसी कोशिश हो सकती है। इस के लिए स्थाई निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत कर विक्रय पर अस्थाई   निषेधाज्ञा प्राप्त की जा सकती है। इस वाद में आप यह कथन कर सकते हैं कि आप के पिता 14 वर्षों से लापता है इस कारण साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत उपधारणा के अंतर्गत उन्हें मृत माना जाना चाहिए और आप उन के उत्तराधिकारी होने के नाते यह वाद प्रस्तुत कर रहे हैं।

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समस्या-

रेणु भदोरिया ने अहमदाबाद गुजरात से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

म उत्तर प्रदेश के जसमई गाँव के निवासी थे पिछले 25 सालों से हम अहमदाबाद में निवास कर रहे हैं। हमारे गांव में हमारी पुश्तैनी ज़मीन है घर बनाने की उस में से कुछ ज़मीन पर हमारे परिवार के लोगों ने कब्जा कर लिया था, और हमारे घर के निकालने का रास्ता सिर्फ़ 2.5 फुट छोड़कर अपना निर्माण कर लिया और वो लोग कहते है हमने तुम्हारे ज़मीन पर कब्जा नहीं किया। हमारी घर की ज़मीन का बटवारा प्रधान द्वारा किया गया था, जो बाद में प्रतिपक्ष वालों ने मानने से इनकार कर दिया। इसके अलावा परिवार के दूसरे लोगों द्वारा भी हमारी ज़मीन निर्माण कर लिया गया है। अब मैं चाहती हूँ कि बिना लड़ाई झगड़े के हमें हमारी ज़मीन क़ानून के नियम के हिसाब से मिल जाए। मैं सरकारी बटवारा करना चाहती हूँ। उसके लिए हमें क्या करना पड़ेगा?

समाधान-

प का कहना सही है आप की संयुक्त संपत्ति का बँटवारा नहीं हुआ है। हमारे यहाँ ऐसे ही चलता रहता है। परिवार के कुछ लोग गाँव से बाहर चले जाते हैं। जो रह जाते हैं वे आपस में संपत्ति के अधिक से अधिक भाग पर कब्जा बनाए रखने की कोशिश करते हैं। जब बाहर जाने वाला बंधु वापस आता है तो वह फिर बंटवारे की बात करता है। लेकिन संपत्ति का बंटवारा बिना अदालत जाए नहीं हो पाता।

आप बंटवारा कराना चाहती हैं तो आप को जिला न्यायाधीश के न्यायालय में बंटवारे का वाद प्रस्तुत करना होगा। संयुक्त संपत्ति के सभी स्वामी उस वाद में पक्षकार बनेंगे। अदालत सभी पक्षों को सुन कर बंटवारा कर देगा। यह बंटवारा स्थाई होगा। इस के लिए आप जिला मुख्यालय के किसी दीवानी  मामलों के वकील से मिलें और उस की सहायता से संपत्ति के विभाजन तथा अपने हिस्से का अलग कब्जा दिलाए जाने का वाद संस्थित करें।

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रजिस्टर्ड बंटवारानामा संपत्ति के स्वत्व का दस्तावेज है।

May 17, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जितेन्द्र ने उज्जैन, से मध्य प्रदेश -समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी की मुत्यु हो चुकी है। मेरे दादाजी की स्वंय अर्जित सम्पत्ति का एक मकान जो कि हॉउसिंग बोर्ड द्वारा लीज होल्ड है एवं नगर निगम सीमा में है जिसका सम्पत्ति कर वगैरह उस सम्पत्ति पर निवासरत् दादाजी के 3 पुत्रों द्वारा सम्मिलित रूप से जमा किया जाता है। दादीजी का भी देहान्त दिनांक हो गया है। दादाजी की कुल 7 संतानें (5 पुत्र एवं 2 पुत्रियां) हैं। दादाजी ने अपनी मृत्यु के पूर्व कोई भी वसियत भी नहीं की थी। इस सम्पत्ति पर वर्तमान में 3 पुत्रों के परिवार निवासरत है, अन्य में से 1 पुत्र लापता है, 1 पुत्र अन्यत्र निवासरत है, 1 पुत्री का देहान्त कुछ समय पूर्व हो चुका है एवं 1 पुत्री अन्यत्र निवासरत होकर अविवाहित है। इस सम्पत्ति का बंटवारा किस प्रकार किया जा सकता है? सभी संतानों का मालिकाना हक किस प्रकार इस सम्पत्ति पर हो सकता है? मालिकाना हक से संबंधित क्या दस्तावेज तैयार करवा सकते हैं? कृपया बतायें- 1. क्या इस सम्मत्ति की रजिस्ट्री होगी? 2. हॉउसिंग बोर्ड इस सम्पत्ति में क्या कार्यवाही कर सकता है ? 3. रजिस्टर्ड बंटवारा ओर रजिस्ट्री में क्या कोई अंतर है? क्या रजिस्टर्ड बंटवारा में रजिस्ट्री के सभी अधिकार प्राप्त होते है या नहीं?

समाधान-

ब आप रजिस्ट्री शब्द का उल्लेख करते हैं तो आम तौर पर उसका अर्थ पंजीकृत विक्रय पत्र से या पंजीकृत लीज डीड से होता है। लेकिन पंजीकरण का कानून यह है कि यदि 100 रुपए से अधिक कीमत की कोई अचल संपत्ति का हस्तांतरण हो तो उस की रजिस्ट्री होना जरूरी है। बंटवारा भी ऐसा ही एक विलेख है। पंजीकरण कानून कहता है कि बंटवारे के विलेख का पंजीकृत होना जरूरी है वर्ना वह विलेख जरूरत पड़ने पर किसी कार्यवाही में नहीं पढ़ा जाएगा।

संपत्ति के सभी साझेदारों के बीच आपसी सहमति से बंटवारा होता है तो उसे पंजीकृत कराना जरूरी है। यह पंजीकृत विलेख ही संपत्ति के स्वामित्व का विलेख होगा। हाउसिंग बोर्ड या नगर निगम में जहाँ संपत्ति का रिकार्ड रहता है वे अपने रिकार्ड में नामान्तरण करते हैं लेकिन नामान्तरण हो जाने से किसी को स्वत्वाधिकार प्राप्त नहीं होता है। नामान्तरण गलत होने पर न्यायालय के आदेश से उसे हटाया या दुरुस्त किया जा सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में सभी पुत्रों और पुत्रियों का समान हिस्सा है। यदि किसी का देहान्त हो गया है तो उस की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उस के उत्तराधिकारियों को जाएगी। किसी के मर जाने से या गायब हो जाने से उस का अधिकार समाप्त नहीं हो जाता है।

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समस्या-

नीलम खन्ना ने मनीमाजरा, चंडीगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी को उनके पिताजी से साल 1911 में संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। मेरे पिताजी को दादा जी से उनकी संपत्ति साल 1971 में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। हम दो भाई बहन हैं। मेरे पिताजी ने सारी संपत्ति की वसीयत मेरे भाई के बेटे के नाम कर दी, मेरे पिताजी के देहांत के बाद सारी संपत्ति मेरे भतीजे के नाम हो गई। मैंने जुलाई 2016 में अपने हिस्से के लिए केस दायर किया, मैंने संपत्ति को बेचने से रोकने के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन किया, लेकिन उस समय मेरे पास संपत्ति का पिछला रिकॉर्ड ना होने के कारण अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन रद्द हो गया। मैंने अब पिछला सारा रिकॉर्ड निकलवा लिया है क्या मैं अब दोबारा अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन कर सकती हूँ? क्या मुझे अपना हिस्सा मिल सकता है?

समाधान-

प के द्वारा दिए गए विवरण से यह स्पष्ट है कि उक्त संपत्ति सहदायिक है। आप ने विवरण में यह नहीं बताया है कि आप के पिताजी की मृत्यु कब हुई है। यदि आप के पिता जी की मृत्यु. 2005 के बाद हुई है तब आप को 2005 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम में हुए संशोधन से इस सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त हो चुका था। उस वक्त आप के पिता केवल अपने हिस्से की वसीयत कर सकते थे न कि पूरी संपत्ति की। इस प्रकार आप का हिस्से का दावा सही है आप को हिस्सा मिलना चाहिए।

दावा तो पहले भी हिस्से का ही हुआ होगा। अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन तो उसी दावे में प्रस्तुत किया गया होगा। यदि वह दावा अभी चल रहा है तो उसी दावे में अस्थाई निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र पुनः प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि दावा भी आप ने खारिज करवा लिया है या अदम हाजरी अदम पैरवी में खारिज हो चुका है तो उस का रिकार्ड देख कर तय करना पड़ेगा कि उसे दुबारा किस प्रकार किया जा सकता है। बेहतर है आप वहीं दीवानी मामलों के किकसी अच्छे वकील से सलाह कर आगे कार्यवाही करें।

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किसी को भी स्थावर संपत्ति से जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता।

May 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

गोलू साहू ने पंडुका, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-


मेरे पिता ने पैतृक संपत्ति को बिना हमारे जानकारी व सहमति तथा बिना हमारा हिस्सा अलग किये बिना ही 1/2 एकड़ जमीन को अज्ञात महिला व्यक्ति के नाम पर रजिस्ट्री कर दी है। तथा उस व्यक्ति द्वारा नामांतरण व रिकॉर्ड में अपना नाम भी दर्ज करवा लिया है।  लेकिन जमीन पर कब्जा हमारा है , सर क्या हम कब्जे पर बने रहे..? क्या वह व्यक्ति जबरदस्ती हमसे कब्जा छीन सकता है….? हमें क्या करना चाहिए…….?


समाधान-

कोई भी व्यक्ति जबरन किसी से स्थावर सम्पत्ति का कब्जा छीन कर वर्तमान में काबिज व्यक्ति को बेदखल नहीं कर सकता। यदि कोई ऐसी कोशिश करता है या बेदखल करता है तो तुरन्त पुलिस को रिपोर्ट करें तथा एसडीएम के न्यायालय में धारा 145-146 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत करें। यदि किसी को ऐसा आवेदन प्रस्तुत करने के पहले के 60 दिनों में बेदखल भी कर दिया गया है तो उसे संपत्ति का कब्जा वापस दिलाया जाएगा।

पैतृक/ सहदायिक संपत्ति का बंटवारा हुए बिना कोई भी पिता अपनी संतानों को पैतृक संपत्ति से अलग नहीं कर सकता। इस तरह संपत्ति का उक्त हस्तान्तरण वैध नहीं है। लेकिन उस जमीन में पिता अपने हिस्से की जमीन को बिना बंटवारा किए भी हस्तांतरित कर सकता है, उस हस्तान्तरण के आधार पर नामान्तरण भी खोला जा सकता है। लेकिन जिस व्यक्ति को संपत्ति का हिस्सा हस्तांतरित किया गया है वह व्यक्ति संपत्ति पर कब्जा केवल बंटवारे के माध्यम से ही प्राप्त कर सकता है। आप रजिस्ट्री को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं तथा संपत्ति से बेदखली के विरुद्ध इसी न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस मामले में दस्तावेजों को किसी स्थानीय वकील को दिखा कर सलाह लें और आगे की कार्यवाही करें।

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समस्या-

नन्द किशोर ने देवरी, जिला सागर म.प्र. से समस्या भेजी है कि-


साल 1953 में मेरे पिताजी के पिताजी का देहांत होने के बाद पिताजी को दस एकड़ जमीन मिली। हम पांच भाई हैं, हमारे पिताजी ने उक्त जमीन हम तीन भाइयों में बराबर रजिस्टर्ड बटवारा द्वारा 2012 में बांट दी। मेरे दो भाईयों ने कोर्ट में केस लगाया है कि उक्त सम्पत्ति पैत्रिक है, मुझे भी हिस्सा चाहिए। पिताजी की कैंसर की बीमारी में हम तीनों भाइयों ने पैसा लगाया एवं सेवा की, मुझे सलाह दें।


समाधान-

प के पिताजी के इलाज में आप ने जो धन लगाया वह आप का कर्तव्य था। आप ने यह कर के कोई एहसान नहीं किया। वैसे भी आप जमीन पर काबिज हो कर उस का लाभ लेते रहे होंगे। इस कारण यह सोचना बन्द कर दें कि पिता  जी की बीमारी में धन लगाने से आप को कोई अधिकार उत्पन्न हो गया है।

1953 में परंपरागत हिन्दू अधिनियम प्रभावी था। इस कारण से आप को पिता को उन के पिता से मिली जमीन केवल आपके पिता की नहीं हुई अपितु वह एक सहदायिक संपत्ति हो गयी। जिस में आप के सभी भाइयों का जन्म से अधिकार उत्पन्न हो गया। इस कारण इस भूमि में आप के उन दो भाइयों का जिन्हें जमीन नहीं मिली है जन्म से अधिकार है। रजिस्टर्ड बँटवारे में आप के पिता ने उन के हिस्से की जमीन भी आप को दे दी है जो गलत है। आप के पिता केवल उन के हिस्से की जमीन का बंटवारा कर सकते थे। आप के दो भाई सही कर रहे हैं कि उन्हें पैतृक और सहदायिक भूमि में हिस्सा मिलना चाहिए।

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समस्या-

सुनीता ने निजामुद्दीन, दिल्ली से हरियाणा राज्य की समस्या भेजी है कि-


पावर ऑफ़ अटोर्नी क्या होता है? क्या यह रजिस्ट्री जैसा ही होता है? मैंने जिससे जमीन खऱीदी है, वो यही बोल रहा है। मैं ने प्लाट बल्लबगढ़ हरयाणा में लिया है और वो जेवर, यूपी में बोल रहा है पावर ऑफ़ अटोर्नी करने के लिए। क्या यह सही है? क्या इससे हम बाद में बिना बिल्डर के ही  रजिस्ट्री करा सकते हैं?


समाधान-

आप को और लगभग सभी लोगों को यह समझना चाहिए कि रजिस्ट्री, विक्रय पत्र यानी सेल डीड और पावर ऑव अटॉर्नी अर्थात मुख्तारनामा क्या होते हैं। हम यहाँ बताने का प्रयत्न कर रहे हैं-

रजिस्ट्री या रजिस्ट्रेशन या पंजीकरण-

जब आप कोई पत्र किसी को भेजना चाहते हैं तो साधारण डाक से लिफाफे पर टिकट लगा कर डाक के डब्बे में डाल देते हैं। यह साधारण पत्र होता है। लेकिन जब आप उस पर अधिक (25 रुपए) का डाक टिकट लगा कर तथा एक अभिस्वीकृति पत्र जिस पर आपका व पाने वाले का पता लिख कर डाक घर में देते हैं तो डाक घर आप को रसीद देता है। आप उस के लिए कहते हैं की हमने रजिस्ट्री से चिट्ठी भेजी है। इस चिट्ठी को भेजने के सबूत के तौर पर आपके पास डाकघर की रसीद होती है। डाकघर यह जिम्मेदारी लेता है कि जो अभिस्वीकृति पत्र आप ने लिफाफे के साथ लगाया है उस पर पाने वाले के हस्ताक्षर करवा कर आप के पास लौटाएगा। यदि 30 दिनों में अभिस्वीकृति पत्र आप को वापस नहीं मिलता है तो आप डाकघर को पत्र दे कर पूछ सकते हैं कि उस ने उस पत्र का क्या किया। इस पर डाकघर आप को एक प्रमाण पत्र देता है कि आप का पत्र फलाँ दिन अमुक व्यक्ति को अमुक पते पर डिलीवर कर दिया गया है। अब आप रजिस्टर्ड पत्र या रजिस्ट्री शब्द का अर्थ समझ गए होंगे कि आप का पत्र आप के द्वारा डाक में देने से ले कर पाने वाले तक पहुँचने  तक हर स्थान पर रिकार्ड़ में दर्ज किया जाता है।

इसी तरह जब  कोई भी दस्तावेज जैसे विक्रय पत्र, दान पत्र, मुख्तार नामा, गोदनामा, एग्रीमेंट, राजीनामा, बंटवारानामा आदि लिखा जाता है तो उस में किसी संपत्ति के हस्तांतरण या हस्तान्तरण किए जाने का उल्लेख होता है। अधिकारों का आदान प्रदान होता है। तब उस दस्तावेज को हम डीड या विलेख पत्र, या प्रलेख कहते हैं। हमारे यहाँ पंजीकरण अधिनियम (रजिस्ट्रेशन एक्ट) नाम का एक केन्द्रीय कानून है जिस के अंतर्गत यह तय किया हुआ है कि कौन कौन से दस्तावेज हैं जिन का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा, कौन से दस्तावेज हैं जिन का ऐच्छिक रूप से आप पंजीयन करा सकते हैं। इस के लिए हर तहसील स्तर पर और नगरों में एक या एक से अधिक उप पंजीयकों के दफ्तर खोले हुए हैं जिन में इन दस्तावेजों का पंजीयन होता है। यदि पंजीयन अधिनियम में किसी दस्तावेज की रजिस्ट्री कराना अनिवार्य घोषित किया गया है तो उस दस्तावेज की रजिस्ट्री अनिवार्य है अन्यथा उस दस्तावेज को बाद में सबूत के तौर पर मान्यता नहीं दी जा सकती है। उदाहरण के तौर पर किसी भी 100 रुपए से अधिक मूल्य की स्थाई संपत्ति (प्लाट या मकान, दुकान) के किसी भी प्रकार से हस्तांतरण विक्रय, दान आदि का पंजीकृत होना अनिवार्य है अन्यथा वह संपत्ति का हस्तांतरण नहीं माना जाएगा।  अब आप समझ गए होंगे कि रजिस्ट्री का क्या मतलब होता है। रजिस्ट्री से कोई भी दस्तावेज केवल उप पंजीयक कार्यालय में दर्ज होता है उस का निष्पादन किया जाना प्रथम दृष्टया सही मान लिया जाता है।

विक्रय पत्र सेल डीड –

कोई भी स्थाई अस्थाई संपत्ति जो प्लाट, दुकान, मकान,वाहन, जानवर आदि कुछ भी हो सकता है उसे कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित कर सकता है। यह हस्तांतरण दान हो सकता है अदला बदली हो सकती है, या धन के बदले हो सकता है। जब यह धन के बदले होता है तो इसे विक्रय कहते हैं। इस विक्रय का दस्तावेज लिखना होता है। इसी दस्तावेज को विक्रय पत्र कहते हैं। यदि यह संपत्ति स्थाई हो और उस का मूल्य 100 रुपए हो तो उस का विक्रय पत्र उप पंजीयक के यहाँ पंजीकरण कराना जरूरी है। यदि पंजीकरण नहीं है तो ऐसा विक्रय वैध हस्तान्तरण नहीं माना जाएगा। यह विक्रय पत्र वस्तु को विक्रय करने वाला वस्तु का वर्तमान स्वामी निष्पादित करता है और उस पर गवाहों के ह्स्ताक्षर होते हैं। यदि वस्तु का वर्तमान स्वामी किसी कारण से उप पंजीयक के कार्यालय तक पहुँचने में असमर्थ हो तो उस स्वामी का मुख्तार (अटोर्नी) यह विक्रय पत्र स्वामी की ओर से निष्पादित कर सकता है। इस के लिए उस के पास वैध अधिकार होना चाहिए।

मुख्तारनामा या पावर ऑफ अटॉर्नी-

जब कोई संपत्ति का स्वामी स्वयं पंजीयन के लिए उप पंजीयक के कार्यालय में उपस्थित होने में असमर्थ हो तो वह एक मुख्तार नामा या पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित कर किसी अन्य व्यक्ति को मुख्तार या अटॉर्नी नियुक्त कर देता है जो कि उस की ओर से उप पंजीयक कार्यालय में उपस्थित हो कर दस्तावेज अर्थात विक्रय पत्र आदि का विक्रय पत्र हस्ताक्षर कर सकता है और उस का पंजीयन करा सकता है विक्रय का मूल्य प्राप्त कर सकता है। इस के लिए यह आवश्यक है कि मुख्तार नामा के द्वारा मुख्तार को ये सब अधिकार देना लिखा हो। मुख्तार नामा किसी भी काम के लिए दिया जा सकता है। लेकिन वह उन्हीं कामों के लिए दिया हुआ माना जाएगा जो मुख्तार नामा में अंकित किए गए हैं इस कारण मुख्तार द्वारा कोई दस्तावेज निष्पादित कराए जाने पर मुख्तारनामे को ठीक से पढ़ना जरूरी है जिस से यह पता लगे कि वह किन किन कामों के लिए दिया जा रहा है। मुख्तार नामा का पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है वह किसी नोटेरी से तस्दीक कराया गया हो सकता है लेकिन यदि वह किसी स्थाई संपत्ति मकान, दुकान, प्लाट आदि के विक्रय के हो तो उस का पंजीकृत होना जरूरी है। कई बार जब किसी संपत्ति के हस्तांतरण पर किसी तरह की रोक होती है या कोई और अड़चन होती तब भी वस्तु को विक्रय करने के लिए एग्रीमेंट कर लिया  जाता है और क्रेता के किसी विश्वसनीय व्यक्ति के नाम मुख्तार नामा बना कर दे दिया जाता है ताकि मुख्तार जब वह अड़चन हट जाए तो क्रेता के नाम विक्रय पत्र पंजीकृत करवा ले। लेकिन इस तरह से क्रेता के साथ एक धोखा हो सकता है। मुख्तार नामा कभी भी निरस्त किया जा सकता है। यदि संपत्ति का मालिक ऐसी अड़चन समाप्त होने पर या उस के पहले ही मुख्तार नामा को निरस्त करवा दे तो फिर मुख्तार को विक्रय पत्र निष्पादित करने का अधिकार नहीं रह जाता है। इस तरह मुख्तार नामा के माध्यम से किसी संपत्ति का क्रय करना कभी भी आशंका या खतरा रहित नहीं होता है।

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