Possession Archive

समस्या-

कपिल शर्मा ने रुद्रप्रयाग, भीरी, टेमरिया वल्ला, बसुकेदा, उत्तराखंड की समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी के भाई ने अपनी 21 नाली जमीन हरिजन समाज कल्याण को बेच दी और उसके बाद वह लापता हो गए। उसके बाद हम ने उस पर विभाग का कब्जा होने नहीं दिया। जिस कारण वह कब्जा हमारे पास ही है, पिछले 30 साल से। तो क्या यह जमीन हमारी ही हो गयी है। अगर नहीं है, तो हमारे नाम पे करवाने के लिए इसमें क्या कार्यवाही की जा सकती है? इस जमीन के पट्टे हमारे यहाँ के हरिजनों को मिले हुए है पर इनका भी कब्जा नहीं है, तो इसमें क्या इन हरिजनों का हक़ बनता है? क्योंकि अब वह 30 साल बाद हमें अपने कब्ज़े के लिए परेशान कर रहे हैं। महोदय मैं बहुत परेशान हूँ ये लोग मुझे बहुत परेशान कर रहे हैं। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

प के दादाजी के भाई ने जमीन बेच दी, अब उस पर आप का या आप के परिवार के किसी व्यक्ति का कोई हक नहीं रहा है। वह जमीन हरिजनों को आवंटित कर दी गयी है और उस पर उन का हक हो गया। आप ने हरिजनों का कब्जा नहीं होने दिया लेकिन आप का जो कब्जा था वह भी अवैध था। आप अपने बल से कब्जें में थे। अब आप का बल क्षीण हो गया है और हरिजन उन के हक की जमीन पर कब्जा करना चाहते हैं तो आप को परेशानी हो रही है। यही परेशानी पिछले तीस साल से हरिजनों को थी, लेकिन आप को उस से कोई फर्क नहीं पड़ा। तो कब्जा तो बल का मामला है जिस के पास बल है, पुलिस और अफसरों को अपने हक में इस्तेमाल करने की ताकत है उसी का कब्जा है। यदि आप जमीन को अपने नाम करा लेंगे तब भी हरिजनों में ताकत और बल हुआ तो वे जमीन का कब्जा आप से ले लेंगे।

जमीन एक बार अनुसूचित जाति के व्यक्ति के नाम स्वामित्व में आ गयी तो वह अब गैर अनुसूचित जाति के खाते में नहीं आ सकती। आप के खाते में किसी प्रकार नहीं आएगी। आप इस जमीन को अपने नाम कराने की बात को भूल ही जाएँ तो बेहतर है। गनीमत है कि हरिजनों ने आप को अनु.जाति अनु.जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में कोई फौजदारी मुकदमा नहीं किया वर्ना आप को लेने के देने पड़ सकते थे। आप ने तीस सालों से अपने हक की न होते हुए भी इस जमीन से जितनी कमाई की है उस में आप अपने लिए इस से कई गुना जमीन खरीद सकते हैं। यह सोच कर तसल्ली कर लीजिए। जिन का हक है वह तो आप को आगे पीछे देना होगा। उस से बचा नहीं जा सकता।

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बँटवारा कैसे किया जाए?

August 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नटवर साहनी ने गोबरा नवापारा, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

क्या पैतृक सम्पति का बँटवारा करवाने पर बटवारा करने वाला जीवित न रहने पर मान्य रहता है?  क्या बटवारा नामा बिना पंजीकृत मान्य रहता है? क्योंकि वह पंजीकृत करवाने में असहाय है।

समाधान-

किसी भी साझी संपत्ति का बँटवारा आपसी सहमति से हो सकता है। यदि साझीदार या परिवार किसी एक व्यक्ति के द्वारा सुझाए गए बंटवारे पर सहमत हों तो वैसे भी किया जा सकता है। पर सभी साझीदारों की सहमति जरूरी है। एक बार बँटवारा हो जाने पर और सब के अपने अपने हिस्से पर काबिज हो जाने पर एक लंबे समय तक स्थिति वैसे ही बने रहने पर उस बँटवारे को चुनौती देना संभव नहीं होता है।

यह बँटवारा मौखिक हो कर बँटवारे के अनुसार संपत्ति का कब्जा सब को मिल जाने पर उस का निष्पादन हो जाता है। बँटवारे के कुछ समय बाद चाहेँ तो सारे साझीदार बँटवारे का स्मरण पत्र लिख कर उस पर सभी के हस्ताक्षर और गवाहों के हस्ताक्षर करवा कर उसे नौटेरी से प्रमाणित करा कर रख सकते हैं इसे भविष्य में किसी भी  मामले में साक्ष्य में प्रस्तुत किया जा सकता है।

बँटवारा यदि लिखित में होता है तो उस का पंजीकृत होना आवश्यक है, यदि वह पंजीकृत न हुआ तो भविष्य में साक्ष्य में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। ऐसी स्थिति में उस दस्तावेज का कोई महत्व नहीं रह जाता है।

बेहतर यह है कि बँटवारा पंजीकृत हो। यदि नहीं होता है तो बँटवारा मौखिक हो और बँटवारे के मुताबिक संपत्ति पर पृथक पृथक कब्जे दे दिए जाएँ और उस के बाद बँटवारे का स्मरण पत्र नौटेरी से निष्पादित करा लिया जाए तो वह पर्याप्त है।

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समस्या-

मोहम्मद जीशान ने सीतापुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

क घर का बैनामा है, उस पर ६ लोगो के नाम अंकित हैं। परन्तु ५ लोग उस मकान में १३ सालों से नहीं रह रहे हैं। अब वो ५ लोग अपना हिस्सा बेचना चाहते हैं। जिसका छठा हिस्सा है वो जबरदस्ती कब्ज़ा किये है, कृपया बेचने के लिए कानूनी हल बताएँ।

समाधान-

किसी भी संयुक्त संपत्ति के सारे साझेदार मिल कर आपसी सहमति से ही पूरी संपत्ति को विक्रय कर सकते हैं या फिर एक या एक से अधिक साझेदार उस संपत्ति में अपना हिस्सा विक्रय कर सकते हैं। यदि उन के पास कब्जे में संपत्ति का कोई भाग हो तो उस का कब्जा दे सकते हैं। इस तरह करने पर खरीददार को उस संपत्ति के एक भाग पर कब्जा मिल जाता है तथा पूरी संपत्ति के उतने हिस्से का वह साझीदार हो जाता है जितने हिस्से उसने खरीदे हैं। यहाँ समस्या यह आती है कि इस तरह के विक्रय में खरीददार नहीं मिलता। खरीददार को अपने हिस्सा अलग करने के लिए बंटवारे का मुकदमा करना पड़ता है।

आप के मामले में जिस के पास कब्जा है वह मकान बेचना नहीं चाहता। जो बेचना चाहते हैं उन के पास कब्जा नहीं है। बिना कब्जे के कोई हिस्सा खरीदने को तैयार नहीं होगा। वैसी स्थिति में बेचने के इच्छुक साझीदारों को बंटवारे का दावा करने तथा अपने हिस्से का कब्जा दिलाने के लिए दावा करना होगा और बंटवारा कराना होगा। एक बार बंटवारे की प्राथमिक डिक्री पारित होने पर अंतिम डिक्री पारित करने के दौरान वे चाहें तो छठे व्यक्ति का हिस्सा खरीद सकते हैं और पूरी संपत्ति के स्वामी हो जाने पर संपत्ति विक्रय कर सकते हैं।

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समस्या-

संध्या कश्यप ने रेलवे पाड़ा, अडावल, जगदलपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

35 वर्ष से हमारे ससुर ने घर के समीप एक जमीन पर कब्जा कर रका था। उस समय पर वहाँ कोई मकान नहीं था। अब सरपंच पंचायत की जमीन बता कर दूसरो को बेच रहे हैं और हमें क्या तुम्हारे पास पट्टा है कह कर डरा रहे हैं। क्या यह जमीन हमें मिल सकती है? क्या हम लोग कोई कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं? सरपंच का काम पंचायत के लोगों को सुरक्षित करना है कि उन्हें लूटें।

समाधान-

प का घर के पास की किसी जमीन पर इतना पुराना कब्जा है इस का अर्थ ये तो नहीं कि आप उस जमीन के स्वामी हो गए हैं। यदि जमीन पंचायत की है तो वह सार्वजनिक है और उस पर कब्जा हटाने की कार्यवाही पंचायत को करने का अधिकार है। वे आप का कब्जा हटाने की कार्यवाही कर सकते हैं और किसी जरूरतमंद को जमीन मकान बनाने के लिए बेच सकते हैं। आखिर गाँव में जमीन सीमित होती है और लगातार आबादी बढ़ने से मकानों के लिए जमीन की जरूरत होती है।

लेकिन किसी भी व्यक्ति का कब्जा यदि 30 वर्ष से अधिक का है तो उसे हटाया जाना संभव नहीं है। यदि आप को आशंका है कि आप का कब्जा जबरन हटा दिया जाएगा तो आप दीवानी न्यायालय में जा कर कब्जा हटाए जाने के विरुद्ध पंचायत तथा उस के द्वारा जिस को विक्रय की जाए दोनों के विरुद्ध स्थगन आदेश प्राप्त किया जा सकता है। लेकिन फिर भी उस जमीन पर आप का स्वामित्व स्थापित नहीं होगा।   उस के लिए जमीन पंचायत से खरीदनी होगी या पट्टा बनवाना पड़ेगा।

 

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आप ने मकान का स्वामित्व नहीं बल्कि केवल कब्जा खरीदा है।

June 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राधेश्याम ने इंदौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी ने २०१२ में इंदौर में एक मकान ३०० वर्गफुट जिस पर चद्दर का शेड है, 1,25,000/- रूपये में ख़रीदा था, जिसकी १०० रूपये के स्टाम्प पर नोटरी करायी गयी थी! उस वक़्त पिताजी के पास रजिस्ट्री कराने के पैसे उपलब्ध नहीं थे इसलिए उस वक़्त सिर्फ नोटरी कराकर कब्ज़ा हासिल कर लिया था, बाद में पैसे आने पर जब पुराने मकान मालिक से रजिस्ट्री कराने के लिए कहा तो उसने साफ़ इनकार कर दिया और कहा कि मकान का अब न तो हमारे पास पट्टा है और न हॉं कोई लिखा पढ़ी है ! जबकि पुराना मकान मालिक उस मकान में पिछले बीस वर्षों से रह रहा था! और नगर पालिका में संपत्ति कर भी भर रहा था, जो की अब हम भर रहे हैं, लेकिन मकान मालिक के नाम से (हस्ते में पिताजी का नाम)। एक नयी बात पता चली कि उस मकान सम्बन्धी और आसपास के मकान पर जमीन विवादित कोर्ट में केस चल रहा है। लेकिन अभी तक हमारे पास उक्त सम्बन्ध में कोई भी नोटिस या कानूनी तौर पर किसी ने कुछ भी नहीं कहा। सिर्फ आसपास वाले ही हमें भयभीत करते है कि आपने यह मकान क्यों लिया यह तो कभी भी टूट सकता है। मेरे पिताजी मकान में दूसरी मंजिल बनाना चाहते हैं परन्तु अनचाहे डर से भयभीत हैं! मेरे पिताजी की उम्र ७५ वर्ष है, और इस विषय को लेकर वो बहुत चिंतित रहते हैं! इस स्थिति में हमें क्या कदम उठाना चाहिए?

समाधान-

प के पिताजी ने 300 वर्गफुट जमीन और उस पर बने मकान को खरीदा नहीं है बल्कि केवल खरीदने का सौदा किया है। किसी भी अचल संपत्ति का जिस का मूल्य 100 रुपये या उस से अधिक का हो खऱीदना तभी पूर्ण हो सकता है जब कि उस का विक्रय पत्र पंजीकृत करवा दिया हो। इस कारण जो नोटेरी से प्रमाणित दस्तावेज है वह केवल मकान खरीदने का एग्रीमेंट या अनुबंध है।

किसी भी वस्तु को वही विक्रय कर सकता है जिस का वह स्वामी हो या स्वामी से उसे उस वस्तु को विक्रय करने का लिखित अधिकार मुख्तार नामे से प्राप्त हो। आप बता रहे हैं कि विक्रेता के पास न तो पट्टा है और न ही कोई लिखा पढ़ी है। इस से पता लगता है कि उक्त विक्रेता के पास भी उस मकान का कब्जा ही है हो सकता है यह कब्जा बीस वर्ष से बना हुआ हो। इस प्रकार आप के पिताजी ने उस व्यक्ति से केवल उस मकान का कब्जा खरीदा है जो उस व्यक्ति के पास था।

अब आप को यह पता करना चाहिए कि वह जमीन किस की है और उस पर कैसा मुकदमा चल रहा है। यह तो स्थानीय रूप से पता करने पर ही पता चल सकता है। नगर निगम आदि से यह पता किया जा सकता है कि वह जमीन किस की है। उसी से यह भी पता लग सकता है कि यदि कोई मुकदमा चल रहा है तो वह किस का किस के विरुद्ध हो सकता है। आम तौर पर यदि वह जमीन किसी की निजी हुई तो उस पर से आप को कोई हटा नहीं सकेगा। बस आप को प्रमाणित करना पड़ेगा कि जिस व्यक्ति ने आप को कब्जा बेचा है वह उस पर बीस वर्ष से काबिज था। और उस जमीन या मकान से संबंधित मुकदमे से बेचने वाले का कोई लेना देना नहीं था। वैसे भी जिस मूल्य में आप के पिताजी ने मकान लिया है उस में इसी तरह का विवादित भूखंड मिल पाना इंदौर नगर में  मुमकिन था। हो सकता है कभी उस मामले में निर्णय हो जाए और बाद में नगर निगम या न्यास आदि वहाँ काबिज लोगों को पट्टे जारी कर दे। तब आप के पिताजी उस संपत्ति के स्वामी हो जाएँ। पर इस सब के लिए सतर्क रहना होगा और पट्टा जारी करने की कार्यवाही करते रहना होगा। तब तक यदि आप दूसरी मंजिल बनाना चाहते हैं तो बना कर रह सकते हैं। जितना रिस्क इस संपत्ति के छिनने का है उतना ही दूसरी मंजिल का भी होगा। पर कब्जा बना कर उसी मकान में रहते रहेंगे तब ही इस संपत्ति को आप बचा सकेंगे।

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बंटवारे का वाद प्रस्तुत कर न्यायालय से बंटवारा कराएँ।

June 10, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

उमाकान्त ने देवी तहसील सौसर, जिला छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

दादाजी ने अपने जीवनकाल में कोई बंटवारा नहीं किया और न ही नाप के हिसाब से जोतने के लिए दिया। लेकिन उन की मृत्यु के बाद जिन्हें जोतने को ज्यादा मिला वे बंटवारा नहीं चाहते लेकिन बाकी हिस्सेदार बंटवारा चाहते हैं। हमन कुछ कानूनी कार्यवाही की लेकिन उन्हों ने जानपहचान से रद्द करवा दी। बताए हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

प ने क्या कानूनी कार्यवाही की यह नहीं बताया। हमें लगता है कि आप ने कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की बल्कि आप राजस्व अधिकारियों को फिजूल मैं आवेदन देते रहे। अब आप की समस्या का हल न्यायालय द्वारा बंटवारे में है। आप ने यह भी नहीं बताया है कि दादाजी के देहान्त के बाद नामान्तरण भी हुआ है या नहीं। यदि नहीं हुआ है तो नामान्तरण कराना चाहिए।

यदि नामान्तरण हो गया है तो ठीक वर्ना नामान्तरण की कार्यवाही के साथ साथ आप को चाहिए कि आप राजस्व न्यायालय में अपनी जमीन के बंटवारे, खाते अलग अलग करने और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा दिलाए जाने के लिए वाद प्रस्तुत करें। बाकी सभी हिस्सेदार और राज्य सरकार जरिए तहसीलदार पक्षकार बनेंगे। यह वाद तब तक चलेगा जब तक कि बंटवारा हो कर सब को अपने अपने हिस्से पर अलग कब्जा न मिल जाए।

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समस्या-

रोहन ने लुधियाना, पंजाब से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे नाना का देहान्त2015 में हुआ। वो हमारे साथ लुधियाना ही रहते थे। सारी संपत्ति हरदोई उत्तर प्रदेश में है। मृत्यु के पहले उन्हों ने वसीयत की इच्छा की थी, वो हमने करवाई। उन्हों ने 4 हिस्सों में अपनी सम्पति वसीयत की क्यों कि उनके 3 लड़के थे। चौथा हिस्सा उन्हों ने हमारी मां को वसीयत किया। उत्तराधिकार में उस सम्पति का नामान्तरण नायब की कोर्ट से 3 लोगो के हक़ में था। बाद में वसीयत दाखिल की हमने और तहसीलदार ने पंजीकृत वसीयत के आधार पर मेरी माँ का नाम भी नामान्तरण करवा दिया। समस्या ये है कि आर्डर के 70 दिन बाद एक मामा ने आर्डर के खिलाफ अपील की है। क्या अपील अवधि बाधित नहीं है?  क्या नामान्तरण हो जाने से भी हमें कोई लाभ नहीं मिलेगा? नाना ने चौथा हिस्सा हमारे नाम किया है क्या उस पे हम कब्जा नहीं ले सकते।  वसीयत के समय छोटे मामा साथ थे, उन्होंने हमारे हक़ में एफिडेविट भी लगाया था । क्या एसडीएम ऑर्डर बदल सकते हैं। हम को कब्जा कैसे मिलेगा एग्रीकल्चर लैंड का,वो 14 बीघा का है? उसका पार्टीशन कैसे करवाए? उसका अलग खाता कैसे करवाएँ?

समाधान-

दि  किसी नामान्तरण के मामले में वसीयत प्रस्तुत हो और  उसे चुनौती दी जाए तो तहसलीदार या नायब उस मामले में नामान्तरण नहीं कर सकता। वैसी स्थिति में नामान्तरण कराने के लिए न्यायालय ही जाना होगा। इस  मामले में आप ने जब वसीयत पेश की तो तहसलीदार ने अन्य पक्षकारों को बुलाया या नहीं या आपत्तियाँ ली या नहीं उस पर बहुत कुछ निर्भर करता है। अपील तो व्यथित पक्षकार का अधिकार है, इस कारण उस पर सुनवाई होगी और तभी उस का निर्णय होगा। अपील यदि अवधि बाधित है तो आप अपील में यह आपत्ति ले सकते हैं। यदि वसीयत में कोई खेोट नहीं है तो अपील भी आप की माँ के पक्ष में निर्णीत हो जाएगी। लेकिन अपील आप के हक में निर्णीत हो जाने मात्र से आप को जमीन का कब्जा नहीं मिल जाएगा। .

नामान्तरण से किसी भी कृषि भूमि में उस के हिस्सेदारो का हिस्सा निर्धारित हो जाता है लेकिन भूमि संयुक्त बनी रहती है उस पर सभी हिस्सेदारों का संयुक्त स्वामित्व बना रहता है। अलग अलग खाता करने के लिए और अपने खाते की भूमि पर अलग कब्जा प्राप्त करने के लिए आप की माता जी को संयुक्त स्वामित्व की भूमि के बंटवारे और अपने हिस्से पर कब्जा दिलाए जाने का दावा करना पड़ेगा। चूँकि नामान्तरण आज भी आप के पक्ष में है इस कारण आप यह दावा तुरन्त कर सकते हैं। आप को अपील का निर्णय होने का इन्तजार किए बिना बंटवारे का दावा कर देना चाहिए।

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समस्या-

अनिल ने भोपाल, मध्य प्रदेश से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी के नाम एक मकान है। मेरे पिता वर्ष २००३ से लापता हैं। मेरे पिता ४ भाई हैं। तीनों भाइयों ने मुझे ये मकान मौखिक हिस्से में दे दिया था। मैं २० बर्षो से इस मकान कि देख रेख व टेक्स देता आ रहा हूँ।  मकान पर मेरा कब्ज़ा है तथा किरायेदार भी मुझे ही किराया देते हैं। वर्ष २०१२ में मैंने मकान का नामांतरण अपनी माँ के नाम से करा लिया था।  अब उन्होंने उससे निरस्त करा के उसे मेरी दादी के नाम करा लिया है? क्या वे उसे बेच सकती हैं? उन्हें कैसे रोका जाये?

समाधान-

नामान्तरण किसी भी प्रकार से स्वामित्व और स्वामित्व के हस्तांतरण को प्रकट नहीं करता है। आप का उस मकान पर 20 वर्षों से कब्जा है, इस कारण कोई आप को उस मकान से बेदखल नहीं कर सकता। किन्तु मौखिक बंटवारे में आप को मकान मिला था इसे साबित करना आसान नहीं होगा। देख-रेख करना और टैक्स जमा करने मात्र से यह उपधारणा नहीं ली जा सकती है कि वह मकान आप को मौखिक बंटवारे में दे दिया गया था। यदि यह साबित होता है कि कोई बंटवारा नहीं हुआ था तो दादाजी के मकान और शेष संपत्ति का बंटवारा होना चाहिए और उस स्थिति में उन के सभी उत्तराधिकारियों को उस का हिस्सा मिलना चाहिए।

आप के पिता 2003 से लापता हैं तो आप दीवानी न्यायालय में घोषणा का दावा कर के उन्हें मृत घोषित करवा सकते हैं और इस घोषणा के आधार पर मृत्यु प्रमाण पत्र आप को मिल सकता है। वैसी स्थिति में आप अपने पिता के उत्तराधिकारी हो जाएंगे। चूंकि दादी के नाम मकान का नामान्तरण हो जाने से वह मकान दादी का नहीं हो जाता बल्कि संयुक्त संपत्ति बना रहता है। इस कारण उन्हें इस मकान को बेचना तो नहीं चाहिए। फिर भी ऐसी कोशिश हो सकती है। इस के लिए स्थाई निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत कर विक्रय पर अस्थाई   निषेधाज्ञा प्राप्त की जा सकती है। इस वाद में आप यह कथन कर सकते हैं कि आप के पिता 14 वर्षों से लापता है इस कारण साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत उपधारणा के अंतर्गत उन्हें मृत माना जाना चाहिए और आप उन के उत्तराधिकारी होने के नाते यह वाद प्रस्तुत कर रहे हैं।

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भाई आप से मकान छीन नहीं सकेंगे।

June 4, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अंगद ने बेगूंसराय, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता ने सन 1969 एक जमीन मेरे बडे भाई के नाम से खरीदा, उस समय मेरे बड़े भाई की उम्र 19 या 20 साल थी मेरी उम्र 15 साल थी। सन 1995 ई. में हम दोनो भाई ने उस जमीन पर एक सयुंक्त घर बनाया। जिस में दो अलग अलग पलैट हैं। दोनो भाई ने अपना अपना पलैट अपने अपने पैसा से बनाया। जिस में हम दोनो भाई आज भी रह रहे हैं। जिस समय मैं ने उस जमीन पर घर बनाना आरंभ किया उस समय तक मुझे पता नहीं था कि वह जमीन मेरे भाई के नाम है और मेरे बडें भाई ने भी मुझे नहीं बताया था। मुझे लगता था की वह जमीन मेरे पिता के नाम हैं। इसका पता मुझे अब चला कि वह जमीन मेरे भाई के नाम है। अब मेरे बडा भाई मुझे कहता है कि मेरी जमीन व घर खाली करो। मेरे माता व पिता का देहांत हो चुका हैं। बहुत मेंहनत से मैंने अपना घर बनाया है मैं भूतपूर्व फौजी हूँ। बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

मीन आप के पिताजी ने खरीदी थी लेकिन भाई के नाम है इस कारण प्राथमिक रूप से उस भूमि का स्वामी आप के भाई हैं। जब तक आप यह साबित नहीं कर देते कि यह जमीन पिताजी ने भाई के नाम से खरीदी जरूर थी लेकिन पूरे परिवार के लाभ के लिए खऱीदी थी।

आप उस जमीन पर मकान बना चुके हैं। आप ने अपने पैसे से बनाया है तो आप यह साबित कर सकते हैं कि इस मकान को आप ने अपने धन से खुद बनाया है।

आप को इस मकान को बना कर उस में रहते हुए 22 वर्ष हो चुके हैं। आप के भाई यदि अदालत में यह दावा करें कि आप से उस मकान का कब्जा दिलाया जाए तो यह दावा लिमिटेशन के आधार पर ही खारिज हो जाएगा क्यों कि कब्जे का दावा केवल 12 वर्ष की अवधि में किया जा सकता है। मकान में बिजली और नल के कनेक्शन भी आप के नाम से होंगे। वोटर कार्ड आदि में भी पिछले 22 वर्ष से आप के नाम अंकित होंगे। आप 22 वर्ष का पजेशन उक्त संपत्ति पर अच्छे से साबित कर सकते हैं। इस तरह आप का कब्जा मकान पर प्रतिकूल कब्जा है।

आप के भाई आप को मकान खाली करने को कहें तो उन्हें कहें कि मकान तो मेरा है और मैं खाली नहीं कर रहा हूँ और यदि वे समझते हैं कि यह मकान उन का है तो वे अदालत में दावा कर दें अदालत फैसला कर देगी। जब अदालत में दावा पेश हो तो दावे की प्रतिलिपि आप को मिल जाए तब आप किसी अच्छे दीवानी मामलों के वकील से सलाह ले कर मुकदमे में अपनी प्रतिरक्षा करें। आप के भाई आप से उस मकान को किसी स्थिति में नहीं छीन सकते।

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समाधान-

राम नारायण ने बड़ौदा, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या ये है कि मेरे पिता की स्वअर्जित सम्पति है।  जिसे मेरे पिता ने 1965 में लिया था।  मेरे पिता का देहांत 03/10/2005 को हो गया है।  मेरे पिता ने कोई वसीयत नहीं बनाई थी।  देहांत के बाद मेरी 3 बहनो में से एक बहन ने अपनी परिस्थिति का रोना रोकर मेरे से मेरा एक रूम ले लिया और बोली की मेरी परिस्थिति ठीक होने के बाद मैं चली जाउंगी। लेकिन अब 8 साल हो गया है। लेकिन वो जाने को नहीं बोलती है और झगड़ा करती है। मेरी माँ मेरे साथ ही रहती है। उससे भी झगड़ा करती है। मेरी बहन को रूम से निकालने के लिए क्या करना होगा? मेरी बहन का आदमी भी उसके साथ ही रहता है।


समाधान-

प के पिता की स्वअर्जित संपत्ति पर आप के पिता की मृत्यु के साथ ही उन के उत्तराधिकारियों का स्वत्वाधिकार स्थापित हो गया। आप अकेले उस संपत्ति के स्वामी नहीं हैं। पुत्र होने के नाते आप अकेले उस मकान के स्वामी नहीं हो सकते। इस मकान में फिलहाल पाँच हिस्से हैं। एक आप की माँ का तीन आप की बहनों के और पाँचवाँ आपका। यदि आप बहिन से कुछ कहेंगे तो वह अदालत में बंटवारे का दावा करेगी। दूसरी बहनों और माँ को भी साथ ले लेगी तो आप को केवल पाँचवाँ हिस्सा ही प्राप्त होगा, जो आप का है। वैसे भी जब तकआप को सभी बहनों से रिलीज डीड के माध्यम से हक प्राप्त नहीं हो जाए उन सभी का हि्स्सा बना रहेगा।

बहिन ने परिस्थिति का रोना रो कर जो कमरा प्राप्त किया है वह उस का हक है। उस ने कैसे भी मकान पर कब्जा प्राप्त कर लिया है और उसी में रहती भी है आप अपनी बहन को रहने दें। जो भी समाधान हो वह प्यार से आपसी समझ से करें।

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