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समस्या-

मेरे पिताजी दो भाई थे, जिनके पास एक पुश्तैनी जमीन 14×70 स्क्वायर फुट की थी जिसके खसरे में मेरे दादा का  नाम दर्ज है। दोनों भाइयों ने आपसी रजामंदी से 40 वर्ष पूर्व जमीन का बंटवारा आधा-आधा कर लिया किन्तु कोई विलेख नही लिखवाया। मेरे पिताजी ने अपने हिस्से के 14×35 के प्लाट पर स्वयं के खर्च से 40 वर्ष पूर्व मकान बनवा लिया था तथा जिसका किसी ने विरोध नही किया था, जिसका गृहकर 38 वर्षो से पिताजी के नाम से ही जमा होता है, पिताजी जी की मृत्यु के बाद मेरे नाम से गृहकर जमा होता है और मकान पर मेरा ही कब्जा है। मेरे चाचा जिनके हिस्से में 14×35 का प्लाट था उन्होंने अपने हिस्से के प्लाट में अभी तक कोई निर्माण नही करवाया  और उनकी मृत्यु भी हो चुकी है। अब विवाद का विषय ये है कि चाचा का पुत्र 40 वर्ष पूर्व हुए आपसी बंटवारे को नही मान रहा, उसका कहना है कि चूंकि 14×70 के पूरे प्लाट का खसरा उसके दादा के (पिता के पिता) नाम पर है और बंटवारे का कोई विलेख नही इसलिए घर का और खाली जमीन का बंटवारा करो और अपने घर मे से हमको भी हिस्सा दो। छोटे दादा के पुत्र द्वारा झूठे केस में फसाने की साजिश की जा रही और मारने की धमकी दी जा रही। क्या कानूनी तौर पर वह मेरे दादा जी का मकान हड़प सकता है? सर हमारे पास घर के 38 वर्षों का गृहकर की रसीद (जो पिताजी के नाम से है), घर का 12 वर्षों का बिजली का बिल (मेरे स्वयं के नाम से),16 वर्षो का जलकर की रसीद (पिताजी के नाम पर), पिताजी का राशन कार्ड, माताजी का राशन कार्ड और मेरे दादाजी के नाम वाला नगर पंचायत आफिस से जारी 14×35 स्क्वायर फुट के प्लाट (जिसमे पिताजी के द्वारा बनवाया मकान है) का खसरा है। क्या कानूनी तौर पर चाचा का पुत्र मेरे मकान पर कब्जा पा सकता है?

-मोनू अहमद,  नगर पंचायत रुद्रपुर, जिला-देवरिया, (उ. प्र.)

समाधान-

दि 40 वर्ष पूर्व बंटवारा हो चुका था तो उस के गवाह अवश्य होंगे। आवश्यकता पड़ने पर साक्षियों  के बयान करवा कर बंटवारे को साबित किया जा सकता है। इस संबंध में आप Karpagathachi And Ors vs Nagarathinathachi 1965 AIR 1752 के प्रकरण को देखें। आप के पास पिताजी के नाम से 38 वर्ष से गृहकर की रसीद है। घर बनाने के बाद ही तो गृहकर आरंभ हुआ है यह एक सहायक सबूत है जो कहता है कि मकान बने हुए हिस्से पर आपका इतने लंबे समय से कब्जा है। 16 वर्षों का जलकर र 12 वर्ष से बिजली के बिल भी सहायक सबूत हैं। आप अच्छे से बंटवारा और मकान का निर्माण साबित कर सकते हैं। प्रतिकूल कब्जे (एडवर्स पजेशन) के तर्क का भी सहारा लिया जा सकता है। इस तरह कानूनी रूप से आपके मकान को हड़प करना इतना आसान नहीं है।

आप अपने चचेरे भाई को कह दीजिए कि वह दुबारा से बंटवारा चाहता है तो बंटवारे का दावा कर दे। फैसला अदालत में हो। आप यदि मुकदमे को मुस्तैदी से लड़ेंगे तो आप की संपत्ति आपके पास ही रहेगी।

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समस्या-

मेरी पत्नी बबीता देवी (68 वर्ष) एक पैर से विकलांग है। मेरे बाबा अंबिका सिंह जिनको 1940 में 7 एकड़ 42 डिसमिल जमीन उनके हिस्से में प्राप्त हुआ था। मेरे पिता दो भाई थे मेरे पिता का नाम वेशर सिंह और मेरे चाचा का नाम वादों सिंह। मेरी चाचा वादों सिंह ने विवाह नहीं किया था। मेरे चाचा वादों सिंह ने 3 एकड़ 42 डिसमिल जमीन 1948 में खरीदा था मेरे चाचा वादों सिंह की मृत्यु 2004 में हुई। उनके मरणोपरांत वह जमीन अभी मेरे पास है। क्या मेरे चाचा के द्वारा जो जमीन मुझे मिला उस पर मेरे पुत्र या पुत्री का अधिकार है। जिस वक्त मेरे चाचा ने जमीन खरीदा था उस वक्त वो संयुक्त परिवार के ही सदस्य थे किंतु उनके द्वारा खरीदे गए जमीन के केवाला पर सिर्फ उन्हीं का नाम है, मेरे पिताजी का नाम नहीं है। मुझे 3 पुत्र पैदा हुऐ परंतु तीनो जन्म के समय मृत पाए गए, तीनों की मृत्यु पेट में ही हो गई थी। फिर मुझे दो पुत्रियां हुई। क्या उन मृत पुत्रों का भी कोई हिस्सा हमारे संपत्ति में होता है? यदि हां तो फिर क्या वह हिस्सा मेरी पत्नी को स्थानांतरित होगा? मेरी पुत्री ने मुझ पर टाइटल पार्टीशन सूट किया है। उसका हिस्सा इस संपत्ति में कितना हो सकता है । जबकि 7 एकड़ 42 डिसमिल जो कि मेरे बाबा का हिस्सा था, उस में मेरे चाचा का जो हिस्सा होता है वह तो मेरा पर्सनल प्रॉपर्टी कहलायेगा।

उमेश सिंह vishnukr1506@gmail.com

समाधान-

आप के दादा अम्बिका सिंह को 2014 में जो जमीन उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है वह आप की पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति है। इस संपत्ति का उत्तराधिकार उत्तरजीविता से तय होगा। 2005 से पुत्रियाँ भी सहदायिक संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार रखने लगी हैं। इस कारण आप की पुत्री आप की सहदायिक संपत्ति में अपना हिस्सा अलग कराने की अधिकारी है। आप के पुत्र मृत पैदा हुए इस कारण उन का कोई अलग से हिस्सा नहीं है। वह हिस्सा आपकी पत्नी को प्राप्त नहीं होगा।  दादा की जमीन में आप के चाचा का हिस्सा भी आप को मिल गया है। लेकिन वह फिर भी आप की स्वअर्जित संपत्ति नहीं है क्यों कि वह आपको उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ है।  आप की पुत्री इस भूमि में अपना हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है। उस का हिस्सा कुल जमीन में 1/3 ही होगा। आप के चाचा ने जो हिस्सा खुद खरीदा है और जिस का केवाला उन के नाम है वह जमीन आप की स्वअर्जित मानी जाएगी और आप के जीतेजी उस में किसी को हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। इस जमीन में आप की पुत्री कोई भी हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

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समस्या-

अभी मेरी बुआ ने मेरे पिताजी के साथ तीनों भाइयो पर केस किया है खेती की जमीन पर जो मेरे दादा जी से मिली है। यह जमीन मेरे दादा जी को मेरे पड़दादा जी से गोद के रूप में मिली थी। मेरे दादा जी की मृत्यु 2000 में हुई और मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद सभी खसरा में मेरे पापा और तीनों भाइयों का नाम आ गया। जब प्रशासन हमारे गांव में आये तब मेरी बुआ ने कॉल पर जमीन लेने से मना कर दिया। उस समय ना हमने उनसे किसी पेपर पर सिग्नेचर करवाया। इतने सालों बाद में मेरी बुआ ने केस फ़ाइल किया है। मैंने सुना है कि हिन्दू उत्तराधिकारी कानून 2005 में बेटी का जमीन पर अधिकार नही होता। अब आगे हम क्या करे कृपया आप हमें बताएं।

– गजेंद्र सिंह, पाली, राजस्थान

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार और सहदायिक संपत्ति के संबध में बहुत गलत धारणाएँ लोगों के बीच पैठी हुई हैं। यह माना जाता रहा है कि यदि किसी हिन्दू पुरुष को कोई संपत्ति उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में मिली है तो वह पुश्तैनी संपत्ति है और उस में पुत्रियो को कोई अधिकार नहीं है और यह अधिकार 2005 में ही उन्हें प्राप्त हुआ है।

यह पुश्तैनी शब्द ही हमें भ्रम में डालता है। तो आप को समझना चाहिए कि वह पुश्तैनी संपत्ति जिसमें पुत्र का जन्म से अधिकार होता है वह क्या है? इस के लिए आप को तीसरा खंबा की पुश्तैनी संपत्ति से संबंधित महत्वपूर्ण पोस्ट “पुश्तैनी, सहदायिक संपत्तियाँ और उन का दाय” पढ़नी चाहिए। जिस से आप समझ सकें कि यह पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति क्या है। आप इसे लिंक को क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

उक्त पोस्ट पढ़ कर आप को पता लग गया होगा कि आप ने जिस संपत्ति पर प्रश्न किया है वह पुश्तैनी है या नहीं है।

यह सही है कि पुत्रियों को 2005 के संशोधन से ही पुत्रों के समान सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार प्राप्त हुआ है, लेकिन 2005 के पहले भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 मे यह उपबंध था कि यदि किसी सहदायिकी के किसी पुरुष सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो उस का दाय उत्तरजीविता से तय होगा। लेकिन यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई भी स्त्री हुई तो उस के सहदायिक संपत्ति में हिस्से का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से तय होगा न कि मिताक्षर विधि के उत्तरजीविता के नियम के आधार पर। इस तरह 2005 के पूर्व भी पिता की मृत्यु पर पुत्री को उस की संपत्ति में धारा-8 के अनुसार हिस्सा मिलता था लेकिन वह सहदायिकी की सदस्य नहीं होती थी।

इस तरह पूर्व में जो नामान्तरण हुआ है वह गलत हुआ क्यों कि उस में आप की बुआ का हिस्सा तय नहीं हुआ था। आप की बुआ ने जो मांग की है वह सही है वह हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है।

समस्या-

मेरी उम्र लगभग 40 वर्ष है। हम लोग 4 भाई और एक बहन हैं, जिसमे दो भाई मुझसे बड़े हैं और बहन मुझसे छोटी है, शेष एक भाई सबसे छोटा है। मेरे पिता जी की 1984 में ही मृत्यु हो गई थी और क्योंकि मेरे पिताजी बिहार के विद्युत विभाग मे सरकारी नौकरी करते थे और नौकरी में रहते हुए ही उनकी मृत्यु हुई थी, तो मेरी माताजी को पिताजी के स्थान पर अनुकंपा के आधार पर 1987 में नौकरी हुई और वो लगभग 29 साल नौकरी करने के बाद 2016 मे रिटायर हो गई हैं। वो अभी जीवित हैं। मैं यह जानना चाहता हूँ कि मेरी माता जी ने 29 साल की नौकरी में बैंक मे जो भी रुपया जमा कर रखा है और उनको जो रिटायरमेंट के समय जो पैसा मिला है या अभी जो प्रति महीने पेंशन मिल रही है उसमे मेरा कोई क़ानूनी अधिकार है या नहीं? क्या मैं अपना अधिकार लेने के लिए कोई क़ानूनी उपाय कर सकता हूँ या नहीं? क्योंकि बॅंक मे जो भी पैसा जमा है उसमे कहीं पर भी मेरा नाम ना तो नॉमिनी में दिया गया है और ना ही सेकेंड नाम में जब कि मुझे छोड़ कर बाकी सभी भाइयों का नाम नॉमिनी में दिया गया है। सारा बैंक का पैसे में माता जी के साथ सेकेंड नाम में किसी भाई का नाम दिया गया है मेरा नाम कहीं भी नहीं दिया गया है। सब ही भाई मुझे जान मारने की धमकी देते हैं और कहते हैं की तुमको बँटवारा में एक पैसा भी नहीं मिलेगा। माता जी भी मेरा विरोध ही करती हैं और कहती हैं की तुम घर से निकल जाओ। मेरे चार भाई में सिर्फ़ एक भाई सेकेंड वाले की शादी हुई है लेकिन उसकी पत्नी उससे झगड़ा करके अपने घर चली गयी है और तलाक़ मांगती है। मेरी बहन की शादी 2005 में हो चुकी है और उसके दो बच्चे हैं। मुझे अपने हिस्से का का पैसा लेने का मेरा कोई क़ानूनी अधिकार है या नहीं और क्या हम अपनी माता जी क़ानूनी प्रक्रिया करके पैसा ले सकते हैं या नहीं?

– प्रकाश कुमार सिन्हा, जहानाबाद (बिहार)

समाधान-

किसी भी स्त्री की संपत्ति उस की एब्सोल्यूट संपत्ति होती है। आप की माता जी के पास जो भी धन है वह उन का स्वयं का अर्जित धन है। उस धन पर जीतेजी केवल माता जी का अधिकार है। उस के अलावा किसी भाई का कोई अधिकार नहीं है। नोमिनी बनाए जाने के लिए किसी पर कोई दबाव नहीं डाला जा सकता है। आप की माताजी चाहें तो किसी को भी आप के भाई बहिन के अतिरिक्त किसी अन्य व्यक्ति को भी नोमिनी बना सकती हैं। आप की माताजी जीतेजी अपनी इस संपत्ति को किसी को दे सकती हैं या उसे विक्रय कर सकती हैं उन्हें रोकने का अधिकार किसी को नहीं है। वे चाहे तो अपनी समस्त संपत्ति को किसी को भी वसीयत भी कर सकती हैं। आप को उन के जीतेजी उन की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है।

हाँ यदि आप की माताजी कोई वसीयत नहीं करती हैं और उन की मृत्यु हो जाती है तो अन्य बहिन भाइयों की तरह आप को भी उत्तराधिकार में उतनी ही संपत्ति प्राप्त करने का अधिकार होगा जितना कि अन्य भाई बहिनों को होगा अर्थात आप भी 1/5 संपत्ति के अधिकारी होंगे। बैंक, बीमा आदि संस्थाओं में नोमिनी बनाने का अर्थ यह नहीं है कि उस में जमा धन उस नोमिनी का हो जाएगा। नोमिनी केवल ट्रस्टी होता है और उस की यह जिम्मेदारी होती है कि वह इस तरह प्राप्त धन को सभी उत्तराधिकारियों में उनके हिस्से के अनुसार बांट दे। पर कभी कभी इस तरह नोमिनी धन ले कर अपने पास रख लेता है और किसी को नहीं देता। लेकिन इस तरह खुद धन रख लेना धारा 406 आईपीसी का अपराध है जिस के लिए उसे दंडित किया जा सकता है। आप अपने हिस्से के धन के लिए नोमिनी के विरुद्ध दावा कर सकते हैं। आप यह भी कर सकते हैं कि जहाँ जहाँ धन जमा है और नोमिनी द्वारा धन प्राप्त कर लेने की संभावना है वहाँ तुरन्त पत्र दें कि उत्तराधिकारियों में विवाद है इस कारण नोमनी को धन का भुगतान नहीं किया जाए आप उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर रहे हैं, न्यायालय द्वारा प्रमाण पत्र मिल जाने पर उसी के अनुसार धन का भुगतान किया जाए। आप यह कर सकते हैं कि मृत्यु प्रमाण पत्र प्राप्त होते ही उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए जिला न्यायाधीश के न्यायालय के समक्ष उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर दें।

समस्या-

मेरे दादाजी तीन भाई है और उन सभी ने क़ानूनी रूप से कोई बँटवारा किए बगैर आपसी सहमती से अपनी सुविधानुसार संपत्ति का बँटवारा कर लिया था और अभी तक खसरा नंबर मे भी दादाजी समेत उनके दोनो भाइयो का भी नाम है, दादाजी की दो संतान है एक पिताजी और दूसरी बुआजी, पिताजी ने दो शादियाँ की थी, पहली पत्नी से तीन लड़कियाँ और एक लड़का है सभी लड़कियो की शादियाँ हो चुकी है और मेरा सौतेला भाई और सौतेली माँ दादी और दादाजी के साथ प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने चार कमरो के मकान मे रहते है, पिताजी ने पाँच कमरो का मकान  बनवाया था जिसमे से दो कमरे पिताजी ने किराए से दुकान चलाने हेतु गाँव के ही एक व्यक्ति को सन २००५ मे दे दिए थे जिसका किराया दादाजी ही लेते रहे है और आज तक ऐसा ही चल रहा है और बाकी बचे तीन कमरो मे माँ, मैं और मेरा भाई रहते है| पिताजी के देहांत (२०११) के बाद जब हमने किराए से दी हुई दुकान को खाली कराना चाहा तो दादाजी ने आपत्ति करते हुए कहा की ये मेरा मकान है और जब हम चाहेंगे तभी खाली होगा, इसी तरह से जब हमने मकान का विस्तार करना चाहा तब भी उन्होने आपत्ति करते हुए कहा की तुम लोगो का कोई हिस्सा नही है, और अपने जीते जी मै बँटवारा भी नही करूँगा, क़ानूनी रूप से बँटवारा करने के लिए जब हम सरपंच के पास खानदानी सजरा बनवाने के लिए गये तो वहाँ से भी नकारात्मक जवाब मिला, दरअसल दादाजी हम लोगो को ज़मीन – जायदाद मे से कोई हिस्सा ही नही देना चाहते और लोगो के बहकावे मे आकर दादाजी संपत्ति को बिक्री करने की तथा मेरे सौतेले भाई के नाम करने की योजना बना रहे है अगर ऐसा हुआ तो हम लोग सड़्क पर आ जाएँगे, कृपया सलाह दें कि –
 (१) संपत्ति का बँटवारा कैसे होगा|
 (२) क्या हमारे दादाजी की संपत्ति मे उनके दोनो भाइयो का भी हिस्सा है|
 (३) हम किरायेदार से किराए की दुकान को कैसे खाली करवा सकते है |

– प्रदीप कुमार ज़ायसवाल, गाँव – सिहावल, पोस्ट- सिहावल, तहसील – सिहावल, थाना – अमिलिया, जिला- सीधी (मध्य प्रदेश)

समाधान-

प के दादाजी और उन के भाइयों के बीच बँटवारा कानूनी तौर पर नहीं हुआ था। बल्कि उन्होंने परिवार के अंदर एक अन्दरूनी व्यवस्था बना रखी थी। उस के अंतर्गत कुछ लगो कहीं काम करते थे और कहीं रहते थे। बँटवारा आज तक नहीं हुआ आप को बँटवारा कराने के लिए बँटवारे का दीवानी/ राजस्व वाद संस्थित करना होगा।  चूंकि दादाजी व उन के भाइयों के बीच बंटवारा नहीं हुआ था इस कारण संपूर्ण संपत्ति जो तीनों भाइयों की संयुक्त रूप से थी उस का बंटवारा इस बंटवारे में होगा। इस में आप के दादा जी के अतिरिक्त शेष दो दादाजी को जो संपत्ति अलग कर के दी गयी थी उस का भी बंटवारा होगा। यह वाद संस्थित करने के साथ ही संपत्ति का कोई भी हिस्सेदार किसी संपत्ति को बेच कर खुर्दबुर्द न करे इस के लिए अदालत से स्टे प्राप्त किया जा सकता है।

आप के  दादाजी की अलग से कोई संपत्ति नहीं है बल्कि तीनों दादाओँ की संयुक्त संपत्ति है इस कारण तीनों  भाइयों की संपत्ति में तीनों का हिस्सा है।

यदि किराएदार को आप के पिताजी ने दुकान किराए पर दी है तो उस के संबंध में आप के पिता ही लैंडलॉर्ड माने जाएँगे और वे दुकान खाली कराने के लिए दीवानी न्यायालय में दावा संस्थित कर सकते हैं।

आप को किसी स्थानीय वकील को सभी दस्तावेज दिखा कर परामर्श प्राप्त कर के तुरन्त कार्यवाहियाँ करनी चाहिए।

 

 

माँ के पूर्व पति की संपति में हिस्सा।

August 17, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

 

समस्या-

ब कोई विधवा स्त्री अपने पति की मृत्यु के बाद किसी अन्य व्यक्ति के साथ शादी कर लेती है, तो क्या दूसरे पति से जन्मे बच्चे उस स्त्री के पहले पति की संपति में हिस्सा ले सकते हैं? क्या उस पहले पति के लड़के को उस स्त्री के दूसरे पति से जन्मे लड़के को हिस्सा देना पडेगा?

-विजय कुमार, ग्राम दरौली, जिला, सिवान (बिहार)

समाधान-

कोई भी स्त्री विधवा तब होती है जब उस के पति की मृत्यु हो जाए। मृत्यु के साथ ही उस के पति की संपत्ति का उत्तराधिकार तय हो जाता है। यदि उस के पति के एक पुत्र था तो दो उत्तराधिकारी हुए एक पुत्र और दूसरा पत्नी। इस तरह मृत व्यक्ति की संपत्ति में दो लोग हिस्सेदार हो गए।

विधवा स्त्री ने दूसरे व्यक्ति से विवाह कर लिया। उसके वहा और संतानें हो गयीं। उन संतानों का अपनी माँ के पूर्व पति की संपत्ति के उस हिस्से पर कोई अधिकार नहीं है जो उन के सौतेले भाई का है। लेकिन उन की माँ को जो आधा हिस्सा मिला है उस पर उस की मृत्य के उपरान्त पूर्व पति व दूसरे पति से उत्पन्न सभी संतानों को समान उत्तराधिकार मिलेगा।

आप ने अपनी समस्या न पूछ कर केवल एक कानूनी प्रश्न पूछा है। हम आम तौर पर ऐसे प्रश्नों का उत्तर नहीं देते। लेकिन इस तरह की भ्रान्तियों को दूर करने के लिए हम उत्तर दे रहे हैं। सभी पाठको से अनुरोध है कि हमें समस्या भेजें तो हम समाधान कर पाएंगे। कानूनी प्रश्नों का जवाब पाने के लिए किसी दूसरे साधन का उपयोग करें या फिर खुद कानून का अध्ययन करें।

समस्या –

क अचल संपत्ति मकान जिसकी रजिस्ट्री वर्तमान में मेरी दादी के नाम पर है एवं मेरी दादी का स्वर्गवास वर्ष 2009 में हो चुका है एवं मेरे दादा जी का भी स्वर्गवास वर्ष 2002 में हो चुका है।  मेरी दादी की चार संतानें जिसके अंतर्गत मेरे पिताजी, मेरे ताऊजी एवं मेरी दो बुआजी (पिताजी की बहनें) हैं एवं मेरे पिताजी की दो संताने जिसके अंतर्गत मैं स्वयं एवं मेरी बहन शामिल है एवं मेरी स्वयं की चार संताने जिसके अंतर्गत मेरे चार पुत्र हैं।  मेरे ताऊजी की तीन संताने जिसके अंतर्गत ताऊजी का एक पुत्र और दो पुत्रियाँ हैं एवं ताऊजी का जो पुत्र है उसकी भी चार संतानें जिसके अंतर्गत उसके चार पुत्र हैं। अब सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उपरोक्त वर्णित अचल संपत्ति मकान में उपरोक्त वर्णित सभी सदस्यों में से कौन-कौन कानूनी रूप से हिस्सेदार हैं। उपरोक्त वर्णित अचल संपत्ति मकान में उक्त वर्णित मेरी दोनों बुआजी की संतानें भी क़ानूनन भागीदार है क्या? उपरोक्त वर्णित अचल संपत्ति मकान में उक्त वर्णित मेरे ताऊजी की दोनों बेटियों की संतानें एवं मेरी बहन की संतानें भी कानूनन भागीदार हैं क्या? उपरोक्त लिखित समस्या के प्रत्येक बिन्दु पर विस्तृत जानकारी देने का आभार करें।

– अभिषेक बंसल, तहसील व जिला ग्वालियर, मध्यप्रदेश

समाधान-

कान का स्वामित्व आप की दादी का था। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत यह उपबंध है कि किसी भी हिन्दू स्त्री की संपत्ति उस की एब्सोल्यूट संपत्ति होती है। अर्थात उस में कोई भागीदार नहीं होता। इस कारण आप की दादी के नाम की यह संपत्ति पुश्तैनी संपत्ति नहीं है।

आप की दादी के देहान्त के उपरान्त अधिनियम की धारा 15 के अंतर्गत इस संपत्ति का उत्तराधिकार खुला है। धारा 15 में किसी भी स्त्री की संपत्ति के उत्तराधिकारी प्रथमतः उस स्त्री के पुत्र पुत्री व पति हैं। आप के दादाजी का देहान्त पूर्व में ही हो चुका है। इस कारण से आप की दादी की उक्त संपत्ति के उत्तराधिकारी उन के पुत्र अर्थात आप के पिता, आप के ताऊजी और आप की बुआएँ हुई हैं। सभी एक चौथाई हिस्से के अधिकारी हैं। जब तक ये चारों जीवित हैं इस संपत्ति पर किसी भी अन्य व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं है। इन चारों में से किसी की मृत्यु हो जाने पर उस के हिस्से का उत्तराधिकार खुलेगा जो कि या तो उस व्यक्ति की वसीयत के अनुसार होगा और यदि कोई वसीयत नहीं की गयी तो पुरुष के मामले में उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से तथा स्त्री होने पर धारा-15 के आधार पर खुलेगा। यदि इन चारों में से कोई हिस्सेदार चाहे तो बंटवारा करवा सकता है, या बिना बंटवारे के अपने हिस्से को विक्रय कर सकता है।

अपनी संपत्ति की सुरक्षा नहीं करेंगे तो उसे खो बैठेंगे।

August 12, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मैंने अपना मकान किराए पर दुकान चलाने के लिए दिया था।  आपसी सहमति के कारण कोई एग्रीमेंट नहीं लिखा गया था।  किराएदार लगभग 8 साल से रह रहा है।  4 साल का किराया नहीं दिया है। किराया मांगने पर किराया नहीं दे रहा है।  कहने पर दुकान खाली नहीं कर रहा है।  उसके पास कोई भी कागजी तौर पर सबूत नहीं है। उल्टा फर्जी जाकर कोर्ट में मुकदमा कर दिया है कहता है मकान मैंने बनवाया है। किराएदार के पास कोई भी लिखित प्रमाण नहीं है कि मैंने यह रूम किराए पर लिया है।  जबकि मकान मालिक के नाम (बिजली ,मकान नक्शा ,खतौनी, नगर पालिका टैक्स रसीद) है।  किरायादार जो किराया देता था वह भी रसीद काट कर नहीं  देता था। किराएदार पूर्ण रूप से इन लीगल तरीके से रह रहा है। क्या इसे पुलिस की मदद से हटाया जा सकता है ?  कृपया इस समस्या का हल बताए।

-वासदेव चौधरी, गाँव – बिहरा पोस्ट – ऊँचगाव  जिला – बस्ती  उत्तर प्रदेश

समाधान-

प जिस मुसीबत में फँसे हैं वह आप की खुद की मूर्खता और काहिली का सबूत है। पहले जब मकान किराए पर दिया तब आप को कम से कम उस से यह लिखाना चाहिए था कि वह मकान किराए पर ले रहा है। किरायानामा लिखने का प्राथमिक उद्देश्य यही होता है कि किराएदार की स्वीकृति मकान मालिक के पास रहे कि वह उस मकान पर बहैसियत किराएदार ही काबिज है। यदि यह होता तो आप को परेशानी नहीं होती।

आप ने किरायानामा नहीं लिखवाया और चार साल तक किराया लेते रहे तब उसे चार साल के किराए की रसीद देनी चाहिए थी और उस की काउंटर प्रति पर किराएदार के हस्ताक्षर होने चाहिए थे जिस से आप के पास यह सबूत हो जाता कि वह किराएदार है। आप ने यह भी नहीं किया।

जब चार साल पहले किराएदार ने किराया देना बंंद कर दिया तब आप को उस पर बकाया किराया वसूली का मुकदमा करना चाहिए था। आप ने चार साल तक वह मुकदमा भी नहीं किया।

अब जब वह खुद यह कहते हुए अदालत चला गया है कि मकान उस का खुद का है आप परेशान हो रहे हैं तो गलत क्या है? जो व्यक्ति समय रहते अपने अधिकारों की सुरक्षा नहीं करता वह ऐसे ही अपने अधिकार खो देता है।

आप को सब से पहले यह करना चाहिए कि कोई ऐसा सबूत तलाशना चाहिए जिस से यह साबित कर दें कि किराएदार आप के मकान में किराएदार है। यदि ऐसा कोई सबूत मिल जाता है तो आप किराएदार द्वारा किए गए मुकदमे में अपना बचाव कर सकेंगे। इस के साथ ही आप को पिछले 3 वर्ष के बकाया किराए और डिफाल्ट व व्यक्तिगत जरूरत के आधार पर मकान खाली करने हेतु बेदखली के लिए दीवानी वाद दाखिल करना चाहिए। यह काम आप से साक्षात्कार कर के वकील कर सकता है। इस कारण बेहतर है कि आप अपने यहाँ के बेहतर से बेहतर वकील करें, जो आप को इस मुसीबत से निजात दिला दे। हम ने अपने जीवन में अनेक मामले देखे हैं जिन में मकान मालिक की काहिली के कारण लोग कब्जा कर के खुद मालिक बन बैठे हैं। इस कारण शीघ्रता कीजिए और अच्छा वकील तलाश कर बचाव के साथ साथ बेदखली की कार्यवाही भी कराइए।

समस्या-

मेरे दादाजी की 6 हेक्टेयर जमीन है,और हम उनके जीते जी ही जमीन का नामांतरण कराना चाहते है,पिताजी के नाम पर,या डायरेक्ट मेरे नाम पर। मेरी 2 बुआजी है, तो क्या कर सकते हैं हम? ,और नामांतरण शुल्क तथा वसीयत के बारे में बताएँ।

-अनिल गुर्जर, ग्राम पोखरनी, तहसील टिमरनी, जिला हरदा, मध्यप्रदेश

समाधान-

प का प्रश्न बिना पूर्ण विवरण के है। आपने यह नहीं बताया कि उक्त भूमि आप के दादाजी की स्वअर्जित है या फिर पुश्तैनी है। यदि पुश्तैनी है तो उस में आप के दादाजी का नाम होते हुए भी आप के पिताजी और दोनों बुआएँ भी जन्म से भागीदार हो सकती हैंं। वैसी स्थिति में दादाजी केवल अपने हिस्से की जमीन को ही हस्तान्तरित कर सकते हैं आपके पिता और बुआओँ के हिस्से की जमीन को हस्तान्तरित नहीं कर सकते।

हम यदि यह मान लें कि उक्त भूमि आप के दादाजी की स्वअर्जित है तो उन के जीवनकाल में उक्त भूमि आप के पिता या आप के नाम केवल हस्तान्तरण से ही संभव है। वह विक्रय पत्र या दानपत्र के पंजीकरण से ही संभव है। इस में भूमि के बाजार मूल्य का 7-10 प्रतिशत खर्चा आ सकता है। इस संबंध में आप को अपने उप पंजीयक के कार्यालाय से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। एक बार दान पत्र या विक्रय पत्र का पंजीयन हो जाने पर आप उस के आधार पर नामांतरण करवा सकते हैं।

अत्यधिक कम खर्च मे ंउक्त भूमि को आप के या आप के पिताजी के नाम हस्तांतरित कराने का तरीका यह है कि आप के दादाजी जिस के नाम भी उक्त भूमि को हस्तांतरित कराना चाहते हैं उस के नाम वसीयत कर दें और उस वसीयत को उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करा लिया जाए। आप के दादाजी के जीवनकाल के बाद आप उस वसीयत के आधार पर नामांतरण करवा सकते हैं। लेकिन दादाजी आपनी वसीयत को अपने जीवनकाल में कभी भी निरस्त कर सकते हैं या बदल सकते हैं।

समस्या-

मेरे पति की असामयिक मृत्यु हो गयी है।  मेरे पति को पैतृक संपत्ति में 4 बीघा जमीन हिस्से में आई थी।  क्या मेरे पति की मृत्यु के बाद मेरा कोई हक उस पैतृक संपत्ति में बनेगा अथवा नही?  मैंने अभी कोई दूसरी शादी नही की है। अगर मेरे मां बाप मेरी दूसरी शादी कर देते हैं तो मेरा पैतृक संपत्ति जो मेरे पति की थी क्या मैं उस पर दावा कर सकती हूँ?

-लता देवी,  2/881 कोर्ट रॉड सहारनपुर

समाधान-

प के पति की जो भी स्वअर्जित संपत्ति थी अथवा पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति में जो भी उन का हिस्सा था वह आप के पति की मृत्यु के साथ ही उत्तराधिाकार में आप को प्राप्त हो चुका है। आप उसे प्राप्त करने के लिए दावा कर सकती हैं।

यदि आप दूसरा विवाह करती हैं तो भी आप का इस संपत्ति पर यह अधिकार बना रहेगा। वह आप के विवाह करने से समाप्त नहीं होगा। आप चाहें तो विवाह के बाद भी दावा कर सकती हैं। लेकिन आप को यह दावा समय रहते करना चाहिए। क्यों कि अक्सर ऐसा होता है कि आप दावा करते हैं तब तक दावा करने की कानूनी समयावधि समाप्त हो जाती है और आप दावा करने से वंचित हो सकती हैं। इस कारण आप को चाहिए कि तुरन्त किसी वकील से परामर्श कर के कार्यवाही करें।

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