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समस्या-

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 251(1)  के अंतर्गत जिस खातेदार पर रास्ते के लिये वाद दायर करते हैं उसी में से रास्ता दिया जाता है या किसी दूसरे  की खातेदारी में से रास्ता दिया जा सकता है,  यदि रास्ते में आने वाली दूरी कम हो।

– राहुल चौधरी, अजमेर

समाधान-

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 में कृषि भूमि में जाने के लिए रास्ते के संबंध में धारा 251 तथा धारा 251-क हैं। धारा 251 में आपका पहले से उपभोग में लिया जा रहा रास्ता किसी के द्वारा बंद कर देने या उस में बाधा पहुँचाने के संबंध में है तथा धारा 251-क किसी काश्तकार के खेत में आने जाने का रास्ता न होने पर नया रास्ता देने के संबंध में है। ये दोनों धाराएँ निम्न प्रकार हैं-

धारा- 251.

रास्ते तथा अन्य निजी सुखाचार के अधिकार- (1) उस दशा में जब कोई भूमिधारी जो वस्तुतः रास्ते के अधिकार या अन्य सुखाचार या अधिकार का उपभोग कर रहा हो, अपने उक्त उपभोग में बिना उसकी सहमति के, विधि विहित प्रणाली से भिन्न तरीके से, बाधित किया जाय, तहसीलदार उक्तरूपेण बाधित भूमिधारी के प्रार्थना-पत्र पर तथा उक्त उपभोग एवं बाधा के विषय में सरसरी जाँच करने के पश्चात् बाधा को हटायेजाने की अथवा बंद किये जाने की और प्रार्थी भूमिधारी को पुनः उक्त उपभोग करने की आज्ञा, कर सकेगा चाहे उक्तरूपेण पुन: उपयोग किये जाने के विरुद्ध तहसीलदार के समक्ष अन्य कोई हक स्थापित किया जाय।

(2) इस धारा के अन्तर्गत पारित कोई आज्ञा किसी व्यक्ति को ऐसे अधिकार या सुखाचार को स्थापित करने से विवर्जित नहीं करेगी जिसके लिये वह सक्षम सिविल न्यायालय में नियमित रीति से वाद प्रस्तुत करके दावा कर सकता हो।

251-क.

अन्य खातेदार की जोत में से होकर भूमिगत पाइपलाइन बिछाना या नया मार्ग खोलना या विद्यमान मार्ग का विस्तार करना.-(1) जहाँ

(क) कोई अभिधारी, अपनी जोत की सिंचाई के प्रयोजन के लिए किसी अन्य खातेदार की जोत में से होकर भूमिगत पाइपलाइन बिछाना चाहता है; या

(ख) कोई अभिधारी या अभिधारियों का कोई समूह अपनी जोत या, यथास्थिति, उनकी जोतों तक पहुंचने के लिए अन्य खातेदार की जोत में से होकर एक नया मार्ग बनाना चाहता है या किसी विद्यमान मार्ग को विस्तारित या चौड़ा करना चाहता है

और मामला पारस्परिक सहमति से तय नहीं होता है। तो ऐसा अभिधारी या, यथास्थिति, ऐसे अभिधारी ऐसी सुविधा के लिए संबंधित उप-खण्ड अधिकारी को आवेदन कर सकेंगे और उप-खण्ड अधिकारी, यदि संक्षिप्त जांच के पश्चात् उसका समाधान हो जाता है कि-

(i) यह आवश्यकता आत्यंतिक आवश्यकता है और यह जोत के केवल सुविधाजनक उपभोग के लिए नहीं है; और

(ii) अन्य खातेदार की जोत में से होकर, विशिष्ट रूप से नये मार्ग के मामले में, पहुंचने के वैकल्पिक साधन का अभाव सिद्ध किया गया है

तो आदेश द्वारा, आवेदक को, अभिधारी, जो उस | भूमि को धारित करता है, द्वारा सीमांकित या दर्शित लाईन के साथ-साथ भूमि की सतह से कम से कम । तीन फुट नीचे पाइपलाइन बिछाने के लिए या ऐसे ट्रैक | पर, जो उस अभिधारी द्वारा जो उस भूमि को धारित – करता है, दर्शाया जाये, भूमि में से होकर, और यदि ऐसा ट्रैक दर्शित नहीं किया जाये तो लघुतम या निकटतम रूट से होकर एक नया मार्ग जो तीस फुट से अधिक चौड़ा न हो, बनाने के लिए या विद्यमान मार्ग को तीस फुट से अनधिक तक विस्तारित या चौड़ा

करने के लिए, उस अभिधारी को, जो उस भूमि को धारित करता है, जिसमें से होकर पाइपलाइन बिछाने या एक नया मार्ग बनाने या विद्यमान मार्ग को चौड़ा करने का अधिकार मंजूर किया जाये, ऐसे प्रतिकर के संदाय पर जो विहित रीति से उप-खण्ड अधिकारी द्वारा अवधारित किया जाये, अनुज्ञात कर सकेगा।

(2) जहाँ उप-धारा (1) के अधीन नया मार्ग बनाने या किसी विद्यमान मार्ग को विस्तारित करने या चौड़ा करने का अधिकार मंजूर किया जाये वहाँ ऐसे मार्ग | को समाविष्ट करने वाली उस भूमि के संबंध में अभिधृति निर्वापित की हुई समझी जायेगी और वह भूमि राजस्व अभिलेखों में “रास्ता’ के रूप में अभिलिखित की जायेगी।

(3) वे व्यक्ति, जिनको उप-धारा (1) में निर्दिष्ट सुविधाओं में से किसी भी सुविधा के उपभोग के लिए अनुज्ञात किया गया है, उक्त सुविधा के आधार पर उस जोत में, जिसमें से होकर ऐसी सुविधा मंजूर की जाये, कोई भी अन्य अधिकार अर्जित नहीं करेंगे।’

उक्त दोनों धाराओं के उपबंधों से आप समझ गए होंगे कि आप का मामला धारा 251 (1) का न हो कर धारा 251-क का है।

आप का सवाल यह था कि जिस पड़ौसी की भूमि में से रास्ता मांगा गया है और प्रकरण में पक्षकार बनाया गया है क्या उस के अलावा किसी अन्य जिसे प्रकरण में पक्षकार न बनाया गया हो उस की भूमि में से भी रास्ता दिया जा सकता है क्या? तो हमारा कहना है कि जिस से रास्ता मांगा ही नहीं गया उस से रास्ता नहीं दिलाया जा सकता है। जिस से रास्ता दिलाया जाए उस का प्रकरण में पक्षकार होना आवश्यक है। जिस की जमीन में से रास्ता दिया जाएगा उस का पक्ष सुना जाना आवश्यक है अन्यथा रास्ता दिए जाने का आदेश ही गैर कानूनी होगा। यदि ऐसी कार्यवाही लंबित है तो आप जिस के खेत में से आप रास्ता चाहते हैं वह यदि पक्षकार नहीं है तो उसे प्रकरण में पक्षकार बनाए जाने के लिए आप आवेदन कर सकते हैं।

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समस्या-

मेरे दादाजी तीन भाई है और उन सभी ने क़ानूनी रूप से कोई बँटवारा किए बगैर आपसी सहमती से अपनी सुविधानुसार संपत्ति का बँटवारा कर लिया था और अभी तक खसरा नंबर मे भी दादाजी समेत उनके दोनो भाइयो का भी नाम है, दादाजी की दो संतान है एक पिताजी और दूसरी बुआजी, पिताजी ने दो शादियाँ की थी, पहली पत्नी से तीन लड़कियाँ और एक लड़का है सभी लड़कियो की शादियाँ हो चुकी है और मेरा सौतेला भाई और सौतेली माँ दादी और दादाजी के साथ प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने चार कमरो के मकान मे रहते है, पिताजी ने पाँच कमरो का मकान  बनवाया था जिसमे से दो कमरे पिताजी ने किराए से दुकान चलाने हेतु गाँव के ही एक व्यक्ति को सन २००५ मे दे दिए थे जिसका किराया दादाजी ही लेते रहे है और आज तक ऐसा ही चल रहा है और बाकी बचे तीन कमरो मे माँ, मैं और मेरा भाई रहते है| पिताजी के देहांत (२०११) के बाद जब हमने किराए से दी हुई दुकान को खाली कराना चाहा तो दादाजी ने आपत्ति करते हुए कहा की ये मेरा मकान है और जब हम चाहेंगे तभी खाली होगा, इसी तरह से जब हमने मकान का विस्तार करना चाहा तब भी उन्होने आपत्ति करते हुए कहा की तुम लोगो का कोई हिस्सा नही है, और अपने जीते जी मै बँटवारा भी नही करूँगा, क़ानूनी रूप से बँटवारा करने के लिए जब हम सरपंच के पास खानदानी सजरा बनवाने के लिए गये तो वहाँ से भी नकारात्मक जवाब मिला, दरअसल दादाजी हम लोगो को ज़मीन – जायदाद मे से कोई हिस्सा ही नही देना चाहते और लोगो के बहकावे मे आकर दादाजी संपत्ति को बिक्री करने की तथा मेरे सौतेले भाई के नाम करने की योजना बना रहे है अगर ऐसा हुआ तो हम लोग सड़्क पर आ जाएँगे, कृपया सलाह दें कि –
 (१) संपत्ति का बँटवारा कैसे होगा|
 (२) क्या हमारे दादाजी की संपत्ति मे उनके दोनो भाइयो का भी हिस्सा है|
 (३) हम किरायेदार से किराए की दुकान को कैसे खाली करवा सकते है |

– प्रदीप कुमार ज़ायसवाल, गाँव – सिहावल, पोस्ट- सिहावल, तहसील – सिहावल, थाना – अमिलिया, जिला- सीधी (मध्य प्रदेश)

समाधान-

प के दादाजी और उन के भाइयों के बीच बँटवारा कानूनी तौर पर नहीं हुआ था। बल्कि उन्होंने परिवार के अंदर एक अन्दरूनी व्यवस्था बना रखी थी। उस के अंतर्गत कुछ लगो कहीं काम करते थे और कहीं रहते थे। बँटवारा आज तक नहीं हुआ आप को बँटवारा कराने के लिए बँटवारे का दीवानी/ राजस्व वाद संस्थित करना होगा।  चूंकि दादाजी व उन के भाइयों के बीच बंटवारा नहीं हुआ था इस कारण संपूर्ण संपत्ति जो तीनों भाइयों की संयुक्त रूप से थी उस का बंटवारा इस बंटवारे में होगा। इस में आप के दादा जी के अतिरिक्त शेष दो दादाजी को जो संपत्ति अलग कर के दी गयी थी उस का भी बंटवारा होगा। यह वाद संस्थित करने के साथ ही संपत्ति का कोई भी हिस्सेदार किसी संपत्ति को बेच कर खुर्दबुर्द न करे इस के लिए अदालत से स्टे प्राप्त किया जा सकता है।

आप के  दादाजी की अलग से कोई संपत्ति नहीं है बल्कि तीनों दादाओँ की संयुक्त संपत्ति है इस कारण तीनों  भाइयों की संपत्ति में तीनों का हिस्सा है।

यदि किराएदार को आप के पिताजी ने दुकान किराए पर दी है तो उस के संबंध में आप के पिता ही लैंडलॉर्ड माने जाएँगे और वे दुकान खाली कराने के लिए दीवानी न्यायालय में दावा संस्थित कर सकते हैं।

आप को किसी स्थानीय वकील को सभी दस्तावेज दिखा कर परामर्श प्राप्त कर के तुरन्त कार्यवाहियाँ करनी चाहिए।

 

 

समस्या-

मेरे दादाजी की 6 हेक्टेयर जमीन है,और हम उनके जीते जी ही जमीन का नामांतरण कराना चाहते है,पिताजी के नाम पर,या डायरेक्ट मेरे नाम पर। मेरी 2 बुआजी है, तो क्या कर सकते हैं हम? ,और नामांतरण शुल्क तथा वसीयत के बारे में बताएँ।

-अनिल गुर्जर, ग्राम पोखरनी, तहसील टिमरनी, जिला हरदा, मध्यप्रदेश

समाधान-

प का प्रश्न बिना पूर्ण विवरण के है। आपने यह नहीं बताया कि उक्त भूमि आप के दादाजी की स्वअर्जित है या फिर पुश्तैनी है। यदि पुश्तैनी है तो उस में आप के दादाजी का नाम होते हुए भी आप के पिताजी और दोनों बुआएँ भी जन्म से भागीदार हो सकती हैंं। वैसी स्थिति में दादाजी केवल अपने हिस्से की जमीन को ही हस्तान्तरित कर सकते हैं आपके पिता और बुआओँ के हिस्से की जमीन को हस्तान्तरित नहीं कर सकते।

हम यदि यह मान लें कि उक्त भूमि आप के दादाजी की स्वअर्जित है तो उन के जीवनकाल में उक्त भूमि आप के पिता या आप के नाम केवल हस्तान्तरण से ही संभव है। वह विक्रय पत्र या दानपत्र के पंजीकरण से ही संभव है। इस में भूमि के बाजार मूल्य का 7-10 प्रतिशत खर्चा आ सकता है। इस संबंध में आप को अपने उप पंजीयक के कार्यालाय से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। एक बार दान पत्र या विक्रय पत्र का पंजीयन हो जाने पर आप उस के आधार पर नामांतरण करवा सकते हैं।

अत्यधिक कम खर्च मे ंउक्त भूमि को आप के या आप के पिताजी के नाम हस्तांतरित कराने का तरीका यह है कि आप के दादाजी जिस के नाम भी उक्त भूमि को हस्तांतरित कराना चाहते हैं उस के नाम वसीयत कर दें और उस वसीयत को उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करा लिया जाए। आप के दादाजी के जीवनकाल के बाद आप उस वसीयत के आधार पर नामांतरण करवा सकते हैं। लेकिन दादाजी आपनी वसीयत को अपने जीवनकाल में कभी भी निरस्त कर सकते हैं या बदल सकते हैं।

बँटवारा गैर खातेदारी की भूमि का भी हो सकता है।

July 1, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

शमीम अहमद ने बीकानेर, राजस्थान से पूछा है-

र्स्ट पार्टी में मेरी माताजी मेरे बडे भाई साहब और दूसरी पार्टी में मेरे चाची और उसके दो बेटों के नाम से सँयुक्त रूप से स्थगन आदेश लगभग 200 बीघा खेती की जमीन का माननीय राजस्व न्यायालय, अजमेर में राजस्थान सरकार उपनिवेशन कार्यालय इंदिरा ग़ांधी नहर के खिलाफ़  चल रहा हैं। यह सारी ज़मीन अभी तक ग़ैरखातेदारी की हैं और इसके खातेदारी के वास्ते ऊपर दिए गए नामों का ही सँयुक्त दावा राजस्व अपील अधिकारी कार्यालय में चल रहा है। अभी तक जमीन की खातेदारी नही मिली है, इसलिए इस पर केवल स्थगन आदेश पर ही हम लोग खेती करते हैं। मेरी समस्या यह है कि इस सारी जमीन पर मेरे चाचा के दोनों लड़को में कब्जा कर रखा है और वो ही खेती कर रहे है। हमे जमीन का एक भी टुकड़ा नही दे रहे है खेती करने के लिए। चूंकि हम गरीब लोग है और अभी बरसात का मौसम चल रहा है तो खेती के लिए हमारे पास किसी भी प्रकार की इसके अलावा जमीन नहीं है।  अब जब तक हमे खातेदारी नही मिलती तब तक हमें हमारा हक ये लोग नहीं देंगे। श्रीमान जी मेरा प्रश्न यह है कि –
1. क्या स्थगन आदेश में भी बंटवारा करवाया जा सकता हैं कानूनी रूप से और क्या स्थगन आदेश में भी बंटवारे के लिए दावा कर सकते है । ऐसा करने के लिए क्या प्रक्रिया है?
2. हमे जब तक खातेदारी नही मिलती है तब तक हम अपना हक उन लोगों सर कैसे ले सकते हैं?
3. स्थगन आदेश में बंटवारा करने पर राजस्व अपील अधिकारी के कार्यालय में चल रहे सयुक्त रूप से खातेदारी के वास्ते दावे पर क्या असर पड़ेगा?

समाधान-

प की समस्या तो समझ में आ रही है पर तथ्य ठीक से समझ नहीं आ रहे हैं। स्थगन िकसी मुकदमे में होता है और यह मुकदमा किस बात का है आप के प्रश्न से स्पष्ट नहीं हो रहा है। फिर भी हम आप के प्रश्नों के उत्तर दे रहे हैं-

  1.  गैरखातेदारी अधिवासी (टीनेंट) भी टीनेंसी एक्ट की धारा 53 के अंतर्गत बंटवारे के लिए वाद संस्थित कर सकते हैं। आप भी अपना बंटवारे, तथा अपने हिस्से का अलग कब्जा दिलाने का दावा पेश कर सकते हैं। इसी दावे में आप पूरी जमीन पर रिसीवर कायम करने के लिए आवेदन दे सकते हैं कि रिसीवर ही उस जमीन पर खेती की देखरेख करें और उस से होने वाले मुनाफे को अपने पास रखे जो बंटवारा होने पर उस के हिसाब से पक्षकारों को दे दिया जाए। इस तरह आप के विपक्षी जो पूरी जमीन पर खेती कर रहे हैं उन की खेती रिसीवर के पास चली जाएगी। आप के पास तो कुछ है नहीं, इस कारण उन पर दवाब आएगा। इस दबाव के कारण वे जमीन का एक हिस्सा आप को खेती करने के लिए दे सकते हैं।
  2. दूसरे प्रश्न का उत्तर भी यही है।
  3. एक बार बंटवारे की डिक्री हो जाए तो आप उस की प्रमाणित प्रति राजस्व अपील न्यायालय में पेश कर सकते हैं और उस का संज्ञान लिया जा कर तदनुरूप वहाँ निर्णय किया जा सकता है।

हमें आप के दोनों चल रहे मुकदमों की प्रकृति के बारे में जानकारी स्पष्ट नहीं है। इस कारण इन उत्तरों को केवल मार्गदर्शक समझा जाए। इस संबंध में आप अपने वकीलों से परामर्श कर के उचित कार्यवाही करें तो बेहतर है।

समस्या-

र, मेरी जमीन के आगे की जमीन का लेवल बहुत ही नीचे है, उनके द्वारा मिट्टी को निकाल दिया गया है। जिससे हमें कृषि हेतु अनेक प्रकार के परेशानी का सामना करना पड़ा रहा है। पानी खेत में नही टिक पा रहा है तथा सारी मिट्टी सामने वाले के, खेत में जा रही है।  हमारे खेत की मिट्टी कम होती जा रही है। ऐसी बहुत समस्याएं हमारे सामने आ रही हैं। मैं यह जानना चाहता हूं कि क्या मैं अपने खेत की मिट्टी निकाल सकता हूं क्या?  हमारे पीछे खेत वाले ने हमें धमकी दी है कि अगर तुमने अपने खेत से मिट्टी निकलवाई तो मैं तुरंत पुलिस को सूचित कर दूंगा।  मैं यह जानना चाहता हूं कि हमारा यह अधिकार नहीं है कि हम अपने निजी कार्य हेतु अपने खेत से मिट्टी निकाल सकें। इस संदर्भ में हमें थोड़ी सी जानकारी चाहिए हमें अपने खेत से मिट्टी निकालने के लिए क्या करना चाहिए?

 – रमेश चंद्र चौसाली

समाधान-

प को ध्यान रखना चाहिए कि समस्त कृषि भूमि सरकार के स्वामित्व की होती है और कृषक केवल उस का खातेदार कृषक है जिस की हैसियत एक किराएदार जैसी है। कृषक से किराए के रूप में हर वर्ष सरकार लगान वसूल करती है। जब आप खेत के मालिक ही नहीं हैं तो अपनी मर्जी से अपने काम के लिए मिट्टी कैसे निकाल सकते हैं। लेकिन यही काम आप सरकार की अनुमति से कर सकते हैं।

आप ने हमें नहीं बताया है कि आप का खेत किस राज्य के किस जिले की किस पंचायत में स्थित है। प्रत्येक राज्य के लिए खेती की जमीन का कानून भिन्न भिन्न है। पर लगभग सभी कानूनों में तहसीलदार को राज्य का प्रतिनिधि मान कर यह अधिकार दिया है कि वह खातेदार कृषक को उस की भूमि में से मिट्टी निकालने की अनुमति प्रदान कर सके। यदि आप को अपने निजी कार्य के लिए मिट्टी की आवश्यकता है तो आप अपनी  आवश्यकता बताते हुए तहसील में आवेदन दीजिए। तहसलीदार से लिखित अनुमति प्राप्त  हो जाने पर मिट्टी निकालें। तब पुलिस भी कुछ नहीं कर पाएगी।

खेत में जाने के रास्ते के लिए एसडीओ को आवेदन प्रस्तुत करें।

September 16, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नवरतन सैन ने रानीसर, बीकानेर से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरा खेत जो कि मेरे पास के गांव बबलु की कांकड़ में पड़ता है उस खेत का मार्ग किसी व्यक्ति ने रोक दिया है और बोल रहा है कि तुम्हारा मार्ग नहीं है। जब मैंने इस सम्बन्ध में पटवारी से बात की तो वह बोला कि तुम्हारा कागजों में कटान का मार्ग नहीं है! तो अब मैं अपने खेत केसे जाउंगा और मुझे अपने खेत का ( कटान) का मार्ग कैसे मिलेगा?

समाधान-

प के खेत पर जाने का मार्ग आप को कितने वर्षों से प्राप्त था यह आप ने नहीं बताया जिस से यह निर्धारित किया जा सके कि क्या यह आप का सुखाधिकार था। यदि आप को यह मार्ग 20 वर्ष से अधिक से मिला हुआ था तो वह  सुखाधिकार हो सकता है। यदि ऐसा है तो फिर उस आधार पर सिविल न्यायालय में भी वाद किया जा सकता है और आप को उस रास्ते से जाने से रोकने के विरुद्ध निषेधाज्ञा प्राप्त की जा सकती है।

यदि आप के खेत पर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है और आप को अपने खेत तक जाने के लिए किसी के खेत से गुजरना ही हो तो आप राजस्थान टीनेंसी एक्ट 1955 की धारा 251 ए के अंतर्गत एसडीओ के न्यायालय में सब से कम दूरी वाला रास्ता दिलाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

समस्या-

कपिल शर्मा ने रुद्रप्रयाग, भीरी, टेमरिया वल्ला, बसुकेदा, उत्तराखंड की समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी के भाई ने अपनी 21 नाली जमीन हरिजन समाज कल्याण को बेच दी और उसके बाद वह लापता हो गए। उसके बाद हम ने उस पर विभाग का कब्जा होने नहीं दिया। जिस कारण वह कब्जा हमारे पास ही है, पिछले 30 साल से। तो क्या यह जमीन हमारी ही हो गयी है। अगर नहीं है, तो हमारे नाम पे करवाने के लिए इसमें क्या कार्यवाही की जा सकती है? इस जमीन के पट्टे हमारे यहाँ के हरिजनों को मिले हुए है पर इनका भी कब्जा नहीं है, तो इसमें क्या इन हरिजनों का हक़ बनता है? क्योंकि अब वह 30 साल बाद हमें अपने कब्ज़े के लिए परेशान कर रहे हैं। महोदय मैं बहुत परेशान हूँ ये लोग मुझे बहुत परेशान कर रहे हैं। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

प के दादाजी के भाई ने जमीन बेच दी, अब उस पर आप का या आप के परिवार के किसी व्यक्ति का कोई हक नहीं रहा है। वह जमीन हरिजनों को आवंटित कर दी गयी है और उस पर उन का हक हो गया। आप ने हरिजनों का कब्जा नहीं होने दिया लेकिन आप का जो कब्जा था वह भी अवैध था। आप अपने बल से कब्जें में थे। अब आप का बल क्षीण हो गया है और हरिजन उन के हक की जमीन पर कब्जा करना चाहते हैं तो आप को परेशानी हो रही है। यही परेशानी पिछले तीस साल से हरिजनों को थी, लेकिन आप को उस से कोई फर्क नहीं पड़ा। तो कब्जा तो बल का मामला है जिस के पास बल है, पुलिस और अफसरों को अपने हक में इस्तेमाल करने की ताकत है उसी का कब्जा है। यदि आप जमीन को अपने नाम करा लेंगे तब भी हरिजनों में ताकत और बल हुआ तो वे जमीन का कब्जा आप से ले लेंगे।

जमीन एक बार अनुसूचित जाति के व्यक्ति के नाम स्वामित्व में आ गयी तो वह अब गैर अनुसूचित जाति के खाते में नहीं आ सकती। आप के खाते में किसी प्रकार नहीं आएगी। आप इस जमीन को अपने नाम कराने की बात को भूल ही जाएँ तो बेहतर है। गनीमत है कि हरिजनों ने आप को अनु.जाति अनु.जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम में कोई फौजदारी मुकदमा नहीं किया वर्ना आप को लेने के देने पड़ सकते थे। आप ने तीस सालों से अपने हक की न होते हुए भी इस जमीन से जितनी कमाई की है उस में आप अपने लिए इस से कई गुना जमीन खरीद सकते हैं। यह सोच कर तसल्ली कर लीजिए। जिन का हक है वह तो आप को आगे पीछे देना होगा। उस से बचा नहीं जा सकता।

नामान्तरण सही समय पर कराएँ जिस से गलफहमियाँ न पनपें।

July 29, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राकेश कुमार ने ग्राम पोस्ट माकतपुर जिला कोडरमा, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी फुआ (गुंजारी देवी) शादी के तुरंत बाद बिना कोई औलाद के बल बिधवा हो गई। मेरी फुआ अपने पति की मृत्यु के बाद अपने मायके में अपने भाई भतीजों के साथ रहने लगी। प्रश्नगत भूमि को राज्य सरकार द्वारा गुंजारी देवी के नाम से बंदोबस्ती वाद संख्या 14/75-76 के माध्यम से 1.40 डी (गैर मजरुआ खास) जमीन बंदोबस्त किया गया एवं सरकारी लगान रसीद गुंजारी के से कट रहा है गुंजारी देवी को प्राप्त भूमि जिला निबंध, कोडरमा के कार्यालय से दान पत्र संख्या 7252 दिनांक 09/06/1986 के माध्यम से अपने भाई एवं भतीजों के नाम से कर दिया।  जो आज तक गुंजारी देवी के नाम से रसीद कटवाते आ रहे हैं उक्त जमीन पर माकन दुकान एवं कुआं बनाकर रहते चले आ रहे हैं | गुंजारी देवी की मृत्यु सन 1993 में हो गई। गांव के कुछ लोगों का कहना है की गुन्जरी देवी को वारिस नहीं होने के कारण उनकी मृत्यु के बाद यह जमीन सरकार के खाते में वापस चली गई इसलिए इस जमीन को हम लोग सामाजिक कार्य के लिए उपयोग करेंगे। क्या गावं वालों का आरोप सही है? क्या ऐसा संभव है? उक्त जमीन पर अपनी दावेदारी मजबूत कैसे करें?

समाधान-

गाँव वालों का आरोप सही नहीं है पर इस आरोप के पीछे गलती गाँव वालों की नहीं गुञ्जारी देवी के भाई भतीजों की है। जंगल में मोर नाचता है तो कोई नहीं देखता। जब शहर गाँव में नाचता है तो लोग देखते हैं और कहते हैं आज मोर नाचा है। गुञ्जारी देवी ने दान पत्र अपने भाई भतीजों के नाम निष्पादित कर रजिस्टर कराया तो उस का नामान्तरण राजस्व रिकार्ड में होना चाहिए था। इस नामान्तरण के न होने से राजस्व रिकार्ड में आज भी भूमि गुञ्जारी देवी के नाम है। यदि उस रिकार्ड को देख कर गाँव के लोग आरोप लगाते हैं और जमीन को सार्वजनिक काम में लेने के लिए कहते हैं तो वे गलत कैसे  हो सकते हैं। सही समय पर नामान्तरण न होने से अनेक गलतफहमियाँ उत्पन्न होती हैं।

अब इस समस्या का निदान यह है कि उक्त पंजीकृत दान पत्र के आधार पर नामान्तरण के लिए आवेदन करें और नामान्तरण कराएँ जब राजस्व रिकार्ड में यह जमीन गुञ्जारी देवी के खाते में आ जाएगी तो गाँव वाले अपने आप यह आरोप लगाना बंद कर देंगे। वैसे भी जब गाँव को सार्वजनिक कार्यों के लिए भूमि की जरूरत हो और भूमि उपलब्ध न हो तो सार्वजनिक कार्यों के लिए उपलब्ध होने वाली भूमि पर उन की निगाह रहेगी। इस कारण तुरन्त नामान्तरण कराया जाना जरूरी है।

जो बंटवारा चाहता है उसे कार्यवाही करने दें।

July 1, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

सुनील शर्मा ने कोटा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी ने उनके चारो बेटो को बराबर जमींन बाट दी, लेकिन जमीन नाम पर नहीं हुई। सिर्फ एक पेपर पर लिखा है और सभी के साइन हैं उस पर। लेकिन हमारे हिस्से की जमीन में शहर का रोड निकल गया हे तो बाकी के भाई उस जमींन में हक़ मांग  रहे हैं।  हमें हमारी जमीन अपने नाम पर करवानी है। दादा जी का देहांत हो गया है।

समाधान-

दि आप के दादाजी सभी बेटों को बराबर जमीन बांट गए थे तो उन्हें उसी समय राजस्व रिकार्ड में अलग अलग खाते बनवा देने चाहिए थे, यह काम वे जीतेजी नहीं कर गए। उन की मृत्यु के उपरान्त भी बंटवारा किया जा कर सब के खाते अलग अलग करवा लेने चाहिए थे। लेकिन तब भी नहीं हुआ। अब दादाजी की जमीन का रिकार्ड एक साथ है और उस में सभी पुत्रों के नाम अंकित हैं। इस कारण सारी जमीन अभी तक संयुक्त स्वामित्व मे ंहै। हो सकता है जमीन के कब्जे अलग अलग हों, लेकिन स्वामित्व सारी जमीन पर सब का है।

आप के पास जो दस्तावेज है यदि वह  किसी मौखिक बंटवारे के स्मरण पत्र के रूप में है और उस पर सभी हिस्सेदारों के हस्ताक्षर हों तो न्यायालय उसे बंटवारे के समान मान सकता है। पर इस के लिए आप को कानूनी कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है। यदि आप कानूनन बंटवारा करेंगे तो भी सब को आज की स्थिति में बराबरी से देखा जाएगा और सब को समान रूप से हिस्सा मिलेगा। यदि बंटवारे के स्मरण पत्र को वैध मान लिया गया तो हो सकता है आप के कब्जे की जमीन आप के ही हिस्से में रह जाए।  यदि आप जमीन का खाता अपने नाम कराने जाएंगे तो आप को हानि ही हो सकती है। इस कारण से आपके जो भाई हिस्सा चाहते हैं उन्हें कहें कि वे अपने हक के लिए अपने हिसाब से कार्यवाही करें।

नामान्तरण से स्वामित्व तय नहीं होता।

June 24, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अभिषेक राय ने देवरिया,  उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

चाचा की कोई औलाद नहीं थी। 1978 में चाचा ने मुझे रजिस्टर्ड वसीयत किया। 1996 में उनकी मृत्यु हो गयी। उसके बाद मैंने दाखिल-खारिज करवाने के लिए नोटिस भेजा, उस में मेरे चाचा के भाई को आपति हुई, केस 1 साल तहसीलदार के वहाँ चला और केस मैं जीत गया, और मेरा नाम खतौनी में चढ़ गया। 20 साल बाद 2016 मेरे 3 अन्य भाई दीवानी में अपील किए कि रजिस्टर्ड वसीयत फ़र्ज़ी है और हमारा भी शेयर हुआ चाचा की संपत्ति में।  2 गवाह में से एक गवाह जो मेरे मामा हैं जिन्हों ने केस कराया है और कहता है कि मैं कोर्ट मे विपरीत बयान दूंगा कि वसीयत फ़र्ज़ी है और मेरे साइन नहीं हैं या चाचा की तबियत ठीक नहीं थी आदि।

समाधान-

प ने 1996 में वसीयत के आधार पर नामान्तरण कराया। लेकिन नामान्तरण से स्वामित्व तय नहीं होता। इस कारण आप के भाइयों ने वसीयत को अब दीवानी न्यायालय में चुनौती दी गयी है। इस दावे में अनेक बिन्दु होंगे जिन के आधार पर यह दावा निर्णीत होगा। केवल वसीयत ही एक मात्र बिन्दु नहीं होगा। इस कारण यदि वसीयत का एक गवाह बदल रहा है तो कम से कम एक गवाह और होगा। इस के अलावा रजिस्टर्ड वसीयत में रजिस्ट्रार के सामने वसीयत होती है वह उसे तस्दीक करता है। 1978 में जो दस्तावेज रजिस्टर्ड हो वह पुराना होने के कारण ही सही माना जाएगा। उस में गवाह की ये बातें नहीं मानी जाएंगी। इस कारण से आप वसीयत को दूसरे गवाह और वसीयत ड्राफ्ट करने वाले के बयान करवा कर भी साबित कर सकते हैं। लेकिन इन सब बिन्दुओँ का जवाब मौके पर आप के वकील ही तलाशेंगे। इस मामले में आप को उन्हीं से बात करनी चाहिए। यदि मामला उन के बस का न हो तो किसी स्थानीय सीनियर वकील की इस मामले में सलाह ले कर मुकदमे को आगे बढ़ाना चाहिए

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