Right to Information Archive

सहकारी समितियाँ कब सूचना अधिकार कानून में आती हैं?

May 18, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

RTIसमस्या-

विजय लूनिया ने कवर्धा, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

क्या ऐसी सहकारी समिति जो की राज्य शासन के नियंत्रण मे हो और शासन द्वारा करोडों रूपए पूंजी  निवेश किया गया हो एवं जिसका नियंत्रण भी शासन के हाथ में हो क्या ऐसी सहकारी समिती  सूचना के अधिकार कानून में आती है?

समाधान-

सामान्य रूप से सहकारी समितियाँ सूचना के अधिकार कानून के अन्तर्गत नहीं आती हैं। लेकिन यदि किसी सहकारी समिति का स्वामित्व, नियन्त्रण किसी सरकार के हाथ में हो या वह सबस्टेंशियली सरकार द्वारा वित्तपोषित हो तो ऐसी सहकारी समिति सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत आएगी तथा उस से सूचना के अधिकार कानून के अन्तर्गत सूचना प्राप्त की जा सकती है।

इस संबंध में 7 अक्टूबर 2013 को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Thalappalam Ser.Coop.Bank Ltd.& … vs State Of Kerala & Ors के प्रकरण में पारित निर्णय में स्पष्ट किया गया है कि सहकारी समितियाँ सूचना के अधिकार कानून के अन्तर्गत नहीं आती हैं, लेकिन यदि किसी सहकारी समिति का स्वामित्व, नियन्त्रण किसी सरकार के हाथ में हो या वह सबस्टेंशियली सरकार द्वारा वित्तपोषित हो तो ऐसी सहकारी समिति सूचना के अधिकार कानून के अंतर्गत आएगी तथा उस से सूचना के अधिकार कानून के अन्तर्गत सूचना प्राप्त की जा सकती है।

RTIसमस्या-

यसदानी खान ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मैं रायपुर में ही हायर सेकण्डरी स्कूल मे प्रिंसपल के पद पर कार्यरत हूँ। मेरे स्टाफ मे कुलदीप भानू व्याख्याता पद पर कार्यरत है जिस की उम्र 40 वर्ष है कुलदीप ने अपनी शादी 23 वर्ष की उम्र में की थी। वह 30 साल की उम्र तक अपनी पत्नी के साथ रहा फिर दोनों सामाजिक समझौते के तहत तलाक लेकर अलग रहने लगे। 1 साल बाद कुलदीप ने दूसरा विवाह कर लिया। कुलदीप को अपनी दूसरी पत्नी के साथ रहते हुए 9 साल हो गये हैं और उसके दो पुत्र भी हैं। जनवरी 2014 में कुलदीप की पहली पत्नि के भाई ने सूचना अधिकार के तहत कुलदीप की सारी गोपनीय जानकारी की मांग की। कुलदीप एक सरकारी कर्मचारी है जिससे उसके शासकीय गोपनीय चरित्रावली की जानकारी देना सूचना अधिकार के अंर्तगत नहीं था जिस से मैं ने उसको जानकारी नहीं दी। फिर उनके भाई उनके द्वारा राज्य सूचना आयोग में भी आवेदन किया मगर वहाँ भी उनको जानकारी देने से मना कर दिया गया। उसके बाद मार्च 2014 मे कुलदीप की पहली पत्नि ने रायपुर कुटुम्ब न्यायालय में भरण पोषण के लिए आवेदन किया और कुटुम्ब न्यायालय ने जुलाई 2014 में अंतरिम भरण पोषण की राशि तय कर दी आज तक कुलदीप अपनी पहली पत्नी को भरण पोषण की अंतरिम राशि देकर भरण पोषण कर रहा है। आज वर्तमान तक कुटुम्ब न्यायालय में कुलदीप और उनकी पहली पत्नी का केस चल रहा है फाईनल आदेश नहीं हुआ है। अब मार्च 2015 में कुलदीप की पहली पत्नी ने सूचना के अधिकार 2005 के तहत कुलदीप की शासकीय गोपनीय चरित्रावली की मांग की है कुलदीप की पहली पत्नी ने केन्द्रीय सूचना आयोग द्वारा पारित निर्णय prashansha Sharma V/s Delhi Transco Ltd. No. CIC/SA/A/2014/000433 date 03.02.2015 के आधार पर आवेदन किया है। उनका कहना है कि सूचना के अधिकार कानून के तहत कोई भी अपने जीवन साथी की आय, सम्पत्ति निवेश आदि की जानकारी मांग सकता है। केन्द्रीय सूचना आयोग (सी. आई. सी) ने इस बारे में आदेश जारी कर दिये हैं। पति की कमाई आरटीआई के अधीन हो गयी है। सूचना आयुक्त ने नई रूलिंग दी है अभी तक यह सूचनाएँ थर्ड पार्टी के तहत गोपनीय होती थी। अब पति की कमाई और निवेश का ब्यौरा पत्नि मांग सकती है। यह सभी दलिलें कुलदीप की पहली पत्नि ने आवेदन में लिख कर मुझ से कुलदीप की गोपनीय जानकारियों की मांग की है। मैं आपको ये बताना चाहूंगा की मै नें सीआईसी के द्वारा पारित उपरोक्त निर्णय को ध्यान से पढ़ा। मेरे हिसाब से उपरोक्त केस मेम सीआईसी ने सिर्फ आवेदिका और अनावेदक के लिए ही आदेश दिया है। उपरोक्त केस का फैसला केस से असंबंधित लोगों के लिए नहीं है और उपरोक्त केस में अनावेदक, आवेदिका का भरण पोषण नहीं कर रहा था इसलिए सीआईसी ने उपरोक्त केस का फैसला आवेदिका के पक्ष में किया। अब मै आपसे यह पुछना चाहता हूँ कि क्या सीआईसी ने ऐसा कुछ आदेश निकाला है जिसके तहत मुझे कुलदीप की गोपनीय जानकारीयाँ उनकी पहली पत्नी को देना पड़े, और अगर ऐसा कुछ नया नियम निकाला गया है तो सूचना के अधिकार 2005 के किस धारा में संशोधन/एड किया गया है और मुझे इन सभी नियमों की जानकारी किस बुक से प्राप्त हो सकता है। सीआईसी द्वारा उपरोक्त केस का निर्णय 03.02.2015 को लिया गया है और कुलदीप की पहली पत्नी के आवेदन के अनुसार सीआईसी द्वारा नई रूलिंग भी 03.02.2015 को पारित किया गया है। सीआईसी द्वारा उपरोक्त केस में पारित निर्णय के अनुसार जब कोई पति अपनी पत्नि का भरण पोषण नहीं कर रहा है तब पत्नि अपने पति से उनकी कमाई व निवेश का ब्यौरा मांग सकती है मगर यहाँ स्थिति यह है कि कुलदीप भानु अपनी पहली पत्नी का भरण पोषण न्यायालय के आदेश के अनुसार 15.07.2014 से कर रहा है तो आप बताइऐ कि क्या? कुलदीप की पहली पत्नी को उनके द्वारा मांगी गई जानकारी देना आवश्यक है या नहीं।

समाधान-

प की जानकारी के लिए बता रहे हैं कि सूचना के अधिकार कानून में कोई संशोधन नहीं किया गया है। यह केवल सूचना आयुक्त का निर्णय है। भारत का संविधान यह उपबंध करता है कि ऊंचे न्यायालय का निर्णय निचले न्यायालय पर बाध्यकारी होगा। इस कारण आप से यह मांग की जा रही है कि आप सूचना दें।

लेकिन इस मांग में कई खामियाँ हैं। आयुक्त का निर्णय यह कहता भी हो कि जीवन साथी की आय व संपत्ति के बारे में सूचना दिया जाना चाहिए, तो भी यह महिला उस व्यक्ति की जिस के बारे में आप से सूचना मांगी गयी है अब जीवन साथी अर्थात पत्नी नहीं है। उस की जीवन साथी तो उस की वर्तमान पत्नी है। जिसने सूचना मांगी है वह तो इस व्यक्ति से विवाह विच्छेद कर चुकी है। इस कारण आप को यह सूचना नहीं देना चाहिए।

दूसरी बात यह है कि यह आयुक्त का निर्णय है। कानून में कोई परिवर्तन नहीं है। और आप सूचना अधिकारी हो सकते हैं लेकिन न्यायालय नहीं हैं। आप पर यह निर्णय वैसे भी बाध्यकारी नहीं है। इस कारण आप के द्वारा यह निर्णय नहीं लेना चाहिए कि यह सूचना दी जाए। एक व्यक्ति की गोपनीय जानकारी सूचना के अधिकार के अन्तर्गत देना उचित नहीं है। यदि आप आवेदिका का आवेदन निरस्त करते हैं तो उसे अपील करने दीजिए। यदि अपील न्यायालय आप को निर्देश दे कि आप सूचना दें तो आप सूचना दे सकते हैं।

RTIसमस्या-

हरि शंकर ने मेरठ शहर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं उत्तर प्रदेश के जनपद मेरठ का रहने वाला, पिछडी जाति (सोनार) से हूं। आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं है, घर पर ही कम्प्यूटर जॉब वर्क करके परिवार का पालन कर रहा हूं। मैंने अपने बेटे को वर्ष २००९ में जनपद मेरठ के ही एक इंजीनियरिंग कालेज में बीटेक में बैंक से शिक्षा ऋण लेकर प्रवेश दिलाया था। मेरे बेटे ने प्रत्येक वर्ष छात्रवृत्ति/शुल्क प्रतिपूर्ति के लिए आवेदन किया था। वर्ष २०१३ में उसका कोर्स पूरा हो गया। इस दौरान कालेज ने उसे मात्र एक ही वर्ष की शुल्क प्रतिपूर्ति का भुगतान किया। जैसा कि विदित है कि कालेज प्रबंध तंत्रों द्वारा छात्रवृत्ति/शुल्क प्रतिपूर्ति घोटाले दिन प्रतिदिन उजागर हो रहे हैं। इसी को देखते हुए मैंने एक आरटीआई आवेदन कालेज सूचना अधिकारी तथा एक आरटीआई जन कल्याण अधिकारी जनपद मेरठ को दी। समय सीमा समाप्त होने पर भी कोई जवाब न मिलने पर पुन: एक रिमांइडर दिया। रिमांइडर पर मेरा प्रेषक में पता देखकर जिला समाज कल्याण अधिकारी ने बिना लिफाफा खोले ‘रिफ्यूज्ड’ रिमार्क के साथ वापस भेज दिया। अत: आपसे निवेदन है कि मेरा सही मार्गदर्शन करने की कृपा करें कि मैं इस संबंध में क्या प्रक्रिया प्रयोग में ला सकता हूं। क्योंकि मुझे पूर्ण विश्वास है कि समाज कल्याण अधिकारी तथा कालेज प्रबंध तंत्र ने मिलकर छात्रवृत्ति/शुल्कप्रतिपूर्ति में भारी घोटाला कर बच्चों के हक पर डांका डाला है। यदि यह राशि हमें मिल जाये तो बैंक का कुछ भार उतर जायेगा।

समाधान-

ह एक सामान्य समस्या है। अनेक बार ऐसा होता है कि सूचना के लिए आवेदन प्रस्तुत करने पर समय सीमा में कोई उत्तर प्राप्त नहीं होता है। वैसी स्थिति में आवेदक को समय सीमा में सूचना अधिकारी से उच्च अधिकारी को अपील प्रस्तुत करना चाहिए और अपील से सन्तुष्ट न होने पर दूसरी अपील आयोग को करना चाहिए।

दि लोक सूचना अधिकारी निर्धारित समय-सीमा के भीतर सूचना नहीं देते है या धारा 8 का गलत इस्तेमाल करते हुए सूचना देने से मना करता है, या दी गई सूचना से सन्तुष्ट नहीं होने की स्थिति में 30 दिनों के भीतर सम्बंधित लोक सूचना अधिकारी के वरिष्ठ अधिकारी यानि प्रथम अपील अधिकारी के समक्ष प्रथम अपील की जा सकती है (धारा 19(1)।

दि आप प्रथम अपील से भी सन्तुष्ट नहीं हैं तो दूसरी अपील 60 दिनों के भीतर केन्द्रीय या राज्य सूचना आयोग (जिससे सम्बंधित हो) के पास की जा सकती है। (धारा 19(3)।

हो सकता है आप के मामले आप के द्वारा आवेदन दिए जाने के बाद अपील की अवधि समाप्त हो चुकी हो। वैसी स्थिति में आप नए सिरे से सूचना के लिए आवेदन कर सकते हैं।

RTIसमस्या-

शैलेश प्रकाश ने बेगूसराय, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मैं आईओसीएल बरौनी रिफाइनरी में जून 2010 से पर्मनेंट एमपलोई हूँ। मेरा प्रमोशन 2014 के जुलाई में होना था, पर नही हुआ। मेरा कॉनफिडेंशियल रिपोर्ट (पर्फॉर्मेन्स रिपोर्ट) 2011, 2012, 2013, 2014 का हुआ था यह कैसे पता लगेगा। क्योंकि मैं ने जब अपनी कॉनफिडेंशियल रिपोर्ट (पर्फॉर्मेन्स रिपोर्ट) संबंधित ऑफीसर से जानना चाहा तो ओफिसर ने नहीं बताया। उन का कहना था कि ये नहीं बताया जाएगा। इस का क्या रास्ता है जिस से मुझे अपना कॉनफिडेंशियल रिपोर्ट (पर्फॉर्मेन्स) का पता लगे। जिस से मुझे पता लगे कि मेरा इस वर्ष की पर्फॉर्मेन्स कैसी रही?

समाधान-

प का संस्थान सार्वजनिक क्षेत्र का संस्थान है जिस में सूचना का अधिकार अधिनियम प्रभावी है। आप सूचना के अधिकार के अन्तर्गत आवेदन दे कर जानकारी प्राप्त कर सकते हैं कि आप के विगत वर्षों की परफोरमेंस (कॉन्फिडेंशियल) रिपोर्ट दी गई है या नहीं।

लेकिन आप कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट को देख नहीं सकते न ही पढ़ सकते हैं क्यों कि वह एक गोपनीय प्रलेख है। यदि आप को वह रिपोर्ट दे दी जाए या पढ़ा दी जाए तो वह गोपनीय नहीं रह जाएगी।

स संबंध में यह नियम है कि यदि आप की कॉन्फिडेंशियल रिपोर्ट में कोई नकारात्मक टिप्पणी होगी तो उसे प्रबंधन को आप को सूचित करना पड़ेगा। यदि आप की गोपनीय रिपोर्ट दी गई है और किसी नकारात्मक टिप्पणी की सूचना आप को नहीं दी गई है तो आप को यही समझना चाहिए कि आप के विरुद्ध कोई नकारात्मक टिप्पणी नहीं दी गई है। यदि दी भी गई हो तो उस का कोई उपयोग नहीं किया जा सकता। क्यों कि उस की सूचना आप को नहीं दी गई है। आप की पदोन्नति जुलाई 2014 में नहीं हो सकी है तो उस का कोई अन्य कारण रहा होगा। जब आप सूचना के अधिकार के अन्तर्गत सूचना मांगे तो आप यह सूचना भी मांग सकते हैं कि आप को जुलाई 2014 में पदोन्नत किया जाना था वह किस कारण से नहीं किया गया है।

मूल दस्तावेज मंगाने के लिए न्यायालय को आवेदन किया जा सकता है …

November 27, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

RTIसमस्या-

राहुल ने कानपुर, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

संरक्षण अधिकारी से जनसूचना अधिकार के अन्तर्गत बयानों की प्रमाणित प्रति मांगे जाने पर अधिकारी द्वारा यह लिखित जवाब दिया कि पति पत्नी के बयान हुए नहीं थे सिर्फ उपस्थिति के हस्ताक्षर की प्रमाणित प्रति दी। संयोग से पति पत्नी के बयानों की कॉपी पहले से ही थी, जिसके आधार पर पत्नी के प्रार्थना पत्र में कही गयी बातें और बयानों में अंतर जैसे मायके से निकाले जाने की तारीख में जिस के आधार पर पत्नी का झूठ सिद्ध होता था। अगर केस चलता है तो उस में राहत मिल सकती थी? सर मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प को आप के पास उपलब्ध प्रति की फोटो प्रतियाँ संलग्न करते हुए सूचना के अधिकार के अंतर्गत अपील प्रस्तुत करनी चाहिए। यदि मुकदमा होता है या पुलिस में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो कर कोई अन्वेषण होता है तो आप उन की फोटो प्रतियाँ प्रस्तुत कर के बचाव की कोशिश कर सकते हैं। तथा जमानत के समय भी इन का उपयोग कर सकते हैं।

दि कोई मुकदमा न्यायालय में जाता है तो आप उस न्यायालय में आप के पास की प्रतियाँ प्रस्तुत करते हुए न्यायालय से प्रार्थना कर सकते हैं कि बयानों की असली प्रति पुलिस के पास उपलब्ध होनी चाहिए और पुलिस के सक्षम अधिकारी को तलब कर के उस से उक्त बयानों की असल प्रति न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराई जाए। यदि फिर भी असल न्यायालय के समक्ष नहीं आती है तो आप साक्ष्य अधिनियम के अन्तर्गत आवेदन दे कर अपने पास उपलब्ध प्रतियों को द्वितियक साक्ष्य के रूप में साक्ष्य में ग्रहण करने का आवेदन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं और न्यायालय इसे अनुमत कर सकता है।

RTIसमस्या-

सुरेश ने धार मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ने पंचायत से सूचना अधिकार से मांगने पर फाइल मिली, जिस में कुछ लोगो के अकाउंट हैं। मैं उन अकाउंट की जानकारी बैंक से लेना चाहता हूँ। बैंक किसी व्यक्तिगत अकाउंट की जानकारी देना नहीं चाहती इसलिये में क्या करूँ?

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप को इन बैंक खातों की जानकारी क्यों चाहिए? बैंक में किसी भी व्यक्ति के खाते से संबंधित सूचनाएँ उस व्यक्ति और बैंक के बीच की गोपनीय सूचनाएँ होती हैं। बैंक के व्यवसाय के लिए आवश्यक है कि वह उन सूचनाओं को किसी भी अन्य व्यक्ति को न दे। ये सूचनाएँ कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में ही किसी तीसरे व्यक्ति को दी जा सकती हैं। सूचना अधिकार अधिनियम में भी धारा 8 (1) में इस तरह के उपबंध हैं कि तीसरे पक्ष से संबंधित सूचनाएँ देने से इन्कार किया जा सकता है।

सूचना अधिकार अधिनियम की धारा 8 (1) निम्न प्रकार है।

धारा 8 (1) सूचना का अधिकार अधिनियम

स प्रकार आप देखते हैं कि सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8 (1) के खण्ड (घ) (ङ) व (ञ) में ऐसे उपबन्ध हैं कि बैंक किसी तीसरे व्यक्ति से संबंधित सूचनाएँ तब तक नहीं दे सकता जब तक कि उस में विस्तृत लोक हित का समर्थन नहीं होता हो।

दि उक्त सूचनाएँ जो आप जानना चाहते हैं उन के लिए आप यह सिद्ध कर पाएँ कि इस से विस्तृत लोक हित का समर्थन होगा तो ही बैंक उन सूचनाओं को आप को प्रदान कर सकता है अन्यथा नहीं।

private schoolसमस्या-
आशीष दुबे ने खेड़ली, जिला नरसिंहपुर, मध्य प्रदेश से पूछा है-

किसी निजी विद्यालय द्वारा उसी माह की शुल्क पर देरी शुल्क वसूलना तथा विद्यालय के द्वारा आरटीआई में यह बात नहीं बताया जाना कि वे किस नियम के अंतर्गत वसूल रहे हैं कानूनी है या गैर कानूनी? मुझे इस का उपाय बताएँ।

समाधान-

प ये जानना चाहते हैं कि उसी माह में स्कूल द्वारा देरी शुल्क वसूलने का नियम क्या है और इस तरह वसूली जायज है या नहीं? स्कूल ये आरटीआई के अन्तर्गत नहीं बता रहा है।

स्कूल आप की आरटीआई का उत्तर देने को बाध्य नहीं है। लेकिन प्रत्येक स्कूल जो कि मान्यता प्राप्त है उस पर जिला शिक्षा अधिकारी की निगरानी होती है। शुल्क  वसूलने के नियम उसे जिला शिक्षा अधिकारी को बताने होंगे।

दि आप जिला शिक्षा अधिकारी से पूछेंगे कि अमुक स्कूल में इस तरह देरी से शुल्क वसूल की जा रही है वह किस नियम के अंतर्गत है? तथा शुल्क वसूलना गलत है या सही? तो जिला शिक्षा अधिकारी को आप को स्कूल से जानकारी कर के आप को बतानी होगी। इस तरह जिला शिक्षा अधिकारी की निगाह में भी शुल्क वसूली की बात आ जाएगी और वह स्कूल के विरुद्ध कार्यवाही कर सकेगा।

cheque dishonour1समस्या-

कय्यूम खान, राजनन्दगाँव, छत्तीसगढ़ ने पूछा है-

मेरा एक चैक गुम हो गया था। जिस की सूचना मैं ने बैंक को दे दी थी। किन्तु वह चैक किसकी के हाथ लग गया। अब उस व्यक्ति ने चैक को भुगतान हेतु बैंक में प्रस्तुत कर दिया और वह अनादरित हो गया। अब वह व्यक्ति मुझे फोन कर के परेशान कर रहा है और केस करने की धमकी दे रहा है।  मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प का चैक खो गया था तब आप के लिए बैंक को सूचना देना मात्र पर्याप्त नहीं था। आप को बैंक में उस चैक को कैंसल करवा देना चाहिए था। तब उस का भुगतान इसी कारण से रोक दिया जाता। अब यदि आप ने बैंक को लिखित सूचना दी थी तो उस की एक प्रमाणित प्रति बैंक से प्राप्त करें। बैंक देने से आनाकानी करे तो सूचना के अधिकार के अन्तर्गत उस प्रति को बैंक से प्राप्त करें।

चैक जिस व्यक्ति ने प्रस्तुत किया है जब तक वह आप को चैक की राशि का भुगतान करने का लिखित सूचना न दे तब तक कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यदि वह चैक की राशि का भुगतान करने का लिखित नोटिस आप को देता है तो आप तुरन्त उस का उत्तर रजिस्टर्ड एडी डाक द्वारा दें कि आप का वह चैक खो गया था जिस की सूचना आप ने बैंक को पहले ही दे दी थी। तथा उस व्यक्ति ने वह चैक गलत लगाया है।

दि फिर भी वह व्यक्ति आप के विरुद्ध मुकदमा चलाता है तो बैंक से प्राप्त आप के पत्र की प्रति तथा नोटिस का जवाब दोनों के आधार पर आप अपना बचाव कर सकते हैं।

समस्या-

झुंझुनूं, राजस्थान से गोपाल सिंह चौहान ने पूछा है –

RTIमैने सूचना के अधिकार के अन्‍तर्गत दिनांक 3.3.2013 को ग्राम सेवा सहकारी समिति से सूचना हेतु व्‍यक्तिश: समिति के मुख्‍य कार्यकारी अधिकारी जो कि लोक/ सहायक सूचना अधिकारी भी है को देने पर लेने से ही इन्‍कार करने पर जरिये रजिस्‍टर्ड पत्र समिति के मुख्‍य कार्यकारी को भिजवा दिया। परन्‍तु कोई जवाब नहीं मिला।  प्रथम अपील समिति के ही अध्‍यक्ष जो प्रथम अपील लोक सूचना अधिकारी भी है को देने पर उसने भी मेरा प्रार्थना पत्र लेने से इन्‍कार कर दिया। इसके इन्‍कार करने पर श्रीमान जिला कलक्‍टर को अपनी शिकायत दर्ज करवाई। श्रीमान जिला कलेक्‍टर महोदय द्वारा मेरा प्रार्थना पत्र जिले के प्रशासन अधिकारी उप रजिस्‍ट्रार सहकारी समितियॉं झुंझुनूं को भिजवा दिया श्रीमान उप रजिस्‍ट्रार महोदय द्वारा समिति के मुख्‍यकार्यकारी अधिकारी को सूचना देने हेतु निर्देशित किया परन्‍तु अब भी सूचना उपलब्‍ध नहीं करवाई जा रही है। ऐसी परिस्थिति में मेरे द्वारा चाही गई सूचना कैसे प्राप्‍त की जा सकती है कृपया मार्गदर्शन प्रदान करे।

समाधान-

प को सूचना अधिकारी ने नियत समय में कोई उत्तर नहीं दिया। तथा प्रथम अपील लोक सूचना अधिकारी ने प्रार्थना पत्र लेने से इन्कार कर दिया है। आप को चाहिए था कि आप इस की शिकायत राज्य सूचना आयोग को करते।

जिला कलेक्टर को आप ने शिकायत की है उस का कोई लाभ आप को होने वाला नहीं है। आप के पास अभी भी समय है आप तुरन्त सूचना हेतु आवेदन रजिस्ट्री की रसीद, पोस्टल आर्डर जो आप ने शुल्क के लिए नत्थी किया था, अपील का आवेदन जो नहीं लिया गया और जिला कलेक्टर को की गई शिकायत और उस के आदेश की प्रतियाँ संलग्न करते हुए सीधे राज्य सूचना आयोग को अपनी शिकायत प्रस्तुत करें।

समस्या-

बलरामपुर, छत्तीसगढ़ से उत्तम साहू ने पूछा है-

मैं शिक्षाकर्मी के पद पर कार्यरत हूँ। पति-पत्नी स्थानांतरण के तहत मेरा स्थानांतरण जिला कोरिया से जिला बलरामपुर के शासकीय प्राथमिक शाला केरा में हुआ है। स्थानांतरण पश्चात मैंने विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी व मुख्य कार्यपालन अधिकारी कार्यालय में वेतन प्राप्त करने हेतु पासबुक की छायाप्रति जमा किये 6 माह से ज्यादा समय हो चुके है हर महीने कार्यालय के बाबुओं द्वारा शासकीय प्रक्रिया का हवाला देकर मेरा वेतन अब तक नही बनाया है। इसके लिए मुख्यकार्यपालन अधिकारी को प्रार्थना पत्र भी दिया था।  कृपया उचित मार्गदर्शन बताएं।या किस तरह की लड़ाई लड़नी होगी बिना वेतन के मेरी स्थिति बहुत ख़राब है कृपया उचित मार्गदर्शन बताएं?

समाधान-

सूचना का अधिकारशासकीय प्रक्रिया का केवल बहाना किया जाता है।  किसी स्थानान्तरित व्यक्ति का वेतन प्रदान करने के लिए आवश्यक दस्तावेज पूर्व पदस्थापना कार्यालय से पद छोड़ने के साथ ही प्रदान कर दिए जाते हैं। आम तौर पर अवकाशों का विवरण तथा अंतिम वेतन प्रमाण पत्र पूर्व कार्यालय से नए कार्यालय को पहुँचना आवश्यक है। यदि वेतन बकाया होने पर नहीं दिया जाता है तो कार्यालय को कारण बताना चाहिए।

मेरी राय में आप को विकास खण्ड शिक्षा अधिकारी व मुख्य कार्यपालन अधिकारी से व्यक्तिगत रूप से मिल कर उन्हें अपनी शिकायत बताएँ। इस के अलावा आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत एक आवेदन प्रस्तुत कर यह पूछें कि कर्तव्य पर उपस्थित होने व सभी दस्तावेज उपलब्ध करवा देने के बाद भी आप का वेतन समय पर क्यों अदा नहीं किया गया है और अब क्या कारण है कि आप का वेतन अदा नहीं किया जा रहा है। सूचना प्राप्त हो जाने पर यदि कोई आवश्यक दस्तावेज के अभाव में ऐसा हो रहा है तो उसे उपलब्ध करवाएँ।  सूचना के अधिकार के अंतर्गत आवेदन देने के पश्चात संभवतः आप के वेतन का भुगतान शीघ्र आरंभ हो जाएगा। यदि फिर भी न हो तो धारा-80 सीपीसी के अंतर्गत एक नोटिस वेतन अदा करने के लिए जिम्मेदार अधिकारी को दिलवाएँ। सूचना के अधिकार के अंतर्गत आवेदन का प्रारूप इसी वेबसाइट पर तलाशने से मिंल जाएगा।

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