Special Articles Archive

समस्या-

सुनीता ने निजामुद्दीन, दिल्ली से हरियाणा राज्य की समस्या भेजी है कि-


पावर ऑफ़ अटोर्नी क्या होता है? क्या यह रजिस्ट्री जैसा ही होता है? मैंने जिससे जमीन खऱीदी है, वो यही बोल रहा है। मैं ने प्लाट बल्लबगढ़ हरयाणा में लिया है और वो जेवर, यूपी में बोल रहा है पावर ऑफ़ अटोर्नी करने के लिए। क्या यह सही है? क्या इससे हम बाद में बिना बिल्डर के ही  रजिस्ट्री करा सकते हैं?


समाधान-

आप को और लगभग सभी लोगों को यह समझना चाहिए कि रजिस्ट्री, विक्रय पत्र यानी सेल डीड और पावर ऑव अटॉर्नी अर्थात मुख्तारनामा क्या होते हैं। हम यहाँ बताने का प्रयत्न कर रहे हैं-

रजिस्ट्री या रजिस्ट्रेशन या पंजीकरण-

जब आप कोई पत्र किसी को भेजना चाहते हैं तो साधारण डाक से लिफाफे पर टिकट लगा कर डाक के डब्बे में डाल देते हैं। यह साधारण पत्र होता है। लेकिन जब आप उस पर अधिक (25 रुपए) का डाक टिकट लगा कर तथा एक अभिस्वीकृति पत्र जिस पर आपका व पाने वाले का पता लिख कर डाक घर में देते हैं तो डाक घर आप को रसीद देता है। आप उस के लिए कहते हैं की हमने रजिस्ट्री से चिट्ठी भेजी है। इस चिट्ठी को भेजने के सबूत के तौर पर आपके पास डाकघर की रसीद होती है। डाकघर यह जिम्मेदारी लेता है कि जो अभिस्वीकृति पत्र आप ने लिफाफे के साथ लगाया है उस पर पाने वाले के हस्ताक्षर करवा कर आप के पास लौटाएगा। यदि 30 दिनों में अभिस्वीकृति पत्र आप को वापस नहीं मिलता है तो आप डाकघर को पत्र दे कर पूछ सकते हैं कि उस ने उस पत्र का क्या किया। इस पर डाकघर आप को एक प्रमाण पत्र देता है कि आप का पत्र फलाँ दिन अमुक व्यक्ति को अमुक पते पर डिलीवर कर दिया गया है। अब आप रजिस्टर्ड पत्र या रजिस्ट्री शब्द का अर्थ समझ गए होंगे कि आप का पत्र आप के द्वारा डाक में देने से ले कर पाने वाले तक पहुँचने  तक हर स्थान पर रिकार्ड़ में दर्ज किया जाता है।

इसी तरह जब  कोई भी दस्तावेज जैसे विक्रय पत्र, दान पत्र, मुख्तार नामा, गोदनामा, एग्रीमेंट, राजीनामा, बंटवारानामा आदि लिखा जाता है तो उस में किसी संपत्ति के हस्तांतरण या हस्तान्तरण किए जाने का उल्लेख होता है। अधिकारों का आदान प्रदान होता है। तब उस दस्तावेज को हम डीड या विलेख पत्र, या प्रलेख कहते हैं। हमारे यहाँ पंजीकरण अधिनियम (रजिस्ट्रेशन एक्ट) नाम का एक केन्द्रीय कानून है जिस के अंतर्गत यह तय किया हुआ है कि कौन कौन से दस्तावेज हैं जिन का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा, कौन से दस्तावेज हैं जिन का ऐच्छिक रूप से आप पंजीयन करा सकते हैं। इस के लिए हर तहसील स्तर पर और नगरों में एक या एक से अधिक उप पंजीयकों के दफ्तर खोले हुए हैं जिन में इन दस्तावेजों का पंजीयन होता है। यदि पंजीयन अधिनियम में किसी दस्तावेज की रजिस्ट्री कराना अनिवार्य घोषित किया गया है तो उस दस्तावेज की रजिस्ट्री अनिवार्य है अन्यथा उस दस्तावेज को बाद में सबूत के तौर पर मान्यता नहीं दी जा सकती है। उदाहरण के तौर पर किसी भी 100 रुपए से अधिक मूल्य की स्थाई संपत्ति (प्लाट या मकान, दुकान) के किसी भी प्रकार से हस्तांतरण विक्रय, दान आदि का पंजीकृत होना अनिवार्य है अन्यथा वह संपत्ति का हस्तांतरण नहीं माना जाएगा।  अब आप समझ गए होंगे कि रजिस्ट्री का क्या मतलब होता है। रजिस्ट्री से कोई भी दस्तावेज केवल उप पंजीयक कार्यालय में दर्ज होता है उस का निष्पादन किया जाना प्रथम दृष्टया सही मान लिया जाता है।

विक्रय पत्र सेल डीड –

कोई भी स्थाई अस्थाई संपत्ति जो प्लाट, दुकान, मकान,वाहन, जानवर आदि कुछ भी हो सकता है उसे कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित कर सकता है। यह हस्तांतरण दान हो सकता है अदला बदली हो सकती है, या धन के बदले हो सकता है। जब यह धन के बदले होता है तो इसे विक्रय कहते हैं। इस विक्रय का दस्तावेज लिखना होता है। इसी दस्तावेज को विक्रय पत्र कहते हैं। यदि यह संपत्ति स्थाई हो और उस का मूल्य 100 रुपए हो तो उस का विक्रय पत्र उप पंजीयक के यहाँ पंजीकरण कराना जरूरी है। यदि पंजीकरण नहीं है तो ऐसा विक्रय वैध हस्तान्तरण नहीं माना जाएगा। यह विक्रय पत्र वस्तु को विक्रय करने वाला वस्तु का वर्तमान स्वामी निष्पादित करता है और उस पर गवाहों के ह्स्ताक्षर होते हैं। यदि वस्तु का वर्तमान स्वामी किसी कारण से उप पंजीयक के कार्यालय तक पहुँचने में असमर्थ हो तो उस स्वामी का मुख्तार (अटोर्नी) यह विक्रय पत्र स्वामी की ओर से निष्पादित कर सकता है। इस के लिए उस के पास वैध अधिकार होना चाहिए।

मुख्तारनामा या पावर ऑफ अटॉर्नी-

जब कोई संपत्ति का स्वामी स्वयं पंजीयन के लिए उप पंजीयक के कार्यालय में उपस्थित होने में असमर्थ हो तो वह एक मुख्तार नामा या पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित कर किसी अन्य व्यक्ति को मुख्तार या अटॉर्नी नियुक्त कर देता है जो कि उस की ओर से उप पंजीयक कार्यालय में उपस्थित हो कर दस्तावेज अर्थात विक्रय पत्र आदि का विक्रय पत्र हस्ताक्षर कर सकता है और उस का पंजीयन करा सकता है विक्रय का मूल्य प्राप्त कर सकता है। इस के लिए यह आवश्यक है कि मुख्तार नामा के द्वारा मुख्तार को ये सब अधिकार देना लिखा हो। मुख्तार नामा किसी भी काम के लिए दिया जा सकता है। लेकिन वह उन्हीं कामों के लिए दिया हुआ माना जाएगा जो मुख्तार नामा में अंकित किए गए हैं इस कारण मुख्तार द्वारा कोई दस्तावेज निष्पादित कराए जाने पर मुख्तारनामे को ठीक से पढ़ना जरूरी है जिस से यह पता लगे कि वह किन किन कामों के लिए दिया जा रहा है। मुख्तार नामा का पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है वह किसी नोटेरी से तस्दीक कराया गया हो सकता है लेकिन यदि वह किसी स्थाई संपत्ति मकान, दुकान, प्लाट आदि के विक्रय के हो तो उस का पंजीकृत होना जरूरी है। कई बार जब किसी संपत्ति के हस्तांतरण पर किसी तरह की रोक होती है या कोई और अड़चन होती तब भी वस्तु को विक्रय करने के लिए एग्रीमेंट कर लिया  जाता है और क्रेता के किसी विश्वसनीय व्यक्ति के नाम मुख्तार नामा बना कर दे दिया जाता है ताकि मुख्तार जब वह अड़चन हट जाए तो क्रेता के नाम विक्रय पत्र पंजीकृत करवा ले। लेकिन इस तरह से क्रेता के साथ एक धोखा हो सकता है। मुख्तार नामा कभी भी निरस्त किया जा सकता है। यदि संपत्ति का मालिक ऐसी अड़चन समाप्त होने पर या उस के पहले ही मुख्तार नामा को निरस्त करवा दे तो फिर मुख्तार को विक्रय पत्र निष्पादित करने का अधिकार नहीं रह जाता है। इस तरह मुख्तार नामा के माध्यम से किसी संपत्ति का क्रय करना कभी भी आशंका या खतरा रहित नहीं होता है।

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पाठकों ने तीसरा खंबा के सलाह मंच का स्वागत किया है।

March 10, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

मित्रों!

Teesrakhambaतीसरा खंबा पर पोस्ट न देख कर आप को लगता होगा कि यह नहीं चल रहा है। लेकिन ऐसा नहीं है। हम प्रतिदिन अपनी पोस्ट पर एक कानूनी समस्या का समाधान नियमित रूप से प्रस्तुत किया करते थे। उस में बहुत समय लगता था। पहले आए हुई समस्याओं को पढ़ कर उन में से उत्तर देने लायक समस्या छांटना। फिर उस की हिन्दी को दुरुस्त करना और फिर उस का समाधान प्रस्तुत करना। इस में हमें बहुत समय देना पड़ता था फिर भी हम सभी समस्याओं का समाधान प्रस्तुत नहीं कर सकते थे।

ब हम ने इस के लिए अलग से सलाह बना दिया है। यदि आप तीसरा खंबा के सलाह मंच लिंक पर क्लिक करें तो सीधे तीसरा खंबा के सलाह मंच पर पहुँच जाएंगे। वहाँ आप अपना एक बार पंजीकरण कर लें। उस के बाद आप अपनी कोई भी कानूनी समस्या कभी भी प्रस्तुत कर सकेंगे। आप की समस्या तुरन्त सलाह मंच पर दिखाई देने लगेगी। अन्य पाठक भी आप की समस्या पर सुझाव दे सकते हैं। जो भी सुझाव देगा वह वहाँ दिखाई देगा। हमें जब भी समय होगा हम आप की समस्या का समाधान प्रस्तुत कर देंगे।

तीसरा खंबा के पुराने स्वरूप की नित्य पोस्ट न आने से हम समझते थे कि इस के पाठकों की संख्या कुछ कम हो सकती है। लेकिन हर्ष का विषय है कि यह संख्या पहले की अपेक्षा बढ़ गयी है। इस से पता लगता है कि पाठकों ने कानूनी सलाह के इस नए फोरम का स्वागत किया है।

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तीसरा खंबा चालू क्यों नहीं?

February 15, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

Law Firmपाठकों और मित्रों!

बहुत सारे पाठकों और मित्रों के सन्देश मिले हैं कि तीसरा खंबा चालू क्यों नहीं है। अभी तक हम इस प्रश्न का उत्तर देने की स्थिति में नहीं थे।

हमारी वेबसाइट ‘तीसरा खंबा’ को एक नया रूप देने की कोशिश में 8 दिसम्बर 2015 के बाद रोक दिया गया था। उस के बाद उस में फोरम आरंभ किए गये। किसी भी फोरम में विषय के अनुसार कोई भी पाठक खुद को पंजीकृत कर के अपनी समस्या को प्रस्तुत कर सकता था और कोई भी पाठक उस पर अपनी राय प्रकट कर सकता था। यह किसी भी कानूनी समस्या के हल का एक अच्छा उपाय है।

पाठकों की समस्याओँ पर राय प्रकट करने की आदत न होने के कारण फिलहाल मुझे ही लगभग सभी समस्याओं के हल सुझाने पड़ रहे थे। तीसरा खंबा का मुख्य पृष्ठ 8 दिसम्बर 2015 पर ही अटका रहा। इस बीच मैं अपने वकालत के कार्यालय परिवर्तन में उलझा रहा। आखिर मेरा वकालत का कार्यालय हमारी लॉ-फर्म LAW FIRM KOTA Justice & Deeds के कार्यालय के साथ संयुक्त हो गया। इस परिवर्तन से मेरा आवास कार्यालय से दूर पड़ने लगा था। आवास को भी कार्यालय के नजदीक लाने के लिए बदलना पड़ा। अब दोनों नजदीक हैं। लेकिन मेरे लिए बहुत कुछ बदल गया है। पहले कार्यालय और आवास एक ही परिसर में थे। अब अलग अलग हैं। अब कार्यालय में काम का समय निश्चित है। कार्यालय समय में कार्यालय का काम ही हो सकता है। तीसरा खंबा वेबसाइट और सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति केवल अपने आवास से ही संभव हो सकती है।

बदला हुआ नया आवास लॉ-फर्म का कार्यालय नगर के व्यावसायिक केन्द्र गुमानपुरा में स्थित है। बीएसएनएल का जो डिस्ट्रीब्यूशन पाइंट आवास के निकट था उस में कोई लाइन पेयर सही सलामत नहीं मिला। जिस के कारण इंटरनेट कनेक्शन आरंभ नहीं हो सका। बीएसएनएल को लम्बी दूरी से नयी केबल बिछानी पड़ी। इस के उपरान्त पिछले शनिवार शाम टेलीफोन कनेक्शन चालू हो सका। बीएसएनएल का आश्वासन है कि वे इन्टरनेट कनेक्शन आज अवश्य आरंभ कर देंगे। इस काम में बीएसएनएल के कर्मचारियों और अधिकारियों ने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी।

कार्यालय और आवास दोनों नए हैं और अभी तक सुव्यवस्थित नहीं हो सके हैं। इसलिए काम करने में सहज कम्फर्ट भी अभी तक नहीं आ सकी है। हो सकता है मुझे सहज होने में अभी एक-दो सप्ताह ओर लगें। लेकिन आवास पर इंटरनेट उपलब्ध होने के बाद जल्दी ही हमारी कोशिश होगी कि तीसरा खंबा को स्वााभाविक गति में ले आया जाए।

आशा है तीसरा खंबा टीम को उस के के पाठकों और मित्रों का सहयोग पहले की तरह मिलता रहेगा।

आपका –

दिनेशराय द्विवेदी

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दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ!!!

November 11, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

मित्रों और पाठकों और सहयोगियो¡

दीपावली शुभकामनाएँ!दैव की तरह दीपावली का त्यौहार फिर आ गया है। आप सभी दीपावली के इस त्यौहार को मनाने में व्यस्त हैं। आठ वर्ष से कुछ अधिक समय पहले दीपावली के कुछ दिन पूर्व 28 अक्टूबर 2007 को ‘तीसरा खंबा’ एक ब्लाग के रूप में आरंभ हुआ यह नितांत वैयक्तिक प्रयास एक दिन वेबसाइट का रुप ले लेगा और इस के पाठकों के लिए एक जरूरी चीज बन जाएगा, ऐसा मैं ने सोचा भी नहीं था।

रंभ में सोचा यही गया था कि यदा कदा मैं अपने इस ब्लाग पर न्याय व्यवस्था के बारे में अपने विचारों को प्रकट करते हुए कुछ न कुछ विचार विमर्श करता रहूंगा। जब भी कहीं विमर्श आरंभ होता है तो वह हमेशा ही कुछ न कुछ कार्यभार उत्पन्न करता है। यदि विमर्श के दौरान समस्याओं के कुछ हल प्रस्तुत होते हैं तो फिर यह बात निकल कर सामने आती है कि समस्याओं के हल की ओर आगे बढ़ा जाए।  समस्याग्रस्त लोगों के सामने जो हल प्रस्तुत करता है उसी से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह हल की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कोई अभियान का आरंभ करे, उस के रास्ते पर उन का पथप्रदर्शक भी बने।  दुनिया के छोटे बड़े अभियानों से ले कर समाज को आमूल चूल बदल देने वाली क्रांतियों का आरंभ इसी तरह के विमर्शों से हुआ है।

न्याय समाज व्यवस्था का एक आवश्यक अंग है।  समाज की छोटी से छोटी इकाई परिवार से ले कर  बड़ी से बड़ी इकाई राज्य को स्थाई बनाए रखने के लिए न्याय आवश्यक है। यदि चार लोग साथ रहते हों और जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं को जुटाने का काम करते हों तो भी जो कुछ वे जुटा लेते हैं उस का उपयोग वे न्याय के बिना नहीं कर सकते। एक दिन के शाम के भोजन के लिए कुछ रोटियाँ जुटाई गई हैं तो उन का आवश्यकतानुसार न्यायपूर्ण वितरण आवश्यक है। यदि उन में से दो लोग सारी रोटियाँ खा जाएँ तो शेष दो लोगों को भूखा रहना होगा। एक-आध दिन  और यदा-कदा तो यह चल सकता है। लेकिन यदि नियमित रूप से ऐसा ही होने लगे तो दोनों पक्षों में संघर्ष निश्चित है और साथ बना रहना असंभव। जब चार लोगों का एक परिवार बिना न्याय के एकजुट नहीं रह सकता तो एक गाँव, एक शहर, एक अंचल, एक प्रान्त और भारत जैसा एक विशाल देश कैसे एकजुट रह सकता है। इस कारण मैं अक्सर यह कहता हूँ कि मनुष्य केलिया न्याय रोटी से पहले की आवश्यकता है।

ज समाज में न्याय पूरी तरह हमारी संवैधानिक व्यवस्था पर निर्भर है।  भारत के गणतंत्र का रूप लेने और संविधान के अस्तित्व में आने पर उसने एक न्याय व्यवस्था देने का वायदा इस देश की जनता के साथ किया। इस संवैधानिक न्याय व्यवस्था के लागू होने की एक अनिवार्य शर्त यह भी थी कि इस के वैकल्पिक उपायों का पूरी तरह उन्मूलन कर दिया जाए। लेकिन गणतंत्र के 66वें वर्ष में भी संवैधानिक न्याय व्यवस्था पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी है और संविधानेतर संस्थाएं (जातीय पंचायतें और खापें) अब भी मनमाना न्याय कर रही हैं और अपने जीवन को बनाए रखने के लिए समाज के जातिवादी विभाजन पर आधारित प्राचीन  संगठनों से शक्ति प्राप्त करती हैं।  एक जनतांत्रिक समाज के निर्माण के लिए इन पुरानी संस्थाओं और संगठनों का समाप्त किया जाना नितांत आवश्यक था। इन पुरानी संस्थाओं और उन के अवशेषों को पूरी तरह समाप्त करने का यह कार्यभार गणतंत्र की संवैधानिक संस्थाओं पर था।  लेकिन जब जातिवाद ही सर्वोच्च संवैधानिक संस्था संसद के सदस्यों को चुने जाने का आधार बन रहा हो वहाँ यह कैसे संभव हो सकता था? हमारा जनतांत्रिक गणतंत्र एक चक्रव्यूह में फँस गया है जिस में जातिवादी संस्थाएँ संसद को चुने जाने का आधार बन रही हैं।  संसद को इन संस्थाओं की रक्षा करने की आवश्यकता है। जिस के लिए जरूरी है कि संवैधानिक न्याय व्यवस्था अधूरी और देश की आवश्यकता की पूर्ति के लिए नाकाफी बनी रहे जिस से इन जातिवादी संस्थाओं को बने रहने का आधार नष्ट न हो सके। जनतंत्र कभी सफल हो ही नहीं सके।

ही कारण है कि भारत की केन्द्र और राज्य सरकारों ने कभी न्यायपालिका को जरूरी स्तर की सुविधाएँ प्रदान नहीं कीं। जब देश में अंग्रेजों का शासन था तो अदालतें सिर्फ इतनी थीं कि वे देश की जनता पर अपना आधिपत्य बनाए रखें। उन्हें सामाजिक न्याय की कोई आवश्यकता नहीं थी। लेकिन एक जनतांत्रिक गणतंत्र बन जाने के बाद देश की गरीब से गरीब जनता को न्याय प्रदान करना इस गणतंत्र की प्राथमिक आवश्यकता है। यदि यह आवश्यकता पूरी नहीं की जा सकी है तो हमें जानना चाहिए कि हमारा यह गणतंत्र अधूरा है। आप इस से अनुमान कर सकते हैं कि संयुक्त राज्य अमरीका में 10 लाख की आबादी पर 135-140 जज नियुक्त हैं जब की भारत में 10 लाख की इसी आबादी पर केवल 12-13 जज नियुक्त हैं। अमरीका के मुकाबले केवल दस प्रतिशत अदालतें हों तो न्याय व्यवस्था कैसे चल सकती है। यही कारण है कि अदालतों में अम्बार लगा है। एक एक जज दस दस जजों का काम निपटा रहा है। ऐसे में न्याय हो सकना किसी तरह संभव नहीं है। अदालतें सिर्फ कागजी न्याय (पेपर जस्टिस) कर रही हैं। जज न्याय करने के काम ऐसे कर रहे हैं जैसे उन्हें मशीन से लॉन की घास काटना हो। अब भी न्याय केवल कारपोरेट्स, वित्तीय संस्थाओं, धनपतियों और दबंगों को मिल रहा है। इस के बाद जिस विवाद में ये लोग पक्षकार नहीं हैं उन विवादों में इन का किसी पक्षकार के पक्ष में हस्तक्षेप न्याय को अन्याय में परिवर्तित कर देता है। अदालतें कम होने पर मुकदमों का अंबार लगा है। कई कई पीढियाँ गुजर जाने पर भी न्याय नहीं मिलता। अनेक निरपराध लोग जीवन भर जेलों में सड़ते रहते हैं। जरूरी होने पर अनेक वर्षों तक तलाक नहीं मिलता, बच्चों को उपयुक्त अभिरक्षा नहीं मिलती। मकान मालिक को अपना ही मकान उपयोग के लिए नहीं मिलता तो किराएदार बिना वजह मकान से निकाल दिए जाते हैं। न्याय के अभाव में जितना अन्याय इस देश में हो रहा है उस का सानी किसी जनतांत्रिक देश में नहीं मिल सकता। उस पर जब हमारे लोग इसे दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र कहते हैं तो शर्म से सिर झुकाने के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझता।

दि देश की जनता को वास्तविक जनतंत्र चाहिए तो उसे इस चक्रव्यूह को तोड़ना होगा। वास्तविक जनतंत्र इस देश की श्रमजीवी जनता, उजरती मजदूरों-कर्मचारियों, किसानों, विद्यालयों-महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों, बेरोजगार व रोजगार के लिए देस-परदेस में भटकते नौजवानों की महति आवश्यकता है। वे ही और केवल वे ही इस चक्रव्यूह को तोड़ सकते हैं। लेकिन उन्हें इस के लिए व्यापक एकता बनानी होगी।

ह एक मकसद था जिस के लिए तीसरा खंबा ब्लाग के रूप में आरंभ हुआ था।  एक न्यायपूर्ण जीवन की स्थापना सुंदर और उत्तम लक्ष्य तो हो सकता है पर उस की प्राप्ति के लिए जीवन को जीना स्थगित नहीं किया जा सकता। वह तो जैसी स्थिति में उस में भी जीना पड़ता है।  वर्तमान समस्याओं से लगातार निपटते हुए जीना पड़ता है।  यह एक कारण था कि तीसरा खंबा से पाठकों की यह अपेक्षा हुई कि वह वर्तमान समस्याओं के अनन्तिम और अपर्याप्त ही सही पर मौजूदा हल भी प्रस्तुत करे। तीसरा खंबा को यह आरंभ करना पड़ा।  आज स्थिति यह है कि तीसरा खंबा के पास सदैव उस की क्षमता से अधिक समस्याएँ मौजूदा समाधान के लिए उपस्थित रहती हैं।  पिछले एक डेढ़ वर्ष में यह भी हुआ कि तीसरा खंबा जो बात लोगों के सामने रखना चाहता था वे नैपथ्य में चली गईं और समस्याओं के मौजूदा समाधान मंच पर आ कर अपनी भूमिका अदा करते रहे।

श्री बीएस पाबला

   बीएस पाबला

स बीच 1 जनवरी 2012 को तीसरा खंबा को वेब साइट का रूप मिला।  शायद यह कभी संभव नहीं होता यदि तीसरा खंबा के आरंभिक मित्र श्री बी.एस.पाबला  इस के लिए लगातार उकसाते न रहते और इसे तकनीकी सहायता प्रदान न करते। उन के कारण ही तीसरा खंबा को आप एक वेबसाइट के रूप में देख पा रहे हैं।  इस रूप में इस के पाठकों की संख्या के साथ कानूनी समस्याओं में भी वृद्धि हुई।  पहली जनवरी 2012 से 10 नवम्बर 2015 तक 3 वर्ष 10 माह दस दिनों में (11,69,400) ग्यारह लाख उनहत्तर हजार चार सौ से अधिक पाठक तीसरा खंबा पर दस्तक दे चुके हैं। वर्तमान में लगभग 2000 पाठक तीसरा खंबा पर प्रतिदिन दस्तक दे रहे हैं। हमें यह महसूस हुआ कि प्रतिदिन एक समस्या का समाधान प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है। उसे बढ़ा कर दो करना पड़ा। लेकिन उसे हम अधिक दिन नहीं चला पाए। वह तभी संभव हो सकता है जब कि तीसरा खंबा को व्यवसायिक स्तर पर चलाया जाए। पर वह भी फिलहाल संभव नहीं है। कानूनी समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करना मात्र इस वेब साइट का एक-मात्र लक्ष्य न तो कभी था और न हो सकता है। हम चाहते हैं कि सप्ताह में कुछ विशिष्ठ आलेख वर्तमान न्याय व्यवस्था की समस्याओं और एक जनतांत्रिक आवश्यकता के लिए आवश्यक आदर्श न्याय व्यवस्था के लक्ष्य पर प्रकाशित किए जाएँ।  लेकिन यह तभी संभव है जब तीसरा खंबा के कुछ सक्षम मित्रों की सहभागिता इस में रहे।  सभी सक्षम मित्रों से आग्रह है कि इस काम में तीसरा खंबा के साथ खड़े हों और न्याय व्यवस्था के संबंध में अच्छे आलेखों से इस वेब साइट की समृद्धि में अपना योगदान करें।

श्री मनोज जैन, एडवोकेट

       मनोज जैन

बी.एस. पाबला जी जैसे निस्वार्थ व्यक्तित्व के निशुल्क तकनीकी सहयोग के बिना इस साइट को यहाँ तक लाना संभव नहीं था। मुझे हमेशा महसूस होता है कि इस काम में कुछ विधिज्ञो को और जोड़ा जा सके तो हम इसे अधिक विस्तार दे सकते हैं। इस वर्ष मेरे एक युवा ऊर्जावान साथी श्री मनोज जैन इस के साथ जुड़े हैं। हम दोनों अपने प्रोफेशन में भी सहभागी हैं। उन का योगदान तीसरा खंबा को नई ऊंचाइयों तक जाने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।  हम तीसरा खंबा में उन का स्वागत करते हैं।

दीपावली के अवसर पर तीसरा खंबा अपने सभी पाठकों और मित्रों का हार्दिक अभिनंदन करता है।  सभी के लिए हमारी शुभकामना है कि वे आने वाले समय में जीवन को और अधिक उल्लास के साथ जिएँ।  साथ ही यह आशा भी है कि तीसरा खंबा को पाठकों और मित्रों का सहयोग लगातार प्राप्त होता रहेगा।

                                                                                                                                                                                                  … दिनेशराय द्विवेदी

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Market dictatorshipसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी कंपनी पिछले 1 साल से वेतन का भुगतान समय पर नहीं कर रही है। हर महीने 14 से 20 तारीख को कर रही है। एक साल पहले 7 तारीख तक भुगतान कर दिया जाता था। कुल 250 से 300 कर्मचारी है PF, ESI, सही है। पर वेतन समय पर मिले इस के लिए क्या करें?

समाधान-

जिन उद्योगों में 1000 से कम कर्मचारी हैं उन में अगले माह की 7 तारीख तक तथा जहाँ 1000 या अधिक कर्मचारी हैं उन में कर्मचारियों को 10 तारीख तक वेतन का भुगतान कर दिया जाना चाहिए। इस के बाद किया गया भुगतान देरी से किया गया भुगतान है। जिस में प्रत्येक कर्मचारी को हर बार 25 रुपया जुर्माना दिलाया जा सकता है। लेकिन उस के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में मुकदमा करना पड़ेगा। यदि आप अकेले मुकदमा करेंगे तो प्रबंधन आप को किसी भी तरह से नौकरी से निकाल देगा। इस कारण यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती है। इसे लड़ने के लिए सारे उद्योग के श्रमिकों को एक जुट होना पड़ेगा।

कुछ साल पहले तक यह श्रम विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह नियोजक से समय पर वेतन दिलाए। यदि समय पर वेतन का भुगतान नहीं होता था तो श्रम विभाग के निरीक्षक उस नियोजक के विरुद्ध श्रमिकों की ओर से वेतन भुगतान प्राधिकारी के यहाँ मुकदमा करते थे। लेकिन अब सरकारों ने श्रमिकों की ओर से मुकदमा करना बन्द कर दिया है। सरकारों का मानना है कि वेतन समय पर दिलाना सरकारों का नहीं बल्कि कानून और अदालत का काम है। यदि समय पर वेतन चाहिए तो मजदूर खुद मुकदमा करे। मुकदमा करने के लिए काम से गैर हाजिर हो, नुकसान उठाए। इस तरह वह मुकदमा करेगा ही नहीं और उद्योगपति अपनी मनमर्जी चलाते रहेंगे। यही मौजूदा भाजपा और पिछली कांग्रेस सरकार का सत्य है। वे मालिकों के लिए बनी हैं और उन के लिए ही काम करेंगी। श्रम विभाग में अफसर नहीं हैं। तीन चार अदालतों को एक अफसर चलाता है। फैसले बरसों तक नहीं होते। श्रम न्यायालय भी जरूरत के अनुसार नहीं हैं। जिस से 30-35 साल पुराने मुकदमे भी अभी तक लंबित पड़े हैं।

दि कोई उद्योग एक माह देरी से वेतन देता है तो उस की उपेक्षा की जा सकती है लेकिन साल भर से यही हो रहा है तो सरकार को खुद उस पर मुकदमा चलाना चाहिए और मजदूरें को देरी के एक एक दिन का ब्याज 12% की दर से पैनल्टी के साथ दिलाना चाहिए। वैसे भी मजदूर रोज काम करता है और कमाता है। उस कमाई को एक माह से अधिक समय तक अपने पास रख कर उद्योगपति मुनाफा कमाता है। उस का कोई हिसाब नहीं होता। ब्रिटेन में वेतन इसी कारण हर सप्ताह भुगतान किया जाता है जिस से मजदूर की मजदूरी का पैसा मालिक के पास अधिक दिन न रहे और मालिक अनुचित लाभ न उठाए।

ब हर उद्योग के मजदूर को संगठित होना पड़ेगा। केवल एक उद्योग के मजदूर को नहीं अलग अलग उद्योगों के मजदूरों को भी आपस में संगठित होना पड़ेगा। अब उन की लड़ाई केवल सामुहिक सौदेबाजी या अदालत की नहीं रह गयी है। क्यों कि इन दोनों तरह की लड़ाइयों को सरकार मालिकों के पक्ष में तब्दील कर देती है। इस तरह हमारे देश की व्यवस्था भी जनतांत्रिक नहीं रह गयी है। वह कहने को जनतांत्रिक है लेकिन चरित्र में वह पूंजीपतियों-भूस्वामी वर्गों की शेष जनता पर तानाशाही है।

ब मजदूरों की समस्याओं का इस देश में एक ही इलाज रह गया है कि मजदूर एक वर्ग के रूप में राजनैतिक रूप से संगठित हों और वर्तमान सत्ता को पलट कर अपनी वर्गीय सत्ता स्थापित करें। तभी पूंजीपतियों और भूस्वामियों और उन के दोस्त विदेशी पूंजीपतियों की इस तानाशाही को धराशाही किया जा कर जनता का जनतंत्र स्थापित किया जा सकता है।

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नव वर्ष आप के जीवन में अनन्त खुशियाँ लाए …

January 1, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

मित्रों और पाठकों!

वर्ष 2014 के आखिरी दिन तीसरा खंबा के सर्वर में समस्या आ जाने से आप सभी को परेशानी हुई।  समस्या कुछ गंभीर थी और उसे समझने में कुछ समय लगा जिस के कारण साइट को आरंभ होने में कुछ देरी हुई। लेकिन अब यह समस्या दूर हो गई है। हम आशा करते हैं कि निकट भविष्य में इसे इस तरह की कोई समस्या नहीं होगी।

तीसरा खंबा ब्लागस्पॉट के एक ब्लाग के रूप में आरम्भ हुआ था। 1 जनवरी 2012 को इसे इस साइट में बदला गया। यह रूप धारण करने के बाद इस के पाठकों में तेजी से वृद्धि हुई। इन तीन वर्षों में इसे सात लाख से अधिक पाठक मिले हैं। यह हिन्दी की किसी भी अव्यवसायिक साइट के लिए जिसे दो व्यक्ति मिल कर अपने खुद के संसाधनों से चला रहे हों एक कीर्तिमान हो सकता है।

इस साइट के संचालक इस माह अपने निजि पारिवारिक कारणों से व्यस्त रहेंगे। जिस के कारण हो सकता है कि पाठकों की कुछ जटिल समस्याओं को हल मिलने में देरी हो। हालाँ कि हमारा पूरा प्रयत्न होगा कि हमेशा की तरह कम से कम एक पाठक की समस्या का हल प्रतिदिन प्रस्तुत किया जाए। हमारी इस गति के कारण हम अनेक पाठकों की समस्याओं का हल प्रस्तुत करना चाहते हुए भी नहीं कर पाते। इस का कारण संसाधनों की कमी है। हम तीसरा खंबा के लिए संसाधन जुटाना चाहते हैं और उस के लिए प्रयासरत भी हैं। हो सकता है हम अगले दो तीन माह में इस स्थिति में आ सकें कि हम प्रतिदिन एक से अधिक पाठकों को समाधान प्रस्तुत कर सकें।

बहुत से पाठक चाहते हैं कि उन की समस्या का समाधान तुरन्त दिया जाए। अनेक पाठकों की यह इच्छा रहती है कि उन की समस्या का समाधान प्रस्तुत करने के बाद भी वे हम से लगातार मार्गदर्शन प्राप्त करते रहें। लेकिन फिलहाल यह संभव नहीं है। हिन्दी भाषा मे इस काम को करने में बहुत चुनौतियाँ हैं। सब से पहले तो हमें समस्या देवनागरी हिन्दी में प्राप्त नहीं होतीं। वे अंग्रेजी या रोमन लिपि में होती हैं। हमें उन्हें देवनागरी हिन्दी रूप देना पड़ता है।  भारत में सारा केन्द्रीय कानून अंग्रेजी में तो इंटरनेट पर उपलब्ध हो जाता है लेकिन नियम व उपनियम आदि उपलब्ध नहीं होते। राज्यों की विधियाँ तो बिलकुल उपलब्ध नहीं हो पातीं। इस कारण राज्य की विधियों से संबंधित विधिक समस्याओं के हल में परेशानी होती है। इन समस्याओं के हल के लिए यह आवश्यक है कि तीसरा खंबा का अपना एक ऐसा विस्तृत ग्रंन्थागार हो जिस में भारत और उस के सभी राज्यों की विधियाँ, नियम और उपनियम उपलब्ध हो सकें। लेकिन यह एक बड़ा काम है जो समय, श्रम और धन तीनों चाहता है। इस आवश्यकता को पूरा करना फिलहाल असंभव है। हमारे साधन सीमित हैं। केवल दो व्यक्ति अपने निवेश, श्रम और बचे हुए समय से इस साइट को चला रहे हैं।

फिर भी हम सोच रहे हैं कि हिन्दी पाठकों के लिए इस एक अकेली अनूठी साइट को किस तरह से बेहतर बनाया जा सकता है। हम पाठकों और मित्रों से भी चाहते हैं कि वे भी अपने सुझाव हमें दें। जिस से इस साइट की उपयोगिता में वृद्धि हो। ऐसा कोई भी सुझाव इसी पोस्ट की टिप्पणियों में अंकित किया जा सकता है।

यह नया वर्ष 2015 ईस्वी सभी पाठकों और मित्रों के जीवन में अनन्त खुशियाँ लाए, इसी शुभकामना के साथ…

आप का …

दिनेशराय द्विवेदी

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बाल श्रम और उस का प्रतिषेध !

November 14, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

भारत में बच्चों के अधिकारों के बारे में चर्चा बहुत होती है लेकिन उन के बारे में सही जानकारी का भी अत्यन्त अभाव है। भारत में बाल-श्रम के प्रतिषेध के लिए  बाल श्रम ( प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 प्रभावी है। बाल दिवस के अवसर पर हम यहाँ इस अधिनियम के सामान्य प्रावधान यहाँ पाठकों की जानकारी के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं-

बाल श्रम ( प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 
इस अधिनियम का उद्देश्य समूचे बाल श्रम का उन्मूलन करना नहीं है, यह केवल कुछ प्रक्रियाओं एवं व्यवसायों में बाल श्रम के नियोजन को निषिद्ध करता है, जहां नियोजन निषिद्ध नही है, वहां बाल श्रमिकों की सेवा दशाओं को विनियमित करता है, 14 वर्ष की उम्र तक के बालकों को शिक्षा ग्रहण करने की सुविधा सुनिश्चित करने के लिए प्रावधान करता है और उनकी कोमल अवस्था के विपरीत उनसे कठिन कार्य लेने पर रोक लगाता है तथा विभिन्न श्रम कानूनों में बालक (चाइल्ड) की परिभाषा को एक रूप देता है। इन्हीं उद्देश्यों से इस अधिनियम को विनिर्मित किया जाना इस अधिनियम में कहा गया है।

बाल श्रमिक की परिभाषा    
ऐसे श्रमिक जिन्होंने अपनी आयु के 14 वर्ष पूर्ण न किये हों इस अधिनियम की धारा -2 (II) के अन्तर्गत इस अधिनियम द्वारा “बालक” के रूप में परिभाषित किए गए हैं।

बाल श्रम पूर्ण रूप से निषेध 
अधिनियम की धारा-3 के अधीन भाग (अ) मे उल्लिखित व्यवसायों तथा भाग (ब) में उल्लिखित प्रक्रियाओं को खतरनाक घोषित करते हुये बाल श्रम नियोजित किया जाना पूर्ण रूप से निषिद्ध किया गया है। कारखाना अधिनियम, 1948 की धारा-67, माइन्स एक्ट, 1952 की धारा-40, मर्चेन्ट शिपिंग एक्ट, 1958 की धारा-109 तथा मोटर ट्रान्सपोर्ट वर्क्स एक्ट, 1961 की धारा-21 की व्यवस्था के अनुसार इन उद्योगों  में चाहे वे खतरनाक अथवा गैर खतरनाक प्रकृति के हों इस अधिनियम द्वारा बाल श्रम पूर्ण रूप से निषिद्ध किया गया है।

बाल श्रम नियोजन का नियमन    
धारा-6 से 11- धारा-3 में उल्लिखित अनुसूची से भिन्न गैर खतरनाक अधिष्ठानों में बालकों को नियोजित किया जा सकता है।

बाल श्रमिक नियोजन की शर्तें    
बाल श्रमिकों को जहाँ नियोजित किया जा सकता है वहाँ उन्हें केवल निम्न की शर्तों के साथ ही नियोजित किया जा सकता है-

  • बाल श्रमिक से किसी भी दिन लगातार 3 घन्टे से अधिक कार्य नहीं लिया जा सकता है। तीन घंटे काम लेने के उपरांत या उस से पहले बालक को न्यूनतम एक घंटे का विश्राम काल देना आवश्यक  है।
  • बाल श्रमिक के कार्य के घन्टे विश्राम काल ( न्यूनतम एक घन्टा ) को सम्मिलित करते हुए छह घन्टे से अधिक नहीं हो सकते। अर्थात उन से दिन में पाँच घंटे से अधिक काम नहीं लिया जा सकता। इस में वह समय भी सम्मिलित है जिस समय उसे काम देने के लिए प्रतीक्षा कराई जाती है।
  • बाल श्रमिक को सप्ताह में एक दिन अवकाश दिया जाना अनिवार्य किया गया है।
  • सांय 07 बजे से प्रातः 08 बजे के मध्य बाल श्रमिक से कार्य नहीं लिया जा सकता है।
  • बाल श्रमिक से ओवरटाईम कार्य नहीं लिया जा सकता है।
  • गैर खतरनाक नियोजन में काम करने वाले बाल श्रमिक के नियोजक द्वारा उसे अपने खर्चे पर 2 घन्टे प्रतिदिन शिक्षा का लाभ दिलाया जाना आवश्यक कर दिया गया है।

अभिलेख    
प्रत्येक नियोजक को बाल श्रमिक का उपस्थित रजिस्टर पृथक से रखना अनिवार्य है, जिसमें वह उसका नाम, जन्मतिथि, कार्य का प्रकार, कार्य के घण्टे, अवकाश का समय आदि रखेगा।

बाल श्रम नियोजित करने हेतु नोटिस
नियोजक यदि बाल श्रमिक नियोजित करता है तो बाल श्रमिक के पू
र्ण विवरण की सूचना क्षेत्र के निरीक्षक को पूर्ण विवरण सहित 30 दिन के अन्दर प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया गया है।

दण्ड 
इस अधिनियम की धारा-14 एवं 15 में निषिद्ध नियोजन सम्बन्धी प्रावधान का उल्लंघन करने वाले नियोजक को प्रथम अपराध पर न्यूनतम तीन माह की कैद जो एक वर्ष तक भी हो सकती है या दस हजार रूपये अर्थदण्ड जो बीस हजार रूपये तक भी हो सकता है अथवा दोनो दण्डों से दण्डित किया जा सकता है। अधिनियम के अन्य किसी प्रावधान का उल्लंघन करने वाले को एक माह तक की सजा या दस हजार रूपये तक अर्थदण्ड अथवा दोनों दण्ड दिये जा सकते हैं। फैक्ट्रीज एक्ट, 1948 की धारा-67, माइन्स एक्ट, 1952 की धारा-40, मर्चेन्ट शिपिंग एक्ट, 1958 की धारा-109 तथा मोटर ट्रान्सपोर्ट वर्क्स एक्ट, 1961 की धारा-21 के अधीन जहां भी बाल श्रम नियोजन निषिद्ध है के प्रावधानों का उल्लंघन भी इस अधिनियम की धारा-14 के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध है।

आयु का प्रमाण    
बाल श्रमिक की आयु के सम्बन्ध में विवाद उत्पन्न होने पर राजकीय चिकित्सक द्वारा आयु के सम्बन्ध में प्रदत्त प्रमाण पत्र को ही मान्य कर दिया गया है।

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्देश

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा एम0 सी0 मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य ( 465/86) में दिये गये ऎतिहासिक निर्देश निम्नांकित बिन्दुओं में समाहित हैं –

  • प्रतिकर की वसूली-

खतरनाक उद्योगों में बाल श्रमिक नियोजित करने वाले सेवायोजकों से रूपया 20 हजार तक प्रतिकर भी वसूला जाये।

  • शिक्षा व्यवस्था।

खतरनाक उद्योगों से बाल श्रम को हटाकर उसे शिक्षा का लाभ दिलाया जाये ।
गैर खतरनाक नियोजन में काम करने वाले बाल श्रमिक के सेवायोजक द्वारा उसे अपने खर्चे पर 2 घन्टे प्रतिदिन शिक्षा का लाभ दिलाया जायेगा।

  • पुनर्वास

बाल श्रमिक के परिवार के एक वयस्क सदस्य को रोजगार दिलाया जाये।

  • कल्याण निधि का गठन।

नियोजकों से वसूल की गयी उक्त धनराशि से प्रत्येक जिले में एक श्रम कल्याण निधि का गठन किया जाये, जिसका उपयोग बाल श्रमिकों के कल्याण हेतु किया जाये।

परोक्त प्रावधानों के बाद भी अनेक निषिद्ध उद्योगों और प्रक्रियाओं में बाल श्रम  का उपयोग किया जा रहा है। लोग देख कर भी उस की अनदेखी करते हैं।  इस का एक मुख्य कारण यह भी है कि हमारे यहाँ अभी लोगों को शिकायत करने की आदत नहीं है।  शिकायत कर देने पर भी उचित कार्यवाही करने वाले निरीक्षकों की बहुत कमी है, जो हैं उन्हें भी ऐसे नियोजको द्वारा प्रायोजित कर लिया जाता है।  जब तक स्वयं जनता में बाल श्रम विरोधी जागरूकता उत्पन्न नहीं होती है, बाल-श्रम का पूरी तरह से उन्मूलन संभव नहीं है।

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स्त्री पुरुष संबंधों पर सार्वजनिक चर्चा अपराध हो सकती है ..

May 2, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

तीसरा खंबा पिछले दिनों तकनीकी समस्या के कारण अनुपस्थित रहा। इस समस्या का एक कारण इस साइट पर टैग्स और कैटेगरीज का अधिक संख्या में होना चित्रों की अधिकता आदि भी है। हो सकता है हम पाठकों की समस्याओं का समाधान कुछ दिन और प्रस्तुत नहीं कर सकें। असुविधा के लिए हमें खेद है। कभी कभी अनेक समस्याएँ समाज में बहुतायत में होती हैं और उन का कानून से सीधा संबंध होता है। फिलहाल हम ऐसी कुछ समस्याओं पर कुछ सामग्री आप के सामने रखना चाहेंगे।

किसी स्त्री-पुरुष के बीच के अन्तरंग संबंधों की घटनाओं या गतिविधियों पर भारतीय समाज में अक्सर चटखारे ले कर चर्चाएँ की जाती हैं।  लेकिन लोग बिलकुल यह नहीं जानते कि ऐसी चर्चा करना या उस में सम्मिलित होना अपने आप में अपराध हो सकता है। कुछ दिनों से कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह टीवी एंकर अमृताराय के साथ अपने संबंधों को लेकर मेन स्ट्रीम मीडिया और सोशल मीडिया में आलोचना का शिकार हैं। इन दोनों को तथा अमृताराय के पति को इरादतन आलोचना का शिकार बनाया जा रहा है। जब कि यह एक सामान्य मामला है जिस की सामाजिक रूप से चर्चा करने के बजाए उपेक्षा की जानी चाहिए।

 सलन किसी परिवार की विवाहित लड़की का उस के पति के साथ संबंध खराब हो जाता है, वे एक दूसरे से अलग रहने लगते हैं। मामला यहाँ तक आगे बढ़ जाता है कि दोनों सहमति से विवाह विच्छेद का आवेदन पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करते हैं। तब यह निश्चित हो गया होता है कि यह वैवाहिक संबंध समाप्त हो गया है और वैसी स्थिति में दोनों ही व्यक्तियों को जो उस विवाह में हैं, इस बात का पूरा अधिकार है कि वे अपने लिए नए जीवन साथी की तलाश करें। इस तलाश में एक दूसरे से मिलना, जुलना, एक दूसरे को समझना आदि सभी कुछ सम्मिलित है। इस मिलने जुलने की जानकारी यदि सार्वजनिक होती है तो उसे वे खुद भी नहीं छुपाना चाहेंगे। क्यों कि इस में न तो कुछ अनैतिक है और न ही कुछ अवैध।

 स मामले में लोग यहाँ तक कयास लगा कर हमले कर रहे हैं कि दिग्विजय सिंह तथा अमृता के बीच भौतिक संबंध स्थापित हुए हैं जो एक विवाह के होते हुए नहीं होने चाहिए। एक तो इस तरह के भौतिक संबंधों का कुछ खुलासा नहीं हुआ है। यदि हों भी तो इस तरह के संबंधों पर जब तक अमृता के पति और दिग्विजय सिंह की पत्नी की ओर से कोई शिकायत नहीं आती तो उन पर किसी भी तीसरे व्यक्ति को शिकायत करने का कोई अधिकार और अवसर नहीं है। यदि कोई ऐसा करता है तो ऐसा करना उक्त तीनों व्यक्तियों में से किसी के लिए भी अपमानजनक हो सकती है जो कि स्वयं में एक अपराध है। इस तरह इस संबंध पर चर्चा करना स्वयं अपराध हो सकता है। भारतीय दंड संहिता की धारा निम्न प्रकार है-

 497. जारकर्म–जो कोई ऐसे व्यक्ति के साथ, जो कि किसी अन्य पुरुष की पत्नी है और जिसका किसी अन्य पुरुष की पत्नी होना वह जानता है या विश्वास करने का कारण रखता है, उस पुरुष की सम्मति या मौनानुकूलता के बिना ऐसा मैथुन करेगा जो बलात्संग के अपराध की कोटि में नहीं आता, वह जारकर्म के अपराध का दोषी होगा, और दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा । ऐसे मामले में पत्नी दुष्प्रेरक के रूप में दण्डनीय नहीं होगी ।

 इस से यह स्पष्ट है कि इस संबंध में यदि स्त्री के पति की मौनानुकूलता या सम्मति न हो तभी यह एक अपराध हो सकता है। इस मामले में अमृता राय के पति ने किसी तरह की कोई शिकायत नहीं की है। वैसी स्थिति में इस मामले को चर्चा का विषय बनाना अपराधिक गतिविधि हो सकती है। बहुत से लोग केवल अपने सामंती और स्त्री समानता विरोधी विचारों की भड़ास निकालने के लिए अभद्र टिप्पणियाँ मीडिया और सोशल मीडिया में कर रहै हैं, वह अपराध है और ऐसा करने वाले कभी भी इस अपराध के लिए अभियोजित किए जा सकते हैं। यह स्त्री विरोधी विमर्श तुरन्त रोका जाना चाहिए।

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डर का कोई इलाज नहीं, बिहार इसी कारण पिछड़ा है।

March 27, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
unity400समस्या-
अमरेन्द्र कुमार ने पटना बिहार से पूछा है-

मैं ने पटना के बिल्डर से फ्लेट खरीदा है। अपार्टमेंट बहुत बड़ा है। 192 फ्लेट हैं। बिल्डर अधूरा काम कर के भाग गया। हमने पूरा पैसा दिया लेकिन हमें बेसिक एमिनिटीज भी नहीं मिली हैं। जेसे जनरेटर सैट वगैरह। हम सोसायटी के रहने वाले लोग बहुत बार बिल्डर से मिले, लेकिन वह नहीं सुनता है, बहुत ही दबंग है। कोर्ट जाने से लोग डरते हैं कि जो भी आगे आएगा बिल्डर मार भी सकता है। हम क्या करें?

समाधान-

र का कोई इलाज नहीं है। आप ने वह फिल्मी सम्वाद तो सुना होगा कि ‘जो डर गया सो मर गया’। वह सम्वाद बिलकुल सही है। एक अकेला व्यक्ति डर से सदैव ही जीते जी मरता रहता है।

प कोर्ट में नहीं जाना चाहते तो हम क्या सलाह दे सकते हैं। हम तो यहाँ तीसरा खंबा पर आप को केवल कानूनी उपाय बता सकते हैं, आप वह उपाय करने से डरते हैं तो डरते रहिए और मरते रहिए।

बिल्डिंग में 192 फ्लेट हैं, यदि एक फ्लेट से संबंधित परिवार में 4 सदस्य भी हों तो कुल 768 लोग हैं। अब 768 लोग एक दबंग से डरते हैं तो सिर्फ इसलिए कि वे सब अकेले हैं। आप की कहानी बताती है कि बिहार कितना पिछड़ा हुआ है? केवल इसलिए कि वहाँ के लोग संगठित हो कर अपने हितों के लिए लड़ना नहीं जानते।

प लोगों ने सोसायटी बनाई है, संगठन की अपनी ताकत होती है, कम से कम राजनैतिक ताकत होती है। ऐसा नहीं है कि पटना में ऐसी राजनैतिक ताकतें नहीं हैं, जो लोगों को संगठित करने और उन की लड़ाइयाँ लड़ने का काम नहीं करती हों। आप उन में से किसी को तलाशिए, उन का साथ हासिल कीजिए। इस बार लोकसभा चुनाव में ताकत दिखाइए। सब मिल कर कलेक्टर, राज्य के मुख्य निर्वाचन आयुक्त, मुख्य सचिव और मुख्य मंत्री को कहिए कि आप को दबंग से जब तक छुटकारा न मिलेगा, समस्याएँ दूर न होंगी, किसी चुनाव में वोट न डालेंगे। खबर अखबार में छपवाइए। डर से मुकाबला किए बिना और लड़ाई लड़े बिना तो आप को कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। कानून भी उसी का साथ दे सकता है जो डर का मुकाबला करता है।

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पाठकों से निवेदन –

December 30, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

प्रिय पाठकों,

स वेब साइट को अपडेट करने का दायित्व मैं अकेला वहन करता हूँ।  पिछली 26 दिसम्बर से मैं बाहर हूँ। जहाँ न तो साधन उपलब्ध हैं और न ही समय मिल पा रहा है। इस बीच राजस्थान पत्रिका के शनिवारीय परिशिष्ट मी-नेक्स्ट में तीसरा खंबा का रिव्यू प्रकाशित हुआ है। जिस से अनेक नए पाठक इस से जुड़े हैं। जिस ने तीसरा खंबा को अधिक उत्तरदायित्व सौंप दिये हैं।

लेकिन जब तक मैं स्वयं अपने स्थान पर पुनः नहीं पहुँच जाता हूँ तब तक इसे नियमित रूप  से अपडेट करना संभव नहीं हो पाएगा। जो असुविधा इस से पाठकों को हो रही है उस के लिए मुझे खेद है। अनेक पाठकों से उन की समस्याएँ प्राप्त हुई हैं। लेकिन उन में अधिकांश ऐसी हैं जिन के समान समस्याओं का समाधान पहले से तीसरा खंबा पर दिया जा चुका है। यदि पाठक चाहें तो तीसरा खंबा के किसी पेज पर दायीं तरफ ऊपरी कोने में बने नीले रंग के बाक्स में जा कर अपनी  समस्या की समान समस्या सर्च कर के अपने लिए समाधान तलाश  सकते हैं।

ब 6 जनवरी तक ही तीसरा खंबा को नियमित रूप से  अपडेट कर सकना संभव हो सकेगा। इस बीच संभव हुआ तो कुछ समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया जाएगा।

सभी पाठकों को नववर्ष की शुभकामनाएँ!!!

 

आप का शुभाकांक्षी-

                               दिनेशराय द्विवेदी

                               संचालक, तीसरा खंबा

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