Succession Archive

विधवा और उस की पुत्री को विभाजन कराने का अधिकार है।

August 15, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

सौरव ताया ने रसीना, कैथल, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

20 दिन पहले मेरे भाई की मौत हो गई है और अब से 2 साल पहले मेरे पापा की मौत हो गई थी। मेरे भाई की शादी को 2 साल 6 माह हो गए है। क्या उसकी पत्नी और डेढ़ साल की बेटी का उनकी सम्पत्ति पर अधिकार है? जबकि उनके पास मेरे भाई के नाम सहित कोई भी दस्तावेज नहीं है और मेरे पिता के बाद उनकी सम्पति का बंटवारा नहीं हुआ। उन की संपत्ति अपने आप मेरी मां और हम 3 भाईयों के हिस्से में आ गई थी। भाभी हमारे घर रहना नहीं चाहती और ना ही अपनी बेटी को छोड़ रही है।

समाधान-

प के पिता के देहान्त के उपरान्त पिता की संपत्ति के चार हिस्सेदार हुए आप तीन भाई और माँ। इस संपत्ति में एक हिस्सा आप के मृत भाई का था। जेसै आप के पिता की संपत्ति आप चारों के नाम अपने आप आ गयी थी, उसी तरह आप के भाई के हिस्से की संपत्ति उस की पत्नी और बेटी के नाम आ चुकी हैं।

आप की भाभी आप के साथ नहीं रहना चाहती तो यह उन की मर्जी है उन्हें साथ रहने को बाध्य नहीं किया जा सकता। डेढ़ वर्ष की उन की बेटी उन की जिम्मेदारी है, वह उन के साथ ही रहेगी जब तक वह वयस्क हो कर उस का विवाह नहीं हो जाता।

आप की जिस संपत्ति में ¼ हिस्सा आप की भाभी व भतीजी का है वे उस हिस्से को प्राप्त करने की अधिकारी हैं। आप स्वैच्छा से दें तो ठीक अन्यथा आप की भाभी विभाजन का वाद संस्थित कर के भी अपना हिस्सा अलग प्राप्त कर सकती हैं।

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पिता की संपत्ति पर उस के जीते जी संतान का कोई अधिकार नहीं।

August 11, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

सहज प्रीत सिंह ने लुधियाना, की समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम सहज प्रीत सिंह है।  2006 में मेरा डाइवोर्स हो गया था। मेरा एक बेटा है जो अपनी माँ के पास है। मेरे पिता जी स. जसवीर सिंह सारी प्रॉपर्टी मेरे नाम करवाना चाहते हैं लेकिन उन्हे डर है कि कहीं मेरा बेटा जो मेरी पत्नी क पास है. प्रॉपर्टी पर अधिकार मांगने ना आ जाए. मेरे पिता जी ने डाइवोर्स सेटल्मेंट के समय लिखवाया था कि मेरे पोते का किसी चीज़ पर कोई हक नहीं और उस टाइम मेरी पत्नी ने 2 लाख रुपए मांगे थे जो दे दिए थे. लेकिन क्या मेरा बेटा मुझ से या मेरे पिता जी पर प्रॉपर्टी हक के लिए कोई क़ानूनी कार्रवाई कर सकता है? जो भी प्रॉपर्टी है मेरे पिता जी ने खुद बनवाई है. जो मेरे डाइवोर्स के बाद खरीदी थी. अभी 2/3 साल में. यह प्रॉपर्टी मेरे माता जी के नाम पर है लेकिन ये मेरे खुद के पैसे से खरीदी है लेकिन रजिस्टर्ड मेरे माता जी क नाम पर है.

समाधान-

सल में जिस संपत्ति के बारे में आप चिन्तित हैं वह आपकी माताजी के नाम है और वही उस की स्वामिनी हैं। मेरा एक सवाल ये है कि क्या आप कानूनी रूप से इस समय अपने पिताजी या माताजी की संपत्ति में हिस्सा मांग सकते हैं? नहीं न, तो फिर आप का बेटा आप के जीतेजी आप की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं मांग सकता। उस का कोई भी हक पैदा होगा तो तब होगा जब आप नहीं रहेंगे और आप की संपत्ति के उत्तराधिकार का प्रश्न उठेगा। आप के जीवन काल में आप के पुत्र का आप की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है।

माताजी के नाम जो संपत्ति है उसे वे आप के नाम वसीयत कर सकती हैं। इस से उन के जीवनकाल के बाद आप उस के स्वामी हो जाएंगे। आप अपनी संपत्ति जिसे देना चाहेँ उसे वसीयत कर सकते हैं। आप दूसरा विवाह करें तो अपनी पत्नी और होने वाली संतानों के नाम या उन में से किसी एक के नाम वसीयत कर सकते हैं। इस से आप के शेष उत्तराधिकारी उन के उत्तराधिकार के हक से वंचित हो जाएंगे। आप के जीवन काल में आप की तलाकशुदा पत्नी से उत्पन्न पुत्र का कोई हक आप की संपत्ति पर नहीं है लेकिन यदि आप अपनी संपत्ति की कोई वसीयत नहीं करते तो जो भी निर्वसीयती संपत्ति आप के जीवनकाल के उपरान्त शेष रहेगी उस में आप की पहली पत्नी से उत्पन्न पुत्र का भी अधिकार रहेगा।

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नामान्तरण निरस्ती को दीवानी न्यायालय में चुनौती दें।

August 1, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

डॉ. मोहन कुमार वर्मा ने उज्जैन, मध्यप्रेदश से  समस्या भेजी है कि-

मैंने नगरपालिका सीएमओ को नामांतरण हेतु आवेदन किया, जिसमें मैंने पिता की पंजीकृत वसियत एवं अनुप्रमाणित गवाह की फोटोकॉपी प्रस्तुत की। इस पर मेरे भाई बहनों ने आपत्ति दर्ज कराई।  उन्होंने बटवारा विलेख नोटरी का प्रस्तुत किया जिस पर सलाहकार ने टीप दिया कि आवेदक ने पंजिकृत वसीयत दिया जिस पर न्यायालय का स्टे नहीं है अतः नामांतरण में आपत्ति नहीं है। न.पा.शुजालपुर पी.आइ.सी. की बैठक में नामांतरण स्वीकार हो मेरा नामांतरण होगया। तत्पश्चात मैंने वर्ष 2011-12 से 2016-17 तक संपत्ति कर प्रति वर्ष जमा किया। वर्ष 17-18 का सं.कर जमा करने गया तो मालुम हुआ कि मेरा नामांतरण निरस्त कर मेरे पिताजी का नाम अंकित कर दिया गया। शायद आपत्तिकर्ताओं ने अधिकारियों से साठगांठ करके मेरे नामांतरण अवैध रूप से निरस्त करा दिया अब मुझे क्या कार्यवाही करना चाहिए?

समाधान-

क बार आप के पक्ष में हो चुका नामान्तरण बिना आप को सुनवाई का अवसर दिए निरस्त नहीं हो सकता था। नगरपालिका ने गलती की है। आप नगर पालिका को इस मामले में नगरपालिका अधिनियम के अंतर्गत नोटिस दें कि उन्हों ने नामान्तरण को निरस्त कर के गलती की है। यदि वे नामान्तरण निरस्तीकरण का आदेश वापस न ले कर नामान्तरण आप के नाम नहीं करते हैं तो आप दीवानी अदालत में नगर पालिका के विरुद्ध दीवानी वाद संस्थित करेंगे।

नोटिस देने के उपरान्त दो माह की अवधि व्यतीत हो जाने पर आप नगर पालिका के विरुद्ध उक्त नामान्तरण निरस्तीकरण को हटाने का व्यादेश पारित करने तथा इस आशय की घोषण करने का वाद संस्थित करें कि पंजीकृत वसीयत से पिता की मृत्यु के बाद आप स्वामी हो गए हैं। इस मामले में वाद संस्थित करने के लिए किसी अच्छे वकील की सेवाएँ प्राप्त करें।

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समस्या-

वत्सला कुमारी ने पटना, बिहार से  समस्या भेजी है कि-

म लोग तीन बहन और एक भाई है। तीनों बहन औार भाई की शादी हो चुकी है। भाई का एक बेटा है। एक बहन की एक बेटी है। एक बहन की कोई संतान नहीं है। हमारे दो संतान है, एक बेटा और बेटी है। हमारे दादा जी के दो मकान हैं। एक मकान जिला-पटना, राज्य-बिहार में है जो पटना पीपुल्स कॉपरेटिव से सन् 1968 में खरीदी गई थी, और दूसरा मकान जिला-मुंगेर, राज्य-बिहार में है जो सन् 1969 में मेरे दादा जी ने अपने भाई से खरीदा था जो खास महल की जमीन पर बनाया हुआ है। मेरे दादा जी को एक ही संतान मेरे पिताजी थे। मेरे दादा जी का देहांत सन 1983 में, पिताजी का देहांत सन 1999 में तथा मेरे माता जी की देहांत सन 2017 में हुई। मेरे भाई ने पिताजी की देहांत के बाद पटना के मकान जो पिपुल्स कॉपरेटीव में हैं बिना किसी सूचना के अपना नाम सन् 2000 में अपना नाम से करबा लिया। उक्त मकान का विभाजन किस प्रकार किया जा सकता है। मेरा भाई दोनों मकान पर अपना दावा करता है। क्या उक्त मकान पर हमारा अधिकार है?

समाधान-

दोनों मकान आप के दादा जी ने 1956 के बाद खरीदे थे। आप के दादाजी और पिता जी की संपत्ति का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 के अनुसार तय होगा। आप के दादाजी के देहान्त के बाद यदि दादी जीवित रही होंगी तो इन दोनों मकानों के दो हिस्सेदार आप के पिता और आप की दादी हुईं। दादी के देहान्त के बाद केवल आप के पिता उस के स्वामी हुए। अब पिता के तीन बेटियाँ और एक पुत्र है। माताजी का देहान्त भी हो चुका है। ऐसी स्थिति में तीनों पुत्रियाँ और एक पुत्र कुल संपत्ति के ¼ एक चौथाई हिस्से के स्वामी हैं। बंटवारा होने पर चारों को बराबर के हिस्से प्राप्त होंगे।

आप ने लिखा है कि भाई ने मकान अपने नाम करा लिया है। तो अधिक से अधिक यह हुआ होगा कि भाई ने नगर पालिका या नगर निगम में नामान्तरण करवा लिया होगा। लेकिन नामान्तरण से किसी अचल संपत्ति का स्वामित्व निर्धारित नहीं होता है। आप के पिता के देहान्त के साथ ही संपत्ति चारों संतानों की संयुक्त हो चुकी थी। चारों का यह स्वामित्व केवल किसी स्थानान्तरण विलेख ( विक्रय पत्र, दानपत्र, हकत्याग पत्र) आदि के पंजीयन से ही समाप्त हो सकता है अन्यथा नहीं। इस तरह सभी संतानें एक चौथाई हिस्से की अधिकारी हैं।

हमारी राय है कि आप को आप के पिता की समस्त चल अचल संपत्ति के विभाजन के लिए वाद संस्थित कर देना चाहिए। यह वाद पटना या मुंगेर दोनों स्थानों में से किसी एक में किया जा सकता है। आप पटना रहती है  तो वहाँ यह  वाद संस्थित करना ठीक रहेगा। इस काम में जितनी देरी करेंगी उतनी ही देरी से परिणाम प्राप्त होगा। इस कारण बिना देरी के यह काम करें।

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समस्या-

राजीव गुप्ता ने सकरा, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा के नाम से कुछ ज़मीन और मकान की ज़मीन है, मगर सारी पुश्तैनी है। मेरे पापा 4 भाई हैं दादा गुज़र चुके हैं मेरे पापा ओर चाचा को ज़मीन घर बनाने के लिए मौखिक रूप से बाँट दिया गया। हम सबका 20 साल से मकान पर समान रूप से क़ाबिज हैं। दिल्ली में भी ह्मारा 1 मकान है जो मेरी माँ के नाम है मेरे छोटे चाचा ने उसपर दावा किया था। लेकिन हम केस जीत गये अब चाचा और दादी मिलकर उस मकान का बदला लेने के लिए गाँव की ज़मीन चाचा के नाम करना चाहती है। क्या मेरी दादी का भी मेरे दादा की पुश्तैनी ज़मीन में अधिकार है? वो ऐसा बदला लेने के लिए कर रही है। एक बात और ह्मारा मकान पर 20 सालों से क़ब्ज़ा तो है मगर ज़्यादा प्रूफ सर्टिफिकेट नहीं हैं। चुनाव का पहचान पत्र, ओर स्कूल सर्टिफिकेट हैं। हम दादी का पूरा खर्च उठाने को भी तैयार हैं, मगर वो अब तैयार नहीं है। इससे पहले 20 साल तक हमने ही उनकी सेवा की है। क्या हमें अब मकान बनाने के बाद इस में से दादी को हिस्सा देना होगा?

समाधान-

दि आप के गाँव की संपत्ति पुश्तैनी है तो उस में दादी का हिस्सा तो अवश्य है। लेकिन पुश्तैनी संपत्ति में जिसे वास्तव में सहदायिक संपत्ति कहा जाता है। पुरुष संतानों का जन्म से ही अधिकार होता है, 2005 से पुत्रियों का भी जन्म से अधिकार हो गया है। यदि संयुक्त /सहदायिक संपत्ति में हिस्सेदार की मृत्यु होती है तो उस का उत्तराधिकार वसीयत से अथवा हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार होगा न कि उत्तरजीविता के पुराने नियमों से। इस कारण दादी का उस में हिस्सा है।

आप के पिता का कुछ तो हिस्सा तब भी था जब दादाजी जीवित थे। फिर दादा जी की मृत्यु के समय कुछ हिस्सा उन से उत्तराधिकार में मिला है। इस तरह आप के अधिकार में काफी हिस्सा आ सकता है। दादी का हिस्सा भी बहुत थोड़ा होगा। आप बंटवारे में कह सकते हैं कि आप के पिता को यह जमीन दादा ने मकान बनाने के लिए दी थी।  मकान आप के पिताजी ने अपनी आय से बनाया है। आप यह साबित कर देते हैं कि मकान आप के पिता ने अपनी निजी आय से बनाया है तो बंटवारे में उस का भी ध्यान रखा जा सकता है।

बेहतर तो यह है कि आप इस तरह अंदाज लगाना बंद करें। यदि दादी चाचा के नाम वसीयत करती हैं या दादी बंटवारे का वाद करती हैं तो आप के पिताजी अपने अधिकार के लिए लड़ सकते हैं। बंटवारा भी होता है तो हमारी राय में आप के पिता दादी के आंशिक हिस्से की राशि का भुगतान कर के अपना बनाया हुआ मकान पर अपना पूर्ण स्वामित्व प्राप्त कर सकते हैं।

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समस्या-

जमीला खातून ने सीतापुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति ने एक जमीन 1998 में खरीदी थी। मेरे पति की मृत्यु हो गयी। उन से मेरी चार लड़कियाँ हैं। मेरा और मेरी लड़कियों का जमीन में कितना कितना हिस्सा होगा। मेरे देवर जो मेरे पति के सगे भाई हैं उन का क्या हक है, जब कि वह जमीन उन की पुश्तैनी नहीं है यह जमीन मेरे पति ने अकेले ही खरीदी थी। कृपया मुस्लिम ला के मुताबिक पूरी जानकारी दें।

समाधान-

मुस्लिम व्यक्तिगत विधि में पुश्तैनी जमीन जैसा कोई सिद्धान्त नहीं है और कोई संपत्ति पुश्तैनी नहीं होती। जो भी संपत्ति होती है वह व्यक्तिगत होती है हाँ यदि किसी मृतक व्यक्ति की संपत्ति का बंटवारा न हो और किसी उत्तराधिकारी की पहले ही मृत्यु हो जाए तो वैसी संपत्ति में मृतक का हित बना रहता है और वह उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाता है। इस तरह आप के पति की जमीन चाहे उन्हों ने खुद खरीदी हो या पूर्वजों से प्राप्त हुई है वह व्यक्तिगत ही है।

मुस्लिम विधि के अनुसार आप के पति की संपत्ति में से 1/8 आप को, 2/3 सभी लड़कियों को मिला कर और 1/6 हिस्सा आप के पति के भाई अर्थात आप के देवर को मिलेगा। शेष बचा हुआ हिस्सा भी लड़कियों को मिलेगा। आप अपने पति की संपत्ति के 24 हिस्से बनाएँ, उस में से 3 हिस्से आप के, 4 हिस्से आप के देवर के तथा 17 हिस्से लड़कियों को संयुक्त रूप से प्राप्त होंगे।। प्रत्येक लड़की को कुल संपत्ति का 4.25 हिस्सा मिलेगा।

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समस्या-

श्वेता ने जबलपुर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है

मेरी बड़ी दीदी की शादी जबलपुर में हुई है उनको 25 साल हो गये। शादी के बाद से जीजाजी मज़दूरी करते हैं इसलिए ज़्यादा इनकम नहीं होती जिससे कि वो अपना स्वयं का घर बना सकें। लेकिन उनके फादर का बहुत बड़ा मकान है, उनकी 3 बेटियाँ हैं जिस में से एक बेटी ने शादी नहीं की हैं और वह जबलपुर हाईकोर्ट में एडवोकेट भी है। 4 बेटे हैं जिस में से किराए के मकान में रहते हैं। उनकी बेटी जो एडवोकेट है और 45 वर्ष  की है ने उनको घर से निकालने के लिए उच्च न्यायालय में  मुक़दमा कर दिया है की मेरी दीदी उनको गाली देती है, लड़ाई करती है इसलिए हम इनको अपनी प्रॉपर्टी से बेदखल करते हैं। इनसे हमारा कोई लेना देना नहीं है। मेरी दीदी हमेशा से ही अत्याचार सहते आई है, उसे कई बार मारा पीटा भी, लेकिन उसने कभी कोई एक्शन नहीं लिया। हमेशा इज़्ज़त को लेकर चलती थी जिसकी वजह से उन्हें आज ये सब देखना पड़ रहा है? क्या बेटे का अपने पिता की संपत्ति पर कोई हक नहीं होता? यदि पिता चाहे तो ही उसे हक मिलेगा और न चाहे तो नहीं? क्या फादर की इच्छा से ही प्रॉपर्टी का बटवारा हो सकता है।

समाधान-

प की बहिन की समस्या का हल आप को संपत्ति के बंटवारे में  नजर आता है। लेकिन यह संपत्ति तो आप के जीजाजी को तभी मिल सकती है जब कि वह संपत्ति सहदायिक हो और उस में आप के जीजाजी का हक हो। तीसरा खंबा पर आप सर्च करेंगी तो आप को यह मिल जाएगा कि संपत्ति सहदायिक कब हो सकती है। यदि यह संपत्ति 60-70 वर्ष पुरानी है और 17 जून 1956 के पूर्व आप के जीजाजी के पिता या उन के पिता या दादा जी को उन के पिता से उत्तराधिकार में  मिली हो तो ही वह सहदायिक हो सकती है।

यदि आप के जीजाजी के परिवार की यह संपत्ति सहदायिक है तो उस में जन्म से आप के जीजाजी का अधिकार हो सकता है और आप के जीजाजी उस का बंटवारा करने तथा अपने हिस्से की संपत्ति पर कब्जा प्राप्त करने का दावा कर सकते हैं। इस के लिए आप के जीजाजी को दीवानी कानून के जानकार किसी अच्छे वकील से मिल कर अपनी समस्या बतानी चाहिए।

लेकिन यदि उक्त संपत्ति आप के जीजाजी के पिता की स्वअर्जित संप्तति हुई तो उस में आप के जीजाजी का कोई हक नहीं है और उन्हें उस संपत्ति से पिता के जीवनकाल में कुछ नहीं मिलेगा। यदि पिता उन की संपत्ति की कोई वसीयत कर गए और उस में आप के जीजाजी को कुछ नहीं दिया तो उन्हें कुछ नही मिलेगा। यदि पिता की मृत्यु के उपरान्त कोई संपत्ति निर्वसीयती शेष रही तो उस में से आप के जीजाजी को कोई हिस्सा मिल सकता है।

 

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समस्या-

मोहित ने सहारनपुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी उम्र २७ वर्ष है।. मेरा एक बड़ा भाई है जो मुझसे १ या दो साल बड़ा होगा, उसकी शादी हो चुकी है। वो पिताजी के साथ रहता है ओर मैं माता जी के साथ। मेरी माता जी मेरे जन्म के वर्ष से ही ससुराल पक्ष द्वारा मारपीट किए जाने के कारण अपने मायके आ गई थी। सुलह की तमाम कोशिशों के बाद पिता जी पर मारपीट ओर भरण-पोषण का मुक़दमा दर्ज किया गया। आज २७ साल बाद भी वो मुक़दमा चल रहा है। वो थोड़ा बहुत खर्च देते है कोर्ट के द्वारा। पर इसी बीच उन्होने (वर्ष २००० के लगभग) दूसरी शादी कर ली और दूसरी पत्नी से उनको एक पुत्र, एक पुत्री है। दूसरी पत्नी, दोनो बच्चे और मेरा बड़ा भाई पिताजी के साथ ही हरियाणा के गाँव में रहते हैं जहा पिता जी का बाकी परिवार भी रहता है। ज़मीन जयदाद के नाम पर कुछ नहीं हैं केवल मकान हैं (मेरे संज्ञान मे) जिसपर मैं दावा कर सकूँ। मैंने अपना घर सहारनपुर में बना लिया है जो की मेरी मम्मी के नाम है। मैं उनपर कार्यवाही चाहता हूँ कि उन्होंने अपनी पत्नी और पुत्र के लिए कुछ नहीं किया और बिना तलाक़ लिए दूसरी शादी कर ली है। इसके लिए मुझे क्या करना होगा और क्या सबूत पेश करने होंगे।

समाधान-

प ने जिस तरह तथ्य सामने रखे हैं उस से पता लगता है कि आप अपने पिता पर कोई मुकदमा करते हैं तो भी आप को कुछ हासिल नहीं होगा। लगता है आप के मन में पिता से बदला लेने की भावना है, यह होना स्वाभाविक भी है। आखिर आप का भी हक था पिता पर। पर किसी भी तरह से बदले की भावना तो उचित नहीं है।

पहला अपराध आप के पिता ने आप की माताजी के प्रति किया था। माताजी उन के विरुद्ध दूसरी शादी के लिए पुलिस में जा सकती थीं और उन्हें सजा हो सकती थी। पर या तो माताजी ने ऐसा करना ठीक नहीं समझा या फिर पुलिस ही यह साबित करने में असमर्थ रही कि आप के पिताजी की दूसरी शादी शादी न हो कर केवल लव इन रिलेशन है। और कोई अपराधिक कार्यवाही नहीं की जा सकती।

संपत्ति के नाम पर आप के पिता के पास मकान हैं। हो सकता है वे संयुक्त संपत्ति हों। यह भी हो सकता है कि आप की माताजी के भय से उन संपत्तियों में से पिता ने अपना अधिकार अलग कर लिया हो जिस से आप की माताजी या आप हक न जता सकें।

आप ने अपनी और अपनी माँ के लिए एक अलग दुनिया बना ली है। वह बेहतर है। पिता से बदले के चक्कर में न पड़ें। इस से आप अपने लिए बेवजह परेशानियाँ मोल लेंगे, मिलेगा कुछ नहीं। एक सलाह बिना मांगे दे रहे हैं कि आप ने अपना पैसा लगा कर सहारनपुर में जो मकान बनाया है वह माताजी के नाम से है। उसे अपने नाम हस्तांतरित करवा लें या फिर उस की पंजीकृत वसीयत अपने नाम करवा लें। आप की माताजी अभी भी आप के पिता की पत्नी हैं जिस के कारण पिता उन के उत्तराधिकारी हो सकते हैं। आप का बड़ा भाई तो उत्तराधिकारी है ही। ऐसी कोई व्यवस्था न होने पर माताजी के देहान्त के बाद आप का बड़ा भाई और पिता दोनों इस मकान में आप से हिस्सा मांग सकते हैं। इसे गंभीरता से लें।

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समस्या-

धर्मेन्द्र सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा जी का मकान है जिनकी मृत्यु हो गयी है। अब इस मकान पर उनका छोटा पुत्र कब्जा करना चाहता है। मेरी दादीजी जिंदा है वो यह मकान नहीं देना चाहती हैं। ये मकान दादीजी के नाम करवाना है और उनके छोटे पुत्र को बाहर निकलना है। इसके लिए मैं क्या करुँ?

समाधान-

प के दादा जी का देहान्त होने के पहले उन्हों ने कोई वसीयत नहीं की है। आप के दादा जी के देहान्त के साथ ही उन का उत्तराधिकार खुल गया है औोर उन की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो चुकी है। आप के दादा जी के उत्तराधिकारी, उन के पुत्र, पुत्रियाँ, मृत पुत्र/ पुत्रियों की पत्नी/ पति और उन की संतानें, उन की पत्नी (आप की दादीजी) हैं। ये सभी उस मकान के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। आप के दादाजी के छोटे पुत्र को भी उस मकान के स्वामित्व में हिस्सेदारी प्राप्त हुई है। इस हिस्सेदारी से उसे अलग नहीं किया जा सकता।

आप की दादी या अन्य कोई भी उत्तराधिकारी यह कर सकता है कि मकान के बंटवारे का दावा करे और सब को अलग अलग हिस्सा देने की राहत प्रदान करने की मांग करे, या फिर यह भी राहत मांगी जा सकती है कि आप के दादाजी के छोटे पुत्र को उस के हिस्से की कीमत अदा कर के उस मकान से बेदखल करने की डिक्री की मांग की जाए। इस बीच अस्थाई निषेधाज्ञा जारी कराई जा सकती है कि दादाजी का छोटा पुत्र न्यूसेंस पैदा न करे। यदि वह फिर भी कुछ गड़बड़ करता है या तंग करता है तो दादी जी की ओर से महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा का प्रतिषेध अधिनियम में कार्यवाही की जा सकती है।

 

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हक तर्क करना या रिलीज डीड निष्पादित करना क्या है?

June 15, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

सुरेन्द्र पाल सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या किसी नाबालिग (18 वर्ष से कम) के नाम जमीन का हक तर्क किया जा सकता हे? हक तर्क करने के नियम क्या है ?  हक तर्क से सम्बंधित नियम और कानून की जानकारी कौन सी किताब या नियमावली या अधिनियम में मिल सकती है? जानकारी प्रदान करवाने की कृपा करावे।

समाधान-

क तर्क करना अथवा रिलीजी डीड निष्पादित करने का अर्थ है किसी संपत्ति में अपने अधिकार को किसी दूसरे के हक में छोड़ देना है। लेकिन  इस के लिए जरूरी है कि जो हक तर्क कर रहा है और जिस के हक में हक तर्क किया जा रहा है दोनों एक ही सम्पत्ति में हिस्सेदार हों और संपत्ति संयुक्त हो। जैसे किसी व्यक्ति के देहान्त के उपरान्त उत्तराधिकार में संपत्ति उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाती है। तब कोई एक या अधिक उत्तराधिकारी किसी दूसरे उत्तराधिकारी के हक में अपना हक छोड़ सकते हैं। दो लोगों ने संयुक्त रूप से संपत्ति खरीदी हो और दोनों संयुक्त स्वामी हों तो उन में से एक दूसरे के हक में हक त्याग कर सकता है।
हक तर्क करने वाले का वयस्क होना जरूरी है।  जिस के हक में हक तर्क किया जा रहा है उस का बालिग होना जरूरी नहीं है वह नाबालिग हो सकता है। हक तर्क करना एक प्रकार से संपत्ति का हस्तान्तरण है और 100 रुपए से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति के हस्तान्तरण का पंजीकरण होना जरूरी है। यदि हक तर्क की जाने वाली सम्पत्ति का मूल्य यदि 100 रुपए से अधिक है और वह अचल संपत्ति है तो हक तर्क करने के दस्तावेज का पंजीकृत होना जरूरी है।
हक तर्क करने / रिलीज डीड निष्पादन के मामले में दो अधिनियम सामने हैं। एक तो संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम और दूसरा पंजीकरण अधिनियम। पंजीकरण के लिए स्टाम्प ड्यूटी और फीस का पता करना भी जरूरी है क्यों कि रिलीज डीड पर पंजीकरण शुल्क अन्य हस्तान्तरणों से कम है।

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