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महत्वपूर्ण सूचना

April 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

प्रिय पाठको!

तीसरा खंबा का सर्वर बदला जा रहा है। इस कारण से कुछ समय तक हम तीसरा खंबा में नयी पोस्ट नहीं डाल पा रहे हैं , क्यों कि वह सुरक्षित नहीं रह पाएगी।

पाठकों को इस से होने वाली असुविधा के लिए हमें खेद है।

हम जल्दी ही आप के बीच वापस लौटेंगे।

भवदीय –

संचालक

तीसरा खंबा

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समस्या-

आर. के.  ने नदबई, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा तलाक के केस को लगभग चार साल हो चुके हैं और अभी तक फैसला नहीं हुआ है। मैं यही जानना चाहता हूं कि क्या मैं आरटीआई के माध्यम से केस से सम्बनधित प्रश्न न्यायालय से पूछ सकता हूँ?

समाधान-

प स्वयं उस प्रकरण में पक्षकार हैं इस कारण आप को तलाक के केस में देरी का कारण पता होना चाहिए। किसी भी मुकदमे में जो समय लगता है उस का विवरण प्रत्येक पेशी पर लिखी जाने वाली आदेशिका में होता है। आप को आदेशिका की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त करने का अधिकार है आप स्वयं अदालत में आवेदन दे कर पता कर सकते हैं कि आप के मामले में क्यों देरी हो रही है। उस का कारण आप स्वयं भी हो सकते हैं और अन्य कोई कारण भी हो सकता है। यदि आप स्वयं कारण हैं तो उन कारणों को दूर करने का प्रयत्न करें।

यदि अन्य कोई कारण है तो न्यायालय से निवेदन करें कि वह उन कारणों का उपाय कर के उन्हें दूर करने की कोशिश करे। फिर भी किसी कारण से देरी हो रही हो तो आप संबंधित उच्च न्यायालय को अपना परिवाद भेज सकते हैं। उच्च न्यायालय उसे हल करने का प्रयत्न करेगा। यदि न्यायालय के पास क्षमता से अधिक मुकदमें हों तो अधिक न्यायालय खोलने का कार्य राज्य सरकार का है। उस के लिए राज्य सरकार से मांग की जा सकती है। राजस्थान सरकार अधिक मुकदमे होने के कारण दो नए पारिवारिक न्यायालय कोटा में खोले हैं। जिस से अब इस तरह के मुकदमों के निस्तारण में इस जिले में तेजी आई है।

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rp_gavel9.jpgसमस्या-

सिद्दीकी ने मेरठ टाउन उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं मेरठ में एक मोबाइल कंपनी का डिस्ट्रीब्यूटर हूँ।  मुझ से आस-पास के क्षेत्र के रिटेलर जुड़े हुए है जो डिस्ट्रीब्यूटर से सिम, रिचार्ज, टॉप-अप, आदि खरीदते हैं और उन्हें कस्टमर को बेचते हैं। ये सिल-सिला पिछले 5 वर्षो से चलता आ रहा है। इसी बीच कुछ रिटेलर बंधुओ ने एक अवैध मोबाइल यूनियन बना ली। उसके बाद सभी रिटेलर उस यूनियन से जुड़ गए। ये यूनियन कहीं भी पंजीकृत नहीं है। इस अवैध यूनियन में कुछ राजनैतिक किस्म के रिटेलर भी मौजूद हैं जो डिस्ट्रीब्यूटर के अंडर में काम करते है (डिस्ट्रीब्यूटर से ही सिम, रिचार्ज, लेते हैं)। ये यूनियन डिस्ट्रीब्यूटर की बिज़नेस की छोटी-छोटी बातों को लेकर आये दिन हड़ताल कर देती है और जबरदस्ती सभी रिटेलर के फेलेक्सी सिम (जिससे रिचार्ज होता है) लेकर उन्हें हड़ताल करने के लिए मजबूर करते हैं और मार्किट में सिम रिचार्ज आदि बेचने नहीं देतें हैं। और ये यूनियन डिस्ट्रीब्यूटर के खिलाफ रिटेलर को भड़काती रहती हैं और अपनी मनमानी पर उतारू रहती है जिससे डिस्ट्रीब्यूटर का बिजनेस का नुक्सान होता है, डिस्ट्रीब्यूटर को मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है। यूनियन के पदाधिकारी कहते है कि तुम कुछ भी कहीं भी शिकायत कर लो कुछ नहीं हो सकता। इस पूरे विवरण में क्या कानूनी कार्यवाही हो सकती है और इसकी शिकायत कहाँ पर करनी है? क्या यूनियन का किसी विभाग में पंजीकर्त होना जरुरी है।  क्या यूनियन का लैटर हैड होना जरुरी है। अगर ये यूनियन किसी भी विभाग में पंजीकृत नहीं है तो इस अवैध यूनियन के खिलाफ क्या कानूनी कार्यवाही हो सकती है और कहाँ पर करनी है? डिस्ट्रीब्यूटर अपने बचाव में क्या कर सकता है और कहाँ वाद दायर कर सकता है?

समाधान-

ह तो व्यापार में होता है। डिस्ट्रीब्यूटर सभी रिटेलर्स को अपनी शर्तों पर माल देता है। जब कि रिटेलर चाहता है कि उसे माल उस की शर्तों पर मिले। डिस्ट्रीब्यूटर तो इलाके में एक ही है इस कारण वह एकाधिकारी व्यवहार करता है। रिटेलर अपनी शर्तों पर माल लेने के लिए सामुहिक रूप से कार्यवाही करने के लिए सौदेबाजी करते हैं।  सामुहिक सौदेबाजी तो उनका अधिकार है। हड़ताल करने के लिए रिटेलर अपनी अनौपचारिक यूनियन बना सकते हैं या उसे ट्रेड यूनियन एक्ट के अन्तर्गत पंजीकृत भी करवा सकते हैं। यदि वे अपनी यूनियन को पंजीकृत करवा लेते हैं तो उन्हें कुछ और अधिकार प्राप्त हो सकते हैं। यदि उन की यूनियन पंजीकृत नहीं है तो वे सारे मिल कर सामुहिक रूप से आप के साथ सौदेबाजी कर सकते हैं। सामुहिक रुप से कोई कार्य करना या न करना किसी तरह से अवैध नहीं है जब तक कि वह कार्य किसी कानून के अंतर्गत अवैध नहीं हो।

बहुत सारे रिटेलर्स कुछ रिटेलरों के फैलेक्सी सिम एक स्थान पर रखवा लेते हैं जिस से वे आगे रिचार्ज नहीं कर सकते। लेकिन यदि कोई रिटेलर अपनी इच्छा से किसी एक के पास अपना फेलेक्सी सिम रख देता है तो यह किसी प्रकार अवैध नहीं है। लेकिन यदि किसी को फैलेक्सी सिम रखने के लिए बाध्य किया जाता है तो यह अवैध है और पीड़ित व्यक्ति अर्थात संबंधित रिटेलर इस की शिकायत पुलिस थाना में करवा सकता है। आप उस रिटेलर की मदद कर सकते हैं।

आप अधिक से अधिक यह कर सकते हैं कि किसी भी तरह की अवैध कार्यवाही को न करने के लिए अपने रिटेलरों के विरुद्ध दीवानी न्यायालय से निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन उस में आप को सभी रिटेलर्स को व्यक्तिगत रूप से पक्षकार बनाना पड़ेगा जो बहुत परेशानी तलब होगा। इस सम्बन्ध में आप किसी अच्छे स्थानीय दीवानी मामलों के वकील से मिल कर सलाह करें तो बेहतर होगा।

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private schoolसमस्या-

रूपबास, भरतपुर, राजस्थान के एक किशोर भुवनेश्वर शर्मा ने तीसरा खंबा को समस्याएँ भेजी हैं-

1- हम एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं सभी बच्चे कक्षा टेंथ में पढ़ते है। हमारे यहां पर सामाजिक का कोई टीचर नहीं है क्या यह बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है या नहीं? कक्षा 10 राजस्थान बोर्ड की बोर्ड क्लास है, बच्चे सामाजिक में फेल भी हो सकते है। वहां पर सामाजिक विज्ञान पढ़ाने वाला कोई टीचर नहीं है, प्रधानाध्यापक से कहते हैं तो कहती हैं कोई बुराई नहीं, इस टीचर से सामाजिक विज्ञान पढ़ने में। इस के लिए कहां शिकायत करनी चाहिए?

2- एक व्यक्ति ऑफिस में लिपिक के पद पर कार्यरत है उसे उस की जाति से जाना जाएगा अथवा नाम से?

3- एक मास्टर है जो बच्चों के चूतड़ पर डंडा मारता है उस पर कोई कार्यवाही हो सकती है?

4- मिनरल वाटर का पानी खराब आने की सूचना हम कहां दे वाटर प्लांट सरकारी है?

5- हमने एक दुकानदार से एक नया सिम कार्ड खरीदा अब उसी पहचान पत्र की फोटो कॉपी करवाकर दुकानदार ने हमारे आईडी कार्ड और फोटो से अन्य सिम खरीद रखी है। उस के लिए क्या करना चाहिए? हमें कहां दावा पेश करना चाहिए?

6- हमने दुकानदार से नया मोबाइल खरीदा था। अब मोबाइल खराब हो गया है और वह गारंटी में है। वह दुकानदार उस मोबाइल को सर्विस सेंटर पर नहीं ले जा रहा है इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

7- हमने दुकानदार से एशियन पेण्ट  की पांच किलो की बाल्टी खरीदी अब उस बाल्टी में ऊपर पानी निकल आया है, इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

8- मेरे दादा जी ने एक व्यक्ति के गाल पर थप्पड़ मार दिया था वह जाति से जाट है क्या वह हम पर दावा कर सकता है?

समाधान-

कुछ दिन पहले इस किशोर ने तीसरा खंबा के ई-मेंल बाक्स में प्रश्नों की लाइन लगा दी और उसे भर दिया। हम इस किशोर की अपनी, अपने साथियों, परिवार और समाज की चिन्ता करने की प्रवृत्ति की सराहना करते हैं। अपनी समस्याओं के समाधान खुद खोजने की प्रवृत्ति एक अच्छा गुण है। आगे चल कर यह प्रवृत्ति इस किशोर में नेतृत्वकारी गुण पैदा कर सकती है। लेकिन इस उम्र में जब कि वह दसवीं कक्षा का विद्यार्थी है उसे इन चिन्ताओं से मुक्त होना चाहिए। उसे ये चिन्ताएँ अपने अभिभावकों को बतानी चाहिए और स्वयं इन चिन्ताओं से मुक्त हो जाना चाहिए। अभिभावकों को चाहिए कि वे इन चिन्ताओं को दूर करने के लिए प्रयास करें। किशोरों का काम है कि वे अपने अध्ययन पर अधिक ध्यान दें। पहले ही उन के स्कूल में सामाजिक विज्ञान का शिक्षक नहीं है। इस समस्या को बच्चो ने अपनी प्रथानाध्यापिका को बताया लेकिन लगता है इस समस्या का हल उन के पास नहीं है। उन्हों ने एक अन्य विषय के अध्यापक को सामाजिक विज्ञान पढाने के लिए लगाया है लेकिन लगता है वह ठीक से बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहा है। जिस से बच्चों को कष्ट हो रहा है। यह बात प्रधानाध्यापिका को समझनी चाहिए और स्कूल में उपलब्ध ऐसे अध्यापक को सामाजिक विज्ञान पढाने के लिए लगा देना चाहिए जो बच्चों को संतुष्ट कर सके। यदि यह भी संभव नहीं हो तो यह काम खुद प्रधानाध्याप्क को करना चाहिए।

1- राजस्थान में शिक्षकों की बहुत कमी है। सरकार नए शिक्षक भर्ती नहीं रही है। उस के स्थान पर उस ने सैंकड़ों विद्यालयों को बन्द कर के उन्हें समामेलित कर दिया है। इस से बच्चों को दूर दूर स्कूलों में जाना पड़ रहा है। फिर भी समस्या का अन्त नहीं हुआ है। इस से स्पष्ट है कि राज्य का धन बचाने का जो जुगाड़ सरकार ने निकाला था वह ठीक नहीं था। बच्चों के अध्ययन का पैसा बचा कर आप कैसा भारत बनाना चाहते हैं? ऐसा भारत या तो अशिक्षित होगा या फिर अर्ध शिक्षित, न घर का न घाट का।

स समस्या का कानूनी हल यह है कि बच्चे राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को जो कि जोधपुर में बैठते हैं एक पत्र लिख कर स्कूल के अधिक से अधिक बच्चों के हस्ताक्षर करवा कर भेजें और उन से प्रार्थना करें कि वे राज्य सरकार के शिक्षा विभाग को रिट जारी कर यह निर्देश दें कि बच्चों की इस कमी को पूरा किया जाए। यदि स्कूल सरकारी न हो कर प्राइवेट है तो सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। क्यों कि यह सरकार का कर्तव्य है कि उस के राज्य में ऐसा निजी स्कूल संचालित न हो जिस में विषयों को ठीक से पढ़ाने वाले अध्यापक ही न हों।

2- किशोर ने दूसरी समस्या लिखी है कि कोई व्यक्ति अपने नाम से जाना जाएगा या उस की जाति से? हालांकि हमारे संविधान ने अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़ी जातियों को आरक्षण का अधिकार दिया है। लेकिन यह अधिकार उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए दिया है, इस लिए नहीं कि यह उन की पहचान बन जाए। सही बात तो यह है कि किसी भी व्यक्ति को उस की जाति से नहीं पहचाना जाना चाहिए। उसे उस के नाम से ही पहचाना जाना चाहिए। लेकिन यह सब बातें समाज के समक्ष धरी की धरी रह जाती हैं। समाज में एक व्यक्ति अन्ततः अपने काम से पहचाना जाता है। भले ही लोगों को यह पता हो कि गांधी, नेहरू, अम्बेडकर, भगतसिंह आदि की जाति क्या है। लेकिन वे अपनी अपनी जातियों से नहीं अपितु अपने अपने कामों से जाने जाते हैं। इस कारण दीर्घकाल तक लोग केवल उन के काम से पहचाने जाते हैं।

3- अध्यापक का काम बच्चो को शिक्षा प्रदान करना है। उन्हें दंडित करना नहीं। किसी भी स्थिति में किसी भी विद्यार्थी को शारीरिक या आर्धिक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए। यदि शिक्षक की उचित बात को बच्चे नहीं मानते हैं तो कमी शिक्षक में है, बच्चो में नहीं। यह शिक्षक का कर्तव्य है कि वह ऐसे तरीकों की खोज करे जिस से बच्चों को उचित शिक्षा प्रदान की जा सके। ऐसे शिक्षक की शिकायत बच्चों को अपने अभिभावकों से करनी चाहिए। अभिभावक इस मामले में स्कूल के प्रधानाध्यापक से और जिला शिक्षाधिकारी से शिकायत कर सकते हैं। यदि समस्या का समाधान फिर भी न हो तो अभिभावक सीधे पुलिस या न्यायालय में परिवाद संस्थित कर सकते हैं।

4- मिनरल वाटर खराब आने की शिकायत भी किशोरों को अपने अभिभावकों से करनी चाहिए। इस मामले में अभिभावक अपने इलाके के खाद्य विभाग के निरीक्षक और अधिकारी को लिखित में शिकायत कर सकते हैं। यह उस का दायित्व है कि वह उचित कार्यवाही करे। यदि वह कार्यवाही नहीं करता है तो जिला कलेक्टर को शिकायत लिखी जा सकती है और मिनरल वाटर खरीदने वाला व्यक्ति उपभोक्ता न्यायालय में भी परिवाद प्रस्तुत कर सकता है।

5-किशोर कोई सिम कार्ड नहीं खरीद सकता। सिम कार्ड अवश्य ही किसी वयस्क ने खरीदा होगा। उस वयस्क को चाहिए कि वह इस की शिकायत पुलिस को करे। किसी व्यक्ति की आई डी से स्वयं कोई सिम खरीद लेना अत्यन्त गंभीर अपराध है। लेकिन शिकायत करने के पहले यह शिकायतकर्ता को चाहिए कि वह जाँच ले कि ऐसी गलत सिम का फोन नं. क्या है?

6-मोबाइल खराब हो जाने पर उपभोक्ता को सीधे सर्विस सेन्टर जाना चाहिए जो मोबाइल बनाने वाली कंपनी का होता है। इस मामले में दुकानदार की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। वह मोबाइल को सर्विस सेन्टर नहीं ले जाएगा।

7-एशियन पेंट्स खऱाब निकलने पर दुकानदार से बदल कर नया डब्बा देने का आग्रह करना चाहिए। यदि वह सुनवाई न करे तो दुकानदार और कंपनी के विरुद्ध उपभोक्ता न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

8- आप के दादा जी ने किसी व्यक्ति को थप्पड़ मार दिया था तो उस के परिणाम की चिन्ता भी दादा जी को करनी चाहिए, उन के पोते को नहीं। पोते को सिर्फ उस की पढ़ाई करनी चाहिए। थप्पड़ खाया हुआ व्यक्ति चाहे तो न्यायालय में परिवाद कर सकता है और अपमान के लिए क्षतिपूर्ति चाहने के लिए दीवानी वाद भी कर सकता है। लेकिन पुलिस इस मामले में कार्यवाही नहीं कर सकती। थप्पड़ खाने वाला जाट होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि वह व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति या जनजाति का होता तो पुलिस इस मामले में कार्यवाही कर सकती थी। जिस में दादा जी को गिरफ्तार किया जा सकता था। हाँ, आप दादाजी को समझा सकते हैं कि लोगों के साथ मारपीट करने और उन्हें गालियों से नवाजने का जमाना कब का समाप्त हो चुका। अब हर एक को सभ्यता से एक इन्सान की तरह पेश आना चाहिए। समाज में औरों से सभ्यता से पेश आने वालों का ही सम्मान होता है।

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mother_son1समस्या-

ब्रजलाल ने दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

नाज़ायज़ संबंधो से पैदा हुई पुत्री के भरण पोषण की जिम्मेदारी क्या पिता की होती है? यदि वो पिता पहले ही 2 बेटियो का पिता हो तो भी।

समाधान

किसी भी स्त्री-पुरुष के यौन सम्बन्ध को इस आधार पर जायज या नाजायज करार दिया जाता है कि उन के बीच सामाजिक रीति से विवाह नहीं हुआ है जो कि कानून से सहमति प्राप्त हो। लेकिन प्रकृति इस तरह के संबंध में किसी तरह की बाधा उत्पन्न नहीं करती। वह नहीं देखती कि संबंध बनाने वाले स्त्री-पुरुष विवाह जैसी कानूनी संस्था में बंधे हुए हैं या नहीं हैं। यदि यौन संबंध बनते हैं और संतान के जन्म को किसी वैध रीति से नहीं रोका जाता है तो एक इंसान जन्म लेता है। उस के जन्म में उस का कोई दोष नहीं होता। वह उसी प्राकृतिक विधि से जन्म लेता है जिस से सारे इंसानी बच्चे जन्म लेते हैं। उसे भी वे सभी अधिकार प्राप्त हैं जो कि सब बच्चों को प्राप्त है। इसी कारण से कोई भी बच्चा अवैध या नाजायज नहीं कहा जा सकता है।

क जमाने में स्थिति यह थी कि यह सिद्ध करना कठिन होता था कि किस बच्चे का पिता कौन है। पर आज के युग में डीएनए टेस्ट जैसी वैज्ञानिक पद्धति उपलब्ध है जिस से प्रमाणित होता है कि किसी बच्चे का जैविक पिता कौन है। यदि कोई जैविक पिता अपनी संतान का भरण पोषण करने से इन्कार करे तो इस का अर्थ यह समझा जाना चाहिए कि संतान के लालन पालन की जिम्मेदारी सिर्फ स्त्रियों/ माताओं की है, पुरुषों का उस से कोई लेना देना नहीं है। यदि ऐसा समझा जाता है तो दुनिया भर में धार्मिक और कानूनी तरीके से जो विवाह संस्था खड़ी की गयी है वह क्षण भर में भरभरा कर गिर पड़ेगी। फिर क्यों कोई स्त्री किसी विवाह के बंधन में बंधना चाहेगी? स्वतंत्र रहना क्यों नहीं पसंद करेगी?

र संतान को वयस्क होने तक भरण-पोषण और संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार है। बिना विवाह के जन्मी संतान को भी अपने पिता से भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार है, और उत्तराधिकार में अपने पिता की संपत्ति प्राप्त करने का भी अधिकार है।

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किन्नर भी इन्सान हैं।

July 20, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

HIJRAसमस्या-

संतोष कुमार ने गाज़ियाबाद, उत्‍तर प्रदेश से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

किन्नर लोग जो लोगों को परेशान करते हैं, उन से किस प्रकार निपटा जा सकता है? ये लोग बहुत ही बेशर्मी से पेश आते हैं और लोगों को तंग करते हैं। इनके खिलाफ क्या किया जा सकता है?

समाधान-

किन्नर भी इंसान ही हैं। जब किसी को पता लगता है कि उन के परिवार का एक सदस्य यौनिक रूप से अपंग है तो वे उसे त्याग देते हैं। फिर उसे इसी किन्नर समाज में शरण मिलती है। पूरे समाज के प्रति उन में कोई अच्छा भाव नहीं होता। उन्हें आज कोई काम तक नहीं देता। वे समझते हैं कि वे भी समाज के अंग हैं और उन्हें समाज से कुछ प्राप्त करने का अधिकार है। इस कारण उन्होंने अधिकार स्वरूप सामाजिक उल्लास के अवसरों पर अपना नेग लेते हैं, न देने पर अश्लीलता पर उतर आते हैं। कुछ अवसरों पर तो समाज भी यह समझता है कि यह उन का अधिकार है। इस कारण उन की इस हरकत पर बाकी लोग चुप रहते हैं।

जकल कुछ किन्नर रेल व बसों आदि में उगाही करने का काम भी करने लगे हैं। इन में से अधिकांश किन्नर भी नहीं हैं। बहुत से बेरोजगार लोग किन्नर का वेश धारण कर यह काम करने लगे हैं। वैसे भी खुद किन्नर समाज इस तरह की उगाही को गलत मानता है।

दि कोई किन्नर न हो और सामान्य व्यक्ति रेल के डब्बे में आ कर वसूली करने लगे तो आप क्या करेंगे? सारे यात्री उसे पकड़ेंगे और अगले स्टेशन पर उसे पुलिस के हवाले कर देंगे। वही आप को किन्नर या किन्नर वेशधारी व्यक्ति से निपटने के लिए करना चाहिए।

वास्तव में यह समस्या कानून और व्यवस्था की कम और सामाजिक अधिक है। अधिक से अधिक परिवार यदि अपने इस तरह के यौन विकलांग बच्चों को सामान्य बच्चों की तरह अपनाने लगें तो किन्नर समाज ही समाप्त हो जाए। कई किन्नर हैं जो पढ़े लिखे हैं और अपना व्यवसाय या नौकरी तक करते हैं। इस के लिए सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है। यह वैसी ही सामाजिक बीमारी है जैसे दहेज और बाल विवाह इसे सामाजिक परिवर्तन के माध्यम से ही किया जा सकता है। हमारा दुर्भाग्य है कि इन सामाजिक समस्याओं के लिए देश में कोई बड़ा आंदोलन नहीं है। हम इस तरह की समस्याओं को भी कानून के माध्यम से निपटना चाहते हैं, जो हो नहीं सकता।

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ENCROACHMENTसमस्या-

नेमीचन्द ने हाथरस, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

कुछ दिनों पहले की बात है नगर में दुकानों का अतिक्रमण हटाने के लिए नगर पालिका ने कार्यवाही की, जिस में अतिक्रमण के साथ साथ बहुत सी दुकानें भी तोड़ दीं। मेरे पडोसी की एक दुकान है और उस ने अपनी दुकान के आगे जो नगर पालिका की 2 फुट नाली है पर एक सीढ़ी बना रखी थी। पर नगर पालिका ने सब तोड़ दिया। मेरे पड़ौसी का कहना है कि वह तो उस दो फुट जमीन का किराया नगर पालिका को देता है। कुछ लोगों का कहना है कि नगर पालिका ने पहले अनुमति दे रखी थी कि दुकान के बाहर दो फुट जमीन और नाली को ढकने के लिए अस्थायी निर्माण किया जा सकता है। इस कार्रवाई पर मेरे प्रश्न निम्न प्रकार हैं १. कि क्या नगर पालिका किसी से अपनी भूमि का किराया लेती है यदि हाँ तो मेरे पडोसी जो नियम अनुसार किराया देता है उस कि दुकान क्यों तोड़ दी गई? २. नगर पालिका किस कानून की किस धारा के तहत नगर का अतिक्रमण हटा सकती है। ३. पहले अस्थायी निर्माण (जैसे दुकान के आगे ब्रंच लगाना, काउन्टर लगाना) की अनुमति देना फिर हटाने का आदेश देना क्या ऐसा कोई प्रावधान है?

समाधान-

गरपालिका पूरे नगर के क्षेत्र में स्थित सार्वजनिक स्थलों और भवन निर्माण को नियंत्रित करती है। यदि बाजार में दुकान है और ऐसी परिस्थिति है कि नाली के ऊपर बनी सीढ़ी से यातायात पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है तो वह सीढ़ी बनाने की अनुमति दे देती है। यह अनुमति किराएदारी नहीं बल्कि लायसेंस / अनुज्ञप्ति होती है। जिसे जब चाहे तब अनुज्ञप्ति प्रदान करने वाला व्यक्ति समाप्त कर सकता है। हर नगर में अब मकान निर्माण के समय सड़क की ओर 10 फुट सैट बैक छोड़ने का नियम बना है। जरूरत पड़ने पर और सड़क चौड़ी करने के लिए नगर पालिका उस सैट बैक की भूमि को पुनः अधिग्रहीत कर सड़क में शामिल कर सकती है।

प का पड़ौसी किराया नहीं बल्कि लायसेंस की शुल्क देता था। नगर पालिका ने ऐसे लायसेंस समाप्त कर दिए होंगे क्यों कि जैसे जैसे यातायात में वृद्धि हुई है वैसे वैसे सड़क को अधिक चौड़ा रखना आवश्यक हो गया है। नालियाँ अब सड़क लेवल पर ढक दी जाती हैं जिस से उस तीन फुट के स्थान को पार्किंग के लिए उपयोग में लिया जा सके।

प समझ गए होंगे कि दुकान या मकान के आगे निर्माण की जो भी अनुमति होती है वह अस्थाई होती है और आवश्यकता होने पर उसे समाप्त कर अस्थाई निर्माण को हटाया जा सकता है। घरों के आगे फैंसिंग कर के पौधे लगाने, सड़क पर रैम्प बनाने, दुकान के आगे ब्रंच, सीढ़ी या काउंटर लगाने की अनुमतियाँ इसी तरह की अस्थाई अनुमतियाँ हैं जिन्हें समाप्त किया जा सकता है।

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Market dictatorshipसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी कंपनी पिछले 1 साल से वेतन का भुगतान समय पर नहीं कर रही है। हर महीने 14 से 20 तारीख को कर रही है। एक साल पहले 7 तारीख तक भुगतान कर दिया जाता था। कुल 250 से 300 कर्मचारी है PF, ESI, सही है। पर वेतन समय पर मिले इस के लिए क्या करें?

समाधान-

जिन उद्योगों में 1000 से कम कर्मचारी हैं उन में अगले माह की 7 तारीख तक तथा जहाँ 1000 या अधिक कर्मचारी हैं उन में कर्मचारियों को 10 तारीख तक वेतन का भुगतान कर दिया जाना चाहिए। इस के बाद किया गया भुगतान देरी से किया गया भुगतान है। जिस में प्रत्येक कर्मचारी को हर बार 25 रुपया जुर्माना दिलाया जा सकता है। लेकिन उस के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में मुकदमा करना पड़ेगा। यदि आप अकेले मुकदमा करेंगे तो प्रबंधन आप को किसी भी तरह से नौकरी से निकाल देगा। इस कारण यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती है। इसे लड़ने के लिए सारे उद्योग के श्रमिकों को एक जुट होना पड़ेगा।

कुछ साल पहले तक यह श्रम विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह नियोजक से समय पर वेतन दिलाए। यदि समय पर वेतन का भुगतान नहीं होता था तो श्रम विभाग के निरीक्षक उस नियोजक के विरुद्ध श्रमिकों की ओर से वेतन भुगतान प्राधिकारी के यहाँ मुकदमा करते थे। लेकिन अब सरकारों ने श्रमिकों की ओर से मुकदमा करना बन्द कर दिया है। सरकारों का मानना है कि वेतन समय पर दिलाना सरकारों का नहीं बल्कि कानून और अदालत का काम है। यदि समय पर वेतन चाहिए तो मजदूर खुद मुकदमा करे। मुकदमा करने के लिए काम से गैर हाजिर हो, नुकसान उठाए। इस तरह वह मुकदमा करेगा ही नहीं और उद्योगपति अपनी मनमर्जी चलाते रहेंगे। यही मौजूदा भाजपा और पिछली कांग्रेस सरकार का सत्य है। वे मालिकों के लिए बनी हैं और उन के लिए ही काम करेंगी। श्रम विभाग में अफसर नहीं हैं। तीन चार अदालतों को एक अफसर चलाता है। फैसले बरसों तक नहीं होते। श्रम न्यायालय भी जरूरत के अनुसार नहीं हैं। जिस से 30-35 साल पुराने मुकदमे भी अभी तक लंबित पड़े हैं।

दि कोई उद्योग एक माह देरी से वेतन देता है तो उस की उपेक्षा की जा सकती है लेकिन साल भर से यही हो रहा है तो सरकार को खुद उस पर मुकदमा चलाना चाहिए और मजदूरें को देरी के एक एक दिन का ब्याज 12% की दर से पैनल्टी के साथ दिलाना चाहिए। वैसे भी मजदूर रोज काम करता है और कमाता है। उस कमाई को एक माह से अधिक समय तक अपने पास रख कर उद्योगपति मुनाफा कमाता है। उस का कोई हिसाब नहीं होता। ब्रिटेन में वेतन इसी कारण हर सप्ताह भुगतान किया जाता है जिस से मजदूर की मजदूरी का पैसा मालिक के पास अधिक दिन न रहे और मालिक अनुचित लाभ न उठाए।

ब हर उद्योग के मजदूर को संगठित होना पड़ेगा। केवल एक उद्योग के मजदूर को नहीं अलग अलग उद्योगों के मजदूरों को भी आपस में संगठित होना पड़ेगा। अब उन की लड़ाई केवल सामुहिक सौदेबाजी या अदालत की नहीं रह गयी है। क्यों कि इन दोनों तरह की लड़ाइयों को सरकार मालिकों के पक्ष में तब्दील कर देती है। इस तरह हमारे देश की व्यवस्था भी जनतांत्रिक नहीं रह गयी है। वह कहने को जनतांत्रिक है लेकिन चरित्र में वह पूंजीपतियों-भूस्वामी वर्गों की शेष जनता पर तानाशाही है।

ब मजदूरों की समस्याओं का इस देश में एक ही इलाज रह गया है कि मजदूर एक वर्ग के रूप में राजनैतिक रूप से संगठित हों और वर्तमान सत्ता को पलट कर अपनी वर्गीय सत्ता स्थापित करें। तभी पूंजीपतियों और भूस्वामियों और उन के दोस्त विदेशी पूंजीपतियों की इस तानाशाही को धराशाही किया जा कर जनता का जनतंत्र स्थापित किया जा सकता है।

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rp_police-station2.jpgसमस्या-

नितिन अग्रवाल ने सतना मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा एक बैंक खाता श्री बालाजी अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में एवम् एक खाता I.D.B.I. बैंक में भी है । 28.02.15 को श्री बालाजी बैंक ने मुझसे कहा कि आपके खाते में गलती से 198000/- (एक लाख अन्ठानवे हजार रुपये) आज से 9 माह पहले जमा हो गये थे, जो आप जमा करवा दीजिये । (28.05.14 को मैंने 2000 I.D.B.I. बैंक से ट्रांसफर किये थे तो उन्होंने 200000 रु. चढ़ा दिये थे ।) तब मैंने कहा कि मुझे थोड़ा समय दीजिये, इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम का इंतज़ाम कठिन है । तब बैंक ने कहा कि क्लोजिंग चल रही है, आपको तुरंत पैसा जमा करना पड़ेगा 15 दिनों के अंदर । मैंने उनको एक आवेदन पत्र भी दिया था कि मेरी एफ.डी. परिपक्व करके मेरे खाते में राशि जमा कर दी जाये और मेरा जो लोन चल रहा है उसको समाप्त कर दिया जाये, जो राशि खाते में जमा है उसको भी लोन में समायोजित करने के बाद जो भी राशि बचती है उसको मैं जमा करने को तैयार हूँ । लेकिन उन्होंने उस आवेदन को स्वीकार नहीं किया । और न ही पावती दी । 19.03.15 को मैं बैंक 2000/- (दो हजार रुपये) जमा करने गया और जमा करने के बाद पासबुक में इंट्री करवाई तो पता चला कि बैंक ने मेरे खाते से दिनांक 28-02-2015 को 198000/- एवं दिनांक 03-03-2015 को 25/- निकाल लिये थे वो भी मेरे साईन और अनुमति के बगैर । 23.03.15 को मैंने मान्यनीय उपभोक्ता फोरम द्वारा बैंक को नोटिस भी भिजवाया कि बैंक ने मेरे खाते से मेरी अनुमति के बिना ही 198000/- और 25/- निकाल लिये हैं । 11.04.15 को बैंक द्वारा सतेंद्र मोहन उपाध्याय टी. आई. सिटी कोतवाली सतना को प्रभाव में लेकर मुझे दोपहर 12 बजे से शाम 06:30 बजे तक थाने में बैठाकर प्रताड़ित किया एवं पैसे जमा करवाने के दवाब बनाया गया, बिना कोई F.I.R. के ही एवं बिना अदालत की अनुमति के हथकड़ी लगवाकर कैदियों के साथ बैठा दिया गया, और मेरी मानवीय गारिमा, सम्मान और सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नष्ट किया गया । 13.04.15 को मैंने टी. आई. सिटी कोतवाली सतना एवं बैंक प्रबंधन के खिलाफ एस.पी. साहब के नाम सी.एस.पी. आफिस में लिखित आवेदन हथकड़ी लगी हुयी फोटो के साथ दिया एवं साथ में मानवाधिकार न्यायालय में भी याचिका दर्ज़ करवाई और मानवाधिकार न्यायालय द्वारा नोटिस भी जारी हुआ । और साथ में उच्चाधिकारियों को भी मैंने इस बात की लिखित सूचना भेजी । हथकड़ी लगाने के 18 दिन बाद, दिनांक 29-04-15 को श्री बालाजी बैंक के साथ मिलकर बदले की भावना से टी.आई. सत्येंद्र मोहन उपाध्याय और एस.आई. शत्रुघन वर्मा द्वारा झूठी रिपोर्ट दर्ज़ की गयी और धारा 403 व 406 लगा दी गयी । जबकि मैंने उन लोगों को पहले भी सूचित किया था कि मैंने सिर्फ अपने खाते में ही जमा रकम निकाली थी । चूंकि बैंक ने पैसा लेने के लिये गलत तरीकों का इस्तेमाल किया था । इसलिये आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ कि आगे मैं क्या करूं, क्या करना सही होगा ।

समाधान-

बैंक ने आप के खाते में अधिक धन चढ़ा कर गलती की है। इस गलती को सुधारने का सही तरीका यह था के बैंक उस धन को जमा कराने के लिए आप को लिखित नोटिस देता और आप की जो धनराशियाँ बैंक में जिन जिन खातों में हैं उन्हें सीज कर लेता। इस के साथ ही उस धन को जमा कराने के लिए आप के विरुद्ध दीवानी अदालत में दीवानी वाद संस्थित करता। लेकिन बैंक ने इस गलती को सुधारने के लिए गलत तरीका अपनाया और आप को पुलिस की सहायता से अपमानित किया और मानसिक व शारीरिक संताप पहुँचाया। इस मामले में गलती पुलिस की है जिस ने अवैध रीति अपनाई। आप इस के विरुद्ध उच्च न्यायालय में पुलिस/सरकार के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। बैंक की अनियमितता के विरुद्ध आप पहले ही उपभोक्ता अदालत में जा चुके हैं।

प के विरुद्ध जो धारा 403 व 406 का मुकदमा बनाया गया है वह बनता ही नहीं है। उस प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कराने के लिए भी आप उच्च न्यायालय के समक्ष निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं और प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द करवा सकते हैं।

दालतों की स्थिति सरकार ने ऐसी बना रखी है कि वहाँ न्याय मिलना अनन्त काल तक लंबित रहता है इस बीच न्यायार्थियों को जो तकलीफ भुगतनी पड़ती है उस का कोई हिसाब ही नहीं है। इस स्थिति ने पुलिस, सार्वजनिक व निजि संस्थाओं और सरकारी अमले को निरंकुश बनाया है। उसी का फल आप को भुगतना पड़ा है। इस तरह की स्थितियों से तभी समाज को बचाया जा सकता है जब कि एक त्वरित और उचित न्याय व्यवस्था देश में स्थापित हो। पर वह तो अभी एक सपना लगता है। अभी तो हमारी सरकारों ने जरूरत के केवल 15 प्रतिशत न्यायालय स्थापित किए हुए हैं। इस न्याय व्यवस्था को एक गुणवत्ता वाली त्वरित न्याय व्यवस्था में परिवर्तित होना देश की समूची राजनैतिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हुए बिना संभव नहीं लगता। तब तक इस अपर्याप्त न्यायिक व्यवस्था के दु्ष्परिणाम नागरिकों को भुगतने होंगे।

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rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-
दिलीप सेठिया ने खंडवा, मध्यप्रदेश से  समस्या भेजी है कि-

मैं एक निजी कंस्ट्रेक्सन कंपनी में 4 साल से मार्केटिंग एवं फील्ड का पूरा काम देख रहा हूँ। मेरे 2 बच्चे भी हैं जो स्कूल में अध्यनरत हैं और किराये के मकान में रहते हैं। मुझे कंपनी ने 1 जनवरी 2011 को ऑफर लैटर दे कर काम पर रखा है। मुझे जिस मासिक वेतन 13625/= पर आरंभ में रखा था, वर्तमान मई 2015 में भी वही वेतन बैंक द्वारा दे रहे हैं। 1 जनवरी 2012 को मुझे वेतन बढ़ाने का बोल कर, आज तक मुझे बढ़ी हुई वेतन नहीं दी है। अब मांगता हूँ तो जवाब मिलता है, काम छोड़ दो। मेरे दोनों बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। मैँ अब क्या करूँ?

समाधान-

निजि कम्पनी में आप की नौकरी आप को दिए गए ऑफर लैटर की शर्तों पर निर्भर करती है। आप ने उस ऑफर लैटर को स्वीकार किया और वह एक संविदा में परिवर्तित हो गया। उस में यदि वेतन निश्चित है और वेतन बढ़ाने की कोई शर्त नहीं है तो आप को कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि आप अपने वेतन को बढ़ाने की मांग करें। वैसे भी मार्केंटिंग के लोगों को औद्योगिक विवाद अधिनियम के अन्तर्गत वर्कमेन साबित करना बहुत कठिन काम है। यदि किसी तरह की कानूनी लड़ाई लड़ना चाहेंगे तो अदालतों की हालत यह है कि उन का निर्णय आप के जीवनकाल में हो जाए तो समझिए आप को सरकार ने खैरात दे दी। यूँ भी नियोजन क्षेत्र से संबंधित कानून अब कर्मचारियों के पक्ष में नहीं है। इस कारण कोई भी कानूनी उपाय आप के पास इस के लिए उपलब्ध नहीं है। यदि आप बच्चों का भविष्य खराब होने की दुहाई दे कर कुछ राहत की मांग करेंगे तो आप की विवशता देख कर नियोजक आप का वेतन बढ़ाना तो दूर काम की कमी बता कर आप का वेतन कम करने का प्रयत्न करते दिखाई देंगे।

निजि क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपना स्किल बढ़ाएँ, अपना अनुभव बढ़ाएँ और अपने काम की मांग पैदा करें। और एक कंपनी की नौकरी को अपना जीवन बनाने से बचें। आप के नियोजक हर काम अपने मुनाफे के लिए करते हैं। जिस दिन उन्हें आप की जरूरत नहीं होगी या आप से कम वेतन में आप का काम करने वाला व्यक्ति मिल जाएगा वे आप को काम से बाहर कर देंगे। इस कारण आप को निरन्तर काम की तलाश भी जारी रखनी पड़ेगी। जैसे ही आप को वर्तमान से बेहतर काम मिले आप तुरन्त छोड़ कर दूसरा नियोजन पकड़ लें।

च्छी तरह समझ लें कि भारत में श्रमिकों और कर्मचारियों के लिए कोई भी सामाजिक सुरक्षा नहीं है। उन्हें उचित वेतन देने के लिए कोई कानून नहीं है। उन के नियोजन की सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। यदि कोई कानून की किताब खोल कर बताए कि यह कानून है तो उस कानून के आधार पर किसी तरह की राहत पाना आसान नहीं है। एक श्रम न्यायालय में तीन कर्मचारियों की सेवा समाप्ति के विवाद 1983 से चल रहे हैं जिन्हें हम खुद देख रहे हैं। लेकिन आज तक श्रम न्यायालय उन का निर्णय नहीं कर सका। श्रम न्यायालय 32 वर्ष में जब तीन कर्मचारियों को उन के विवाद का निर्णय नहीं दे सकता तो फिर इस देश के न्यायालयों से श्रमिक कर्मचारी वर्ग न्याय की आशा नहीं कर सकता। अब तो श्रमिक वर्ग के लिए इस देश में न्याय तभी संभव होगा जब वे एक जुट हो कर देश की सत्ता को अपने और मित्र वर्गों के हाथों में ले लेंगे। वर्तमान में तो पूंजीपतियों और भूस्वामियों का बोल बाला है। इस व्यवस्था से कुछ भी आशा करना मजदूरों, किसानों, रिटेलरों आदि मेहनतकश वर्गों के लिए मूर्खता सिद्ध हो रहा है।

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