System Archive

ENCROACHMENTसमस्या-

नेमीचन्द ने हाथरस, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

कुछ दिनों पहले की बात है नगर में दुकानों का अतिक्रमण हटाने के लिए नगर पालिका ने कार्यवाही की, जिस में अतिक्रमण के साथ साथ बहुत सी दुकानें भी तोड़ दीं। मेरे पडोसी की एक दुकान है और उस ने अपनी दुकान के आगे जो नगर पालिका की 2 फुट नाली है पर एक सीढ़ी बना रखी थी। पर नगर पालिका ने सब तोड़ दिया। मेरे पड़ौसी का कहना है कि वह तो उस दो फुट जमीन का किराया नगर पालिका को देता है। कुछ लोगों का कहना है कि नगर पालिका ने पहले अनुमति दे रखी थी कि दुकान के बाहर दो फुट जमीन और नाली को ढकने के लिए अस्थायी निर्माण किया जा सकता है। इस कार्रवाई पर मेरे प्रश्न निम्न प्रकार हैं १. कि क्या नगर पालिका किसी से अपनी भूमि का किराया लेती है यदि हाँ तो मेरे पडोसी जो नियम अनुसार किराया देता है उस कि दुकान क्यों तोड़ दी गई? २. नगर पालिका किस कानून की किस धारा के तहत नगर का अतिक्रमण हटा सकती है। ३. पहले अस्थायी निर्माण (जैसे दुकान के आगे ब्रंच लगाना, काउन्टर लगाना) की अनुमति देना फिर हटाने का आदेश देना क्या ऐसा कोई प्रावधान है?

समाधान-

गरपालिका पूरे नगर के क्षेत्र में स्थित सार्वजनिक स्थलों और भवन निर्माण को नियंत्रित करती है। यदि बाजार में दुकान है और ऐसी परिस्थिति है कि नाली के ऊपर बनी सीढ़ी से यातायात पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है तो वह सीढ़ी बनाने की अनुमति दे देती है। यह अनुमति किराएदारी नहीं बल्कि लायसेंस / अनुज्ञप्ति होती है। जिसे जब चाहे तब अनुज्ञप्ति प्रदान करने वाला व्यक्ति समाप्त कर सकता है। हर नगर में अब मकान निर्माण के समय सड़क की ओर 10 फुट सैट बैक छोड़ने का नियम बना है। जरूरत पड़ने पर और सड़क चौड़ी करने के लिए नगर पालिका उस सैट बैक की भूमि को पुनः अधिग्रहीत कर सड़क में शामिल कर सकती है।

प का पड़ौसी किराया नहीं बल्कि लायसेंस की शुल्क देता था। नगर पालिका ने ऐसे लायसेंस समाप्त कर दिए होंगे क्यों कि जैसे जैसे यातायात में वृद्धि हुई है वैसे वैसे सड़क को अधिक चौड़ा रखना आवश्यक हो गया है। नालियाँ अब सड़क लेवल पर ढक दी जाती हैं जिस से उस तीन फुट के स्थान को पार्किंग के लिए उपयोग में लिया जा सके।

प समझ गए होंगे कि दुकान या मकान के आगे निर्माण की जो भी अनुमति होती है वह अस्थाई होती है और आवश्यकता होने पर उसे समाप्त कर अस्थाई निर्माण को हटाया जा सकता है। घरों के आगे फैंसिंग कर के पौधे लगाने, सड़क पर रैम्प बनाने, दुकान के आगे ब्रंच, सीढ़ी या काउंटर लगाने की अनुमतियाँ इसी तरह की अस्थाई अनुमतियाँ हैं जिन्हें समाप्त किया जा सकता है।

Market dictatorshipसमस्या-

टीकम सिंह परिहार ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी कंपनी पिछले 1 साल से वेतन का भुगतान समय पर नहीं कर रही है। हर महीने 14 से 20 तारीख को कर रही है। एक साल पहले 7 तारीख तक भुगतान कर दिया जाता था। कुल 250 से 300 कर्मचारी है PF, ESI, सही है। पर वेतन समय पर मिले इस के लिए क्या करें?

समाधान-

जिन उद्योगों में 1000 से कम कर्मचारी हैं उन में अगले माह की 7 तारीख तक तथा जहाँ 1000 या अधिक कर्मचारी हैं उन में कर्मचारियों को 10 तारीख तक वेतन का भुगतान कर दिया जाना चाहिए। इस के बाद किया गया भुगतान देरी से किया गया भुगतान है। जिस में प्रत्येक कर्मचारी को हर बार 25 रुपया जुर्माना दिलाया जा सकता है। लेकिन उस के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में मुकदमा करना पड़ेगा। यदि आप अकेले मुकदमा करेंगे तो प्रबंधन आप को किसी भी तरह से नौकरी से निकाल देगा। इस कारण यह लड़ाई अकेले नहीं लड़ी जा सकती है। इसे लड़ने के लिए सारे उद्योग के श्रमिकों को एक जुट होना पड़ेगा।

कुछ साल पहले तक यह श्रम विभाग की जिम्मेदारी थी कि वह नियोजक से समय पर वेतन दिलाए। यदि समय पर वेतन का भुगतान नहीं होता था तो श्रम विभाग के निरीक्षक उस नियोजक के विरुद्ध श्रमिकों की ओर से वेतन भुगतान प्राधिकारी के यहाँ मुकदमा करते थे। लेकिन अब सरकारों ने श्रमिकों की ओर से मुकदमा करना बन्द कर दिया है। सरकारों का मानना है कि वेतन समय पर दिलाना सरकारों का नहीं बल्कि कानून और अदालत का काम है। यदि समय पर वेतन चाहिए तो मजदूर खुद मुकदमा करे। मुकदमा करने के लिए काम से गैर हाजिर हो, नुकसान उठाए। इस तरह वह मुकदमा करेगा ही नहीं और उद्योगपति अपनी मनमर्जी चलाते रहेंगे। यही मौजूदा भाजपा और पिछली कांग्रेस सरकार का सत्य है। वे मालिकों के लिए बनी हैं और उन के लिए ही काम करेंगी। श्रम विभाग में अफसर नहीं हैं। तीन चार अदालतों को एक अफसर चलाता है। फैसले बरसों तक नहीं होते। श्रम न्यायालय भी जरूरत के अनुसार नहीं हैं। जिस से 30-35 साल पुराने मुकदमे भी अभी तक लंबित पड़े हैं।

दि कोई उद्योग एक माह देरी से वेतन देता है तो उस की उपेक्षा की जा सकती है लेकिन साल भर से यही हो रहा है तो सरकार को खुद उस पर मुकदमा चलाना चाहिए और मजदूरें को देरी के एक एक दिन का ब्याज 12% की दर से पैनल्टी के साथ दिलाना चाहिए। वैसे भी मजदूर रोज काम करता है और कमाता है। उस कमाई को एक माह से अधिक समय तक अपने पास रख कर उद्योगपति मुनाफा कमाता है। उस का कोई हिसाब नहीं होता। ब्रिटेन में वेतन इसी कारण हर सप्ताह भुगतान किया जाता है जिस से मजदूर की मजदूरी का पैसा मालिक के पास अधिक दिन न रहे और मालिक अनुचित लाभ न उठाए।

ब हर उद्योग के मजदूर को संगठित होना पड़ेगा। केवल एक उद्योग के मजदूर को नहीं अलग अलग उद्योगों के मजदूरों को भी आपस में संगठित होना पड़ेगा। अब उन की लड़ाई केवल सामुहिक सौदेबाजी या अदालत की नहीं रह गयी है। क्यों कि इन दोनों तरह की लड़ाइयों को सरकार मालिकों के पक्ष में तब्दील कर देती है। इस तरह हमारे देश की व्यवस्था भी जनतांत्रिक नहीं रह गयी है। वह कहने को जनतांत्रिक है लेकिन चरित्र में वह पूंजीपतियों-भूस्वामी वर्गों की शेष जनता पर तानाशाही है।

ब मजदूरों की समस्याओं का इस देश में एक ही इलाज रह गया है कि मजदूर एक वर्ग के रूप में राजनैतिक रूप से संगठित हों और वर्तमान सत्ता को पलट कर अपनी वर्गीय सत्ता स्थापित करें। तभी पूंजीपतियों और भूस्वामियों और उन के दोस्त विदेशी पूंजीपतियों की इस तानाशाही को धराशाही किया जा कर जनता का जनतंत्र स्थापित किया जा सकता है।

rp_police-station2.jpgसमस्या-

नितिन अग्रवाल ने सतना मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा एक बैंक खाता श्री बालाजी अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में एवम् एक खाता I.D.B.I. बैंक में भी है । 28.02.15 को श्री बालाजी बैंक ने मुझसे कहा कि आपके खाते में गलती से 198000/- (एक लाख अन्ठानवे हजार रुपये) आज से 9 माह पहले जमा हो गये थे, जो आप जमा करवा दीजिये । (28.05.14 को मैंने 2000 I.D.B.I. बैंक से ट्रांसफर किये थे तो उन्होंने 200000 रु. चढ़ा दिये थे ।) तब मैंने कहा कि मुझे थोड़ा समय दीजिये, इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम का इंतज़ाम कठिन है । तब बैंक ने कहा कि क्लोजिंग चल रही है, आपको तुरंत पैसा जमा करना पड़ेगा 15 दिनों के अंदर । मैंने उनको एक आवेदन पत्र भी दिया था कि मेरी एफ.डी. परिपक्व करके मेरे खाते में राशि जमा कर दी जाये और मेरा जो लोन चल रहा है उसको समाप्त कर दिया जाये, जो राशि खाते में जमा है उसको भी लोन में समायोजित करने के बाद जो भी राशि बचती है उसको मैं जमा करने को तैयार हूँ । लेकिन उन्होंने उस आवेदन को स्वीकार नहीं किया । और न ही पावती दी । 19.03.15 को मैं बैंक 2000/- (दो हजार रुपये) जमा करने गया और जमा करने के बाद पासबुक में इंट्री करवाई तो पता चला कि बैंक ने मेरे खाते से दिनांक 28-02-2015 को 198000/- एवं दिनांक 03-03-2015 को 25/- निकाल लिये थे वो भी मेरे साईन और अनुमति के बगैर । 23.03.15 को मैंने मान्यनीय उपभोक्ता फोरम द्वारा बैंक को नोटिस भी भिजवाया कि बैंक ने मेरे खाते से मेरी अनुमति के बिना ही 198000/- और 25/- निकाल लिये हैं । 11.04.15 को बैंक द्वारा सतेंद्र मोहन उपाध्याय टी. आई. सिटी कोतवाली सतना को प्रभाव में लेकर मुझे दोपहर 12 बजे से शाम 06:30 बजे तक थाने में बैठाकर प्रताड़ित किया एवं पैसे जमा करवाने के दवाब बनाया गया, बिना कोई F.I.R. के ही एवं बिना अदालत की अनुमति के हथकड़ी लगवाकर कैदियों के साथ बैठा दिया गया, और मेरी मानवीय गारिमा, सम्मान और सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नष्ट किया गया । 13.04.15 को मैंने टी. आई. सिटी कोतवाली सतना एवं बैंक प्रबंधन के खिलाफ एस.पी. साहब के नाम सी.एस.पी. आफिस में लिखित आवेदन हथकड़ी लगी हुयी फोटो के साथ दिया एवं साथ में मानवाधिकार न्यायालय में भी याचिका दर्ज़ करवाई और मानवाधिकार न्यायालय द्वारा नोटिस भी जारी हुआ । और साथ में उच्चाधिकारियों को भी मैंने इस बात की लिखित सूचना भेजी । हथकड़ी लगाने के 18 दिन बाद, दिनांक 29-04-15 को श्री बालाजी बैंक के साथ मिलकर बदले की भावना से टी.आई. सत्येंद्र मोहन उपाध्याय और एस.आई. शत्रुघन वर्मा द्वारा झूठी रिपोर्ट दर्ज़ की गयी और धारा 403 व 406 लगा दी गयी । जबकि मैंने उन लोगों को पहले भी सूचित किया था कि मैंने सिर्फ अपने खाते में ही जमा रकम निकाली थी । चूंकि बैंक ने पैसा लेने के लिये गलत तरीकों का इस्तेमाल किया था । इसलिये आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ कि आगे मैं क्या करूं, क्या करना सही होगा ।

समाधान-

बैंक ने आप के खाते में अधिक धन चढ़ा कर गलती की है। इस गलती को सुधारने का सही तरीका यह था के बैंक उस धन को जमा कराने के लिए आप को लिखित नोटिस देता और आप की जो धनराशियाँ बैंक में जिन जिन खातों में हैं उन्हें सीज कर लेता। इस के साथ ही उस धन को जमा कराने के लिए आप के विरुद्ध दीवानी अदालत में दीवानी वाद संस्थित करता। लेकिन बैंक ने इस गलती को सुधारने के लिए गलत तरीका अपनाया और आप को पुलिस की सहायता से अपमानित किया और मानसिक व शारीरिक संताप पहुँचाया। इस मामले में गलती पुलिस की है जिस ने अवैध रीति अपनाई। आप इस के विरुद्ध उच्च न्यायालय में पुलिस/सरकार के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। बैंक की अनियमितता के विरुद्ध आप पहले ही उपभोक्ता अदालत में जा चुके हैं।

प के विरुद्ध जो धारा 403 व 406 का मुकदमा बनाया गया है वह बनता ही नहीं है। उस प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कराने के लिए भी आप उच्च न्यायालय के समक्ष निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं और प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द करवा सकते हैं।

दालतों की स्थिति सरकार ने ऐसी बना रखी है कि वहाँ न्याय मिलना अनन्त काल तक लंबित रहता है इस बीच न्यायार्थियों को जो तकलीफ भुगतनी पड़ती है उस का कोई हिसाब ही नहीं है। इस स्थिति ने पुलिस, सार्वजनिक व निजि संस्थाओं और सरकारी अमले को निरंकुश बनाया है। उसी का फल आप को भुगतना पड़ा है। इस तरह की स्थितियों से तभी समाज को बचाया जा सकता है जब कि एक त्वरित और उचित न्याय व्यवस्था देश में स्थापित हो। पर वह तो अभी एक सपना लगता है। अभी तो हमारी सरकारों ने जरूरत के केवल 15 प्रतिशत न्यायालय स्थापित किए हुए हैं। इस न्याय व्यवस्था को एक गुणवत्ता वाली त्वरित न्याय व्यवस्था में परिवर्तित होना देश की समूची राजनैतिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हुए बिना संभव नहीं लगता। तब तक इस अपर्याप्त न्यायिक व्यवस्था के दु्ष्परिणाम नागरिकों को भुगतने होंगे।

rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-
दिलीप सेठिया ने खंडवा, मध्यप्रदेश से  समस्या भेजी है कि-

मैं एक निजी कंस्ट्रेक्सन कंपनी में 4 साल से मार्केटिंग एवं फील्ड का पूरा काम देख रहा हूँ। मेरे 2 बच्चे भी हैं जो स्कूल में अध्यनरत हैं और किराये के मकान में रहते हैं। मुझे कंपनी ने 1 जनवरी 2011 को ऑफर लैटर दे कर काम पर रखा है। मुझे जिस मासिक वेतन 13625/= पर आरंभ में रखा था, वर्तमान मई 2015 में भी वही वेतन बैंक द्वारा दे रहे हैं। 1 जनवरी 2012 को मुझे वेतन बढ़ाने का बोल कर, आज तक मुझे बढ़ी हुई वेतन नहीं दी है। अब मांगता हूँ तो जवाब मिलता है, काम छोड़ दो। मेरे दोनों बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। मैँ अब क्या करूँ?

समाधान-

निजि कम्पनी में आप की नौकरी आप को दिए गए ऑफर लैटर की शर्तों पर निर्भर करती है। आप ने उस ऑफर लैटर को स्वीकार किया और वह एक संविदा में परिवर्तित हो गया। उस में यदि वेतन निश्चित है और वेतन बढ़ाने की कोई शर्त नहीं है तो आप को कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि आप अपने वेतन को बढ़ाने की मांग करें। वैसे भी मार्केंटिंग के लोगों को औद्योगिक विवाद अधिनियम के अन्तर्गत वर्कमेन साबित करना बहुत कठिन काम है। यदि किसी तरह की कानूनी लड़ाई लड़ना चाहेंगे तो अदालतों की हालत यह है कि उन का निर्णय आप के जीवनकाल में हो जाए तो समझिए आप को सरकार ने खैरात दे दी। यूँ भी नियोजन क्षेत्र से संबंधित कानून अब कर्मचारियों के पक्ष में नहीं है। इस कारण कोई भी कानूनी उपाय आप के पास इस के लिए उपलब्ध नहीं है। यदि आप बच्चों का भविष्य खराब होने की दुहाई दे कर कुछ राहत की मांग करेंगे तो आप की विवशता देख कर नियोजक आप का वेतन बढ़ाना तो दूर काम की कमी बता कर आप का वेतन कम करने का प्रयत्न करते दिखाई देंगे।

निजि क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपना स्किल बढ़ाएँ, अपना अनुभव बढ़ाएँ और अपने काम की मांग पैदा करें। और एक कंपनी की नौकरी को अपना जीवन बनाने से बचें। आप के नियोजक हर काम अपने मुनाफे के लिए करते हैं। जिस दिन उन्हें आप की जरूरत नहीं होगी या आप से कम वेतन में आप का काम करने वाला व्यक्ति मिल जाएगा वे आप को काम से बाहर कर देंगे। इस कारण आप को निरन्तर काम की तलाश भी जारी रखनी पड़ेगी। जैसे ही आप को वर्तमान से बेहतर काम मिले आप तुरन्त छोड़ कर दूसरा नियोजन पकड़ लें।

च्छी तरह समझ लें कि भारत में श्रमिकों और कर्मचारियों के लिए कोई भी सामाजिक सुरक्षा नहीं है। उन्हें उचित वेतन देने के लिए कोई कानून नहीं है। उन के नियोजन की सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। यदि कोई कानून की किताब खोल कर बताए कि यह कानून है तो उस कानून के आधार पर किसी तरह की राहत पाना आसान नहीं है। एक श्रम न्यायालय में तीन कर्मचारियों की सेवा समाप्ति के विवाद 1983 से चल रहे हैं जिन्हें हम खुद देख रहे हैं। लेकिन आज तक श्रम न्यायालय उन का निर्णय नहीं कर सका। श्रम न्यायालय 32 वर्ष में जब तीन कर्मचारियों को उन के विवाद का निर्णय नहीं दे सकता तो फिर इस देश के न्यायालयों से श्रमिक कर्मचारी वर्ग न्याय की आशा नहीं कर सकता। अब तो श्रमिक वर्ग के लिए इस देश में न्याय तभी संभव होगा जब वे एक जुट हो कर देश की सत्ता को अपने और मित्र वर्गों के हाथों में ले लेंगे। वर्तमान में तो पूंजीपतियों और भूस्वामियों का बोल बाला है। इस व्यवस्था से कुछ भी आशा करना मजदूरों, किसानों, रिटेलरों आदि मेहनतकश वर्गों के लिए मूर्खता सिद्ध हो रहा है।

सुस्त न्यायिक व्यवस्था का इलाज तो राजनीति से ही संभव है।

May 16, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_divorce.jpgसमस्या-

प्रभाकर ने ग्वालियर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मारी शादी हिन्दू विधि से ११ साल पहले हुई थी। २ बच्चे हैं। शादी के बाद कभी भी नहीं बनी पर कोशिश थी कि शायद कुछ ठीक हो जाएगा। मैं किस प्रकार से जल्द तलाक़ ले सकता हूँ, सही कारण तो पत्नी द्वारा मानसिक प्रतारणा है, पर शायद सिद्ध करने में जिंदगी निकल जाएगी। क्या मैं अपना विवाहेतर शारीरिक संबंध सिद्ध करके डिक्री ले सकता हूँ? या मेरा धर्म परिवर्तन करके ये शादी खत्म की जा सकती है? पत्नी ने पहले तलाक़ की धमकी दी थी पर अब तलाक़ देने के लिए सहमत नहीं है। कृपया कुछ और उपाय हो तो सुझाएँ, बच्चो का हक़ भी पत्नी रखे तो चलेगा, मैं बच्चो का भरण पोषण लाइफ टाइम तक करने के लिए तैयार हूँ। शायद मैं कुछ तथ्य न दे कर भावनात्मक बात कर रहा हूँ पर कृपया अन्यथा न लीजिए।

समाधान-

भी तो आप को खुद लग रहा है कि आप शायद भावनात्मक बात कर रहे हैं। इस से स्पष्ट है कि आप के पास पत्नी से विवाह विच्छेद का कोई वैध कारण आप को दिखाई नहीं पड़ रहा है। यदि आप समझते हैं जो कुछ पत्नी कर रही है वह क्रूरता पूर्ण व्यवहार है तो आप उस के आधार पर न्यायिक पृथक्करण या विवाह विच्छेद का आवेदन कर सकते हैं। जहाँ तक सिद्ध करने में जीवन निकल जाने का भय है तो इस का अर्थ यह है कि आप के यहाँ न्याय पालिका बहुत सुस्त है और सभी मामलों में निर्णय देरी से होते हैं। आप को उस पर विश्वास नहीं रहा है।  यद सब इस कारण होता है कि न्यायालय के क्षेत्राधिकार के क्षेत्र से इतने मुकदमे प्रस्तुत होते हैं कि उस के लिए एक न्यायालय पर्याप्त नहीं है। उस क्षेत्र के लिए और न्यायालय स्थापित किए जाने की आवश्यकता है। नए न्यायालय स्थापित करने का काम सरकार का है। कम न्यायालय और अधिक मुकदमे होने से पेशियाँ देरी से होती हैं। प्रतिदिन अधिक मुकदमे न्यायालय की कार्यसूची में लगते हैं जिन में से आधे से अधिक में केवल पेशी ही मिलनी होती है। इस का लाभ वे न्यायार्थी उठाते हैं जो अपने मुकदमों को लंबा करना चाहते हैं। यदि ऐसा है तो कोई भी आधार आप तलाक का हो लेकिन समय उतना ही लगेगा। सुस्त न्यायिक व्यवस्था से वकीलों के भरोसे नहीं लड़ा जा सकता। उसे दुरुस्त करने के लिए राजनीति ही करनी पड़ेगी। ऐसी सरकारें लानी होंगी जो न्यायाक दायित्वों के प्रति सजग हों और जनता को न्याय उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त संख्या में न्यायालय स्थापित करे।

केवल विवाह समाप्त करने के लिए किया गया धर्म परिवर्तन वैध नहीं। फिर उस से पत्नी को विवाह विच्छेद का अधिकार प्राप्त होता है आप को नहीं। हमें लगता है आप के बीच तालमेल की समस्या है। बेहतर तो यह है कि इस समस्या से निपटने के लिए किसी काउंसलर की मदद प्राप्त करनी चाहिए।

अन्तिम प्रतिवेदनों को स्वीकृत होने में देरी क्यों होती है?

May 6, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_supreme-court-of-india4.jpgसमस्या-

योगेश सोलंकी ने पाली, राजस्थान से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

म दो भाई है अपने स्व:माताजी-पिताजी के निधन के बाद से ही अपने पिताजी द्वारा बनाये मकान में रहते है। बड़े भाई का ज्येष्ठ पुत्र प्रेम विवाह कर हम सभी से सबंध समाप्त कर उदयपुर में रहता है। उसकी पत्नी ने मई 2014 मे महिला थाना पाली में धारा 498 अ,313,323,344 व 366 मे झूठी एफआईआर में घर के सभी सदस्यों को नामजद करवा दिया। पुलिस अनुसंधान में उनकी रिपोर्ट झूठी पाए जाने पर हमारे हक मे F.R. देकर मामला माननीय जे.एम.न्यायालय मे अक्टूबर 14 पेश कर दिया गया। जिस पर रिपोर्टकर्ता को नोटिस तामील करवा तारीख पेशी पर हाजिर होने को सूचित भी कर दिया गया। तब से आज तक 5 पेशी पड़ गयी पर वह हाजिर नहीं हुए। उनके बार बार नही आने पर न्यायालय उन्हें अधिकतम कितने अवसर दे सकता है। अगर वह फिर भी नहीं आते हैं तो न्यायालय अपना फैसला कब सुनायेगा? क्या हम जल्दी निर्णय हेतु कहीं आवेदन कर सकते हैं? निर्णय हमारे हित में होने पर परिवादी को अगली अदालत में जाने के लिये कितना समय मिलेगा? निर्णय के बाद हम मानहानि का मुकदमा और झूठे पुलिस केस का मुकदमा कर सकते हैं क्या?

समाधान –

प के इस मामले में पुलिस द्वारा प्रस्तुत किए गए अन्तिम प्रतिवेदन पर न्यायालय अपना निर्णय दे कर उसे स्वीकार या अस्वीकार नहीं कर रहा है और आप को बार बार पेशी पर जा कर ध्यान रखना पड़ रहा है, यही आप की मूल परेशानी है।

प को लग रहा है कि शिकायत कर्ता को तामील हो जाने के बाद भी अदालत उसे उपस्थित होने का अवसर क्यों दिए जा रही है। पर ऐसा नहीं है। वास्तविकता यह है कि हमारे यहाँ अदालतों की संख्या जरूरत की एक चौथाई से भी कम है। जनसंक्या के अनुपात में भारत में जजों की संख्या अमरीका के मुकाबले 10 प्रतिशत, ब्रिटेन के मुकाबले 20 प्रतिशत और चीन के मुकाबले 5 प्रतिशत ही है। यही कारण है कि हमारी अदालतों के पास मुकदमों की भरमार है। हर अदालत के पास उस की अपनी क्षमता से तीन-चार गुना मुकदमे और काम होता है। अदालत के पीठासीन अधिकारी मजिस्ट्रेट के ऊपर यह भी दबाव रहता है कि वह कोटे से कम से कम दुगना काम कर के दे। इस कारण पीठासीन अधिकारी का सारा ध्यान अपने कोटे से दुगना या अधिक काम करने का दबाव रहता है।

स तरह के अन्तिम प्रतिवेदनों पर आदेश पारित करने का काम आम तौर पर सब से अन्तिम वरीयता का कार्य होता है। जब तक उन की पत्रावलियाँ सामने आती हैं तब तक अदालत का समय समाप्त हो जाता है।

स तरह के मामले पुलिस द्वारा अदालत के समक्ष प्रस्तुत किए जाते हैं। पुलिस की तो हिम्मत ही नहीं होती कि अदालत से उन में आदेश पारित करने को कहे। परिवादी की ओर से कोई उपस्थित नहीं हो रहा है। और आप को पुलिस ने अभियुक्त बनाया ही नहीं है इस कारण से आप भी उपस्थित हो कर अदालत को निवेदन नहीं कर सकते। इस तरह के मामलों में जब तक अदालत प्रसंज्ञान न ले ले तब तक संभावित अभियुक्त को सुनवाई का अधिकार नहीं होता। यही कारण है कि इस तरह के मामलों में देरी होती रहती है, कोई समय सीमा नहीं है। जब तक उच्च न्यायालय इस तरह के मामलों में यह तय न कर दे कि अंतिम प्रतिवेदनों के मामले में परिवादी को तामील होने के बाद की पहली तारीख से एक निश्चित अवधि में मसलन तीन माह में आदेश पारित किया जाना अनिवार्य न कर दिया जाए तब तक यह स्थिति बनी रहेगी।

ब आप को समझ आ गया होगा कि न्यायालय परिवादी को समय और अवसर नहीं दे रहा है। बल्कि अपने कार्याधिक्य के कारण उस मामले में आदेश पारित नहीं कर रहा है। यदि आप कर सकें तो इतना करें कि न्यायालय को मौखिक रूप से निवेदन करें कि इस मामले में अंतिम प्रतिवेदन पर आदेश पारित कर दिया जाए तो भी काम चल जाएगा।

स तरह के मामले में यदि अंतिम प्रतिवेदन स्वीकार कर लिया जाता है तो आप को कुछ नहीं करना है। परिवादी को यदि उस आदेश से कोई आपत्ति हुई तो वह आदेश की तिथि से 90 दिनों में सेशन न्यायालय को निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकता है। यदि आप के विरुद्ध प्रसंज्ञान लिया जाता है तो आप को सम्मन जारी होंगे। आप को उक्त मामले का सम्मन मिलने से 90 दिनों की अवधि में आप उस आदेश के विरुद्ध सेशन न्यायालय को निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। जब अन्तिम प्रतिवेदन स्वीकार हो जाए तब आप अन्तिम प्रतिवेदन व न्यायालय के आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपियों के साथ दुर्भावना पूर्ण अभियोजन के लिए अपराधिक और दीवानी मुकदमे परिवादी के विरुद्ध संस्थित कर सकते हैं। ध्यान रखें। अन्तिम प्रतिवेदन और संलग्न दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ अभी प्राप्त कर लें और न्यायालय के आदेश की प्रतिलिपि भी जल्दी प्राप्त करें। अन्तिम प्रतिवेदन स्वीकार कर लेने के साथ ही पत्रावली वापस पुलिस को लौटा दी जाती है, बाद में अन्तिम प्रतिवेदन की प्रतियाँ प्राप्त करने में परेशानी हो सकती है।

कानूनी सलाहसमस्या-

हितेश ने कैलाशपुरी, राजसमन्द, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

ग्राम पंचायत कैलाशपुरी द्वारा 1995 में सरपंच साहब ने मेरी माताजी के नाम का निशुल्क पट्टा दिया उसका रेकॉर्ड है या नहीं हमें पता नहीं है। हम ने निर्माण कराने के लिए पत्थर डलवाए थे और 1-2 ट्रेक्टर पत्थर पहले से पड़े थे जो 15-20 साल पहले से पड़े थे। हमारे पड़ौस में कब्ज़ा करने के लिए पत्थर किसी ने डलवाए तो किसी की शिकायत पर ग्राम पंचायत ने एक आम सूचना चस्पा की कि ये पत्थर और अन्य सामग्री 3 दिन में उठा ली जाए तो हम ने पत्थर पंचायत नहीं ले जाए इसलिए मालिकाना हक की सूचना ग्राम पंचायत को 3 दिन मे दे दी जो पोस्ट द्वारा भेजी गई ओर उन्हें मिल गई। सूचना सरपंच और सचिव दोनों को भेजी गई थी। तब पंचायत 6 दिन बाद मेरे पत्थर नहीं ले गई। पंचायत द्वारा न तो हमारी सूचना पर हम से पट्टा मांगा गया और न ही पत्थर लेजा ने के बारे में सूचित किया गया। पंचायत की कार्यवाही के दौरान पट्टा बताया तो उसे जाली कह कर पत्थर ले गए। तो आप से अनुरोध है कि मुझे बताएँ कि हम अपने पत्थर और ज़मीन दोनों प्राप्त करने के लिए क्या उन लोगों पर क्रिमिनल ओर सिविल कार्यवाही दोनों एक साथ की जा सकती है। पट्टा निशुल्क वाला है यह 1995 में ग्राम पंचायत ने मेरी माताजी के नाम का दिया था जो निरस्त नहीं किया गया और न ही उस ज़मीन पर 15-20 साल से किसी ने आपत्ति की है। ना ही इस पंचायत द्वारा निरस्त किया गया है। सरपंच ओर अन्य सभी प्रभावशाली लोग हैं तो आप बताएँ कि हम इस मुसीबत से कैसे निपटें?

समाधान-

प की माँ के पास पट्टा है जो इस बात का सबूत है कि आप की माताजी को उस भूखंड पर पट्टे के अन्तर्गत स्वामित्व प्राप्त है। इस के बाद भी पंचायत ने पत्थर उठाए हैं तो आप को पंचायत के समक्ष पत्थर लौटाए जाने के लिए आवेदन देना चाहिए। यदि यह आवेदन निरस्त हो जाता है तो आप जिला कलेक्टर के समक्ष उस की अपील प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि ग्राम पंचायत ने बिना कोई कागजी कार्यवाही किए पत्थर उठाए हैं तो आप अपराधिक मुकदमा कर सकते हैं। लेकिन यदि पंचायत की यह कार्यवाही रिकार्डेड है तो आप को दीवानी और प्रशासनिक उपाय ही करने होंगे।

प को तुरन्त दीवानी न्यायालय में पट्टे के आधार पर घोषणा का वाद दाखिल करना चाहिए तथा इस बात के लिए निषेधाज्ञा प्राप्त करने की प्रार्थना करनी चाहिए कि आप वैध रूप से प्लाट पर काबिज हैं, पट्टे से स्वामित्व प्राप्त है, आप के कब्जे और स्वामित्व में ग्राम पंचायत दखल न दे, नियमानुसार भूखंड पर निर्माण करने की अनुमति प्रदान करते हुए आप को निर्माण करने दे।

प को इसी वाद के साथ अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर तुरन्त अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करनी चाहिए कि ग्राम पंचायत आप के पत्थर लौटाए और आप के कब्जे में दखल नहीं करे तथा नियमानुसार भूखंड पर निर्माण करने की अनुमति प्रदान करते हुए आप को निर्माण करने दे।

Raj-Boardsसमस्या-

साँकरणा, तहसील अहोर, जिला जालोर, राजस्थान से श्रवण कुमार ने पूछा है –

मेरा नाम श्रवण कुमार है लेकिन मेरी दसवीं की अंक तालिका में मेरा नाम सरवण कुमार (Saravan Kumar) छपा है जो गलत है। मैं इसे सही करवाना चाहता हूँ क्या यह संभव है? यदि संभव है तो कैसे किया जा सकता है?

समाधान-

प ने दसवीं कक्षा की परीक्षा माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान अजमेर से पास की है। यदि आप की अंक तालिका या प्रमाण पत्र में किसी तरह की कोई गलती हो गई हो तो उसे वह प्रलेख जारी किए जाने की तिथि से दो वर्ष की अवधि में ठीक करवाया जा सकता है। आप के नाम में तो वर्तनी की अशुद्धि हुई है। इस अशुद्धि को शुद्ध कराने के लिए तो कोई समय सीमा भी निर्धारित नहीं है, इसे कभी भी शुद्ध कराया जा सकता है।

प को अपनी अकंतालिका में अशुद्धि को ठीक कराने के लिए उस स्कूल में संपर्क करना चाहिए जिस से आप ने परीक्षा दी थी और परीक्षा का आवेदन पत्र प्रस्तुत किया था। आप वहाँ आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि स्कूल आप की मदद करने से इन्कार करे तो आप सीधे माध्यमिक शिक्षा बोर्ड राजस्थान अजमेर को आवेदन प्रस्तुत कर अपनी अंकतालिका में नाम में हुई वर्तनी की अशुद्धि को ठीक करवा सकते हैं।

उच्च न्यायालय में हिन्दी में रिट व अन्य याचिकाएँ …

August 31, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
jabalpur highcourtसमस्या-

चुरहट, मध्यप्रदेश से पूनम सिंह ने पूछा है-

क्या उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका या अन्य कोई आवेदन हिन्दी भाषा में प्रस्तुत किया जा सकता है? क्या याचिका को पोस्ट के माध्यम से भेजने पर स्वीकृत हो सकता है।

समाधान-

देश के कुछ राज्यों के उच्च न्यायालयों में हिन्दी में रिट याचिका या अन्य किसी भी प्रकार की याचिका प्रस्तुत की जा सकती है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार राज्यों के उच्च न्यायालयों में हिन्दी में कार्य होता है। उत्तराखंड, छत्तीसगढ़, और झारखंड राज्य भी इन्हीं राज्यों से पृथक हुए हैं इस कारण इन राज्यों के उच्च न्यायालय भी हिन्दी में कार्य होना चाहिए।  आप मध्यप्रदेश से हैं। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में हिन्दी में कार्य होता है वहाँ रिट याचिका या अन्य कोई भी कार्यवाही हिन्दी में संस्थित की जा सकती है।

न्यायालय में संस्थित प्रत्येक मामले में कम से कम दो पक्ष होते हैं और न्यायालय दोनों ही पक्षों को सुन कर अपना निर्णय प्रदान करता है। सुनवाई में दोनों पक्षों का उपस्थित होना अनिवार्य है। इस कारण कोई भी प्रकरण व्यक्तिगत रूप से ही न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इस से पक्षकार को यह भी ज्ञान रहता है कि उस के द्वारा प्रस्तुत या उस के विरुद्ध प्रस्तुत प्रकरण में क्या कार्यवाही हो रही है। इस कारण डाक से याचिका प्रस्तुत करने का अभी तक कोई प्रावधान नहीं है। हालाँ कि सर्वोच्च न्यायालय में ई-फाइलिंग सुविधा अवश्य प्रदान की गई है।

डाक से भेजी गई याचिका या पत्र के किसी महत्वपूर्ण जनहित से संबद्ध होने पर को याचिका के रूप में स्वीकार करने की शक्ति सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालय को है लेकिन यह न्यायालय की इच्छा है कि वे उसे याचिका के रूप में स्वीकार करें या न करें। इस कारण यदि आप किसी मामले को उच्च न्यायालय के समक्ष ले ही जाना चाहते हैं तो आप को स्वयं ही उपस्थित हो कर, यहाँ तक कि किसी सक्षम वकील के माध्यम से ही उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।

लोक अदालत में मुकदमा कैसे लगवाएँ?

August 12, 2013 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
लोक अदालत 1समस्या-

मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश से अफसर अली ने पूछा है –

मारा मुकदमा धारा- निल/२०१२. ६६/६६ग है जिसकी अदालत मैं ३ तारीखें पडं चुकी हैं। हम दोनों पक्ष आपस में रजामंद हैं।  हम यह मुकदमा अदालत से बिल्‍कुल खत्‍म कराना चाहते हैं। लोक अदालत में यह मुकदमा कैसे जायेगा जिस से यह मुकदमा खत्‍म हो जाए। हमारी लोक अदालत मुरादाबाद जिले मे कहाँ लगती है? मुकदमा किस तरह से जायेगा? यह मुकदमा लोक अदालत में हाथों हाथ खत्‍म हो सकता है या नहीं, जबकि दोनो पक्ष आपस में सहमत है?

समाधान –

भी जिला मुख्यालयों पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण स्थापित किया गया है, इस के अध्यक्ष जिला न्यायाधीश होते हैं। इसी में एक स्थाई लोक अदालत लगाई गई है जो कम से कम सप्ताह में दो दिन अवश्य लगती है। लेकिन इस का कार्यालय साप्ताहिक अवकाश व राजकीय अवकाश के दिनों को छोड़ कर प्रतिदिन खुलता है। इस के अतिरिक्त प्रत्येक अदालत भी माह में कम से कम एक दिन लोक अदालत लगाती है जिस में निर्णय कराने के लिए किसी भी दिन आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।

प को लोक अदालत में मुकदमे का निर्णय कराने के लिए कहीं भी जाने की आवश्यकता नहीं है आप का मुकदमा जिस न्यायालय में चल रहा है उसी अदालत में मुकदमे की पेशी के दिन या किसी भी दिन आप आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। यह आवेदन दोनों सहमत पक्षों द्वारा न्यायालय में प्रस्ततु किया जाए जिस में अंकित किया जाए कि आप दोनों सहमत हैं और लोक अदालत की भावना से उक्त प्रकरण में निर्णय कराना चाहते हैं। आप के आवेदन पर न्यायालय उसी दिन जिस दिन आप ने आवेदन प्रस्तुत किया है मुकदमे का निर्णय कर सकता है अथवा अगली लगने वाली लोक अदालत में मुकदमे को निर्णय के लिए रख सकता है।

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