Welfare Archive

समस्या-

कौशल पटेल ने ग़ाजियाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मैं कौशल पटेल उम्र 36 वर्ष गाजियाबाद (उ0प्र0) में निवास करता हूँ। मेरी शादी सन् 2008 में हुई थी। मेरी आर्थिक स्थिति के चलते मेरी पूर्व पत्नी ने मुझसे तलाक ले लिया था। मेरा तलाक सन् 2014 में मेरठ (उ0प्र0) न्यायालय में हुआ था। तलाक के बाद धारा 125 में खर्चे के मुकदमें का भी फैसला भी 2014 में ही हो गया था। जिसके बाद कोर्ट के आदेश पर प्रति माह मुझे अपनी पूर्व पत्नी को रूप्यै 3500/- का भुगतान करना पड़ता है। जो मैं कोर्ट में जमा करवाता हूँ। भुगतान में 2000/-रूपये मेरी पत्नी का और 1500/-रूपये मेरी बेटी का होता है। मेरी बेटी जो कि अब 7 वर्ष की है जो की मेरी पूर्व पत्नी के साथ ही है। चूंकि मैं अपने बुजुर्ग माता-पिता के साथ रहता हूँ। मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। अभी मुझे मालूम हुआ है कि मेरी पूर्व पत्नी डिग्री काॅलेज में प्राईवेट लेक्चरार हो गई है। सैलरी का मुझे नहीं पता कि कितनी मिलती है लेकिन प्राईवेट लेक्चरार को भी लगभग 20-25 हजार की सैलरी मिलती है। मैं यह जानना चाहता हूँ कि क्या मेरी पूर्व पत्नी नौकरी करते समय भी मुझसे खर्चा लेने की अधिकारी है? क्या मुझे न्यायालय से कोई समाधान मिल सकता है? जिससे मुझे खर्चा ना देना पड़े क्यूंकि मेरी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। कृपया उचित समाधान बतायें।


समाधान-

कौशल जी, आप को न्यायालय के समक्ष दो तथ्य प्रमाणित करने होंगे। पहला यह कि आप की आय नहीं है या बहुत कम है। दूसरा यह कि आप की पत्नी वास्तव में 20-22 हजार रुपया कमाने लगी है। आप इन्हें प्रमाणित करने के लिए सबूत जुटाइए। केवल आप के कहने मात्र से अदालत ये दोनों तथ्य साबित नहीं मानेगी।

यदि आप पर्याप्त सबूत जुटा लेते हैं और उक्त दोनों तथ्यों को साबित करने में सफल हो सकते हों तो धारा 127 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत अपना आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और पूर्व में जो आदेश धारा 125 के अंतर्गत दिया गया है उसे संशोधित किया जा सकता है।

यदि वास्तव में आप की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है और आप इस तथ्य को प्रमाणित कर देते हैं तो पत्नी को दी जाने वाली मासिक भरण पोषण राशि बन्द की जा सकती है। लेकिन बेटी के लिए दी जाने वाली राशि कम होने की बिलकुल सम्भावना नहीं है।

 

माता-पिता व वृद्धों के भरण पोषण का कानून

August 3, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

hinduwidowसमस्या-

शीला देवी ने जबलपुर म.प्र. से पूछा है-

मेरी बेटी और दामाद मेरे मकान में कब्जा कर के बैठ गये हैं। ना तो किराया देते हैं ना मकान खाली करते हैं। जब कि मकान मेरे नाम पे है। मेरे पति का देहान्त 1986 में हो गया था। किराए से ही गुजारा चलता था। वो भी ये लोगों ने बन्द कर दिया। मेरा बेटा हैदराबाद में रहता है।

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप के बेटी दामाद ने किस तरह आप के मकान में कब्जा किया है? क्या वे किराएदार के बतौर मकान में रहे थे? क्या उन का किरायानामा लिखा गया था। क्या उन्हों ने कभी किराया दिया और आप ने रसीद दी, क्या किसी रसीद पर आप की बेटी या दामाद के हस्ताक्षर हैं? इन तथ्यों के बिना सही उपाय बताया जाना संभव नहीं है। यदि आप दस्तावेजी रूप से यह साबित करने में सक्षम हों कि वे किराएदार की हैसियत से वहाँ निवास कर रहे थे तो आप न्यायालय में उन के विरुद्ध बकाया किराया और बेदखली के लिए वाद प्रस्तुत कर सकती हैं।

यदि ऐसा नहीं है तो आप माता पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण अधिनियम 2007 तथा उस के अंतर्गत बने मध्यप्रदेश के नियम 2009 के अन्तर्गत अपनी बेटी-दामाद तथा पुत्र के विरुद्ध भरण पोषण के लिए आवेदन इस अधिनियम के अन्तर्गत स्थापित अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप जिला न्यायालय परिसर में स्थापित विधिक सहायता केन्द्र में स्थापित कानूनी समस्या क्लिनिक से भी सहायता प्राप्त कर सकती हैं।

समस्या-motor accident

सूरज कुमार ने मंडावा, जिला झुंझुनूं से पूछा है-

मेरे रिश्तेदार की अज्ञात वाहन से पिलानी में दुर्घटन हो कर मौके पर मृत्‍यु हो गई क्‍या ऐसी स्थिति में क्‍लेम मिल सकता है?

 

 

समाधान-

किसी भी अज्ञात वाहन से होने वाली दुर्घटना में मारे जाने वाले व्यक्ति के आश्रितों व गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को सहायता प्रदान करने के लिए मोटर वाहन अधिनियम 1988 के अन्तर्गत सोलेशियम फंड की व्यवस्था की गयी है। इस अधिनियम की धारा 161 से 163 तक में इस फंड की स्थापना और इस के अंतर्गत मुआवजा देने के उपबंध किए गए हैं। इस योजना के अंतर्गत मृतक के आश्रितों को 25 हजार रुपये तथा गम्भीर रूप से घायल व्यक्ति को 12,500 रुपये की क्षतिपूर्ति देने की व्यवस्था की गयी है।

यह मुआवजा प्राप्त करने के लिए प्रत्येक जिले के कलेक्टर के कार्यालय में व्यवस्था है। वहाँ इस के लिए आवेदन प्राप्त किए जाते हैं। आवेदन के साथ प्रथम सूचना रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, चोट प्रतिवेदन, मर्ग सूचना, पंचनामा आदि दस्तावेजों की जरूरत होती है। सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन करने पर मुआवजा प्राप्त हो सकता है।

private schoolसमस्या-

रूपबास, भरतपुर, राजस्थान के एक किशोर भुवनेश्वर शर्मा ने तीसरा खंबा को समस्याएँ भेजी हैं-

1- हम एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ रहे हैं सभी बच्चे कक्षा टेंथ में पढ़ते है। हमारे यहां पर सामाजिक का कोई टीचर नहीं है क्या यह बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है या नहीं? कक्षा 10 राजस्थान बोर्ड की बोर्ड क्लास है, बच्चे सामाजिक में फेल भी हो सकते है। वहां पर सामाजिक विज्ञान पढ़ाने वाला कोई टीचर नहीं है, प्रधानाध्यापक से कहते हैं तो कहती हैं कोई बुराई नहीं, इस टीचर से सामाजिक विज्ञान पढ़ने में। इस के लिए कहां शिकायत करनी चाहिए?

2- एक व्यक्ति ऑफिस में लिपिक के पद पर कार्यरत है उसे उस की जाति से जाना जाएगा अथवा नाम से?

3- एक मास्टर है जो बच्चों के चूतड़ पर डंडा मारता है उस पर कोई कार्यवाही हो सकती है?

4- मिनरल वाटर का पानी खराब आने की सूचना हम कहां दे वाटर प्लांट सरकारी है?

5- हमने एक दुकानदार से एक नया सिम कार्ड खरीदा अब उसी पहचान पत्र की फोटो कॉपी करवाकर दुकानदार ने हमारे आईडी कार्ड और फोटो से अन्य सिम खरीद रखी है। उस के लिए क्या करना चाहिए? हमें कहां दावा पेश करना चाहिए?

6- हमने दुकानदार से नया मोबाइल खरीदा था। अब मोबाइल खराब हो गया है और वह गारंटी में है। वह दुकानदार उस मोबाइल को सर्विस सेंटर पर नहीं ले जा रहा है इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

7- हमने दुकानदार से एशियन पेण्ट  की पांच किलो की बाल्टी खरीदी अब उस बाल्टी में ऊपर पानी निकल आया है, इसके लिए हमें क्या करना चाहिए?

8- मेरे दादा जी ने एक व्यक्ति के गाल पर थप्पड़ मार दिया था वह जाति से जाट है क्या वह हम पर दावा कर सकता है?

समाधान-

कुछ दिन पहले इस किशोर ने तीसरा खंबा के ई-मेंल बाक्स में प्रश्नों की लाइन लगा दी और उसे भर दिया। हम इस किशोर की अपनी, अपने साथियों, परिवार और समाज की चिन्ता करने की प्रवृत्ति की सराहना करते हैं। अपनी समस्याओं के समाधान खुद खोजने की प्रवृत्ति एक अच्छा गुण है। आगे चल कर यह प्रवृत्ति इस किशोर में नेतृत्वकारी गुण पैदा कर सकती है। लेकिन इस उम्र में जब कि वह दसवीं कक्षा का विद्यार्थी है उसे इन चिन्ताओं से मुक्त होना चाहिए। उसे ये चिन्ताएँ अपने अभिभावकों को बतानी चाहिए और स्वयं इन चिन्ताओं से मुक्त हो जाना चाहिए। अभिभावकों को चाहिए कि वे इन चिन्ताओं को दूर करने के लिए प्रयास करें। किशोरों का काम है कि वे अपने अध्ययन पर अधिक ध्यान दें। पहले ही उन के स्कूल में सामाजिक विज्ञान का शिक्षक नहीं है। इस समस्या को बच्चो ने अपनी प्रथानाध्यापिका को बताया लेकिन लगता है इस समस्या का हल उन के पास नहीं है। उन्हों ने एक अन्य विषय के अध्यापक को सामाजिक विज्ञान पढाने के लिए लगाया है लेकिन लगता है वह ठीक से बच्चों को पढ़ा नहीं पा रहा है। जिस से बच्चों को कष्ट हो रहा है। यह बात प्रधानाध्यापिका को समझनी चाहिए और स्कूल में उपलब्ध ऐसे अध्यापक को सामाजिक विज्ञान पढाने के लिए लगा देना चाहिए जो बच्चों को संतुष्ट कर सके। यदि यह भी संभव नहीं हो तो यह काम खुद प्रधानाध्याप्क को करना चाहिए।

1- राजस्थान में शिक्षकों की बहुत कमी है। सरकार नए शिक्षक भर्ती नहीं रही है। उस के स्थान पर उस ने सैंकड़ों विद्यालयों को बन्द कर के उन्हें समामेलित कर दिया है। इस से बच्चों को दूर दूर स्कूलों में जाना पड़ रहा है। फिर भी समस्या का अन्त नहीं हुआ है। इस से स्पष्ट है कि राज्य का धन बचाने का जो जुगाड़ सरकार ने निकाला था वह ठीक नहीं था। बच्चों के अध्ययन का पैसा बचा कर आप कैसा भारत बनाना चाहते हैं? ऐसा भारत या तो अशिक्षित होगा या फिर अर्ध शिक्षित, न घर का न घाट का।

स समस्या का कानूनी हल यह है कि बच्चे राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को जो कि जोधपुर में बैठते हैं एक पत्र लिख कर स्कूल के अधिक से अधिक बच्चों के हस्ताक्षर करवा कर भेजें और उन से प्रार्थना करें कि वे राज्य सरकार के शिक्षा विभाग को रिट जारी कर यह निर्देश दें कि बच्चों की इस कमी को पूरा किया जाए। यदि स्कूल सरकारी न हो कर प्राइवेट है तो सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। क्यों कि यह सरकार का कर्तव्य है कि उस के राज्य में ऐसा निजी स्कूल संचालित न हो जिस में विषयों को ठीक से पढ़ाने वाले अध्यापक ही न हों।

2- किशोर ने दूसरी समस्या लिखी है कि कोई व्यक्ति अपने नाम से जाना जाएगा या उस की जाति से? हालांकि हमारे संविधान ने अनुसूचित जातियों, जनजातियों और पिछड़ी जातियों को आरक्षण का अधिकार दिया है। लेकिन यह अधिकार उन्हें समाज की मुख्य धारा में लाने के लिए दिया है, इस लिए नहीं कि यह उन की पहचान बन जाए। सही बात तो यह है कि किसी भी व्यक्ति को उस की जाति से नहीं पहचाना जाना चाहिए। उसे उस के नाम से ही पहचाना जाना चाहिए। लेकिन यह सब बातें समाज के समक्ष धरी की धरी रह जाती हैं। समाज में एक व्यक्ति अन्ततः अपने काम से पहचाना जाता है। भले ही लोगों को यह पता हो कि गांधी, नेहरू, अम्बेडकर, भगतसिंह आदि की जाति क्या है। लेकिन वे अपनी अपनी जातियों से नहीं अपितु अपने अपने कामों से जाने जाते हैं। इस कारण दीर्घकाल तक लोग केवल उन के काम से पहचाने जाते हैं।

3- अध्यापक का काम बच्चो को शिक्षा प्रदान करना है। उन्हें दंडित करना नहीं। किसी भी स्थिति में किसी भी विद्यार्थी को शारीरिक या आर्धिक रूप से दंडित नहीं किया जाना चाहिए। यदि शिक्षक की उचित बात को बच्चे नहीं मानते हैं तो कमी शिक्षक में है, बच्चो में नहीं। यह शिक्षक का कर्तव्य है कि वह ऐसे तरीकों की खोज करे जिस से बच्चों को उचित शिक्षा प्रदान की जा सके। ऐसे शिक्षक की शिकायत बच्चों को अपने अभिभावकों से करनी चाहिए। अभिभावक इस मामले में स्कूल के प्रधानाध्यापक से और जिला शिक्षाधिकारी से शिकायत कर सकते हैं। यदि समस्या का समाधान फिर भी न हो तो अभिभावक सीधे पुलिस या न्यायालय में परिवाद संस्थित कर सकते हैं।

4- मिनरल वाटर खराब आने की शिकायत भी किशोरों को अपने अभिभावकों से करनी चाहिए। इस मामले में अभिभावक अपने इलाके के खाद्य विभाग के निरीक्षक और अधिकारी को लिखित में शिकायत कर सकते हैं। यह उस का दायित्व है कि वह उचित कार्यवाही करे। यदि वह कार्यवाही नहीं करता है तो जिला कलेक्टर को शिकायत लिखी जा सकती है और मिनरल वाटर खरीदने वाला व्यक्ति उपभोक्ता न्यायालय में भी परिवाद प्रस्तुत कर सकता है।

5-किशोर कोई सिम कार्ड नहीं खरीद सकता। सिम कार्ड अवश्य ही किसी वयस्क ने खरीदा होगा। उस वयस्क को चाहिए कि वह इस की शिकायत पुलिस को करे। किसी व्यक्ति की आई डी से स्वयं कोई सिम खरीद लेना अत्यन्त गंभीर अपराध है। लेकिन शिकायत करने के पहले यह शिकायतकर्ता को चाहिए कि वह जाँच ले कि ऐसी गलत सिम का फोन नं. क्या है?

6-मोबाइल खराब हो जाने पर उपभोक्ता को सीधे सर्विस सेन्टर जाना चाहिए जो मोबाइल बनाने वाली कंपनी का होता है। इस मामले में दुकानदार की कोई जिम्मेदारी नहीं होती। वह मोबाइल को सर्विस सेन्टर नहीं ले जाएगा।

7-एशियन पेंट्स खऱाब निकलने पर दुकानदार से बदल कर नया डब्बा देने का आग्रह करना चाहिए। यदि वह सुनवाई न करे तो दुकानदार और कंपनी के विरुद्ध उपभोक्ता न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

8- आप के दादा जी ने किसी व्यक्ति को थप्पड़ मार दिया था तो उस के परिणाम की चिन्ता भी दादा जी को करनी चाहिए, उन के पोते को नहीं। पोते को सिर्फ उस की पढ़ाई करनी चाहिए। थप्पड़ खाया हुआ व्यक्ति चाहे तो न्यायालय में परिवाद कर सकता है और अपमान के लिए क्षतिपूर्ति चाहने के लिए दीवानी वाद भी कर सकता है। लेकिन पुलिस इस मामले में कार्यवाही नहीं कर सकती। थप्पड़ खाने वाला जाट होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यदि वह व्यक्ति किसी अनुसूचित जाति या जनजाति का होता तो पुलिस इस मामले में कार्यवाही कर सकती थी। जिस में दादा जी को गिरफ्तार किया जा सकता था। हाँ, आप दादाजी को समझा सकते हैं कि लोगों के साथ मारपीट करने और उन्हें गालियों से नवाजने का जमाना कब का समाप्त हो चुका। अब हर एक को सभ्यता से एक इन्सान की तरह पेश आना चाहिए। समाज में औरों से सभ्यता से पेश आने वालों का ही सम्मान होता है।

बाल श्रम और उस का प्रतिषेध !

November 14, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

भारत में बच्चों के अधिकारों के बारे में चर्चा बहुत होती है लेकिन उन के बारे में सही जानकारी का भी अत्यन्त अभाव है। भारत में बाल-श्रम के प्रतिषेध के लिए  बाल श्रम ( प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 प्रभावी है। बाल दिवस के अवसर पर हम यहाँ इस अधिनियम के सामान्य प्रावधान यहाँ पाठकों की जानकारी के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं-

बाल श्रम ( प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 
इस अधिनियम का उद्देश्य समूचे बाल श्रम का उन्मूलन करना नहीं है, यह केवल कुछ प्रक्रियाओं एवं व्यवसायों में बाल श्रम के नियोजन को निषिद्ध करता है, जहां नियोजन निषिद्ध नही है, वहां बाल श्रमिकों की सेवा दशाओं को विनियमित करता है, 14 वर्ष की उम्र तक के बालकों को शिक्षा ग्रहण करने की सुविधा सुनिश्चित करने के लिए प्रावधान करता है और उनकी कोमल अवस्था के विपरीत उनसे कठिन कार्य लेने पर रोक लगाता है तथा विभिन्न श्रम कानूनों में बालक (चाइल्ड) की परिभाषा को एक रूप देता है। इन्हीं उद्देश्यों से इस अधिनियम को विनिर्मित किया जाना इस अधिनियम में कहा गया है।

बाल श्रमिक की परिभाषा    
ऐसे श्रमिक जिन्होंने अपनी आयु के 14 वर्ष पूर्ण न किये हों इस अधिनियम की धारा -2 (II) के अन्तर्गत इस अधिनियम द्वारा “बालक” के रूप में परिभाषित किए गए हैं।

बाल श्रम पूर्ण रूप से निषेध 
अधिनियम की धारा-3 के अधीन भाग (अ) मे उल्लिखित व्यवसायों तथा भाग (ब) में उल्लिखित प्रक्रियाओं को खतरनाक घोषित करते हुये बाल श्रम नियोजित किया जाना पूर्ण रूप से निषिद्ध किया गया है। कारखाना अधिनियम, 1948 की धारा-67, माइन्स एक्ट, 1952 की धारा-40, मर्चेन्ट शिपिंग एक्ट, 1958 की धारा-109 तथा मोटर ट्रान्सपोर्ट वर्क्स एक्ट, 1961 की धारा-21 की व्यवस्था के अनुसार इन उद्योगों  में चाहे वे खतरनाक अथवा गैर खतरनाक प्रकृति के हों इस अधिनियम द्वारा बाल श्रम पूर्ण रूप से निषिद्ध किया गया है।

बाल श्रम नियोजन का नियमन    
धारा-6 से 11- धारा-3 में उल्लिखित अनुसूची से भिन्न गैर खतरनाक अधिष्ठानों में बालकों को नियोजित किया जा सकता है।

बाल श्रमिक नियोजन की शर्तें    
बाल श्रमिकों को जहाँ नियोजित किया जा सकता है वहाँ उन्हें केवल निम्न की शर्तों के साथ ही नियोजित किया जा सकता है-

  • बाल श्रमिक से किसी भी दिन लगातार 3 घन्टे से अधिक कार्य नहीं लिया जा सकता है। तीन घंटे काम लेने के उपरांत या उस से पहले बालक को न्यूनतम एक घंटे का विश्राम काल देना आवश्यक  है।
  • बाल श्रमिक के कार्य के घन्टे विश्राम काल ( न्यूनतम एक घन्टा ) को सम्मिलित करते हुए छह घन्टे से अधिक नहीं हो सकते। अर्थात उन से दिन में पाँच घंटे से अधिक काम नहीं लिया जा सकता। इस में वह समय भी सम्मिलित है जिस समय उसे काम देने के लिए प्रतीक्षा कराई जाती है।
  • बाल श्रमिक को सप्ताह में एक दिन अवकाश दिया जाना अनिवार्य किया गया है।
  • सांय 07 बजे से प्रातः 08 बजे के मध्य बाल श्रमिक से कार्य नहीं लिया जा सकता है।
  • बाल श्रमिक से ओवरटाईम कार्य नहीं लिया जा सकता है।
  • गैर खतरनाक नियोजन में काम करने वाले बाल श्रमिक के नियोजक द्वारा उसे अपने खर्चे पर 2 घन्टे प्रतिदिन शिक्षा का लाभ दिलाया जाना आवश्यक कर दिया गया है।

अभिलेख    
प्रत्येक नियोजक को बाल श्रमिक का उपस्थित रजिस्टर पृथक से रखना अनिवार्य है, जिसमें वह उसका नाम, जन्मतिथि, कार्य का प्रकार, कार्य के घण्टे, अवकाश का समय आदि रखेगा।

बाल श्रम नियोजित करने हेतु नोटिस
नियोजक यदि बाल श्रमिक नियोजित करता है तो बाल श्रमिक के पू
र्ण विवरण की सूचना क्षेत्र के निरीक्षक को पूर्ण विवरण सहित 30 दिन के अन्दर प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया गया है।

दण्ड 
इस अधिनियम की धारा-14 एवं 15 में निषिद्ध नियोजन सम्बन्धी प्रावधान का उल्लंघन करने वाले नियोजक को प्रथम अपराध पर न्यूनतम तीन माह की कैद जो एक वर्ष तक भी हो सकती है या दस हजार रूपये अर्थदण्ड जो बीस हजार रूपये तक भी हो सकता है अथवा दोनो दण्डों से दण्डित किया जा सकता है। अधिनियम के अन्य किसी प्रावधान का उल्लंघन करने वाले को एक माह तक की सजा या दस हजार रूपये तक अर्थदण्ड अथवा दोनों दण्ड दिये जा सकते हैं। फैक्ट्रीज एक्ट, 1948 की धारा-67, माइन्स एक्ट, 1952 की धारा-40, मर्चेन्ट शिपिंग एक्ट, 1958 की धारा-109 तथा मोटर ट्रान्सपोर्ट वर्क्स एक्ट, 1961 की धारा-21 के अधीन जहां भी बाल श्रम नियोजन निषिद्ध है के प्रावधानों का उल्लंघन भी इस अधिनियम की धारा-14 के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध है।

आयु का प्रमाण    
बाल श्रमिक की आयु के सम्बन्ध में विवाद उत्पन्न होने पर राजकीय चिकित्सक द्वारा आयु के सम्बन्ध में प्रदत्त प्रमाण पत्र को ही मान्य कर दिया गया है।

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये निर्देश

माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा एम0 सी0 मेहता बनाम तमिलनाडु राज्य ( 465/86) में दिये गये ऎतिहासिक निर्देश निम्नांकित बिन्दुओं में समाहित हैं –

  • प्रतिकर की वसूली-

खतरनाक उद्योगों में बाल श्रमिक नियोजित करने वाले सेवायोजकों से रूपया 20 हजार तक प्रतिकर भी वसूला जाये।

  • शिक्षा व्यवस्था।

खतरनाक उद्योगों से बाल श्रम को हटाकर उसे शिक्षा का लाभ दिलाया जाये ।
गैर खतरनाक नियोजन में काम करने वाले बाल श्रमिक के सेवायोजक द्वारा उसे अपने खर्चे पर 2 घन्टे प्रतिदिन शिक्षा का लाभ दिलाया जायेगा।

  • पुनर्वास

बाल श्रमिक के परिवार के एक वयस्क सदस्य को रोजगार दिलाया जाये।

  • कल्याण निधि का गठन।

नियोजकों से वसूल की गयी उक्त धनराशि से प्रत्येक जिले में एक श्रम कल्याण निधि का गठन किया जाये, जिसका उपयोग बाल श्रमिकों के कल्याण हेतु किया जाये।

परोक्त प्रावधानों के बाद भी अनेक निषिद्ध उद्योगों और प्रक्रियाओं में बाल श्रम  का उपयोग किया जा रहा है। लोग देख कर भी उस की अनदेखी करते हैं।  इस का एक मुख्य कारण यह भी है कि हमारे यहाँ अभी लोगों को शिकायत करने की आदत नहीं है।  शिकायत कर देने पर भी उचित कार्यवाही करने वाले निरीक्षकों की बहुत कमी है, जो हैं उन्हें भी ऐसे नियोजको द्वारा प्रायोजित कर लिया जाता है।  जब तक स्वयं जनता में बाल श्रम विरोधी जागरूकता उत्पन्न नहीं होती है, बाल-श्रम का पूरी तरह से उन्मूलन संभव नहीं है।

वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण और संरक्षण

April 24, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

मैं जानना चाहती हूँ कि यदि कोई माता या पिता अपनी संपत्ति या पुश्तैनी संपत्ति में अपना हिस्सा किसी एक संतान को दे दे और बाद में वही संतान उन का भरण पोषण न कर के उन्हें परेशान करने लगे तो ऐसे माता-पिता क्या कर  सकते हैं?

– प्रतिभा साहनी, नई दिल्ली

समाधान-

संतानों पर अपने वरिष्ठ नागरिक (60 वर्ष की आयु प्राप्त कर चुके) माता-पिता  का तथा निस्सन्तान वरिष्ठ नागरिकों के ऐसे संबंधियों पर जो उन की संपत्ति पर कब्जा रखते हैं या उस का उपभोग करते हैं, या उन के देहान्त के उपरान्त उन की संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करने वाले हों ऐसी रीति से भरण-पोषण का दायित्व है जिस से वे अपना सामान्य जीवन जी सकें। इस अधिनियमं के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए अभिभावकों और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम-2007 में विशिष्ठ उपबंध किए गए हैं। इस अधिनियम की शक्तियों के द्वारा प्रत्येक जिले में एक या अधिक भरण पोषण अधिकरण स्थापित किए गए हैं जिन का पीठासीन अधिकारी उपखण्ड अधिकारी या उस से उच्च पद का अधिकारी ही हो सकता है।

स अधिनियम में यह उपबंधित किया गया है कि ऐसे वरिष्ठ नागरिक जो अपना भरण पोषण करने में सक्षम नहीं हैं वे भरण पोषण और संरक्षण प्राप्त करने के लिए जहाँ वे स्वयं निवास करते हैं या जहाँ उन की संतानें निवास करती हैं उस क्षेत्र के भरण पोषण अधिकरण के समक्ष स्वयं या किसी पंजीकृत संस्था के माध्यम से आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। सूचना प्राप्त होने पर अधिकरण स्वयं भी कार्यवाही कर सकता है। यह अधिकरण संक्षिप्त सुनवाई के उपरान्त आवेदन का निपटारा करते हुए संतानों और निस्संतान वरिष्ठ नागरिकों के संबंधियों के विरुद्ध वरिष्ठ नागरिकों को प्रतिमाह भरण पोषण की निश्चित राशि जो दस हजार रुपए प्रतिमाह तक की हो सकती है अदा करने का आदेश दे सकता है। आदेश की पालना न करने पर दायित्वाधीन व्यक्ति पर जुर्माना किया जा सकता है और एक माह तक के कारावास से दंडित भी किया जा सकता है।

स अधिनियम में यह भी यह भी उपबंधित किया गया है कि इस अधिनियम के लागू होने के उपरान्त यदि कोई नागरिक अपनी संपत्ति को इस शर्त के अंतर्गत कि संपत्ति प्राप्त करने वाला व्यक्ति संपत्ति अन्तरित करने वाले व्यक्ति को जीवन के लिए आवश्यक सुख सुविधाएँ और भौतिक साधन उपलब्ध कराएगा। यदि संपत्ति प्राप्त करने वाला व्यक्ति संपत्ति अंतरित करने वाले व्यक्ति को उक्त  आवश्यक सुख सुविधाएँ और भौतिक साधन प्रदान करने से मना करता है या प्रदान नहीं करता है तो उक्त अधिकरण संपत्ति के अंतरण को धोखाधड़ी से प्राप्त किया गया मानते हुए उसे निरस्त कर सकता है।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada