Writ Petition Archive

agricultural-landसमस्या-

 

अरुण सेन ने पुर भीलवाड़ा, राजस्थान से पूछा है-

 

मारे खेत के पास बड़ी कम्पनी जिन्दल सॉ के आने से हमारे खेतों मे फसलों पर मिट्टी जम जाती है फसल नहीं होती है। खेत का रास्ता जिन्दल कंपनी ने रोक दिया है पूछ कर अन्दर जाना पड़ता है। कंपनी न तो मुआवजा देती है और न ही कंपनी में नौकरी देते हैं कोई सुनवाई नहीं होती क्या करें?

 

समाधान-

कंपनियाँ तो चाहती हैं कि आसपास के खेत वाले इसी तरह परेशान हों और उन्हें सस्ते में ये जमीनें खरीदने को मिल जाएँ। इस मामले में सरकार के स्थानीय अधिकारी भी उन की मदद करते हैं इस कारण शिकायत करने पर भी कोई कंपनी के विरुद्ध कार्यवाही नहीं करता।

कंपनी के पास जमीन जाने के पहले आप के खेत का रास्ता था जो कंपनी को जमीन मिलने से बंद हो गया है तो आप को सरकार से वैकल्पिक रास्ता मांगना चाहिए। यदि कंपनी के कारोबार से धूल उड़ कर फसलों पर जमती है तो कंपनी से नुकसान का मुआवजा मांग सकते हैं। यह एक तरह का कंटक (न्यूसेंस) भी है जिस की शिकायत आप स्थानीय एसडीएम से कर सकते हैं धारा 133 दंड प्रक्रिया संहिता में एसडीएम कंपनी के विरुद्ध कार्यवाही कर सकता है।

आप यह सब काम करें। यदि अधिकारी आप की न सुनें तो जिला कलेक्टर के माध्यम से राज्य सरकार को नोटिस दें और सीधे इन सभी राहतों के लिए उच्च न्यायालय में रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए बेहतर है कि उच्च न्यायालय के किसी वकील की सलाह लें और उस से पूछ लें कि रिट याचिका प्रस्तुत करने के और क्या क्या करना पड़ेगा।

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rp_police-station2.jpgसमस्या-

नितिन अग्रवाल ने सतना मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा एक बैंक खाता श्री बालाजी अर्बन कोऑपरेटिव बैंक में एवम् एक खाता I.D.B.I. बैंक में भी है । 28.02.15 को श्री बालाजी बैंक ने मुझसे कहा कि आपके खाते में गलती से 198000/- (एक लाख अन्ठानवे हजार रुपये) आज से 9 माह पहले जमा हो गये थे, जो आप जमा करवा दीजिये । (28.05.14 को मैंने 2000 I.D.B.I. बैंक से ट्रांसफर किये थे तो उन्होंने 200000 रु. चढ़ा दिये थे ।) तब मैंने कहा कि मुझे थोड़ा समय दीजिये, इतनी जल्दी इतनी बड़ी रकम का इंतज़ाम कठिन है । तब बैंक ने कहा कि क्लोजिंग चल रही है, आपको तुरंत पैसा जमा करना पड़ेगा 15 दिनों के अंदर । मैंने उनको एक आवेदन पत्र भी दिया था कि मेरी एफ.डी. परिपक्व करके मेरे खाते में राशि जमा कर दी जाये और मेरा जो लोन चल रहा है उसको समाप्त कर दिया जाये, जो राशि खाते में जमा है उसको भी लोन में समायोजित करने के बाद जो भी राशि बचती है उसको मैं जमा करने को तैयार हूँ । लेकिन उन्होंने उस आवेदन को स्वीकार नहीं किया । और न ही पावती दी । 19.03.15 को मैं बैंक 2000/- (दो हजार रुपये) जमा करने गया और जमा करने के बाद पासबुक में इंट्री करवाई तो पता चला कि बैंक ने मेरे खाते से दिनांक 28-02-2015 को 198000/- एवं दिनांक 03-03-2015 को 25/- निकाल लिये थे वो भी मेरे साईन और अनुमति के बगैर । 23.03.15 को मैंने मान्यनीय उपभोक्ता फोरम द्वारा बैंक को नोटिस भी भिजवाया कि बैंक ने मेरे खाते से मेरी अनुमति के बिना ही 198000/- और 25/- निकाल लिये हैं । 11.04.15 को बैंक द्वारा सतेंद्र मोहन उपाध्याय टी. आई. सिटी कोतवाली सतना को प्रभाव में लेकर मुझे दोपहर 12 बजे से शाम 06:30 बजे तक थाने में बैठाकर प्रताड़ित किया एवं पैसे जमा करवाने के दवाब बनाया गया, बिना कोई F.I.R. के ही एवं बिना अदालत की अनुमति के हथकड़ी लगवाकर कैदियों के साथ बैठा दिया गया, और मेरी मानवीय गारिमा, सम्मान और सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नष्ट किया गया । 13.04.15 को मैंने टी. आई. सिटी कोतवाली सतना एवं बैंक प्रबंधन के खिलाफ एस.पी. साहब के नाम सी.एस.पी. आफिस में लिखित आवेदन हथकड़ी लगी हुयी फोटो के साथ दिया एवं साथ में मानवाधिकार न्यायालय में भी याचिका दर्ज़ करवाई और मानवाधिकार न्यायालय द्वारा नोटिस भी जारी हुआ । और साथ में उच्चाधिकारियों को भी मैंने इस बात की लिखित सूचना भेजी । हथकड़ी लगाने के 18 दिन बाद, दिनांक 29-04-15 को श्री बालाजी बैंक के साथ मिलकर बदले की भावना से टी.आई. सत्येंद्र मोहन उपाध्याय और एस.आई. शत्रुघन वर्मा द्वारा झूठी रिपोर्ट दर्ज़ की गयी और धारा 403 व 406 लगा दी गयी । जबकि मैंने उन लोगों को पहले भी सूचित किया था कि मैंने सिर्फ अपने खाते में ही जमा रकम निकाली थी । चूंकि बैंक ने पैसा लेने के लिये गलत तरीकों का इस्तेमाल किया था । इसलिये आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ कि आगे मैं क्या करूं, क्या करना सही होगा ।

समाधान-

बैंक ने आप के खाते में अधिक धन चढ़ा कर गलती की है। इस गलती को सुधारने का सही तरीका यह था के बैंक उस धन को जमा कराने के लिए आप को लिखित नोटिस देता और आप की जो धनराशियाँ बैंक में जिन जिन खातों में हैं उन्हें सीज कर लेता। इस के साथ ही उस धन को जमा कराने के लिए आप के विरुद्ध दीवानी अदालत में दीवानी वाद संस्थित करता। लेकिन बैंक ने इस गलती को सुधारने के लिए गलत तरीका अपनाया और आप को पुलिस की सहायता से अपमानित किया और मानसिक व शारीरिक संताप पहुँचाया। इस मामले में गलती पुलिस की है जिस ने अवैध रीति अपनाई। आप इस के विरुद्ध उच्च न्यायालय में पुलिस/सरकार के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। बैंक की अनियमितता के विरुद्ध आप पहले ही उपभोक्ता अदालत में जा चुके हैं।

प के विरुद्ध जो धारा 403 व 406 का मुकदमा बनाया गया है वह बनता ही नहीं है। उस प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कराने के लिए भी आप उच्च न्यायालय के समक्ष निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं और प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द करवा सकते हैं।

दालतों की स्थिति सरकार ने ऐसी बना रखी है कि वहाँ न्याय मिलना अनन्त काल तक लंबित रहता है इस बीच न्यायार्थियों को जो तकलीफ भुगतनी पड़ती है उस का कोई हिसाब ही नहीं है। इस स्थिति ने पुलिस, सार्वजनिक व निजि संस्थाओं और सरकारी अमले को निरंकुश बनाया है। उसी का फल आप को भुगतना पड़ा है। इस तरह की स्थितियों से तभी समाज को बचाया जा सकता है जब कि एक त्वरित और उचित न्याय व्यवस्था देश में स्थापित हो। पर वह तो अभी एक सपना लगता है। अभी तो हमारी सरकारों ने जरूरत के केवल 15 प्रतिशत न्यायालय स्थापित किए हुए हैं। इस न्याय व्यवस्था को एक गुणवत्ता वाली त्वरित न्याय व्यवस्था में परिवर्तित होना देश की समूची राजनैतिक व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन हुए बिना संभव नहीं लगता। तब तक इस अपर्याप्त न्यायिक व्यवस्था के दु्ष्परिणाम नागरिकों को भुगतने होंगे।

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Jhola doctorसमस्या-

शुक्लागंज, उन्नाव, उत्तर प्रदेश से राजा सिंह ने पूछा है –

मेरे पिता जी ने फरवरी 2012 में कस्बे की व्यवसायिक सड़क पर एक मकान खरीदा जिस की चौड़ाई 13 फुट है जिसमे 10 फुट दुकान 3 फुट की गॅलरी है। दुकान की लंबाई 12 फुट है और पीछे 37 फुट में कुछ भी नहीं बना था। दुकान में 25 साल से एक डॉक्टर बीएएमएस डिग्री से सेल्फ़ प्रॅक्टिस करता है। उस ने जब हम लोग मकान ले रहे थे तो कहा था कि हम मकान छोड़ देंगे क्यों कि हम बूढ़े हो गये हैं। हम अपने घर वाली दुकान मे सेल्फ़ प्रॅक्टिस कर लेंगे। हम लोग उसकी बातों में आ गये। मकान लेने के बाद जब हम लोग उसके पास गये तो उस ने कहा कि हमें 5-6 महीने का समय दो तो हम लोगो ने सीधा समझ के दे दिया।  जब हम लोग नवम्बर 2012 में उसके पास गये तो वो हम लोगों को धमकी देते हुए बोला कि उसे 2 लाख रुपये चाहिए नहीं तो क़ानून भी कभी दुकान खाली नही करा पाएगा। हम लोग बहुत चिंतित हुए हम लोगों ने कुछ पैसों का इंतज़ाम कर के मई 2013 में उस के पास गये तो वो कहने लगा कि मैं 2 लाख से एक भी कम नहीं लूंगा।  पिताजी मायूस होकर आ गये। फिर पिताजी 21 अगस्त को उस के पास हाथ पैर जोड़ कर उसे मनाने के लिए गये। क्यों की वो दुकान की दीवार गिरने की हालत में थी और वो उसे बनवाने जा रहा था। तो वो एक सरिया ले के पिताजी की तरफ दौड़ा। पिताजी पुलिस के पास गये तो पुलिस ने काम बंद करा दिया। पुलिस ने 2 घंटे उसे बिठा कर छोड़ दिया। फिर पुलिस हम ही लोगों को धमका कर कहती है कि अगर यह दुकान हल्की भी टूटी तो तुम (पिताजी) पर इतनी दफ़ा लगाउंगा कि तुम्हारी सरकारी नौकरी भी चली जाएगी। यथा स्थिति बनाए रखो। फिर 5 सितम्बर को 2 वकील दुकान की फोटो खींच कर ले गये और पता चला है की उसने केस कर दिया है स्टे के लिए। उस ने हम लोगों को आज तक एक रुपया किराया नहीं दिया है और हमें ही धमकाता है। उस के 2 लड़के 30-35 साल के हम को धमकाते हैं और कहते हैं कि तुम्हारे वकील भी हमारे हो जाएंगे। तुम तो गये काम से। हमारे पास कोई मकान नहीं है उस के पास उसी रोड पर मकान और दुकान है वो एक प्राइवेट डाक्टर है। 15 रुपये में दवाई देता है। हम लोग पागल हुए जा रहे हैं। क्या हम लोग कभी मकान में कब्जा नहीं ले पाएँगे हमारे पिताजी 2017 मे रिटायर हो रहे हैं मेरी उम्र 20 साल और 3 बहनें हैं।  उस डाक्टर को) को गुण्डों का संरक्षण प्राप्त है।  हम लोग को मजबूरी मारे डाल रही है।  कोई सार्थक उपाय बताएँ।  हमारे पास ज़्यादा बैंक बैलेन्स भी नहीं है।  हमें दीदी की शादी भी करनी है। हम लोग किराए के मकान में रहते हैं।

समाधान-

प का परिवार एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार है जिस के पास कस्बे में अपना आवास तक नहीं है और वह किराए के मकान में निवास करता है। परिवार में माता पिता के सिवा तीन बहनें भी हैं। पिताजी सरकारी कर्मचारी हैं और दीदी का विवाह करना है। आप के पिता ने जैसे तैसे कुछ बचत कर के अपने मकान और रिटायरमेंट के बाद कुछ आय का जुगाड़ करने के लिए व्यावसायिक सड़क पर एक दुकान और उस के पीछे का खाली प्लाट खरीदा है। अब दुकान का किरायेदार दुकान खाली नहीं कर रहा है जब कि दुकान खरीदने के पहले उस ने वायदा किया था कि वह दुकान खाली कर देगा। आप के पिता से उस ने झगड़ा किया और वे पुलिस के पास गए। पुलिस ने कार्यवाही तो की लेकिन आप के पिता को भी धमका दिया। अब दुकानदार अदालत में स्टे के लिए गया है और उस के लड़के आप को धमका रहे हैं। आप ने अपने मकान का सुखद सपना देखा था लेकिन वह अब खटाई में पड़ गया है और मुसीबतें सामने है। लगता है दुकान खरीदने में जो पैसा लगाया था वह सब बेकार चला गया है और संकट के बादल मंडरा रहे हैं। लेकिन यह सब स्वाभाविक है और उस से घबराने की तनिक भी जरूरत नहीं है। वह किराएदार डाक्टर, उस के लड़के और पुलिस ने अपने अपने चरित्र के मुताबिक ही भूमिकाएँ अदा की हैं।

प का डाक्टर किराएदार भी उसी मध्यवर्ग का हिस्सा हैं, जिस के आप हैं। उस ने भी पन्द्रह रुपए में दवाई बेच बेच कर केवल जीवन यापन ही किया है और हो सकता है उस के लड़के अभी तक अपने पैरों पर खड़े भी न हो पाए हों, रहने को मकान बना लिया हो जिस में प्रेक्टिस करने लायक दुकान भी हो लेकिन 25 साल से जिस दुकान में वह किराएदार था उस दुकान को खाली करने मात्र से लाख दो लाख रुपए की कमाई होने की गुंजाइश दिखने पर वह इस मौके को नहीं छोड़ना चाहता हो। किराएदार का व्यवहार एक सामान्य मध्यवर्गीय व्यक्ति की तरह है। आप को मकान की आवश्यकता है।  बिना किसी बड़ी मुसीबत के उस का कब्जा हासिल करने के लिए आप के पिता ने कुछ धन की व्यवस्था कर लेना इसी बात का द्योतक है।

पुलिस किसी किराएदार से मकान खाली नहीं करा सकती यह उस के अधिकार क्षेत्र के बाहर का मामला है। आप के पिताजी मकान की गिरने वाली दीवार के मामले में किराएदार से बात की उस ने झगड़ा करने का प्रयत्न किया। शान्ति भंग होने की स्थिति बनी वैसी स्थिति में पुलिस ने डाक्टर को दो घंटे थाने में बिठा लिया। इस से अधिक पुलिस अधिक से अधिक यह कर सकती थी कि डाक्टर और आप के पिता के विरुद्ध शान्ति भंग न करने के पाबंद करने हेतु एक शिकायत किसी कार्यपालक दंडनायक की अदालत में दाखिल कर देती। हो सकता है उस ने ऐसा किया भी हो। उस ने आप के पिता को धमकाया भी कि वे डाक्टर से न उलझें यह भी सही किया। क्यों कि किसी मकान दुकान को खाली कराने के लिए ताकत का प्रयोग करना उचित और कानूनी नहीं है। इस के लिए आप के पिताजी को दीवानी न्यायालय में कार्यवाही करनी चाहिए। जिस में कुछ समय तो लगेगा लेकिन किराएदार को दुकान खाली करना पड़ेगी।

जिस उम्र में आज आप हैं जब मैं उस उम्र में था तब मेरे पिता जी ने भी एक मकान खरीदा था जिस के एक हिस्से में किराएदार रहता था। उस समय उस किराएदार ने भी यही कहा था कि वह मकान खाली कर देगा। लेकिन उस ने नहीं किया। हम ने उस से कोई झगड़ा न किया। केवल कुछ समय बाद जब वह मकान के शौचालय का नवनिर्माण कराने लगा तो हमने मकान खाली कराने का मुकदमा कर के शौचालय के निर्माण पर स्टे ले लिया। बाद में कुछ समय तो लगा लेकिन मकान खाली हो गया। इस तरह आप को और आप के पिता जी को भी थोड़ा धीरज रखना पड़ेगा। दुकान निश्चित रूप से खाली हो जाएगी।

ह तो सही है कि आप के पिता जी ने वह संपत्ति रहने के लिए खरीदी है। लेकिन उस संपत्ति में कोई रहने लायक मकान नहीं है, दुकान के अतिरिक्त केवल एक खाली प्लाट है। निश्चित रूप से आप के पिता जी की योजना इस खाली प्लाट पर आवासीय मकान बनाने की रही होगी। तो आप के पिता जी खाली प्लाट पर मकान बनाएँ तो कोई उन्हें रोक नहीं सकता।

प ने मकान फरवरी 2012 में खरीदा था। इस तरह उसे खरीदे लगभग डेढ़ वर्ष हो चुका है और तब से किराएदार ने मकान का किराया नहीं दिया है। इस तरह किराएदार ने अठारह माह का किराया न दे कर किराया अदायगी में चूक की है। यह दुकान खाली कराने के लिए एक मजबूत आधार है।  इस के अतिरिक्त एक आधार यह भी हो सकता है कि उन का पुत्र वयस्क हो चुका है और वे उसे उस दुकान में व्यवसाय कराना चाहते हैं जिस के लिए उन्हें उस दुकान की निजि आवश्यकता है। इस तरह आप के पिता जी इन दो मजबूत आधारों पर दुकान खाली करने का दावा कर डाक्टर पर कर सकते हैं। कुछ समय तो लगेगा लेकिन दुकान खाली हो जाएगी। उस के लिए किसी भी तरह झगड़ा वगैरह करने या डाक्टर से संबंध खराब करने की कोई जरूरत नहीं है। डाक्टर इसी लिए आप के पिता से रुपया मांग रहा है कि आप दुकान को जल्दबाजी में खाली कराना चाहते हैं और न्यायालय की प्रक्रिया से डरते हैं। यदि वह रुपया आप के पिताजी उसे दे दें तो वह तुरन्त खाली कर देगा वर्ना जानबूझ कर मुकदमे को लंबा करेगा। पर मेरे विचार में अदालत की कार्यवाही से दुकान खाली कराना उचित है।

प के पिताजी जब मकान खाली कराने का मुकदमा करें तो इस बात की अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए भी आवेदन करें कि मुकदमा चलने के दौरान दुकाने के पीछे के खाली प्लाट और दुकान के ऊपर मकान का निर्माण करने में वह किराएदार बाधा उत्पन्न न करे। इस से आप के पिता प्लाट पर निर्माण कर के मकान बना सकते हैं और उस में जा कर निवास कर सकते हैं। दुकान मुकदमा निपटेगा तब खाली हो जाएगी। डाक्टर ने जो मुकदमा किया है उस में इस के अतिरिक्त और कोई आदेश न होगा कि आप उस से केवल न्यायिक प्रक्रिया अपना कर ही दुकान खाली कराएँ जबरन न कराएँ और यह आदेश उचित है।

प शान्तिपूर्वक अपनी पढ़ाई आदि जारी रखें। आप के पिताजी दुकान खाली करने का मुकदमा करें और मकान का निर्माण करवा कर उस में रहने जाएँ। दुकान तो कभी न कभी खाली हो ही जानी है। आखिर किराएदार हमेशा किराएदार ही रहता है वह कभी उस का मालिक नहीं बन सकता। इस के लिए आप के पिता जी को नगर के अच्छे दीवानी मामलों के वकील से सम्पर्क करना चाहिए। किराएदार के पुत्रों की इस धमकी में कोई वजन नहीं है कि जो भी वकील करेंगे वह उन का हो जाएगा। इस दुनिया में लोग बिकते हैं लेकिन सब फिर भी नहीं बिकते। जिस वकील की प्रतिष्ठा ईमानदारी से काम करने की हो उसे वकील करें। आप के परिवार को कुछ परेशानी तो होगी लेकिन कुछ समय बाद हल भी हो जाएगी। यदि आप के पिताजी ऐसी संपत्ति खरीदते जिस में कोई किराएदार न होता तो यह समस्या नहीं होती। निश्चित रूप से किराएदार होने के कारण वह संपत्ति आप के पिताजी को बाजार दर से कुछ कम कीमत पर ही मिली होगी। अब उस के कारण यह समस्या तो झेलनी पड़ेगी। संपत्ति सदैव कुछ न कुछ झगड़ा साथ ले कर बनती है, यह मौजूदा दुनिया का नियम है।  संपत्ति बनानी है तो इस से समझदारी से निपटना पड़ेगा।

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agriculture landसमस्या-

बहजादका, तहसील मवाना, जिला मेरठ, उत्तर प्रदेश से सुरेन्द्र गिरी ने पूछा हैः

मेरी समस्या यह कि संन् 1972 में हमारे गाँव मे बारिश का पानी भर गया था। यह पानी एक तालाब से दूसरे तालाब में निकालने के लिये एसडीएम और तहसीलदार ने आकर मेरे खेत खसरा नम्बर 144, 145, में नाला निकलवाया और हमारी जमीन के बदले में खसरा नम्बर 131 गाँव के खाद के गड्ढों की जमीन ग्राम पंचायत की सहमति से दी थी।  इसके बाद सन् 1980 में मेरे खिलाफ किसी ने अवैध कब्जे का मुकदमा डाल दिया। जिसका फैसला संन 1984 में मेरे पक्ष में हुआ।  फैसले में आदेश हुआ कि सुरेन्द्र का खाद के गडढो पर अवैध कब्जा नहीं है। क्यों कि नाले की भूमि के बदले में गाँव समाज के खाद के गडढों की भूमि दी गयी है।  इसी प्रकार सन् 1991 में भी मेरे पक्ष मे फैसला हुआ। लेकिन आज तक इस नाले व खाद के गडढो का कागजों में तबादला नहीं दिखाया गया है।  मैं ने सन् 2011 में एसडीएम और कमिशनर के यहाँ भी अपना केस डाला था लेकिन दोनों ने यह कहते हुये केस खारिज कर दिया कि धारा 132 के तहत गाँव के खाद के गड्ढों की जमीन का तबादला नहीं हो सकता। यह नाला आज भी मौजूद है। इस नाले में आधे गाँव का पानी जाता है। नाले को पक्का कराने के लिए गाँव प्रधान के पास पैसे आ गए हैं और गाँव वाले लोग भी वहाँ पर नाला चाहते हैं। लेकिन मंगल सिंह, हरेन्दर इस नाले का विरोध कर रहा है। मंगल सिंह, हरेन्दर पटवारी, नायब तहसीलदार को पैसे दे कर मेरा कब्जा छुडवाना चाहता है। पटवारी, नायब तहसीलदार ने मेरी फसल भी कटवा दी है। गाँव पंचायत मुझे नाला भी बन्द नहीं करने देते हैं। मैं क्या करूँ? जो दोनों भूमि का तबादला कागजों में किया जा सके या नाला बन्द करके मेरी जमीन की पैमाइश करायी जाये। जाँच करवा कर कार्यवाही की जा सके।  मेरे पास सभी प्रधानों के प्रस्ताव भी हैं।

समाधान-

कृषि भूमि की वास्तविक स्वामी सरकार है। कृषक उस पर केवल किराएदार की हैसियत से खेती करता है। लेकिन आप के खाते की जमीन सार्वजनिक हित के लिए ले कर उस के स्थान पर खाद के गड्ढों की जमीन आप को दी है। लेकिन खाद के गड्ढों की जमीन संभवतः किसी व्यक्ति को नहीं दी जा सकती। इस कारण आप को उस जमीन का कब्जा तो दे दिया गया, आप उस पर खेती भी करते रहे लेकिन वह आप के खाते में न डाली जा सकी। किसी अधिकारी को यह कानूनी अधिकार नहीं है कि उस सार्वजनिक भूमि को आप के खाते में हस्तान्तरित कर दे। इस सार्वजनिक जमीन को आप के खाते में दर्ज करने के लिए सरकार को ही उच्च स्तर पर निर्णय करना पड़ेगा। या सरकार फिर भी आप को खाद के गड्ढों की जमीन न देना चाहे तो जो जमीन आप से ली गई है उस का मुआवजा आप को देगी।

प को इस मामले में अब तक हुई सारी कार्यवाही का विवरण देते हुए राज्य सरकार को मुख्य सचिव, राजस्व सचिव तथा जिला कलेक्टर के माध्यम से न्याय प्राप्ति के लिए नोटिस देना चाहिए। और नोटिस की अवधि समाप्त हो जाने पर उच्च न्यायालय में रिट याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए। इस नोटिस को देने के पूर्व आप को सारे मामले के दस्तावेजों सहित किसी उच्च न्यायालय के वकील से मिल कर राय करनी चाहिए। उस के बाद यह कार्यवाही करनी चाहिए।

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समस्या-

जोधपुर, राजस्थान से श्रवण ने पूछा है –

मेरे पिताजी रेलवे में पानीवाला के पद पर कार्यरत थे जिनका देहांत 17-12-2012 को हो गया था जिनका सर्विस में नाम प्रेम लाल था और घर पर सभी दस्तावेजो में नेमाराम था और मेरे शैक्षणिक दस्तावेजों में मेरे पिताजी का नाम प्रेमलाल की बजाय नेमाराम है।  अब मेरे पिताजी की जगह मेरी नौकरी लगनी है।  परन्तु सर्विस रिकार्ड व मेरे शैक्षणिक दस्तावेजो में पिताजी का नाम अलग है। दोनों जगह मेरे दादाजी का नाम व मेरा नाम व मेरे माताजी का नाम सही है। रेलवे ने नौकरी देने से मना कर दिया है मैंने 100 रुपये का शपथ पत्र व सरपंच का प्रमाण पत्र भी दिया है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

Applition for Appointmentभी आप के पिताजी के देहान्त को अधिक समय नहीं हुआ है।  मुझे लगता है कि आपने अभी विधिपूर्वक आवेदन ही नहीं किया है।  आप ने केवल रेलवे में संपर्क किया है और वहाँ आप को मौखिक यह कहा गया है कि आप को नौकरी नहीं मिलेगी। इस से काम नहीं चलेगा।  आप को रेलवे से आवेदन पत्र मांग कर नियमानुसार आवेदन करना चाहिए। साथ में वे सभी दस्तावेज प्रस्तुत करने चाहिए जिन से यह साबित किया जा सके कि प्रेमलाल और नेमाराम एक ही व्यक्ति था। आवेदन देने का सबूत आप को अपने पास रखना चाहिए और इस बात का इंतजार करना चाहिए कि रेलवे आप को नौकरी दे या फिर नौकरी देने से लिखित आदेश द्वारा इन्कार करे। यह भी हो सकता है कि रेलवे आप को कुछ खास सबूत प्रस्तुत करने को कहे। तब आप उन के कहे अनुसार कार्य करें।

दि आप को रेलवे में अनुकंपा नियुक्ति मिल जाती है तो ठीक है और यदि नहीं मिलती है और रेलवे लिखित में इन्कार कर देती है तो आप को तुरन्त जोधपुर उच्च न्यायालय में सेवा सम्बन्धी मामलों के किसी वकील को सारे दस्तावेजों के साथ मिलना चाहिए और उस की सलाह के अनुरूप सिविल वाद या रिट याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए। यदि आप के पास ऐसे दस्तावेज हुए जिन से साबित किया जा सकता हो कि प्रेमलाल और नेमाराम एक ही व्यक्ति था तो रिट याचिका प्रस्तुत करना उचित होगा अन्यथा आप को सिविल वाद प्रस्तुत करना चाहिए।

दि रेलवे लिखित में आप को अनुकंपा नियुक्ति देने से इन्कार कर चुकी है तो आप को तुरन्त रिट याचिका अथवा दीवानी वाद जो भी स्थानीय वकील सारे दस्तावेज देख कर सलाह दे प्रस्तुत करना चाहिए।

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वैकल्पिक उपाय होने पर रिट याचिका पोषणीय नहीं है।

November 23, 2012 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित
समस्या-

राजगढ़, मध्यप्रदेश से ममता नामदेव पूछती हैं-

दालत के आदेशानुसार मेरे पति द्वारा मुझे धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण की राशि 1500/- रुपए प्रतिमाह पिछले 36 माह से प्रदान की जा रही है। धारा 24 में अन्य अदालत द्वारा 30 माह पूर्व स्वीकृत अंतरिम भरण पोषण की राशि 1200/- रुपए प्रतिमाह बार बार मांगे जाने और अदालत के निर्देशों के बावजूद अभी तक नहीं दी गई है।  पेशी पर मेरे पति के हाजिर ना होने और उन के गवाहों के हाजिर ना होने के कारण मेरे पति का धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम विवाह विच्छेद का मुकदमा परिवार अदालत ने 3 माह पहले खारिज कर दिया है। खारिजी आदेश तथा मुकदमा चलने के दौरान दिए गए खर्चे व भरण पोषण व स्थाई पुनर्भरण के आवेदनों को को मेरे पति द्वारा अनुच्छेद 227 सपठित धारा 24/25/28 हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। मुझे उच्च न्यायालय में अपना पक्ष रखना है। मैं कोई नौकरी नहीं करती मेरी कोई आय नहीं है।  क्या धारा 24 अंतरिम भरण-पोषण की राशि को धारा 13 के खारिजी आदेश के साथ 32 माह बाद चुनौती दी जा सकती है? कृपया मार्गदर्शन दें।

समाधान-

प के पति ने सभी आदेशों के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत की है। रिट याचिका के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है। इस कारण उसे प्रस्तुत किया जा सकता है। हालांकि अत्यधिक देरी कर के प्रस्तुत की गई रिट याचिका को उच्च न्यायालय स्वीकार नहीं करते हैं। इस मामले में 32 माह की देरी अत्यधिक देरी है और रिट याचिका को विचारार्थ भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

कोई भी रिट याचिका तब भी स्वीकार नहीं की जा सकती है जब कि उस मामले में याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो।  परिवार न्यायालय के किसी भी आदेश व निर्णय के विरुद्ध परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 19 के अंतर्गत अपील का प्रावधान है। इस तरह आप के मामले में अधिनियम के अंतर्गत अपील का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है।  किसी भी वैकल्पिक उपाय के उपलब्ध रहते हुए किसी मामले में रिट याचिका स्वीकार्य नहीं हो सकती।  इस के लिए सर्वोच्च न्यायालय का United Bank Of India vs Satyawati Tondon & Ors. के मामले में on 26 July, 2010 को दिया गया निर्णय आप की सहायता कर सकता है। इसे आप यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकती हैं। 

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