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शुल्क देने पर भी पत्रिका न भेजने पर उपभोक्ता अदालत में कार्यवाही करें और पुलिस में धारा 420 आईपीसी की रिपोर्ट दर्ज कराएँ

 प्रिया शर्मा ने पूछा है-

मैं इस समय बहुत ही बड़ी समस्या से गुजर रही हूँ। मैं ने पिछले साल दिसम्बर में एक मैगजीन के लिए फॉर्म भर कर भेजा था। उस का एक साल का मूल्य 450 रुपए था जिसका मैं ने बैंक ड्राफ्ट बनवा कर कम्पनी को भेज दिया था। उसी महीने उनके पास 450 रुपए का बैंक ड्राफ्ट पहुच गया था जिसकी जानकारी मैं ने फोन से पता कर ली थी और उन्होंने मुझ से बोला था कि जनवरी से हम हर महीने आपको 5 तारीख तक मैगजीन भेज दिया करेंगे। लेकिन इतने महीने के बाद भी ना तो उन्होंने मुझे कोई मैगजीन भेजी और न ही कोई पत्र भेज कर जानकारी दी। मैं उन्हें फोन कर कर के थक गई हुँ।  वे हर बार यही बोलते हैं कि २ या ३ दिन में आपके पास मैगजीन पहुँच जाएगी। पहले तो उन्होंने ये बोला कि अभी प्रिंटिंग प्रोब्लम चल रही है हम आपको अप्रेल तक मैगजीन भेज देंगे, लेकिन उन्होंने कोई मैगजीन नहीं भेजी और न ही वो पैसे वापिस कर रहे हैं। अब आप ही बताये मैं क्या कर सकती हूँ?

 उत्तर – 
प्रिया जी,
प ने एक प्रकाशक या बुक सेलर से एक मैगजीन को वर्ष भर तक खरीदने के लिए अपना शुल्क भेज दिया है। लेकिन वे आप को मैगजीन के अंक नहीं भेज रहे हैं। इस तरह वे सेवा में दोष कर रहे हैं। यदि उन्हों ने अभी तक मैगजीन प्रकाशित ही नहीं की है तो फिर यह सीधे-सीधे धारा 420 आईपीसी में छल का अपराध है। सेवा में दोष के लिए यदि आप के पास उन का ई-मेल पता है तो आप को ई-मेल से उन्हें एक पत्र भेज देना चाहिए। जिस में आप उन्हें लिखें कि उन्हों ने आप के साथ छल कर के रुपया ऐंठा है, और आप उन के विरुद्ध उपभोक्ता अदालत में मुकदमा करेंगी, साथ ही पुलिस में धारा 420 आईपीसी में उन के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कराएंगी। यदि कंपनी का ई-मेल पता आप को उपलब्ध न हो तो आप यही पत्र रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से प्रेषित कर दें। 

हो सकता है इस पत्र के मिलने के उपरांत कंपनी आप को मैगजीन भेजना आरंभ कर दे। यदि एक माह तक कोई उत्तर कंपनी की ओर से नहीं आता है तो  आप को तुरंत अपने निवास स्थान के नजदीक के पुलिस स्टेशन पर जा कर रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए कि आप के साथ इस तरह बेईमानी पूर्वक संपत्ति प्राप्त कर के छल किया गया है जो कि धारा 420 आईपीसी में अपराध है। पुलिस को इस रिपोर्ट पर कार्यवाही करनी चाहिए। यदि पुलिस यह कार्यवाही नहीं करती है तो आप सीधे न्यायालय में भी अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकती हैं। अदालत आप के बयान दर्ज कर के सीधे प्रकाशक को सम्मन भेजेगी। इस पर कंपनी आप का रुपया वापस लौटा कर समझौता करना चाहे तो आप अपनी राशि के साथ आप को हुआ हर्जाना भी मांगिए। आप चाहें तो उपभोक्ता  अदालत में सेवा में कमी के लिए शिकायत प्रस्तुत कर सकती हैं। उपभोक्ता अदालत आप को अपना रुपया, अदालत की कार्यवाही का खर्च तथा हर्जाना दिला सकता है।

अखबारों द्वारा अश्लील और धोखे वाले विज्ञापन प्रकाशित करना अपराध है


 अरुण कुमार झा ने पूछा है –
 
1. आए दिनों कई प्रकार के विज्ञापन दैनिक अखबारों में छपते हैं जैसे सेक्स शक्ति बढ़ाने का नुस्खा, इन विज्ञापनों में बहुत ही भद्दे और शर्मसार करने वाले चित्र रहते हैं। क्या ऐसे विज्ञापनों के चित्रों को बंद किया जा सकता है?
2. दोस्ती करने के संबंध में जो विज्ञापन दैनिक अखबारों में छपते हैं  वे तो बिलकुल ही ठग लोगों द्वारा भोले भाले युवकों युवतियों को समाज से गुमराह करने वाला होता है। क्या उस विज्ञापन की सत्यता को जाँचने की जिम्मेवारी संबंधित अखबारों की नहीं होनी चाहिए?
3. इसी प्रकार युवकों को बिना कोई जमानत के भारी रकम कर्ज के रूप में देने का लालच दिया जाता है क्या ऐसे विज्ञापन पर कानूनी रोक नहीं लग सकती? 
 उत्तर – 
अरुण जी,
हमारे साथी वकील श्री अख्तर ख़ान अकेला को इस तरह की समस्याओं का विशेष अनुभव है, आप के प्रश्नों का उत्तर अकेला जी ने इस तरह दिया है –
1. आप के पहले प्रश्न का उत्तर है कि हमारे देश में प्रेस पुस्तक पंजीकरण अधिनियम बना हे जिसके तहत किसी भी अख़बार या मैगज़ीन प्रकाशन के पहले एक घोषणा पत्र प्रस्तुत करना पढ़ता है।  देश के कानूनों की परिधि में ही अखबार प्रकाशित किया जा सकता है।  देश में चमत्कारिक औषधि और चमत्कारिक उपाय  (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम 1954 बना है।  इस कानून में ऐसी किसी भी दवा का विज्ञापन प्रकाशन गैर कानूनी है और जो कम्पनी इस तरह के विज्ञापन छपवाती है उसे तो 6 माह तक  सजा हो सकती है।  इस तरह के विज्ञापन प्रकाशित करने वाले अख़बार के स्वामी को दो वर्ष तक की सजा हो सकती है। मामला संज्ञेय है जिस में शिकायत पर या फिर खुद पुलिस मुकदमा दर्ज कर सकती है।  लेकिन इस गेर कानूनी धंधे में अब अख़बार भी लिप्त हें और पुलिस खामोश है, दवा के संबंध में औषधि कानून अलग से बना है जिसमें किसी भी दवा का विज्ञापन अवैध और गैर कानूनी है। ऐसे विज्ञापन प्रकाशन पर दवा निर्माता का लाइसेंस निलम्बित करने और सजा का भी प्रावधान है। वैसे भी किसी भी दवा को चिकित्सक की सलाह के बगैर बेचना ,बिकवाना और खरीदना अपराध है।
2. आप का दूसरा प्रश्न दोस्ती करने के संबंध में में प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों के संबंध में है कि क्या इस ठगी वाले विज्ञापन की सत्यता को जाँचने की जिम्मेदारी संबंधित अखबारों की नहीं होनी चाहिए?
इस मामले में उत्तर यह है कि कोई भी प्रकाशन जो अश्लीलता या किसी अपराध को बढावा देता है उसमें अख़बार मालिक,सम्पादक,प्रकाशक और विज्ञापन दाता सब अपराधी होते हैं।  मान लीजिये अश्लीलता या जिस्म फरोशी का न्योता दोस्ती के नाम पर है तो इस अपराध में भारतीय दंड संहिता की धारा १२० बी के अंतर्गत विज्ञापन प्रकाशित करने वाला अखबार भी समान रूप से अपराधी है, क्योंकि इस अपराध की बुनियाद अख़बार का विज्ञापन है और अख़बार में प्रेस पुस्तक पंजीकरण नियमों के तहत ऐसे प्रकाशन प्रतिबंधित हैं।
3. कोई भी व्यक्ति अगर अनाम व्यक्ति के विज्ञापन से इस तरह से ठगा जाता है तो अख़बार भी धारा 420, 467 व 120 भा.दं.संहिता के अंतर्गत अपराधी है और उस के संपादक, प्रकाशक व मुद्रक सभी दोषी हैं व सभी को उस के लिए दंड दिया जा सकता है। प्रेस कोंसिल ऐसे अखबारों को अनेक बार फटकर लगा चुकी है,  लेकिन उस के बावजूद कानून तोड़ने का सिलसिला लगातार जारी है। 
रुण जी, यदि आप इन बातों से व्यथित हैं तो आप को इन बातों की शिकायत पुलिस को करनी होगी और कार्यवाही करने के लिए उन्हें बाध्य करना पड़ेगा। यदि पुलिस ऐसा न करे तो आप सीधे अदालत में शिकायत प्रस्तुत कर के अदालत से पुलिस को कार्यवाही करने लिए आदेश जारी करवा सकते हैं। 

एक अभियुक्त की जमानत देने पर आप के क्या दायित्व होंगे?

 श्री नरेश सिह राठौड़  तीसरा खंबा के स्थाई पाठक हैं। पिछली पोस्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्हों ने पूछा है- 

ब हम किसी व्यक्ति के न्यायिक हिरासत में होने पर उसे जमानत पर रिहा होने के लिए किसी की जमानत देते हैं, तब उस परिस्थिति में जमानतदार की क्या स्थिति रहती है ?

 उत्तर –
 नरेश भाई का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है। कभी भी किसी भी व्यक्ति या उस के मित्र या रिश्तेदार द्वारा आप से यह कहा जा सकता है कि आप न्यायालय के समक्ष उस की जमानत दे दें जिस से बंदी न्यायिक हिरासत से रिहा हो सके। आप नजदीकी मित्र होने या रिश्तेदार होने के कारण मना भी नहीं कर सकते। अब प्रश्न यह है कि आप के जमानत दे देने पर क्या क्या दायित्व हो सकते हैं? या क्या क्या परिणाम हो सकते हैं?
आप से जमानत जब भी मांगी जाती है तो एक जमानत प्रपत्र पर आप के हस्ताक्षर लिए जाते हैं और आप को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने को कहा जाता है। न्यायालय में स्वयं मजिस्ट्रेट या जज या न्यायालय का रीडर आप को यह बताता है कि आप किस बात की जमानत दे रहे हैं। लेकिन यह भी हो सकता है कि वहाँ आप को यह सब न बताया जाए। इस लिए यह आवश्यक है कि जमानत का प्रपत्र जो कि एक बंधपत्र होता है उस पर हस्ताक्षर करने के पहले आप यह अवश्य पढ़ लें कि उस में क्या लिखा है? यह बंधपत्र दंड प्रक्रिया संहिता के प्ररूप सं. 45 में दिया गया है जो निम्न प्रकार है –

प्ररूप सं. 45
थाने या न्यायालय के भारसाधक अधिकारी के समक्ष हाजिर होने के लिए बंधपत्र और जमानत पत्र
(धारा 436, 437,438(3) और 441 देखिए)
मुचलका
मैं  …………………………..(नाम)………………………….पुत्र श्री …………………………. जाति…………… निवासी …………………………………… हूँ तथा ……………………… थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा बिना वारंट गिरफ्तार या निरुद्ध कर दिए जाने पर (या ………………. न्यायालय के समक्ष लाए जाने पर) अपराध अंतर्गत धारा ……………………………………… से आरोपित किया गया हूँ तथा मुझ से ऐसे अधिकारी या न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए प्रतिभूति देने की अपेक्षा की गई है, मैं स्वयं को इस बात के लिए आबद्ध करता हूँ कि मैं ऐसे अधिकारी या न्यायालय के समक्ष ऐसे प्रत्येक दिन, हाजिर होऊंगा, जिस में ऐसे आरोप की बाबत कोई  अन्वेषण या विचारण किया जाए, तथा मैं अपने को आबद्ध करता हूँ कि यदि इस में चूक करूँ तो मेरी ……………………………….. रुपए की राशि समपहृत हो जाएगी। 
तारीख …………………                                               हस्ताक्षर
जमानत-पत्र
मैं …………………………..(नाम)………………………….पुत्र श्री …………………………… जाति……….. निवासी ………………………………………………………..स्वयं को अभियुक्त …………………………………. के लिए, इस बात के लिए प्रतिभू घोषित करता हूँ कि वह …………………………….. थाने के भार साधक अधिकारी या ……………………………… न्यायालय के समक्ष ऐसे अन्वेषण के प्रयोजन के लिए या उस के विरुद्ध आरोप का उत्तर देने के लिए उपस्थित होगा औऱ मैं इस बंध-पत्र के द्वारा अपने को आबद्ध करता हूँ कि इस में उस के द्वारा चूक किए जाने की दशा में मेरी रुपए ………………………… की राशि समपहृत हो जाएगी।
तारीख …………………  &nb
sp;                                                       
हस्ताक्षर

 स प्रपत्र के दो भाग हैं। प्रथम भाग व्यक्तिगत बंध-पत्र है जिसे मुचलका लिखा गया है और दूसरा भाग प्रतिभू का बंधपत्र है जिसे जमानत लिखा गया है। प्रथम भाग पर बंधपत्र की राशि अकित की जा कर स्वयं अभियुक्त के हस्ताक्षर कराए जाते हैं और दूसरे भाग पर जमानत की राशि अंकित की जा कर अभियुक्त की जमानत देने वाले जमानती के हस्ताक्षर कराए जाते हैं। इस प्रपत्र की भाषा से ही प्रथम दृष्टया समझा जा सकता है कि जमानत पर छूटने वाले अभियुक्त और उस की जमानत देने वाले जमानती के दायित्व क्या हैं?
मानत देते समय जमानती का एक शपथ पत्र इस आशय का भी लिया जाता है कि उस की आर्थिक हैसियत कितनी है? आज कल कुछ न कुछ दस्तावेज जमानती को इस बात का भी दिखाना पड़ता है जिस से यह पता लग सके कि उस की आर्थिक हैसियत क्या है। इस के लिए जमानती के मकान या जमीन के दस्तावेज, या किसी वाहन के स्वामित्व के दस्तावेज देख कर संतुष्ट हो जाती है कि जमानती पर्याप्त राशि की जमानत देने लायक है। इस के अतिरिक्त अदालत आज कल जमानती की फोटो आई.डी. अर्थात सचित्र परिचय-पत्र भी देखती है कि वास्तव में जमानत देने वाला व्यक्ति वही तो है जो वह स्वयं को घोषित कर रहा है। जो राशि जमानत पत्र में भरी जाती है उसे जमानती को देख लेना चाहिए जिस से उसे पता रहे कि उस ने कितनी राशि की जमानत दी  है। क्यों कि यह राशि अक्सर जमानत-प्रपत्र को भरते समय पता नहीं होती और अदालत उसी समय बताती है। तब इस बात की तसल्ली कर लेनी चाहिए कि कितनी राशि की जमानत आप दे रहे हैं। किसी राशि विशेष की जमानत देने का अर्थ है कि आप थाने को या अदालत को यह आश्वासन दे रहे हैं कि अभियुक्त मुकदमे के अनुसंधान के दौरान बुलाये जाने पर पुलिस थाने पर या अदालत में मुकदमे की हर सुनवाई के दिन उपस्थित होता रहेगा और यदि वह आवश्यक होने पर उपस्थित नहीं होगा तो उस के जमानत मुचलके की राशि जब्त कर ली जाएगी। 
ब भी कोई अभियु्क्त न्यायालय में अपेक्षित होने पर उपस्थित नहीं होता है तो उस की जमानत और मुचलका जब्त कर लिए जाते हैं और अभियुक्त की गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी कर दिया जाता है। साथ ही अभियुक्त और जमानती के विरुद्ध एक नयी कार्यवाही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 446 के अंतर्गत संस्थित की जा कर दोनों को सूचना भेजी जाती है कि क्यों न उन से जमानत और मुचलके की राशि वसूल की जाए।  आम तौर पर वारंट पर गिरफ्तार किए जाने से बचने के लिए अभियुक्त स्वयं ही अदालत के सन्मुख उपस्थित हो कर अपनी जमानत का आवेदन देता है तब न्यायालय अभियुक्त की जमानत ले ने के अवसर पर इस धारा 446 की कार्यवाही की भी सुनवाई करता है और उस का निर्णय करता है। अभियुक्त के न्यायालय में उपस्थित हो जाने के कारण न्यायालय जमानत या मुचलके की जब्त की गई राशि में क

जनता की किस को पड़ी है?

पिछले तीन दिन से कोटा में रहने के बावजूद व्यस्तता रही और ‘तीसरा खंबा’ पर कोई पोस्ट नहीं जा सकी। इस बीच कानूनी सलाह चाहने वालों के अनेक मेल मिले हैं। लेकिन इन दिनों उस काम के लिए समय ही नहीं निकाल सका। कानूनी सलाह के लिए समस्या को ठीक से समझना पड़ता है और कभी कभी कानून को दुबारा देखना पड़ता है। उत्तर लिख देने के बाद उसे जाँचना भी पड़ता है। इस व्यस्तता के बीच यह काम नहीं कर सकूंगा। 5 से 12 दिसंबर तक  मैं कोटा से बाहर रहना होगा, इस बीच अंतर्जाल से मेरा संपर्क शायद ही बने। मेरे साथ ही मेरे दोनों ब्लाग अंतर्जाल से अनुपस्थित रहेंगे। इस से कानूनी सलाह चाहने वाले पाठकों को असुविधआ होगी, लेकिन मेरा उन से निवेदन है कि एक-दो सप्ताह प्रतीक्षा करें। मेरा प्रयास होगा कि सभी जरूरी प्रश्नों का उत्तर शीघ्र से शीघ्र दिया जा सके। 
चलिए आज देखें कि कानून के गलियारों में पिछले कुछ दिनों में क्या कुछ हुआ है?
क्या निजि और क्या नहीं?
सुप्रीम कोर्ट ने नीरा रादिया टेप प्रकरण में उद्योगपति रतन टाटा की याचिका पर केन्द्र सरकार को अगले दस दिनों में अपना जवाब देने को कहा है। इस याचिका में रतन टाटा ने सुप्रीम कोर्ट से निवेदन किया है कि सरकार को यह निर्देश दिया जाए कि वह इस मामले की जाँच करे कि उन के और कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा रादिया के साथ हुई निजि बातचीत की टेप कैसे लीक हुई। उन्हों ने यह भी निवेदन किया है कि इस टेप की सामग्री का भविष्य में प्रकाशन रोका जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई 13 दिसंबर को तय की है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया है कि इस टेप की सामग्री प्रकाशित करने वाले दोनों पत्रों आउटलुक और ऑपन को भी, इस मामले में पक्षकार बनाया जाए।
  • न्यायालय कुछ मामलों को छोड़ कर कभी स्वयमेव किसी मामले में हाथ नहीं डालते। लेकिन जब रतन टाटा ने सर्वोच्च न्यायालय का द्वार खटखटा ही दिया है तो अब इस मामले में यह व्याख्यायित होना निश्चित है कि क्या क्या निजि है और क्या नहीं?
‘जनता की किस को पड़ी है?’  
 धर कर्नाटक में लोकायुक्त ने सूचना तकनीक मंत्री कट्टा सुब्रह्मनैया नायडू, उन के कॉरपोरेट पुत्र जगदीश नायडू तथा आठ अन्य संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध करोड़ों के भूमि घोटाले के मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करा दी है। उन पर लगाए गए आरोपों में दस्तावेजों में फर्जीवाड़ा करने , छल करने, बेनामी सौदे करने, मिथ्या दस्तावेज बनाने, फर्जी फर्में बनाने आदि सम्मिलित हैं।  संबंधितों में वे कंपनियाँ सम्मिलित हैं जिन में दोनों पिता-पुत्र भागीदार हैं। यह प्रथम सूचना रिपोर्ट येदुरप्पा सरकार की मुश्किलें और बढ़ा देगी जब कि पहले ही वह मुख्यमंत्री के रिश्तेदारों को सर्वोत्तम भूखंड आवंटित करने के मामले में फँसी पड़ी है। 
  • ये बढ़ते मामले साबित कर रहे हैं कि कांग्रेस और भाजपा दोनों ही दल कारपोरेट जगत के प्रतिनिधि हैं। उन की सरकारें उन्हीं के लिए काम करती हैं। हर राजनीतिज्ञ जानता है कि एक राजनेता होने से एक कारपोरेट होना महत्वपूर्ण है। वह येन-केन-प्रकरेण सारे मूल्यों को ताक पर रख कर अपनी पूंजी बढ़ा कर कॉरपोरेट जगत में महत्वपूर्ण स्थान बन

विधि मंत्री सपने दिखाने का थिएटर चला रहे हैं?

ब केन्द्रीय विधि मंत्री कह रहे हैं कि केन्द्र सरकार एक ऐसे कानून को बनाने पर विचार कर रही है जिस से न्याय प्राप्त करना नागरिकों का मौलिक अधिकार हो जाएगा। यह घोषणा उन्हों ने 23वें एशिया विधि सम्मेलन में बोलते हुए दी। कुछ दिन पहले गुवाहाटी उच्चन्यायालय की अगरतला खंडपीठ के नए भवन के उद्घाटन के समय उन्हों ने कहा था कि “केंद्र सरकार न्यायिक सुधार के लिए कदम उठाने के अलावा नवीनतम सूचना प्रौद्योगिकी की मदद से देशभर के न्यायालय प्रशासन का आधुनिकीकरण करने जा रही है। निचली अदालतों में लंबित सभी मामलों का निपटारा छह माह के भीतर करने के लिए ग्राम न्यायालय (ग्रामीण अदालतों) का गठन किया जा रहा है साथ ही पिछले वर्ष अक्टूबर में देशभर में चलायमान न्यायालय प्रणाली शुरू की गई है।”
विधि मंत्री द्वारा अनेक अवसरों पर की जा रही इन घोषणाओं के लागू होने पर भी देश में न्याय प्राप्त करने के परिदृश्य में कोई बड़ा अंतर आ पाना संभव प्रतीत नहीं होता। यह वैसे ही है जैसे समन्दर को खाली करने के लिए कुछ पंप लगा दिए जाएँ और फिर कहा जाए कि शीघ्र ही समन्दर खाली हो जाएगा। हालत यह है कि इसी वर्ष के सितम्बर माह के अंत में सुप्रीम कोर्ट में 54,732 मामले लंबित थे। जुलाई 2009 में विभिन्न उच्च न्यायालयों में 40 लाख तथा निचली अदालतों में 2.7 करोड़ मामले लंबित थे। लंबित मुकदमों की यह संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। यदि किसी औद्योगिक श्रमिक को 30-35 वर्ष की उम्र में गैर कानूनी रीति से नौकरी से निकाल दिया जाए और वह अदालत से न्याय प्राप्त करना चाहे तो उसे न्याय प्राप्त करने में इतना समय गंवाना पड़ सकता है कि उस की सेवानिवृत्ति की तिथि निकल जायेगी, यह भी हो सकता है कि न्यायालय के निर्णय की पालना होने के पहले वह इस दुनिया से ही विदा ले जाए। यदि उस की सेवा निवृत्ति तिथि निकल जाती है तो अदालत में यह तर्क दिया जाता है कि अब उसे नौकरी में तो रखा ही नहीं जा सकता उसे कुछ आर्थिक राहत दे दी जाए जो 20-25 हजार रुपयों से चार-पाँच लाख रुपयों तक की हो सकती है। इस तरह अंत में उस व्यक्ति को या उस के उत्तराधिकारियों को न्याय के स्थान पर जीवन भर अभावों में जीना पड़ता है, उस का परिवार बर्बाद हो चुका होता है, उस के बच्चे पढ़-लिख नहीं पाते और अंत में खैरात की तरह कुछ रुपये उस की झोली में डाल दिए जाने का आदेश होता है, वह भी कई वर्षों तक निष्पादित नहीं किया जाता। हम इस दृष्टिकोण से विचार करें तो अनेक मामलों देश की अदालतों में किसी तरह का न्याय नहीं हो रहा है। जो हो रहा है उसे तकनीकी न्याय तो कह सकते हैं लेकिन वास्तविक न्याय नहीं कहा जा सकता।
म इस स्थिति का कारण तलाशने की एक कोशिश कर सकते हैं। विधि आयोग ने जुलाई 1987 में अपनी 120वीं रिपोर्ट में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या के लिए ‘न्यायाधीश-जनसंख्या अनुपात’ को जिम्मेदार बताया था। सुप्रीम कोर्ट ने ऑल इंडिया जजेज एसोसिएशन (2002) मामले के पैरा 25 में कहा था कि मामलों के निपटारे में देरी का मुख्य कारण ‘न्यायाधीश- जनसंख्या अनुपात’ ही है। अगर पर्याप्त संख्या में न्यायाधीश  नियुक्त नहीं किए गए तो लोगों को न्याय नहीं मिलेगा। वर्ष 2009 में भारत में यह अनुपात 12.5 न्यायाधीश प्रति दस लाख लोग था, जबकि अमेर

प्रतिवादी या अभियुक्त के पते की जानकारी के बिना उस के विरुद्ध मुकदमा चलाया जाना संभव नहीं है

 मैजिक विंग्स ने पूछा है – – –

मैं भीलवाड़ा का रहने वाला हूं। मैं जयपुर के एक आदमी से 11 हजार रुपए मांगता था, उसने मुझे आईसीआईसीआई बैंक का एक अकाउंट पेयी चैक दिया जब मैंने उसको बैंक में डाला तो वह बाउंस हो गया उसमें पर्याप्‍त पैसा नहीं था। मैं उसके घर का पता नहीं जानता था, ऑफिस का पता जानता था। लेकिन वह ऑफिस बंद कर चुका है। जब मैंने आईसीआईसी बैंक से उसके घर का पता किया, और उस पते पर गया तो वह पता फर्जी निकला। बैंक में भी उसने फर्जी पता ही दे रखा था।  अब क्‍या किया जा सकता है,? क्‍या बैंक वालों के खिलाफ भी धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज होगा या उस आदमी का कुछ नहीं हो सकता।

कृपया मुझे इसकी पूरी जानकारी दें।


उत्तर – – – 

 महोदय,

जिस आदमी से आप को धन प्राप्त करना है, उस का पता तो आप को ही बताना पड़ेगा। आईसीआईसीआई ने भी अपने यहाँ खाता किसी न किसी फोटो आईडी के आधार पर ही खोला होगा। बैंक के विरुद्ध कार्यवाही करने पर अधिक से अधिक यह हो सकता है कि बैंक को कायदे-कानून की पालना करने में लापरवाह माना जाए और उन्हें कुछ दंड भुगतना पड़े। लेकिन इस से बैंक को कोई फर्क नहीं पड़ता। 
चैक तो बाद में अस्तित्व में आया है। पहले तो आपने उस व्यक्ति को रुपया दिया है या उस पर कोई दायित्व छोड़ा है। उस दायित्व की पूर्ति के लिए चैक तो बाद में जारी किया गया है। आप को उस व्यक्ति को रुपया उधार देने या उस पर दायित्व छोड़ने के पहले उस का पता आदि ले कर रखना चाहिए था। बिना पते के तो कोई कार्यवाही अदालत में नहीं की जा सकती है। यदि पुलिस में धोखाधड़ी का मुकदमा भी दर्ज कराएंगे तो पुलिस भी उस में अभियुक्त लापता होने की रिपोर्ट लगा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेगी। आप को स्वयं ही उस व्यक्ति का पता ज्ञात करना होगा। तभी आप कोई कार्यवाही कर पाएंगे।
हाँ, यदि आप को संभावना प्रतीत होती हो कि आप बाद में उस व्यक्ति का पता मालूम कर सकते हैं तो बैंक से चैक अनादरित होने के एक माह के भीतर उस के बैंक में दिए गए पते पर नोटिस भेज कर परक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत कार्यवाही आरंभ कर सकते हैं। बाद में जब भी उस व्यक्ति का पता मालूम हो अदालत को बता कर कार्यवाही को गति प्रदान की जा सकती है।

अदालतों की भाषा वही होनी चाहिए जो उस के अधिकांश न्यायार्थियों की भाषा है

ज भी यह एक प्रश्न हमारे माथे पर चिपका हुआ है कि अदालतों का काम किस भाषा में होना चाहिए? सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों का काम अंग्रेजी में हो रहा है। अनेक राज्यों में अधीनस्थ न्यायालयों का काम भी अंग्रेजी में हो रहा है। राजस्थान, मध्यप्रदेश का मेरा अनुभव है कि वहाँ अधीनस्थ न्यायालयों का काम हि्न्दी में हो रहा है। राजस्थान उच्च न्यायालय हिन्दी में आने वाली याचिकाओं की सुनवाई करता है और न्यायालय में संवाद और बहस का माध्यम अधिकांश हिन्दी ही है। फिर भी यह भाव बना हुआ है कि अंग्रेजी में काम करने वाले अभिभाषक स्तरीय हैं। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में काम  की भाषा का मेरा अनुभव नहीं है लेकिन मेरी जानकारी के अनुसार वहाँ हिन्दी की स्थिति राजस्थान से बेहतर होनी चाहिए। यही स्थिति छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय की होनी चाहिए। इलाहाबाद व पटना उच्च न्यायालय और उन की पीठों में भी हिन्दी अपरिचित नहीं है। मेरे विचार में हिन्दी के हृदयस्थल होने के कारण वहाँ के उच्च न्यायालयों में हिन्दी की स्थिति सर्वाधिक अच्छी होनी चाहिए।  मेरा कुछ माह पहले हरियाणा की अदालतों को देखने का अवसर मिला। मुझे आश्चर्य हुआ कि एक संपूर्ण हिन्दी प्रदेश होने के उपरांत भी वहाँ अधीनस्थ न्यायालयों में काम अंग्रेजी में ही होता है और हिन्दी उपेक्षित है।
दालतों का काम उस भाषा में होना चाहिए जो उस के अधिकांश न्यायार्थियों की भाषा है। यदि न्याय देने का काम एक अपरिचित भाषा में होता है तो निश्चित है कि न्यायार्थी इस बात से अनभिज्ञ रहते हैं कि उन के मामले के साथ क्या हो रहा है। उन्हें उतना ही पता लग पाता है जितना वे समझ पाते हैं या फिर जो उन्हें समझा दिया जाता है। इस से उन्हें न्याय प्राप्त होने में कठिनाई होती है। हरियाणा में यदि एक दीवानी वाद अंग्रेजी में लिखा गया है तो उस में क्या लिखा है यह वाद प्रस्तुत करने वाले को उतना ही पता होता है जितना की उस का वकील उसे बता देता है। जब कि वादी को वाद के अभिवचनों का सत्यापन करना होता है। इस तरह जो सत्यापन किया जाता है या किया जा रहा है उस का कोई अर्थ नहीं है। लेकिन सत्यापन के बिना कोई वाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। समस्या तब खड़ी होती है जब उसी वाद में वादी की साक्ष्य हो रही होती है और तब उस से यह प्रश्न पूछा जाता है कि जो कुछ वह कह रहा है उसे उस ने वाद में अंकित ही नहीं कराया। कानून यह है कि जो तथ्य आप ने वाद में किए गए अभिवचनों में अंकित ही नहीं किया है उस की साक्ष्य प्रस्तुत नहीं की जा सकती है। इस तरह अनेक न्यायार्थियों को हानि होती है।
दालतों में हिन्दी में काम करने पर आने वाली कठिनाइयों की बात है तो इस के पक्ष में दिये जाने वाले सभी तर्क खोखले हैं। राजस्थान की सभी अदालतों में हिन्दी में काम होता है और कोई समस्या खड़ी नहीं होती। राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा हजारों आदेश और निर्णय हिन्दी में पारित किए जा चुके हैं। जहाँ तक मुझे स्मरण है पूर्व न्यायाधीश शिव कुमार शर्मा ने अकेले लगभग ग्यारह हजार से अधिक निर्णय और आदेश हिन्दी में लिखाए थे। वर्तमान में वे विधि आयोग के सदस्य हैं। न्यायालयों को हिन्दी में काम करने मे कोई कठिनाई नहीं होती। यदि कोई ऐसा कहता है तो समझ लीजिए वह बहाना कर रहा है। अदालतों को हिन्दी में काम करने में सब से बड़ी बाधा है तो वह स्वयं हिन्दी भाषी वकील और न्यायाधीश हैं
जो अंग्रेजी में काम करने में अपना सम्मान समझते हैं। पूर्व न्यायाधीश शिवकुमार शर्मा का यह कथन बिलकुल सही है कि सभी उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ प्रस्तुत करने को अनुमत किया जाना चाहिए। चाहे तो यह शर्त जोड़ दी जाए कि उन का अंग्रेजी अनुवाद साथ में प्रस्तुत किया जाए जिस से हिन्दी न जानने वाले जज और पक्षकार को असुविधा नहीं हो।
चलते चलते – – –
क ग्रामीण जिला कलेक्टर से मिलने गया और अपनी समस्या कलेक्टर के सामने रखी। वह अपनी बोली में बोल रहा था। पूरी बात सुनने के बाद कलेक्टर ने उसे सलाह दी कि उसे एक वकील कर लेना चाहिए क्यों कि जो बात वह कह रहा है वह उस की समझ में नहीं आ रही है।
स पर ग्रामीण का कलेक्टर से कहना था कि यदि आप को मेरी बात समझ नहीं आई तो इस में मेरा क्या कसूर है? आप बड़े आदमी हैं, पढ़े लिखे हैं। आप की बात मेरी समझ में न आए तो फिर भी ठीक पर आप को तो मेरी बात समझ में आनी ही चाहिए। वरना आप का पढ़ना लिखना और कलेक्टर बनना बेकार है।

पर्याप्त संख्या में अदालतें स्थापित करने को धन की आवश्यकता है, इस बात को सरकार औऱ संसद के सामने रखने से कानून मंत्रालय को कौन रोक रहा है।

दालतों की कमी अब सर चढ़ कर बोलने लगी है और कानून मंत्रालय सीधे-सीधे नहीं तो गर्दन के पीछे से हाथ निकाल कर कान पकड़ने की कोशिश कर रहा है। कानून मंत्रालय ने सुझाव दिया है कि कोई भी नया कानून बनाने से पहले संसद को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इससे अदालतों पर कितना अतिरिक्त भार पडेगा और इस मकसद के लिए आवश्यक धन के लिए प्रावधान सुनिश्चित किया जाना चाहिए। हालाँकि इस सुझाव से लगता है कि जैसे संसद ही अभी तक पर्याप्त मात्रा में अदालतों की स्थापना को रोके हुए थी। कानून मंत्री एम वीरप्पा मोइली ने वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी को लिखे एक पत्र में कहा है कि किसी भी नए विधेयक या कानून से अदालतों पर पडने वाले अतिरिक्त भार तथा इस उद्देश्य के लिए जरूरी खर्च का आकलन किया जाना चाहिए।  
र्तमान में स्थिति यह है कि देशभर में निचली और उच्च अदालतों में लगभग तीन करोड मामले लंबित हैं और इनकी संख्या धीरे धीरे बढ रही है। वर्ष 2009 के आंकडों पर आधारित सरकार के आकलन के अनुसार भारत में औसतन किसी मुकदमे के अंतिम फ़ैसले में 15 साल का वक्त लगता है। ज्यूडिशल इंपैक्ट असेसमेंट टास्क फ़ोर्स की सिफ़ारिशों पर आधारित मोइली के पत्र में कहा गया है कि सरकार न्यायिक प्रभाव आकलन के जरिए अदालतों द्वारा किसी कानून के कार्यान्वयन में संभावित खर्च का पूर्वानुमान लगा सकती है। टास्क फ़ोर्स ने पूर्व कानून सचिव टीके विश्वनाथन के अनुसंधान कार्य पर आधारित अपनी सिफ़ारिशों में कहा था कि संसद या राज्य विधानसभाओं में पारित होने वाले प्रत्येक विधेयक से अदालतों पर पडने वाले भार का अनुमान मुहैया कराया जाना आवश्यक कर दिया जाना चाहिए। 
कानून मंत्रालय वित्त मंत्रालय को यह बताना तो चाहता है कि नयी अदालतें खोलने के लिए धन की आवश्यकता है। एक बात यह समझ में नहीं आ रही है कि वह यह बात खुल कर सरकारों के सामने क्यों नहीं रखना चाहता। इस बात को खुल कर सरकार और संसद के सामने रखने से कानून मंत्रालय को कौन रोक रहा है।

संशोधित अंक-सूची के लिए उपभोक्ता अदालत में आवेदन किया जा सकता है

राज ने पूछा है —
 

सर जी,
मैने देवी अहिल्या यूनिवर्सिटी में अपनी बी.ए. की अंक-सूची की मूल प्रति पिताजी का नाम सुधार करने हेतु दी थी।  लेकिन 3 माह बाद मैं ने वहा जाकर अंक-सूची मांगी तो बाबू ने कहा अंक-सूची गुम हो चुकी है, मुझे पता नहीं।  मेरे पास रसीद है, मुझे क्या करना चाहिए।  जल्दी समाधान भेजें। मैं आपका आभारी रहूंगा।


समाधान — 

राज जी,

प के पास अंक-सूची जमा कराने की रसीद है, आप पुनः एक आवेदन विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार के नाम  लिख कर दें। जिस में सारी बात लिखें कि आप ने अंक-सूची किस कारण से और कब जमा कराई थी और उस में प्रार्थना करें कि आप को आप के पिताजी का सही नाम अंकित कर के संशोधित अंकसूची प्रदान की जाए। साथ में अंक-सूची की रसीद की फोटो प्रति संलग्न करें। हो सके तो यह आवेदन आप स्वयं रजिस्ट्रार को व्यक्तिगत रूप से दें। आप की समस्या का समाधान हो जाना चाहिए। यदि एक-दो सप्ताह में आप की समस्या का समाधान न हो तो किसी वकील से एक विधिक नोटिस रजिस्ट्रार को भिजवाएँ। इस के उपरांत भी समाधान न होने पर आप चाहें तो जिला उपभोक्ता समस्या प्रतितोष मंच में शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं। वहाँ आप की समस्या का समाधान हो जाएगा।

वकील के मुंशी से सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक

सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश सरोश होमी कपाड़िया 12 मई को देश के 38वें प्रधान न्यायाधीश के रूप में शपथ ले चुके हैं।  वे 28.09.2012 तक इस पद पर बने रहेंगे। न्यायमूर्ति कपाड़िया पहले न्यायाधीश हैं जिन का जन्म आजाद भारत में 29 सितंबर 1947 को एक निर्धन परिवार में हुआ। उन्हों ने अपने जीवन का आरंभ एक वकील के दफ्तर में मुंशी के रूप में की औऱ अपना अध्ययन जारी रखा। विधि स्नातक हो जाने पर उन्हें 10 सितंबर 1974 को एक एडवोकेट के रूप में पंजीकृत किया और उन्हों ने बम्बई उच्च न्यायालय में वकालत प्रारंभ की। 8 अक्टूबर 1991 को वे अतिरिक्त न्यायाधीश के रूप में बम्बई उच्च न्यायालय में नियुक्त हुए। 23 मार्च 1993 को वे स्थाई न्यायाधीश हो गए। 5 अगस्त 2003 को उन्हें उत्तरांचल उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया और 18.12.2003 को वे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त किए गए।
क गरीब परिवार से निकल कर स्वयं अपने श्रम और लगन के आधार पर एक वकील के मुंशी से भारत के मुख्य न्यायाधीश के पद पर पहुँचे। देश की जनता के प्रति प्रतिबद्धता को वे अपनी पूंजी मानते हैं। एक ऐसे व्यक्ति से न्याय प्रणाली के सर्वोच्च पद पर पीठासीन होने पर देश आशा कर सकता है कि वे न्याय प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए काम करेंगे। अपने कार्यकाल में न्यायपालिका की गरिमा को और ऊंचा उठाते हुए न्याय को बिना किसी भेदभाव के आमजन तक पहुँचाने के महत्वपूर्ण कार्य को आगे बढ़ाएंगे। निश्चित ही इस काम में उन्हें न केवल केन्द्रीय सरकार अपितु राज्य सरकारों का सहयोग भी चाहिए। 
तीसरा खंबा देश की न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर पदासीन होने पर उन का स्वागत  और अभिनंदन करता है और आशा करता है कि वे न्याय को देश के हर व्यक्ति तक पहुँचाने के काम को आगे बढ़ाएंगे।
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