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चैक खोने की सूचना बैंक को दे देने पर भी अनादरण की सूचना मिलने पर क्या करें?

cheque dishonour1समस्या-

कय्यूम खान, राजनन्दगाँव, छत्तीसगढ़ ने पूछा है-

मेरा एक चैक गुम हो गया था। जिस की सूचना मैं ने बैंक को दे दी थी। किन्तु वह चैक किसकी के हाथ लग गया। अब उस व्यक्ति ने चैक को भुगतान हेतु बैंक में प्रस्तुत कर दिया और वह अनादरित हो गया। अब वह व्यक्ति मुझे फोन कर के परेशान कर रहा है और केस करने की धमकी दे रहा है।  मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प का चैक खो गया था तब आप के लिए बैंक को सूचना देना मात्र पर्याप्त नहीं था। आप को बैंक में उस चैक को कैंसल करवा देना चाहिए था। तब उस का भुगतान इसी कारण से रोक दिया जाता। अब यदि आप ने बैंक को लिखित सूचना दी थी तो उस की एक प्रमाणित प्रति बैंक से प्राप्त करें। बैंक देने से आनाकानी करे तो सूचना के अधिकार के अन्तर्गत उस प्रति को बैंक से प्राप्त करें।

चैक जिस व्यक्ति ने प्रस्तुत किया है जब तक वह आप को चैक की राशि का भुगतान करने का लिखित सूचना न दे तब तक कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यदि वह चैक की राशि का भुगतान करने का लिखित नोटिस आप को देता है तो आप तुरन्त उस का उत्तर रजिस्टर्ड एडी डाक द्वारा दें कि आप का वह चैक खो गया था जिस की सूचना आप ने बैंक को पहले ही दे दी थी। तथा उस व्यक्ति ने वह चैक गलत लगाया है।

दि फिर भी वह व्यक्ति आप के विरुद्ध मुकदमा चलाता है तो बैंक से प्राप्त आप के पत्र की प्रति तथा नोटिस का जवाब दोनों के आधार पर आप अपना बचाव कर सकते हैं।

सेल्फ चैक अनादरित होने पर भी धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अपराध से नहीं बचा जा सकता।

sbi1समस्या-
सुजानगढ़, राजस्थान से बाबूलाल बोहरा ने पूछा है  –

मैंनें अपनी एक गाड़ी एक व्यक्ति को विक्रय की थी, जिसके बाबत उस व्यक्ति में मेरे 2,00,000/-रुपये बकाया हैं। उस व्यक्ति ने मुझे उक्त रुपये अदा करने हेतु अपने बैंक खाते का एक सेल्फ चैक मेरा नाम उस में अंकित किये बिना 2,00,000/- रुपये की राशि उस में भर कर उसे हस्ताक्षरित कर मुझे दिया था। उक्त चैक मैंने निश्चित अवधि के भीतर कलेक्शन हेतु अपनी बैंक में पेश किया जो समाशोधन हेतु उक्त व्यक्ति की बैंक में भेजा गया परन्तु उसके खाते में पर्याप्त राशि नहीं होने के कारण उक्त चैक डिसऑनर हो गया। मुझे उक्त चैक के डिसऑनर होने की सूचना मिलते ही मैं ने रजिस्टर्ड डाक मय रजिस्टर्ड ए. डी. के द्वारा उस व्यक्ति के पते पर निश्चित अवधि के भीतर नोटिस भेजकर उक्त चैक के डिसऑनर होने की उसे सूचना दी एवम् मैं ने उससे अपनी उक्त चैक की धनराशि 15 दिनों में अदा कर देने हेतु उक्त नोटिस में लिखा जिसकी सम्यक रुप से उस पर तामील हो जाने के बावजूद भी उसने चैक की उक्त राशि का भुगतान मुझे नोटिस की अवधि में नहीं किया जिस कारण मैं ने उक्त व्यक्ति के विरुद्ध निश्चित अवधि के भीतर एक परिवाद अन्तर्गत धारा 138 परक्राम्य लिखित अधिनियम, 1881 के तहत न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया है। जो वर्तमान में न्यायालय में बहस प्रसंज्ञान के प्रक्रम पर विचाराधीन है। मैं इस सम्बन्ध में आपसे यह जानकारी हासिल करना चाहता हूँ कि क्या उक्त प्रकार से जो सेल्फ चैक उसमें मेरा नाम अंकित किये बिना मुझे दिया गया था वह सेल्फ चैक डिसऑनर होने एवं नोटिस की अवधि में उस व्यक्ति के द्वारा मुझे चैक राशि का भुगतान न करने पर उस व्यक्ति का कृत्य अन्तर्गत धारा 138 परक्राम्य लिखित अधिनियम, 1881 में उपबन्धित अपराध की परिभाषा में आता है? और सेल्फ चैक के सम्बन्ध में कानूनी स्थिति क्या है? यदि सम्भव हो सके तो मुझे इस सम्बन्ध में महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांतो से भी अवगत करवाने की कृपा करें।

समाधान –

कानून के अंतर्गत कोई भी चैक सेल्फ नहीं होता। चैक या तो क्रास्ड होता है या खाते में जमा होने वाला होता है या फिर बियरर होता है। हर चैक में यह अंकित होता है कि “ ……………. (किसी व्यक्ति का नाम) या धारक को अदा करें”। इस चैक को बियरर रखा जा सकता है या फिर क्रॉस किया जा सकता है या फिर खाते में जमा होने वाला बनाया जा सकता है। यदि चैक को क्रॉस कर दिया जाए या फिर उस पर अकाउंट पेयी लिखा जाए तो फिर वह उसी व्यक्ति के खाते में जमा होगा जिस का नाम उस पर अंकित है। यदि सेल्फ लिखा हो और छपे हुए बियरर शब्द को न काटा गया हो तो भी जो व्यक्ति उस चैक को ले कर बैंक में उपस्थित होता है वह धारक माना जाएगा। यदि चैक डिसऑनर हो जाता है तो धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम की परिधि में आ जाएगा।

प के मामले में आप ने चैक को अपने बैंक के अपने खाते में जमा कराया और चेक दाता के बैंक में समाशोधन के लिए भेजा गया इस का अर्थ यह है कि चैक पर आप का नाम अंकित था और सेल्फ अंकित नहीं था। यदि उस पर सेल्फ अंकित होते हुए भी आप के धारक होने के कारण बैंक ने चैक को स्वीकार कर चैक दाता के बैंक को भेजा तब भी धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम आकर्षित होगी।

प का मुकदमा सही है। इस पर न्यायालय प्रसंज्ञान ले लेगा तथा चैक दाता के विरुद्ध मुकदमा दर्ज हो कर आगे चलेगा। इस संबंध में 12 जुलाई 2006 को Intech Net Limited And Ors. vs State And Anr के प्रकरण में आन्ध्रप्रदेश उच्च न्यायालय का तथा 17 जुलाई 2013 को  B.Sarvothama vs S.M.Haneef on 17 July, 2013  के मुकदमे में पारित कर्नाटक उच्च न्यायालय का निर्णय महत्वपूर्ण है। इन दोनों निर्णयों को आप उन के उनवान पर चटका लगा कर पढ़ सकते हैं और उन के प्रिंट भी ले सकते हैं।

चैक अनादरण का मुकदमा क्या है? और इस में कितनी सजा हो सकती है?

cheque dishonour1समस्या-
ठीकरी, इंदौर, मध्यप्रदेश से आनन्द सिंह तोमर ने पूछा है-

धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के मुकदमे में क्या होता है? यदि कोर्ट फैसला सुना दे तो कितना जुर्माना और अधिक से अधिक कितनी सजा हो सकती है? यदि सम्पति नाम पर हो और रुपए नहीं दें तब क्या होगा?

समाधान –

ज जिस रूप में यह कानून मौजूद है उस का स्वरूप इस प्रकार है ….

क व्यक्ति के पास किसी अन्य व्यक्ति के खाते का चैक है, जो किसी ऋण के पुनर्भुगतान या किसी अन्य दायित्व के निर्वाह के लिए दिया गया था।  जिस का भुगतान उसे प्राप्त करना है तो वह उस चैक को उस पर अंकित तिथि से वैधता की अवधि समाप्त होने तक अपने बैंक में प्रस्तुत कर उस चैक का धन चैक जारीकर्ता के खाते से प्राप्त कर सकता है।   वैधता की अवधि सामान्य तौर पर चैक पर अंकित जारी करने की तिथि के तीन माह के भीतर और विशेष रूप से चैक पर अंकित इस से कम अवधि तक के लिए वैध होता है।  किसी भी कारण से यह चैक अनादरित (बाउंस) हो कर वापस आ सकता है।    वैधता की अवधि के दौरान इस वापस आए चैक को कितनी ही बार भुगतान हेतु बैंक में प्रस्तुत किया जा सकता है।

दि इस चैक का भुगतान किसी भी तरीके से नहीं होता है और चैक अनादरित ही रह जाता है तो अंतिम बार उस के बैंक से अनादरण की सूचना प्राप्त होने से 30 दिनों की अवधि में चैक धारक लिखित सूचना (नोटिस) के माध्यम से चैक जारीकर्ता से चैक की राशि पन्द्रह दिनों में भुगतान करने की मांग करे और यह नोटिस प्राप्त होने के पन्द्रह दिनों में भी उस चैक की राशि चैक धारक को चैक जारीकर्ता भुगतान करने में असफल रहे तो चैक का यह अनादरण एक अपराध हो जाता है।  चैक धारक नोटिस की पन्द्रह दिनों की अवधि समाप्त होने के तीस दिनों के भीतर अदालत में अपराध की शिकायत दर्ज करा सकता है।

स शिकायत पर अदालत प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्त (चैक जारी कर्ता) के विरुद्ध समन जारी करेगी और अभियुक्त के न्यायालय में उपस्थित हो जाने पर मामले की सुनवाई करेगी।  अभियोजन की साक्ष्य के उपरांत अभियुक्त को सफाई में साक्ष्य का अवसर देगी और सुनवाई के उपरांत अभियुक्त को दोषी पाए जाने पर न्यायालय उसे दो वर्ष तक के कारावास और चैक की राशि से दो गुना राशि तक के जुर्माने की सजा से दंडित कर सकता है। जुर्माना अदा न होने पर अभियुक्त को अधिकतम छह माह तक की अवधि का अतिरिक्त कारावास भुगतना पड़ सकता है।

ह मामला पूरी तरह से दस्तावेजों पर आधारित है।  चैक, उसे बैंक में प्रस्तुत करने की रसीद, उस के अनादरित होने की सूचना, चैक जारी कर्ता को उस के पते पर भेजा गया नोटिस सभी दस्तावेज हैं और अकेले शिकायतकर्ता के बयान से प्रमाणित किए जा सकते हैं।  यदि कोई गंभीर त्रुटि न हो जाए तो शिकायत का सीधा अर्थ चैक जारीकर्ता को  सजा होना है।

धारा 138  के सभी मामलों में एक ही बात है जो चैक जारीकर्ता के पक्ष में जा सकती थी, वह यह कि चैक किसी ऋण के भुगतान या किसी अन्य दायित्व के निर्वाह के लिए नहीं दिया गया हो।  आम तौर पर नियम यह है कि जो किसी कथन को प्रस्तुत करेगा वही उसे प्रमाणित करेगा।  सामान्य कानून के अनुसार इस तथ्य को कि चैक किसी ऋण के भुगतान या किसी अन्य दायित्व के निर्वाह के लिए दिया गया था,  प्रमाणित करने का दायित्व शिकायतकर्ता पर होना चाहिए था।  लेकिन धारा 139 में यह उपबंधित किया गया है कि जब तक अभियुक्त विपरीत रूप से प्रमाणित नहीं कर दे कि चैक को किसी दायित्व के निर्वाह या ऋण के भुगतान हेतु जारी किया हुआ ही माना जाएगा।  धारा 139 ने ही इस कानून को मारक बना दिया है और चैक जारी कर्ता के लिए कोई सफाई नहीं छोड़ी है।

प के मामले में भी आप के व परिवादी के बीच कोई समझौता न हो पाने और समझौते के आधार पर मुकदमे का निर्णय न हो पाने पर आप को अधिकतम दो वर्ष तक के कारावास और चैक की राशि से दो गुना राशि तक के जुर्माने की सजा से दंडित किया जा सकता है। जुर्माना अदा न होने पर अभियुक्त को अधिकतम छह माह तक की अवधि का अतिरिक्त कारावास भुगतना पड़ सकता है। दंड प्रक्रिया संहिता में यह भी उपबंध है कि जुर्माने की राशि अभियुक्त की संपत्ति की कुर्की कर के उस से वसूल की जा सकती है। इस तरह यदि आप के नाम पर कोई संपत्ति है तो उसे कुर्क कर के उस से भी जुर्माने की राशि वसूल की जा सकती है।

क्या एक वर्ष पूर्व अनादरित चैक के आधार पर भी रुपया वसूल किया जा सकता है?

समस्या-

मेरे पिताजी ने एक व्‍यक्ति को 3,00,000/- रुपया उधार दिया था।  उस ने समय पर नहीं लौटाया, वह बार बार बहाने के बनाता था।  आखिर में उसने एक चैक दिया जो जनवरी 2011 का था।  चैक बैंक में जमा किया तो यह लिखा हुआ आया कि उस के खाते में पैसा नहीं है।  फिर उस ने समय मांग लिया और इस प्रकार आज तक वो टाल ही रहा है।  पिता जी ने उसे कोई नोटिस नहीं भेजा क्‍योंकि वह व्‍यक्ति रिश्‍तेदार था।  अंत में बहाने की जगह उसकी भाषा यह हो गयी है कि हम रुपया नही देंगे।  अब क्‍या इतना समय निकल जाने के बाद हम उस चैक और बैंक की स्ल्पि के आधार पर उससे पैसा ले सकते है।  कृपया उचित मागदर्शन करे।

-कमलेश सिंह, भोपाल, मध्यप्रदेश

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप के पिताजी ने जो रुपया उधार दिया था उस का कोई सबूत है या नहीं?  मुझे लगता है कि उस का कोई न कोई सबूत अवश्य ही होगा।  आप के पिताजी ने रुपया चैक द्वारा उसे दिया होगा तो चैक के खाते से निकलने और उस के खाते में जाने का सबूत होगा।  किसी डायरी में उस की लिखत होगी।   हो सकता है उस रुपए की रसीद आप के पिता जी ने प्राप्त की हो।  यदि कुछ भी नहीं है तो कम से कम एक या दो गवाह तो इस बात के होंगे कि रुपया उन के सामने उधार दिया था।  यह भी हो सकता है कि किसी के सामने आप के पिता जी ने उधार दिया रूपया मांगा हो और उस व्यक्ति ने जल्दी देने या कुछ समय बाद देने का वायदा किया हो।  इन दस्तावेजी और मौखिक सबूतों में से एकाधिक सबूतों से यह साबित किया जा सकता है कि आप के पिता जी ने उस व्यक्ति को रुपया उधार दिया था।

दि आप के पिता जी को दिए गए चैक की तिथि राशि रुपया उधार देने की तिथि से तीन वर्ष के भीतर ही है तो फिर इस चैक को रुपया उधार लेने की संस्वीकृति (Acknowledgment) माना जा सकता है।  ऐसी अवस्था में जब कि चैक जनवरी 2011 का है उस की तिथि से तीन वर्ष की अवधि में अर्थात दिसम्बर 2013 तक आप के पिता जी उक्त व्यक्ति से रुपया वसूल करने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

प के प्रश्न से यह प्रतीत होता है कि आप यह जानना चाहते हैं कि क्या धारा-138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत भी कार्यवाही की जा सकती है या नहीं? तो अब उक्त चैक के आधार पर ऐसी कार्यवाही नहीं की जा सकती।  कोई भी चैक केवल उस की वैधता की अवधि (जो तीन माह या छह माह होती है)  में कई बैंक में प्रस्तुत किया जा सकता है।  चैक अनादरित होने की सूचना बैंक से प्राप्त होने के 30 दिन की अवधि में ही आप उस चैक की राशि नकद वापस लौटाने का नोटिस चैकदाता को दे सकते हैं और इस नोटिस के चैकदाता द्वारा प्राप्त करने की तिथि से 45 दिन की अवधि में ही धारा-138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत परिवाद न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है,  इस के बाद नहीं।  इस तरह अब आप के पिताजी धारा-138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत परिवाद प्रस्तुत नहीं कर सकते।  लेकिन जो रीति हम ने ऊपर बताई है उस के अनुसार रुपया वसूली के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।  दीवानी वाद प्रस्तुत करने के लिए उन्हें वसूली जाने वाली धनराशि के अनुपात में न्यायालय शुल्क अदा करनी होगी।

नोटिस वापस लौटा देने पर भी चैक अनादरण का मुकदमा किया जा सकता है

समस्या-

क परिचित व्यक्ति को उस की बहिन की शादी के लिए मैं ने एक लाख रुपए की मदद की।  उस ने उस राशि के भुगतान के लिए मुझे अपना चैक दिया।  किन्तु चैक अनादरित हो गया। मैं ने उसे जब ये बताया तो उस ने मुझ से बात करनी ही बन्द कर दी।  मैं ने उसे वकील का नोटिस भेजा तो उस ने लेने से इन्कार कर दिया जिस से नोटिस वापस आ गया।  क्या मैं उस पर धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अन्तर्गत मुकदमा कर सकता हूँ? उस पर कितना खर्चा आएगा?

-दानिश खान, नागपुर, महाराष्ट्र

समाधान-

प उस व्यक्ति पर धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम का मुकदमा कर सकते हैं।  उस के द्वारा नोटिस न लेने का अर्थ यह है कि उसे चैक के अनादरित होने की सूचना है और उसे यह भी पता है कि यह नोटिस किस कारण से भेजा है।  नोटिस को वापस कर देना नोटिस को प्राप्त कर लेने के समान है।

न्यायालय में मुकदमा कर देने पर अभियुक्त व्यक्ति यह कह सकता है कि उसे नोटिस मिला ही नहीं।  तब न्यायालय उसे यह भी कह सकता है कि आप को न्यायालय का नोटिस तो मिल गया है उस के मिलने के बाद 15 दिनों में आप को भुगतान कर देना चाहिए था।

प को यह मुकदमा आप के द्वारा भेजे गए नोटिस के भेजे जाने के 45 दिनों के अंदर कर देना चाहिए।  अन्यथा परिसीमा से बाधित होने का अवसर हो सकता है। इस तरह के मामले में न्यायालय में चार-पाँच सौ से अधिक का खर्च नहीं आता है।  लेकिन वकील की फीस इस के अलावा होगी।  यह चैक की धनराशि रुपए एक लाख की दस प्रतिशत या कम या अधिक भी हो सकती है।  लेकिन उस की परवाह न करें।  न्यायालय आप को आप की राशि के अलावा अच्छा खासा न्यायालय व्यय और हर्जाना दिला सकता है।

चैक अनादरण मामले : अभियुक्त मर गया तो समझो परिवादी भी मारा गया

 
 फ़ैजाबाद, उत्तर प्रदेश से मृत्युञ्जय ने पूछा है –

क व्यक्ति से मेरा व्यापारिक लेनदेन चलता था। बाद में उसने मेरा 8,80,000/- रुपया नहीं दिया तो मैंने उस के द्वारा दिए गए चैकों के अनादरण के आधार पर उसके ऊपर धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम का मुकदमा किया है। अभी 16 सितम्बर को उस व्यक्ति की मृत्यु हो गयी। उसकी शादी नहीं हुई थी और उसकी कोई स्वार्जित संपत्ति नहीं है।उसके पिता के पास काफी संपत्ति है और वह उसे बेचने पर अमादा है। यह संपत्ति जिस व्यक्ति के ऊपर मैंने मुकदमा किया है उसके दादा या परदादा (उसके पिता के दादा)  के द्वारा अर्जित की गई थी। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाने के बाद क्या इस संपत्ति से उसके हिस्से के आधार पर या अन्य किसी तरह कोई वसूली हो सकती है? क्या मैं किसी तरह उसके पिता को संपत्ति बेचने से रोक सकता हूँ।  वह व्यक्ति अभी मेरे द्वारा अप्रैल 2008 में किये गए मुक़दमे में हाजिर तक नहीं हुआ था। बाद में उल्टा मुझे ही अपने वकील के माध्यम से नोटिस भेजा था। उसके ऊपर दीवानी का मुकदमा करने के लिए एक बहुत बड़ी रकम कोर्ट फीस के रूप में भी देना पड़ेगा जो मेरे लिए बड़ा मुश्किल है।  लेकिन किसी तरह इंतजाम तो करना ही पड़ेगा। कृपया यह सलाह दे की मुझे दीवानी का वाद किस आधार पर प्रस्तुत करना चाहिए? और क्या वह मुकदमा करने के बाद मुझे मेरा पैसा मिलने की कोई संभावना दिख रही है अथवा नहीं? मै निर्णय नहीं ले पा रहा हूँ कि मुझे अब क्या

 

 
 
 कानूनी सलाह –
 
मृत्युञ्जय की समस्या के अवलोकन से पता लगता है कि उन्होंने अपने व्यापारिक लेन-देन की उधारी वसूलने के लिए किसी व्यक्ति के विरुद्ध उस व्यक्ति द्वारा उन्हें दिए गए चैकों के आधार पर परक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत अप्रेल 2008 में मुकदमा किया। इस मुकदमे को चलते तीन वर्ष से अधिक हो चुके हैं।
रक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत मुकदमा एक अपराधिक मुकदमा है। कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को किसी कानूनन वसूली योग्य उधार या अन्य किसी दायित्व के भुगतान के लिए चैक देता है। चैक धारक द्वारा चैक को भुगतान हेतु बैंक में प्रस्तुत करने पर वह बैंक द्वारा चैकदाता के बैंक खाते में चैक के भुगतान के लिए पर्याप्त धनराशि न होने के कारण अनादरित कर दिया जाता है तो यह माना जाएगा कि चैकदाता ने अपराध किया है जिस के लिए उसे दो वर्ष तक के कारावास, या चैक की राशि की दुगनी राशि तक का जुर्माने, या दोनों से दंडित किया जा सकता है। लेकिन इस के लिए यह आवश्यक है कि –
1. चैक को बैंक में जारी करने की तिथि के छह माह की अवधि में अथवा उस चैक की वैधता की अवधि में, जो भी कम हो बैंक में प्रस्तुत किया गया हो।
2. चैक प्राप्तकर्ता चैक के अनादरण की सूचना प्राप्त होने के तीस दिनों की अवधि में अनादरित चैक की राशि चैकदाता से प्राप्त करने के लिए लिखित में चैकदाता से चैकराशि की मांग करे।
3. चैकदाता उसे लिखित मांगपत्र प्राप्त होने की तिथि से 15 दिनों की अवधि में चैकराशि का भुगतान चैक धारक को करने में असमर्थ रहे।
 
स तरह के मामले में जब तक कि अन्यथा साबित न कर दिया जाए तब तक चह माना जाएगा कि चैक धारक ने चैक किसी कानूनन वसूली योग्य उधार या अन्य किसी दायित्व के लिए ही प्राप्त किया था।
 
स मामले में न्यायालय तभी प्रसंज्ञान ले सकता है जब कि उस के समक्ष कार्रवाई के लिए कारण उत्पन्न हो जाने की तिथि से 30 दिनों की अवधि में परिवाद प्रस्तुत कर दिया गया हो। हालाँकि  न्यायालय 30 दिनों के उपरान्त प्रस्तुत किया गए परिवाद पर प्रसंज्ञान ले सकती है यदि उसे संतुष्ट कर दिया जाए कि 30 दिनों की निर्धारित अवधि में परिवाद प्रस्तुत नहीं करने के लिए परिवादी (चैक धारक) के पास समुचित कारण था। इस मामले में कार्रवाई के लिए कारण तब उत्पन्न हो जाता है जब कि चैकदाता को चैकराशि का मांगपत्र प्राप्त हो जाने की तिथि से 15 दिनों की अवधि समाप्त हो जाती है।
स पूरे कानून में कहीं भी यह उपबंधित नहीं है कि अपराध साबित हो जाने पर अभियुक्त को जुर्माने के दंड से दंडित किया ही जाएगा। यह भी उपबंधित नहीं है कि किया गया जुर्माने की राशि से कोई राशि चैकधारक को दिलायी जाएगी। इस तरह यह स्पष्ट है कि धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम तथा सम्बन्धित उपबंध किसी कानूनन वसूली जा सकने वाली धनराशि की वसूली के लिए है। लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357 की उपधारा 1 (ख) में यह उपबंधित किया गया है कि दंडादेश से वसूल किए गए जुर्माने या उस के किसी भाग का उपयोजन उस अपराध द्वारा हुई हानि या क्षति का प्रतिकर देने में किया जा सकता है यदि न्यायालय की राय में ऐसे व्यक्ति द्वारा  प्रतिकर दीवानी न्यायालय में वसूल किया जा सकता है।
 
न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता के उक्त उपबंध का उपयोग कर के ही जुर्माने के रूप में वसूल की गई राशि का एक भाग चैक धारक को दिलाने का आदेश देते हैं। यह राशि आम तौर पर चैक की राशि और उस पर अर्जित किए जा सकने वाले ब्याज के समरूप होती है। इस तरह चैक धारक को उस के द्वारा दीवानी न्यायालय द्वारा वसूल की जा सकने वाली राशि प्राप्त हो जाती है। दीवानी दावा करने के लिए चैक धारक को दावे के मूल्यांकन के आधार पर न्याय शुल्क देनी होती है जो दावे के मूल्य की 5 से 10 प्रतिशत तक हो सकती है। इस न्याय शुल्क को बचाने के लिए लोग अब चैक अनादरण के आधार पर फौजदारी मुकदमे करते हैं लेकिन उस की राशि को वसूल करने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत नहीं करते। दीवानी वाद प्रस्तुत करने की अवधि धनराशि उधार दिए जाने की तिथि से केवल तीन वर्ष की है। इस अवधि में वाद प्रस्तुत न करने पर बाद में वाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता।
 
जैसा कि मृत्युञ्जय के मामले मे हुआ है। धनराशि दिए हुए तीन वर्ष से अधिक की अवधि व्यतीत हो चुकी है और चैक दाता की मृ्त्यु हो गयी। अब चैक अनादरण का अपराधिक मुकदमा तो अभियुक्त की मृत्यु के साथ ही समाप्त हो जाएगा। उस से मृत्युञ्जय को कोई राशि प्राप्त होना संभव नहीं है। मृतक अभियुक्त की संपत्ति यदि कोई हो तो उस से भी किसी भी प्रकार से उधार या अन्य दायित्व की राशि वसूल करने का कोई जरिया नहीं है, क्यों कि दीवानी वाद प्रस्तुत करने की अवधि तो समाप्त हो चुकी है। यदि मृत्यु़ञ्जय कोई दीवानी वाद प्रस्तुत करते हैं तो वह अवधि बाधित होने के कारण निरस्त कर दिया जाएगा और उन के द्वारा अदा की गई न्याय शुल्क की राशि की उन्हें और हानि हो जाएगी। मृत्युञ्जय को समझ लेना चाहिए कि उधार की राशि डूब गई है और उसे वसूल करने की हर कोशिश में उसे ही हानि होगी।
 
ब प्रश्न यह भी है कि तब किया क्या जाए? यदि कानूनी रूप से वसूले जाने योग्य उधार दी गई अथवा किसी दायित्व को चुकाने के लिए दिए गए चैक के अनादरित हो जाने पर धारा 138 परक्राम्य अधिनियम के अंतर्गत परिवाद प्रस्तुत कर दिया गया हो तो भी उस राशि को वसूलने के लिए किया जा सकने वाला दीवानी वाद उस के प्रस्तुत करने की अवधि समाप्त होने के पहले प्रस्तुत कर देना चाहिए। अन्यथा जिस दिन परिवादी अपने वकील को कहेगा कि अभियुक्त मर गया है तो वकील परिवादी को भी यही कहेगा कि तुम भी मारे गए।
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