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विक्रेता वही वस्तु विक्रय कर सकता है जो उस के पास है।

agreementसमस्या-

गजेन्द्र कुमार मीना ने ऑफिस नं. 9, प्रथम तल डीडीए मार्केट, जीएच-4 पश्चिम विवाह दिल्ली से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं ने अभी एक अलवर राजस्थान में एक जमीन खरीदी है 110 वर्ग गज, परन्तु रजिस्ट्री नही हुई है, नोटरी का एग्रीमेंट हुआ है। रजिस्ट्री में लिखा गया है कि ये जमीन मंदिर माफ़ी की आराजी महाराज की है, जिस पर विक्रेता का कब्जा है। क्या आप मुझे बतायेंगे कि मंदिर माफ़ी (नाम) की जमीन की रजिस्ट्री नहीं होती है तो मेरा एग्रीमेंट कानून जायज है या नहीं?

समाधान-

प इतना तो समझते ही होंगे कि जो चीज आप की नहीं है उसे आप बेच नहीं सकते। यदि आप किसी ऐसी वस्तु को मुझे बेचने का करार करते हैं जो आप की नहीं है तो वह करार सही नहीं होगा। लेकिन वह वस्तु आप के कब्जे में है और जब तक वह आप के कब्जे में है आप उस के माध्यम से हर वर्ष कुछ कमाई कर लेते हैं या उस वस्तु का उपयोग कर सकते हैं तो वैसी स्थिति में उस वस्तु का कब्जा भी मूल्यवान हो उठता है। यदि आप यह कहते हुए कि इस वस्तु पर मेरा स्वामित्व तो नहीं है लेकिन इस का कब्जा मेरे पास है और यह वस्तु मैं आप को दे रहा हूँ तो वह वस्तु मेरे स्वामित्व की तो नहीं होगी। लेकिन जब तक वह मेरे कब्जे में रहेगी मैं उस का उपयोग कर सकता हूँ या उस से लाभ कमा सकता हूँ।

ऐसी ही स्थिति आप के इस एग्रीमेंट की है। विक्रेता आप को स्पष्ट रूप से कह रहा है कि उस जमीन पर उस का स्वामित्व नहीं है, केवल कब्जा है जिसे वह आप को बेच रहा है। अब आप के पास जब तक वह जमीन कब्जे में है आप उस का उपयोग कर सकते हैं। इस तरह आप उस जमीन का स्वामित्व नहीं अपितु उस का केवल कब्जा खरीद रहे हैं।

जहाँ तक रजिस्ट्री का प्रश्न है तो आप के इस एग्रीमेंट की रजिस्ट्री हो भी सकती है। क्यों कि इस एग्रीमेंट में कुछ बी नाजायज या गैर कानूनी नहीं है। उस व्यक्ति के पास केवल कब्जा था और वह आप को वही विक्रय कर सकता है। लेकिन एग्रीमेंट या विक्रय पत्र के पंजीयन से भी आप को केवल कब्जा ही मिलेगा न कि उस जमीन का स्वामित्व। उस जमीन का स्वामित्व तो तभी मिल सकता है जब कि उस जमीन का स्वामी उस वस्तु को आप को विक्रय कर दे। जब तक उस जमीन को आप से वापस लेने के लिए उस का स्वामी कोई कानूनी कार्यवाही कर के आप से उस का कब्जा नहीं ले लेता है तब तक आप उस जमीन का उपयोग कर सकते हैं।

एग्रीमेण्ट या कांट्रेक्ट लिखित ही होने चाहिए …

No employmentसमस्या-

सुरेन्द्र कुमार ने हनुमानगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क प्राइवेट ब्राइट स्टेप ट्रेनिंग सेन्टर (एजेंसी) ने एनएसडीसी भारत सरकार के दी नेशनल स्किल सर्टिफिकेशन एण्ड मोनेटरी रिवार्ड स्कीम के अन्तर्गत छात्रों को स्किल ट्रेनिंग देने के लिए मुझे लड़के लड़कियों के फार्म (प्रार्थना पत्र) लेने को कहा और प्रति छात्र 500 रुपए देने को कहा। छात्रों की स्कोलरशिप सीधे जीरो बैलेंस पर खुले बैंक खातों में आ गई। एजेंसी को प्रति छात्र 10000 रुपए मिले उन्हें स्किल करने के लिए। एजेंसी ने मुझे मेरे मेहनताने के 21000 रुपए मिलने थे जो देने से एजेंसी ने इन्कार कर दिया। कोई लिखित एग्रीमेंट नहीं हुआ था। मैं बेरोजगार हूँ, मैं क्या करूँ?

समाधान-

जेंसी ने आप के साथ एक एग्रीमेंट किया था कि आप उन के लिए छात्र जुटाएंगे, वे प्रति छात्र आप को 500 रुपया देंगे। आप ने अपनी सेवाएँ दे दीं लेकिन उन्होने आप को आप की सेवाओँ की कीमत अदा नहीं की। इस तरह उन्हों ने इस एग्रीमेंट का उल्लंघन किया। कानूनी रूप से आप उन के विरुद्ध रुपए 21000 की वसूली का दीवानी वाद न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन जो भी दीवानी मुकदमा दाखिल करता है यह उस की जिम्मेदारी है कि वह एग्रीमेंट को साबित करे।

चूँकि आप के पास लिखित एग्रीमेंट नहीं है, वह मौखिक था। उस का कोई गवाह भी नहीं है। वैसी स्थिति में आप किसी तरह यह साबित नहीं कर पाएंगे कि आप के व एजेंसी के मध्य कोई एग्रीमेंट हुआ था। आप का वाद सबूतों के अभाव में खारिज हो जाएगा। इसी कारण कोई भी एग्रीमेंट मौखिक नहीं होना चाहिए। हर एग्रीमेंट लिखित होना चाहिए और उस के ऐसे गवाह भी होने चाहिए जो ये कह सकें कि उन के सामने ऐसा एग्रीमेंट हुआ था। इस के साथ इस बात का भी कोई हिसाब होना चाहिए कि वे फार्म आपने ही भरवाए थे। क्यों कि एग्रीमेंट के साथ साथ आप को यह भी साबित करना होगा कि एग्रीमेंट के अनुसार आप ने कितना काम किया था और कितना पैसा आप का बनता है।

क तरह से यह छल है। लेकिन छल यदि संपत्ति के संबंध में किया जाए तो ही अपराध कहलाता है। यदि कोई छल कर के किसी के काम करा ले और पैसा न दे तो यह हरकत भारतीय कानून के अन्तर्गत अपराध नहीं है। वैसी अवस्था में इस तरह का छल एक आम बात है। हमारे पास इस तरह की समस्याएँ ले कर लोग प्रतिदिन आते हैं लेकिन चूंकि यह न तो दंडनीय अपराध है और न ही कांट्रेक्ट व काम करने का कोई सबूत इस कारण हम किसी की कोई मदद नहीं कर पाते। इस लिए जब भी किसी तरह का एग्रीमेंट या कांट्रेक्ट हो वह लिखित होना चाहिए और उस के गवाह भी होने चाहिए वर्ना लोग ऐसे ही छले जाते रहेंगे।

किरायानामा अक्सर 11 माह की अवधि के लिए क्यों लिखा होता है?

समस्या-

जोधपुर, राजस्थान से प्रहलाद ने पूछा है –

मैं अपनी दुकान किराए पर देना चाहता हूँ। दुकान का किरायानामा 11 माह के लिए लिखाया जाए या पिर पाँच वर्ष के लिए? किराएदार जान-पहचान का है। पाँच वर्ष का किरायानामा बना लें तो कैसा रहेगा?

समाधान-

पंजीयन अधिनियम के अनुसार यदि किराएदारी एक वर्ष या इस से अधिक काल के लिए की जाती है तो ऐसा किरायानामा रजिस्टर्ड होना चाहिए। यही कारण है कि लोग ग्यारह माह का किरायानामा लिखाते हैं जिस से उस का पंजीयन नहीं कराना पड़े।  यही कारण है कि अधिकांश किराएनामें 11 माह की अवधि के लिए लिखे होते हैं।  पाँच वर्ष का किरायानामा लिखवाने पर आप को किरायानामा पंजीकृत कराना होगा तथा दो वर्ष के किराए की राशि के बराबर राशि की संपति के विक्रय पत्र पर निर्धारित स्टाम्प ड्यूटी अदा करनी होगी।  शायद स्टाम्प ड्यूटी के रूप में इतनी राशि देने पर किराएदार सहमत नहीं होगा।

लेकिन यदि किरायानामा पांच वर्ष की अवधि के लिए लिखा और पंजीकृत कराया जाता है और उस में यह शर्त होती है कि आप पाँच वर्ष के पूर्व आप दुकान को खाली नहीं करा सकेंगे। तो फिर आप केवल इस आधार पर कि किराएनामे की अवधि समाप्त हो गई है अपनी दुकान को खाली करवा सकते हैं।

लिखित आदेश, नियुक्ति पत्र या अनुबंध के बिना कहीं कोई मजदूरी न करें

समस्या-

ताजपुर, जिला-समस्तीपुर, राज्य-बिहार से पंकज कुमार ने पूछा है-

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की शाखा मालपुर (कोड 08396) जिला वैशाली, बिहार के शाखा प्रबंधक श्री बैजू पासवान ने मुझे अपनी शाखा में डाटा एंट्री कार्य के लिए प्राइवेट से आठ हजार रुपया मासिक पर नौकरी रखा था। मैं ने 23 अप्रैल 2012 से काम शुरू किया। मुझे एलसीपीसी रजिस्टर दिया गया जिस पर. खाता सं., सीआईएफ नंबर, खातेदार का नाम और तिथि एंट्री  करना पड़ता था।  23 अप्रैल 2012 से कार्य करता रहा।  इसके अलावा मुझसे और भी काम कराया गया।  जैसे पानी पिलाना, गेट खोलना या बंद करना, छायाप्रति करवाकर लाना, फाइल बढ़ाना इत्यादी।  यानि शाखा प्रबंधक महोदय के आदेसनुसार जो भी कार्य दिया जाता मैं वो सभी कार्य करता था।  मैं उनसे जब भी अपना पारिश्रमिक माँगा तो उन्होंने मुझे केवल आश्वासन देते रहे कि तुम काम करते रहो, एजीएम बदल गए हैं इसलिए तुम्हारा भुगतान होने में देरी हो रही है।  तुम्हारा काम अच्छा है इसी तरह काम करते रहो। बहुत जल्द ही तुम मेरे साथ एजीएम के यहाँ चलना वहीं से आदेश लेकर तुम्हारा भुगतान कर दूंगा।  इसी बीच बहुत कहने पर जून में 1,000=00 रुपया तथा अगस्त में 2,000=00 रुपया एडवांस दिए थे। मैं  इनके आश्वासन पर चुपचाप काम करता रहा।  जब अक्टूबर 2012 ख़त्म होने वाला था तो मुझे डाक्टर के यहाँ जाने के लिए पैसे की जरुरत हुई तो मैंने उनसे पैसा माँगा तो उन्होंने मुझे कहा की किसी से क़र्ज़ लेकर काम चलाओ और 09 या 10 नवम्बर 2012 को आना तुम्हारा पूर्ण भुगतान कर दिया जायेगा।  जब मै 09 तारीख को बैंक पर गया तो उन्होंने मुझे कहा की तुम्हारा तो तीन हजार रुपया ही बनता है। मैं स्तब्ध! रह गया। जब मैं उनसे हाथ जोड़कर विनती करने लगा तब उन्होंने गार्ड को बुलाकर मुझे गेट से बाहर करवा दिया।  23 अप्रैल 2012 से अक्टूबर 2012 तक कार्य किया जिसका पारिश्रमिक 48,000=00 (अड़तालीस हजार रुपया) बनता है 3,000 काटकर 45,000=00 (पैतालीस हजार) बकाया निकलता है। लेकिन वो नहीं दे रहे हैं।  मैं बहुत परेशान हूँ, कुछ समझ नहीं आ रहा है।  साथ ही कोई लिखित उन्होंने मुझे नहीं दिया है। हां काम का रिकॉर्ड जरुर है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प ने उक्त काम मौखिक आश्वासन पर किया था। आप को प्रतिमाह आठ हजार रुपया देने को ब्रांच मैनेजर ने कहा था आप के पास इस का कोई लिखित सबूत नहीं है। लेकिन यदि किन्हीं व्यक्तियों के सामने यह बात हुई हो तो आप उन व्यक्तियों की साक्ष्य (गवाही) के माध्यम से यह साबित कर सकते हैं कि आप को आठ हजार रुपया प्रतिमाह पर नौकरी पर रखा गया था। इसी तरह आप आप के द्वारा किए गए काम के रिकॉर्ड तथा मौखिक गवाही से यह साबित कर सकते हैं कि आप से अप्रेल से अगस्त तक काम लिया गया है।

म तौर पर शाखा प्रबंधक को किसी व्यक्ति को नौकरी पर रखने का कोई अधिकार नहीं होता है। इस का अधिकार एजीएम या किसी उच्चाधिकारी को ही होता है। हाँ यदि उच्चाधिकारी यह अवश्य कर सकते हैं कि शाखा में कार्याधिक्य होने पर कुछ काम आकस्मिक कर्मचारी लगा कर करवा सकते हैं। जिस के लिए कुछ धनराशि खर्च करने का अधिकार शाखा प्रबंधक को मिल जाता है। ऐसी स्थिति में वे आकस्मिक कर्मचारी नियुक्त कर सकते हैं। ऐसा लगता है कि आप के शाखा प्रबंधक ने एजीएम के इस आश्वासन पर कि उन्हें आकस्मिक कर्मचारी रखने की अनुमति दे दी जाएगी आप को नियोजित कर काम करवा लिया और बाद में एजीएम ने अनुमति देने से इन्कार कर दिया। ऐसे मामलों में यह साबित करना कि आप को किसी निश्चित वेतन पर नियोजित किया गया था, आप ने किस अवधि में काम किया और आप का कितना वेतन बकाया है यह साबित करना अत्यन्त कठिन होता है।

लेकिन आप ने काम किया है तो उस की मजदूरी आप को मिलनी चाहिए। आप को अपनी मजदूरी प्राप्त करने के लिए मजदूरी भुगतान अधिनियम के अंतर्गत तुरंत एक आवेदन प्राधिकारी मजूदूरी (वेतन) भुगतान अधिनियम के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए। इस आवेदन में आप को उक्त शाखा के ब्रांच मैनेजर, तत्कालीन ब्रांच मैनेजर बैजू पासवान तथा एजीएम को पक्षकार बनाना चाहिए। मौखिक साक्ष्य से तथा दस्तावेजी साक्ष्य से साबित किया जा सकता है कि आप को आठ हजार रुपए प्रतिमाह पर नियोजित किया गया था। और आपने अप्रेल से अक्टूबर तक काम किया है। यदि दस्तावेजी साक्ष्य़ आप के पास नहीं है तो बैंक द्वारा जवाब प्रस्तुत करने के उपरान्त तथा आप की साक्ष्य प्रस्तुत होने के पहले दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 11 नियम 12 व 14 के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर आप अपने पक्ष के प्रासंगिक दस्तावेज बैंक से प्रस्तुतु कराने के लिए न्यायालय से प्रार्थना कर सकते हैं। इस आवेदन को प्रस्तुत करने के लिए आप को किसी स्थानीय वकील या फिर किसी ट्रेड यूनियन अधिकारी की सेवाएँ प्राप्त करनी चाहिए।  भविष्य में आप को ध्यान रखना चाहिए कि बिना किसी लिखित आदेश, नियुक्ति पत्र या अनुबंध के कहीं पर भी कोई मजदूरी न करें। यह भी ध्यान रखें कि किसी प्रपत्र या पंजी में आप की प्रतिदिन की उपस्थिति अंकित की जाती है या नहीं। जहाँ तक हो सके उपस्थिति का सबूत अपने पास रखें।

अनुबंध (Agreement) कितने रुपए के स्टाम्प पर होना चाहिए?

समस्या-

भोपाल, मध्यप्रदेश से राजेश ने पूछा है-

मैं ने एक व्यक्ति के साथ कोई इकरारनामा (एग्रीमेंट) किया है।  लेकिन यह सादा कागज पर है और उस में उस व्यक्ति के, मेरे तथा एक साक्षी के हस्ताक्षर हैं। आगे चल कर कोई विवाद होने पर क्या यह अनुबंध मान्य होगा? क्या इसे स्टाम्प पर कराना जरूरी है? यह कितने रुपए के स्टाम्प पर होना चाहिए? क्या इस के अलावा भी कुछ कराना होगा।

समाधान-

प ने यह नहीं बताया है कि यह अनुबंध किस काम के लिए किया गया है और लिखत का विषय क्या है?  यूँ मध्यप्रदेश स्टाम्प अधिनियम में अनुबंध पर कोई स्टाम्प ड्यूटी नहीं लगाई गई है।  लेकिन अनेक अनुबंध अन्य लिखतों की श्रेणी में आते हैं। जिन पर स्टाम्प ड्यूटी लगानी आवश्यक है। जब तक आप ये न बताएँ कि अनुबंध किस विषय से संबंधित है और उस लिखत को क्या कहा जा सकता है? तब तक यह बताना संभव नहीं है कि कितनी स्टाम्प ड्यूटी अदा करनी होगी? कितने मूल्य के स्टाम्प पर इसे लिखा जाना चाहिए और इस के अतिरिक्त क्या करना चाहिए। वैसे कोई भी लिखत नोटेरी से सत्यापित करवा लेनी चाहिए। इस से विवाद के समय उसे साबित करना आसान होगा। यदि आप लिखत ले कर सत्यापन के लिए किसी नोटेरी से संपर्क करेंगे तो वही बता देगा कि उसे कितने रुपए के स्टाम्प पर होना चाहिए। मध्यप्रदेश में किन किन लिखतों पर स्टाम्प ड्यूटी लगाई गई है और कितनी लगाई गई है यह आप यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

भूमि सौदे में छल की गंध आते ही तुरन्त कार्यवाही करें

समस्या-

मेरी दिवंगत माताजी ने एक प्लॉट 14-01-2009 को खरीदा था जिस का नोटरी के यहाँ प्रमाणित अनुबंध में उल्लेख है कि 75% रकम अभी और शेष 25% रकम 5 माह बाद देय होगी तभी रजिस्ट्री की जाएगी।  किंतु उसके बाद मेरी माता का स्वाथ्य खराब रहने लगा।  मेरी माता जी ने 5 माह बाद जब उस व्यक्ति को रकम देते हुए रजिस्ट्री कराने को कहा तो उसने कहा पहले आप अपनी तबीयत सही कर लो।  रजिस्ट्री तो बाद में भी  हो जाएगी।  किंतु 03-10-2009 को मेरी माता का देहांत हो गया उसके पश्चात मैं ने कई बार उससे अपने प्लाट की रजिस्ट्री कराने को कहा पहले तो वह टालता रहा, फिर कहने लगा मैं ने उसे बेच दिया और तुम्हारा पैसा भी मैं नहीं दूँगा।  इसी बीच मेरे पिताजी का देहांत भी 04-08-2011 को हो गया।  मेरी  दो बहिनें हैं।  जिनका विवाह हो चुका है।  मैं अकेला हूँ, मैं प्लाट कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?

-आशीष पँवार, उज्जैन, मध्यप्रदेश

समाधान-

प का प्रारंभिक अनुबंध 14 जनवरी 2009 को हुआ था, उस के 5 माह बाद आप की माता जी ने शेष राशि का भुगतान किया।  इन दोनों भुगतानों की रसीद का बड़ा महत्व है।  आप को संविदा के विशेष पालन के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करना चाहिए।  लेकिन यह वाद कारण उत्पन्न होने के तीन वर्ष की अवधि में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए। जनवरी से पाँच माह जून में हो जाते हैं। यदि जून 2009 में शेष राशि का भुगतान किया है तो वाद प्रस्तुत करने का समय निकल चुका है।  हो सकता है किसी कारण से अभी भी वाद प्रस्तुत करने का समय शेष हो।  लेकिन इस के लिए आप को तुरन्त किसी अनुभवी वकील से मिलना होगा वह आप से तमाम तथ्यों की पूछताछ करने के बाद यह पता कर सकेगा कि आप के मामले में दीवानी वाद अब किया जा सकता है अथवा नहीं।

लेकिन विक्रेता ने आप से सौदा करने के बाद भी उस भूखंड को विक्रय कर दिया है तो यह आप के साथ छल करने का अपराध है।  इस अपराध के लिए आप पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा सकते हैं।  थाने द्वारा कार्यवाही न किए जाने पर पुलिस अधीक्षक को डाक से भिजवा सकते हैं।  सप्ताह भर में कोई कार्यवाही न होने पर आप न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं।  यह आप को अवश्य करना चाहिए।  आज कल संपत्ति के विशेष रूप से भूखंडों के सौदों में बहुत छल-कपट हो रहा है।  इस कारण से बहुत सावधान रहना चाहिए और धोखे की संभावना की गंध आते ही तुरन्त कार्यवाही भी करनी चाहिए।   आप इस मामले को बिलकुल भी न टालें, तुरंन्त किसी अच्छे वकील से मिल कर कार्यवाही कराएँ।

विवाह विच्छेद की डिक्री सक्षम न्यायालय से प्राप्त किए बिना दूसरा विवाह वैध नहीं होगा

समस्या-

मेरी शादी फरवरी 2008 में हुई थी। लेकिन मेरे प्रति पति के यौन उदासीन रहने और विवाह के भुक्त होने के कारण पति के साथ नोटेरी के समक्ष प्रमाणित अनुबंध कर के मेरा तलाक हो गया है। अब मैं दूसरा विवाह करना चाहती हूँ। यदि मैं विवाह करती हूँ तो क्या यह विवाह वैध होगा?

-रीता सिंह, मुरादाबाद, उत्तरप्रदेश

समाधान-

दि कोई व्यक्ति जिस पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है और वह आदिवासी नहीं है तो उस का विवाह बिना सक्षम न्यायालय की डिक्री के विच्छेद नहीं हो सकता। एक हिन्दू विवाह को विच्छेद करने के लिए न्यायालय की डिक्री प्राप्त करना आवश्यक है।

 

दि आप बिना सक्षम न्यायालय से विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त किए केवल नोटेरी द्वारा प्रमाणित किए गए अनुबंध को विवाह विच्छेद मान कर दुबारा विवाह करती हैं तो यह दूसरा विवाह कानूनन अवैध होगा। यह विवाह भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के अन्तर्गत अपराध भी होगा जिस के लिए आप को सात वर्ष तक के कारावास के दंड से दंडित किया जा सकता है।

विक्रेता के नाम नामान्तरण न होने पर भी क्या उस से मकान खरीदने का अनुबंध किया जा सकता है ?

समस्या-

म एक मकान पानीपत हरियाणा में खरीद रहे हैं। उक्त मकान के विक्रय का अनुबंध करने और अग्रिम राशि विक्रेता को देने के पहले हमने तहसील में पता किया तो उन्हों ने हमें  पटवारी के पास भेजा जिस ने हमें बताया कि जिस से आप मकान ले रहे हैं उस के नाम नामान्तरण (इन्तकाल) नहीं खुला है। उस के नाम इन्तकाल खुलने पर ही आप के नाम विक्रय पत्र पंजीकृत हो सकेगा। इन्तकाल खुलने में एक-दो माह का समय लगेगा। इस मामले में विक्रयमूल्य की 10-15 प्रतिशत राशि विक्रेता को दे कर उस से मकान खरीदने का अनुबंध करने में किसी तरह का कोई खतरा तो नहीं है? हमें क्या करना चाहिए?

-दीपक कुमार, पानीपत, हरियाणा

समाधान-

म तौर पर जब भी कोई संपत्ति खरीदने के लिए अनुबंध किया जाता है तो विक्रेता कुछ राशि अग्रिम मांगता है। यह राशि यदि संपत्ति के मूल्य की 10 से 15 प्रतिशत हो तो इस तरह राशि का अग्रिम भुगतान कर के संपत्ति क्रय करने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन आप जिस मकान को खरीदना चाहते हैं उस का अभी बेचने वाले के नाम का ही नामांतरण राजस्व रिकार्ड में नहीं हुआ है। इस का अर्थ यह है कि विक्रेता ने पहले जिस व्यक्ति से मकान खरीदा था उस से विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर उस का पंजीयन तो करवा लिया किन्तु उस के बाद राजस्व रिकार्ड में नामान्तरण नहीं करवाया है। यह भी सही है कि नामान्तरण होने में एक-दो माह या इस से भी अधिक समय लग सकता है और उस के बिना विक्रेता आप के नाम संपत्ति के विक्रय पत्र का पंजीयन नहीं करवा सकता।

दि आप ने खरीदी जा रही समस्त संपत्ति के स्वामित्व के मूल दस्तावेज देख लिए हों और आप विश्वस्त हों कि वे सही हैं तो आप संपत्ति को क्रय करने का अनुबंध कर सकते हैं। लेकिन आप को यह विश्वास होना चाहिए कि जिस व्यक्ति के साथ आप यह अनुबंध कर रहे हैं वह संपत्ति का स्वामी है और बाद में अनुबंध का पालन अवश्य करेगा। इस के साथ ही जो विक्रय अनुबंध आप उस के साथ करना चाह रहे हैं उस में यह अवश्य लिखवाएँ कि विक्रेता अनुबंध की तिथि से निश्चित समय (दो या तीन या चार माह) में अपने नाम इन्तकाल खुलवा कर मकान के विक्रय पत्र निष्पादित कर देगा और उस का पंजीयन करवा देगा। यदि उस ने इस निश्चित अवधि में विक्रय पत्र का पंजीयन नहीं करवाया तो यह अनुबंध का अपखंडन माना जाएगा और वैसी स्थिति में विक्रेता आप को आप के द्वारा उसे अदा की गई अग्रिम राशि का दो गुना राशि अदा करेगा।

दि विक्रेता समय पर विक्रय पत्र का पंजीयन नहीं करवाता है तो आप उसे नोटिस दे कर अग्रिम  भुगतान की गई धनराशि से दुगनी राशि की मांग कर सकते हैं। विक्रेता द्वारा यह राशि नहीं लौटाने पर आप उस के विरुद्ध संविदा का पालन न करने के लिए आप के द्वारा अदा की गई राशि की दुगनी राशि की वसूली के लिए वाद प्रस्तुत कर सकते हैं और कानूनन उस की वसूली कर सकते हैं। इस वाद के प्रस्तुत किए जाने के साथ ही आप उस संपत्ति को अटैच करवा सकते हैं जिस से आप की राशि की वसूली सुनिश्चित हो जाए।

साक्षी का दायित्व है कि सच बयान करे

पाठक गुलशन पूछते हैं …

विक्रय के अनुबंध (एग्रीमेण्ट) में साक्षी का क्या दायित्व है।  विक्रेता ने कपट (फ्रॉड) कर के क्रेता के नाम और अनुबंध की शर्तों को बदल दिया। सफेदा (white flude) लगा कर नाम बदल दिया। अगर गवाह नए क्रेता और अनुबंध की शर्तों से इन्कार कर दे और कहे कि नए अनुबंध में उस की गवाही को न माना जाए तो क्या अनुबंध निरस्त हो सकता है?  मैं उस अनुबंध में गवाह हूँ।
उत्तर …
गुलशन जी,
किसी भी दस्तावेज पर किसी गवाह के हस्ताक्षर इस लिए कराए जाते हैं कि उस दस्तावेज के किसी न्यायिक कार्यवाही में विवादित हो जाने पर वह गवाही दे सके कि उस की उपस्थिति में दस्तावेज को निष्पादित किया गया था। उस का यह कर्तव्य भी है कि वह न्यायालय को अथवा सक्षम प्राधिकारी के समक्ष बुलाए जाने पर सत्य तथ्यों को प्रकट करे और दस्तावेज के निष्पादन की अवस्था न्यायालय या प्राधिकरण को बताए। 
प के द्वारा प्रदर्शित मामले में आप ने जिस स्थिति में उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए हैं वही आप को बयान करना चाहिए। यदि आप के हस्ताक्षर होने के बाद एकतरफा तरीके से दस्तावेज में कपट पूर्वक कोई परिवर्तन किया गया है तो वह भी आप को अदालत के समक्ष बयान करना चाहिए। यही एक साक्षी का कर्तव्य है। यहाँ यदि आप कहेंगे कि दस्तावेज के निष्पादन के बाद दस्तावेज को अपने पास रखने वाले व्यक्ति ने उस में एकतरफा परिवर्तन किए हैं तो निश्चित रूप से अनुबंध का वर्तमान परिवर्तित स्वरूप निरस्त हो जाएगा।

नोटेरी से तस्दीक विक्रय अनुबंध के बाद विक्रय पत्र की रजिस्ट्री कैसे कराएँ?

अमित जाँगीड़ पूछते हैं –

मैं ने गाँव में एक 252 वर्ग फुट का भूखंड खरीदा है। जिस विक्रयपत्र केवल नोटेरी द्वारा तस्दीक किया गया है। किस प्रकार से उस की रजिस्ट्री कराई जा सकती है?

 उत्तर –

अमित जी,

किसी भी स्थाई संपत्ति का विक्रय पत्र कानून द्वारा तभी मान्य हो सकता है जब कि वह उस क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत हो।  यदि आप के पास का दस्तावेज केवल नोटेरी द्वारा तस्दीक किया हुआ है तो वह विक्रय-पत्र नहीं है केवल विक्रय का अनुबंध है। यदि आप विक्रय का मूल्य अदा कर चुके हैं तो विक्रेता से कहिए कि वह विक्रयपत्र निष्पादित कर उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत कराएँ। 
इस के लिए विक्रेता को उप पंजीयक के कार्यालय में उपस्थित होना पड़ेगा। साथ में आप को दो गवाह भी ले जाने होंगे और स्टाम्प ड्यूटी तथा पंजीकरण शुल्क भी अदा करनी पड़ेगा। पंजीकरण हो जाएगा। यदि विक्रेता विक्रय पत्र निष्पादित करने और उसे पंजीकृत कराने में आनाकानी करे तो आप उसे कानूनी नोटिस दें और फिर भी वह ऐसा न करे तो आप विक्रय पत्र निष्पादित करने और उसे पंजीकृत करवाने के लिए उक्त अनुबंध जो कि एक संविदा भी है उस की विनिर्दिष्ट पालना कराने के लिए सिविल न्यायालय में दावा पेश कर सकते हैं। न्यायालय डिक्री पारित कर देगा उस के उपरांत आप उस डिक्री के आधार पर विक्रय पत्र का पंजीयन उप पंजीयक के कार्यालय में जा कर करवा सकते हैं।
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