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अभियुक्त को फरार घोषित कराएँ।

समस्या-

दशरथ वर्मा ने उज्जैन, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

न्यायालय में चैक बाउंस का धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनयम का परिवाद प्रस्तुत किया था जिस पर प्रसंज्ञान लिए जाने पर अभियुक्त के विरुद्ध समन जारी हुए हैं। लेकिन अभियुक्त उस के दिए पते से मकान खाली कर अन्यत्र चला गया है इस लिए उसे समन की तामील नहीं हो रही है। क्या किया जाए?

समाधान-

किसी भी अपराधिक प्रकरण में अभियोजक (मुकदमा चलाने वाले) की यह जिम्मेदारी है कि वह अभियुक्त का पता ठिकाना मालूम करे और उसे किसी भी तरह न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कराए। अपराधिक मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति (यदि अभियुक्त की स्वयं की प्रार्थना पर अदालत द्वारा उपस्थिति से कोई मुक्ति प्रदान न कर दी गयी हो) में कोई कार्यवाही हो सकना संभव नहीं है।

इस के लिए अभियोजक न्यायालय से पुलिस के नाम समन, गिरफ्तारी या जमानती वारंट जारी करवा सकता है। जिन मामलों में स्वयं सरकार अभियोजक होती है उन में भी यही प्रक्रिया है। इस मामले में अभियोजक भी आप ही हैं तो अभियुक्त का पता तो आप को ज्ञात करना होगा और न्यायालय को दे कर उस पते के लिए समन या वारंट जारी कराना होगा। अदालत यह कर सकती है कि जारी समन या वारंट को आप को वह दस्ती देने का आदेश दे दे जिस से आप खुद उसे ले जा कर पुलिस को साथ ले कर निशादेही से तामील करवा सकें।

यदि फिर भी अभियुक्त नहीं मिलता है और जानबूझ कर छुपा रहता है तो आप न्यायालय को धारा 82 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत फरार घोषित करने की उद्घोषणा के लिए आवेदन कर सकते हैं। जिस के अंतर्गत अभियुक्त की संपत्ति को कुर्क किया जा सकता है। अभियुक्त का ऐसी स्थिति में मिलना आप की कोशिश पर ही निर्भर करता है। पुलिस और अदालत आप की मदद कर सकते हैं लेकिन अभियुक्त को तो आप को तलाश करना ही होगा अन्यथा आप का यह मुकदमा करना बेकार हो जाएगा।

कोई झूठे मुकदमे में फँसा दें तो क्या करें?

rp_courtroom11.jpgसमस्या-

जितेन्द्र ने नई दिल्ली से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं देहली में रहता हूँ और पढ़ाई करता हूँ। मेरा गांव मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में है। मार्च 31 को गांव में मेरे छोटे भाई का झगड़ा हुआ। उसने FIR करवाया तो सामने वाली पार्टी ने भी क्रॉस FIR में मेरा नाम भी लिखवा दिया। मैंने पुलिस थाने में सूचना भी दी कि मैं मौजूद ही नहीं हूँ, फिर मेरा नाम कैसे दर्ज किया जा सकता है। परन्तु नाम को लिखकर उन्होंने पिताजी से झूठी जमानत भी करवा ली और मेरा नाम कोर्ट में दे दिया। वहाँ कुछ व्यक्ति ने झूठी गवाही भी दे दी कि मैं था। अब कोर्ट से भी मैं ने जमानत ली! आगे मुझे कैसे क्या स्टेप लेना चाहिए क्योंकि इस घटना की जानकारी मैंने SP कार्यालय मे भी दी थी, मेल भी किया था। इसी बीच मेरा एग्जाम था जिसका मेरा लास्ट अटेम्प्ट था। अब इस घटना के कारण मेरा उस में सिलेक्शन नहीं हो पाया! मैं यह चाहता हूँ क्या इसको आधार बनाकर मैं पुलिस और उन गवाहों के ऊपर मानहानि का केस लगाऊँ। क्या मैं ऐसा सकता हूँ, यदि कर सकता हूँ तो कैसे? और नहीं तो फिर ऐसे तो कोई भी कभी भी किसी को कही भी झूटी रिपोर्ट में फसाँ सकता है क्या?

समाधान

ब से पहले तो आप के विरुद्ध जो फौजदारी मुकदमा चल रहा है उस में किसी अच्छे वकील से पैरवी करानी चाहिए। जिस से आप उस प्रकरण में निर्दोष साबित हों। यह बहुत आवश्यक है। आप की इस शिकायत में कुछ दम नहीं नजर आता है कि इस एफआईआर के कारण आप का सलेक्शन नौकरी के लिए नहीं हो पाया आप ने बताया भी नहीं कि आप के विरुद्ध मुकदमा किन धाराओँ में है।

दि आप को उस मुकदमे में निर्दोष पाया जाता है तो उस के निर्णय की प्रमाणित प्रति प्राप्त कीजिए। जब वह प्रमाणित प्रति मिल जाए तब आप रिपोर्ट कराने वाले के विरुद्ध मानहानि का अपराधिक मुकदमा कर सकते हैं। इस के अलावा आप दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए क्षतिपूर्ति का दीवानी वाद भी कर सकते हैं जिस में आप आप को हुई क्षतियों के अतिरिक्त मानहानि के लिए भी हर्जाना मांग सकते हैं। इस सम्बन्ध में पूर्व में भी तीसरा खंबा पर बहुत लिखा गया है। आप ऊपर दायीं और दिए गए गहरे नीले रंग के सर्च बाक्स की मदद से मानहानि और दुर्भावना पूर्ण अभियोजन से संबंधित लेख पढ़ सकते हैं।

दुर्भावनापूर्ण अभियोजन व मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति हेतु दीवानी वाद व अपराधिक अभियोजन दोनों किए जा सकते हैं।

rp_law-suit.jpgसमस्या-

सुनील कुमार ने भोपाल, मध्यप्रदेश समस्या भेजी है कि-

मेरे भाई और उसकी पत्नी के बीच सम्बन्ध अच्छे नहीं होने की वजह से मेरे भाई ने उसे तलाक का नोटिस दिया और 2002 में न्यायालय में वाद दायर कर दिया। |उस के बाद मेरे भाई की पत्नी ने हमारे पूरे परिवार के खिलाफ दहेज़ प्रताड़ना और मारपीट का झूठा मुकदमा न्यायालय में दायर कर दिया, इसी दौरान उस ने अपने पीहर पक्ष के लोगो के साथ मिलकर हमें कई बार पुलिस की प्रताड़ना भी दी ताकि मेरा भाई तलाक की अर्जी वापस ले ले। लेकिन मेरे भाई ने ऐसा नहीं किया; और अब 2015 में दहेज़ के झूठे मामले में स्थानीय न्यायालय का फैसला आ गया जिस में पूरे परिवार को बरी कर दिया गया और माननीय न्यायालय ने उसे झूठा मुकदमा करार दिया। अब मैं आपसे सलाह लेना चाहता हूँ कि क्या मैं अपने भाई की पत्नी और उसके पीहर पक्ष वालों के खिलाफ मानहानि का दावा कर सकता हूँ। क्योंकि पूरे सात वर्ष तक हम पूरे परिवार वाले लगातार परेशान रहे, दावे की क्या प्रक्रिया होगी, क्योंकि मेरे भाई की पत्नी ने सारा झूठा मुकदमा और पुलिस प्रताड़ना अपने पीहर वालो की मदद और मिलीभगत से किया था?

समाधान-

ब यह प्रमाणित हो गया है कि मुकदमा झूठा था तो आप अब दो काम कर सकते हैं। एक तो आप और वे सभी लोग जिन्हें इस मुकदमे में अभियुक्त बनाया गया था, दुर्भावना पूर्ण अभियोजन तथा मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति का दावा कर सकते हैं। इस के लिए आप को न्यायालय में साबित करना होगा कि 1. आप को मिथ्या रूप से अभियोजित किया गया था, 2. उक्त अभियोजन का समापन होने पर आप को दोष मुक्त कर दिया गया है, 3. अभियोजन बिना किसी उचित और उपयुक्त कारण के किया गया था, 4. अभियोजन करने में दुर्भावना सम्मिलित थी और 5. आप को उक्त अभियोजन से आर्थिक तथा सम्मान की हानि हुई है। आप को उक्त मुकदमे की प्रथम सूचना रिपोर्ट, आरोप पत्र तथा निर्णय की प्रमाणित प्रतियों की आवश्यकता होगी इन की दो दो प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त कर लें। जितनी राशि की क्षतिपूर्ति के लिए आप दावा प्रस्तुत करेंगे उस पर आप को न्यायालय शुल्क नियम के अनुसार देनी होगी। प्रक्रिया दीवानी होगी और वैसे ही चलेगी जैसे क्षतिपूर्ति के लिए दीवानी वाद की होती है।

स के अतिरिक्त आप उक्त दस्तावेजों के साथ साथ मिथ्या अभियोजन व मानहानि के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 211 व 500 में परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इस पर प्रसंज्ञान लेने और अपराधिक मुकदमे की तरह प्रक्रिया पूर्ण हो कर न्यायालय निर्णय प्रदान करेगा। इस में मिथ्या अभियोजन करने वाले दो वर्ष तक के कारावास और अर्थदंड की सजा हो सकती है। आप को इन दोनों ही कार्यवाहियाँ करने के लिए किसी स्थानीय वकील की सेवाएँ प्राप्त करना होगा।

प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो गयी है तो पहले जमानत कराइए फिर बचाव की कोशिश करिए।

rp_police-station2.jpgसमस्या-

झुन्ना श्रीवास्तव ने बतौली, बिहार से समस्या भेजी है कि-

बिजली बिभाग ने हम पर टोका फसाकर चोरी से बिजली जलाने की प्राथमिकी दर्ज करा दी। जबकि मेरे पास बैध कनेक्शन है। मैं पुलिस को रसीद दिखाया, लेकिन फिर भी पुलिस गिरफतारी आदेश जरी कर दी है। पुलिस बोल रही है, आप बिजली बिभाग से लिखवाकर लायें की बैध कनेक्शन है। लेकिन बिजली बिभाग बोल रहा है की अगर कोर्ट मांगेगा तो लिख कर देंगे। मैं सूचना के अधिकार से भी माँगा लेकिन सूचना नहीं दे रहे हैं। मैं पुलिस और बिजली बिभाग के पास गुहार कई बार लगाई लेकिन कोई नहीं सुन रहा है। बिजली बिभाग 5 मीटर तार का जब्ति की सूचि बनाई गई है। जिस पर सिर्फ़ बिजली कर्मचारी का ही हस्ताक्षर है। जबकि कुछ भी जप्त नहीं किया गया। नियमनुसार स्थानीय व्यक्ति से जब्ति सूचि पर हस्ताक्षर कराना चाहिए था। जब्ति सूचि नियमानुसार नहीं बनाना अपराध है कि नहीं अगर है तो मैं अलग से कोर्ट में परिवाद दाखिल कर सकता हूँ कि नहीं? मुझे इस की शिकायत कहाँ करनी चाहिए।

समाधान-

सा कोई नियम नहीं है कि जब्ती की सूची पर बिजली विभाग का कर्मचारी गवाह नहीं हो सकता। यह जरूर है कि पुलिस को स्वतंत्र गवाह तलाश करना चाहिए था। लेकिन यदि स्वतंत्र गवाह की तलाश की जाए और कोई उपलब्ध नहीं हो तो बिजली विभाग का कर्मचारी भी गवाह बनाया जा सकता है। आप के ये सभी तर्क जब आप के विरुद्ध मुकदमा चलेगा तब आप के बचाव में काम आ सकते हैं। अन्वेषण के इस स्तर पर नहीं।

ह भी कोई जरूरी नहीं कि जिस के पास वैध कनेक्शन है वे चोरी कर ही नहीं सकते। सब से ज्यादा वे ही चोरी करते हैं जिन के पास कनेक्शन हैं। सारे उद्योगों के पास वैध कनेक्शन होते हैं और सब से ज्यादा कटिया वही मारते हैं जिस का कभी पता नहीं चलता। यह तर्क भी कोई अधिक मायने नहीं रखता।

दि एफआईआर दर्ज हो गयी है तो पहले जमानत कराइए। फिर आप अपने तर्क अदालत में बचाव में प्रस्तुत करते रहिएगा।

किसी गलत अपराधिक मामले से बचने के लिए सारे तथ्य अंकित करते हुए कानूनी नोटिस दिलवाएँ …

justiceसमस्या-

अजमेर, राजस्थान से सुरेश कुमार ने पूछा है –

मेरे एक दोस्त की माँ को उस की नानी की मृत्यु के बाद नानी की नॉमिनी होने के कारण सावधि जमा का धन मिल गया। माँ उसे दुबारा सावधि जमा करना चाहती थी, मगर पिता जी उस धन को खेत मे खर्च करना चाहते थे। माँ ने एक अकाउंट पेयी चैक से अपना धन मेरे दोस्त यानी अपने बेटे के बैंक अकाउंट में हस्तान्तरित करवा दिया। माँ के कहने पर बेटे ने अपने नामे से सावधि जमा करली। इस पर पिता ने अपने पुत्र की पत्नी के जेवरात अपने पास रख लिए। जब पुत्रवधु ने अपने जेवरात माँगे तो पिता ने कहा कि मैं ने तो अपने काम के लिए उन जेवरात को बेच दिया। अब माँ अपनी सावधि जमा का धन वापस लेना चाहती है। मेरा दोस्त अपनी पत्नी के जेवरात सावधि जमा का धन वापस लौटाने को सहमत है लेकिन मगर पिता जी जेवरात देने को सहमत नहीं हैं। अब माँ और पिता जी दोनों एक हो कर कहते है कि अगर सावधि जमा का पैसा नहीं दिया तो वे पुलिस में रिपोर्ट कर देंगे कि उस ने धोखा देकर माँ के खाते से पैसा अपने खाते में हस्तान्तरित करवा कर सावधि जमा अपने नाम बनवा ली। दोस्त के पास किसी प्रकार की कोई लिखा-पढ़ी नहीं है। सावधि जमा की राशि और जेवरात की कीमत करीब बराबर ही है।  चैक माँ के खाते का था लेकिन चैक में विवरण दोस्त के हाथ से लिखा गया था। क्या माँ ओर पिता जी उस के नाम रिपोर्ट लिखा सकते हैं, और क्या उस के खिलाफ कोई क़ानूनी धारा लग सकती है? उसे क्या करना चाहिए?

समाधान-

कोई भी व्यक्ति पुलिस में रिपोर्ट कराना चाहे तो कर सकता है उस पर किसी तरह की कोरई रोक नहीं है। यदि पुलिस समझती है कि कोई संज्ञेय अपराध हुआ है तो वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण कर सकती है और पर्याप्त सबूत होने पर अभियुक्त को गिरफ्तार कर सकती है और न्यायालय में उस के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत कर सकती है।

जिस तरह यह मामला माता-पिता और पुत्र-पुत्रवधु के बीच है, उस से नहीं लगता है कि कोई रिपोर्ट माता-पिता द्वारा दर्ज कराई जाएगी। लेकिन फिर भी सावधानी रखना जरूरी है। जिस तरह आप के दोस्त को डर लग रहा है कि माता-पिता रिपोर्ट दर्ज करवा देंगे जब कि कोई अपराध आप के दोस्त ने किया ही नहीं है।  उधर पिता द्वारा पुत्रवधु के जेवर रख लेना या उन्हें बेच देना तो गंभीर अपराध है। पुत्रवधु के जेवर उस का स्त्री-धन हैं। यदि ससुर उस के जेवर देने से इन्कार करता है या उन्हें बेच देता है तो यह धारा 406 आईपीसी के अन्तर्गत अमानत में खयानत का अपराध है। मेरे विचार में आप के दोस्त की पत्नी यदि रिपोर्ट दर्ज करवा दे तो दोस्त के माता-पिता दोनों ही मुकदमे में बुरी तरह से फँस जाएंगे। पुत्रवधु के प्रति मानसिक क्रूरता का बर्ताव करने के कारण धारा 498-ए के अपराध में भी उन के विरुद्ध मुकदमा बनेगा।

स स्थिति में आप के दोस्त के पास सब से अच्छा उपाय ये है कि वे किसी स्थानीय वकील से संपर्क कर के अपनी और अपनी पत्नी की ओर से एक संयुक्त विधिक नोटिस अपने माता-पिता को भिजवाएँ जिस में ऊपर वर्णित समूची स्थिति का उल्लेख करते हुए यह कहें कि वह अपनी माता को सावधि जमा का धन लौटाने को सदैव तैयार रहा है और अब भी है। लेकिन माता-पिता अपनी पुत्रवधु के जेवर नहीं लौटा रहे हैं जिस से पुत्रवधु को गहरा मानसिक संताप हुआ है जो कि क्रूरता की श्रेणी में आता है तथा माता-पिता दोनों धारा 406 तथा 498-ए के अपराध के दोषी हैं। यदि वे नोटिस मिलने के बाद एक निश्चित अवधि 15 या 30 दिनों में जेवर लौटा दें तो आप का मित्र उसी समय सावधि जमा की जो राशि उसे चैक द्वारा दी गई थी उसे लौटा देगा, यदि माता-पिता उक्त जेवरात नहीं लौटाते हैं तो वे दोनों कानूनी कार्यवाही करने को बाध्य होंगे।

स नोटिस से सारी बात स्पष्ट हो जाएगी तथा माता-पिता घर में बैठ कर ही सारे मामले को निपटा लेंगे। यदि फिर भी वे मामले को नहीं निपटाते हैं तो सारे तथ्य अंकित करते हुए आप का मित्र व उस की पत्नी एक संयुक्त रिपोर्ट पुलिस थाना को प्रस्तुत कर के प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकता है। इस तरह के मामलों में पुलिस भी पहले मामले को आपस में निपटाने को प्राथमिकता देती है। पुलिस के हस्तक्षेप से मामला निपट सकता है। इस नोटिस से कम से कम इतना तो होगा कि यदि माता-पिता कोई मामला दर्ज कराएंगे तो उस में आप के दोस्त व उस की पत्नी के पास पर्याप्त प्रतिरक्षा उपलब्ध रहेगी।

आपराधिक न्याय प्रशासन की कमजोर कड़ी – लोक अभियोजन

  • मनिराम शर्मा, एडवोकेट

न्यायालय के साथ साथ, पुलिस और लोक अभियोजक आपराधिक न्याय प्रशासन के आधार स्तंभ हैं। पुलिस किसी मामले में तथ्यान्वेषण व साक्ष्य एकत्र करने का कार्य करती है और लोक अभियोजक उसे प्रस्तुत कर अभियुक्त को दण्डित करवाने हेतु पैरवी करते हैं। सामान्य अपराधों का परीक्षण मजिस्ट्रेट न्यायालयों द्वारा होता है और गंभीर (जिन्हें जघन्य अपराध कहा जाता है) अपराधों का परीक्षण सामान्यतया सत्र न्यायलयों द्वारा किया जाता है। वैसे अपराधों के इस वर्गीकरण में राज्यवार थोडा बहुत अंतर भी पाया जाता है किन्तु समग्र रूप में भारत  में लगभग स्थिति एक जैसी ही है।

निचले स्तर के मजिस्ट्रेट न्यायालयों में तो पैरवी हेतु अभियोजन सञ्चालन के लिए पूर्णकालिक स्थायी सहायक लोक अभियोजक नियुक्त होते हैं किन्तु ऊपरी न्यायालयों – सत्र न्यायालय, उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में अभियोजन के सञ्चालन के लिए मात्र अंशकालिक और अस्थायी लोक अभियोजक नियुक्त किये जाते हैं। इन लोक अभियोजकों को नाम मात्र का पारिश्रमिक देकर उन्हें अपनी आजीविका के लिए अन्य साधनों से गुजारा करने के लिए खुला छोड़ दिया जाता है। वर्तमान में लोक अभियोजकों को लगभग सात हजार रुपये मासिक पारिश्रमिक दिया जा रहा है जबकि सहायक लोक अभियोजकों को  पूर्ण वेतन लगभग तीस हजार रुपये दिया जा रहा है। यह भी एक विरोधाभासी तथ्य है कि सामान्य अपराधों के लिए निचले न्यायालयों में स्थायी सहायक लोक अभियोजक नियुक्त हैं जबकि ऊपरी न्यायलयों में संगीन अपराधों के परीक्षण और अपील की पैरवी को अल्पवेतनभोगी अस्थायी लोक अभियोजकों के भरोसे छोड़ दिया गया है। यह स्थिति आपराधिक न्याय प्रशासन का उपहास करती है और अपराधों की रोकथाम व अपराधियों को दण्डित करने के प्रति सरकारों  की संजीदगी का एक नमूना पेश करती है ।

 लेखक : मनीराम शर्मा, एडवोकेट

बी.कॉम., सी.ए.आई.आई.बी, एलएल.बी., 22 वर्ष से अधिक स्टेट बैंक समूह में अधिकारी संवर्ग में सेवा करने के पश्चात स्वेच्छिक सेवा निवृति प्राप्त, वर्तमान में एडवोकेट एवं समाज सेवा में विशेषतः न्यायिक सुधारों हेतु प्रयासरत।

लोक अभियोजकों की नियुक्तियां सत्तासीन राजनैतिक दल द्वारा अपनी लाभ हानि का समीकरण देखकर की जाती हैं और लोक अभियोजक भी अपने नियोक्ता के प्रसाद ( प्रसन्नता) का पूरा ध्यान रखते हैं अन्यथा उन्हें किसी भी समय सरकारी कोप-भाजन का शिकार होने पर पद गंवाना पड़ सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि संगीन जुर्मों के अपराधियों को यदि सरकारी संरक्षण प्राप्त हो तो उस प्रकरण में लोक अभियोजक के माध्यम से पैरवी में ढील देकर दण्डित होने से बचा जा सकता है। भारत में राजनीति के अपराधीकरण के लिए यह भी एक प्रमुख कारक है। सरकार जिसे दण्डित नहीं करवाना चाहे उसके विरुद्ध पैरवी में ढील के निर्देश दे सकती है।

न्यायप्रशासन की स्वतंत्रता के लिए प्रायः देश के न्यायविद और उनके समर्थक तर्क देते हैं कि न्याय प्रशासन की पवित्रता के लिए न्यायपालिका की स्वतन्त्रता एवं न्यायाधीशों का निर्भय, एवं उनकी नौकरी में स्थायित्व  होना आवश्यक है। यक्ष प्रश्न यह है कि जब न्याय प्रशासन के अहम स्तंभ लोक अभियोजक की सेवा की अनिश्चितता जनित न्यायप्रशासन पर संभावित प्रतिकूल प्रभाव को देश वहन कर सकता है तो  न्यायाधीशों की सेवा की अनिश्चितता से देश वास्तव में किस प्रकार कुप्रभावित होगा। अर्थात न्यायाधीशों की सेवा को भी स्थायी रखने की कोई आवश्यकता नहीं है।

लोक अभियोजक इतने अल्प पारिश्रमिक के कारण पैरवी में न तो कोई रूचि लेते हैं और न ही न्यायालयों द्वारा सामान्यतया अभियुक्तों को दण्डित किया जाता है। राजस्थान के एक जिले के आंकड़ों के अनुसार वर्ष में दोषसिद्धि का मामले दर्ज होने से मात्र 1.5% का अनुपात है। यह तथ्य भी उक्त स्थिति की पुष्टि करता है। लोक अभियोजक भी अपनी आजीविका के लिए अनैतिक साधनों पर आश्रित रहते हैं। यह तो सपष्ट है ही कि भारतीय न्यायालयों से दण्डित होने की बहुत कम संभावनाएं हैं  किन्तु अभियोजन पूर्व की यातनाओं से मुक्ति पाना एक बड़ा कार्य है जिसके लिए न्यायालयों की स्थापना अपना आंशिक औचित्य साबित करती है। भारत के राष्ट्रीय पुलिस आयोग का कहना भी है कि देश में 60% गिरफ्तारियां अनावश्यक होती है जिन पर जेलों का 43.2% खर्चा होता है। माननीय सुप्रीम कोर्ट भी जोगिन्दर कुमार के मामले में कह चुका है कि जघन्य अपराध के अतिरिक्त गिरफ्तारी को टाला जाना चाहिए और मजिस्ट्रेटों पर यह दायित्व डाला गया है कि वे इन निर्देशों की अनुपालना सुनिश्चित करें। किन्तु मजिस्ट्रेटों के निष्क्रिय सहयोग से स्वार्थवश पुलिस अनावश्यक  गिरफ्तारियां करती रहती है और वकील न तो इनका विरोध करते और न ही मजिस्ट्रेट से इन अनुचित गिरफ्तारियों में दंड प्रक्रिया संहिता की  धारा 59 के अंतर्गत बिना जमानत रिहाई की मांग करते हैं। उलटे इन अनावश्यक गिरफ्तारियों में भी जमानत से इन्कार कर गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेटों और न्यायाधीशों द्वारा जेल भेज दिया जाता है।

न्यायालयों द्वारा दोषियों के दण्डित होने की संभावनाएं अत्यंत क्षीण हो जाने से लोक अभियोजकों की भूमिका अग्रिम एवं पश्चातवर्ती जमानत तक ही प्रमुखत: सीमित हो जाती है। प्रचलित परम्परानुसार एक गिरफ्तार व्यक्ति की जमानत (चाहे उसकी गिरफ्तारी अनावश्यक या अवैध ही क्यों न हो) के लिए भी लोक अभोयोजक के निष्क्रिय सहयोग की आवश्यकता है अर्थात जमानत आसानी से हो जाये इसके लिए आवश्यक है कि लोक अभियोजक की ओर से जमानत का विरोध नहीं हो। वकील समुदाय में आम चर्चा  होती रहती है कि वकील को बोलने के लिए जनता से फीस मिलती है जबकि सरकारी वकील को चुप रहने के लिए जनता फीस (नजराना) देती है। ऐसा नहीं है कि यह तथ्य सरकार की जानकारी में नहीं है। क्योंकि सरकार को भी स्पष्ट ज्ञान है कि जिस प्रकार राशन डीलर, स्टाम्प विक्रेता आदि सरकार से मिलने वाले नाममात्र के कमीशन पर जीवन यापन नहीं कर सकते और वे अपने जीवन यापन के लिए अन्य अवैध कार्य भी करते हैं ठीक उसी प्रकार लोक अभियोजकों और सरकारी वकीलों के भी अनैतिक कार्यों में लिप्त रहने की भरपूर संभावनाए मौजूद रहती हैं।

परिवादी को मुकदमे से पारिवारिक व आर्थिक परेशानी हो रही है, मामला कैसे समाप्त हो?

समस्या-

विगत दो वर्ष पूर्व एक लड़की को पास के गॉंव वाले लड़के के द्वारा मोबाईल पर अश्लील बातें की जा रही थी,  जिसकी प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) पुलिस थाने में लिखवाई गई थी।  पिछले दो सालों से केस अदालत में लंबित है।  इसका कोई फैसला नहीं हो पा रहा है।  अदालत में हो रही देरी से इस केस में लड़की को पारिवारिक व आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है इसलिये वह चांहती है कि इस पर समझौता हो जाये,  इसके लिये क्या करना होगा?

-आनन्द, बैतूल, मध्यप्रदेश

समाधान-

प के प्रश्न से पता नहीं लगता है कि मामला किस धारा के अंतर्गत न्यायालय में चल रहा है।  धारा की जानकारी के अभाव में यह निर्धारित करना कठिन है कि इस मामले में क्या  लड़की ने या उस के अभिभावक ने पुलिस को रिपोर्ट दर्ज कराई। यदि इस मामले में पुलिस कार्यवाही नहीं करती तो उसे बदनामी उठानी पड़ती।  पुलिस ने कार्यवाही कर दी है तो आप यह कह रहे हैं कि लड़की को पारिवारिक आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है जो संभव प्रतीत नहीं होता है।  लड़की का तो अब उस मामले से सिर्फ इतना लेना देना है कि एक बार उसे अदालत में जा कर बयान देना है वह भी तब जब अदालत स्वयं समन भेज कर लड़की को बुलाए।  इस से लड़की को किस प्रकार पारिवारिक व आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है यह बात समझ नहीं आ रही है।  ऐसा तो तभी हो सकता है जब स्वयं अभियुक्त पक्ष उसे परेशान कर रहा हो।  यदि ऐसा है तो यह न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालना है जो कि स्वयं में एक अपराध है।  इस परिस्थिति में तो लड़की या उस के अभिभावकों को मामला वापस लेने के स्थान पर परेशान करने के लिए फिर से पुलिस को या उस न्यायालय को जिस में यह मामला चल रहा है शिकायत करनी चाहिेए। जिस से न्याय में बाधा उत्पन्न करने वालों को इस कार्य के लिए भी दंडित किया जा सके।

प के प्रश्न से यह भी पता नहीं लगता है कि मामला किस धारा के अंतर्गत न्यायालय में चल रहा है।  यह संदेह भी उत्पन्न हो रहा है कि यह प्रश्न अभियुक्त पक्ष की ओर से पूछा जा रहा हो।  धारा की जानकारी के अभाव में यह निर्धारित करना कठिन है कि इस मामले में क्या हो सकता है।  इस तरह के मामलों में धारा 354 आईपीसी का अपराध बनता है। यह लड़की द्वारा शमनीय है।  यदि लड़की न्यायालय में आवेदन दे कि वह अपराध का शमन चाहती है तो मुकदमा समाप्त हो सकता है,लेकिन न्यायालय इस बात की जाँच भी कर सकती है कि लड़की कहीं दबाव में तो यह आवेदन नहीं दे रही है।

दीवानी व फौजदारी मुकदमे में अंतर क्या है?

बबिता वाधवानी जी ने तीसरा खंबा पर एक टिप्पणी में कहा-

-दीवानी व फौजदारी मुकदमे में अंतर क्या है?  आज तक मालूम नहीं चला मुझे। 

दीवानी मामले-

दीवानी मामला वह है जिस में संपत्ति सम्बन्धी या पद सम्बन्धी अधिकार विवादित हो, चाहे ऐसा विवादित अधिकार धार्मिक कृत्यों या कर्मों सम्बन्धी प्रश्नों पर अवलम्बित क्यों न हो।  यहाँ बात भी तात्विक नहीं है कि वह पद किसी विशिष्ठ स्थान से जुड़ा है या नहीं।  जब ऐसे मामलों में कोई वाद न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है तो वह दीवानी वाद या मुकदमा कहलाता है।

दीवानी अदालतों में काम बहुत रहता है और कुछ दीवानी मामले एक ही प्रकार की विशिष्ठ प्रकृति के होते हैं।  जैसे कृषि भूमि से सम्बन्धित मामले, मोटर यान या रेल दुर्घटना से संबंधित मामले, या श्रमिकों व उन के नियोजकों के मध्य विवाद, सरकारी कर्मचारियों की सेवा से संबंधित मामले आदि।  इस तरह के मामलों की संख्या अधिक होती है। इस कारण से इन के संबंध में संसद ने विशेष कानून बना कर इन्हें दीवानी न्यायालयों के क्षेत्राधिकार से बाहर करते हुए इन के लिए अलग से अधिकरण बना दिए हैं।  वैसे प्रकृति में ये सभी मामले दीवानी मामले हैं।

अपराधिक या फौजदारी मामले

भारत में भारतीय दंड संहिता तथा अन्य बहुत से कानूनों के द्वारा कुछ कृत्यों और कुछ अकृत्यों को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है।  इन अपराधिक कृत्यों और अकृत्यों के लिए दंड निश्चित किया गया है।  ये सभी  मामले जिन में किसी व्यक्ति को कोई अपराध करने के लिए दंड दिए जाने हेतु विचारण किया जाए वे सभी मामले अपराधिक या फौजदारी मामले कहे जाते हैं।  उदाहरण के तौर पर यदि कोई व्यक्ति उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच द्वारा प्रदान किए गए निर्णय की पालना नहीं करता है तो उस के इस अकृत्य को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम की धारा 27 के अंतर्गत  दंडनीय करार दिया गया है।  यदि कोई व्यक्ति इस धारा के अंतर्गत उपभोक्ता विवाद प्रतितोष मंच के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करता है तो यह मामला एक फौजदारी या अपराधिक या दांडिक मामला कहलाएगा और इस का विचारण फौजदारी मामलों की तरह होगा।

आप के द्वारा विकसित सोफ्टवेयर का बिना मूल्य उपयोग करने वाले के विरुद्ध कापीराइट एक्ट में कार्यवाही करें

समस्या-

मैं आईटी सैक्टर में हूँ, वर्तमान में मैं एक प्राइवेट फर्म  में काम कर रही हूँ। दो वर्ष पूर्व मैं एक व्यक्ति के संपर्क में आई जो कि उस के व्यवसाय के लिए कुछ आईटी एप्लीकेशन्स विकसित करवाना चाहता था। मैं ने उस के लिए आवश्यक सोफ्टवेयर तैयार किए तथा उसे जब भी आवश्यकता हुई आवश्यक सपोर्ट प्रदान किया। मैं ने जब भी उक्त कार्य के भुगतान के लिए उक्त व्यक्ति से कहा उस ने साफ साफ कोई उत्तर नहीं दिया। यह व्यक्ति भारतीय है और अमरीका में ग्रीन कार्ड होल्डर है। मैं उस से अपना पैसा कैसे प्राप्त कर सकती हूँ। मैं सोचती हूँ कि मैं उस के नियोजक जो कि एक प्रतिष्ठित आईटी कंपनी है को शिकायत करूँ। मुझे क्या करना चाहिए।

-श्वेता शर्मा, बैंगलोर, कर्नाटक

समाधान-

प ने जो कार्य उस व्यक्ति के लिए किया वह आप के तथा उस व्यक्ति के बीच एक संविदा कार्य था। आप के मामले में यदि कोई स्पष्ट और लिखित संविदा हुई हो कि उस व्यक्ति को आप के कार्य के लिए एक निश्चित राशि अदा करनी है तो आप अपना कार्य संपन्न कर चुकी हैं और आप संविदा के अनुसार उक्त कार्य के लिए जो भी धन निश्चित हुआ हो वह उस से प्राप्त करने की अधिकारी हैं। इस तरह के मामलों में लिखित संविदा का होना निहायत जरूरी है।

दि आप का और उस के बीच कोई संविदा नहीं हुई हो तो आप उसे अपने काम की शुल्क स्वयं निर्धारित कर उसे भेज सकती हैं जिस में आप यह कह सकती हैं कि वह  उक्त बिल के भुगतान तक उक्त सोफ्टवेयर का उपयोग नहीं करे। क्यों कि उक्त सोफ्टवेयर को आपने विकसित किया है और उस पर आप का कापीराइट है। आप की अनुमति के बिना वह व्यक्ति उस सोफ्टवेयर का उपयोग नहीं कर सकता जिसे आपने विकसित किया है।

दि बिल भेजने के उपरान्त निर्धारित अवधि में वह व्यक्ति आप को आप के काम के मूल्य का भुगतान न करे तो आप उसे विधिक सूचना (Legal Notice) दें कि वह आप के काम का भुगतान निश्चित अवधि में कर दे अन्यथा आप अपनी शुल्क की राशि प्राप्त करने के लिए उस के विरुद्ध दीवानी वाद प्रस्तुत करेंगी तथा कापीराइट के उल्लंघन के लिए दीवानी और अपराधिक मुकदमा चलाएँगी, तथा उस के नियोजक को भी शिकायत करेंगी।

नोटिस के उत्तर में भुगतान प्राप्त न होने की दशा में आप उक्त कार्यवाहियों में से कोई एक या सभी कर सकती हैं। पर मेरी राय यह है कि आप पहले न्यायालय में एक वाद उक्त सोफ्टवेयर को उस व्यक्ति द्वारा उपयोग में लेने से रोके जाने के लिए निषेधाज्ञा जारी करने के लिए प्रस्तुत करें और तुरंत अस्थाई निषेधाज्ञा जारी करवाएँ।  उस के बाद उस के नियोजक को सूचित करें, फिर भी काम न हो तो आप कापीराइट एक्ट के अंतर्गत उस के विरुद्ध अपराधिक मामला दर्ज कराएँ। आप उस से अपनी शुल्क और क्षतियाँ प्राप्त करने के लिए उस के विरुद्ध दीवानी वाद भी प्रस्तुत कर सकती हैं। पर ध्यान रहे शुल्क वसूली के लिए वाद वादकारण उत्पन्न होने के तीन वर्ष की अवधि में ही किया जा सकता है।

अपराध के घटित होने की रिपोर्ट झूठी सिद्ध होने पर परिवादी के विरुद्ध धारा 182 भा.दं.संहिता में मुकदमा चलाया जा सकता है

 समस्या-

ब मैं अपनी मां सियादेवी को अपने गाँव से अपने साथ  कोलकाता ले आया तो उसके बाद मेरी बहन किरण कुमारी ने हमारे ऊपर आरोप लगाया कि विजय कुमार ने सियादेवी का अपरहण कर लिया है और उस की हत्या कर देगा। किरण कुमारी ने मेरे विरुद्ध न्यायालय में जा कर झूठा मुकदमा कर दिया जिसका CR No. 1591/10 Date:20/09/2010 है।  इसके बाद न्यायालय से थाना में फिर दर्ज के लिए पत्र भेजा गया जिसका थाना में Case No. 120/10 Date:29/11/2010 धारा 342/323/363/365/364/506 के अंतर्गत पंजीकृत किया गया।  इस केस में 4 लोगो का गवाही में नाम दिया गया है, इसके बाद मेरी माँ सियादेवी का धारा 164 के अंतर्गत दिनांक 15/06/2011 को बयान लिया गया जिस में मेरी माँ सियादेवी ने कहा कि “मैं अपने मर्जी से अपने बेटे विजय कुमार के साथ कोलकाता गयी थी।  मेरा अपहरण नहीं किया गया है।  मेरी बेटी किरण कुमारी ने झूठा मुकदमा मेरे बेटे विजय कुमार के ऊपर किया है।“  मेरी बहन किरण कुमारी ने मेरे ऊपर झूठा मुकदमा किया इसका प्रमाण धारा 164 के अंतर्गत लिया गया सियादेवी का बयान का कोर्ट से निकला हुआ नक़ल का कागजात मेरे पास है।  क्या मैं किरण कुमारी और उन चार गवाह के विरुद्ध कौन सी क़ानूनी करवाई कर सकता हूँ या कौन सा मुकदमा इन लोगो के विरुद्ध कर सकता हूँ?

-विजय कुमार, बेगूसराय, बिहार

समाधान-

प के प्रश्न से पता लगता है कि आप की बहिन ने पहले न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत की जिसे धारा 156(3) दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पुलिस को प्रेषित किया गया। बाद में पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर के अन्वेषण किया और आप की माता जी के बयानों के बाद यह पाया कि शिकायत मिथ्या है। आप की बहिन का यह कृत्य धारा 182 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराध है जो एक वर्ष के कारावास तथा 1000 रुपए तक के जुर्माने से दंडनीय है। लेकिन यह अपराध असंज्ञेय है और जमानतीय भी इस कारण से इस मामले में आप को न्यायालय में शिकायत दर्ज करा सकते हैं। पुलिस द्वारा प्रेषित अंतिम प्रतिवेदन तथा उस पर न्यायालय की मंजूरी के आदेश की प्रमाणित प्रतियाँ पहले न्यायालय से प्राप्त करनी होंगी और फिर न्यायालय को शिकायत प्रस्तुत करना होगा साथ में उक्त प्रमाणित प्रतियाँ भी प्रस्तुत करनी होंगी। आप का बयान लेने के उपरान्त न्यायालय आप की बहिन के विरुद्ध प्रसंज्ञान ले सकता है। इस मुकदमे में आप की बहिन को दंडित किया जा सकता है।

स के अतिरिक्त आप की बहिन द्वारा की गई उक्त शिकायत के कारण जो परेशानी और खर्च उठाना पड़ा है उस के लिए आप उस के विरुद्ध दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए दीवानी वाद भी प्रस्तुत कर सकते हैं और उस से हर्जाने की मांग कर सकते हैं। लेकिन दीवानी वाद में जितने हर्जाने की आप मांग करेंगे उतनी राशि पर आप को निर्धारित कोर्ट फीस न्यायालय को अदा करनी होगी।

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