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परित्याग व अन्य आधारों पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें।

समस्या-

मनोज ने भोपाल, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे मित्र का विवाह 30 अप्रेल 2005 को चित्तौड़गढ़ राजस्थान में हुआ था। मित्र मध्य प्रदेश का है, बारात राजस्थान गई थी। उसकी पत्नी 2006 में बिना कारण उसे छोड़ के अपने मायके चली गई। मेरे मित्र ने वहाँ जाकर उसे समझाने का बहुत प्रयास किया, पर वह अपनी ज़िद्द पर अड़ी रही। उसकी ज़िद्द थी कि वह घर दामाद बनकर रहे। पर मेरा मित्र ये बात नही माना, क्योंकि वह सेना में सेवारत है और उसके भी मां, बाप, बहन है जिसकी जिम्मेदारी उस पर है। इसी बीच 2007 में मेरे मित्र का एक बेबी हो गया अब बच्चा होने के बाद मेरे मित्र के सास, ससुर, साला बच्चे से मिलने नहीँ देते थे। पर उसने बार बार मिलने का प्रयास किया पर उसे  मिलने नही दिया जाता, जब वह छुट्टियां खत्म होने के बाद वह सेना में बापिस आ जाता। इसी बीच उसकी पत्नी ने 2010 में भाग कर रायपुर छत्तीसगढ़ में एक युवक से विवाह कर लिया। पर मेरे मित्र को मालूम नहीं चला। जब वह 6 माह में छुट्टी ले के जाता तो उसे ये कहा कर लौटा देते कि वह नही मिलना चाहती और वह जॉब करने लगी है। ये सिलसिला चलता रहा जब मित्र ने वहाँ के थाने में रिपोर्ट दर्ज करने गया तो वहाँ के एसएचओ ने रिपोर्ट दर्ज नही की। वह बोला वह जॉब करती है उसे परेशान मत करो नहीं उसकी कंप्लेन में बंद हो जाओगे और कोई छुड़ाने नहीं आएगा, और army की नौकरी चली जायेगी। वह वापिस गया अभी मई 2017 में उसे मालूम पड़ा कि उसने दूसरा विवाह कर लिया है। रायपुर में किसी अजय नाम के व्यक्ति से और मित्र के बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट में दूसरे पति अजय का नाम डलवा दिया है। मित्र का लड़का 5वीं में पढ़ता है और उन दोनो का रायपुर में वोटर आई डी बना हुआ है जो कि वोटर लिस्ट में है, और उन दोनों के कुछ फोटो मिले है गले मे हाथ डाले हुए और मांग में सिन्दूर है। उधर पुछा गया तो मालूम पड़ा कि उन दोनों ने प्रेम विवाह किया है। आप बताइए कि मेरा मित्र क्या करे? जिससे उसकी समस्या हल होजाये उन दोनों को सबक सिखाया जाए उसे सजा मिल सके साथ मे मित्र का बच्चा भी मिल जाये मित्र की पत्नी के दूसरी शादी का बस फ़ोटो और वोटर लिस्ट का सबूत है इन के आधार पर क्या कार्यवाही करें?

समाधान-

प के मित्र की पत्नी को छोड़ कर गए हुए 11 वर्ष हो चुके हैं और आप के मित्र ने अभी तक कोई कार्यवाही नहीं की है। 11 वर्ष से आप के मित्र की पत्नी अलग रहती है और उस ने घर भी बसा लिया है। आप का मित्र चाहता तो अभी तक परित्याग के आधार पर तलाक ले सकता था।  देरी से न्यायालय तक जाने पर राहत मिलना कठिन होता है। अब भी आप के मित्र को सभी संभव आधारों पर तलाक के लिए आवेदन करना चाहिए।

आप का मित्र फौज में है, केवल अवकाश में घर आता है। एक लंबे समय तक उस की पत्नी को अकेले उस के ससुराल में रहना होता था। जब पत्नी को अकेले ही रहना होता था तो वह आप के मित्र के परिवार के साथ क्यों रहती? अपने मायके में क्यों नहीं। यही दोनों के बीच विवाद है।

मित्र की पत्नी सैटल हो चुकी है। बच्चा अब तक उस के साथ रहा है, वह अपने पिता को नहीं जानता या पिता के रूप में किसी दूसरे व्यक्ति को जानता है। ऐसी स्थिति में बच्चे की कस्टडी मिलना कठिन है जब कि आप का मित्र खुद फौज में रहता है।

आप के मित्र को पत्नी के विरुद्ध तलाक की और बच्चे की कस्टडी का मुकदमा करना चाहिए। इन मुकदमों के दौरान अदालत दोनों के बीच राजीनामा कराने की कोशिश करेगी। दोनों का साथ रहना तो मुमकिन नहीं फिर भी जो भी आपसी रजामंदी से हो सके वह करना चाहिए। कम से कम तलाक ले लेना चाहिए जिस से आप का मित्र दूसरा विवाह कर सके। पत्नी को सबक सिखाने की बात मन से निकाल दें। कानूनी स्थिति जो भी है वह ऐसी है कि सबक सिखाने के चक्कर में आप के मित्र ही कहीं चकरी न हो जाएँ।

 

धारा 9 का आवेदन लंबित होने पर संतान की कस्टडी के लिए धारा 26 में आवेदन प्रस्तुत करें

समस्या-

रणधीर सिंह ने गोरखपुर, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम रणधीर है और मैं एक प्राइवेट जॉब करता हूँ। मेरी पत्नी सरकारी टीचर है हमारी शादी 20/05/2013 को हुई थी। हमारा एक ११ माह का बेटा भी है जिसे वो अपना साथ लेकर ८ माह से अपने मायके में रह रही है। शादी के बाद से ही उसका व्यवहार मेरे और मेरे घर वालो के प्रति ठीक नहीं था। शादी के १५ दिन बाद जब वो अपने घर गई और बाद में जब मैंने उसे आने के लिए कहा तो उसने मना कर दिया । उस ने कहा कि जब आना होगा तो बता देंगे। फिर कुछ दिन बाद जब मैं उसके घर जा के बात किया तो वो आयी। कुछ दिन तक ऐसे ही चलता रहा वो हमेशा अपने घर चली जाती है और बार बार कहने पर ही आती है। जब वो मेरे घर पे रहते तो उसके घर से किसी न किसी बहाने लोग लेने चले आते थे जिस वजह से हम में कई बार झगड़ा भी हो जाता था। उसने बिना हमें बताये बच्चे का मुंडन करा दिया है। जब इस बात को ले कर हमारा झगड़ा हो गया जिसके बाद से वो और उसके भाई मुझे बच्चे से नहीं मिलने दे रहे हैं। जब मैं बच्चे से मिलने के लिए जाता हूँ तो वो गाली गलौज करते हैं और बच्चे को कमरे में बंद कर देते हैं। वे धमकी देते हैं कि वो मुझ पे पुलिस केस कर देंगे। अभी मैंने 20/11/2016 को हिन्दू विवाह अधिनियम से विदाई का दावा किया है जिसकी तारीख  03/02/2017 को है। मैं ये जानना चाहता हूँ कि मैं अपने बच्चे से मिलने के लिए क्या कर सकता हूँ? जिससे मैं अपने बच्चे से कुछ समय के लिए मिल सकूँ? और यदि वो हम पे 498 और घरेलू हिंसा का केस करती है और हम उस से बरी हो जाते है तो मैं उस पे आपराधिक मानहानि का केस कर सकता हूँ या नहीं?

समाधान-

आप के मामले में सारा झगड़ा बराबरी के व्यवहार का प्रतीत होता है। आप की पत्नी स्वावलंबी है और आप से ही नहीं आप के परिवार के लोगों से भी समानता का व्यवहार चाहती है। लेकिन आप के पारिवारिक सेटअप में वह संभव प्रतीत नहीं हो रहा है। यदि आप और आप का परिवार समान व्यवहार की बात को स्वीकार कर ले तो आप दोनों के बीच की समस्या हल हो सकती है अन्यथा आप के पास विवाह विच्छेद का ही मार्ग रह जाएगा।

आप ने धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत प्रकरण प्रस्तुत कर दिया है। इस कारण से आप को अधिकार है कि आप बच्चे की कस्टडी और उस से मिलने के लिए समय और तरीका निर्धारित करने हेतु न्यायालय में हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 26 के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

यदि आप के विरुद्ध आप की पत्नी घरेलू हिंसा में कोई आवेदन प्रस्तुत करती है और वह मिथ्या सिद्ध होता है तो आप उस के विरुद्ध अपराधिक मानहानि का मुकदमा कर सकते हैं साथ ही आप दुर्भावना पूर्ण अभियोजन के लिए वाद प्रस्तुत कर हर्जाने की मांग भी कर सकते हैं।

पुत्र से मिलने व संरक्षा हेतु धारा 26 हिन्दू विवाह अधिनियम में आवेदन करें।

rp_CUSTODY-OF-CHILD-254x300.jpgसमस्या-

धीरज मिश्रा ने उत्तर प्रदेश के गाँव-बहेड़वा, पोस्ट-मिर्जामुराद, जिला-वाराणसी से पूछा है-

मेरे बेटे आर्यन से स्कूल में मिलने पर उसकी नानी चंदा देवी ने स्कूल के प्रबंधक को लिखकर रोक लगा रखा है।  परंतु मैं अपने बेटे से स्कूल में मिलने का अधिकार चाहता हूँ ताकि उसकी काउंसलिंग करवा सकूँ।  कृपया उचित सलाह दें।

समाधान-

र पिता अपने पुत्र का नैसर्गिक संरक्षक है और उसे अपने पुत्र से मिलने का अधिकार है। यदि आप के पुत्र का स्कूल प्रबंधन आप को अपने पुत्र से मिलने नहीं दे रहा है तो आप स्कूल को लीगल नोटिस दे सकते हैं और कह सकते हैं कि स्कूल प्रबंधन इस तरह गलती कर रहा है।

यदि स्कूल नोटिस के बाद भी पुत्र से मिलने नहीं देता है तो आप स्कूल प्रबंधन के विरुद्ध दीवानी वाद प्रस्तुत कर के न्यायालय से स्थायी व्यादेश जारी करवा सकते हैं।

यदि आप के और आप की पत्नी के बीच किसी तरह का विवाद है और परिवार न्यायालय में हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत किसी तरह का मुकदमा चल रहा है तो आप हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 26 के अन्तर्गत इस तरह का आदेश उसी न्यायालय से प्राप्त कर सकते हैं जहाँ यह मुकदमा चल रहा है।

बेटी की कस्टड़ी माँ के पास ही रहेगी।

mother_son1समस्या-

भाग्यश्री ने फरीदाबाद, हरियाणा से पूछा है-

शादी को 3 साल हो गये। दो साल की बेटी है। मरे पति पैसे के लिए मुझ से झगड़ा करते हैं। कई बार मारा भी। मैने इस की सूचना महिला थाने को दी। वो कई बार सुलह करा के जाते हैं। पर फिर वही बर्ताव। मुझे भूखा रखा जाता है सब के सामने हर बात मान लेते हैं जिस से मैं ही गलत लगती हूँ। अब मैं ने मुकदमे के लिए पत्र दिया है तो मुझे क्या करना होगा। क्या बच्ची मुझे मिल जाएगी। मेरे कितने पैसे खर्च होंगे इस में?

समाधान-

प की समस्या से स्पष्ट नहीं हुआ कि आप चाहती क्या हैं? यह तो सही है कि आप उस व्यक्ति के साथ जीवन निर्वाह नहीं कर सकतीं। पति से अलग रहने का आप के पास वाजिब कारण है। इस कारण आप अलग रह सकती हैं। अपने लिए भरण पोषण प्राप्त कर सकती हैं। बच्चों की कस्टड़ी का आधार बच्चों का हित है। बेटी की उम्र दो वर्ष की है, उस का हित आप के साथ रहने पर है और उसे आप से अलग नहीं किया जा सकता।  कोई भी अदालत उसे आप से अलग नहीं होने देगी। बेटी आप के साथ रहेगी तो आप उस के लिए भी भरण पोषण मांग सकती हैं और आप को यह सब मिलेगा।

आप तुरन्त अन्तरिम रूप से राहत मांग सकती हैं न्यायालय आप को दे सकता है। मुकदमों का खर्च स्थान भेद से भिन्न भिन्न होता है। फरीदाबाद दिल्ली से लगा हुआ है इस कारण उस पर महानगर का असर है इस कारण खर्च तो जो होगा वह होगा। वकील की फीस ही सब से अधिक होगी. वह आप को तय करनी पड़ेगी। लेकिन जैसे ही आप को अन्तरिम राहत प्राप्त होगी आप के लिए वकील की फीस देना उतना कठिन नहीं रहेगा। आप चाहें तो वकील को कह सकती हैं कि आप आरंभ में नोमिनल खर्चे की रकम दे पाएंगी।लेकिन जैसे ही भरण पोषण की राशि मिलने लगेगी नियमित किस्तों में फीस भी दे देंगी। वकील इस प्रस्ताव को स्वीकार कर सकता है।

अन्त में आप को हमारी सलाह है कि आप को अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। भरण पोषण के सहारे जीवन व्यतीत नहीं होता और व्यक्तित्व नष्ट हो जाता है। आप इतना आत्मनिर्भरता प्राप्त कर लें कि खुद ठीक से जी सकें और बेटी की परवरिश कर सकें। यदि आप ऐसा सोचती हैं तो आप अपने पति से तलाक ले कर अलग भी हो सकती हैं। आप चाहें तो किसी नए जीवन साथी के साथ अपना जीवन भी आरंभ कर सकती हैं।

बच्चे की अभिरक्षा उस के हितों को सर्वोपरि देख कर ही माँ या पिता को प्राप्त होगी।

rp_Desertion-marriage.jpgसमस्या-

पवन ने हरिद्वार उत्तराखंड से पूछा  है-

मेरा विवाह नवंबर 2009  में एक पढ़ी लिखी (BA BEd पास) मेरठ उत्तर प्रदेश की रहने वाली अनामिका के साथ हिन्दू रीतिरिवाज के अनुसार हरिद्वार उत्तराखंड में संपन्न हुआ था।  वह शुरू से ही मुझे व मेरे परिवार वालों को परेशान करती थी,   शादी के दो माह बाद गर्भवती होने पर वह जिद करके मायके चली गई और वहां जाकर मुझे सूचना दिए बगेर बिना मेरी इच्छा व अनुमति के उसने अपना गर्भपात करवा लिया। इसके बाद कुछ समय ठीक चला लेकिन दिसम्बर 2010 मायके जाकर अपने के पिता के घर से उसने दहेज़ मांगने व दहेज़ के लिए परेशांन करने का आरोप लगाते हुए एक पत्र मेरे पिताजी के पास भेजा था जिसकी एक एक  नक़ल महिला आयोग उत्तराखंड ,वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक हरिद्वार व समाचार पत्र को भेजनी बताई थी। मैंने तब वकील की सलाह पर तलाक  का एक वाद स्थानीय परिवार न्यायालय में दायर कर दिया था।  लेकिन कुछ समय बाद ही एक मध्यस्थ के माध्यम से समझौते के बाद मेरी पत्नी घर आकर मेरे माता पिता से अलग रहने लगी तलाक के केस में कोई कार्यवाही नहीं हुई थी।  दिसम्बर 2011 में हमारे बेटा होने के बाद मेरी पत्नी फिर मेरे साथ बुरा व्यवहार करने लगी व मुझे मरने मारने की धमकी देने लगी। वह मेरे व मेरे बेटे का कोई ख्याल नहीं रखती थी, केवल टीवी आदि  में लगी रहती थी। घर की शांति के लिए मैं सब कुछ सहता रहा। इसके बाद उसने एक स्कूल में पढ़ाना शुरू कर दिया तथा बेटे को मेरे या मेरे माता पिता के पास सुबह सात बजे से रात के दस बजे तक छोड़ कर मस्त रहने लगी। लेकिन केवल तीन माह में ही उसने नौकरी छोड़ दी। अगस्त 2014 से अप्रैल 2015 के बीच वह कई बार मेरे कार्यस्थल में लड़ाई झगडे करने के लिए गई और वहां उपस्थित मेरे सहयोगियों व बाहरी व्यक्तियों के सामने मुझसे गाली गलौज की और सितम्बर 2014 में महिला हेल्प लाइन हरिद्वार में उसने मेरे विरुद्ध शिकायत कर दी कि मैं ध्यान नहीं रखता हूँ व उसे जरुरी सामान नहीं लाकर देता हूँ। महिला हेल्प लाइन में मुझे व उसको समझा बुझा कर केस समाप्त कर दिया। इसके बाद 7 अप्रैल 2015 में मुझे परेशान करने के लिए महिला हेल्प लाइन में फिर से उसी प्रकार की शिकायत कर दी। 20 दिनों तक मुझे वहा बुलाया गया लेकिन परिणाम इसकी इच्छा के मुताबिक न होने पर इसने  हेल्प लाइन में यह कह कर की आगे की कार्यवाही मैं अपने मायके मेरठ से करुँगी ये केस बंद हो गया। 30 अप्रैल को वह मेरे बेटे रुपेश को लेकर मेरे घर से मेरी अनुपस्थिति में कमरों में ताले लगा कर चली गईं। मेरा बेटा प्री नर्सरी पढ़ चुका था और उसका एडमिशन LKG में करवा दिया था। पर सब बेकार गया वह मुश्किल से 6 दिन स्कूल गया और उसकी माँ उसे लेकर चली गई। उसने मेरा फोने उठाना भी बंद कर दिया, फिर मैंने रुपेश की तबियत व स्कूल में अनुपस्थिति व नाम काटने की चिंता जताते हुए Whatapp पर मेसेज भी भेजे लेकिन कोई जवाब नहीं मिला और उसने मुझे ब्लोक कर दिया। मैं मजबूर होकर चुप बैठ गया क्योंकि उसके पिता इंडियन आर्मी के बहुत बड़े अफसर है और वे मुझे कई बार गली गलौज तथा मारने की धमकी दे चुके हैं। मेरी पत्नी 1 साल 3  माह से बेटे के साथ  मायके में है अब मैं अपनी पत्नी को तलाक देना चाहता हूँ और बेटे की कस्टडी लेना चाहता हूँ।|   मेरे प्रश्न ये हैं 1. क्या मैं उन कमरों के ताले तोड़ कर उन्हें इस्तेमाल कर सकता हूँ?

  1. मैं अपने बेटे से मिलना चाहता हूँ तो में क्या कानूनी प्रक्रिया अपनाऊँ जिससे मैं अपने बेटे से हर महीने मिल सकूँ। क्योंकि मेरा अपनी पत्नी और उसके घरवालो से कोई संवाद नहीं है न ही कोई बीच में बात करने वाला बिचौलिया है?
  2. मुझे मेरे बेटे जिसकी उम्र 4 वर्ष 9 माह है की कस्टडी कैसे ले सकता हूँ?
  3. मैं अपनी पत्नी से कैसे तलाक ले सकता हूँ?
  4. क्या मेरी पत्नी अब भी मेरे या मेरे परिवार पर 498(A), घरेलू हिंसा, या कोई अन्य केस फाइल कर सकती हे जेसे उसको गये हुए 1 साल से ऊपर हो गया है?

समाधान-

प की समस्या का हल तो तलाक ही है। तलाक लेने के लिए आप को आधार चाहिए। एक आधार तो यही है कि वह एक वर्ष से अधिक से आप से अलग निवास कर रही है। इस के अतिरिक्त जो कुछ उस ने किया है वह क्रूरता की श्रेणी में आता है। इस कारण दो मजबूत आधार आप के पास हैं। आप किसी भी वकील से मिल कर उन्हें तथ्य बता कर और आपसी विचार विमर्श करते हुए तलाक का एक मजबूत मुकदमा प्रस्तुत कर सकते हैं। इसी मुकदमे को पेश करने के उपरांत आप उसी न्यायालय में हर माह अपने बेटे से मिलने और उस की कस्टडी के लिए आवेदन कर सकते हैं।

बच्चे की कस्टड़ी का आधार बच्चे का हित होता है। इस के लिए आप को यह साबित करना होगा कि बच्चे का हित उस की माँ के साथ नहीं बल्कि आप के साथ है और उस की माँ उस की परवरिश ठीक से नहीं कर पा रही है। यदि आप यह साबित कर सके तो आप को पुत्र की कस्टड़ी मिल जाएगी।

कोई भी मुकदमा करने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता है। आप वकीलों से जा कर कहें दीजिए कि मुझे फलाँ व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा करना है, उसे परेशान करना है। तो आप को कुछ वकील तो ऐसे भी मिल जाएंगे जो पूरी कहानी और तथ्य खुद गढ़ लेंगे। इस कारण यह बिलकुल नहीं कहा जा सकता कि आप की पत्नी आपके विरुद्ध कौन से मुकदमे कर सकती है या करेगी। वह किसी भी तरह का मुकदमा आप के विरुदध कर सकती है। हाँ आप ने इस तरह के मुकदमों में पैरवी ठीक से कराई और सतर्क रहे तो किसी मुकदमे में आप की पत्नी को सफलता प्राप्त नहीं होगी।

 

दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के आवेदन के साथ बेटी की अभिरक्षा के लिए आवेदन किया जा सकता है।

Adoptionसमस्या-

संदीप ने गुड़गाँव, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

मुझ पर पत्नी ने धारा 323, 406, 498ए, 506 व 120 बी का मुकदमा कर दिया है। मेरे विवाह को चार वर्ष हो गए हैं। मेरी पत्नी को थैलीसीमिया की बीमारी है जिस का मैं इलाज करवा रहा था, मेरे पास अस्पताल के इलाज के दस्तावेज भी हैं। मेरी एक दो वर्ष की बेटी भी है। मैं ने ना दहेज लिया न मांगा। मेरे ऊपर ये सारे गलत आरोप हैं। मुझे मेरी बेटी वापस चाहिए। हो सके तो पत्नी भी वापस आ जाए। पर वह मेरे साथ रहना नहीं चाहती। कोर्ट में मुकदमा चल रहा है वह आपसी समझौते के लिए एक लाख रुपया मांग रही है। आपसी सहमति से तलाक में मुझे धन नहीं देना भले ही मैं जेल चला जाउंगा पर गलत के आगे नहीं झुकूंगा। बेटी को अपनी अभिरक्षा में लेने का तरीका बताएँ।

समाधान-

जो व्यक्ति जेल जाने को तैयार हो उस का मिथ्या आरोप कुछ नहीं बिगाड़ सकते। जो आरोप आप पर लगाए हैं वे आप की पत्नी को सिद्ध करने होंगे। उस मुकदमे में आप को अपनी प्रतिरक्षा ठीक से करनी चाहिए।

त्नी यदि एक लाख रुपया ही आपसी सहमति के लिए मांग रही है तो यह राशि अधिक नहीं है। यह राशि पत्नी के भरण पोषण के लिए बहुत कम है। हो सकता है आप दस लाख के स्थान पर एक लाख लिख गए हों। यदि वह एक लाख ही मांग रही है तो हमारी राय है कि आप को आपसी सहमति से तलाक ले लेना चाहिए। लेकिन उस में आप शर्त यह रखें कि बेटी आप के साथ रहेगी और बाद में पत्नी कोई भरण पोषण नहीं मांगेगी तथा जो अपराधिक मुकदमा उस ने किया है उसे खारिज कराएगी।

प की समस्या के विवरण से यह पता नहीं लगता है कि आप की पत्नी या आप ने हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत कोई आवेदन दिया हुआ है। बेटी की अभिरक्षा के लिए आप तभी आवेदन कर सकते हैं जब कि पति पत्नी के मध्य हिन्दू विवाह अधिनियम का कोई प्रकरण न्यायालय में चल रहा हो। आप पत्नी के साथ दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और साथ में धारा 26 में पुत्री की अभिरक्षा के लिए आवेदन कर सकते हैं। लेकिन बेटी की अभिरक्षा उसी को प्राप्त होगी जो उस की देखभाल ठीक से करने में समर्थ हो और जिस के साथ रहने में बेटी का हित हो। यह तथ्य न्यायालय स्वयं दोनों पक्षों की साक्ष्य के आधार पर तय करेगा।

बच्चे की अभिरक्षा के लिए न्यायालय बच्चे का हित देखेगा।

father daughterसमस्या-

युवराज ने बर्दमान, पश्चिम बंगाल से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 8 साल पहले हुई थी। मेरा एक 7 वर्ष का पुत्र भी है। पिछले तीन सालों से मेरी पत्नी मेरे बेटे को ले कर अपने मायके में निवास कर रही है क्यों कि उस के मायके में सिर्फ माँ अकेली है, पिता का देहान्त हो चुका है। और भाई शहर के बाहर नौकरी करता है। उस की माँ अपने गृहनगर में ही राज्य सरकार की नौकरी करती है। अब पत्नी मेरे साथ नहीं आना चाहती और आपसी सहमति से तलाक लेना चाहती है। उस के लिए मैं भी तैयार हूँ। लेकिन मैं अपने पुत्र की कस्टड़ी लेना चाहता हूँ। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

वास्तव में आप की कोई समस्या ही नहीं है। यदि आप की पत्नी आपसी सहमति से तलाक लेना चाहती है तो आप उस के सामने शर्त रख सकते हैं कि आप तभी तलाक देंगे जब वह स्वेच्छा से आप के पुत्र की कस्टड़ी आप को दे देगी। इस के लिए यदि वह तैयार हो जाती है तो आप सहमति से तलाक लेंगे तब तलाक की अर्जी में लिख सकते हैं कि पुत्र आप के साथ रहेगा। वैसे भी सहमति से तलाक की अर्जी में आप दोनों को बताना पड़ेगा कि पुत्र किस के पास रहेगा।

पुत्र किस की कस्टड़ी में रहेगा या तो आप दोनों सहमति से तय कर सकते हैं, या फिर न्यायालय तय कर सकता है। यदि न्यायालय कस्टड़ी की बात तय करता है तो वह आप दोनों की इच्छा से तय नहीं करेगा बल्कि  देखेगा कि उस का हित किस के साथ रहने में है। यह तथ्यों के आधार पर ही निश्चित किया जा सकता है कि बच्चे की कस्टड़ी किसे प्राप्त होगी। वैसे पुत्र 7 वर्ष का हो चुका है और आप आवेदन करेंगे तो उस की कस्टड़ी आप को मिल सकती है। क्यों कि आप की पत्नी के पास आय का अपना साधन है यह आप ने स्पष्ट नहीं किया। जहाँ तक देख रेख का प्रश्न है तो निश्चित रूप से चाहे लड़का हो या लड़की माँ अपने बच्चों का पालन पोषण पिता से अधिक अच्छे से कर सकती है।

मारी राय है कि आप को बच्चे की कस्टड़ी के सवाल को अभी त्याग देना चाहिए और आपसी सहमति से तलाक ले लेना चाहिए। उस से आप एक नए जीवनसाथी के साथ अपना नया दाम्पत्य आरम्भ कर सकते हैं। बाद में आप को लगता है कि बच्चे का भविष्य माँ से बेहतर आप के साथ हो सकता है तो आप बाद में भी इस के लिए आवेदन कर सकते हैं।

बेटी की कस्टड़ी के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम में भी आवेदन किया जा सकता है।

Muslim-Girlसमस्या-

कंचन ने गांधीधाम, गुजरात से पुनः समस्या भेजी है कि-

मुझे लड़की की कस्टड़ी कितने दिनों में मिल सकती है। मैं क्या कर सकती हूँ? मैं उन की दूसरी पत्नी हूँ, पहली ने विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर ली थी। मैं ने भरण पोषण का मुकदमा किया था। उन्हों ने मुझे अपने साथ रखने को कहा तो मैं ने केस वापस ले लिया। लेकिन उन्होने बच्चा छीन कर मुझे फिर निकाल दिया। अब 498ए का मुकदमा चल रहा है अभी तारीख नहीं पड़ी है। मुझे अपनी बेटी चाहिए। बहुत छोटी है वो। मेरा समाधान करें।

समाधान-

कंचन जी, आप की समस्या को देखते हुए हम ने तुरन्त आप को समाधान दिया था। आप ने पूरा विवरण दिया होता तो हम तभी आप का समाधान उसी तरह देते। हम यहाँ समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। नियमित वकालत नहीं करते। फिर भी आप की समस्या को देखते हुए समाधान बता रहे हैं। कृपया आगे कोई कार्यवाही किए बिना कोई प्रश्न हम से न करें। करें तो इसी पोस्ट पर टिप्पणी के रूप में करें आप को यहीं उत्तर दिया जा सके।

प को कस्टड़ी जल्दी मिल सकती है। क्यों कि छोटी उम्र की बच्ची को उस की माता से अलग नहीं किया जा सकता। आप को तुरन्त घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन देना चाहिए और अपने व बच्ची के खर्चे के साथ बच्ची की कस्टडी की राहत मांगनी चाहिए। उस में मजिस्ट्रेट धारा 21 के अन्तर्गत तुरन्त कस्टड़ी के लिए आदेश कर सकता है। बस आप को एक अच्छा स्थानीय वकील करना होगा।

498ए के मामले में आप शिकायतकर्ता हैं, मुकदमा पुलिस ने चलाया है और सरकारी वकील उस की पैरवी करेगा। जब उस में साक्ष्य ली जाएगी तब आप को केवल बयान के लिए समन आएगा। उस के पहले आप को कोई सूचना प्राप्त नहीं होगी।

प चाहें तो परिवार न्यायालय में धारा-9 या धारा-10 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना या न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए आवेदन कर सकती हैं। उस के साथ ही बच्ची की कस्टड़ी प्राप्त करने के लिए भी आवेदन कर सकती हैं। लेकिन यह बताना कठिन है कि बच्ची की कस्टड़ी कितने दिन में मिल सकती है।

आप को बेटी की कस्टडी मिल सकती है।

born after faild tubectomyसमस्या-

कंचन ने गांधीधाम, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मैं ने लव मैरिज की है और मेरा पति मुझे मारता है, मेरी 18 माह की बेटी है जो उस ने मेरे से छीन ली है और मुझे घऱ से बाहर निकाल दिया है। मैं ने 498ए का केस किया था लेकिन उस में उन लोगों ने जमानत ले ली। मेरे से नोटेरी करवाई है कि लड़की पर मेरा कुछ भी हक नहीं होगा। क्या लड़की मैं नहीं ले सकती? कृपया समाधान करें।

समाधान-

ति से विवाद होने पर सब से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि आप के पास सपोर्ट क्या है? यदि आप आत्मनिर्भर हैं, अर्थात आप स्वयं अपना खर्च उठा सकती हैं और बेटी की देखभाल कर सकती हैं तो सब से बेहतर है। यदि नहीं है तो सब से पहले आप को यह सोचना चाहिए कि आप का अकेले जीवन गुजारने का साधन क्या बनेगा और मुकदमा लड़ने के लिए आप का सपोर्ट क्या होगा।

धारा 498ए में जमानत तो हो ही जाती है। मुकदमा चलेगा और उस का साबित होना इस बात पर निर्भर करेगा कि आप खुद न्यायालय के समक्ष क्या बयान करती हैं। आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत कार्यवाही कर के सुरक्षा, निवास की सुविधा, बच्चे की कस्टडी और अपने और बच्चे के लिए भरण पोषण का खर्च मांगना चाहिए। दूसरी ओर पारिवारिक न्यायालय में आवेदन दे कर न्यायिक पृथक्करण अथवा विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए साथ में बच्चे की कस्टडी के लिए भी आवेदन करना चाहिए। आप को बच्चे की कस्टडी मिल सकती है। विशेष रूप से तब जब कि वह बालिका है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप के पति ने आप से कुछ लिखवा कर नोटेरी करवा लिया है। वह सब कुछ दबाव में भी हो सकता है जैसा कि प्रतीत होता है।

प जान लें विवाह किसी भी रीति से हो कानून के समक्ष वह विवाह होता है और उस के दायित्व और कर्तव्य समान होते हैं। हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है और किसी भी तरह से स्त्री को अधीन बनाने के रास्ते तलाशता रहता है। आप बच्चे के साथ प्रेम के कारण अपने पति के साथ बनी रहेंगी और जीवन भर यातनाएँ सहन करती रहेंगी। इसी कारण आप से बच्चे को छीन लिया गया है। आप यदि आत्मनिर्भर नहीं हैं तो उस तरफ कदम रखिए। एक स्त्री का सम्मान जनक स्थान समाज में इसी बात पर निर्भर करता है कि वह आत्मनिर्भर है या नहीं।

सहमति से विवाह विच्छेद हो तो संतान की कस्टडी और खर्चे के बारे में भी आपसी सहमति बनाएँ …

mother_son1समस्या-

संध्या ने भोपाल, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 2012 में हुई थी। मेरा 8 महीने का एक बेटा है। शादी के बाद से ही पति मुझे मानसिक रूप से प्रताड़ित कर थे, मैं ने तंग आकर महिला हेल्प लाइन में कंप्लेंट कर दी। अब मैं अपनी माँ के पास रह रही हूँ। मैं ने तलाक़ लेने का निर्णय किया है। पर मैं सहमति से तलाक़ चाहती हूँ। जब मेरे वकील ने मेरे पति से पूछा तो उन्होने भी सहमति व्यक्त की है। मैं केन्द्रीय सरकार की सेवा में हूँ और पति प्राइवेट बिजनेस करते हैं। ससुराल में एक घर जो सास ने बनाया है, 10 बीघा ज़मीन जो ससुर के नाम है और एक दुकान मेरे पति के नाम है। यही संपत्ति है। अभी लीगली बटवारा नहीं हुआ है। सहमति से तलाक़ होने पर मैं अपने पति से अपने लिए या मुझे ना भी मिले तो अपने बेटे के लिए उक्त संपत्ति में हिस्सा माँग सकती हूँ। अगर हाँ तो उस का निर्धारण किस प्रकार से होगा?

समाधान-

प स्वयं केन्द्रीय सरकार की नौकरी में हैं वैसी स्थिति में कानूनन आप कितना प्राप्त करने की स्थिति में हैं यह तभी बताया जा सकता है जब कि यह तथ्य ज्ञात हो कि आप के पति की आय कितनी है और आप खुद कितना कमाती हैं। फिर भी इस बात की संभावना कम है कि आप को कुछ आर्थिक सहायता प्राप्त हो।

प का विवाह विच्छेद हो जाने पर भी आप के पुत्र का संबंध तो सदैव ही उस के पिता से बना रहेगा। इस कारण उस के पिता से जो अधिकार हैं वे भी सदैव बने रहेंगे। पुत्र की कस्टडी और उस के पालन पोषण के खर्चों के लिए धनराशि जो पति आप को निरन्तर देते रहें आपसी सहमति से निर्धारित की जा कर आवेदन में अंकित की सकती है और न्यायालय इसे विवाह विच्छेद की डिक्री में अंकित कर सकता है।

जो भी संपत्ति आप की सास, ससुर व पति के नाम है उस पर उन के जीवनकाल में किसी का कोई अधिकार नहीं है। हाँ पुत्र का भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार है जिस के लिए जब भी आवश्यकता हो तब यदि पुत्र आप की कस्टडी में रहता है तो आप के माध्यम से भरण पोषण प्राप्त करने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है। न्यायालय आप दोनों की आय और संपत्ति को ध्यान में रखते हुए पुत्र के लिए भरण पोषण की राशि निर्धारित कर सकता है।

दि आप के और आप के पति के बीच सहमति बनी है तो आप पति के साथ बातचीत कर के इन मसलों पर पहुँच सकती हैं। यदि आप के पति आप से विवाह विच्छेद के लिए सहमत हैं तो पुत्र की कस्टडी और भविष्य के खर्चों पर भी आपसी सहमति बन सकती है। बेहतर यही है कि यह सब आपसी सहमति से तय हो और विवाह विच्छेद की डिक्री में सम्मिलित कर लिया जाए।

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