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स्वेच्छा से दिया हुए धन के अधिकार का विवाद होने पर अमानत में खयानत का अपराध नहीं बनता।

समस्या-

कल्याण सिंह ने राजीव नगर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मुझे एक कंपनी ने (जिस से मेने एक कियोस्क लिया था) नोटिस भेजा है जिसमें यह कहा गया है कि कंपनी जो कमीशन देती है उसमें जितना कमीशन देना चाहिए था उस अमाउंट से 13957 रुपए  ग़लती से ज़्यादा दे दिया है वो नही लोटाए जाने पर आईपीसी की धारा 409 के तहत अपराध है जबकि यह कंपनी मुझे फॉर्म 16 नहीं प्रोवाइड करवा रही और वो भी पिछले 3 साल से जिसमे मेरा टीडीएस कट रहा हे तो सर टीडीएस काट कर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में जमा नही करवाना भी तो एक अपराध है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प को कंपनी ने कमीशन खुद स्वैच्छा से दिया है। यदि अधिक दे दिया है तो वह उस की कानूनी तरीके से वसूली कर सकती है। आप उन्हें लिखिए कि आप के हिसाब से जो कमीशन मिला है वह सही है। इस तरह कमीशन की धनराशि विवादित हो जाएगी और अमानत नहीं रहेगी। यदि वे समझते हैं कि अधिक भुगतान हो गया है तो इस का निर्णय न्यायालय से कराने के लिए कार्यवाही करें। आपने कोई अपराध नहीं किया है।

उन्हें सूचित करें कि उन्होंने आप का जो टीडीएस आज तक काटा है उस का विवरण आप को नहीं भिजवाया है जो कि इनकम टैक्स कानून का उल्लंघन है यदि वे उचित समय में यह विवरण नहीं भिजवाते हैं तो आप इनकम टैक्स विभाग को शिकायत करेंगे। टीडीएस काट कर इनकम टैक्स विभाग में जमा न कराना गंभीर अपराध है इनकम टैक्स विभाग स्वयमेव कार्यवाही करेगा। वैसे यदि कंपनी ने टीडीएस काटा होगा तो आप के पैन नंबर से इनकम टैक्स विभाग की वेबसाइट पर आप को पता लग जाएगा कि कितना टीडीएस काटा गया है।

 

कांट्रेक्टर ने धन ले कर मकान का निर्माण नहीं किया तो यह अमानत में खयानत का अपराध है।

lawसमस्या-

वैभव ने जलगाँव, महाराष्ट्र से समस्या भेजी है कि-

मैं ने एक कांन्ट्रेक्टर को 3 लाख रुपया दिया था, मकान निर्माण के लिए। पर उस ने हमें मकान नहीं दिया और पैसे भी नही दे रहा है। उस ने पुलिस स्टेशन जाकर कंप्लेंट दी है कि इनकी वजह से मेरी जान को धोका है। पैसे मांगने पर पैसा भी नहीं दे रहा है। उसके लिए क्या करूँ?

समाधान-

प के पास कांट्रेक्टर को तीन लाख रुपया देने का कोई सबूत तो अवश्य होगा। आप किसी वकील से अथवा खुद उसे रजिस्टर्ड ए.डी. के माध्यम से एक नोटिस प्रेषित कीजिए जिस में लिखिए कि उस ने आप से मकान निर्माण करने के लिए रुपए तीन लाख एडवांस लिए थे, जिसे वह नहीं लौटा रहा है और उस धन का उस ने बेईमानी से निजी कामों में उपयोग कर लिया है जो धारा 406 आईपीसी में अपराध है। वह आप का धन 12% वार्षिक ब्याज या जो भी बाजार दर हो ब्याज सहित 15 दिनों में लौटा दे अन्यथा आप उस के विरुद्ध दीवानी और अपराधिक दोनों प्रकार की कार्यवाही करेंगे। इस नोटिस की प्रति और उस की रजिस्ट्री की रसीद तथा एडी प्राप्त हो जाए तो उसे संभाल कर रखें।

स के बाद आप किसी वकील के माध्यम से धारा 406 आईपीसी का परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत करें और न्यायालय से आग्रह करें कि उस परिवाद को अन्वेषण हेतु धारा 156(3) दं.प्र.संहिता में पुलिस को भिजवा दिया जाए। यदि पुलिस अन्वेषण के दौरान कांट्रेक्टर आप को आप का रुपया लौटा देता है तो ठीक है अन्यथा उस के विरुद्ध या तो न्यायालय में पुलिस द्वारा आरोप पत्र प्रस्तुत किया जाएगा अथवा मामले को दीवानी प्रकृति का बताते हुए अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत होगा। यदि आरोप पत्र न्यायालय में नहीं दिया जाता है तो न्यायालय आप को सूचना दे कर न्यायालय में बुलाएगा। तब आप आपत्तियाँ प्रस्तुत कर के आप का तथा अपने गवाहों के बयान वहाँ करवाने से न्यायालय कांट्रेक्टर के विरुद्ध अपराधिक मामले में प्रसंज्ञान ले कर उस के विरुद्ध मुकदमा चला कर उसे दंडित कर सकता है।

दि आप के पास तीन लाख रुपए देने का लिखित सबूत है तो आप 3 लाख रुपया, ब्याज व न्यायालय के खर्चा प्राप्त करने के लिए कांट्रेक्टर के विरुद्ध दीवानी वाद भी संस्थित कर सकते हैं।

जब कोई पुलिस अदालत तक पहुँचता है तभी लोगों को कानून याद आता है।

rp_Hindu-marrige1.jpgसमस्या-

मनोज कुमार चौरसिया ने सुलतानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 28 मई 2013 को हुई। शादी के एक माह बाद मेरी पत्नी मानसिक रूप से बीमार हो गयी जिसका हमने मनोचिकित्सक इलाहाबाद से इलाज कराना शुरू किया और अभी भी इलाज चल रहा है। मेरे ससुराल वाले जबरन मेरी पत्नी को विदा कराकर ले जाते है और वापस विदा नहीं करते। चूँ कि मेरे ससुर वकील सुलतानपुर दीवानी में एवं ममिया ससुर भदोही में जज हैं। इसलिए मुझे झूठे मुकदमें में फँसाने की धमकी देते हैं। 07 फरवरी को मेरी पत्नी को जुड़वाँ बच्चे एक बेटा और एक बेटी आपरेशन से हुए। दवा का सारा पैसा हम ने दिया और हास्पिटल से पत्नी मायके चली गयी। जाते समय ससुराल वालों ने कहा कि तुम को तरसा लेगें। देखो अब हम क्या–क्या करते हैं? तुम्हे बच्चा पैदा करने की क्या जरूरत थी? अब 8 माह का समय बीत चुका है, ससुराल वाले से बात किया परन्तु भेजने को तैयार नहीं थे। मेरी माँ को अपने घर बुलाकर कहा कि अब मेरी लडकी नहीं जायेगी लड़ कर हिस्सा लेगी। इसपर हमने वकील से बात किया तो वकील ने धारा 13 के अन्तर्गत मानसिक बीमारी और जबरन ले जाने व धमकी देने को आधार बनाकर तलाक का मुकदमा कर दिया है। मानसिक बीमारी का लगभग एक वर्ष का पर्चा व कुछ डिलीवरी हास्पिटल का पर्चा मेरे पास है। क्या मुझे तलाक मिल जायेगा? और क्या मेरी ससुराल वाले मुझे 498ए‚ 406‚ 125‚ 24 व अन्य किसी धारा में सजा दिला सकते हैं? क्या मुझे जेल भी जाना पड सकता है?

समाधान-

तीसरा खंबा को इस तरह की समस्याएँ रोज ही मिलती हैं। जिन में बहुत से पति यह पूछते हैं कि मुझे तलाक तो मिल जाएगा? क्या मेरी ससुराल वाले मुझे 498ए‚ 406 या अन्य किसी धारा में सजा दिला सकते हैं? क्या मुझे जेल भी जाना पड़ सकता है? आदि आदि।

र कोई विवाह करने के पहले और विवाह करने के समय यह कभी नहीं सोचता कि कानून क्या है? और उन्हें देश के कानून के हिसाब से बर्ताव करना चाहिए। वह सब कुछ करता है। वह दहेज को बड़ी मासूमियत से स्वीकार करता है, वह मिले हुए दहेज की तुलना औरों को मिले हुए दहेज से करता है, वह उस दहेज में हजार नुक्स निकालने का प्रयत्न करता है।

ब विवाह के लिए लड़की देखी जाती है तो उस की शक्ल-सूरत, उस की पढ़ाई लिखाई, उस की नौकरी वगैरा वगैरा और उस के पिता का धन देखा जाता है। यह कभी नहीं जानने का प्रयत्न किया जाता कि लड़की या लड़के का सामान्य स्वास्थ्य कैसा है? वह किस तरह व्यवहार करता या करती है, विवाह के उपरान्त दोनों पति-पत्नी में तालमेल रहेगा या नहीं? क्यों कि यह सब जानने के लिए लड़के लड़की को कई बार एक साथ कुछ समय बिताने की जरूरत होती है। इसे पश्चिम में डेटिंग कहते हैं। भारतीय समाज डेटिंग की इजाजत कैसे दे सकता है? क्या पता लड़के-लड़की शादी के पहले ही कुछ गड़बड़ कर दें तो? या लड़का या लड़की रिश्ता के लिए ही मना कर दे तो दूसरे की इज्जत क्या रह जाएगी?

विवाह के बाद दहेज को दहेज ही समझा जाता है। पति और उस के रिश्तेदार उसे अपना माल समझते हैं। वे जानते हैं कि दहेज लेना और देना दोनों अपराध हैं। पर कौन देखता है? की तर्ज पर यह अपराध किए जाते हैं। दहेज के कानून में माता-पिता, रिश्तेदारों, मित्रों और अन्य लोगों यहाँ तक कि ससुराल से प्राप्त उपहारों को दहेज मानने से छूट दी गयी है। इस कारण जब कोई मुकदमा दर्ज होता है तो लोग उसे दहेज के बजाय उपहार कहना आरंभ कर देते हैं। पर वे नहीं जानते कि किसी स्त्री को मिले उपहार उस का स्त्री-धन है। उस के ससुराल में रखा हुआ यह सब सामान उस की अमानत है। उसे न लौटाएंगे तो अमानत में खयानत होगी। फिर जब आईपीसी की धारा 406 अमानत में खयानत का मुकदमा ही बनाना होता है तो बहुत सी काल्पनिक चीजें लिखा दी जाती हैं।

त्नी को मानसिक या शारीरिक क्रूरता पहुँचाना हमारे यहाँ पति और ससुराल वालों का विशेषाधिकार माना जाता है, लेकिन कानून उसे 498-ए में अपराध मानता है, तो यह अपराध भी धड़ल्ले से देश भर में खूब चलता है। लोग ये दोनों अपराध खूब धड़ल्ले से करते हैं। समझते हैं कि इन्हें करने का उन्हें समाज ने लायसेंस दिया हुआ है। पर जब इन धाराओं में मुकदमा होने की आशंका होती है या धमकी मिलती है तो वही लोग बिलबिला उठते हैं। उन्हें कानून का यह पालन अत्याचार दिखाई देने लगता है।

म मानते हैं कि जब मुकदमा होता है तो बहुत से फर्जी बातें उस में जोड़ी जाती हैं। यह भी इस देश की प्राचीन परंपरा है। गाँवों में जब लड़ाई होती है तो इज्जत की रखवाली में हथियार ले कर बैठे परिवारों की स्त्रियों से पुलिस में बलात्कार की रिपोर्ट करा दी जाती है। लेकिन विवाह के रिश्ते में ऐसा फर्जीवाड़ा करना दूसरे पक्ष को नागवार गुजरता है।

ब अदालत में कोई भी पीड़ित हो या न हो। एक बार शिकायत कराए, या पुलिस को एफआईआर लिखाए तो उन का फर्ज है जाँच करना और जाँच करने का मतलब पुलिस के लिए यही होता है कि पीड़ित पक्ष और उस के गवाहों के बयान लिए जाएँ और उन से जो निकले उस के आधार पर अपराध को सिद्ध मानते हुए अदालत में आरोप पत्र प्रस्तुत कर दिया जाए। एक बार आरोप पत्र पेश हो जाए तो जब तक उस मुकदमे का विचारण नहीं हो जाए तब तक अदालत के चक्कर तो काटने ही होंगे। सचाई पता लगाने की जरूरत पुलिस और अदालत को कभी नहीं होती। वैसे भी जो चीज पहले से ही पता हो उसे जानने की जरूरत नहीं होती। आखिर वह जान लिया जाता है जो पहले से पता नहीं होता।

प के सामने समस्या है। आप ने तलाक का मुकदमा कर दिया है। वकील की सहायता ली है। वकील को सारे तथ्य पता हैं। हमे तो आप ने पत्नी को मानसिक रोगी मात्र बताया है। उस का पागलपन या मानसिक रोग क्या है? वह रोग के कारण क्या करती या नहीं करती है? या चिकित्सक ने उसे क्या रोग बताया है? आपने हमें कुछ नहीं बताया है। जो मुकदमा किया है उस में क्या आधार किन तथ्यों पर लिए हैं? यह भी नहीं बताया है फिर आप हम से अपेक्षा रखते हैं कि तीसरा खंबा आप को बता देगा कि आप को तलाक मिलेगा या नहीं और आप को फर्जी मुकदमों में फँसा तो नहीं दिया जाएगा।

लाक का मिलना मुकदमे में लिए गए आधारों और उन्हें साक्ष्य से साबित करने के आधार पर निर्भर करता है। आप की पत्नी मुकदमा दर्ज कराएगी तो हो सकता है आप को गिरफ्तार भी कर लिया जाए। लेकिन अक्सर ऐसे मामलों में जमानत हो जाती है और जल्दी ही पति और उसके परिवार वाले रिहा हो जाते हैं। ऐसे मामलों में चूंकि झूठ जरूर मिलाया जाता है इस कारण ज्यादातर पति इस मिलावट के कारण बरी हो जाते हैं। पर कभी कभी सजा भी हो जाती है। अगर आप ने कोई अपराध नहीं किया है। कभी पत्नी को गाली नहीं दी है, उस पर हाथ नहीं उठाया है, उस के उपहारों और स्त्री-धन को उस का माल न समझ कर अपना माल समझने की गलती नहीं की है तो आप को सजा हो ही नहीं सकती। पर यह सब किया है तो सजा भुगतने के लिए तैयार तो रहना ही चाहिए। अपराध की सजा हर मामले में नहीं तो कुछ मामलों में तो मिल ही सकती है।

भी तक कानून ने पत्नी को पति की संपत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार नहीं दिया है। पति की मृत्यु के बाद यदि पति ने कोई बिना वसीयत की संपत्ति छोड़ी हो तो उस का उत्तराधिकार बनता है जिसे वह ले सकती है। लेकिन जीते जी अधिक से अधिक अपने लिए भरण पोषण मांग सकती है। इस कारण जो यह धमकी दे रहे हैं कि पत्नी हिस्सा लड़कर लेगी वे मिथ्या भाषण कर रहे हैं। अभी तक कानून ने ही पति की संपत्ति में हिस्सा पत्नी को नहीं दिया है अदालत कैसे दे सकती है। इस मामले में आप निश्चिंत रहें। आज तीसरा खंबा की भाषा आप को विचित्र लगी होगी। पर इस का इस्तेमाल इस लिए करना पड़ा कि लोग ऐसे ही समझते हैं। आप इस बात को समझेंगे और दूसरे पाठक भी इस तरह के प्रश्न करना बन्द करेंगे। हम तो ऐसे प्रश्नों का उत्तर देना बन्द कर ही रहे हैं।

स्त्री-धन जो पिता, माता, भाई, भाभी और बहन के पास है, अमानत है और उसे लौटाने से मना करना गंभीर अपराध है।

POSTMANसमस्या-

कप्तान सिंह ने राजौरी, जम्मू कश्मीर से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरी पत्नी के साथ धोखा हुआ है। उस की बहन बड़े भाई, भाभी और पिता ने साथ मिल कर अपने गहने सोने का हार झुमके, अंगूठी, इयर टॉप्स और सोने की चूड़ियाँ सारे सामान देने से मना कर दिया है। मेरी शादी को 10-11 साल हो गए हैं अब मेरी पत्नी बहुत दुखी है कृपया उपाय बताएँ।

समाधान

प की पत्नी के गहने जो भी उस के हैं वे पत्नी का स्त्री-धन हैं। यदि वे उस की बहन आदि के पास थे तो वे अमानत के तौर पर रखे थे। अमानत के तौर पर किसी पास रखी कोई भी संपत्ति अमानत ही होती है। यदि वह उसे देने से इन्कार करता है तो यह अमानत में खयानत है जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 406 आईपीसी में दंडनीय अपराध है। आप की पत्नी को उक्त लोगों ने यह स्त्री-धन देने से मना किया है इस का अर्थ यह है कि उन्हों ने यह अपराध किया है।

प की पत्नी चाहें तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है, यदि पुलिस कार्यवाही करने से इन्कार करती है तो इलाके के मजिस्ट्रेट के न्यायालय में सीधे परिवाद प्रस्तुत करें। बेहतर होगा कि पुलिस को रिपोर्ट करने या न्यायालय में परिवाद दर्ज कराने के पहले आप की पत्नी स्वयं या किसी वकील के माध्यम से उक्त गहनों को लौटाने के लिए एक नोटिस रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से भेजें। नोटिस की एक एक प्रतियाँ उक्त सभी व्यक्तियों को अलग अलग डाक से भेजे जाएँ। सब की डाक की रसीदें और प्राप्ति स्वीकृतियाँ अपने पास रखी जाएँ।

मायके वाले बहन-बेटी के गहनों पर कब्जा कर लें तो वह अमानत में खयानत की रिपोर्ट दर्ज करवाए।

police station receptionसमस्या-

माँगी लाल चौहान ने ग्राम-पोस्ट गोयली, जिला सिरोही, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

 मेरी पत्नी ने मुझ पर अपने घरवालों के बहकावे मे आ कर हम से पैसे ऐंठने के मक़सद से मुझ पर और मेरे माता-पिता पर जूठा 498 ए का मुक़ुदमा किया था। लेकिन गुजरते वक़्त (2-3 साल) के साथ मेरी पत्नी को अपनी ग़लती का एहसास हो गया और उस ने पेशी के दौरान चुप-चाप अपने घर से बिना बताए अदालत के समक्ष आ कर मेरे साथ जाने का निवेदन किया। मैं भी अपनी बेटी के खातिर उस को अपनाने को राज़ी हो गया और उसे घर ले आया। लेकिन मेरी पत्नी के इस कदम से उसके घर वालों ने सारा रिश्ता उनसे तोड़ दिया और कहा कि आज से तू मेरे लिए मर गई। मैं आप से ये पूछना चाहता हूँ कि हमारे घर से जो भी चीज़ें बनाई गई थीं (सोने,चाँदी की वस्तुएँ) वो मेरे ससुराल वालों के पास हैं और वो देने के लिए मना कर रहे हैं तो मैं उन को कैसे प्राप्त कर सकता हूँ? हमारे फ़ैसले की तारीख 22-01-2015 है. और फ़ैसले के बाद उस फ़ैसले की प्रमाणित कॉपी कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?

समाधान-

प को बहुत बधाई कि आप की पत्नी को समझ आ गई और वह खुद आप के पास चली आई। एक बार 498 ए का मुकदमा समाप्त हो जाने दीजिए। उस के बाद आप अपने वकील के माध्यम से या स्वयं फैसले की प्रमाणित प्रतिलिपि के लिए आवेदन कर सकते हैं, उस के लिए आवेदन व प्रतिलिपि शुल्क के कुछ रुपये के टिकट आप को लगाने होंगे।

प ने जो गहने अपनी पत्नी के लिए बनवाए थे वे तो आप तभी अपनी पत्नी को उपहार स्वरूप दे चुके थे। इस कारण से वे आप की संपत्ति नहीं हैं। वे अब आप की पत्नी की संपत्ति हैं और उस का स्त्री-धन है। उन गहनों के लिए आप को कार्यवाही करने का कोई अधिकार नहीं है।

लेकिन वे गहने आप की पत्नी का स्त्री-धन होने के कारण वे उन गहनों के लिए कार्यवाही कर सकती हैं। आप की पत्नी के मायके वालों के पास वे गहने अमानत थे। इस तरह उन गहनों को देने से इन्कार करने के कारण उस के मायके वालों ने अमानत में खयानत का धारा 406 आईपीसी के अन्तर्गत दण्डनीय अपराध किया है। आप की पत्नी उक्त अपराध के लिए उस के मायके वालों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है। पुलिस इस प्रथम सूचना रिपोर्ट पर अन्वेषण के दौरान उन गहनों को बरामद कर जब्त कर सकती है। तथा इस अपराध को करने वालों को गिरफ्तार भी कर सकती है। बाद में आप की पत्नी उक्त गहनों को अदालत में आवेदन कर उन का कब्जा प्राप्त कर सकती है। यदि पुलिस इस तरह की प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने या उस पर कार्यवाही करने से इन्कार करे तो वह सीधे न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर अदालत से निवेदन कर सकती है कि पुलिस को मामला दर्ज कर अनुसंधान करने का आदेश प्रदान किया जाए।

दि पुलिस उक्त सारे गहनों को या कुछ को बरामद न कर सके तो आप की पत्नी उक्त गहनों को प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद भी प्रस्तुत कर सकती है।

अन्याय को देर तक सहन न करें, तुरन्त कार्यवाही करें।

पति पत्नी और वोसमस्या-

 

प्रियंका ने जमशेदपुर, झारखंड से पूछा है-

 

मेरी शादी दिसम्बर 2006 में हुई थी। शादी के पहले दिन से ही मेरी सास और ननदों का व्यवहार मेरे प्रति अच्छा नहीं था। उन लोगों ने मुझ से धोखे से बहाना बनाते हुए कई बार पैसे ले लिए हैं। सास के साथ रहते हुए मेरा 2 बार इन लोगों की वजह से गर्भपात हो गया जो मुझे अब समझ में आ रहा है कि ये लोग बच्चा नहीं चाहते थे। मेरी सास और ननद के व्यवहार के चलते मैं और मेरे पति अलग किराए का घर लेकर रहने लगे। 2010 में मेरा बेटा हुआ तब मैं मेरे मायके आई कुछ दिन के लिए। जब वापस गयी तो पता चला की मेरे घर का सारा सामान एक एक बर्तन भी मेरे पति ने बेच दिया है। मेरी कार जो मेरे नाम से रजिस्टर्ड थी उसको भी ड्यूप्लीकेट साइन बना कर बेच दिया। मेरे पति के दूसरी लड़की के साथ भी रिश्ता है। अब मेरा पति मुझे मेरे मायके मे छोड़ कर भाग गया है। मुझे तलाक़ चाहिए और मैं यह चाहती हूँ कि मेरे ससुराल वालों को सज़ा भी मिले। इस के लिए मुझे क्या करना चाहिए?

 

समाधान-

 

म यह नहीं समझ पा रहे हैं कि इस हालत में आप इतने दिन क्या करती रहीं। आप के साथ इतना अन्याय हुआ है, आप को तो बहुत पहले कार्यवाही करनी चाहिए थी।

 

प के मामले में सब कुछ है। आप का स्त्रीधन जो आप के पति के पास था उस ने बेच कर ठिकाने लगा दिया। उस ने जिस तरह का व्यवहार किया वह क्रूरता की श्रेणी में आता है। कार को आप के फर्जी हस्ताक्षर कर के बेच दिया। आप का पति आप को मायके में छोड़ कर चला गया।

 

प तुरन्त स्थानीय वकील से सलाह कीजिए तथा विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करिए आप को विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त हो जाएगी। इस के अतिरिक्त आप का स्त्री-धन खुर्द-बुर्द कर देने और फर्जी हस्ताक्षर कर के कार को बेच देने आप के साथ क्रूरता का व्यवहार करने के लिए पुलिस में रिपोर्ट लिखाइये या फिर न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करिए। देर मत कीजिए।

प्री-पेड से अनधिकृत कटौती अमानत में खयानत है।

consumercomplaintसमस्या-
मुम्बई, महाराष्ट्र से भूपेन्द्र सिंह ने पूछा है –

मेरे पिताजी आईडिया मोबाइल कंपनी, मुम्बई का एक नंबर इस्तेमाल करते हैं, जो कि मेरे भाई के नाम पर रजिस्टर्ड है। मेरे पिताजी सिर्फ फ़ोन रिसीव करने और फ़ोन करना ही जानते हैं। कुछ दिन पहले मैंने उनका हैंडसेट देख रहा था तो मैंने पाया कि उनके नंबर पर फ़िल्मी पैक सर्विस एक्टिवेट थी जिसका प्रति सप्ताह १० रुपये कम्पनी द्वारा काटा जा रहा है। जबकि मेरे पिताजी ने ऐसा कोई सर्विस एक्टिवेट ही नहीं कराया है। जब मैंने कस्टमर केअर पर बात करने कि कोशिश कि तो कंपनी ने उल्टा हमारे ही ऊपर इल्जाम लगा दिया कि आपने ही सर्विस चालू किया है, कंपनी ने नहीं। जब मैंने और अधिक जानकारी मांगी तो सर्वर डाउन है ऐसा करके मेरी शिकायत को नहीं लिया और बाद में दोबारा फ़ोन करने के लिए कहा। जब मैंने दुबारा फ़ोन किया तो फिर से सर्वर डाउन है ऐसा करके मेरी शिकायत को नहीं लिया और बाद में दोबारा फ़ोन करने के लिए कहा।

मैं कंपनी के इस व्यवहार से काफी दुखी हूँ और ऐसा पहले भी हो चुका है।  मैं कंपनी के इस व्यवहार को अपने साथ धोखाधड़ी और ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट समझता हूँ।  मैं कंपनी के खिलाफ क्रिमिनल करवाई करना चाहता हूँ ताकि कंपनी को सबक मिले और दुबारा कोई कंपनी ऐसा न करे किसी ग्राहक के साथ।  कृपया मेरा मार्गदर्शन करें कि मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

दि यह मोबाइल कनेक्शन प्रीपेड है तो आप से सहमति है कि इस तरह की अनधिकृत कटौती अमानत में खयानत है। क्यों कि प्रीपेड में आप के द्वारा रिचार्ज करायी गई राशि यूज करने तक कंपनी के पास आप की अमानत होती है। उस से अनधिकृत रूप से कटौती करना अमानत में खयानत है।

कंपनी जिस दिन से सर्विस एक्टीवेट करना कहती है उस दिन से अभी तक का सारा यूसेज डाटा आप कंपनी से प्राप्त कर लीजिए, कंपनी से लिखित में पूछिए कि आप के भाई के फोन नं. से कब उक्त सेवा चालू कराई गई थी। जब यह सब डाटा आप को लिखित में उपलब्ध हो जाए तो आप कंपनी के चेयरमेन, डायरेक्टर्स व सेक्रेटरी को नोटिस भेज सकते हैं कि आप के पास प्री-पेड नंबर है और आप एडवांस में कंपनी को पैसा जमा करवाते हैं जिस का बैलेंस कंपनी के पास ट्रस्ट के रूप में रहता है। उस ने प्रति सप्ताह यह रुपया काट कर अमानत में खयानत की है। अब तक जितनी राशि काटी गई है वह ब्याज व हर्जाने समेत 30 दिन में लौटाएँ। यदि 30 दिन में कंपनी कोई जवाब नहीं देती है तो आप के भाई पुलिस थाना में अपनी रिपोर्ट दर्ज कराएँ। यदि पुलिस थाना रिपोर्ट दर्ज करने में या कार्यवाही करने में आनाकानी करे तो आप के भाई सीधे न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

भारत के उद्योगपतियों ने एक कंजुमर कम्प्लेंट रिड्रेसल काउंसिल (इंडिया) बना रखी है। यह एक सेल्फ रेगुलेटरी संस्था है। इस की वेबसाइट पर शिकायत प्रपत्र मौजूद है। आप चाहें तो यहाँ भी कार्यवाही कर सकते हैं। इस के लिए आप इस यूआरएल (http://ccrc.in/index.php) वेबसाइट खोल सकते हैं और वहाँ सबमिट कम्प्लेंट पर क्लिक करने पर खुलने वाले पेज पर अपनी शिकायत पंजीकृत करवा सकते हैं।  इस के अतिरिक्त उपभोक्ता न्यायालय में भी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं।

consumercomplaintform

आप की बहिन अपने व अपने बेटे के लिए गुजारा भत्ता प्राप्त करने हेतु दिल्ली के न्यायालय में आवेदन कर सकती है

husband wifeसमस्या-

नदीम अहमद ने दिल्ली से पूछा है –

मेरी बहन का विवाह ११ साल पहले हुआ था लड़का ज्यादा पढ़ा-लिखा नहीं था और अपने पिता के साथ ही काम करता था। देवबंद में उनके स्कूल और कॉलेज हैं। हम ने उनसे कहा के अगर कुछ ऊँच नीच हो गयी तो कौन जिम्मेदार होगा? तो लड़के के पिता ने कहा मैं पूरी तरह से लड़के की तरफ से जिम्मेदार हूँ।  शादी के कुछ दिनों के बाद से ही लड़का मेरी बहन से साथ बुरी तरह से मार-पीट करता आ रहा है।  अगर उससे पहले खाना खाते वक्त रोटी तोड़ ली तो लड़ने लगता है कि हम पुरुष प्रधान हैं और तू हम से पहले रोटी नहीं तोड़ सकती। अगर घर में कुछ चीज़ इधर उधर हो जाये तो हिंसक तरीके से बर्ताव करता है।  शादी के बाद हमें पता चला कि उसको पागलपन का मेडिकल सर्टिफिकेट मिला हुआ है और कहता है के अगर में खून भी कर दूँ तो मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अगर लड़की अपने घर फोन से बात करती है तो छुरी ले के खड़ा रहता है कि क्या बात कर रही है?
क बार मारपीट में लड़की की ऊँगली तोड़ दी जिसका डॉक्टर से उनके बाप ने इलाज कराया। दो बार घर से बाहर निकाल दिया। लड़की दो तीन बजे तक घर से बाहर सड़क पर अकेली खड़ी रही और आप सो गया। आये दिन न जाने कितनी बार बिना बात के लड़की के झापड़ मार देता है और उसका सर दिवार से दे दे के मारता है। इधर उसका सम्बन्ध किसी और लड़की से भी है। हमने उसके पिता से बात की तो उन्होंने बताया कि लड़के ने मेरे उपर भी हाथ उठाया है। मैं ज्यादा कुछ नहीं कर सकता। बहन का एक लड़का भी है 10 वर्ष का। अब हम बहिन को अपने घर ले आये हैं। जब हमने लड़के से और उसके पिता से लड़की के एक्स रे रिपोर्ट और मेडिकल पेपर, और डॉक्टर की प्रेस्क्रिप्शन मांगी तो उन्होंने देने से इंकार कर दिया। लड़की के स्कूल और कॉलेज के सर्टिफिकेट भी नहीं दिए। लड़के का बाप तो काफी हद तक ठीक है लेकिन उसकी माँ और बहनें आये दिन लड़ती हैं और दहेज का ताना देती हैं। अब हमें बताये की हम लड़के के खिलाफ क्या क्या कर सकते हैं? हम पूरा खर्चा बहन का, बहन के लड़के का, रहने के लिए मकान वगैरा चाहते हैं कृपया कर के हमें दिशा दें हम देहली में रहते है और लड़का देवबंद सहारनपुर का है। रूपये पैसों की लड़के वालों के पास कोई कमी नहीं है।

समाधान-

प की बहिन के साथ बहुत अन्याय हुआ है। उस के साथ अमानवीय व्यवहार हुआ है और उस के साथ अत्यधिक क्रूरता का बर्ताव हुआ है। आपने अच्छा ही किया जो आप अपनी बहिन को इस दोज़ख से निकाल लाए। इस क्रूरतापूर्ण बर्ताव के कारण आप की बहिन को अपने पति से अलग रहने का अधिकार भी उत्पन्न हुआ है। मुस्लिम विधि के अनुसार आप की बहिन अपने पति से तलाक की मांग कर सकती है तथा तलाक न दिए जाने पर न्यायालय से तलाक भी प्राप्त कर सकती है। खैर¡ शायद अभी आप लोग ऐसा नहीं चाहते हैं।

प की बहिन को तथा बहिन के लड़के को अपने पिता से गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकार है। इस के लिए आप की बहिन स्वयं अपनी ओर से तथा अपने बेटे की ओर से धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत देहली में जहाँ वह आप के साथ निवास करती है परिवार न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत कर सकती है। उसे गुजारा भत्ता मिल जाएगा यहाँ तक कि आप की बहिन को न्यायालय उक्त प्रकरण की सुनवाई के दौरान भी अन्तरिम गुजारा भत्ता दिलाने का आदेश प्रदान कर सकता है। यह गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकार आप की बहिन को तलाक के बाद भी जब तक वह दूसरा विवाह न कर ले तब तक है। बेटे को बालिग 18 वर्ष का होने तक गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकार है। इसी तरह का आवेदन आप की बहिन महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत भी कर सकती है और न केवल गुजारा भत्ता अपितु अपने लिए सुरक्षा का आदेश भी प्राप्त कर सकती है।

प की बहिन के साथ जो क्रूरता हुई है वह धारा 498-ए भा.दं.संहिता के अन्तर्गत अपराध है। ससुराल में जिस जिस ने उस के साथ क्रूरता की है वे सभी अपराधी हैं। आप की बहिन की संपत्ति जो उसे उपहार के बतौर अपने मायके वालों से, ससुराल वालों से तथा मित्रों से प्राप्त हुई है वह उस का स्वयं की संपत्ति है वह उस संपत्ति को लौटाने की मांग अपने पति व उस के ससुराल वालों से कर सकती है। उस के इलाज से संबंधित दस्तावेज व शिक्षा से संबंधित दस्तावेज भी मूल्यवान प्रतिभूति हैं वह उन  की भी मांग कर सकती है। यह संपत्ति और मूल्यवान प्रतिभूतियाँ न लौटाने पर धारा 406 भा.दं.संहिता का अपराध है। इस की शिकायत आपकी बहिन पुलिस को कर सकती है और पुलिस द्वारा कार्यवाही न करने पर न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत कर सकती है। पर क्यों कि ये अपराध देवबंद में हुए हैं इस कारण से इस की शिकायत देवबंद के पुलिस थाना या उस पुलिस थाना पर अधिकारिता रखने वाले देवबंद के न्यायालय में ही कर सकती है।

प को चाहिए कि आप दिल्ली में किसी संजीदा वकील से मिलें और अपनी बहिन व उस के बेटे की ओर से कार्यवाही तुरन्त करें। आप को धारा 498-ए तथा धारा 406 भा.दंड संहिता के अन्तर्गत कार्यवाही देवबंद में भी करनी चाहिए।

गिरवी रखे जेवर न लौटाना अमानत में खयानत का अपराध है।

समस्या-

इंदौर, मध्य प्रदेश से प्रहलाद सिंह ने पूछा है-

मेरी उम्र 62 वर्ष है, मैं राष्ट्रीयकृत बैंककर्मी रह चुका हूँ एवं विगत दीर्घ अन्तराल से सेवा से पृथक हूँ जिसके कारण विभिन्न न्यायालयों में निर्णय हेतु प्रकरण लंबित हैं। सेवा पृथक्करण  के पश्चात आर्थिक विषमताओं के चलते मेरे द्वारा अपने पारिवारिक बुजुर्ग मित्र (संबोधन-काकाजी) जो ब्याज पर लेनदेन का व्यवसाय करते थे,  उनसे वर्ष १९९७ में अपनी पत्नी के जेवर गिरवी रखकर २०,०००/- रु. दो प्रतिशत मासिक ब्याज दर पर उधार लिए थे। जितना मूल धन उधार लिया था उससे कई ज्यादा मूल्य जेवरों का था। जेवरों की संख्या, प्रकार इत्यादि की सूची तत्समय कर्जदाता काकाजी द्वारा बनायी गई थी। धन की त्वरित आवश्यकता एवं आपसी सम्बन्धों/ विश्वास के चलते तत्समय मेरे द्वारा ना ही इस सम्बन्ध में कोई लिखा पढ़ी की गई न ही कोई अन्य दस्तावेज इस सम्बन्ध में रखा गया। क्योंकि उनकी पत्नी ने मुझे धर्म भाई बना रखा था एवं सम्पूर्ण परिवार से मधुर पारिवारिक सम्बन्ध थे। मेरे द्वारा उधार धन प्राप्ति से आगामी २-३ वर्षों तक ब्याज राशि नियमित दी जाती रही। फिर मेरा गुजारा भत्ता बंद हो गया तो उन्हें ब्याज देना भी धीरे धीरे बंद हो गया। कुछ वर्षों बाद उनकी म्रत्यु भी हो गई। उनके जीवित रहते मैं आर्थिक परेशानी के चलते लेन देन चुकता कर अपने गिरवी जेवर उनसे नहीं प्राप्त कर सका। वर्तमान में उनके परिवार में पत्नी याने मेरी धर्म बहन काफी वृद्ध हो चुकी हैं एवं उनके ३ पुत्र एवं परिवार है। २ पुत्र शासकीय सेवा में हैं। मेरे द्वारा अपने हालातों में सुधार आने पर उनसे विगत कई वर्षों से अपनी पत्नी के गिरवी रखे जेवर छुडवाने हेतु पूरे परिवार से पृथक पृथक मौखिक निवेदन/ चर्चा कर रहा हूँ किन्तु वे अधिक ब्याज दर से कुल रकम चुकाने की बात करते हैं या सोने के वर्तमान भाव से गिरवी रखे जेवरों को लौटाने का कहकर टालमटोल करते हैं (जो कि मेरे सामर्थ्य से परे है) एवं लेनदेन चुकता कर गिरवी रखे जेवर लौटाने में रूचि नहीं रखते हैं क्यों की वर्तमान में सोने का मूल्य आसमान छू रहा है एवं मेरे लिए गए कर्ज से कई गुना संपत्ति उनके पास है। बातचीत के सारे प्रयास विफल हो चुके हैं। स्वर्गीय काकाजी की पत्नी जो कि मुझे धर्मभाई मानती है वो भी सारे संबंधों/ रिश्ते-नाते को भुला चुकी हैं। संक्षिप्त में मैं नियमानुसार उक्त लेनदेन चुकता करने की मंशा रखता हूँ किन्तु मेरे पास उक्त लेनदेन, गिरवी रखे जेवरों इत्यादि का कोई सबूत / दस्तावेज / अनुबंध उपलब्ध नहीं हैं किन्तु कर्जदाता के बहीखाता में उक्त जानकारी निश्चित उपलब्ध है। तो इस स्थिति में नियमानुसार लेनदेन चुकता कर अपनी गिरवी रखी संपत्ति की वापसी हेतु क्या मैं मनी लांड्रिंग एक्ट के तहत कोई वैधानिक कार्यवाही कर सकता हूँ? या पहले अपना पक्ष पुख्ता करने के लिए उनके समक्ष एक बार फिर लेनदेन चुकता करने एवं अपनी गिरवी जेवर इत्यादि की वापसी हेतु एक डमी चर्चा करूं एवं उस चर्चा/ बातचीत को गुप्त कैमरे/ मोबाइल रिकॉरडिंग इत्यादि से एक स्टिंग ओपरेशन का रूप दूँ एवं उसे सबूत के बतौर न्यायलय में पेश करूं। क्या यह कार्यवाही कारगर साबित होगी या बिना इसके भी उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जा सकती है जिससे कि मुझे मेरी पत्नी के गिरवी रखे जेवर पुनः प्राप्त हो सकें।

समाधान-

Havel handcuffप के पास जेवर गिरवी रखने का कोई सबूत नहीं है सिवाय इस के कि स्व. काकाजी ने आप के जेवरों की सूची उन के खुद की हस्तलिपि में बनाई थी वह आप के पास है। इस तरह का ऋण चुपचाप प्राप्त किया जाता है इस कारण जेवर गिरवी रखने का भी कोई सबूत न होगा। आप जो ब्याज देते रहे उस का कोई बही खाता या डायरी आपने भी मेंटेन नहीं की होगी। इस लिए आप के पास सबूतों की तो कमी है। इस कारण यदि किसी तरह उन से होने वाली बातचीत रिकार्ड कर ली जाती है तो वह आप के पक्ष में सबूत होगी जो आप के पास की सूची को मिला कर अच्छे साक्ष्य का काम करेगी। इस कारण यदि आप बातचीत को रिकार्ड कर लेते हैं तो यह अच्छा है।

प के जेवर वे वापस नहीं लौटा रहे हैं जो कि उन के पास अमानत हैं। यह सीधे सीधे अमानत में खयानत का धारा 406 आईपीसी का मामला है जो कि एक संज्ञेय अपराध है। जिस के लिए पुलिस तुरंत कार्यवाही कर उन्हें गिरफ्तार कर सकती है और आप के जेवर बरामद कर सकती है जिन्हें बाद में न्यायालय से आदेश करा कर वापस प्राप्त किया जा सकता है।

मारी राय है कि आप पहले रिकार्डिंग कर लें। उस के बाद एक विधिक सूचना (लीगल नोटिस) काका जी के सभी उत्तराधिकारियों को भिजवा दें जिस में जेवर लौटाने का आग्रह कर दें और समय सीमा में न लौटाने पर सक्षम न्यायालय में कार्यवाही करने की चेतावनी दे दें। नोटिस में जेवरों की सूची और रिकार्डिंग जो आप के पास रहेगी उन का उल्लेख न करें। समय सीमा समाप्त होने पर पुलिस में रिपोर्ट लिखाएँ। पुलिस रिपोर्ट न लिखे तो किसी वकील की मदद से सीधे न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर पुलिस को धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता में भिजवाएँ। इस परिवाद में धारा 406 तथा मनी लांड्रिंग एक्ट के अंतर्गत कार्यवाही करने तथा आप के जेवर वापिस दिलाने की राहत मांगें।

… मुसीबत किसी भी समय धरती फोड़ कर बाहर निकल सकती है

समस्या-

चन्‍देरी, मध्यप्रदेश से कुलदीप कोली ने पूछा है –

मारे पापा लोग 6 भाई है 2 चाचा बाहर नौकरी करते हैं।  हमारे सब से छोटे चाचा की शादी लगभग 20 वर्ष पूर्व ग्वा‍‍लियर से हुयी थी।  चाची झूठा दहेज प्रकरण लगाकर लगातार पैसों की मांग कर रही है। इस में हमारे पापा और एक चाचा का नाम झूठा फँसाया गया है। चाची चन्देरी में हमारे यहाँ रहती थी।  एक साल पूर्व घर से पूरा जेवरात ले कर भाग गई और चन्देरी थाने में प्रकरण दर्ज करा दिया जो झूठा है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

Wife 50-50मारा समाज बहुस्तरीय है। संविधान और कानून जहाँ स्त्रियों को बराबरी का अधिकार देता है वहीं हमारा समाज इस के लिए अभी तैयार नहीं है। वह पुरानी रवायतों को बनाए रखना चाहता है जिस में स्त्रियों को अधिकार नहीं थे। अभी कितने लोग हैं जो माता, पिता की मृत्यु पर बहनों को संपत्ति में बराबर का अधिकार देना चाहते हैं? एक लड़की विवाह कर के ससुराल आती है साथ में कुछ जेवर और दहेज लाती है। वह 20 साल तक संयुक्त परिवार में रहती है। सुबह उठने से ले कर सोने तक काम करती है। घर के पुरुष दिन भर काम कर के कमाते हैं, जितना वे काम करते हैं उस से कम स्त्रियाँ घरों पर नहीं करतीं। पुरुषों को उन के काम का पूरा वेतन मिलता है या व्यवसाय से लाभ मिलता है जो पुरुषों की सम्पत्ति हो जाती है। लेकिन स्त्रियों को उन के काम के बदले क्या मिलता है? कुछ नहीं। उन स्त्रियों में से कोई एक अपने पति या ससुराल वालों के व्यवहार से या अनथक परिश्रम से थक कर अपने जेवर ले कर चली जाती है। अपने जो सामान आप के यहाँ छोड़ गई है उन की मांग करती है या उन्हें पाने के लिए मुकदमा कर देती है तो लोग उसे ही दोषी ठहराते हैं। वास्तव में तो जितनी संपत्ति पति ने पिछले 20 सालों में कमा कर बचाई है उस में आधी तो उस की पत्नी की ही है। क्यों कि उस में उस के श्रम की बलि चढ़ी है।

ब केन्द्र सरकार जल्दी ही कानून बनाने वाली है कि पति पत्नी के बीच यदि तलाक होाग तो पति की आधी संपत्ति पत्नी के नाम हस्तांतरित हो जाएगी अर्थात पति की सम्पत्ति में आधा हक पत्नी का होगा। इस कानून से सावधान हो जाइए। सब लोग जो अपनी पत्नी को ये अधिकार नहीं देना चाहते वे कानून बनने के पहले ही अपनी पत्नी को तलाक दे देंगे तो लाभ में रहेंगे वर्ना पत्नी ने बाद में तलाक मांग लिया तो आधी संपत्ति से हाथ धो बैठेंगे।

प को चाहिए कि आप का परिवार अपनी शेष बहुओं को संभाले उन से मनुष्य की तरह व्यवहार करे। यह मानें कि परिवार की समृद्धि में स्त्रियों का बराबर का हक है। उन्हें पारिवारिक निर्णयों में बराबरी प्राप्त है। जहाँ तक आप की चाची का प्रश्न है तो उस से मिलें। परिवार की गलतियाँ जो रही हों उन्हे स्वीकार करें। उसे मनाएँ। उसे कहें कि वह भी परिवार का उसी तरह समान हिस्सा है जैसे परिवार के अन्य पुरुष और महिलाएँ हैं। वह मान जाती है और मुकदमा खारिज करवा कर वापस आने को तैयार हो जाती है तो बहुत अच्छा है। नहीं होती है तो उसे उस के हक की राशि देकर चाचा-चाची के बीच सहमति से तलाक करवाइए। इस पर भी न माने तो अच्छा सा वकील करें जो कानूनी नुक्ते निकाल कर आप को इस मुकदमे की मुसीबत से बचा सके।

ब तो सब को यह सोच लेना पड़ेगा कि स्त्रियों को परिवार में बराबरी का अधिकार दे ही दें। उन्हें इंसान समझें, परिवार की बराबर की इकाई समझें। उन्हें बराबर का अधिकार भी दें।  न देंगे तो मुसीबत किसी भी समय धरती फोड़ कर बाहर निकल सकती है।

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