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उच्च न्यायालय के निर्णय की अनुपालना के लिए उच्च न्यायालय में ही आवेदन करें।

lawसमस्या-
डॉ. महावीर सिंह ने झुन्झुनु, राजस्थान से पूछा है-

युर्वेद विभाग राजस्थान में साक्षात्कार के माध्यम से जून 2009 में 378 आयुर्वेद चिकित्साधिकारी पद पर नियुक्ति /पदस्थापन हुआ। यह भर्तियाँ राजस्थान ग्रामीण आयुर्वेद होमोपथी यूनानी एवं प्राकृतिक सेवा अधिनियम-2008 के अंतर्गत कि गई थीं।  दो वर्ष का प्रोबेशन पीरियड पूरा होने से तीन माह पहले राजस्थान हाईकोर्ट के एक निर्णय द्वारा भर्ती को अवैध घोषित कर दुबारा मेरिट बनाने का आदेश दिया तथा दुबारा भर्ती प्रक्रिया पूरे होने तक कोर्ट ने इन चिकित्सकों को ग्रामीण चिकित्सा का हवाला देकर कार्य करते रहने का निर्देश दिया। आदेश के मुख्य बिंदु थे कि 1. सरकार द्वारा सर्विस रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकने से कोर्ट ने माना कि चयन समिति ने रिकॉर्ड बनाया ही नहीं, 2.  दुबारा चयन प्रक्रिया पूरे होने तक इनको डिस्टर्ब नहीं किया जाये! आज तक सरकार दुबारा भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकी है। मार्गदर्शन देने का श्रम करें। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि राजस्थान सरकार में दो वर्ष के प्रोबेशन पीरियड में प्रोबेशन ट्रेनी के रूप में फिक्स-रिमुनरेशन 16800/- पर रखा जाता है, हमें आज तक यही मिल रहा है।

समाधान-

प की नियुक्ति को उच्च न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किया जा चुका है। हो सकता है राजस्थान सरकार ने उस निर्णय को आगे चुनौती दी हो, जानकारी करें। आवश्यक सेवाएँ होने के कारण नई चयन प्रक्रिया पुनः पूर्ण हो जाने तक के लिए आप को सेवा में यथावत बनाए रखने का आदेश दिया गया है। निश्चित रूप से आप को वही निश्चित वेतन तब तक मिलेगा जब तक कि आप को पुनः चयन प्रक्रिया के द्वारा चयन किया जा कर पिछली तिथि से नियुक्ति नहीं दे दी जाती है।

दि सरकार इस काम में देरी कर रही है तो यह उस का दोष है और न्यायालय के निर्णय की अवमानना भी है। इस के लिए आप न्यायालय के समक्ष अवमानना याचिका भी प्रस्तुत कर सकते हैं और एक नई रिट भी प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप को उच्च न्यायालय के वकील से संपर्क कर के उन्हें पूर्व निर्णय व संबंधित आदेश व आवश्यक दस्तावेज दिखा कर राय करना चाहिए और उन की सलाह के अनुसार कार्यवाही करना चाहिए।

कीडों का कनस्तर खुलता है तो उसे खुलने दो!

हलका में प्रकाशित प्रशांत भूषण के साक्षात्कार में भारत के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश श्री एस.एच. कपाड़िया के संबंध में की गई टिप्पणी पर कि ‘उन्हें उस कंपनी के मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए थी जिस के वे शेयरधारक हैं,’  सर्वोच्च न्यायालय में चल रही अवमानना कार्यवाही के दौरान प्रशांत भूषण के वकील राम जेठमलानी ने अपने मुवक्किल का लिखित बयान पेश किया। इस बयान में कहा गया था कि ‘उन के मुवक्किल के बयान का यह गलत अर्थ लगाया गया कि ‘न्यायमूर्ति कपाड़िया किसी आर्थिक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं,  न्यायमूर्ति कपाड़िया आर्थिक शुचिता के लिए जाने जाते हैं और मेरा मुवक्किल भी इस धारणा को सही मानता है। उन का मुवक्किल न्यायमूर्ति कपाड़िया का बहुत सम्मान करता है।’
स बयान को देखने के उपरांत न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर ने जेठमलानी से पूछा कि उन का मुवक्किल अदालत के सामने क्षमा याचना या खेद क्यों नहीं प्रकट कर देता?
ब जेठमलानी ने कहा कि ‘आप (अदालत) मेरे मुवक्किल से क्षमायाचना या खेद प्रकट करने को नहीं कह सकते। अवमानना कार्यवाही किसी दबाव में नहीं चलनी चाहिए, केवल वे कायर ही जो कार्यवाही का सामना नहीं कर सकते क्षमा याचना या खेद प्रकट कर सकते हैं। मैं अपने मुवक्किल को क्षमायाचना या खेद प्रकट करने की सलाह नहीं दे सकता।’
स के उपरांत न्यायालय ने संक्षिप्त आदेश पारित किया कि वह प्रशांत भूषण के लिखित बयान को स्वीकार नहीं करती, मामले का निर्णय गुणावगुण पर करने के लिए कार्यवाही को आगे चलाया जाए। तब जेठमलानी ने कहा कि ‘यदि कार्यवाही आगे चलाई जाती है तो वह कीड़ों का कनस्तर खोल देगी’। तब न्यायमूर्ति कबीर का उत्तर था कि ‘वह खुलता है तो खुलने दिया जाए’। 
स पर जेठमलानी ने कहा कि ‘हर कोई जानता है कि पिछले दो वर्षों से इस न्यायालय में क्या चल रहा है, लेकिन कोई मुहँ नहीं खोलना चाहता। यदि जनता को सच बोलने के लिए भुगतना चाहिए तो लाखों लोग सींखचों के पीछे जाने को तैयार हैं’
सी अवमानना कार्यवाही में तहलका के अरुण तेजपाल के वकील राजीव धवन ने उन की ओर से कहा कि उन का मुवक्किल भी प्रशांत भूषण के रुख का समर्थन करता है। यदि सच ही अवमानना की प्रतिरक्षा बनने जा रहा है तो कुछ पूर्व मुख्यन्यायाधीश भी एक्स-रे की जद में आ सकते हैं।
न्यायमूर्ति सिरिक जोसेफ ने कहा कि जब कभी न्यायाधीश यह महसूस करते हैं कि उन का कही गई बात का अर्थ कुछ और समझ लिया गया है, तो वे भी खेद प्रकट करते हैं। अवमानना कार्यवाही का सामना करने वालों के लिए खेद प्रकट करने में कोई खराबी नहीं है।
पूर्व कानून मंत्री शान्तिभूषण जिन्होंने यह कहा था कि उच्च-न्यायपालिका में भ्रष्टाचार है, चाहते थे कि इस अवमानना कार्यवाही में उन्हें भी पक्षकार बनाए जाने की उन के आवेदन पर विचार किया जाए, इस पर अदालत ने उन के आवेदन पर अगली तिथि पर विचार करने को कहा। अब इस मामले की सुनवाई 13 अप्रेल को की जाएगी।

न्यायपालिका की आलोचना के लिए माफी मांगने के बजाय जेल जाना पसंद करेंगे

पिछले दो दिनों से सुरेश चिपलूनकर ने सुप्रीमकोर्ट के जजों के संदिग्ध आचरण के बारे में अपने ब्लॉग पर प्रकाशित किया है। यह सब बहुत पहले से तहलका ई-मैगज़ीन पर पिछली सात अक्टूबर को प्रकाशित हो चुका था।  यह सारा मामला वास्तव में न्यायिक जवाबदेही आंदोलन के प्रमुख और सुप्रीमकोर्ट अधिवक्ता प्रशांत भूषण के तहलका में प्रकाशित एक साक्षात्कार में यह कहने पर उत्पन्न हुआ था कि देश के पिछले सोलह न्यायाधीशों में आधे भ्रष्ट थे। उस समय तक न्यायमूर्ति एच.एस. कपाड़िया मुख्य न्यायाधीश नहीं बने थे, उन्हों ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के.जी.बालाकृष्णन् के साथ एक पीठ में वेदान्ता स्टरलाइट ग्रुप से जुड़े एक मामले की सुनवाई की थी इसी साक्षात्कार में उन्हों ने यह भी कहा था कि न्यायमूर्ति कापड़िया को इस मामले की सुनवाई नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह कंपनी के शेयर धारक हैं।  
स साक्षात्कार के आधार पर सुप्रीमकोर्ट के एक अधिवक्ता  हरीश साल्वे ने सुप्रीमकोर्ट के समक्ष एक अवमानना याचिका दाखिल की गई और उस पर प्रशांत भूषण और तहलका के संपादक तरुण तेजपाल के विरुद्ध सुप्रीमकोर्ट ने अवमानना नोटिस जारी किया। इस नोटिस के उत्तर में प्रशांत भूषण ने कहा कि उन्हों ने जो कुछ कहा वह उन की निजि राय थी जो तथ्यों पर आधारित थी, और यदि न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के बारे में निजि राय अभिव्यक्त करना उन का अभिव्यक्ति का मूल अधिकार है। इस के समर्थन में प्रशांत भूषण के पिता और वरिष्ठ अधिवक्ता शान्ति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में एक शपथ पत्र दाखिल कर के कहा कि वे खुद जानते हैं कि सोलह में से आठ मुख्य न्यायाधीश भ्रष्ट थे। इस शपथ पत्र के अंश तहलका ने प्रकाशित किए। शान्ति भूषण ने यह भी कहा कि उन्हें इस कार्यवाही में पक्षकार बनाना चाहिए क्यों कि जो कुछ प्रशांत ने कहा है वह सही है और वे उस की ताईद करते हैं।
बुधवार को इसी प्रकरण की प्रारंभिक पूछताछ सुनवाई के दौरान पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि वह और उनके वकील बेटे प्रशांत भूषण न्यायपालिका में भ्रष्टाचार की ओर इशारा करने के लिए माफी मांगने के  स्थान पर को जेल जाना पसंद करेंगे। उन्हों ने न्यायमूर्ति अल्तमश कबीर, न्यायमूर्ति सायरिक यूसुफ और न्यायमूर्ति एच एल दत्तू की सुप्रीम कोर्ट बैंच के समक्ष यह जवाब तब दिया जब उन्हें उन से माफी मांगने की पेशकश की गई थी।
स अवमानना के इस मामले में यह प्रश्न निहित हो चुका है कि भूषण पिता-पुत्र द्वारा जो कुछ सुप्रीमकोर्ट और उस के न्यायाधीशों के लिए कहा और तरुण तेजपाल द्वारा तहलका में प्रकाशित किय

सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना के लिए दंडित करने व नियम बनाने की शक्तियाँ : भारत में विधि का इतिहास-98

अवमानना के लिए दंडित करने की शक्ति
र्वोच्च न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 129 के अंतर्गत एक अभिलेख न्यायालय है। इसी कारण से इस न्यायालय को अपनी ही अवमानना के लिए किसी व्यक्ति को दंडित करने की शक्ति प्राप्त है। अवमानना के लिए दंडित करने की इस शक्ति का प्रयोग केवल न्यायालय के न्याय प्रशासन के संबंध में ही किया जा सकता है, किसी न्यायाधीश के व्यक्तिगत अपमान के संबंध में इस शक्ति का प्रयोग नहीं किया जा सकता। 
इस शक्ति के अधीन सर्वोच्च न्यायालय ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही कर सकता है जो अवांछित उपायों से न्यायाधीशों को प्रभावित करने और न्याय की प्रक्रिया में प्रतिकूल प्रभाव डालने का प्रयत्न करता है। 
न्यायपालिका की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए अनुच्छेद 121 में यह उपबंध किया गया है कि किसी भी न्यायाधीश के आचरण और निर्णय के संबंध में संसद में चर्चा नहीं की जा सकती है। लेकिन किसी समाचार पत्र में या अन्यथा प्रकाशित किसी आलोचनात्मक आलेख या कथन से स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय प्रशासन के प्रति समुदाय के विश्वास को क्षति पहुँची हो या उस कथन या आलोचना से न्यायिक प्रशासन में अवरोध उत्पन्न हुआ हो तो उक्त कथन अथवा आलोचना को सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना माना जाएगा। 
सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की शक्ति
संविधान के अनुच्छेद 145 के द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को अपनी प्रक्रिया को सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त नियम बनाने की शक्ति प्रदान की गई है। सर्वोच्च न्यायालय की नियम बनाने की यह शक्ति संसद द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन है। वह केवल वे ही नियम बना सकता है जो कि संसद द्वारा नहीं बनाए गए हों। इस तरह संसद द्वारा निर्मित विधि और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्मित नियमों में किसी भी तरह के संघर्ष की संभावना को समाप्त कर दिया गया है।
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