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दरवाजा व रास्ता कैसे बनाए रखें?

समस्या-

अन्नू पांडे ने पूछा है-

नमस्ते!
मेरे घर के पीछे कुछ खाली ग्राम समाज की जमीन है।
मेरे पिता के चाचा जी जो की मेरे घर से 200 मीटर दूर मकान मे रहते है।
मेरे घर के दवाज़े को लेकर रोज़ झगड़ा करते है की मैं उस दरवाज़े को बन्द कर दूँ।उनका कहना है के ये जमनीं उनकी है।जबकि वो ग्राम समाज है। और मेरे पिता के चाचा जी के पास 15 बीघा से ज्यादा का खेत और बाग अलग से है।
तो अब आप हमे बताइये की में अपना निर्माण कार्य किस प्रकार बिना दरवज़ा बन्द किये जारी रख सकता हूँ???

सलाह  

आप का दरवाजा पहले से है आप उसे कायम रखें।
बन्द करने की कहने वाले को कहें कि वह अदालत में जा कर नालिश करे।
यदि वह आप को तंग करता है तो पुलिस में रिपोर्ट कराएँ,  और फिर भी काम न बने तो अदालत में निषेधाज्ञा का वाद दाखिल कर  निर्माण कार्य तथा रास्ते में बाधा उत्पन्न न करने के लिए विपक्षी के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने का प्रयत्न करें।


प्रिय पाठकों!

हम अपने पाठकों से प्राप्त सभी समस्याओं पर अपनी राय ई-मेल से दे रहे हैं।
हम उन्हें यहाँ भी प्रस्तुत कर सकते हैं, जिस से अन्य पाठकों को भी लाभ हो। हम जानना चाहते हैं कि समस्याओं के समाधान इस तरह प्रस्तुत करने का यह प्रारूप आप को कैसा लगा। आशा है आप की टिप्पणियाँ हमें प्राप्त होंगी।
-दिनेशराय द्विवेदी

 

गलत निर्माण को रोकने या हटाने के लिए निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत करें

House demolishingसमस्या-

गोविन्द गौतम ने खजुराहो, छतरपुर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

किसी व्यक्ति द्वारा जबरन मेरी ज़मीन पर छत का छज्जा निकाला जाता है तो ऐसी स्थिति में मैं क्या कर सकता हूँ? पहले से पडौसी के पास दो दो दरवाज़े हैं फिर भी जबरन हमारी जमीन की तरफ तीसरा दरवाज़ा करना उस जगह दूसरे की ज़मीन आती है, वह भी परेशान है तो हम ऐसी स्थिति में क्या करें?

समाधान-

गरीय क्षेत्र में किसी भी आवासीय भूखंड पर निर्माण नगरपालिका या नगर विकास न्यास से बिना मानचित्र स्वीकृत कराए तथा अनुमति प्राप्त किए बिना नहीं किया जा सकता। नगर पालिका इस तरह के निर्माण कार्य की स्वीकृति प्रदान नहीं करती है जिस से पड़ौसियों को परेशानी हो या उन के अधिकारों का अतिक्रमण हो। ग्रामीण क्षेत्र में इस तरह का निर्माण किया जाए तो ग्राम पंचायत इसे रोक सकती है। इस तरह के निर्माण के विरुद्ध सब से आसान तरीका यह है कि जिसे परेशानी हो रही है उसे नगरपालिका अथवा ग्राम पंचायत को शिकायत करनी चाहिए। नगर और ग्राम में व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार इन संस्थाओँ को उचित कार्यवाही करनी चाहिए। लेकिन समस्या यह है कि इस तरह के निर्माण नगर पालिका और ग्राम पंचायत द्वारा उचित कार्यवाही समय पर नहीं करने के कारण ही होते हैं।

दि ऐसा कोई भी निर्माण होने की आशंका हो तो जिस से किसी को परेशानी हो रही हो या फिर किसी के अधिकारों का अतिक्रमण होने वाला हो तो वह सीधे न्यायालय में अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए वाद प्रस्तुत कर उसी वाद में अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर सकता है और न्यायालय से ऐसे कार्य को रोके जाने के लिए आदेश जारी करा सकता है। यदि ऐसे निर्माण का कोई भाग या निर्माण पूरा कर लिया गया हो तो आज्ञात्मक निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए जिस में यह राहत चाही गई हो कि इस तरह का निर्माण वैध नहीं है और इस से आवेदक के अधिकारों का अतिक्रमण हो रहा है। न्यायालय ऐसे मामलों में हो चुके निर्माण को हटाने रास्ते, दरवाजे, खिड़की और पनाले को बन्द करने का आज्ञात्मक आदेश दे सकती है और उस आदेश का पालन करवा सकती है।

दीवानी मामले में दीवानी न्यायालय में कार्यवाही करें, केवल पुलिस को एफआईआर दर्ज कराने से काम नहीं चलेगा

houseconstruction
समस्या-

लखनऊ, उत्तर प्रदेश से प्रगति तिवारी ने पूछा है –

मारे दादा जी द्वारा बनाए घर में तीन परिवार रहते हैं।  उन में से एक परिवार ने घर में अवैध रूप से तोड़-फोड़ शुरू कर दी है। मेरे पिता जी प्रथम सूचना रिपोर्ट FIR लिखाना चाहते हैं लेकिन उन में से एक परिवार ने सुझाव दिया कि आरोपी परिवार के विरुद्ध एक महीने पहले भी प्रथम सूचना रिपोर्ट उसी घर से हो चुकी है इस लिए हमारी रिपोर्ट अब 5 महीने के बाद ही लिखा सकते है। क्या ऐसा कोई नियम है?

समाधान-

सा कोई नियम नहीं है। जब भी अपराधिक घटना घटित हो या होने की संभावना हो तब प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई जा सकती है। आप के पिता जी को इस की रिपोर्ट दर्ज करवा देनी चाहिए। लेकिन आप का मामला अभी अपराधिक नहीं है। आप के तथ्यों के आधार पर केवल यह मामला बनता है कि मतभेद के कारण शान्ति भंग हो इस मामले में पुलिस अधिक से अधिक शान्ति भंग करने से रोकने के लिए परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत करेगी और वहाँ से शान्ति भंग करने के लिए सभी पक्ष पाबन्द कर दिए जाएंगे। इस से कुछ भी हासिल होने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। लेकिन रिपोर्ट पुलिस को अवश्य कर देनी चाहिए।

प का घर संयुक्त परिवार की संपत्ति है और अभी बँटवारा नहीं हुआ है। यह दीवानी अधिकारों का मामला है जिस मे दीवानी कार्यवाही करना ही उचित उपाय है। ऐसी स्थिति में आप के पिता जी को घर के बँटवारे के लिए वाद दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए और बँटवारे के विवाद का निपटारा होने तक उक्त घर में किसी भी तरह के निर्माण और तोड़ फोड़ करने से रोकने के लिए साथ में अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए तथा उस में सभी विपक्षीगण के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करनी चाहिए। इस वाद में आप  के दादा जी के सभी उत्तराधिकारी विपक्षी पक्षकार बनाए जाएंगे।

विभाजन के वाद में संपत्ति को हस्तानन्तरित न करने पर अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त की जा सकती है।

Shopsसमस्या-

गांधीनगर, गुजरात से दिनेशभाई पटेल ने पूछा है-

माता पिता का अवसान हुए 37 वर्ष हो गए हैं। हम तीन भाई हैं बड़ा भाई जमीन और घर भोगता है छोटा भाई मेरे साथ रहता है। मैं सरकारी कर्मचारी हूँ। तीन बहनें 25 वर्ष से ससुराल में हैं। हर प्रसंग में जो खर्चा हुआ है उस में मैं ने हिस्सा दिया है। बड़ा भाई अपने परिवार के लालन पालन के लिए खर्च करता है उस में मुझ से हिस्सा मांगता है। मेरे फंड में भी हिस्सा मांगता है। मैं उसे खर्च में और मेरे फंड में हिस्सा न दूँ तो पिताजी की जायदाद में हिस्सा देने से मना करता है।  मैं गांधीनगर में नौकरी करता हूँ क्या बँटवारे का दावा में गांधीनगर में कर सकता हूँ? मुझे अपने फंड में हिस्सा देना चाहिए या नहीं? क्या जब तक फैसला न ह जायदाद के बारे में स्टे मिल सकता है

समाधान-

प के फंड पर आप का अधिकार है बड़ा भाई आप के फंड का हिस्सा नहीं मांग सकता। वह अपने परिवार के खर्चों के लिए आप से कोई राशि अधिकार के रूप में नहीं मांग सकता। पिता की संपत्ति में हिस्सा देने से बड़े भाई का मना करना गलत है।

प को तुरन्त पिता की संपत्ति के विभाजन का वाद प्रस्तुत करना चाहिए। लेकिन यह वाद उस जिले के जिला न्यायाधीश के यहाँ प्रस्तुत हो सकता है जिस जिले में आप के पिता की संपत्ति या उस का कोई हिस्सा मौजूद हो। गांधीनगर में आप वाद प्रस्तुत नहीं कर सकते।

प को अपने फंड से बड़े भाई को हिस्सा देने की कोई जरूरत नहीं है। आप विभाजन का वाद प्रस्तुत कर उस के साथ ही उक्त संपत्ति को खुर्द-बुर्द न करने के संबंध में न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकते हैं और अस्थाई निषेधाज्ञा (स्टे) प्राप्त कर सकते हैं।

कोई जबरन लाठी के जोर से आप के कब्जे से जमीन नहीं ले सकता, आप राजस्व न्यायालय से स्थगन प्राप्त करें।

agricultural-land
समस्या-

कोरबा, छत्तीसगढ़ से राजेश ने पूछा है-

ज से 15 साल पहले मेरे पिताजी एक व्यक्ति (करीबी रिश्तेदार ) से २०००० रूपये में 20 डिसमिल सिंचित जमीन खरीदी थी।  जितना उन्होंने बताया  और रजिस्ट्री पेपर में भी यही लिखा हुआ है।  खेती की रजिस्ट्री एवं सारे फार्मेलिटी पूरी कर ली गई और हम पूर्ण स्वामित्व से विगत 15 सालों से खेती करते आ रहे हैं।  पर अचानक उस दुष्ट व्यक्ति द्वारा मेरे पिता जी के देहांत के बाद मुझे यह कह कर धमकाने लगा कि उसने सिर्फ 20 डिसमिल जमीन मेरे पिता को बेची थी।  बाकी के 8 डिसमिल जमीन मैं कब्जा कर रहा हूँ और कोई मना करने आया तो जान से मारने की धमकी दे रहा है।  अभी खेती का समय है हमने धान की बोवाई कर ली है और वो कब्जा करने वाला है।
वास्तविकता में वह जमीन 20 डिसमिल से कुछ ज्यादा है, पर यह पक्का नहीं है कि जमीन 28 डिसमिल ही है। पटवारी से हमने अभी तक नपवाया नहीं है।  तो क्या हमें 20 डिसमिल जमीन को छोड़कर बाकी के जितनी भी जमीन होगी उसे छोडनी पड़ेगी? मैं कैसे अपनी जमीन को बचाऊँ अगर वह इस कृत्य में दोषी है तो उसे कड़ी से कड़ी सजा कैसे दिलवाऊँ? चूँकि इसके बेटे बेटियां पुलिस विभाग में नौकरी करते हैं जिसके नाम पर वह हम लोगों पर धौंस जमाता है, और अभी मैं सिर्फ 20 साल का हूँ और अपने पिता की इकलौती संतान हूँ।

समाधान-

मीन पिछले 15 वर्षों से आप के कब्जे में है। रजिस्टर्ड विक्रय पत्र में क्या लिखा है यह नहीं बताया। यदि उस में बेचने वाले ने अपनी कुल जमीन 20 डिसमल ही बताई है और सब बेच दी है तो कुछ जमीन अधिक होने पर भी आप के स्वामित्व की है। आप के कब्जे में आप के स्वामित्व से अधिक की जमीन है तो उस का निर्णय न्यायालय करेगा। यह निर्णय लाठी के जोर से नहीं किया जा सकता। यदि उस व्यक्ति को लगता है कि आप के पास बेची गई जमीन से अधिक जमीन है तो वह न्यायालय में जमीन के कब्जे का वाद प्रस्तुत कर सकता है।  इस तरह जोर जबरदस्ती के माध्यम से जमीन को आप के कब्जे से वापस लेना उचित ही नहीं अपितु गैर कानूनी है।

प को चाहिए कि आप किसी वकील से संपर्क कर के उस व्यक्ति के विरुद्ध अपने निकट के राजस्व न्यायालय से स्थगन आदेश प्राप्त करें कि वह जमीन पर आप के कब्जे को डिस्टर्ब न करे। वह व्यक्ति धमका रहा है तो स्थानीय पुलिस को रिपोर्ट करें। यदि आप को अंदेशा हो कि उस के पुलिस में कर्मचारी पुत्रों के कारण पुलिस कार्यवाही नहीं करेगी तो आप के इलाके के एस.पी. व आई जी से सीधे जा कर मिलें और सारी बात बता कर शिकायत करें।

मार्ग बन्द करने के प्रयास को रोकने के लिए नगरपालिका को शिकायत करें तथा दीवानी न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करें।

समस्या-

सुमन कुमार ने देवपुरा बिहार से पूछा है-

मेरा घर से रोड की दूरी लगभग 10 मीटर है, बीच में 10 मीटर की डिस्टेन्स के सामने किसी दूसरे आदमी की ज़मीन है जो मेरा रास्ता बंद कर रहा है।  लेकिन वो रास्ता 7 फिट चौरा था, जिसका एक प्रूफ मेरे पास है।  मेरे दादा जी के समय का एक दस्तावेज जिस पर 10 लोगों के हस्ताक्षर हैं वो लोग गाली देता है और रास्ता बंद करने का धमकी दे रहा है, मुझे क्या क़ानूनी कार्यवाही मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

village roadरास्तों को अक्षुण्ण बनाए रखने की जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों और नगरपालिकाओं की है। आप को उस व्यक्ति के विरुद्ध ग्राम पंचायत/ नगरपालिका में लिखित शिकायत करनी चाहिए। इस के अतिरिक्त वह गाली गलौच करता है और शान्ति भंग करता है इस के लिए पुलिस थाना को लिखित रिपोर्ट करनी चाहिए।

स के अतिरिक्त आप को दीवानी न्यायालय में अपने दस्तावेज के आधार पर एक वाद स्थाई निषेधाज्ञा हेतु प्रस्तुत कर उस रास्ते को बंद करने से रोकने के लिए ग्राम पंचायत/ नगरपालिका को पक्षकार बनाते हुए प्रस्तुत करना चाहिए और अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर तुरन्त अस्थाई निषेधाज्ञा का आदेश प्राप्त करना चाहिए।

दि वह व्यक्ति गाली गलौच या शान्ति भंग करने से न रुके और पुलिस उस के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं करे तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में आप धारा 107, 116 (3) दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत सीधे शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं। इस शिकायत पर पड़ौसी को पाबंद कर दिया जाएगा कि वह शान्ति भंग करने का कोई भी कृत्य नहीं करे।

अवैध अनधिकृत निर्माण को रोकने और हटाने के लिए स्थाई निषेधाज्ञा के लिए वाद प्रस्तुत कर तुरन्त अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करें।

समस्या-

भोपाल, मध्य प्रदेश से सौरभ ने पूछा है-

मेरी पुश्तैनी जमीन जबलपुर में है और मेरा परिवार अभी वहाँ नहीं रहता है। मेरे चाचा ने सूचना दी है कि मेरी उस जमीन पर कोई बिल्डर कब्जा कर रहा है। इस बात को अभी महिना भर हुआ है। उन लोगों को काम करने से कैसे रोकना चाहिए?

समाधान-

houseconstructionप को तुरन्त जबलपुर जा कर स्थिति को देखना चाहिए। यदि वास्तव में आप की संपत्ति पर कोई निर्माण कार्य चल रहा है तो किए गए निर्माण कार्य को और निर्माण सामग्री को आप तुरन्त अपने खुद के मजदूर लगवा कर हटवा दें, इस का आप को अधिकार है। लेकिन ऐसा करने में कोई पेरशानी हो तो इस अनधिकृत निर्माण को रुकवाने के लिए आप को स्थाई निषेधाज्ञा का दीवानी वाद प्रस्तुत करना चाहिए तथा इसी वाद में अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करनी चाहिए।

किसी भी निर्माण कार्य को करने के पहले नगरपालिका से मानचित्र स्वीकृत करवाना और निर्माण की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है। ऐसी स्वीकृति व अनुमति निश्चित रूप से कब्जा करने वाले ने प्राप्त नहीं की होगी। इस कारण से आप नगर पालिका को भी इस मामले में पक्षकार अवश्य बनाएँ और उन के विरुद्ध यह राहत मांगें कि वह मौके पर जा कर निर्माण कार्य को रोके।

क्त मुकदमा करने के पहले आप नगर पालिका को लिखित शिकायत भी करें कि आप की संम्पत्ति पर बिना मानचित्र स्वीकृत कराए और निर्माण की स्वीकृति प्राप्त किए बिना कोई अनधिकृत व्यक्ति निर्माण करना चाहता है। उसे रुकवाया जाए और निर्माण कर दिया हो तो उसे हटाया जाए।

पावर ऑफ अटार्नी से विक्रय को मूल स्वामी चुनौती दे सकता है

समस्या-

मेरठ, उत्तर प्रदेश से किशनकुमार ने पूछा है –

मेरे माता-पिता ने अपने मकान की संयुक्त वसीयत बनाई जिस के अनुसार एक की मृत्यु हो जाने पर मृतक की संपत्ति का दूसरा स्वामी हो जाएगा। दोनों की मृत्यु हो जाने पर मैं उस संपत्ति का स्वामी हो जाउंगा। मेरी दो विवाहित बहनें हैं। एक बहिन ने पिता जी की मृत्यु के बाद माता जी से पावर ऑफ अटॉर्नी प्राप्त कर एक कमरा दूसरी बहिन को विक्रय कर दिया जिस का पता मुझ बाद में चला। अब मुझे क्या करना चाहिए कि वह किसी और को विक्रय नहीं कर सके और मेरा कमरा मुझे मिल जाए?

समाधान-

वसीयतमाता-पिता ने संयुक्त वसीयत की कि उन में से जिस की भी मृत्यु पहले हो जाएगी उस की संपत्ति का स्वामी दूसरा हो जाएगा। दोनों की मृत्यु हो जाने के उपरान्त वह संपत्ति आप को प्राप्त होगी। इस तरह यह वसीयत एक दोहरी वसीयत है। कोई भी वसीयत तभी प्रभावी होती है जब कि वसीयत कर्ता की मृत्यु हो जाती है। कोई भी वसीयत कर्ता अपने जीवन काल में अपनी वसीयत को परिवर्तित कर सकता है या उसे रद्द कर सकता है।

स मामले में आप के पिता का देहान्त हो गया। उन के देहान्त के साथ ही उन की संपत्ति की स्वामी आप की माता जी हो गई। अब आप की माता जी और पिता की छोड़ी हुई संपत्ति दोनों की स्वामिनी आप की माता जी हैं। माता जी अभी जीवित हैं इस कारण से इस वसीयत का वह भाग जो कि आप की माता जी की इच्छा को प्रकट करता है अभी प्रभावी नहीं है। आप की माता जी अपने हिस्से के वसीयत के भाग को अपने जीवन काल में परिवर्तित कर सकती हैं या रद्द कर सकती हैं। वर्तमान में जो भी संपत्ति है, उन की है। वह आप की नहीं हुई है। इस कारण वे उस संपत्ति को किसी को भी विक्रय या हस्तांतरित कर सकती हैं।

प की माता जी ने एक पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित कर आप की एक बहिन को अपना मुख्तार नियुक्त किया और उस मुख्तार बहिन ने आप की दूसरी बहिन को एक कमरा विक्रय कर दिया। इस में कोई त्रुटि नहीं है, यदि वह विक्रय आप की माता जी के निर्देशानुसार हुआ है। यदि वह आप की माता जी के निर्देशानुसार नहीं हुआ है और किसी धोखे से हुआ है तो आप की माता जी इस हस्तांतरण को चुनौती दे सकती हैं। लेकिन आप को तो इस मामले में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है क्यों कि आप का अभी तक उस संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है।

हाँ, यदि आप की माता जी यह कहती हैं कि आप की मुख्तार बहिन ने उन के निर्देशों के विपरीत यह विक्रय किया है तो आप की माता जी उस विक्रय पत्र को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकती हैं और आप की दूसरी बहिन जिसे वह कमरा विक्रय किया गया है उसे आगे विक्रय करने पर रोक लगाने के लिए इसी वाद में अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर अस्थाई निषेधाज्ञा जारी करा सकती हैं। जिस से आप की कमरे को खरीदने वाली बहिन उसे आगे विक्रय नहीं कर सकेगी।

नामान्तरण संपत्ति के स्वामित्व का सबूत नहीं है।

समस्या-

कुशलगढ, जिला बांसवाडा, राजस्‍थान से संजय सेठ ने पूछा है –

मेरे स्‍वर्गीय दादाजी हमारे समाज के अध्‍यक्ष थे।  22 अप्रेल 1998 को लगभग 6 माह की बीमारी के उपरान्‍त उन का निधन हुआ।  मेरे दादाजी की मृत्‍यु के समय मेरे चाचाजी ने उनसे सादे कागज पर हस्‍ताक्षर करवा लिये थे एवं बाद में उस पर हमारी पैतृक सम्‍पति, समाज का अध्‍यक्ष पद तथा चल अचल सम्‍पति को वंशानुगत आधार पर मेरे चाचाजी के नाम लिख कर वसीयत तैयार कर ली।  जबकि मेरे दादाजी की पैतृक सम्‍पति वर्तमान में नगरपालिका रिकार्ड में मेरे परदादा के नाम पर अंकित है।  मेरे परदादा द्वारा मेरे दादाजी को वसीयत की हो ऐसा कोई प्रमाण नहीं है।  मेरे परदादा के भी दो पुञ थे जिन में से एक पुञ की काफी  समय पहले ही म़त्‍यु हो चुकी थी, उनकी एकमाञ संतान पुञी जीवित है। इसके अतिरिक्‍त हम जिस समाज के सदस्‍य हैं उस समाज ने भी मेरे दादाजी को वंशानुगत आधार पर अध्‍यक्ष पद एवं चल अचल सम्‍पति वसीयत में देने संब‍ंधी कोई अधिकार नहीं दिया था।  वर्तमान में मेरे चाचाजी द्वारा नगरपालिका, कुशलगढ में उक्‍त फर्जी वसीयत के आधार पर हमारी समस्‍त पैत़क  सम्‍पति अपने नाम कराने हेतु प्रार्थना पञ प्रस्‍तुत किया है।  जिस पर मेरे द्वारा आपत्ति दर्ज करवा दी गई है।  आपत्ति प्रस्तुत कर मेरे द्वारा मेरे दादाजी को वसीयत करने हेतु अधिकृत करने वाले दस्‍तावेजों की छायाप्रति चाही है।  जो आज दिनांक तक मुझे नही मिली है।  क्‍या ऐसी स्थिति में नगरपालिका मेरे चाचाजी के नाम पैतृक एवं सामाजिक चल अचल सम्‍पति, वंशानुगत आधार पर अध्‍यक्ष पद की इबारत लिखी हुई वसीयत को मान सकती है।  मैं एक सामान्‍य परिवार से हूँ, जबकि मेरे चाचाजी काफी धनी व्‍यक्ति हैं,  क्‍यों कि उन्‍होने सामाजिक राशि को अपने व्‍यापार में उपयोग लेकर कई गुना राशि अर्जित की है।  इस के साथ साथ वे राजनैतिक रूप से भी प्रभावी हैं, जो अपने प्रभाव का दुरूपयोग कर मुझे पैतृक सम्‍पति से वंचित कर सकते हैं।  मेरे चाचाजी ने जब हम 5 भाई बहन छोटे छोटे, नाबालिग थे तब वर्ष 1972 में मेरे पिताजी से एक सादे कागज पर भाईयों का भागबंटन करने के नाम से लिखा पढ़ी कर रखी है, जिस पर मेरे दादाजी के कहीं भी हस्‍ताक्षर नहीं हैं।  मेरे दादाजी की वसीयत 3 अप्रेल 1998 को लिखी गई बताई गई है, जब वह अस्‍वस्‍थ थे। ऐसी स्थिति में मुझे सुझाव देने का कष्‍ट करें।

समाधान-

Joint propertyप नगरपालिका द्वारा किए जाने वाले नामान्तरण से भयभीत हैं। वास्तविकता यह है कि नगरपालिका द्वारा किया गया नामान्तरण संपत्ति के स्वामित्व का सबूत नहीं है।  इस संबन्ध में आप सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 24 सितम्बर 2004 को सुमन वर्मा बनाम भारत संघ के मामले में पारित निर्णय से मदद प्राप्त कर सकते हैं। आप ने कहा है कि उक्त संपत्ति नगरपालिका के रिकार्ड में आप के दादा जी के नाम लिखी है। इस से स्पष्ट है कि यह आप के दादा जी की संपत्ति है।  लेकिन संपत्ति किस के द्वारा अर्जित की गई थी यह उस का साक्ष्य नहीं है।  संपत्ति के स्वामित्व का साक्ष्य केवल उस संपत्ति को खरीदने का पंजीकृत विक्रय पत्र हो सकता है। इस कारण संपत्ति के स्वामित्व के सबूत के बतौर आप को संपत्ति के आप के परिवार के जिस पूर्वज के नाम वह हस्तांतरित हुई थी उस के नाम का हस्तांतरण विलेख तलाश करना चाहिए। यदि आप तलाश करेंगे तो उप रजिस्ट्रार के कार्यालय के रिकार्ड में वे मिल सकते हैं और उन की प्रतिलिपियाँ आप को प्राप्त करनी चाहिए। यदि ये दस्तावेज नहीं मिलते हैं तो लंबे समय से किस व्यक्ति का उस संपत्ति पर कब्जा रहा है उसी की साक्ष्य से उस संपत्ति का स्वामित्व तय होगा।  यदि आप एक बार यह तय कर लें कि साक्ष्य के आधार पर यह संपत्ति दादा जी की है तो फिर आप उसी आधार पर उक्त संपत्ति के बँटवारे का वाद सिविल न्यायालय में दाखिल करें। उसी वाद में सिविल न्यायालय से नगर पालिका के विरुद्ध यह अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं कि बँटवारा होने तक नगर पालिका उक्त संपत्ति का नामान्तरकरण दर्ज न करे। यदि उक्त संपत्ति आप के दादाजी द्वारा अर्जित संपत्ति प्रमाणित होती है और उन का देहान्त 17 जून 1956 या उस के बाद हुआ है तो संपत्ति का विभाजन हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार उन के उत्तराधिकारियों में होगा।

वैसे भी नगरपालिका द्वारा आप की आपत्ति के बाद नामान्तरकरण को रोक देना चाहिए। यदि वे नहीं रोकते हैं या फिर आप के द्वारा विभाजन का वाद प्रस्तुत कर स्थगन प्राप्त करने के पूर्व नामान्तरकरण कर दिया जाता है तो उसे दीवानी न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है। 1972 में सादा कागज पर किए गए भागाबंटन (बँटवारे) का कोई महत्व नहीं है। बँटवारा यदि आपस में किया गया हो तो वह पंजीकृत होना आवश्यक है। जहाँ तक सामाजिक संपत्ति का प्रश्न है वह संपत्ति समाज की है। समाज का नेतृत्व उस संपत्ति के बारे में वाद प्रस्तुत कर सकता है अथवा समाज के एक – दो व्यक्ति मिल कर  लोग संपूर्ण समाज के हित में आदेश 1 नियम 10 दीवानी व्यवहार संहिता के अंतर्गत वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। ये वाद प्रस्तुत हो जाने के बाद आप के चाचा जी के धन और राजनैतिक प्रभाव के आधार पर संपत्ति का स्वामित्व तय नहीं हो सकेगा और केवल साक्ष्य के आधार पर संपत्तियों का बँटवारा और स्वामित्व तय होगा।

पैतृक संपत्ति में पृथक हिस्से के लिए बँटवारे का वाद प्रस्तुत करें

समस्या-

बर्दवान, बिहार से युवराज ने पूछा है –

मैं एक पाँच वर्ष के बालक का पिता हूँ। दो वर्ष पहले मुझे मेरे पिताजी के घर से निकाल दिया गया क्योंकि मेरे पिताजी लालची प्रवृत्ति के इंसान हैं। मैं ने लव मैरिज की थी, जिसे बाद में मेरे पिता जी ने मान लिया। उस समय मेरे ससुर जी ने मुझे एक लाख रुपए और कुछ सोना दिया था।  बाद में मेरे पिताजी ने और मांगना आरंभ कर दिया।  मुझसे कहते थे कि अपने ससुर से पैसे मांगो, बोलना बिजनेस करना है।  पर मैं ने शर्म के कारण कभी नहीं मांगा।  फिर एक दिन पिताजी और मेरे बीच झगड़ा हुआ और उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया।  दो वर्ष से मेरी पत्नी और बच्चा पत्नी के मायके में हैं। मैं उसी के पास के शहर में प्राइवेट नौकरी करता हूँ।  भाड़े के मकान में रहता हूँ।  गाँव में हमारा एक घर है जो दादा जी का है, दादाजी अब नहीं रहे। मेरे पिता जी दादा जी की इकलौती संतान हैं। हम तीन भाई हैं और मैं सब से बड़ा हूँ। क्या मैं इस संपत्ति में से कुछ प्राप्त कर सकता हूँ और अगर प्राप्त कर सकता हूँ तो उस के लिए मुझे क्या करना पड़ेगा? इस में कितना समय लगेगा? यदि मेरे पिताजी उक्त संपत्ति में से कुछ को बेचना चाहें तो क्या मैं उन्हें रोक सकता हूँ?

समाधान-

रंपरागत हिन्दू विधि यही है कि यदि किसी पुरुष को अपने पिता, दादा या परदादा से कोई संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त होती है तो वह पैतृक संपत्ति है। इस में पौत्रों व परपौत्रों का भी हिस्सा होता है।  लेकिन 1956 में उत्तराधिकार अधिनियम आ जाने के उपरान्त स्थिति में कुछ परिवर्तन आया।   पुत्रियों और पत्नी को भी पिता का उत्तराधिकारी घोषित कर दिए जाने से ऐसी संपत्ति में पोत्रों के अधिकार पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया।  फिर 2005 में उत्तराधिकार अधिनियम में पुनः संशोधन हो जाने पर स्थिति में फिर से परिवर्तन हुआ।  इस कारण से इस तरह के मामलों में सही विधिक राय के लिए कुछ तथ्यों की जानकारी होना अत्यन्त आवश्यक हैं।  आप के मामले में यह तथ्य आवश्यक थे कि आप के दादा जी का देहान्त कब हुआ?  आप के दादा जी को यह संपत्ति अपने पूर्वजों से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी?  या उन्हों ने इसे स्वयं अर्जित किया था? आप के पिता जी की कोई बहन या बहनें हैं अथवा नहीं हैं?  इन तथ्यों की जानकारी के अभाव में अंतिम रूप से सलाह दिया जाना संभव नहीं है।

प के पिताजी को संपत्ति उन के पिता अर्थात आप के दादा जी से प्राप्त हुई है।  आप के पिता के कोई बहिन नहीं थी वैसी स्थिति में यह संपत्ति एक पैतृक संपत्ति है।  आप के दादा जी के देहान्त के उपरान्त यह संयुक्त हिन्दू परिवार की अविभाजित संपत्ति है।  इस संपत्ति में केवल आप के पिता का ही नहीं अपितु उन की संतानों का भी बराबर का हिस्सा है।

दि आप इस संपत्ति में से अपना हिस्सा अलग करना चाहते हैं तो आप को उक्त संपत्ति के विभाजन के लिए वाद दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा। विभाजन के इस वाद के निर्णय में जो भी समय लगेगा वह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इस संबंध में आप को अनुमानित समय केवल कोई स्थानीय वकील ही ठीक से बता सकता है।

दि आप को यह आशंका है कि आप के पिता उक्त संपत्ति या उस के किसी भाग को विक्रय कर सकते हैं तो आप को तुरन्त ही न्यायालय में संपत्ति के विभाजन  के लिए वाद प्रस्तुत करना चाहिए और साथ में अस्थाई निषेधाज्ञा हेतु एक आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए जिस में यह प्रार्थना करनी चाहिए कि आप के पिता या अन्य सहदायिक संपत्ति को हस्तान्तरित  कर सकते हैं इस कारण से मुकदमे का निर्णय होने तक उक्त संपत्ति के किसी भी प्रकार से हस्तान्तरण पर रोक लगाई जाए। अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर लेने पर विभाजन के पूर्व आप के पिता या अन्य कोई सहदायिक उक्त संपत्ति या उस के किसी भाग को हस्तांतरित नहीं कर पाएगा।

स मामले में आप को तुरन्त अपने जिला मुख्यालय पर दीवानी मामलों के अनुभवी स्थानीय वकील को सभी आवश्यक दस्तावेज या जानकारी उपलब्ध करवा कर सलाह प्राप्त करनी चाहिए।

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