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वकील का चुनाव ठीक से करें।

rp_Desertion-marriage.jpgसमस्या-

रविन्द्र कुमार ने दिल्ली से पूछा है-

मेरे छोटे भाई का विवाह 2012 में हुआ। वो और उसकी पत्नी हमारे साथ 3 महीने रहे फिर भाई की पत्नी को को शक होने लगा की उसके सम्बन्ध भाभी के साथ है, जिस कारण मेने भाई को अलग कर दिया और अख़बार में भी निकलवा दिया कि हमारा उनसे कोई लेने देना नही है। वो तक़रीबन 3 साल अलग किराये पर रहे। दोनों का आपस में कोई विवाद हो गया और 498, 406 आईपीसी  में प्रथम सूचना रिपोर्ट हुई। अभी ये केस कोर्ट में नही लगा है। पर स्त्री धन वापसी का चल रहा है और दोनों केसों में मेरे पूरे परिवार का नाम है। सामान कोर्ट के आदेश पर वापस हो गया है। पर वो कहते हैं कि हमारा सामान लड़के के परिवार के पास है जो कि दिया ही नही गया। उन ने झूठे बिल बना के जाँच अदिकारी को दिए। विवाह में कोई वीडियो फोटो नहीं हुआ। वो और हम दोनों गरीब परिवार हैं। फिर भी तक़रीबन 10 लाख का स्त्री धन लिखा रखा है जो कि दिया ही नहीं गया।  अब मैं क्या करूँ समझ नहीं आता? हमारी अग्रिम जमानत हो चुकी है। क्या मुझे और मेरे परिवार को अरेस्ट किया जा सकता है? अगर हाँ तो मुझे क्या करना चाहिए? जो लिया ही नहीं वापस कैसे करूँ कृपया मार्गदर्शन करें।

समाधान-

ति-पत्नी में विवाद हो जाने पर 498 ए व 406 आईपीसी की शिकायत दर्ज कराना आम बात हो गयी है। ऐसी शिकायतों में कई बार केवल 10 प्रतिशत सचाई होती है। लेकिन शिकायत की है और प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होगी तो उस का अन्वेषण पुलिस को करना पड़ेगा। पुलिस अन्वेषण के दौरान जान जाती है कि कितनी सचाई है और कितनी नहीं। आम तौर पर केवल पति के विरुद्ध ऐसा मुकदमा प्रमाणित दिखाई देता है और आरोप पत्र भी उसी के विरुद्ध प्रस्तुत होता है। आप को अभी चाहिए कि आप पुलिस अन्वेषण में पूरा सहयोग करें और पुलिस को आरोप पत्र प्रस्तुत करने दें। पुलिस भी नहीं चाहती कि जिस मुकदमे में वह आरोप पत्र प्रस्तुत करे उस में अभियुक्त बरी हो जाए।

आप ने खुद लिखा है कि आप की अग्रिम जमानत हो चुकी है। इस का अर्थ है कि पुलिस आप को गिरफ्तार नहीं करेगी। बस जिस दिन आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत करेगी उस की सूचना आप को देगी और आप को न्यायालय में उपस्थित हो कर जमानत करानी पड़ेगी। उस के बाद मुकदमा चलता रहेगा।

झूठे आरोपों को साबित करना आसान नहीं होता। यदि आरोप झूठे हैं तो पुलिस ही आरोप पत्र सब के विरुद्ध प्रस्तुत नहीं करेगी। यदि पुलिस ने आरोप पत्र प्रस्तुत कर भी दिया तो तो भी अभियोजन पक्ष मुकदमे को साबित नहीं कर पाएगा तो सभी लोग बरी हो सकते हैं।

आप की जरूरत सिर्फ इतनी है कि आप कोई वकील ऐसा करें जो आप के मुकदमे की पैरवी मेहनत से करे, मुकदमे पर पूरा ध्यान दे। यदि वकील ठीक हुआ तो यह झूठा मुकदमा समाप्त हो जाएगा। इस लिए आप वकील का चुनाव करने में पूरा ध्यान दें। जब भी आप को लगे कि आप का वकील लापरवाही कर रहा है या मेहनत नहीं कर रहा है तो वकील बदल लें।

परिवाद की जाँच में सबूत व गवाह प्रस्तुत कर उसे बन्द कराएँ।

father daughterसमस्या-
बबलू ने कोटा, राजस्थान से पूछा है-

मेरा विवाह 2009 में हुआ। 2011 में बेटी का जन्म हुआ। पत्नी को अक्सर सफेद पानी की की शिकायत रहा करती थी। समय समय पर टाइम उपचार करवाया। 12 जनवरी 2013 को पत्नी को समस्या होने पर मैं ने कोटा के जे.के. लोन हॉस्पिटल मे एडमिट करवाया। यहाँ पर 5 यूनिट रक्त चढाया गया। 22 जनवरी 13 को माइनर ऑपरेशन हुआ। जिस में बच्चेदानी के यहाँ से सैंपल लिया और जाँच को भेजा। 24 जनवरी 13 को मैं वाइफ को लेकर अपने रूम पर आ गया। इसी दिन मेरा साला, ससुर, साले की पत्नी और 2 अन्य व्यक्ति आए और मेरी अनुपस्थिति में मेरी पत्नी और बेटी को अपने साथ ले कर चले गये। मेरा ससुराल मेरे घर से करीब 70 कि.मि. दूर है। 30 जनवरी 3 को जाँच रिपोर्ट मिली।  जिस में वाइफ को गर्भाशय  में कैंसर की पुष्टि हुई।  सेनसेर की पुस्ती हुई। बहुत प्रारंभिक स्टेज थी। डाक्टर का कहना था की कीमोथेरेपी से ठीक हो सकती है। क्यों की मामला प्रारंभिक स्तर का है।  मैं ने ससुराल वालों को सूचना दी लेकिन वो लोग मेरी बात को अनसुना करने लगे। और गाँव में ही देसी उपचार करवाने लगे। 4 फरवरी 13 को ज़्यादा तबीयत बिगड़ने पर मेरा साला और अन्य लोग मेरी पत्नी को लेकर कोटा आए। मैं ने मेरे भाई को सूचित किया मेरा भाई उन को लेकर उस डाक्टर के घर पहुचा जिस का उपचार चल रहा था और जिन्होने ओपरेशन किया था। डाक्टर ने हालत देख कर उसे जेकेलोन हॉस्पिटल रेफर कर दिया। लेकिन मेरा साला और साथ वाले लोग मेरे भाई को चकमा दे कर जीप से मेरी पत्नी को पता नहीं कहाँ  लेकर चले गये। मैं रात भर तलाश करता रहा पर पता नहीं चला। 5 फरवरी 13 को नज़दीकी पुलिस स्टेशन में परिवाद दिया। लेकिन पुलिस ने परिवाद दर्ज नहीं किया। परिवाद में था कि मेरी भाभी जी को उसका भाई और अन्य जाने कहाँ ले गये हैं। भाभी की तबीयत काफ़ी खराब है। लेकिन पुलिस ने परिवाद अपने पास रखा लिया। उधर. 5 फरवरी 1 को मेरी पत्नी की बच्चेदानी कोटा के एक निजी हॉस्पिटल में निकलवा दी गयी। मुझे पता चला और मैं ने 18 फरवरी 13 को पुलिस को फिर परिवाद दिया। यह परिवाद दर्ज किया, लेकिन कार्रवाई कुछ नहीं हुई।  मेरे भाई के पुलिस में बयान भी हुए। 24 जनवरी 13 को जब मेरी पत्नी को घर से ले गये थे उस दौरान साथ में पत्नी 50 हजार रुपए नकद स्त्री-धन भी ले गये थे। बाद में मेरे ससुर ने मेरे और मेरे परिवार के खिलाफ 498ए, 323, 406 भा.दं.सं. में इस्तगासे के ज़रिए मामला दर्ज करवाया। जिस में जो जो आरोप लगाए गये थे, उन सभी का स्पष्टीकरण सबूतों के साथ मैं पुलिस को दे आया। हम मामले की निष्पक्ष जाँच की मांग करते र्हैं लेकिन मामले में जाँच बंद कमरे में हुई। मेरे वकील ने धारा 9. हिन्दू विवाह अधिनियम तथा धारा 97 दंड प्रक्रिया संहिता की कार्रवाई भी की। लेकिन मेरी मुलाकात मेरी पत्नी से नहीं हो सकी। 7 अग्त 2213 को मेरा साला मेरी बेटी को मेरे माता पिता के पास भीलवाड़ा छोड़ आया। एक समझौता पत्र भी लिखा गया। उस पर साले, साले की पत्नी, सरपंच और अन्य गवाहों के हस्ताक्षर हैं। ये समझौता पत्र भी मैं पुलिस को दे आया। फिर भी उस मुकदमे को बन्द नहीं किया है। 20 सितम्बर 2013 को मेरी पत्नी की मृत्यु हो गयी। मुझे मेरे ससुराल वालों ने सूचना तक नहीं दी। और बिना पोस्टमार्टम करवाए ही अंतिम संस्कार करवा दिया। मैं ने यह बात पुलिस को बताई और मामले में निष्पक्ष जाँच की माँग की। लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। मुझे शुरू से ही ब्लेक मेल करने की कोशिश मेरा साला करता रहा। मेरा ससुर जो कि फोरेस्ट डिपार्टमेंट में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी था वो अपनी संपत्ति में से मेरी बेटी को हिस्सा देना चाहता था। मेरी पत्नी के एक बहिन और भी थी जिसे भी मेरे साले और उस की पत्नी द्वारा डरा धमका कर तंग किया जाता था। 2007 में उस ने ससुराल मे आत्मदाह कर लिया था। उस के भी एक बेटी है। साला और साले की पत्नी किसी भी सूरत में यह नहीं चाहते कि ससुर की सम्पत्ति में नातियों को भी हिस्सा मिले।  31 दिसम्बर 2013 को मेरे ससुर की भी संदिग्ध मृत्यु हो गयी। एस दफ़ा भी मुझे और मेरे परिवार को कोई सूचना नहीं दी गई। बगैर पोस्ट मार्टम के अंतिम संस्कार कर दिया गया। जब मैं ने जानकारी जुटाई तो  पता चला कि बहू और बेटे ने पोइजन देकर मार डाला। 31 को सुबह 9 बजे से पहले अंतिम संस्कार भी जल्दी में कर दिया। .बहन बेटियों और समाज के लोगों को भी अंतिम दर्शन नहीं करवाए। आप बताएँ मैं क्या करूँ। मेरी 2 साल की बेटी अभी मेरे पास है। मैं ऑटो ड्राइवर द्र हूँ। जैसे तैसे बेटी की परवरिश कर रहा हूँ। लेकिन पुलिस अभी तक भी मामले को बन्द नहीं कर रही है। 1 मई 2013 को मेरे खिलाफ 498ए, 323. 406 आईपीसी के मामले में शिकायत मेरे ससुर ने दी थी। अभी तक जाँच चल रही है। मेरी पत्नी के कहीं कोई बयान नहीं हैं। मैं और मेरा परिवार काफ़ी परेशन है। हमारे परिवार का सम्मान समाज में धूमिल किया गया है जब कि हम पर जो आरोप लगाए वो सभी झूठे थे। जिस के हमने सबूत भी पुलिस को दिए हैं। अब मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के द्वारा प्रस्तुत तथ्यों से प्रतीत होता है कि आप के व आप के ससुराल वालों के बीच आप की पत्नी की चिकित्सा के तरीके के संबंध में मतभेद थे, जिन्हें हल करने में संवेदनशीलता का अभाव रहा। जिस के कारण विवाद बढ़ा और दोनों पक्षों के बीच यह स्थिति उत्पन्न हुई कि आप की पत्नी के पिता उसे जबरन अपने तरीके से इलाज कराने के लिए ले गए। आप ने जब उन का पीछा किया तो उन्हों ने पुलिस को परिवाद दर्ज करवा दिया। इसी बीच आप की पत्नी की मृत्यु हो गई। बाद में पत्नी के पिता की मृत्यु भी हो गई। तब आप की बेटी को आप के पास भेज दिया गया। अब केवल पुलिस के पास परिवाद मौजूद है जिस में अभी तक कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई है।

प के मामले में 498-ए के लिए अब कोई साक्षी मौजूद नहीं है। सब से मजबूत साक्षी आप की पत्नी हो सकती थी वह अब इस दुनिया में नहीं है और 161 के बयानों के लिए उपलब्ध नहीं है। अन्य कोई प्रत्यक्षदर्शी साक्षी नहीं है। दूसरी और आप के पास अपनी पत्नी की चिकित्सा कराने के सारे सबूत और साक्षी उपलब्ध हैं। वैसी स्थिति में धारा 498-ए के लिए प्रारंभिक सबूत भी उपलब्ध नहीं हैं। धारा-406 का कोई प्रश्न ही अब नहीं रहा है। पत्नी की मृत्यु के उपरान्त स्त्री-धन के स्वामी उस का पति और संतानें हैं। इस तरह आज आप स्वयं और आप की पुत्री स्वामी हैं। पुत्री आप के पास आप के संरक्षण में है और आप उस के प्राकृतिक संरक्षक हैं। धारा 323 में भी आप की पत्नी के जीवित नहीं रहने के कारण कोई साक्षी नहीं है। वैसी स्थिति में जाँच कर्ता पुलिस अधिकारी को रिपोर्ट आप के पक्ष में दे देनी चाहिए।

प को चाहिए कि आप पुलिस का जो अधिकारी परिवाद की जाँच कर रहा है उस से मिलें और उसे सारे तथ्य बताएँ और जरूरत पड़ने पर आवश्यक गवाहों के बयान भी करवा दें। जिस से मामला बन्द हो सके। आप अपनी बेटी की परवाह करें, उस का पालन पोषण करें। यदि आवश्यक हो और सही जीवनसाथी मिल जाए तो आप दूसरा विवाह कर लें। एक लम्बा जीवन बिना जीवन साथी के बिना जीना बहुत कठिन है वह भी तब जब छोटी बच्ची साथ में हो और आप को रोजगार के लिए भी बाहर रहना हो।

शुल्क देने पर भी पत्रिका न भेजने पर उपभोक्ता अदालत में कार्यवाही करें और पुलिस में धारा 420 आईपीसी की रिपोर्ट दर्ज कराएँ

 प्रिया शर्मा ने पूछा है-

मैं इस समय बहुत ही बड़ी समस्या से गुजर रही हूँ। मैं ने पिछले साल दिसम्बर में एक मैगजीन के लिए फॉर्म भर कर भेजा था। उस का एक साल का मूल्य 450 रुपए था जिसका मैं ने बैंक ड्राफ्ट बनवा कर कम्पनी को भेज दिया था। उसी महीने उनके पास 450 रुपए का बैंक ड्राफ्ट पहुच गया था जिसकी जानकारी मैं ने फोन से पता कर ली थी और उन्होंने मुझ से बोला था कि जनवरी से हम हर महीने आपको 5 तारीख तक मैगजीन भेज दिया करेंगे। लेकिन इतने महीने के बाद भी ना तो उन्होंने मुझे कोई मैगजीन भेजी और न ही कोई पत्र भेज कर जानकारी दी। मैं उन्हें फोन कर कर के थक गई हुँ।  वे हर बार यही बोलते हैं कि २ या ३ दिन में आपके पास मैगजीन पहुँच जाएगी। पहले तो उन्होंने ये बोला कि अभी प्रिंटिंग प्रोब्लम चल रही है हम आपको अप्रेल तक मैगजीन भेज देंगे, लेकिन उन्होंने कोई मैगजीन नहीं भेजी और न ही वो पैसे वापिस कर रहे हैं। अब आप ही बताये मैं क्या कर सकती हूँ?

 उत्तर – 
प्रिया जी,
प ने एक प्रकाशक या बुक सेलर से एक मैगजीन को वर्ष भर तक खरीदने के लिए अपना शुल्क भेज दिया है। लेकिन वे आप को मैगजीन के अंक नहीं भेज रहे हैं। इस तरह वे सेवा में दोष कर रहे हैं। यदि उन्हों ने अभी तक मैगजीन प्रकाशित ही नहीं की है तो फिर यह सीधे-सीधे धारा 420 आईपीसी में छल का अपराध है। सेवा में दोष के लिए यदि आप के पास उन का ई-मेल पता है तो आप को ई-मेल से उन्हें एक पत्र भेज देना चाहिए। जिस में आप उन्हें लिखें कि उन्हों ने आप के साथ छल कर के रुपया ऐंठा है, और आप उन के विरुद्ध उपभोक्ता अदालत में मुकदमा करेंगी, साथ ही पुलिस में धारा 420 आईपीसी में उन के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कराएंगी। यदि कंपनी का ई-मेल पता आप को उपलब्ध न हो तो आप यही पत्र रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से प्रेषित कर दें। 

हो सकता है इस पत्र के मिलने के उपरांत कंपनी आप को मैगजीन भेजना आरंभ कर दे। यदि एक माह तक कोई उत्तर कंपनी की ओर से नहीं आता है तो  आप को तुरंत अपने निवास स्थान के नजदीक के पुलिस स्टेशन पर जा कर रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए कि आप के साथ इस तरह बेईमानी पूर्वक संपत्ति प्राप्त कर के छल किया गया है जो कि धारा 420 आईपीसी में अपराध है। पुलिस को इस रिपोर्ट पर कार्यवाही करनी चाहिए। यदि पुलिस यह कार्यवाही नहीं करती है तो आप सीधे न्यायालय में भी अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकती हैं। अदालत आप के बयान दर्ज कर के सीधे प्रकाशक को सम्मन भेजेगी। इस पर कंपनी आप का रुपया वापस लौटा कर समझौता करना चाहे तो आप अपनी राशि के साथ आप को हुआ हर्जाना भी मांगिए। आप चाहें तो उपभोक्ता  अदालत में सेवा में कमी के लिए शिकायत प्रस्तुत कर सकती हैं। उपभोक्ता अदालत आप को अपना रुपया, अदालत की कार्यवाही का खर्च तथा हर्जाना दिला सकता है।

अपराधिक मानव वध कब हत्या नहीं है? (2)

अपराधिक मानव वध कब हत्या नहीं है?
अपवाद-2
कोई व्यक्ति शरीर, या संपत्ति की व्यक्तिगत प्रतिरक्षा के अधिकार का सद्भावनापूर्ण प्रयोग करते हुए कानून द्वारा उसे दी गई शक्ति का अतिक्रमण कर दे और बिना पूर्व चिंतन के और प्रतिरक्षा के लिए आवश्यक हानि से अधिक अपहानि करने के इरादे के बिना उस व्यक्ति की मृत्यु कारित कर दे जिस के विरुद्ध वह प्रतिरक्षा का अधिकार प्रयोग में ला रहा था, तो अपराधिक मानव वध हत्या नहीं है। 
 
उदाहरण के रूप में लंबूजी ने छोटूजी को चाबुक मारने की कोशिश की लेकिन इस तरह नहीं कि छोटूजी को कोई गंभीर हानि या चोट पहुँचती। अपने बचाव में छोटूजी ने पिस्तोल निकाल ली, लेकिन उस से न डरते हुए लंबूजी ने चाबुक को न रोक कर हमला जारी रखा। छोटूजी को लगा कि अब पिस्तौल चलाए बिना वे चाबुक की मार से नहीं बच सकते पिस्तोल चला दी। गोली ऐसे घातक अंग पर लगी कि लंबूजी का काम तमाम  हो गया।  यहाँ छोटू जी लंबू जी की हत्या के लिए दोषी नहीं हैं, बल्कि अपराधिक मानव वध के दोषी हैं।
 
 अपवाद-3
कोई व्यक्ति लोक सेवक होते हुए या किसी लोक सेवक की मदद करते हुए लोक न्याय को अग्रसर करने के लिए कार्य करते हुए कानून द्वारा दी गई शक्तियों से आगे बढ़ कर कोई ऐसा कार्य करता है जिसे वह कानूनी और लोकसेवक के नाते कर्तव्य के उचित निर्वहन के लिए सद्भावनापूर्वक आवश्यक होने का विश्वास रखते हुए मृतक के विरुद्ध कोई वैमनस्यता रखे बिना के किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु कारित कर देता है। तो यह हत्या नहीं है, अपितु अपराधिक मानव वध है। इस अपवाद में यह स्पष्ट किया गया है कि ऐसे मामले में यह बात तथ्यहीन है कि किस व्यक्ति ने आवेश दिलाया था या पहला हमला किया था।

 अपवाद-4
अचानक झगड़े से उपजे क्रोध की तीव्रता में हुई अचानक लड़ाई में पूर्व चिन्तन के बिना, झगड़े का कोई अनुचित लाभ उठाने की मंशा के बिना या क्रूरतापूर्ण या असामान्य तरीके का प्रयोग किए बिना कारित की गई मृत्यु हत्या नहीं है, लेकिन अपराधिक मानव वध है।

 अपवाद-5
यदि जिस की मृत्यु हुई है वह अठारह वर्ष से अधिक उम्र का हो कर भी अपनी सम्मति से मृत्यु होना सहन करता है या मृत्यु की जोखिम उठाता है उस जोखिम में उस का अपराधिक मानव वध हत्या नहीं है।                

उदाहरण के रूप में लंबूजी ने अठारह वर्ष से कम आयु के छोटू जी को उकसाया कि वह स्वैच्छापूर्वक आत्महत्या कर ले। यहाँ छोटूजी अठारह वर्ष से कम उम्र के होने के कारण अपनी मृत्यु सहन करने या जोखिम उठाने की सम्मति देने में असमर्थ थे। इस कारण से लंबू जी ने हत्या का दुष्प्रेरण किया है। 

इच्छित व्यक्ति के स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति की हत्या या अपराधिक मानव वध 
 
भा.दं.संहिता की धारा 301 में स्पष्ट किया गया है कि……
यदि कोई व्यक्ति कोई ऐसा कार्य कर के जिस से उस का इरादा किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करना हो या ऐसा करने से किसी की मृत्यु संभाव्य हो किसी ऐसे व्यक्ति की मृत्यु कारित कर देता है जिस की मृत्यु कारित करना उस का उद्देश्य नहीं था। यद्यपि यहाँ उस का इरादा उस व्यक्ति की मृत्यु कारित करना नहीं था जिस की उस ने मृत्यु कर दी है। उस व्यक्ति द्वारा कारित की गई मृत्यु उसी तरह अपराधिक मानव वध या हत्या है जिस तरह उस व्यक्ति द्वारा इच्छित व्यक्ति की मृत्यु कारित करना होती। 

धारा 302 से धारा 306 में विभिन्न श्रेणियों के अपराधिक मानव वध के लिए दंडों की व्यवस्था की गई है, जिस की चर्चा हम आगे करेंगे।

अपराधिक मानव वध कब हत्या नहीं है?

पिछले आलेख अपराधिक मानव वध कब हत्या है? में मानव वध को कब हत्या कहा जा सकता है? इसे स्पष्ट किया गया था। लेकिन इस परिभाषा के कुछ अपवाद भी हैं।

अपराधिक मानव वध कब हत्या नहीं है?
अपवाद-1 

यदि गंभीर और अचानक ऐसी उत्तेजना उत्पन्न किए जाने पर कि व्यक्ति आत्मसंयम की शक्ति खो दे और वह उत्तेजना देने वाले व्यक्ति अथवा किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु भूल या दुर्घटनावश कारित कर दे तो ऐसा मानववध हत्या नहीं कहा जाएगा। लेकिन इस अपवाद के कुछ बंधन भी हैं……

  1. कि ऐसी उत्तेजना किसी व्यक्ति की मृत्यु कारित करने या उसे क्षति पहुँचाने के उद्देश्य से दिखावटी या अपने बचाव की दृष्टि से स्वनिर्मित न हो। 
  2. कि ऐसी उत्तेजना किसी ऐसी बात द्वारा उत्पन्न  नहीं हो जो कि किसी लोकसेवक द्वारा लोकसेवक की शक्तियों के विधिपूर्ण  प्रयोग में की गई हो।
  3. कि ऐसी उत्तेजना ऐसी उत्तेजना किसी ऐसी बात द्वारा उत्पन्न नहीं हुआ हो जो व्यक्ति के अपने स्वरक्षा के के अधिकार के विधिपूर्ण प्रयोग में की गई हो

यहाँ यह भी स्पष्ट किया गया है कि, उत्तेजना गंभीर और अचानक थी या नहीं कि अपराध को हत्या की श्रेणी में जाने से बचा दे एक तथ्य का प्रश्न है जो परिस्थितियों और साक्ष्य के आधार पर ही सुनिश्चित किया जा सकता है।

 इस अपवाद को इन उदाहरणों से समझा जा सकता है….

  1.  संता द्वारा उत्तेजित किए जाने के कारण बंता इरादतन बंता के पुत्र का वध कर देता है। यह हत्या कही जाएगी क्यों कि बंता को संता के पुत्र ने उत्तेजित नहीं किया था और संता के पुत्र की मृत्यु उत्तेजना में दुर्घटना या गलती से नहीं हुई थी।
  2. बंता को संता ने अचानक इस तरह उत्तेजित कर दिया कि बंता ने संता पर अपनी पिस्तौल तानी और चला दी। गोली संता को नहीं लगी। लेकिन गोली नजदीक ही पंता को लग गई जो बंता को दिखाई नहीं दे रहा था। बंता को पंता को मारने का कोई इरादा नहीं था और यह संभावित भी नहीं था कि पंता उस की गोली से मर जाता। यहाँ बंता ने पंता की ‘हत्या’ नहीं की है, किन्तु ‘अपराधिक मानव वध किया है’।
  3. बंता सिपाही ने अपने मित्र संता को घर से बाहर बुलाया और अचानक उसे गिरफ्तार कर लिया।  इस से संता को  अचानक तीव्र आवेश आ गया और उस ने अचानक बंता का वध कर दिया। यह हत्या कहलाएगी। क्यों कि आवेश ऐसी बात पर आया था जो बंता ने लोकसेवक के नाते लोकसेवक का कर्तव्य करते हुए की थी। 
  4. बंता एक मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित हो कर एक साक्षी के रूप में बयान करता है कि वह संता की किसी बात पर विश्वास नहीं करता। उसे संता के बयान पर कतई विश्वास नहीं है और संता ने शपथ ले कर भी अदालत के सामने झूठ बोल कर शपथ को भंग किया है। संता को अचानक बंता के इस बयान पर आवेश आ गया और उस ने बंता का वध कर दिया। यह हत्या है। 
  5. बंता यकायक संता की नाक पकड़ने का प्रयास करता है। संता उस से बचने के लिए बंता को पकड़ लेता है, जिस से बंता को आवेश आता है और वह संता का वध कर देता है। यह हत्या है क्यों कि उत्तेजना ऐसी बात से हुई है जो प्राइवेट प्रतिरक्षा में की गई थी।
  6. बंता ने संता पर आघात किया संता को इस से क्रोध आ गया। पास में ही खडे उगन्ता ने संता के गुस्से का लाभ उठाने के लिए संता को उसी समय कटार पकड़ा दी और संता ने गुस्से में बंता की हत्या कर दी। यहाँ हो सकता है कि संता अपराधिक मानव वध का

अपराधिक मानव वध कब हत्या है?

पिछले आलेख में हम ने भा.दं.संहिता की धारा 299 में परिभाषित ‘अपराधिक मानव वध’ पर बात की थी।  धारा 300 में कुछ अपवादों को छोड़ कर हत्या को परिभाषित किया गया है। इन अपवादों पर हम बाद में बात करेंगे। 
1.  वह कार्य जिस के द्वारा मृत्यु कारित की गई है, मृत्यु कारित करने के इरादे से किया गया हो तो वह हत्या है, अथवा
2. कोई कार्य किसी व्यक्ति को ऐसी शारीरिक क्षति पहुँचाने के इरादे से किया गया हो जिस के लिए अपराधी जानता हो कि इस से उस व्यक्ति की मृत्यु कारित करना संभाव्य है, जिस को ऐसी क्षति पहुँचाई गई है और उस की मृत्यु हो गई हो, अथवा
3. कोई कार्य जो ऐसी शारीरिक क्षति पहुँचाई जाने के इरादे से किया गया हो जो प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त हो, और जिस से मृत्यु हो गई हो, अथवा
4. कार्य करने वाला व्यक्ति यह जानता हो कि वह कार्य इतना खतरनाक है कि पूरी संभावना है कि वह मृत्यु कारित कर देगा या ऐसी शारीरिक क्षति कारित कर देगा जिस से मृत्यु होना संभाव्य है और वह बिना किसी पर्याप्त कारण के मृत्यु कारित करने या उपरोक्त प्रकार की क्षति पहुँचाने का खतरा उठाते हुए ऐसा कार्य करे।
आम पाठकों को उक्त भाषा कुछ जटिल प्रतीत हो सकती है। लेकिन फिर भी इसे दोहराकर पढ़ेंगे तो समझ आ जाएगा। फिर भी हम कुछ उदाहरणों की मदद ले सकते हैं। जैसे …..
1. यदि संता यदि बंता को मार डालने के लिए उस पर गोली चलाता है और परिणाम स्वरूप बंता मर जाता है तो संता हत्या करता है।
2. संता यह जानते हुए कि बंता ऐसे रोग से ग्रस्त है कि संभावित है कि एक प्रहार ही उस की मृत्यु कारित कर दे, शारीरिक क्षति कारित करने के इरादे से बंता पर प्रहार करता है और परिणाम स्वरुप बंता मर जाता है। यहाँ संता हत्या का अपराध करता है। हालांकि वह प्रहार किसी स्वस्थ व्यक्ति की मृत्यु कारित करने के लिए प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में पर्याप्त नहीं होता।  हाँ, यदि संता को यह पता नहीं होता कि बंता बीमार है और एक प्रहार भी उस के जीवन के लिए घातक हो सकता है तो वह हत्या का दोषी नहीं होता। 
3. संता इरादा कर के बंता पर तलवार या लाठी से ऐसा घाव पहुँचाता है जो प्रकृति के मामूली क्रम में किसी भी मनुष्य की मृत्यु कारित करने के लिए पर्याप्त है परिणाम स्वरूप बंता की मृत्यु हो जाती है। तो यहाँ संता बंता की हत्या का दोषी है, हालाँकि उस का इरादा बंता की हत्या करने का नहीं था।
4. संता बिना किसी कारण के मनुष्यों के एक समूह पर भरी हुई तोप चलाता है और उन में से एक की मृत्यु हो जाती है। संता यहाँ हत्या का दोषी है, हालांकि किसी व्यक्ति विशेष की हत्या करने का उस का कोई इरादा या पूर्व चिंतित परिकल्पना नहीं थी।
उक्त कार्यों के होते हुए भी कुछ अपवाद हैं जिन में अपराधिक मानव वध को हत्या नहीं माना जा सकता है। वे अपवाद कौन से हैं? इस पर आगे बात करेंगे? (जारी)

अपराधिक मानव-वध क्या है?

भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 से कौन परिचित नहीं है। इस धारा में किसी भी मनुष्य की हत्या के लिए मृत्यु या आजीवन कारावास तथा जुर्माने के दंड से दंडित करने का प्रावधान है। लेकिन कभी इस से कम दंड भी दिया जाता है और तब यह कहा जाता है कि जो हत्या हुई थी वह सदोष मानव वध नहीं था इस कारण से उसे हत्या के लिए निश्चित दंड नहीं दिया जा सकता। इस के लिए धारा 304  जिस में हत्या की कोटि में न आने वाले मानव वध के लिए दंड का प्रावधान है, का उल्लेख करते हुए दंड दिया जाता है।  भाई, सागर नाहर ने मुझ से प्रश्न किया है कि यह हत्या की कोटि में न आने वाला मानव वध क्या है?

आईपीसी की धारा 299 में अपराधिक मानव वध को परिभाषित किया गया है। यदि कोई भी व्यक्ति किसी की मृत्यु कारित करने के इरादे से, या किसी के शरीर को ऐसी चोटें पहुँचाने के इरादे से जिन से मृत्यु कारित होना संभाव्य हो, या यह ज्ञान रखते हुए कि उस के कार्य से मृत्यु कारित होना संभाव्य है उस कार्य को करते हुए मृत्यु कारित कर दे, तो यह कहा गया है कि ऐसा व्यक्ति ‘अपराधिक मानव वध’ का अपराध करता है।  

हम इस बात को इस तरह भी समझ सकते हैं कि एक व्यक्ति किसी गड्ढ़े पर लकड़ियाँ और घास इस आशय से बिझाता है कि इस के द्वारा मृत्यु हो सकती है, और संभाव्य है कि इस यत्न से किसी की मृत्यु हो जाए। कोई दूसरा व्यक्ति यह समझते हुए कि वहाँ सख्त जमीन है, उस पर चलता है और गड्डे में गिर कर मारा जाता है तब यह माना जाएगा कि पहले व्यक्ति ने दूसरे का अपराधिक मानव वध किया है।

इसी तरह एक व्यक्ति यह जानता है कि एक दूसरा व्यक्ति एक झाड़ी के पीछे है, लेकिन तीसरा व्यक्ति यह नहीं जानता कि झाड़ी के पीछे कोई व्यक्ति है । पहला व्यक्ति तीसरे व्यक्ति इस इरादे से कि इस से दूसरे व्यक्ति की मृत्यु कारित होना संभाव्य है तीसरे व्यक्ति को झाड़ी पर गोली चलाने के लिए प्रेरित करता है और गोली चलाने दूसरे व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। यहाँ यह हो सकता है कि तीसरा व्यक्ति किसी भी अपराध का दोषी न हो लेकिन दूसरा व्यक्ति अपराधिक मानववध का दोषी है।
एक व्यक्ति किसी झाड़ी के पीछे दिखाई दे रहे एक मुर्गे को मार डालने  और  फिर उसे चुरा कर ले जाने के उद्देश्य से गोली चलाता है लेकिन गोली एक न दिखाई देने वाले दूसरे व्यक्ति को लग जाती है और वह मर जाता है। हालांकि यहाँ पहला व्यक्ति गैर कानूनी काम कर रहा था फिर भी वह अपराधिक मानव वध का दोषी नहीं कहा जा सकता क्यों कि पहले व्यक्ति का इरादा किसी मनुष्य की हत्या करने का नहीं था। 
धारा 299 में कुछ स्पष्टीकरण भी सम्मिलित किए गए हैं-
1. कोई व्यक्ति किसी विकाररोग या अंगशैथिल्य से ग्रस्त दूसरे व्यक्ति को शारीरिक क्षति कारित करता है और इस से दूसरे व्यक्ति  की मृत्यु हो जाती है तो यह समझा जाएगा कि पहले व्यक्ति ने दूसरे की मृत्यु कारित की है।
2. जहाँ किसी व्यक्ति की शारीरिक क्षति पहुँचाए जाने के कारण मृत्यु हो जाती है, और यह कि यदि मारे जाने वाले व्यक्ति को उचित चिकित्सा सहायता मिलने पर उसे बचाया जा सकता था, तो भी यह माना जाएगा कि उस व्यक्ति की मृत्यु कारित की गई है।
3. माँ के गर्भ में स्थित किसी शिशु की मृत्यु करना मानव वध नहीं है लेकिन किसी जीवित शिशु की मृत्यु कारित करना अपराधिक मानववध की क
ोटि में आता है यदि उस शिशु के शरीर का कोई भाग बाहर निकल आया हो, हालांकि उस ने श्वास भी न लिया हो और पूरे तौर पर उस का जन्म नहीं हुआ हो। 
आईपीसी की धारा-300 में हत्या को परिभाषित किया गया है। इस पर आगे बात करेंगे। (जारी)
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