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शासकीय अधिकारी अपनी सुविधा के अनुसार व्याख्या करते हैं

lawसमस्या-

प्रवीण ने रतलाम, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं रतलाम (मध्य प्रदेश) में सहायक लोक अभियाजक के पद पर पदस्थ हूँ। मध्य प्रदेश सरकार ने अपने आदेश दिनांक 11/12/2013 के द्वारा मेरी सेवा समाप्त कर दी थी। सम्बन्धित विवाद माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर में दिनांक 22/12/2013 से लंबित है, माननीय न्यायालय ने सरकार के आदेश दिनांक 11/12/2013 को स्थगित कर रखा है

मेरी समस्या यह है कि मैं पारिवारिक समस्याओं के कारण अपना स्थानान्तरण करवाना चाहता हूँ, लेकिन सरकार का इस सम्बन्ध में मत है कि न्यायालय में प्रकरण लंबित होने के कारण मेरा स्थानान्तरण नहीं हो सकता। क्या सरकार का यह मत उचित है जब कि माननीय न्यायालय ने सरकार के आदेश दिनांक 11/12/2013 को इसलिए स्थगित किया है ताकि मैं सेवा में बना रह सकूँ, उक्त आदेश को स्थगित करने के अलावा कोई अन्य आदेश माननीय उच्च न्यायालय ने नहीं दिया है।

समाधान-

प स्वयं लोक अभियोजक हैं और कानून के व्यवसायी हैं। आप स्वयं समझते हैं कि उच्च न्यायालय के आदेश की आप की व्याख्या सही है। सरकार की व्याख्या सही नहीं है। आप शासकीय सेवा में हैं तो यह भी जानते होंगे कि सरकारी विभागों में उच्च न्यायालयों के आदेशों की व्याख्या करने में दो फैक्टर काम करते हैं। एक तो यह कि कहीं उच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन न हो जाए और उन्हें किसी तरह के कंटेम्प्ट की कार्यवाही का सामना न करना पड़े, दूसरा यह कि उन्हें खुद किस बात में सुविधा है? इसी कारण शासन ने उच्च न्यायालय के आदेश का ऐसी संकीर्ण व्याख्या प्रस्तुत की है। आप ने उस आदेश को यहाँ प्रस्तुत नहीं किया है जिस से हम उस आदेश की अपनी व्याख्या कर सकें। बिना आदेश की भाषा उपलब्ध हुए बिना उस की व्याख्या किया जाना संभव नहीं है।

प इस सम्बन्ध में अपने विभाग के उच्च अधिकारियों को प्रतिवेदन भेज कर स्पष्ट कर सकते हैं कि उक्त आदेश के कारण आप का स्थानान्तरण करने में किसी तरह की कोई समस्या नहीं है। इस मामले में कंटेम्प्ट की कार्यवाही भी सिर्फ आप की ओर से की जा सकती है। आप उन्हें एक अंडरटेंकिंग देते हुए आश्वस्त कर सकते हैं कि यदि आप का स्थानान्तरण किया जाता है तो आप किसी भी तरह की कंटेम्प्ट की कार्यवाही नहीं करेंगे।

आप ने अपनी सेवा मुक्ति को चुनौती देने के लिए रिट याचिका प्रस्तुत की है जिस में यह आदेश पारित हुआ है। इस याचिका में आप ने अपने वकील को नियुक्त किया है जो इस मामले को देख रहे हैं। इस परेशानी का हल निकालने के लिए आप उन से भी राय करें कि आप का स्थानान्तरण किए जाने के लिए क्या किया जा सकता है।

प की सेवा मुक्ति जिस किसी भी कारण से हुई हो। कारण होने के साथ साथ विभाग में किसी न किसी अधिकारी की रुचि भी इस में रही होगी कि आप के विरुद्ध तुरन्त कार्यवाही की जाए। ऐसे व्यक्ति अभी भी शासकीय सेवा में आप के विभाग में होंगे। अभी शासन ने यह व्याख्या की है कि आप का स्थानान्तरण नहीं हो सकता है। लेकिन एक बार यह व्याख्या हो जाने पर कि आप का स्थानान्तरण हो सकता है। ऐसे लोग अपनी कारस्तानी कर सकते हैं और आप का स्थानान्तरण ऐसे स्थान पर भी कर सकते हैं जहाँ आप को रतलाम में जितनी असुविधा हो रही है उस से अधिक असुविधा होने लगे। इस तरह आप के स्थानान्तरण के मामले में जो भी कुछ करना हो वह बहुत सोच समझ कर करें।

सड़क पर पानी और गंदगी फैलाने वालों के विरुद्ध शिकायत कहाँ करें . . .

nuisanceसमस्या-
हिन्दुपुर, आन्ध्रप्रदेश से सोमनाथ कुलकर्णी ने पूछा है –

मेरा घर का रजिस्टर हुआ है। मेरा घर में रोड से सौ मीटर दूरी पर है। मेरे घर को आने जाने के लिए बारह फीट चौड़ा रोड़ी का कच्चा रोड़ है, मगर उस रोड के बाजू मे कुछ घर वाले उस रोड पर उन के घर के बाथरूम का पानी और कचरा डाल देते हैं। ऐसे में मुझे किस से शिकायत करनी होगी? और क़ानूनी की कौन सी प्रक्रिया करूँ जिस से वो लोग उस रोड पर पानी ना डालें?

समाधान –

किसी भी सार्वजनिक स्थल पर या रास्ते में इस तरह की गंदगी और पानी डालना कंटक (न्यूसेंस) उत्पन्न करना है। आप इस की शिकायत अपने गाँव/नगर की पंचायत/नगरपालिका में कर सकते हैं। लेकिन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 133 के अन्तर्गत इस तरह का कंटक हटाने के लिए आप के क्षेत्र के जिला मजिस्ट्रेट, सब डिविजनल मजिस्ट्रेट या कार्यपालक दंडनायक (Executive Magistrate)   को भी शिकायत एक आवेदन के रूप में प्रस्तुत की जा सकती है।

स मामले में जिला मजिस्ट्रेट, सब डिविजनल मजिस्ट्रेट या कार्यपालक दंडनायक का न्यायालय उन व्यक्तियों के विरुद्ध जो ये कंटक उत्पन्न करते हैं नोटिस जारी कर के बुलाएगा और उन से जवाब देने को कहेगा। मामले की सुनवाई कर के उन्हें कंटक हटाने और भविष्य में कंटक उत्पन्न न करने का आदेश देगा। यदि इस आदेश की पालना नहीं की जाती है तो भारतीय दंड संहिता के अन्तर्गत उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पर धारा 188 के अन्तर्गत मुकदमा दर्ज कर के उसे जुर्माना और कारावास के दंड से दंडित किया जा सकता है।

एक तरफा निर्णय व डिक्री साक्ष्य के आधार पर मामला साबित कर देने पर ही प्रदान किए जा सकते हैं।

समस्या-

सिरोही, राजस्थान से मांगीलाल चौहान ने पूछा है-

मेरी पत्नी और मेरे बीच मे एक साल से किसी तरह का कोई रिश्ता नहीं है।  क्यों कि वह शुरू से संदिग्ध चरित्र की है।  फिर भी मैं ने उसको अपनाया।  लेकिन अब मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ।  इसलिए मैं ने कोर्ट में तलाक़ के लिए आवेदन प्रस्तुत कर दिया है।  जिसकी 16-02-2013 को पेशी है।  इस कार्यवाही का नोटिस मेरी पत्नी को मिल चुका है।  लेकिन वह कोर्ट मे पेशी के लिए आने को तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या एक तरफ़ा फ़ैसला सुनाया जा सकता है? या नही?

समाधान-

justiceकिसी भी मामले में यदि प्रतिवादी / प्रतिपक्षी को न्यायालय का समन / नोटिस प्राप्त हो गया हो और वह पक्षकार न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता है तो न्यायालय सब से पहले इस बात की जाँच कर के संतुष्ट होता है कि क्या उस पक्षकार को समन / नोटिस उचित और विधिपूर्ण रीति से तामील हो गया है अथवा नहीं।  न्यायालय के संतुष्ट होने पर कि पक्षकार को समन / नोटिस उचित और विधिपूर्ण रीति से तामील हो चुका है तो वह मुकदमे की पत्रावली पर आदेश देता है कि उस पक्षकार के विरुद्ध मुकदमे की एक तरफा सुनवाई की जाए।

स आदेश के उपरान्त वादी / प्रार्थी को अपने दावे /आवेदन के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया जाएगा।  वादी / प्रार्थी द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत कर देने के उपरान्त न्यायालय वादी / प्रार्थी के तर्क सुनेगा और तय करेगा कि क्या वादी / प्रार्थी की साक्ष्य से उस का मामला साबित हुआ है अथवा नहीं।  न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि वादी / प्रार्थी ने उस के द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य से उस का मामला साबित कर दिया है तो फिर वादी / प्रार्थी को उस के द्वारा चाहा गया निर्णय और डिक्री प्रदान कर दी जाएगी।

न्यायालय द्वारा किसी पक्षकार के विरुद्ध एक तरफा सुनवाई का आदेश दे देने के उपरान्त निर्ण्य होने तक किसी भी समय वह पक्षकार जिस के विरुद्ध ऐसा आदेश दिया गया है आवेदन प्रस्तुत कर एक तरफा सुनवाई के आदेश को निरस्त कर उसे सुनवाई का अवसर प्रदान करने के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर सकता है।  आम तौर पर इस तरह के प्रार्थना पत्र निर्धारित अवधि में प्रस्तुत होने पर तथा उचित कारण होने पर स्वीकार कर लिये जाते हैं।  यह वादी / प्रार्थी के लिए भी उचित है क्यों कि एक तरफा निर्णय या डिक्री को इस आधार पर कि उसे समन /नोटिस की तामील नहीं हुई थी तथा उसे मामले का ज्ञान  नहीं था चुनौती दी जा सकती है तथा उसे निरस्त कराया जा सकता है।

प के मामले में आप की साक्ष्य से आप के आवेदन के तथ्य आप की साक्ष्य से साबित हो जाने पर विवाह विच्छेद की एक तरफा डिक्री आप को प्राप्त हो सकती है तथा।  डिक्री की अपील या उसे अपास्त किए जाने का आवेदन निर्धारित अवधि में प्रस्तुत नहीं होने पर वह अंतिम हो सकती है।

वैकल्पिक उपाय होने पर रिट याचिका पोषणीय नहीं है।

समस्या-

राजगढ़, मध्यप्रदेश से ममता नामदेव पूछती हैं-

दालत के आदेशानुसार मेरे पति द्वारा मुझे धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण की राशि 1500/- रुपए प्रतिमाह पिछले 36 माह से प्रदान की जा रही है। धारा 24 में अन्य अदालत द्वारा 30 माह पूर्व स्वीकृत अंतरिम भरण पोषण की राशि 1200/- रुपए प्रतिमाह बार बार मांगे जाने और अदालत के निर्देशों के बावजूद अभी तक नहीं दी गई है।  पेशी पर मेरे पति के हाजिर ना होने और उन के गवाहों के हाजिर ना होने के कारण मेरे पति का धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम विवाह विच्छेद का मुकदमा परिवार अदालत ने 3 माह पहले खारिज कर दिया है। खारिजी आदेश तथा मुकदमा चलने के दौरान दिए गए खर्चे व भरण पोषण व स्थाई पुनर्भरण के आवेदनों को को मेरे पति द्वारा अनुच्छेद 227 सपठित धारा 24/25/28 हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। मुझे उच्च न्यायालय में अपना पक्ष रखना है। मैं कोई नौकरी नहीं करती मेरी कोई आय नहीं है।  क्या धारा 24 अंतरिम भरण-पोषण की राशि को धारा 13 के खारिजी आदेश के साथ 32 माह बाद चुनौती दी जा सकती है? कृपया मार्गदर्शन दें।

समाधान-

प के पति ने सभी आदेशों के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत की है। रिट याचिका के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है। इस कारण उसे प्रस्तुत किया जा सकता है। हालांकि अत्यधिक देरी कर के प्रस्तुत की गई रिट याचिका को उच्च न्यायालय स्वीकार नहीं करते हैं। इस मामले में 32 माह की देरी अत्यधिक देरी है और रिट याचिका को विचारार्थ भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

कोई भी रिट याचिका तब भी स्वीकार नहीं की जा सकती है जब कि उस मामले में याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो।  परिवार न्यायालय के किसी भी आदेश व निर्णय के विरुद्ध परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 19 के अंतर्गत अपील का प्रावधान है। इस तरह आप के मामले में अधिनियम के अंतर्गत अपील का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है।  किसी भी वैकल्पिक उपाय के उपलब्ध रहते हुए किसी मामले में रिट याचिका स्वीकार्य नहीं हो सकती।  इस के लिए सर्वोच्च न्यायालय का United Bank Of India vs Satyawati Tondon & Ors. के मामले में on 26 July, 2010 को दिया गया निर्णय आप की सहायता कर सकता है। इसे आप यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकती हैं। 

अपराधिक मुकदमों में दस्तावेज व वस्तुएँ प्रस्तुत कराने हेतु न्यायालय के आदेश का उपबंध

समस्या-

वाराणसी, उत्तर प्रदेश से आई. एन. सिंह ने पूछा है –

पराधिक प्रकरण में परिवादी का प्रतिपरीक्षण (जिरह) चल रहा है।  अभियुक्त से परिवादी जैल में मिलने जाती थी, लेकिन जिरह में उस ने इस तथ्य से इन्कार कर दिया और कहा कि मैं कभी मिलने नहीं गयी। मैं चाहता हूँ कि न्यायालय जैल से वह दस्तावेज मंगवाए जिस पर परिवादी के हस्ताक्षर/अंगूठा निशानी है। न्यायाधीश ने पूछा है कि किस उपबंध के अंतर्गत न्यायालय उक्त दस्तावेजों को जेल से मंगवा सकती है? कृपया मार्गदर्शन करें।

समाधान-

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 91 निम्न प्रकार है –

91. दस्तावेज या अन्य वस्तु प्रस्तुत करने के लिए समन-

(1) जब भी कोई न्यायालय या पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी यह समझता है कि किसी ऐसे अन्वेषण, जाँच, विचारण या अन्य कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए. जो इस संहिता के अधीन ऐसे न्यायालय या अधिकारी के द्वारा या उस के समक्ष हो रही है, किसी दस्तावेज या अन्य किसी चीज का पेश किया जाना आवश्यक या वाँछनीय है तो जिस व्यक्ति के कब्जे या शक्ति में ऐसी दस्तावेज या चीज होने का विश्वास है उस के नाम ऐसा न्यायालय एक समन या ऐसा अधिकारी एक लिखित आदेश उस से यह अपेक्षा करते हुए जारी कर सकता है कि उस समन या आदेश में उल्लखित समय और स्थान पर उसे प्रस्तुत करे अथवा हाजिर हो और उसे प्रस्तुत करे।

(2) यदि कोई व्यक्ति, जिस से इस धारा के अधीन दस्तावेज या अन्य कोई वस्तु पेश करने की ही अपेक्षा की गई है उसे पेश करने के लिए स्वयं हाजिर होने के स्थान पर वह उस दस्तावेज या वस्तु को प्रस्तुत करवा दे तो यह समझा जाएगा कि उस ने उस अपेक्षा का अनुपालन कर दिया है।

इस धारा की कोई बात-

(क) भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी, अथवा

(ख) डाक या तार प्राधिकारी की अभिरक्षा में किसी पत्र, पोस्टकार्ड, तार या अन्य दस्तावेज या किसी पार्सल या चीज पर लागू होने वाली नहीं समझी जाएगी।

प जेल का रिकार्ड न्यायालय में मंगवाने के लिए उक्त धारा 91 दं.प्र.संहिता के अंतर्गत एक आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करें जिस में यह लिखें कि किस तरह उक्त दस्तावेज उक्त प्रकरण में प्रासंगिक हैं  और न्याय को प्रभावित करने वाले हैं और जिन्हें न्यायालय के समक्ष नहीं लाए जाने के कारण अभियुक्त द्वारा अपराध नहीं किया होने पर भी दोषी ठहराया जा सकता है। न्यायालय आप के आवेदन पर यथोचित आदेश पारित करेगा। यदि वह आप के दस्तावेज मंगाए जाने के आवेदन को निरस्त कर देता है तो आप उस आदेश के विरुद्ध सत्र न्यायालय में रिविजन याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं।

जिस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए आप उक्त दस्तावेज मंगाना चाहते हैं वह आ जाने पर भी आप को उस दस्तावेज को प्रमाणित करने के लिए उस दस्तावेज को तैयार करने वाले अधिकारी/कर्मचारी को साक्ष्य हेतु बुलाना होगा। जो अपने बयान में कहेगा कि वह लड़की अभियुक्त से मिलने आती थी और तभी उस पंजिका में उस के हस्ताक्षर/अंगूठा निशानी कराए गए थे और उसी के सामने किए गए थे।  तभी परिवादी के जैल में जा कर अभियुक्त से मिलने का तथ्य आप साबित कर सकेंगे।

घरेलू हिंसा के मुकदमा हो जाने पर पति क्या करे?

समस्या-

मेरी पत्नी ने मेरे ऊपर घरेलू हिंसा अधिनियम का केस करीब 18 महिना पहले किया था। मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी, क्योंकि मेरी पत्नी ने मुझे ही करीब 4 साल पहले मेरे ही घर से निकाल दिया था और इस केस के सम्मन उसने मेरे उसी घर के पते पर भिजवाए थे, जहाँ आज केवल वो रह रही है।  उस पते पर मैं था ही नहीं इसलिए उस पते पर मेरे द्वारा सम्मन लिया ही नहीं जा सकता था। इस केस में मेरे अलावा मेरी माँ ,बहिन और जीजा जी को भी शामिल किया था। उन तीनों ने मुझे पहले ही बेदखल किया हुआ है इसलिए वो लोग अब केस में जाते नहीं हैं। मेरी परेशानी ये है कि इस केस में उसके वकील  ने मेरे से 5000, रूपए महिना से आज तक का अंतरिम खर्चा और कुछ नगद पैसे मांगे हैं जिसका टोटल 1 ,70 ,000 है, जबकि मैं कोई नोकरी भी नहीं कर रहा हूँ और मेरे पास तो खुद खाने को भी पैसे नहीं हैं। क्योकि मैं जब घर से निकला था तो अपना सब कुछ रुपया पैसा आदि घर पर ही छोड़ आया था। जिस में से मेरी पत्नी ने 1,00000 , रूपए 2008 में ही अपने नाम बैंक में करवा लिए थे जिसकी मेरे पास रसीद भी है और मेरी पत्नी पढ़ी लिखी होने के कारण एक प्राइवेट फार्मेसी में नोकरी भी कर रही है। उसकी सेलरी करीब 10 ,000 रूपए महिना है जो उसके बैंक खाते में जमा होते हैं।  लेकिन उसने अपनी नोकरी का जिक्र कोर्ट में नहीं किया है और न ही उन 1 लाख रुपयों का।  अब आप मुझे बतायें की मैं इस समस्या से कैसे निकलूँ। क्यों कि मेरे पास रूपए बिलकुल नहीं है और मुझे अगर जेल जाना पड़ा तो कितने टाइम के लिए जाना होगा।  कृपया मेरा मार्ग दर्शन करें।

-कमल हिन्दुस्तानी, हिसार, हरियाणा

समाधान-

प का सवाल अधूरा है। आप ने यह नहीं बताया कि आप को उक्त मुकदमे का समन मिला है या नहीं? यदि मिल गया है तो तय तिथि पर न्यायालय में उपस्थित होइए, वकील कीजिए और उसे अपने मुकदमे की जिम्मेदारी दीजिए। वह आप की ओर से उत्तर प्रस्तुत करेगा।  आप ने जो तथ्य तथा परिस्थितियाँ इस प्रश्न में बताई हैं उन के आधार पर प्रतिरक्षा करना संभव है।  इन तथ्यों को  साबित करने वाले दस्तावेज प्रस्तुत कीजिए और अपने कथनों का शपथ पत्र प्रस्तुत कीजिए। न्यायालय को निर्णय लेने दीजिए कि आपकी पत्नी की मांग उचित है या नहीं? यदि किसी कारण से न्यायालय का निर्णय आप को उचित न लगे तो आप उस की अपील कर सकते हैं।

दि आप को समन नहीं मिला है और मुकदमे की जानकारी हो गई है तो भी आप न्यायालय में उपस्थित हो कर आप की पत्नी के आवेदन में अपनी ओर से प्रतिरक्षा कर सकते हैं। लेकिन यदि आप ने न्यायालय से बचने का मन  बना रखा हो तो यह बिलकुल गलत होगा। क्यों कि एक आवेदन का निपटारा तो केवल दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद ही हो सकता है। इसलिए न्यायालय तो आप को जाना होगा और अपने विरुद्ध मुकदमे में अपना पक्ष रखना होगा।

न्यायालय दोनों पक्षों की सुनवाई के उपरान्त ही उचित आदेश पारित करेगा। तब उस आदेश की पालना आप नहीं करेंगे तो आप के विरुद्ध मुकदमा चलाया जाएगा जिस में आप को 20000 रुपए तक के जुर्माने और एक वर्ष तक के कारावास के दंड से दंडित किया जा सकता है।

दि आप की समस्या यह है कि आप के पास पैसा नहीं है और आप वकील नहीं कर सकते तो आप विधिक सहायता के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में आवेदन कर सकते हैं और कह सकते हैं कि आप निर्धन व्यक्ति हैं जिस की आय नहीं है अथवा अत्यल्प है। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण आप को वकील उपलब्ध करवा देगा।

राजद्रोह पर बहस, लेकिन बिनायक सेन के जमानत आदेश में कुछ नहीं

र्वोच्च न्यायालय ने बिनायक सेन को जमानत देना उचित समझा। जमानत की बहस के दौरान छत्तीसगढ़ सरकार के वकीलों के तर्कों को खारिज करते हुए न्यायालय ने उन पर राजद्रोह (Sedition) के आरोप को सिद्ध नहीं माना और यह भी कहा कि कानून की व्याख्या समकालीन परिस्थितियों में की जानी चाहिए। इस से देश भर में इस औपनिवेशिक कानून को बदलने के पक्ष में चर्चा आरंभ हो गई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने परंपरा को निभाते हुए जमानत के आदेश में किसी भी तरह के विचार अभिव्यक्त नहीं किए हैं जिस से अपील की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय प्रभावित हो। सर्वोच्च न्यायालय का आदेश इस तरह है … 

S U P R E M E   C O U R T  O F  I N D I A

RECORD OF PROCEEDINGS

Petition(s) for Special Leave to Appeal (Crl) No(s).2053/2011

(From the judgement and order dated 10/02/2011 in IA No. 1/2011 in
CRLA No. 20/2011 of The HIGH COURT OF CHATTISGARH AT BILASPUR)

BINAYAKSEN Petitioner(s)

VERSUS

STATE OF CHHATISGARH Respondent(s)

(With appln(s) for exemption from filing O.T.,bail,BRINGING ON
RECORD ADDL. FACTS and office report )

Date: 15/04/2011 This Petition was called on for hearing today.

CORAM :
HON’BLE MR. JUSTICE HARJIT SINGH BEDI
HON’BLE MR. JUSTICE CHANDRAMAULI KR. PRASAD

For Petitioner(s) Mr. Ram Jethmalani,Sr.Adv.
M/s. lata Krishnamurthy,R.N.Karanjawala,
Manik Karanjawala, Sandeep Kapur,
Shivek Trehan, Udit Mendiratta,
Nitya Ramakrishnan and Rahul Kripalani
and Akhil Sachar,Advs.for
M/S. Karanjawala & Co.

For Respondent(s) Mr. Mukul Rohtagi,Sr.Adv.
Mr. U.U.Lalit,Sr.Adv.
Mr. Atul Jha,Adv.
Mr. Sandeep Jha,adv.
Mr. D.K.Sinha,Adv.

Mr. R.S.Suri,Sr.Adv.
Mr. Rana Mukherjee,Adv.
Mr. Merusagar Samantaray,Adv.
Mr. Vikramjit Banerjee,Adv.
Mr. Rajiv Singh,adv.
Mr. S.Shamshery,Adv.

UPON hearing counsel the Court made the following

O R D E R

We have heard the learned counsel for the parties at very great length. Lest we should prejudice any party. We are not giving any reasons for our order. We however direct that the sentence on the petitioner be suspended, and he be released on bail to the satisfaction of the Trial Court.

The SLP is disposed of.

[SUMAN WADHWA]             [VINOD KULVI]
COURT MASTER               COURT MASTER

जमानत के लिए कितनी बार आवेदन किया जा सकता है ?

रमेश जैन ने पूछा है …
धारा 498ए व 406 में किन-किन न्यायालयों में कितनी-कितनी बार जमानत के लिए आवेदन किया जा सकता है? क्या इसके लिए भी कोई सीमा तय होती है।
 क्या किसी भी अपराध के तहत लगाई जमानत याचिका ख़ारिज होने पर भी कोर्ट से कोई दस्तावेज मिलता है? अगर हाँ तो कब? इसकी सूचना किस-किस को भेजी जाती है?
 
उत्तर- – –
रमेश जी,
धारा  498ए व 406 भा.दं.संहिता ही नहीं, किसी भी मामले में जब भी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाता है तो उस के लिए सब से पहले जमानत का आवेदन उस मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत किया जाएगा जहाँ उसे गिरफ्तारी के बाद पुलिस ने प्रस्त्तुत किया है। यदि वह न्यायालय जमानत का आवेदन निरस्त कर देता है तो जमानत का आवेदन उस न्यायालय पर क्षेत्राधिकार रखने वाले सत्र न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। यदि आवेदन सत्र न्यायालय द्वारा भी अस्वीकार कर दिया जाए तो फिर उच्च न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है। एक बार किसी न्यायालय द्वारा जमानत आवेदन निरस्त कर दिए जाने के उपरांत जब तक परिस्थितियों में कोई वस्तुगत परिवर्तन नहीं होता है उस न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए, अन्यथा उसे प्रथम दृष्टया ही निरस्त कर दिया जाएगा। जमानत के आवेदन में यह अंकित किया जाना चाहिए कि पहले कितनी बार और कहाँ कहाँ जमानत का आवेदन किया जा चुका है और पूर्व का जमानत आवेदन निरस्त हो जाने के बाद मामले में क्या वस्तुगत परिवर्तन हुए हैं। कानून में एक से अधिक जमानत आवेदन प्रस्तुत करने में कोई बाधा नहीं है। इस कारण से किसी भी न्यायालय में जमानत आवेदन कितनी भी बार प्रस्तुत किया जा सकता है। 
तो जमानत का आवेदन स्वीकार होने पर और न ही  अस्वीकार होने पर न्यायालय से कोई दस्तावेज नहीं मिलता है। हाँ, जमानत आवेदन पर हुए आदेश की प्रतिलिपि उस के लिए प्रतिलिपि प्राप्त करने का आवेदन प्रस्तुत कर के प्राप्त की जा सकती है। इस के लिए आवश्यक शुल्क निर्धारित है। लेकिन यदि अभियुक्त जिस की ओर से प्रतिलिपि के लिए आवेदन किया गया है न्यायिक या पुलिस अभिरक्षा में है तो प्रतिलिपि निशुल्क दी जाएगी। यदि किसी अभियुक्त की जमानत का आवेदन स्वीकार कर लिया जाता है तो सत्र न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय मजिस्ट्रेट के न्यायालय को अपने आदेश की प्रति प्रेषित करता है। यदि आदेशानुसार मजिस्ट्रेट के न्यायालय में जमानत प्रस्तुत कर दी जाती है और उसे मजिस्ट्रेट स्वीकार कर लेता है तो अभियुक्त को अभिरक्षा से छोड़े जाने का आदेश जेल को मजिस्ट्रेट के न्यायालय द्वारा स्वयं प्रेषित किया जाता है जिसे प्राप्त होने पर जेल अधिकारी संबंधित अभियुक्त को अपनी अभिरक्षा अपनी अभिरक्षा से मुक्त कर देता है।

डी अजित के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का कोई निर्णय नहीं है

कल तीसरा खंबा पर आलेख नहीं था, केवल जनादेश में प्रकाशित आलेख ब्लागर और वेब पत्रकार भी कानूनी दायरे में  की सूचना मात्र थी।  इस आलेख पर सात टिप्पणियाँ तीसरा खंबा पर तथा आठ टिप्पणियाँ जनादेश पर प्राप्त हुई हैं।  कुछ टिप्पणियों से पता लगता है कि पाठक मामले को समझ गए हैं, कुछ से लगता है कि अभी इस मामले पर संशय शेष हैं। 

डी अजित के मामले में मीडिया और ब्लाग में आयी सभी रपटें, आलेख और टिप्पणियाँ सर्वोच्च न्यायालय में जो कुछ भी डी अजित की याचिका पर हुआ उस का परिणाम हैं।  मीडिया में प्रकाशित सभी समाचारों में यह कहा गया था कि सर्वोच्च न्यायालय ने कोई निर्णय पारित किया है।   मैं ने अपनी समझ के अनुसार उसे निर्णय न कहते हुए आदेश कहा था।  इस मामले पर मीडिया ने समाचार प्रकाशित कर एक बहस खड़ी की है जो चल रही है और जो पता नहीं कब तक चलती रहेगी।  लेकिन वास्तविकता कुछ और है। 

जब पहली बार यह समाचार मुझे पढ़ने को मिला तो मैं ने  अंतर्जाल पर इस से संबंधित सभी सूचनाएँ छान डालीं।  मैं मूल निर्णय को तलाशता रहा।  इस में मैं ने अपना बहुत समय जाया किया जिस का नतीजा यह हुआ कि जनादेश के लिए आलेख लिखने का आग्रह मिलने के उपरांत भी उसे लिखने में लगभग चौबीस घंटे गुजर गए।  तलाशने के उपरांत भी उक्त निर्णय कहीं नहीं मिला।  वास्तविकता तो यह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने कोई निर्णय पारित ही नहीं किया।  बिना किसी निर्णय के ही एक बवाल मीडिया और ब्लाग जगत में खड़ा कर दिया गया।  अब एक अंग्रेजी ब्लाग काफिया पर प्रकाशित एक आलेख पर एक पाठक अनुज भुवानिया की टिप्पणी से मामला कुछ हद तक साफ हुआ है। 

अनुज भुवानिया ने अपनी टिप्पणी में बताया है कि “इस मामले में कोई निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित नहीं किया गया है।  डी अजित की याचिका बिलकुल नई रिट याचिका थी जो दिनांक 23.02.2008 को भारत के  मुख्य न्यायाधीश की अदालत में  Admission stage पर सुनवाई किए जाने के लिए सूचीबद्ध की गई थी।”  (इस स्तर पर केवल मात्र यह निर्धारित किया जाता है कि  ‘याचिका स्वीकार करने योग्य भी है या नहीं’ ) डी अजित की याचिका इसी स्तर पर निरस्त कर दी गई और कोई नोटिस जारी नहीं किए गए।  इस स्तर पर कोई निर्णय पारित नहीं किया जाता, इस लिए कोई निर्णय पारित भी नहीं किया गया। केवल दो शब्दों का एक आदेश पारित किया गया …’Petition dismissed.’ कोई निर्णय पारित नहीं किए जाने से कोई बाध्यकारी न्यायिक सिद्धान्त भी स्थापित नहीं हुआ” 

.इस मामले में मीडिया द्वारा समाचार प्रकाशित कर जो कुछ भी बवाल खड़ा किया गया वह डी अजित के वकील की बहस के दौरान जो विचार मुख्य न्यायाधीश द्वारा अभिव्यक्त किए गए होंगे उन के आधार पर खड़ा किया गया।  

वास्तविकता यह है कि डी अजित के विरुद्ध एक मामला ठाणे (महाराष्ट्र) की अदालत में दर्ज हुआ है तथा उस में डी अजित वाँछित है।  केरल उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें अग्रिम जमानत प्रदान
कर दी गई है।  अब उन्हें ठाणे की अदालत जिस के द्वारा उन के विरुद्ध अपराध का प्रसंज्ञान लिया है के प्रसंज्ञान लिए जाने के आदेश के विरुद्ध कोई आपत्ति है तो वे ठाणे के जिला न्यायालय या मुम्बई उच्च न्यायालय के समक्ष उस आदेश को चुनौती दे सकते हैं।  ऐसा नहीं कि डी अजित जो सर्वोच्च न्यायालय में अपने मामले की सुनवाई के लिए व्यवस्था बना सकते हैं और वकील कर सकते हैं, वे ठाणे की जिला अदालत या मुम्बई उच्चन्यायालय के समक्ष भी अपनी निगरानी याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं।  निगरानी की सुनवाई करने वाला न्यायालय यह निर्धारित कर सकता है कि तथ्यों के आधार पर ठाणे अदालत ने उन के विरुद्ध प्रसंज्ञान लिए जाने का जो आदेश दिया है वह उचित है या निरस्त किए जाने योग्य है।  यदि वे निगरानी न्यायालय के निर्णय को भी उचित नहीं समझते हैं तो उस के विरुद्ध उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय जा सकते हैं।  ठाणे के प्रसंज्ञान लिए जाने वाले न्यायालय के आदेश के विरुद्ध चुनौती उपस्थित करने के लिए उन के पास कम से कम दो अवसर तो उपलब्ध हैं ही। 



ऐसी अवस्था में जब कि सर्वोच्च न्यायालय का कोई निर्णय है ही नहीं तो उस पर चलाई जा रही सारी बहस बेमानी है।

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