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अनुकंपा नियुक्ति के लिए मृतक के शेष सभी आश्रितों की अनापत्ति होना जरूरी है।

समस्या-

अक्कू यादव ने प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मको हमारे पिता के चाचा ने 2012 में कानून के अनुसार सब रजिस्ट्रार के सामने गोद लिया गया था। उनकी दो शादी शुदा बेटी है, जिन की गोद लेने के पहले शादी हो गयी थी। उनकी पत्नी का देहांत 2008 में हो गया। तब उन्होने अपनी सेवा और वंशज के लिए हमको पंजीकृत गोद ले लिया, वे सरकारी सेवा पर कार्यरत थे। सेवा के दौरान उनकी 2016 में देहांत हो गया। उनकी जो दो बेटियाँ हैं उन्होंने गोद नामा कैंसल करवाने के लिए मुकदमा किया है। जब गोद लिया गया था तब उनको कोई समस्या नहीं थी। परन्तु अब मरने के बाद बोल रही 30 लाख रुपये दो तब अनुकम्पा के लिए सहमति पत्र दूँगी। अनुकम्पा के लिए मैने बिभाग में अबेदन किया तो बोले बिना सहमति के अनुकम्पा नहीं मिल सकती है तो क्या हम हाईकोर्ट में बिभाग के खिलाफ याचिका कर सकते हैं? हमको अनुकंपा कैसे मिल सकती है और क्या पंजीकृत गोद नामा कैंसल हो सकता है? जब कि सभी दस्तावेज में पिता के स्थान पर दत्तक पिता का नाम है और नॉमिनी फॉर्म भी मेरे नाम है जिला अधिकारी द्वारा वारिस पत्र भी है हम क्या करें हमे बतायें?

समाधान-

प को सही प्रकार से गोद लिया गया है और गोदनामा निरस्त होना असंभव प्रतीत होता है। लेकिन अनुकंपा नियुक्ति के लिए बहिनों की सहमति आवश्यक है। गोद लिए जाने से आप को गोद पुत्र के रूप में वही अधिकार प्राप्त हुए हैं जो एक पुत्र को होते। यदि आपके गोद पिता के कोई पुत्र होता तब भी यही स्थिति बनती। ऐसा लगता है कि आप कुछ छिपा रहे हैं। आप के गोद पिता ने और भी संपत्ति छोड़ी होगी। उस की कीमत भी कम नहीं होगी। बहनें उस संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी हैं और अनापत्ति देने के पहले उस संपत्ति का हिस्सा आप से प्राप्त कर लेना चाहती हैं जिस के कारण बाद में उन्हें बंटवारे आदि की कार्यवाही न करनी पड़े।

आप ने यह नहीं बताया कि आप किस विभाग में नौकरी चाहते हैं। यदि अनुकंपा नियुक्ति के नियमों में विवाहित बहनें आश्रित हैं तो यह स्पष्ट है कि बिना बहनों की अनापत्ति के अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिल सकती। वैसे भी अनुकंपा नियुक्ति मात्र अनुकंपा है कोई अधिकार नहीं है और इस कारण दी जाती है कि परिवार को सहारा मिले। लेकिन आपके मामले में परिवार तो है ही नहीं। बहने शादीशुदा हैं। और आप के अलावा परिवार में कोई अन्य नहीं। तो सरकार वैसे भी नौकरी देने से इन्कार कर सकती है। यह दूसरी बात है कि उस स्थिति में आप उच्च न्यायालय में रिट याचिका कर सकते हैं।

हमारी राय है कि यदि आप की विवाहित बहनें आश्रित अनुुकंपा नियुक्ति नियमों में आश्रित की परिभाषा में हैं तो आप को बहनों से कोई समझौता कर लेना चाहिए और सहमति प्राप्त कर अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करने की कोशिश करें। अन्यथा अनुकंपा नियुक्ति को भूल जाएँ तो बेहतर है। यदि विवाहित बहने आश्रित की श्रेणी में नहीं आती हैं और विभाग आप से उन की अनापत्ति मांग रहा है तो आप विभाग के पत्र के आधार पर रिट याचिका उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।

 

दामाद ससुर का आश्रित नहीं, उसे अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिल सकती।

Compassionate Appointmentसमस्या-

राहुल कुमार ने पीपल्दा, जिला कोटा राजस्थान से पूछा है-

मेरे ससुर जी का देहान्त हो गया है, वे कानूनगो के पद पर राजकीय सेवा में थे। मेरी पत्नी उन की इकलौती पुत्री है, लेकिन वह पढ़ी लिखी नहीं है। मैं बी.ए., बी.एड हूँ। क्या मुझे अनुकंपा नियुक्ति मिल सकती है?

समाधान-

नुकंपा नियुक्ति अपने आप में संविधान की मूल आत्मा के विरुद्ध है। राजकीय सेवाओं में नियुक्त होने का हर नागरिक को अधिकार है। इस कारण राजकीय सेवाओं में नियुक्तियाँ योग्यता के अनुसार सभी योग्य नागरिकों को खुली भर्ती के आधार पर अवसर प्रदान करते हुए ही होनी चाहिए। अनुकंपा नियुक्ति इस सामान्य नियम का अपवाद है जो जनविरोधी भी है। एक राजकीय कर्मचारी के देहान्त के उपरान्त उस के परिवार को पेंशन प्राप्त होती है। एक साधारण किसान जो खेत में पसीना बहाता है, एक मजदूर जो उद्योगों में अपना पसीना बहाता है उस की मृत्यु पर तो उस के आश्रित को कुछ नहीं मिलता। फिर किसी राज्य कर्मचारी के आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति क्यों मिलनी चाहिए? क्या यह भारत के अन्य नागरिकों के साथ अन्याय नहीं है?

फिर भी संविधान ने राजकीय कर्मचारी की सेवा में रहते हुए मृत्यु हो जाने पर अचानक उस का परिवार संकट में न आ जाए इस कारण से नियमानुसार उस के किसी एक आश्रित को नौकरी देने की छूट दे रखी है। अनुकंपा नियुक्तियाँ राज्य की अनुकंपा हैं, यह किसी का अधिकार नहीं है। यदि राज्य के पास स्थान रिक्त हो। कोई आश्रित योग्य हो तो उसे ऐसी नौकरी अनुकंपा के रूप में दी जा सकती है। वह भी केवल सख्ती के साथ केवल नियमों के अनुरूप ही।

राजस्थान के अनुकंपा नियुक्ति नियमों में विवाहित पुत्रियाँ भी आश्रित की श्रेणी में नहीं आतीं दामाद तो दूर की बात है। आप की पत्नी यदि पढ़ी लिखी होती तो भी वह अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करने की अधिकारी नहीं होती। आप तो उन के दामाद हैं। आप को अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती।

किसी आश्रित के सरकारी नौकरी में होने पर दूसरे किसी आश्रित को अनुकम्पा नियुक्ति का अधिकार नहीं . . .

No employmentसमस्या –
राजस्थान से राकेश कुमार राव ने पूछा है –

मेरी माँ का देहान्त दिनांक 20.09.2013 को हो चुका है। मेरे पिता शिक्षा विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी हैं। मैं अनुकम्पा नियुक्ति चाहता हूँ। कृपया उचित सलाह दें।

समाधान-

राजस्थान मृत राज्य कर्मचारी आश्रित अनुकंपा नियुक्ति नियम 1996 के नियम 5 (1) में स्पष्ट प्रावधान है कि मृत राज्य कर्मचारी के आश्रितों में कोई भी यदि सरकारी नौकरी में हुआ तो उस मृत राज्य कर्मचारी के किसी भी आश्रित को अनुकम्पा नियुक्ति नहीं दी जाएगी। यदि मृत राज्य कर्मचारी की विधवा यदि चाहे तो उसे अनुकम्पा नियुक्ति दी जा सकती है।

गभग पूरे देश के अनुकम्पा नियुक्ति नियमों में लगभग ऐसा ही प्रावधान है। इस तरह आप को अनुकम्पा नियुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती। अच्छा हो कि आप इस के लिए प्रयास न करें।

अनुकम्पा नियुक्ति के लिए अन्य आश्रितों की अनापत्ति आवश्यक

समस्या-

गुना, मध्यप्रदेश से विकास शर्मा ने पूछा है –

मेरे पिताजी का स्‍वर्गवास दिनांक 30.12.2012 को हो गया है।  मेरे पिताजी ने मेरी माता जी के देहान्त के बाद दूसरा विवाह किया था जिस से 2 पुत्रियाँ हैं। हम दो भाई उनकी पहली पत्‍नी मेरी माताजी से हैं। पिताजी नगरपालिका में लेखापाल के पद पर सेवारत थे उनकी मृत्‍यु के बाद हमारे पिताजी की दूसरी पत्‍नी उन की नौकरी एवं उनका पूरा पैसा चाहती है, वह हमें कुछ भी नहीं देना चाहती। इस विषय में आप से मार्गदर्शन चाहता हूँ। मैं अपने पिता जी के स्‍थान पर अनुकंपा नियुक्ति चाहता हूँ। यह कैसे संभव होगा?

समाधान-

justiceप के पिता के सेवा संबंधी लाभों में पेंशन के अतिरिक्त उन की ग्रेच्यूटी, बकाया वेतन और भविष्य निधि राशि सम्मिलित है। इस के अतिरिक्त बैंक, बीमा आदि की राशि जो सेवा से संबंधित नहीं है वह भी हो सकती हैं। पेंशन के अतिरिक्त जो भी सेवा संबंधी लाभ तथा अन्यत्र जमाएँ हैं वे सब आप के पिता जी की सम्पत्ति थीं जो उन की मृत्यु के साथ ही उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो गयी हैं।

प के पिता ने दूसरा विवाह आप की माता जी के देहान्त के उपरान्त किया था।  इस तरह उन का दूसरा विवाह वैध है और आप की विमाता भी आप के पिता की उत्तराधिकारी हैं। इस तरह आप के पिता के पाँच उत्तराधिकारी आप की विमाता, आप दोनों भाई तथा दो बहनें हैं। इस तरह आप की समस्त चल-अचल संपत्ति, बीमा से प्राप्त राशि, बैंक में जमा राशियाँ, उन की नौकरी के कारण मिलने वाली ग्रेच्युटी, भविष्य निधि आदि सभी अब आप पाँचों की सँयुक्त संपत्तियाँ हैं। प्रत्येक कुल संपत्ति में पाँचवें भाग का अधिकारी है। चल अचल संपत्ति के लिए विभाजन का वाद प्रस्तुत किया जा सकता है। जो राशियाँ आप के पिता के नियोजक से अथवा बीमा बैंक आदि से प्राप्त होनी शेष हैं उन के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र हेतु जिला न्यायाधीश के न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।

दि आप को आशंका हो कि इन राशियों में से किसी राशि का भुगतान आप की माता जी या किसी अन्य व्यक्ति को किया जा सकता है और आप को प्राप्त नहीं होगा, तो वैसी स्थिति में आप दीवानी न्यायालय में स्थाई व्यादेश हेतु वाद प्रस्तुत कर अस्थाई व्यादेश (Injuction) प्राप्त कर सकते हैं। वैसी स्थिति में उक्त सभी राशियों का भुगतान केवल उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के आधार पर ही किया जा सकेगा।

हाँ तक पेंशन का प्रश्न है वह केवल आप की विमाता तथा अवयस्क पुत्र पुत्रियों को ही प्राप्त हो सकती है। यदि आप दोनों भाई वयस्क हो चुके हैं तो आप का पेंशन पर कोई अधिकार नहीं है।

नुकम्पा नियुक्ति कोई अधिकार नहीं है। इस का आधार यह है कि किसी कर्मचारी का अचानक देहान्त हो जाने पर उस का परिवार अचानक संकट में न आ जाए। फिर अनुकम्पा नियुक्ति केवल रिक्त पद के विरुद्ध ही प्रदान की जा सकती है। इस के लिए मृत शासकीय कर्मचारी के परिवार को यह तय करना होगा कि किस व्यक्ति को नियुक्ति दी जाए। इस के लिए परिवार के सभी वयस्क सदस्यों को अनापत्ति प्रकट करनी होगी। आप अनुकम्पा नियुक्ति तभी प्राप्त कर सकते हैं जब कि आप का भाई तथा आप की विमाता दोनों ऐसी नियुक्ति में आपत्ति न होने संबंधित घोषणा विभाग को लिख कर दें। इसी तरह आप की विमाता को भी यह नियुक्ति तभी प्राप्त हो सकती है जब कि आप दोनों भाई उस नें अनापत्ति प्रकट करें।  इस कारण आप तीनों को आपस में ही तय करना होगा कि किस व्यक्ति को नियुक्ति दी जाए। यदि अनापत्ति नहीं दी जाती है तो किसी भी व्यक्ति को अनुकम्पा नियुक्ति प्राप्त नहीं होगी। यदि आप नियुक्ति चाहते हैं तो आप अपने भाई व विमाता से किस तरह अनापत्ति प्राप्त कर सकते हैं उस का मार्ग आप को ही निकालना होगा।

अशक्तता के कारण सेवानिवृत्ति पर आश्रितों को नौकरी देने की सरकारों की नीति

अश्विनी अग्रवाल पूछ रहे हैं …..

मैं देवबंद (सहारनपुर) में रह रहा हूँ।  मैं सिविल अपील सं. 4210/ 2003 शिवामूर्ती बनाम आंध्र प्रदेश राज्य में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिनांक 12.08.2008 को दिए गए निर्णय के बारे में जानना चाहता हूँ, जिस की सूचना 15 अगस्त 2008 के अमर उजाला में प्रकाशित हुई है।  इस निर्णय के अनुसार यदि कोई सरकारी कर्मचारी शारीरिक रूप से कार्य करने में अक्षम हो जाए तो उस के किसी आश्रित को उस के स्थान पर नौकरी दी जा सकती है।
क्या यह पूरे देश में प्रभावी होगा? मुझे जल्दी इस निर्णय के नियमों और उपनियमों के बारे में बताएँ।

उत्तर – 

आप ने सर्वोच्च न्यायालय के जिस निर्णय का उल्लेख किया है वह अनुकंपा नियुक्ति के संबंध में है।  इस निर्णय की एक प्रमुख बात यह है कि इस में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति राज्य की नीति से सम्बद्ध मामला है और इस में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

मामला यह था कि आंध्रप्रदेश की सरकार ने 30 जुलाई,1980 के सरकारी आदेश से एक योजना लागू की गई थी जिस में चिकित्सकीय आधार पर अक्षम होने के आधार पर सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों के आश्रितों को अनकंपा नियुक्ति दिए जाने का प्रावधान था।   4 जुलाई  1985 तो सरकारी आदेश से इस योजना में यह संशोधन किया गया कि सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारी की वास्तविक सेवानिवृत्ति के पांच या अधिक वर्ष शेष हों तभी इस योजना का लाभ वह कर्मचारी उठा पाएगा।  9 जून 1998 को एक और सरकारी आदेश यह जारी हुआ कि इस योजना का अनुचित लाभ न उठाया जाए इस के लिए जब भी इस योजना के अंतर्गत सेवानिवृत्ति हेतु किसी कर्मचारी का आवेदन प्राप्त होगा तो उसे मेडीकल बोर्ड के समक्ष भेजा जाएगा।  मेडीकल बोर्ड द्वारा मामला उचित पाए जाने पर जिला स्तर की, और सचिवालय के कर्मचारियों के मामले में राज्य स्तर की समिति के पास अनुशंसा के लिए भेजा जाएगा जो मामलों की जांच करेगी और निश्चित मानदंडों के आधार पर अपनी सिफारिश देगी।  जिस के उपरांत ही राज्य सरकार निर्णय करेगी कि आवेदक कर्मचारी को इस योजना के अंतर्गत सेवा निवृत्ति की अनुमति प्रदान की जाए अथवा नहीं।  25 जून 1999 को एक सरकारी स्मरणपत्र जारी किया गया कि इस योजना के अंतर्गत मामले में सरकार द्वारा अनुमति दिए जाने की तिथि के उपरांत सेवा काल 5 वर्ष का शेष होना चाहिए, अर्थात वास्तविक सेवानिवृत्ति की तिथि में पाँच वर्ष शेष होने चाहिए।

इस मामले में जिन लोगों ने आवेदन किए थे उन्हों ने आवेदन की तिथि से पांच साल की सेवा अवधि शेष मानते हुए आवेदन किए थे और निर्णय की प्रक्रिया लंबी होने के कारण देरी हो गई थी और अवधि पांच वर्ष से कम रह गई जिस के कारण आवेदन इस योजना में स्वीकार योग्य न रह गया थे।  प्रभावित कर्मचारियों ने इस मामले में अधिकरण के समक्ष अपीलें प्रस्तुत की जो मंजूर कर ली गईं।   राज्य सरकार ने उच्च न्यायालय में रिटें प्रस्तुत की।  उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि इस मामले में पांच वर्ष की अवधि सेवानिवृत्ति की तिथि  से ही मानी जाएगी।  मामला उच्च न्यायालय गया और वहाँ यह कहते हुए कि यह राज्य का नीतिगत मामला है और इस में न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, निर्णय दिया कि पांच वर्ष की अवधि राज्य सरकार द्वारा सेवानिवृति को अनुमति देने की तिथि से देखी जाएगी।  निर्णय में यह भी उल्लेख है कि राज्य सरकार ने इस योजना को वापस ले लिया है। यदि राज्य सरकार चाहे तो इस योजना को पुनः लागू कर सकती है।

इस प्रकार यह निर्णय कोई भी लाभकारी प्रभाव कर्मचारियों के हित में नहीं रखता।  इस तरह की योजनाएँ यदि कहीं किसी रा
जकीय संस्थान में लागू हैं तो कर्मचारी को अपने संस्थान या विभाग में ही पता करना पड़ेगा कि उन के यहाँ यह योजना लागू है अथवा नहीं?  और इस योजना का लाभ उन्हें मिल सकता है या नहीं।  हाँ यदि किसी कर्मचारी के संस्थान या विभाग या राज्य में यह योजना लागू हो तो फिर उस योजना को सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय प्रभावित करेगा।

वैसे भी अनुकंपा नियुक्ति के मामले में सर्वोच्च न्यायालय का यह मानना है कि यह सरकार की अनुकंपा है न कि कर्मचारी का अधिकार। 
                                                                                                                                                                    

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