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लम्बी बीमारी पर श्रमिक के अवकाश

Esihospitalसमस्या-

संजय ने नोएडा, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मारी कम्पनी हमें साल में 15 अर्जित अवकाश, 10 आकस्मिक व 15 बीमारी अवकाश देती है। मेरे खाते में इस समय २४ बीमारी अवकाश हैं। मैं 1 महिने से बीमार हूँ क्या मुझे मेरे बीमारी अवकाश मिल जाएंगे। और इन अवकाशों के बारे में क्या नियम है हमें बताने का कष्ट करें।

समाधान-

प ने अपनी समस्या में यह नहीं बताया कि आप कंपनी के किस तरह के संस्थान में काम करते हैं, किसी कारखाने में या किसी अन्य प्रकार के उपक्रम में। यदि आप कारखाने में काम करते हैं तो आप को कारखाना अधिनियम के अन्तर्गत अवकाश प्राप्त होंगे। यदि आप किसी और संस्थान में काम करते हैं तो उसी के अनुरूप आप को अवकाश प्राप्त होंगे। जितने अवकाश आप ने बताए हैं वे ठीक ठीक लगते हैं। क्यों कि कुल मिला कर 40 अवकाश हो जाते हैं। वर्ष में 52 साप्ताहिक और 3 राष्ट्रीय अवकाश और होते हैं इस तरह कुल 95 दिन के अवकाश हो जाते हैं। सरकार के अतिरिक्त कोई भी नियोजक इस से अधिक अवकाश नहीं देगा।

दि आप के संस्थान में कर्मचारी बीमा योजना प्रभावी है तो आप की बीमारी ईएसआई अस्पताल द्वारा प्रमाणित होने और चिकित्सा अवकाश की सिफारिश होने पर आप को न केवल सभी अवकाश मिल जाएंगे बल्कि उस अवधि का आधा वेतन भी बीमा योजना से मिलेगा। लेकिन यदि आप के संस्थान में कर्मचारी बीमा योजना प्रभावी नहीं है या आप उस में कवर्ड नहीं हैं तो आप को चिकित्सक का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने पर केवल आप के खाते में अवशेष 24 बीमारी अवकाश ही मिलेंगे। शेष दिनों का आप का वेतन आप को नहीं मिलेगा। अर्थात वे सभी अवैतनिक अवकाश होंगे। बीमारी अधिक लम्बी होने पर नियोजक आप को लम्बी बीमारी के कारण आप की सेवाएँ भी समाप्त कर सकता है जो छंटनी की परिभाषा में नहीं आती हैं। अर्थात उसे इस सेवा समाप्ति के लिए कोई नोटिस या मुआवजा भी नहीं देना पड़ेगा। आप का सेवा काल यदि पाँच वर्ष का है तो आप केवल ग्रेच्युटी और आप के खाते में मौजूद भविष्य निधि राशि के ही अधिकारी रह जाएंगे।

अधिकांश सेल्स प्रमोशन कर्मचारियों को कानूनी सुरक्षा नहीं।

कानूनी सलाहसमस्या-

सुन्दर सिंह ने भिवानी हरियाणा से पूछा है-

मैं वर्तमान में एक निजि उत्पादक कंपनी में बावल (रेवाड़ी) में मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव के पद पर मार्च 2013 से नियोजित हूँ। नियोजक मुझे बिना कोई कारण बताए सेवा से हटाना चाहते हैं । मुझे कोई ऑफर लेटर, नियुक्ति पत्र आदि नहीं दिए गए थे। मेरा वेतन सीधे मेरे बैंक खाते में 15000 रुपए प्रतिमा जमा होता है। मुझे कोई वेतन वृद्धि नहीं दी गई है। नियोजक के पास मुझे सेवा से हटाने का कोई उचित कारण नहीं है। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

प एक कंपनी में मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव हैं। कुल मिला कर आप का काम कंपनी के विक्रय में वृद्धि करने के लिए काम करना है। औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 में आप को कर्मकार नहीं माना है। इस कारण से आप उस अधिनियम के लाभ नहीं ले सकते। 1976 में संसद ने सेल्स प्रमोशन एम्प्लाइज (कंडीशन्स ऑफ सर्विस) एक्ट बनाया था। जिस के द्वारा सेल्स प्रमोशन कर्मचारियों को औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 का लाभ प्रदान करने के प्रावधान बनाए गए। इस कानून को केवल मेडीकल सेल्स प्रमोशन कर्मचारियों पर ही लागू किया गया। इसे अन्य प्रकार के सेल्स प्रमोशन कर्मचारियों पर भी लागू किया जाना था। लेकिन 1980 के बाद देश में श्रमिक-कर्मचारी आंदोलन कमजोर हो गया। सरकार पर कोई दबाव नहीं रहा और यह कानून अन्य उद्योगों के कर्मचारियों पर लागू नहीं हो सका। यहाँ तक कि मेडीकल सेल्स कर्मचारियों को भी इस के लाभ जो मिलने थे वे नहीं मिले। फेडरेशन ऑफ मेडीकल एण्ड सेल्स रिप्रेजेण्टेटिव्ज एसोसिएशन्स ऑफ इंडिया (FMRAI) के आंदोलन की बदौलत दिनांक 31.01.2011 को केन्द्र सरकार ने एक नोटिफिकेशन जारी कर इस कानून को 1. सौन्दर्य प्रसाधन, साबुन, घरेलू क्लीनर्स व विसंक्रामक उद्योग, 2. रेडीमेड कपड़ा उद्योग,  3. सोफ्ट ड्रिंक उत्पादक उद्योग, 4. बिस्किट एवं कन्फेक्शनरी उद्योग, 5. आयुर्वेदिक, यूनानी एवंं होमियोपैथिक दवा उद्योग, 6. आटोमोबाइल व उस के पार्ट्स व एसेसरीज उत्पादक उद्योग, 7. सर्जिकल इक्विपमेंट्स, कृत्रिम अंग व डायग्नोस्टिक्स उद्योगों, 8. इलेक्ट्रोनिक्स, कम्प्यूटर्स, उन की एसेसरीज व स्पेयर पार्टस् के उत्पादक उद्योगों, 9. इलेक्ट्रिकल एप्लाएंसेज उद्योग व 10. पेन्ट्स व वेनिशेज उद्योगों पर प्रभावी बनाया गया है।

स तरह यदि आप उक्त उद्योगों में से किसी एक उद्योग में कार्यरत थे तो आप को कानूनी संरक्षा मिल सकती है और आप की यह सेवा समाप्ति अवैध छंटनी है और आप अपनी छंटनी के विरुद्ध श्रम विभाग को शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन यदि आप उक्त वर्णित उद्योगों  के अतिरिक्त किसी अन्य उद्योग में कार्यरत थे तो आप का नियोजन किसी प्रकार के कानून से संरक्षित नहीं है और सिर्फ नियोजक-कर्मचारी के बीच हुए अनुबंध पर आधारित है। जिस में बिना कारण सेवा से पृथक किए जाने पर सिर्फ क्षतियों की मांग की जा सकती है। वह भी तब जब कि वह अनुबंध में शामिल हो। आप के तथा नियोजक के बीच तो कोई अनुबंध भी नहीं है। इस कारण आप नियोजक से सिर्फ अपना काम किए गए दिनें का वेतन प्राप्त कर सकते हैं। पाँच वर्ष की सेवा पूर्ण न होने से ग्रेच्युटी का आप को अधिकार नहीं है, यदि किसी प्रोविडेण्ट फण्ड के लिए आप के वेतन से कटौती की गई हो तो अधिक से अधिक आप अपने फंड का धन प्राप्त कर सकते हैं। कानून से आप को कुछ भी मदद मिलने की संभावना नहीं है।

नियोजन में रहते हुए अतिरिक्त आय के लिए कोई भी अन्य कार्य नियोजक की लिखित अनुमति से ही करें।

समस्या-

गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश से अमित चौधरी ने पूछा है-

No employmentमैं बीए ऑनर्स हूं और मेरी उम्र लगभग 41 साल है। मैं एक निजी कंपनी में काम कररहा हूं। लेकिन मेरी तनख्वाह बेहद ही कम है। इतनी कम तनख्वाह में मुझेअपने बच्चों को पढाना लिखाना और पालन पोषण में काफी दिक्कत हो रही है। मैंचाहता हूं कि निजी कंपनी में काम करते हुए कुछ अलग भी करूं। जिसके लिएमैंने डीड राइटर्स (दस्तावेज़ लेखक) का लाइसेंस लिया है। निजी कंपनी मेंहमारी ड्यूटी शिफ्टों में चलती है। क्या मैं निजी कंपनी में काम करते हुएदस्तावेज़ लेखन का काम कर सकता हूं। कृपा कर हमारा मार्गदर्शन करें क्योंकिमैं घोर दुविधा में हूं।

समाधान-

यूँ तो अपनी कंपनी के कार्य समय के पश्चात आप को काम करने में किसी तरह की कोई बाधा नहीं है और इस से कंपनी के काम पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता। पर कंपनी में आप का नियोजन कुछ शर्तों के अन्तर्गत होता है। सब से पहले आप को देखना चाहिए कि आप के नियुक्ति पत्र की शर्तों तथा कंपनी के सेवा नियमों में इस तरह का कोई प्रावधान तो नहीं है जो आप को कंपनी के काम के अतिरिक्त अन्य काम करने से प्रतिबंधित करता हो। इस के अलावा कंपनी के नियोजन में रहते हुए आप ऐसा कोई भी कार्य नहीं कर सकते जो कंपनी के काम में बाधा उत्पन्न करता हो। किसी प्रकार की कोई बाधा न होते हुए भी यदि किसी दिन नियोजक चाहे तो इस आधार पर कि आप कंपनी के कार्य पर ध्यान नहीं देते और आप ने लायसेंस ले कर अपना खुद का प्रोफेशन आरंभ कर दिया है आप को सेवा से पृथक कर सकता है और आप के ग्रेच्यूटी, छंटनी का मुआवजा आदि लाभों को देने से इन्कार कर सकता है। इस कारण यदि आप ये कार्य प्रारंभ करना चाहते हैं तो सब से सुरक्षित रीति यही है कि आप अपने नियोजक से डीड रायटर का कार्य आरंभ करने के पहले उस से लिखित में अनुमति प्राप्त कर लें।

स के अलावा आप को यह भी पता करना चाहिए कि डीड रायटर का जो लायसेंस आप को प्राप्त हुआ है उस लायसेंस की ऐसी तो कोई शर्त नहीं है जिस में यह कहा हो कि आप डीड रायटर का काम करते हुए किसी अन्य व्यक्ति के नियोजन में नहीं रह सकते। यदि ऐसी कोई शर्त है तो कोई भी व्यक्ति जो आप से ईर्ष्या रखता है या फिर जिस के प्रोफेशन पर आप के काम कारण फर्क पड़ रहा वह आप की शिकायत कर के आप के लायसेंस को रद्द कराने का प्रयत्न कर सकता है। इन बातों का ध्यान रखते हुए आप डीड रायटर का कार्य आरंभ कर सकते हैं।

केंटोनमेंट बोर्ड एक स्थानीय निकाय और उद्योग है।

समस्या-

प्रशान्त चौहान, ने महू, जिला इन्दौर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मैं केन्टोंमेंट बोर्ड, महू केंट में विगत १९९९ से कनिष्ठ लिपिक पद पर कार्यरत हूँ।  विगत वर्ष नवम्बर २०११ में मेरी हर्निया सर्जरी केंद्रीय चिकित्सा परिचर्या नियम अंतर्गत पालन करते हुए सम्पादित की गई थी।   जिसका वास्तविक चिकित्सा व्यय लगभग १९५००/- के भुगतान हेतु मैं ने  निर्धारित चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा प्रपत्र में योग्य संलग्नको के साथ विगत फरवरी २०१२ को कार्यालय में जमा कराया।  महीनों तक कोई कार्यवाही न होने पर मैं ने इस दौरान स्मरण पत्र भी कार्यालय को दिए।  एक दिन अचानक विगत सितम्बर २०१२ में कार्यालय द्वारा मेरा दावा तकनीकी कारण दर्शाते हुए निरस्त कर दिया गया।  मैं ने उक्त निरस्त दावे की अपील हमारे वरिष्ठ कार्यालय मध्य कमान, लखनऊ को विगत माह अक्तूबर २०१२ में प्रेषित कर दी। वहां से तत्काल मेरे प्रकरण में अपील का बिन्दुवार प्रतिउत्तर प्रेषित किये जाने हेतु महू कार्यालय को पत्र माय अपील भेजा गया। किन्तु कार्यालय द्वारा आज दिनांक तक उसका प्रतिउत्तर वरिष्ठ कार्यालय, लखनऊ को प्रेषित नहीं किया गया है।  इस सम्बन्ध में मेरे प्रकरण हेतु मैने माह दिसंबर में वरिष्ठ कार्यालय, लखनऊ को स्मरण पत्र भी प्रेषित किया है।

ब मैं यह विधिक सलाह चाहता हूँ कि आगामी पंद्रह दिन और मैं वरिष्ठ कार्यालय की कार्यवाही या मुझे सम्बंधित सुचना प्राप्ति का इंतज़ार कर लेता हूँ, तत्पश्चात सक्षम न्यायलय में परिवाद दायर करता हूँ। कृपया सलाह देवें की क्या मैं उपभोक्ता फोरम, इंदौर में अपने चिकित्सा दावा व्यय क्षतिपूर्ति के सम्बन्ध में वाद दायर कर सकता हूँ?  या यह प्रकरण कर्मचारी-नियोक्ता से सम्बंधित होने के कारण वहां दायर नहीं किया जा सकता है?  अतः इस हेतु किस सक्षम न्यायलय में वाद दायर किया जाना उचित होगा जहाँ न्यूनतम व्यय में त्वरित न्याय प्राप्ति हो सके।  चूँकि मैं एक नौकरीपेशा कर्मचारी हूँ अतः यह बात ध्यान में रखते हुए कृपया उक्त विधिक सलाह प्रदान करें।

समाधान-

malicious prosecutionकेंटोनमेंट बोर्ड, एक तरह का स्थानीय निकाय है जो नगर निगम, ग्राम पंचायत आदि की तरह है। इस बोर्ड का भी उसी तरह एक प्रशानिक क्षेत्र होता है, जिस पर सेना का नियंत्रण रहता है। औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 की धारा 2 की उपधारा (ए) में इस के लिए केन्द्र सरकार को समुचित सरकार बताया गया है। इस से यह स्पष्ट है कि यह औद्योगिक विवाद अधिनियम में परिभाषित उद्योग की श्रेणी में भी है। यदि इस अधिनियम में आप कर्मकार के रूप में परिभाषित हैं तो आप के संबंध में औद्योगिक विवाद उठाया जा सकता है।

द्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 की उपधारा (के) में ओद्योगिक विवाद को परिभाषित किया गया है। इस के अनुसार नियोजको और कर्मचारियों के मध्य नियोजन, अनियोजन, कर्मचारियों की नियोजन की स्थितियों व शर्तों के संबंध में कोई भी विवाद या मतभेद औद्योगिक विवाद है। लेकिन एक कर्मचारी द्वारा उस के किसी मामले में उठाया गया विवाद औद्योगिक विवाद नहीं हो सकता। वह ओद्योगिक विवाद का रूप उसी स्थिति में धारण करता है जब कि उसे कर्मचारियों के किसी समूह या उन की ट्रेड यूनियन द्वारा समर्थित हो। लेकिन धारा 2-ए में किसी कर्मकार और उस के नियोजक के मध्य, सेवाच्युति, सेवासमाप्ति, छँटनी और सेवाअवसान के विवाद को किसी कर्मचारी अथवा ट्रेड युनियन के समर्थन के बिना भी औद्योगिक विवाद माना गया है।  जिस का अर्थ यही है कि अकेला कर्मचारी केवल उस की सेवाच्युति, सेवासमाप्ति, छँटनी और सेवाअवसान के विवाद को तो समाधान के लिए औद्योगिक विवाद के रूप में प्रस्तुत कर सकता है किन्तु उस के अन्य विवाद इस अधिनियम में औद्योगिक विवाद के रूप में बिना कर्मचारियो के समूह या यूनियन के समर्थन के बिना औद्योगिक विवाद नहीं होंगे जिस से उन्हें व्यक्तिगत रूप से उठाने का कर्मचारी को कोई अधिकार नहीं है।

प का विवाद आप के चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के निरस्त होने से संबंधित है। यदि इसे किसी कर्मकार समूह या यूनियन का समर्थन प्राप्त नहीं है तो यह भी एक औद्योगिक विवाद नहीं है और आप इसे अधिकार के रूप में समाधान हेतु औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत स्थापित समझौता कार्यवाही के लिए प्रस्तुत नहीं कर सकते और इस का समाधान औद्योगिक विवाद अधिनियम के अंतर्गत स्थापित प्रक्रिया से नहीं हो सकता। यदि आप के मामले को किसी यूनियन या कर्मकारों के समूह का समर्थन प्राप्त नहीं है तो आप इस मामले में औद्योगिक विवाद प्रस्तुत नहीं कर सकते।

किन्तु केंटोनमेंट बोर्ड के कर्मचारियों की सेवाएँ और सेवा शर्तें वैधानिक नियमों से शासित होती हैं। जिस के कारण उन के अंतर्गत उत्पन्न अधिकारों या उन नियमों के उल्लंघन से अधिकारों में कमी होने के मामले दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत किए जा सकते हैं। आप के मामले में आप दीवानी वाद प्रस्तुत कर उक्त चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के नियम विरुद्ध निरस्त किए जाने की घोषणा और चिकित्सा क्षतिपूर्ति दावा के अनुरूप राशि दिलाने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। दीवानी न्यायालय आप को राहत प्रदान कर सकता है। इस के साथ ही आप इस मामले में केंटोनमेंट बोर्ड के राज्य के रूप में परिभाषित होने के कारण रिट याचिका भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

न दोनों ही उपायों के लिए आप को किसी वकील की मदद लेनी पड़ेगी जिस में कुछ तो खर्च होगा ही क्यों कि जो वकील मुकदमा लड़ेगा अपनी फीस तो लेगा ही। जहाँ तक शीघ्र न्याय का प्रश्न है तो भारत में ऐसे न्यायालय उंगलियों पर गिने जा सकते हैं जिन के पास उस की क्षमता से पाँच से दस गुना मुकदमे न हों।  उच्च न्यायालयों में तो मुकदमों का अंबार है। दीवानी न्यायालयों के पास भी काम की कमी नहीं है। इस कारण आप के मुकदमें के निर्णय में कितना समय लगेगा यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

भिन्न दिनों वाले महिनों में मासिक वेतन क्या होगा?

समस्या-

गंगानगर, राजस्थान से बलविन्दर ने पूछा है-

मैं एक एनजीओ में कंप्यूटर ऑपरेटर हूँ। कृपया बताएँ कि 30 दिन और 31 दिन के माह में वेतन किस प्रकार प्राप्त होगा?

समाधान-

किसी भी कर्मचारी का वेतन उस के नियुक्ति संविदा (नियुक्ति पत्र) से या फिर संस्थान में प्रभावी सेवा नियमों से निर्धारित होता है।  यदि नियुक्ति पत्र में किसी कर्मचारी को मासिक दर से वेतन देना निर्धारित किया गया है तो उसे मासिक वेतन प्रतिमाह प्राप्त होगा, चाहे वह माह 28, 29, 30 या 31 दिनों का क्यों न हो। यदि माह में किसी दिन की अनुपस्थिति हो तो एक दिन का वेतन काटे जाने की स्थिति में उस माह में जितने दिन होंगे उतने दिनों से मासिक वेतन को विभाजित कर के एक दिन का वेतन काटा जाएगा।

लेकिन यदि नियुक्ति पत्र में वेतन दैनिक वेतन दर से निर्धारित किया गया है तो फिर महिने में जितने दिन काम किया होगा उतने दिन का वेतन कर्मचारी को दिया जाएगा। उदाहरणार्थ यदि किसी कर्मचारी का वेतन 150 रुपए प्रतिदिन है और वह नवम्बर 2012 माह में चार रविवार के दिन अवकाश पर रहा है तो उसे 26 दिनों का वेतन 3900 रुपए प्राप्त होंगे।  यदि कोई कर्मचारी इस माह में दो दिन अनुपस्थित रहा है तो उसे 24 दिनों का वेतन 3600 रुपए प्राप्त होगा।

वेतन की दर मासिक 6000 होने पर चार रविवार साप्ताहिक अवकाश होने पर कर्मचारी को वेतन 6000 रुपए ही प्राप्त होगा।  यदि कर्मचारी दो दिन अनुपस्थित रहता है तो उस का दो दिन का वेतन 6000 रुपए को 30 दिनों से विभाजित कर के एक दिन का वेतन 200 रुपए आएगा और उस के वेतन से 400 रुपए काट लिए जाएंगे, कर्मचारी को केवल 5600 रुपए प्राप्त होंगे।  लेकिन यदि यही कर्मचारी अक्टूबर 2012 के माह में दो दिन अनुपस्थित रहता तो उस के वेतन को 31 से विभाजित कर के एक दिन का वेतन निकाला जाता जो कि 193.55 रुपए आता और उस के वेतन से दो दिनों की अनुपस्थिति के लिए 387.10 रुपए ही काटे जाते।  लेकिन यदि माह 28 दिन का ही होता तो दो दिन की अनुपस्थिति के लिए उस के वेतन से 428.60 रुपए काट लिए जाते।

स्वयं की आवश्यकता होने पर ही त्याग पत्र दें, नियोजक के कहने पर नहीं

 अनूप अकुलवार ने पूछा है –
मैं एक निजि फर्म में पिछले 12 वर्ष से नौकरी कर रहा हूँ। अब किसी बात को ले कर नए साहब मुझे नौकरी छोड़ने को कह रहे हैं। मुझे क्या करना चाहिए?
 उत्तर –
अनूप जी,
प 12 वर्ष से नौकरी कर रहे हैं। 12 वर्षों की नौकरी के कारण आप के अनेक अधिकार स्थापित हो चुके हैं। जैसे आप ग्रेच्युटी के हकदार हैं। यदि नियोजक द्वारा आप को सेवा से पृथक किया जाता है तो उसे कोई उचित कारण बताना पड़ेगा। इस के अतिरिक्त उसे नोटिस की अवधि का वेतन और सेवाकाल का मुआवजा भी देना पड़ेगा।  इस के अतिरिक्त अन्य लाभ भी हो सकते हैं जिन्हें प्राप्त करने के आप अधिकारी हो चुके होंगे। सब से बड़ी बात तो यह है कि इन 12 वर्षों में आप एक अच्छा वेतन प्राप्त कर रहे होंगे। 
प्रत्येक नियोजक यह चाहता है कि उसे अपने कर्मचारी को कम से कम वेतन देना पड़े। लेकिन पुराने कर्मचारी का वेतन अधिक होता है। जैसे जैसे उस का वेतन बढ़ता जाता है नियोजक यह सोचने लगता है कि यदि पुराने कर्मचारी को निकाल कर नया कर्मचारी रख लिया जाए तो वही कार्य आधी कीमत पर करवाया जा सकता है। इस कारण से वह किसी भी रीति से पुराने कर्मचारी को सेवा से निकालना चाहता है। लेकिन एक तो यह किसी कर्मचारी को सेवा से हटाने का उचित कारण नहीं है दूसरे वह कर्मचारी को देय लाभ भी उसे नहीं देना चाहता। इस कारण से वह किसी न किसी बहाने कर्मचारी पर मानसिक दबाव उत्पन्न करता है कि वह स्वयं नौकरी छोड़ दे। होता यह है कि कर्मचारी की सेवा तो नियोजक समाप्त करना चाहता है लेकिन रिकॉर्ड यह बनाना चाहता है कि स्वयं कर्मचारी ने सेवा त्याग दी हो।
त्याग-पत्र प्राप्त करने के पूर्व नियोजक इस तरह के प्रलोभन भी कर्मचारी को देता है कि उसे प्राप्त होने वाले समस्त लाभ उसे तुरंत दे दिए जाएंगे। यहाँ तक कि उसे अतिरिक्त लाभ भी देने की बात की जाती है। लेकिन त्याग-पत्र देते ही इन लाभों से इन्कार कर दिया जाता है। कानूनी रूप से त्याग पत्र देने वाले कर्मचारी को जो लाभ प्राप्त होते हैं उस से अधिक लाभ उन कर्मचारियों को प्राप्त होते हैं जिन्हें स्वयं नियोजक किसी कारणवश सेवा से हटाता है। इस तरह त्याग पत्र प्राप्त कर नियोजक कर्मचारी को अनेक लाभ प्रदान करने से बच जाता है। यदि कोई कर्मचारी स्वयं त्याग पत्र देता है तो फिर वह उस की सेवा समाप्ति को कानून के समक्ष चुनौती भी नहीं दे सकता। लेकिन यदि नियोजक उस की सेवाएँ समाप्त करता है और ऐसी सेवा समाप्ति में कोई अवैधानिकता है तो कर्मचारी उसे प्रदान किए गए लाभों को प्राप्त करने के बाद भी उस सेवा समाप्ति को कानून के समक्ष चुनौती दे सकता है।

मेरी स्पष्ट राय यह है कि यदि आप स्वयं ही किसी उद्देश्य से सेवा छोड़ना चाहते हों तब ही आप त

ठेकेदार का कर्मचारी कानून के माध्यम से कंपनी का स्थाई कर्मचारी नहीं हो सकता

 देवेन्द्र कर्मा पूछते हैं –

मैं दस वर्षों से कॉन्ट्रेक्टर के द्वारा कंपनी में नौकरी कर रहा हूँ, परन्तु अभी तक स्थाई नहीं किया गया है। क्या मैं कानून की मदद से अपनी नौकरी स्थाई करवा सकता हूँ? कृपया मेरी मदद कीजिए।

 उत्तर – 

देवेन्द्र जी,

र कंपनी यह चाहती है कि उस के उद्योग के लिए जितने कर्मचारियों को नियोजित किया जाना है उन में से अधिक से अधिक कर्मचारी ठेकेदारों के माध्यम से नियोजित किए जाएँ। इस तरह से वे कर्मचारियों के प्रति बहुत सी कानूनी जिम्मेदारियों से बच जाते हैं। उन के लिए यह आर्थिक रूप से भी बहुत लाभकारी होता है। क्यों कि ठेकेदार के कर्मचारियों को बहुत कम वेतन पर काम पर रखा जा सकता है। यदि ठेकेदार के कर्मचारी अपनी सेवा शर्तों में सुधार और वेतन वृद्धि के लिए कोई मांग रखें तो उस से आसानी से इन्कार किया जा सकता है। उन्हें कर्मचारियों को नौकरी से हटाने की भी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। वे ठेकेदार का ठेका समाप्त कर देते हैं। उसी ठेकेदार को किसी अन्य नाम से नया ठेका आवंटित कर नए लोगों को नौकरी दे देते हैं। इस तरह कंपनियों ने श्रमिकों को संगठित हो कर अपनी सेवाशर्तों के लिए सौदेबाजी करने का जो अधिकार कानून से प्राप्त हुआ है उस का तोड़ निकाल लिया है।
ठेकेदार कंपनी का कर्मचारी न हो कर ठेकेदार का कर्मचारी होता है। इस कारण से वह कंपनी के विरुद्ध किसी तरह की कोई कार्यवाही नहीं कर सकता है। वह कंपनी में स्थाई होने की मांग भी नहीं कर सकता है। कानून में भी ऐसा कोई मार्ग नहीं है कि कोई ठेकेदार का कर्मचारी अदालत के माध्यम से कंपनी में स्थाई होने के लिए कोई मांग कर सके और उसे मनवा सके। 
वैसे भारत में एक कानून बना हुआ है, जिस का नाम ठेकेदार श्रमिक (उन्मूलन) अधिनियम 1970 है। इस के अंतर्गत यह प्रावधान बना हुआ है कि यदि उचित सरकार चाहे तो वह किसी भी उद्योग के किसी भी प्रोसेस में ठेकेदार द्वारा श्रमिक नियोजित किए जाने को प्रतिबंधित कर सकती है। लेकिन सरकार को इस में कोई रुचि नहीं है, स्वयं सरकारी संस्थान इन दिनों सारे काम ठेकेदार श्रमिकों से करवाने लगे हैं। ट्रेड यूनियन आंदोलन इतना बिखरा हुआ है कि इस ओर कोई ध्यान ही नहीं देता कि उद्योगों में ठेकेदार द्वारा श्रमिकों को नियोजित करने पर पाबंदी लगाने के लिए सरकार के समक्ष कार्यवाही करे। इस का नतीजा यह है कि अधिकांश उद्योगों में सभी प्रकार के कामों के लिए ठेकेदार के श्रमिक नियोजित किये जा सकते हैं। इस कानून का उपयोग श्रमिकों के लाभ के लिए होने के स्थान पर शतप्रतिशत श्रमिकों के विरुद्ध होता है।
कुछ वर्ष पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय अवश्य यह दिया है कि फैक्ट्री के केंटीन में काम करने वाले कर्मचारियों को चाहे वे ठेकेदार द्वारा नियोजित किए गए हों कंपनी का ही कर्मचारी माना जाएगा। क्यों कि किसी भी फैक्ट्री में केंटीन चलाना फेक्ट्री के मालिक का कानूनी दायित्व है। इस निर्णय के उपरांत जिन केंटीन कर्मचारियों ने कानून के अंतर्गत आवश्यक कार्यवाही की उन्हें कंपनी के कर्मचारी मान लिया गया है।&n
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कुछ ऐसे मामलों में जिन में कंपनी ने कुछ ऐसे कर्मचारियों को नियोजित किया है जिन का सुपरविजन सीधे कंपनी के हाथों में है, जो अपने द्वारा किए गए कार्यों के लिए कंपनी के प्रति जिम्मेदार हैं और सीधे कंपनी को रिपोर्ट करते हैं, जिन के काम की सूची कंपनी बनाती है। जो प्रकृति से कंपनी के ही कर्मचारी हैं और ठेकेदार केवल नाम का व छाया मात्र है। न्यायालयों ने यह माना है कि वे कंपनी के ही कर्मचारी हैं और उन्हें कंपनी के कर्मचारी का अधिकार दिलाया है। 
स के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है जिस से एक ठेकेदार का कर्मचारी कंपनी में स्थाई हो सके। यदि आप समझते हैं आप इन में से किसी श्रेणी के कर्मचारी हैं तो आप अपने नजदीक के किसी ऐसे वकील से मिलें जो लंबे समय से श्रम कानून की प्रेक्टिस कर रहा है। वह आप की पूरी बात जान कर आप को बता सकता है कि आप को कानूनी मदद मिल सकती है अथवा नहीं। वैसे सामान्य उत्तर यह है कि ठेकेदार का कर्मचारी सदैव ही ठेकेदार का कर्मचारी ही रहेगा, कंपनी का कर्मचारी नहीं हो सकता। यह दूसरी बात है कि कंपनी को नए कर्मचारियों की भर्ती करनी हो और वह ठेकेदार के कर्मचारियों में से कुछ लोगों की भरती कर ले। लेकिन तब कंपनी में उस की नौकरी एकदम नई होगी और उसे ठेकेदार की नौकरी छोड़नी पड़ेगी, वह ठेकेदार के यहाँ लंबे सेवा काल के लाभों से वंचित हो जाएगा।

स्थानापन्न पद पर काम करने पर भी नए वेतनमान में वेतन निर्धारण मूल पद पर ही होगा।

 विजय प्रभाकर ने पूछा है –

रकारी कंपनी बीएसएनएल के दूसरे वेतन संशोधन के अनुसार राजभाषा अधिकारियों के वेतन निर्धारण में कटौती की गई है। हम 2000 से ऑफिशिएटिंग कर रहे थे। वेतन निर्धारण 2007 से लागू हुआ। लेकिन ऑफिशिएटिंग कालावधि  के वेतनमान को हटाकर हमारे मूल केडर हिंदी अनुवादक के वेतन पर फिटमेंट नियम लागू किया गया। हम 2008 में कंपनी की परीक्षा पास करके स्थायी हुए है। क्या ऑफिशिएटिंग कालावधि के वेतन को नजर अंदाज किया जाता सकता है ?

 उत्तर –

विजय जी,
ब भी किसी सेवा में कोई पद रिक्त होता है तो उस पद का भार उस से कनिष्ठ श्रेणी में कार्यरत किसी कर्मचारी को उस पर स्थानापन्न रुप से काम करने की जिम्मेदारी दी जाती है। इस का यह अर्थ नहीं है कि उस व्यक्ति की पदोन्नति कर दी गई है। यह एक कामचलाऊ प्रबंध होता है। स्थानापन्न रूप से काम की जिम्मेदारी संभाल रहा व्यक्ति अपनी श्रेणी में सब से वरिष्ठ हो यह भी कोई आवश्यक नहीं है। जब वह स्थानापन्न रूप से काम कर रहा होता है तो वह स्थानापन्न  भत्ता प्राप्त करता है। निश्चित रूप से उसे उस श्रेणी का वेतन मिलना भी चाहिए जिस का वह काम करता है। लेकिन इस से सेवा में उस की प्रास्थिति पर कोई अंतर नहीं आता है। जब भी स्थानापन्न पद के लिए कोई व्यक्ति उपलब्ध हो जाता है तो स्थानापन्न रूप से काम करने वाले व्यक्ति को उस की मूल प्रास्थिति में भेज दिया जाता है। ऐसी स्थिति में वह अपने मूल पद का वेतन प्राप्त करने लगता है।

भी ऐसा भी हो सकता है कि जिस पद पर किसी व्यक्ति ने स्थानापन्न रूप से काम किया है, उस पद के लिए भर्ती की नियमानुसार प्रक्रिया अपनाए जाने पर वही व्यक्ति योग्य पाया जाता है। वैसी स्थिति में उसे ही पदोन्नत कर उस पद पर स्थाई रूप से पदस्थापित कर दिया जाता है। लेकिन वैसी स्थिति में उन्नत पद पर आने की तिथि से ही उस का फिटमेंट किया जाएगा। यही उचित भी है।
दि इस बीच वेतनमानों में किसी प्रकार का कोई संशोधन होता है, तो जिस तिथि से वेतनमान प्रभावी हुए हैं उस तिथि को जहाँ कर्मचारी की प्रास्थिति होगी वहीं उस का वेतन निर्धारण भी होगा। यदि वेतनमान प्रभावी होने के समय कोई व्यक्ति स्थानापन्न रूप से काम कर रहा है तो उस का वेतन निर्धारण उस की मूल श्रेणी में होगा, न कि जहाँ वह स्थानापन्न रूप से काम कर रहा है। लेकिन उसे स्थानापन्न भत्ता मिलता रहेगा, जो नए वेतनमान लागू होने के कारण उस तिथि से संशोधित भी हो जाएगा। यदि वह कर्मचारी पद पर बाद में पदोन्नत हो जाता है तो उसे पदोन्नति की तिथि से ही उस पद पर वेतन निर्धारण होगा। मेरी समझ में आप की स्थिति यही है। आप को जो कुछ दिया गया है वह नियमानुसार ही दिया गया है।

बैंकों की उपभोक्ताओं के प्रति जिम्मेदारी और सूचना का अधिकार अधिनियम

 रोमी ने पूछा है – – – 
क्या बैंक की आम लोगों के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं होती  है? मैं जब भी बैंक जाता हूँ वहाँ के लोग हमेशा हम से गलत और गंदा व्यवहार करते हैं। क्या बैंक के कर्मचारियों के लिए भी कोई कानून होते हैं? क्या बैंक में सूचना अधिकार नियम लागू होता है अगर हाँ तो किस हद तक?
 उत्तर – – –
रोमी भाई!
बैंक की आम लोगों के प्रति जिम्मेदारी की तो मैं बात नहीं करूंगा। क्यों कि किसी बैंक की राह चलते व्यक्ति या ऐसा व्यक्ति जो कभी बैंक गया ही नहीं उस के प्रति क्या जिम्मेदारी हो सकती है। मुझे लगता है कि आप यह जानना चाहते हैं कि बैंक की उस के उपभोक्ताओं के प्रति क्या जिम्मेदारी होती है? यदि आप का प्रश्न यही है तो उस का उत्तर भी यही है कि एक सेवा प्रदाता की जो जो जिम्मेदारियाँ हो सकती हैं वे सब एक बैंक की भी होती हैं। जिन में यह भी सम्मिलित है कि बैंक के कर्मचारियों को उन से सद्व्यवहार करना चाहिए। उन से जो जानकारी मांगी जाए वह उन्हें देना चाहिए। यदि कर्मचारी गलत और गंदा व्यवहार करते हैं तो यह सेवा में गंभीर त्रुटि है और कर्मचारी के लिए एक गंभीर दुराचरण भी है। आप इस तरह के व्यवहार की शिकायत बैंक के उच्चाधिकारियों को कर सकते हैं। आप की शिकायत के आधार पर संबंधित कर्मचारी के विरुद्ध अवश्य ही अनुशासनिक कार्यवाही की जाएगी। यदि आप को इस व्यवहार से कोई शारीरिक या मानसिक या दोनों तरह का संताप हुआ हो तो आप जिला उपभोक्ता समस्या निवारण मंच को शिकायत कर समुचित हर्जाने की मांग कर सकते हैं। 
मस्या यह है कि हम गंदे और गलत व्यवहार का उत्तर गाली-गलौच से देते हैं और हमारा जो अहम् आहत होता है उस की तुष्टि हो जाती है। हम दयावान भी बहुत हैं सोचते हैं कि गाली दे कर हमने उसे दंडित कर ही दिया है, बेचारे की नौकरी में क्यूँ पंगा किया जाए। लेकिन कर्मचारी को इस से कोई सबक नहीं मिलता। उस ने अनुशासनहीनता की है तो निश्चित ही उसे अनुशासनिक कार्यवाही के लिए तैयार रहना चाहिए। लेकिन जब शिकायत ही नहीं होती है तो अनुशासनिक कार्यवाही कहाँ होगी? कोई शिकायत करता भी है और उस पर अनुशासनिक कार्यवाही होती भी है तो संबंधित कर्मचारी उस के पैर जा पकड़ता है। अनेक लोगों से आप पर सिफारिशें पहुँचाता है। अपने बाल-बच्चों पर रहम की भीख मांगता है। आप फिर द्रवित हो उठते हैं। आप या तो अनुशासनिक कार्यवाही में बयान देने नहीं जाते, या फिर उस के बहुत पहले ही अनुशासनिक अधिकारी को लिख देते हैं कि उन के बीच गलतफहमी हो गयी थी जिस के कारण आप ने शिकायत कर दी। अब गलतफहमी दूर हो गई है इस लिए आप कोई कार्यवाही नहीं चाहते। 
ब आप ही बताइए कि इन हालातों में कैसे कर्मचारियों को अनुशासन में रखा जा सकता है। इस के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जनता में जागरूकता होनी चाहिए कि व

नियमित कर्मचारी और दैनिक वेतन भोगी का वेतन समान नहीं हो सकता

धर्मेन्द्र कुमार प्रजापति पूछते हैं–
क्या यह उचित है कि किसी विश्वविद्यालय में संविदा-कर्मी और एजेंसी-कर्मी के मानदेय (वेतन) में अंतर हो सकता है। या यदि ऐजेंसी का मालिक कम भुगतान देता हो तो उस के लिए हम क्या करें? दोनो प्रश्नों के लिए उचित सलाह देने का कष्ट करें। 
उत्तर–
धर्मेंन्द्र भाई!
चित तो यह है कि विश्वविद्यालय अथवा किसी भी संस्थान में समान काम के लिए समान ही वेतन मिलना चाहिए। हाँ यदि सेवा की अवधि में या शिक्षा के स्तर में या कुशलता में किसी तरह का अंतर हो तो वेतन उस के अनुसार कुछ कम या अधिक हो सकता है। लेकिन कानूनी स्थिति इस के विपरीत है। 
रियाणा राज्य बनाम चरणजीत सिंह एवं अन्य के प्रकरण में  न्यायमूर्ति एस.एन. वरियावा, डॉ. ए.आर. लक्षमणन और एस.एच कापड़िया की सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने दिनांक  05.10.2005 को यह निर्णय  (2006 ए.आई.आर. सुप्रीम कोर्ट 106) दिया है कि नियमित रूप से चयन प्रक्रिया द्वारा चुने गए कर्मचारी और एक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी जो कि ठेकेदार के माध्यम से नियोजित किया जाता है का वेतन समान नहीं हो सकता है। क्यों कि शिक्षा, अनुभव और कुशलता आदि अनेक कारक ऐसे हैं जिस के कारण उन के वेतनों में अंतर हो सकता है।
र्मचारियों की ओर से सुप्रीमकोर्ट के समक्ष यह तर्क दिया गया था कि ठेकेदार के माध्यम से कर्मचारी इसीलिए नियोजित किए जाते हैं कि उन्हें कम वेतन दिया जा सके और वे स्थायीकरण के अधिकारी न हो जाएँ. अन्यथा उन का चयन भी मुख्य नियोजक उसी तरह करता है जैसे चयन समिति करती है। इस पर सुप्रीमकोर्ट ने कहा कि यह बात आप की याचिका में नहीं है। याचिका को अच्छी तरह लिखी हुई न मानते हुए सु्प्रीम कोर्ट ने मामले को वापस उच्चन्यायालय को प्रेषित कर दिया कि वह याचिका कर्ता कर्मचारियों को अपनी याचिका को संशोधित करने का अवसर दे और मेरिट पर निर्णय दे। 
स तरह यदि समान वेतन के लिए उक्त तीनों कारकों पर कर्मचारी एक जैसे हों तो समान वेतन के लिए उच्च न्यायालय के समक्ष याचिका दायर की जा सकती है। 
प के लिए मेरी राय यह है कि आप अपने तथ्यों को ले कर आप के उच्चन्यायालय के किसी ऐसे वकील से परामर्श करें जिस का सेवा संबंधी मामले करने का अनुभव रहा हो। उस के परामर्श के उपरांत यदि वह आप को राय दे कि आप को याचिका प्रस्तुत करनी चाहिए तो आप पहले अपने नियोजक और विश्वविद्यालय को नोटिस दें और अवधि समाप्त होने के उपरांत रिट याचिका दाखिल करें।
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