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लक्षणों से लगता है कि मालिक उद्योग को बन्द करने की तैयारी कर रहे हैं।

rp_industry-300x157.jpgसमस्या-

टीकमसिंह ने चौपासनी स्कूल, जोधपुर से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं “मेक शॉट ब्लास्टिंग इक्विपमेंट प्राईवेट लिमिटेड” में काम करता हूँ। यह 30 साल पुरानी प्राइवेट लिमिटेड़ कंपनी है यहाँ पर PF, ESI की सुविधा भी है। यहाँ पर 200 से 250 वर्कर्स हैं जो परमानेंट कर्मचारी हैं। मैं भी उन में से एक हूँ। पहले हमे इनसेंटिव मिलता था जो इन लोगो ने बंद कर दिया और दिपावली का बोनस भी 10,000 से ज्यादा सेलेरी वालों को यह कहते हुए नहीं देते कि यह सरकार का नियम है। जब कि पहले 20% देते थे। इस के अलावा ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधा भी बंद कर दी गई और पिछले साल जुलाई 2014 से महिने की सैलेरी भी समय पर नहीं मिल रही है। इस से पहले सैलेरी 07 तारिख से पहले मिल जाती थी। फिर 07 से 08, 10, 12, 14, 16, 18 और अब 20 से 25 तारिख को मिलती है। ओवर टाईम भी यहा पर रोज 3, 4 घंटे होता है उस का भुगतान पहले ड़बल किया जाता था अब सिंगल देते हैं, वो भी 1, 1 1/2 महिना चढ़ा कर। कंपनी साफ सफाई का भी ध्यान नहीं रखती। बाथरूम व पीने के पानी की जगह इतनी गंदगी है कि नाक पर रूमाल लगा कर जाना पड़ता है। इस के बारे में जीएम, मैनेजर, व कंपनी मालिक से भी बात कर चुके हैं लेकिन समस्याओ का कोई समाधान नहीं हुआ। यहाँ पर फैब्रिकेशन का काम है बड़ी बड़ी मशीनें बनती हैं। हमारा काम बहुत ही मेहनत का है। मेन्टीनेंस का काम भी समय पर नहीं करवाते। बिजली के तार भी जगह जगह से खुले पड़े हैं। 4-5 साल तक भी मेनटीनेंस की परवाह नहीं करते। कृपया हमें मार्ग बताएँ। क्या सैलेरी समय पर मिलने का कोई नियम नहीं है।

समाधान-

प की समस्या भारत के लाखों मजदूरों की समस्या है। सब चीज के नियम बने हुए हैं। वेतन 7 तारीख तक मिल जाना चाहिए। यदि नहीं मिलता है तो यह कानून का उल्लंघन है इसे देखने की जिम्मेदारी श्रम विभाग की है। ओवर टाइम भी दुगना ही मिलना चाहिए और माह के वेतन के साथ मिलना चाहिए। ड्रेस, जुते, साबुन आदि की सुविधाएँ बन्द नहीं की जानी चाहिए थी। यह कानून के अनुसार गलत है। साफ सफाई व सुरक्षा आदि का ध्यान रखने के लिए फैक्ट्रीज एण्ड बॉयलर इंस्पेक्टर को कार्यवाही करनी चाहिए। बोनस भी पहले देते थे तो यह परंपरा बन चुकी थी इसे भी बंद नहीं किया जा सकता था।

लेकिन इन सब समस्याओं के लिए कोई अच्छी यूनियन ही लड़ सकती है। इस के लिए आप की फैक्ट्री के मजदूरों की यूनियन कार्यवाही कर सकती है। यदि यूनियन नहीं है तो मजदूरों की यूनियन बनानी चाहिए और इन सब सुविधाओं के लिए लड़ना चाहिए।

कानून से मिलने वाली सुविधाओं के लिए पहले श्रम विभाग काम करता था। लेकिन आज कल उस ने इन सब चीजों पर ध्यान देना और उद्योगपतियों के विरुद्ध आरोप पत्र न्यायालय में दाखिल करना बंद कर दिया है। अब कोई उन के यहाँ शिकायत करता है तो वे कहते हैं आप मुकदमा कर दें। राजस्थान में मुकदमों के निर्णय की गति इतनी कमजोर है कि बरसों लग जाते हैं। अनेक श्रम संबंधी अदालतों में अधिकारी ही नहीं हैं। एक एक अधिकारी दो तीन अदालतें सम्भाल रहा है। सरकार इन अधिकारियों की संख्या बढ़ाना नहीं चाहती। राजस्थान की कांग्रेस सरकार ने ही मजदूरों को सुविधाएँ कम होने पर कार्यवाही करना बंद कर दिया था। अब मौजूदा सरकार तो इस से बहुत आगे है। उन्हों ने तो उद्योग बंदी करण के लिए सरकार की अनुमति लेने के कानून को और अधिक लचीला बना दिया है।

प के उद्योग के लक्षणों को देख कर लगता है कि उद्योग में मुनाफा घटा है जिस के कारण अब आप के उद्योग के मालिक इस उद्योग को चलाना नहीं चाहते। वे कोई न कोई बहाना बना कर कुछ सालों में इस उद्योग को बंद कर अपनी पूंजी इस उद्योग से निकाल कर कहीं और लगाना चाहते हैं। उन्हों ने उद्योग से पूंजी को निकालना आरंभ कर दिया है। इसी क्रम में उन्हों ने मजदूरों की सुविधाएँ कम कर दी हैं। वे चाहते हैं कि श्रमिक परेशान हो कर आमने सामने की लड़ाई लड़ें, हड़ताल वगैरह करें तो उन्हें उद्योग में तालाबंदी करने, श्रमिकों को कुचलने और बाद में उद्योग को बन्द करने के लिए अच्छा बहाना मिल जाए। श्रमिकों को इन लक्षणों को समझना चाहिए। जिन्हें इस समय किसी और उद्योग में अच्छी नौकरी मिल सकती हो उन्हें उस के लिए प्रयत्न आरंभ कर देना चाहिए और जैसे ही मिले इस नौकरी को छोड़ कर नई नौकरी पर चले जाना चाहिए। जिस तरह की हालत है उस तरह की हालत में यदि फैक्ट्री बंद की गयी और श्रमिकों की छंटनी की गई तो श्रमिकों को उन के मुआवजे, ग्रेच्यूटी व अन्य लाभों के लिए भी कई वर्ष तक लटकाए रखा जा सकता है।

फिलहाल आप को यही सलाह दी जा सकती है कि जोधपुर बड़ा औद्योगिक केन्द्र है और वहाँ बड़े मजदूर संगठन भी हैं। आप अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी बड़े मजदूर संगठन से सलाह कर अपने यहाँ मजदूरों की यूनियन बनाएँ और यूनियन के माध्यम से इन छीन ली गई सुविधाओं के लिए कार्यवाही करें।

बिना पर्याप्त विवरण के किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।

rp_husband-wife.jpgसमस्या-

अतुल ओडेरा ने पोरबन्दर, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

મેરા નામ અતુલ હે ઔર મે ગુજરાત સે હુ. મેરી શાદિ કો ૩ સાલ હુએ હૈ ઔર એક બેટા હે ૧ સાલ કા. મેરી પત્નિ કો અબ મેરે સાથ નહિ રેહના હે ઉસે સિર્ફ અલગ રેહકર પૈસો સે મતલબ હે. મે અપને બેટે કે લીયે અપની પત્નિ સે અલગ નહિ હોના ચાહતા પર ઉસે સિર્ફ પૈસે ચાહિયે સાથ નહિ રેહના ચાહ્તી ઔર ઉસને ભરણ પોશણ કા કેસ કર દિયા હે. ક્રુપિયા કુછ ઉપાય બતયે મે ક્યા કરુ.

मेरा नाम अतुल है और मैं गुजरात से हूँ। मेरी शादी को 3 साल हुए हैं और मेरा एक बेटा है, एक साल का। मेरी पत्नी को अब मेरे साथ नहीं रहना है उसे सिर्फ अलग रह कर पैसों से मतलब है। मैं अपने बेटे के लिए अपनी पत्नी से अलग नहीं होना चाहता पर उसे सिर्फ पैसे चाहिए, साथ नहीं रहना चाहती। उस ने भरण पोषण का केस कर दिया है। कृपया कुछ उपाय बताएँ, में क्या करूँ।

समाधान-

ह आप का आकलन है कि आप की पत्नी को सिर्फ पैसे चाहिए और वह आप के साथ नहीं रहना चाहती है। आखिर कोई तो कारण होगा जिस के कारण वह आप के साथ नहीं रहना चाहती है। नहीं रहने का कोई तो कारण बताती होगी। जब तक आप अपनी पत्नी का आप के साथ नहीं रहने का वास्तविक कारण न जान लें और उस का निदान करने का प्रयत्न न करें ऐसी समस्या तो आप के सामने आएगी ही। आप को अपनी पत्नी से तसल्ली से बात करनी चाहिए। यदि आपस में बात करने का अवसर न मिलता हो तो किसी मध्यस्थ के माध्यम से बात करें अन्यथा किसी काउंसलर की मदद लें।

प ने अपनी समस्या के आवश्यक विवरण भी नहीं बताए कि पत्नी ने भरण पोषण का मुकदमा कहां किया है? कितना भरण पोषण मांगा है? वह अभी आप के साथ रह रही है अथवा अलग रह रही है। यदि अलग रह रही है तो आप के नगर में है अथवा अपने मायके में या कहीं और? यदि अलग रह रही है तो अलग रहने का कारण अपने आवेदन में क्या बताया है? और आप का बच्चा आप के साथ है या पत्नी के साथ है। इस सारे विवरण के बिना तो कोई अवतार भी शायद ही आप की समस्या का कोई ठीक-ठाक हल भी नहीं बता पाएगा।

त्नी और आप के बीच कोई न कोई समस्या तो है जरूर, पर शायद उसे आप नहीं बताना चाहते। यदि कोई मरीज अपना मर्ज छुपाएगा तो कोई भी डाक्टर उस का इलाज नहीं कर सकता। यदि उस ने कोई कारण नहीं बताया है तो आप सीधे कह सकते हैं कि वह स्वयं आप के साथ बिना किसी कारण नहीं रहना चाहती ऐसी स्थिति में वह भरण पोषण प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

प्रतिदिन आप की ही तरह बिना किसी विवरण के लोग हमें समस्याएँ भेजते हैं। हम उन समस्याओं का हल नहीं कर सकते, क्यों कि वास्तव में पूरी समस्या हमारे पास पहुँचती ही नहीं है तो हम हल कैसे सुझाएँ? फिलहाल आप के विरुद्ध जो मुकदमा भरण पोषण के लिए हुआ है उस में किसी स्थानीय वकील से राय करें और मुकदमा ठीक से लड़ें। इस के अतिरिक्त कोई अन्य सुझाव हम आप को या अन्य उन लोगों को नहीं दे सकते जो आप की तरह बिना विवरण की समस्या हमें प्रेषित करते हैं।

विवाह पंजीकरण विवाह की एक तात्विक व पर्याप्त साक्ष्य है।

समस्या-

उदयपुर, राजस्थान से ललित जैन से पूछा है –

मैं हिन्दू हूँ और मैं एक हिन्दू लड़की से प्यार करता हूँ, हम दोनों वयस्क हैं पर मेरे घर वाले हमारी शादी से सहमत नहीं थे तो हम ने पिछले साल मई 2012 में एक मंदिर में जा कर हिन्दू विवाह विधि के अनुरूप विवाह कर लिया तथा उसे नगरपरिषद उदयपुर में विवाह पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवा लिया। विवाह का प्रमाण पत्र हमें प्राप्त हो चुका है। हम ने इस विवाह को सार्वजनिक नहीं किया। क्यों कि तब हम दोनों विद्यार्थी थे। अब हम दोनों ही नौकरियाँ कर रहे हैं। अब हम विवाह को सार्वजनिक कर देना चाहते हैं। इस के लिए सब से सुरक्षित तरीका क्या है जिस से कोई कानूनी रूप से हमें परेशान न कर सके और यह विवाह अवैध घोषित नहीं कर सके? हम पिछले एक वर्ष में साथ नहीं रहे तो क्या इस कारण से इस विवाह को अवैध घोषित किया जा सकता है? क्या हमारा विवाह प्रमाण पत्र जो नगर परिषद से मिला है वह वैध है? यदि कोई पुलिस वाला हमें परेशान करने की कोशिश करे तो हमें क्या करना चाहिए। हमें विवाह की घोषणा कैसे करनी चाहिए जिसे हमें इधर उधर भागने की जरूरत न पड़े और हम बिना किसी परेशानी के पति-पत्नी के रूप में साथ रह सकें?

समाधान-

marriageप का विवाह वैध है। आप के पास विवाह का सब से मजबूत प्रमाण विवाह का प्रमाण पत्र है। यह विवाह की तात्विक और पर्याप्त साक्ष्य है। जब तक प्रमाण पत्र फर्जी प्रमाणित न हो आप के विवाह को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। इस विवाह के कारण आप दोनों पति-पत्नी के रूप में साथ रह सकते हैं। आप दोनों नौकरी करते हैं इस के कारण आप दोनों आत्मनिर्भर भी हैं और बिना किसी अन्य की सहायता के एक अच्छा पारिवारिक जीवन बिता सकते हैं। इस में किसी तरह की कोई कानूनी बाधा नहीं है।

प ने उल्लेख किया है कि आप के परिवार वाले इस विवाह से सहमत नहीं हैं। वैसी स्थिति में यदि उन के विरोध का सामना आप दोनों को करना पड़ सकता है। लेकिन चूंकि आप की सहमति है इस कारण से वे कानूनी रूप से या अन्य प्रकार से कुछ भी नहीं कर सकते। उन से तो आप को कोई भय नहीं होना चाहिए।

पकी पत्नी वयस्क है, और खुद नौकरी करती है। वैसी स्थिति में उस के संबंधियों की ओर से भी कानूनी रूप से कुछ किया जाना संभव प्रतीत नहीं होता है। हाँ इतना हो सकता है कि आप की पत्नी के माता-पिता यह कहें कि आप ने उन की पुत्री को बहला फुसला कर यह सब किया। लेकिन जब विवाह हुआ है और उस का पंजीकरण हुआ है तो उन की इस बात को भी विवाह के पंजीकरण के कारण सही नहीं माना जा सकता।

प को अकारण भय हो रहा है। भय का कोई कारण आप की समस्या में दिखाई नहीं दे रहा है। आप दोनों ने विवाह किया है तो साथ रहने की भी हिम्मत करें। पहले अपने रहने का स्थान तय करें, उसे गृहस्थी के लायक बनाएँ और साथ रहने लगें। आप दोनों साथ हैं तो आप का कोई भी कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। आप दोनों के साथ रहने में किसी तरह की कोई कानूनी समस्या, बाधा या परेशानी नहीं है।

अपने वकील से संतुष्ट नहीं हैं तो तुरंत किसी वरिष्ठ और अनुभवी वकील से मार्गदर्शन प्राप्त करें


 प्रश्न
 मेरा नाम अनिल है,  पति-पत्नी में तलाक के मुकदमे को चलते दो साल हो गएहैं, पति तलाक चाहता है और पत्नी नहीं चाहती और वे दोनों दो साल से अलग रह रहे हैं। क्या उन का तलाक हो सकता है?
उत्तर–
अनिल जी,
प का प्रश्न स्पष्ट नहीं है। आप के प्रश्न से यह तो पता लगता है कि तलाक का मुकदमा अवश्य ही पति ने किया है,  क्यों कि पत्नी तो तलाक चाहती ही नहीं है। इस प्रश्न से यह पता नहीं लगता कि पति को तलाक क्यों चाहिए? और उस ने तलाक के लिए जो अर्जी दी है उस का आधार क्या है? केवल इस तथ्य के आधार पर कि मुकदमा चलते दो वर्ष हो गए हैं यह कैसे निश्चित किया जा सकता है कि तलाक हो सकता है अथवा नहीं। आप के प्रश्न से यह भी स्पष्ट नहीं है कि पति-पत्नी के अलग रहने का आधार क्या है। क्या पति ने पत्नी का त्याग किया है अथवा पत्नी ने पति का त्याग किया है। यदि पत्नी स्वयं ही पति को छोड़ कर चली गई है तो उस के पास उस के अलग रहने का उचित कारण होना चाहिए। यदि उस के पास पति को छोड़ कर चले जाने का उचित कारण नहीं है तो फिर उस का इस तरह पतिगृह छोड़ कर चले जाना निश्चित रूप से अनुचित है और दो वर्ष तक पति का पत्नी द्वारा बिना किसी कारण त्याग कर देना तलाक के लिए उचित आधार है। 
ति ने जो तलाक की अर्जी दो वर्ष पहले दी हुई है निश्चित ही उस में पत्नी द्वारा पति का स्वैच्छा से लंबे समय तक त्याग करना एक आधार नहीं रहा होगा। तो पति को एक आवेदन प्रस्तुत कर अपनी तलाक की अर्जी में संशोधन करवा कर इस आधार को जोड़ना होगा तभी इस आधार पर तलाक की डिक्री अदालत द्वारा पारित की जा सकती है।
लेकिन पति को एक बात का ध्यान रखना होगा कि उस के द्वारा तलाक की अर्जी न्यायालय में प्रस्तुत करना भी पति से अलग रहने का एक उचित कारण हो सकता है, यदि इस बीच पत्नी ने न्यायालय में यह नहीं कहा हो कि वह पति के साथ रहने को तैयार है। यदि उस ने अदालत में यह कहा है कि वह पति के साथ रहने तो तैयार है तो यह आधार निष्फल सिद्ध होगा। पति ने न्यायालय में मुकदमा किया हुआ है तो  उस ने वकील की सहायता भी प्राप्त की होगी। ऐसा प्रतीत होता है कि पति उस के वकील से संतुष्ट नहीं है।यदी ऐसा है तो उसे तुरंत किसी अन्य वरिष्ठ और अनुभवी वकील से मार्गदर्शन प्राप्त करना चाहिए।  

पत्नी बिलकुल भावनाहीन हो गई है, मैं क्या करूँ?

तीसरा खंबा को कल कानूनी सलाह के लिए मेल में निम्नांकित संदेश मिला।  इन पाठक की समस्या बहुत पीड़ामय है।  जरा आप भी पढ़ें।

मेरी पत्नी के अपने जीजा के साथ शादी के पूर्व 15 सालों से और शादी के बाद इस तरह के नाजायज संबंध थे, जिस के मेरे पास पूरे सबूत भी हैं। वो डिप्रेशन की रोगी है, वो घर में दिन भर सोई रहती है। 10 बजे खाना बनाने जाती है जब कि मेरी ड्यूटी पर पहुँचने का समय 10.30 है। मेरी माँ को डिप्रेशन की हालत में घर से निकाल दिया। मेरे कुछ कहने पर उन्हों ने मुझ पर दहेज का केस कर दिया। मेरा चार साल का बेटा है इसलिए मैं उसे घर ले आया। लेकिन फिर भी उस में कोई विशेष सुधार नहीं हुआ। पिछले 18 महिनों से ऐसा नहीं है कि मैं कभी गुस्सा नहीं हुआ हूँ, दो या तीन बार मुझ से उस पर हाथ भी उठ गया है। लेकिन क्या करूँ वह बिलकुल भावनाहीन हो गई है। कितना भी समझाता हूँ कि तुम जल्दी उठा करो, बाहर घूमा करो,  लेकिन कोई बात नहीं सुनती है। बच्चा रोज कोई नुकसान कर देता है लेकिन उसे कोई परवाह नहीं है। मैं अपनी पत्नी का इलाज कराता हूँ, बच्चे  की तरह घुमाता हूँ। 18 महीनों में बहुत परेशान होने पर मै ने एक दो बार दो-तीन थप्पड़ मार दिया , तो क्या मैं ने इतना बड़ा गुनाह कर दिया कि उस के भाई बोले -रखा है तो ठीक से रखो वरना हाथ काट देंगे।  वो पैसे वाले हैं और मैं एक नौकरी करने वाला आदमी हूँ।  मेरी क्षमता न होते हुए भी मैं पत्नी की एक ऐसी बीमारी का इलाज करा रहा हूँ जो कि शादी के 15 साल पहले से थी। मुझे भी उच्च रक्तचाप रहने लगा है और अक्सर 190-110 रहता है। जिस से बात बर्दाश्त से बाहर हो जाती है तो गुस्सा आ जाता है।  समझ में नहीं आता है क्या करूँ?

उत्तर ……………

प्रिय पाठक!
आप के प्रश्न से कहीं यह स्पष्ट नहीं हो रहा है कि आप इस समस्या के कानूनी हल के रुप में क्या चाहते हैं?  आप अपने विरुद्ध दहेज के मुकदमे का सामना कर चुके हैं। आप के पास अपनी पत्नी के शादी के पहले और बाद के अपने जीजा के साथ नाजायज संबंधों के पक्के सबूत थे। आप चाहते तो उन के आधार पर अपनी पत्नी से तलाक ले सकते थे। आप ने वे सबूत भी अवश्य ही किसी वकील को बताए होंगे। यदि वे सबूत पर्याप्त होते तो आप का वकील आप को सलाह देता कि आप तलाक ले लीजिए। लेकिन आप ने ऐसा कुछ किया नहीं।  इस से और आप के संदेश की भाषा से प्रतीत होता है कि आप ने उन सब के लिए पत्नी को माफ कर दिया है और आप ने उसे पुनः अपना लिया है, चाहे अपने इकलौते पुत्र की खातिर ही सही।

आप ने खुद ही बताया है कि आप की पत्नी डिप्रेशन की शिकार है और आप उस का इलाज करवा रहे हैं।  आप ने उसे एक दो बार थप्पड़ भी मार दिया जिसे आप खुद स्वीकार करते हुए कह रहे हैं कि ऐसा आप से उच्चरक्तचाप के कारण गुस्सा आने पर हो गया।  यह खबर सुन कर आप की पत्नी के भाइयों ने आप को हाथ काटने की धमकी दे डाली। लगता है आप की पत्नी के भाई भी स्वभावतः उच्चरक्तचापी हैं और जैसा आप ने किया वैसा ही उन्हों ने आप को जवाब दे दिया।  आप कहते हैं कि वे बहुत पैसे वाले हैं, लेकिन उन के व्यवहार से लगता नहीं है कि ऐसा है।

वास्तव में आप की समस्या कानूनी है ही नहीं। वह चिकित्सकीय और सामाजिक है।  आप के इस पत्र से लगता है कि आप उच्चरक्तचाप के साथ-साथ डिप्रेशन के भी शिकार हो चुके हैं।  आप अपनी पत्नी की चिकित्सा ठीक से करवाइए। मुझे लगता है कि उन्हें , और आप को भी किसी मनोचिकित्सक की आवश्यकता है।  आप तुरंत  किसी मनोचिकित्सक से मिलें और उन्हें अपनी हालत बताएँ, उन से सलाह लें। दूसरी बार में अपनी पत्नी को भी ले जाएँ। यदि मनोचिकित्सक को लगता है कि आप  और आप की पत्नी उ

पत्नी जब ब्लेक मेल करे, तो क्या करें?

तीसरा खंबा के सहयोगी ब्लाग अदालत के टूलबार के माध्यम से एक पाठक से हमें निम्न समस्या प्राप्त हुई थी….
 
 
 
सर! मेरी शादी मई 2004 में हुई थी। लेकिन पत्नी शादी के बाद से ही मायके में रहने लगी। मैं घर लाता हूँ तो दस दिन से अधिक नहीं रहती है। धमकी देती है कि जहर खा लेंगे, फाँसी लगा लेंगे, समाज में तमाशा करेंगे, दहेज केस में फंसा देंगे, पत्नी के घर वाले भी धमकी देते हैं और पैसे मांगते हैं। समाज के लोगों ने समझाने की कोशिश की लेकिन सब बेकार गया। सर पत्नी तीन साल से भी अधिक समय से मायके में ही रहती है। कई बार कोशिश भी की लेकिन आती नहीं है। घऱ वाले और पत्नी धमकी मारती है कि पैसे ला कर दो, नया घर बना कर दो। सर, मैं मानसिक रूप से परेशान हो गया हूँ। मेरी कोई इच्छा नहीं है क्यों कि वे दस दिन से अधिका मेरा पास रही नहीं. सर, सुनने में आया है कि मेरी पत्नी ने मेरे ऊपर भऱण पोषण, घरेलू हिंसा और दहेज का केस लगाने वाली है। मेरे माता-पिता सीधे सादे हैं। सर, मैं यह जानना चाहता हूँ कि मैं अपने बचाव में क्या कर सकता हूँ। सर,कृपया जल्दी जवाब देने का कष्ट करें वरना एक बेकसूर घर और बरबाद हो जाएगा मेरे ई-मेल पर मुझे सलाह देने का कष्ट करें। – आप का ?????
 
हम ने उक्त सज्जन को जो उत्तर दिय़ा वह इस प्रकार है…..

????? जी!

आप की समस्या को कुछ तो आप ने बढ़ा लिया है।  वास्तव में आप की पत्नी और ससुराल वाले आप को ब्लेक-मेल कर रहे हैं। वे जानते हैं कि ऐसा किया जा सकता है। सब से पहले तो आप उन की किसी भी बात का उत्तर देना और प्रतिक्रिया करना बंद कर दें।  उन्हें लगे कि आप उन की परवाह नहीं करते हैं। पत्नी को लाने के बारे में सोचना और कुछ भी करना बंद कर दें।   आप ने यह नहीं बताया कि आप किस प्रांत से हैं।  यदि आप के प्रांत में पुलिस द्वारा स्थापित परिवार परामर्श केन्द्र हो तो वहाँ अपनी सारी कहानी लिखते हुए एक शिकायत करिए।  पुलिस आप की पत्नी और ससुर को बुला कर कार्यवाही करेगी जिस का विवरण भी रखेगी।  कभी आप की पत्नी ने आप पर मुकदमा किया तो आप को उस से मदद मिलेगी।  जिस तरह से आप की पत्नी और ससुर आप को ब्लेकमेल कर रहे हैं उस की शिकायत भी पुलिस को कीजिए। आप की पत्नी तीन साल से अधिक समय से आप के संपर्क  में नहीं है और उस के पिता के यहाँ रह रही है इस कारण से 498-ए का मामला नहीं बनता है। यदि आप के विरुद्ध कोई मुकदमा या प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो जाए तो उसे खारिज कराने के लिए आप को हाईकोर्ट में सीधे कार्यवाही करनी चाहिए।  यदि आप के विरुद्ध मुकदमा हो ही जाए तो आप को किसी समझदार वकील की सहायता लेनी ही पड़ेगी।  आप चाहें तो अभी किसी वकील से मिल कर धारा-9 हिन्दूविवाह अधिनियम के तहत पत्नी से वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना का दावा करें।  यदि दावे में आदेश हो जाने पर भी वह नहीं आती है तो आप तलाक ले सकते हैं। या फिर सीधे ही इस आधार पर कि आप की पत्नी ने तीन साल से अधिक समय से आप का परित्याग कर रखा है, तलाक की अर्जी दाखिल करवा सकते हैं। पर आप को अपनी समस्या ले कर पुलिस और अदालत के पास तो जाना ही होगा।
 
उक्

सद्भाविक और युक्तियुक्त आवश्यकता किराएदार से परिसर खाली कराने का उचित आधार

हरियाणा से हरीश कुमार पूछते हैं…..
मैं ने एक दुकान एक डेंटिस्ट को सोलह वर्ष पूर्व किराए पर दे रखी है।  यह डेंटिस्ट फर्जी है। मुझे अपने भतीजे को वहाँ नया धंधा कराने के लिए चाहिए।  कृपया मुझे उचित सलाह दीजिए। 

उत्तर……

हरीश जी!

जिस किसी को भी आप ने दुकान दी है। वह जीवन में कभी भी दुकान का मालिक नहीं हो सकता। वह हमेशा ही किराएदार रहता है। प्रत्येक राज्य में किराएदार से परिसर चाहे वह आवासीय हो या व्यावसायिक कुछ विशेष आधारों पर खाली कराए जा सकते हैं।  आप के प्रश्न से स्पष्ट है कि आप के पास दो मजबूत आधार उपलब्ध हैं जिन के कारण आप अपने डेंटिस्ट किराएदार से दुकान खाली करा सकते हैं। पहला आधार तो यह है कि आप को उस व्यावसायिक परिसर की आप के भतीजे के धंधे के लिए सद्भाविक और युक्तियुक्त आवश्यकता है।  दूसरा आधार यह है कि आप का किराएदार आप से किराए पर लिए गए परिसर में अवैधानिक गतिविधियाँ चला रहा है। 

आप को इस के लिए जहाँ परिसर स्थित है, वहाँ का क्षेत्राधिकार रखने वाली दीवानी अदालत या किराया अधिकरण जो भी हो वहाँ एक वाद या अर्जी दाखिल करनी होगी।  इस काम को कोई दीवानी का सिद्ध-हस्त वकील कर सकता है। इस के लिए उसी अदालत में पैरवी करने वाले किसी समझदार और वरिष्ठ वकील से मिल कर अपनी समस्या बताएँ। वह आप की समस्या का हल आप को बता देगा। यदि आप को लगे कि वह उचित  उपाय बता रहा है तो उसे अपना मुकदमा लड़ने के लिए वकील कर लें। हाँ वकील चुनने का काम पूरी सावधानी से करें। उस के बारे में यह जानकारी कर लें कि वह आप का काम कराने के लिए उपयुक्त है अथवा नहीं।

आप दीवानी कार्यवाही के अतिरिक्त एक काम और कर सकते हैं।  यदि आप का किराएदार डेंटिस्ट फर्जी है तो आप उस की शिकायत पुलिस से कर सकते हैं।  इस से पुलिस उस के विरुद्ध कार्यवाही करेगी और उस का धंधा बन्द हो जाएगा।  इस से आप को उस से अपना परिसर खाली कराने में मदद मिलेगी। यह कोई गलत काम नहीं है क्यों कि कोई भी व्यक्ति जो अवैधानिक काम कर रहा है उस की सूचना पुलिस को देना हर व्यक्ति का कर्तव्य है।

वकालत के पेशे में आने वाले लोग : वकील और कानून-व्यवस्था (2)

वकील एक पेशेवर (professional) समुदाय तो है,  लेकिन उन्हें आर्थिक एक वर्ग नहीं कहा जा सकता।  वकीलों में ऐसे लोग मिलेंगे जो देश के सब से बड़े व्यक्तिगत आयकर दाता रहे हैं और ऐसे भी जो आयकर देना तो छोड़ सारे जीवन आयकर सीमा को छूने का प्रयत्न करते रहते हैं लेकिन उसे कभी छू नहीं पाते।  जिन पेशों को तीन दशक पहले सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। उनमें वकालत, चिकित्सा, इंजिनियरिंग, अध्यापन आदि सम्मिलित थे। लेकिन चिकित्सा, इंजिनियरिंग, अध्यापन जैसे पेशों में पेशेवर अध्ययन के लिए प्रवेश परीक्षा आरंभ हो गई।  लेकिन वकालत के पेशे के लिए इस तरह की कोई रुकावट नहीं रही।  नतीजा यह हुआ कि बड़ी संख्या में स्नातक और स्नातकोत्तर परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरांत लोगों ने विधि-स्नातक होना एक मार्ग के रुप में चुना।  पहले इस पेशे में आने के लिए किसी वरिष्ठ वकील के पास प्रशिक्षण लेना और इस का प्रमाण पत्र प्राप्त करना अनिवार्य था।  इस से कम से कम एक वर्ष किसी वरिष्ठ वकील के कार्यालय में रह कर एक व्यक्ति इस पेशे से संबंधित आचार की शिक्षा प्राप्त करता था और बहुत से परंपरागत गुण सीखता था। लेकिन जब से विधि की प्रोफेशनल डिग्री का प्रचलन हुआ। यह अनिवार्यता समाप्त हो गई और विधि स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के उपरांत कोई भी बार काऊंसिल में अपना पंजीकरण करवा कर सीधे वकालत आरंभ कर सकता है।  इस का नतीजा यह हुआ कि वकालत के पेशे में पेशेवर आचार-संहिता के ज्ञान और अभ्यास से हीन व्यक्तियों का प्रवेश संभव हो गया। आज इस पेशे में इस तरह के लोगों की संख्या अस्सी प्रतिशत से कम नहीं है।

वकीलों के लिए जो तीन वर्षीय पाठ्यक्रम विभिन्न विश्वविद्यालयों ने तय किया है, उस में पेशेवर आचार संहिता की पढ़ाई शामिल नहीं है।  वकीलों को किस तरह की यूनिफॉर्म पहननी चाहिए और उस का महत्व क्या है? यह तक उस में शामिल नहीं है।  इस की जानकारी वह या तो पुराने वकीलों से पूछ कर करता है या उसे बार काऊंसिल नियम पढ़ने से यह जानकारी हो पाती है।  वकीलों का उन के मुवक्किलों के साथ क्या व्यवहार होना चाहिए? उन्हें मुवक्किलों के धन का किस तरह हिसाब रखना चाहिए? उन का न्यायालय में क्या व्यवहार होना चाहिए? यहाँ तक कि एक न्यायालय में उन की स्थिति न्यायालय के एक अधिकारी की है, इस का तक ज्ञान नहीं होता है।  वकील का काम किसी मुवक्किल की विधि से संबंधित समस्या के हल के लिए सुझाव देना और उसे कार्यरूप में परिणत कर उस की समस्या के हल के लिए आगे बढ़ना है।  जब भी कोई मुवक्किल किसी वकील से संपर्क कर अपनी समस्या सामने रखता है, तो सब से पहला काम वकील का यह है कि उस समस्या के हल के लिए उचित उपाय खोजे, अपनी परियोजना मुवक्किल को सुझाए।  मुवक्किल द्वारा सहमति दे देने पर उस परियोजना पर काम करे।  इस के लिए यह आवश्यक है कि किसी वकील को विधिक उपायों की जानकारी हो।  जब मैं वकालत का अध्ययन कर रहा था तब विधि के पाठ्यक्रम में एक विषय विधिक उपायों का भी होता था।  अभी हाल में जब कोटा विश्वविद्यालय बनने के बाद जब वहाँ विधि पाठ्यक्रम बनाया गया तो पता लगा उन में विधिक उपायों का कोई विषय है ही नहीं। अधिकांश विश्वविद्यालयों से यह विषय पाठ्यक्रम से नदारद है।  ऐसे में एक नया वकील विधिक उपायों को अभ्यास से सीखता है।  प्रारंभ में वह अनेक मुवक्किलों को गलत उपायों के मार्ग पर डाल देता है।  उस का हाल उस कहावत जैसा है, “सीखे बेटा ना

कोई भी कृत्य उस से उत्पन्न विक्षोभ के कारण आत्महत्या कर लेने पर आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का अपराध है

वह 31 दिसंबर 1995 की रात थी।  अर्धरात्रि को एक नया वर्ष 1996 आरंभ होने को था। बितरा चाहता था कि वह रात वह अपनी पत्नी के साथ बिताएगा और नए वर्ष का स्वागत करेगा। लेकिन पत्नी शाम को ही कहीं चली गई थी। वह प्रतीक्षा करता रहा कि वह लौट कर आएगी। लेकिन रात ग्यारह बज चुके थे। उस ने उसे तलाश भी किया किंतु जहाँ जहाँ वह हो सकती थी वहाँ वह कहीं नहीं मिली। बितरा ने वह रात बैचेनी के साथ बिताई। अगले दिन पत्नी वापस लौट कर आ गई। दोनों के बीच झगड़ा हुआ कि वह बिना बताए वहाँ से क्यों चली गई थी। झगड़े ने बितरा के जीवन में कड़ुआहट भर दी थी। उसे लगा कि ऐसे किस तरह उस का जीवन चलेगा। उस ने पत्नी के पिता को बुलवा भेजा। ससुर आए तो उस ने पत्नी को उन के साथ भेज दिया कि वे पत्नी को समझाएँ कि वह अपना व्यवहार सुधारे। वे अपनी बेटी को साथ ले गए।

पत्नी को उस के पिता के साथ गए कुछ ही घंटे बीते होंगे कि श्रीनू वहाँ आया। उस ने बितरा से पूछा कि क्या उस की पत्नी घर पर है? बितरा अपनी पत्नी के व्यवहार से परेशान तो था ही श्रीनू के पूछने पर उस ने कहा कि उसे उस की पत्नी से क्या लेना देना है वह उस के घर न आया करे। वाद विवाद और चिल्ला कर बोलने की आवाज से पूरा घर और पड़ौस वहाँ इकट्ठा हो गया था। श्रीनू ने सब के सामने बितरा को स्पष्ट कह दिया कि वह वहाँ आने से न रुकेगा। बितरा की पत्नी उस की प्रेमिका है और जब तक वह खुद उसे मना नहीं करती तब तक वह यहाँ आता रहेगा। बितरा के घर वालों ने बताया कि बितरा की पत्नी उस के पिता के साथ गई है। यह सुन कर श्रीनू वहाँ से चला गया।  इस खुलासे से कि उस की पत्नी श्रीनू की प्रेमिका है और वह जबरन उस के घर में घुसने लगा है बितरा का मन खराब हो गया उसे अपना जीवन ही व्यर्थ लगने लगा।

श्रीनू वहाँ से बितरा के ससुर के घर गया तो उसे पता लगा कि उस की प्रेमिका को उस के पिता ने उस के  भाई के घर रख छोड़ा है। वह वहाँ पहुँच गया और उसे अपने साथ चलने को कहा, वह श्रीनू के साथ जाने को तैयार हो गई। भाई ने अपनी बहिन के श्रीनू के साथ जाने का विरोध किया लेकिन वह उस के विरोध के बाद भी श्रीनू उस की बहिन को अपने साथ ले गया। बितरा की पत्नी श्रीनू के साथ चार दिन रही फिर बितरा के साथ रही। पाँचवे दिन श्रीनू उसे उस के भाई के घर छोड़ कर चला गया। भाई ने भी उसे अपने पास नहीं रखा और अपने पिता के घर छोड़ आया।

जब बितरा को पता लगा कि श्रीनू उस की पत्नी को उस के भाई के घर से साथ ले गया था और चार दिन साथ रख कर छो़ड़ गया है, तो बितरा ने खुद को बहुत अपमानित महसूस किया, वह गुमसुम हो गया। उसी रात उस ने फाँसी लगा कर अपनी इहलीला समाप्त कर ली। इस आत्महत्या की खबर पुलिस को की गई। पुलिस ने बितरा के शव का पोस्टमार्टम कराया और मामले की जाँच की, विभिन्न लोगों के बयान लिए। पुलिस ने पाया कि परिस्थतियाँ ऐसी हैं कि बितरा को उस की पत्नी और उस के प्रेमी श्रीनू ने आत्महत्या के लिए प्रेरित किया। पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 306 के अंतर्गत अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। अदालत ने गवाहियाँ और अन्य सबूतों के आधार पर अपना निर्णय सुनाते हुए दोनों को बितरा को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने का दोषी पाया और श्रीनू को पाँच साल के कठोर कारावास व सौ रुपए जुर्माने व जुर्माना अदा न करने पर एक माह और कैद भुगतने की सजा दी। बितरा की पत्नी को पाँच वर्ष कैद की सजा सुनाई गई।

अदालत क

कोई दफ्तर के मामले में लड़की को परेशान करे तो क्या करें?

भारत बंजारा पूछते हैं 

जब कोई व्यक्ति किसी लड़की को ऑफिशियल मैटर में परेशान करता है तो क्या करना चाहिए? 

उत्तर 

बंजारा जी,
सब से पहले तो आप को धन्यवाद दूं कि आप ने आज तक का सब से छोटा सवाल तीसरा खंबा की कानूनी सलाह सेवा पर पूछा है।

आप के सवाल से कुछ भी पता नहीं लग रहा है। परेशान करने से आप का क्या तात्पर्य है? लड़की क्या किसी ऑफिस में काम करती है? या फिर उसे किसी ऑफिस में काम पड़ा है और वहाँ उसे परेशान किया जा रहा है? परेशान करने वाला व्यक्ति उस का अधिकारी है या फिर कोई ऑफिस का कोई कर्मचारी उसे परेशान कर रहा है? या ऑफिस के बाहर का व्यक्ति उसे परेशान कर रहा है?

अब आप कहेंगे कि एक प्रश्न का उत्तर देने के बजाए मैं ने खुद आप से बहुत से सवाल कर दिए हैं।

बात यह है कि जब तक मामले के सारे जरूरी तथ्य सामने नहीं हो कोई भी कानूनी सलाह नहीं दी जा सकती है। इसलिए कृपया पहले आप अपनी समस्या के तथ्यों को ठीक से सामने रखें जिस से उन का कोई कानूनी हल या उपाय आप के सामने रखा जाए। आशा है आप अपनी समस्या को विस्तार से तथ्यों सहित सामने रखेंगे।

मैं यह बात आप को ई-मेल से भी पूछ सकता था। लेकिन तीसरा खंबा को अनेक प्रश्न इसी तरह बिना किसी तथ्यों के प्राप्त हो रहे हैं जिन का उत्तर दे पाना संभव नहीं होता। उन से तथ्य मांगे जाते हैं। तथ्य मिलने पर सब को उन की आवश्यकता के अनुरूप सलाह दे दी जाती है। यहाँ इस प्रश्न को और सलाह देने में उपस्थित हमारी समस्या को इसी लिए रखा गया है जिस से अन्य प्रश्न कर्ता भी संपूर्ण तथ्यों सहित प्रश्न को रखें। जितने अधिक तथ्य सामने होंगे सलाह भी उतनी ही सही, सटीक और उपयोगी हो सकेगी।

आशा है आप इसे अन्यथा नहीं लेंगे।

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