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औरत अगर गलती करे तो क्या कोई कानून नहीं है?

father & married daughter1समस्या-

शिवकुमार ने बहराइच, उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 2010 में हुई थी, तभी से मेरी बीवी अलग रहना चाहती थी पर मैं घर में अकेला कमाने वाला और सारा परिवार मेरे उपर निर्भर है। मेरे एक भाई और दो बहन हैं जो मुझ से छोटे हैं, मेरी माँ पिता जी और दादाजी सब मुझ पर निर्भर हैं। शादी के पहले महीने से घर मे क्लेश होता रहा और मेरे ससुराल वालों की नज़र मेरी प्रॉपर्टी पर थी। काफी बार झगडे हुए पर मैं ने संभाला। पर अक्सर वो मायके में ही रहना पसंद करती है और अपने माँ बाप की ही सुनती है। नतीजा यह हुआ कि मामला पुलिस तक पहुँच गया है और पिछले 4 महीनों से वह अपने मायके में रह रही है। परेशानी यह है कि मैंने उसे कई बार बुलाया पर वो आने से मना कर रही है और दहेज का केस करने को कह रही है। सब लोगों ने कहा था अगर एक बच्चा हो जायगा तो ये ठीक हो जाएगी। आज मेरे दो साल का एक सुन्दर बेटा है और वह भी सब कुछ झेल रहा है यहाँ तक कि झगड़े में मेरी बीवी ने काफी बड़ी ईंट मारी जो मेरे दो साल के बेटे के माथे में लगी। फिर भी उसे कोई गम नहीं है वह कहती कि सब आप की गलती है। अब वह अपने माँ और बाप के साथ रह रही है। मेरे अभी कुछ दिन पहले चोट लग गयी थी जब मैंने उसे बताया तो कहती कि मुझे कोई मतलब नहीं है। मैं अपना हिस्सा ले लूंगी। मैं उसे तलाक देकर अपने बेटे को पाना चाहता हूँ। क्यों कि मेरा बेटा अपनी माँ कि जगह मुझे और मेरी माँ को कि अपनी माँ कहता है। जब मेरा बेटा तीन महीने का था तब से मेरी माँ ने उसे ऊपर का दूध पिलाया और उसे संभाला। पर मेरी बीवी को तो उसकी लेट्रिन साफ़ करने में भी घिन आती थी और वो दो दो महीने तक बच्चे को छोड़ कर मायके में रहती थी। उस ने मेरे खिलाफ लगभग 6 महीने पहले वीमेन सेल में भी केस किया था। अब आप मुझे सलाह दीजिये कि किस तरह से मैं अपने बच्चे को पा सकता हूँ? क्या औरत अगर गलती करे तो कोई कानून नहीं है? सब कुछ आदमियों के लिए ही है।

समाधान-

प के परिवार में आप के सिवा आप के माताजी, पिताजी, दादाजी, भाई और दो बहनें तथा आप की पत्नी कुल आठ सदस्य हैं। आप की पत्नी को सारे घर के काम के साथ इन सब की सुनना, उन के आदेशों और इच्छाओं की पालना करना, फिर बच्चे को संभालने का काम करना है।आप यह कह सकते हैं कि सब मदद करते हैं, लेकिन फिर भी हमारे भारतीय परिवारों में इन सारे कामों का दायित्व एक बहू का ही समझा जाता है। लेकिन निर्णय करने की स्वतंत्रता सब से कम या नहीं के बराबर होती है। इस के अलावा उसे निजता (प्राइवेसी) लगभग बिलकुल नहीं मिलती। यहाँ तक कि पति के साथ बात करने का मौका रात को सोते समय मिलता है, तब तक वह इतना थक चुकी होती है कि उस स्थिति में नहीं होती। सूत्रों में बात करती है और अपनी बात तक ठीक से पति को बता तक नहीं सकती। यह मुख्य कारण है कि विवाह के बाद महीने भर बाद ही झगड़े आरंभ हो जाते हैं। ऐसे परिवारों की अधिकांश बहुएँ अलग रहने की सोचती हैं जहाँ वे हों उस का पति हो और बच्चा हो। वह केवल पति और बच्चे पर ध्यान दे। जब बहू मायके जाती है तो अपने ऊपर काम के बोझ, सुनने की बातें और भी बहुत कुछ बढ़ा चढ़ा कर बताती हैं जिस से माता पिता ध्यान दें और उस के साथ खड़े हों। फिर आप के जैसे विवाद सामने आते हैं। आप के जैसे परिवारों में इस का इलाज यही है कि परिवार को जनतांत्रिक तरीके से चलाया जाए।

मारे एक मित्र का परिवार भी इतना ही बड़ा है। यहाँ तक कि परिवार के दो सदस्य एक साथ व्यवसाय करते हैं जब कि एक सदस्य नौकरी करता है। लेकिन वे हर साल परिवार के 14 वर्ष से अधिक की उम्र के सदस्यों की एक बैठक करते हैं जिस में वे ये तय करते हैं कि कौन कौन क्या क्या काम करेगा जिस से सब को आवश्यकता के अनुसार आराम, प्राइवेसी मिल जाए। वे यह भी तय करते हैं कि परिवार की आमदनी कितनी है, उस में खर्च कैसे चलाना है, कैसे बचत करनी है। बचत में से नकद कितना कहाँ रखना है और कितना परिवार में नई वस्तुओं या स्थाई संपत्ति के लिए व्यय करना है। इस बैठक में बहुओं और बच्चों की जरूरतें और इच्छाएँ जानी जाती हैं, और उन से सभी बातों पर राय मांगी जाती है। उस के बाद लगभग सर्वसम्मति से तय होता है कि साल भर परिवार कैसे चलेगा। वर्ष के बीच आवश्यकता होने पर पूरा परिवार फिर से बैठ सकता है और महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर विचार कर सकता है।

प के परिवार में भी ऐसी कोई पद्धति होती जहाँ सब अपनी बात रखते, नई बहू को भी परिवार के एक सदस्य के रूप में उस बैठक में समान महत्ता प्रदान की जाती तो शायद यह समस्या ही खड़ी नहीं होती। पर आप की पत्नी को लगता है कि परिवार में उस की महत्ता कुछ नहीं है। उस की इच्छा का कोई महत्व नहीं है। उस का काम सिर्फ लोगों के आदेशों, इच्छाओं, अपेक्षाओं की पालना करना मात्र है। सब की सारी अपेक्षाएँ उस से पूरी हो नहीं सकतीं। यही विवाद का मूल विषय है। आप की पत्नी को अपनी इस समस्या का कोई हल नहीं सूझ पड़ता है सिवा इस के कि आप, वह और बच्चा अलग रहने लगे। उस ने हल आप के सामने प्रस्तुत भी किया। आप को यह हल पसन्द नहीं। दूसरे किसी हल का प्रस्ताव आपने किया नहीं। तब उस ने अपने मायके में गुहार लगाई और मायके वालों की शरण में जा कर उस ने अपनी बात के लिए लड़ाई छेड़ दी। अब वह सारे हथियारों को आजमाने को तैयार है।

विवाह विच्छेद आप की समस्या का हल नहीं है। क्या करेंगे ऐसा कर के। बच्चा या तो आप से दूर हो जाएगा या उस की माँ से। दूसरा विवाह करेंगे, फिर एक स्त्री को पत्नी बनाएंगे। उस से भी वैसी ही अपेक्षाएँ परिवार के सब लोग रखेंगे। वह भी उन्हें पूरी नहीं कर पाएगी। फिर से एक नई जंग आप के सामने खड़ी होगी। आप की समस्या का हल है कि आप खुद समस्या के मूल को समझें फिर अपने परिवार को समझाएँ। फिर आप के मायके वालों को और सब से अन्त में अपनी पत्नी को। हमारा यह सुझाव आसान नहीं है। किसी परिवार में इस तरह का जनतंत्र पैदा करना किसी क्रांति से कम नहीं है।

प कहते हैं कि औरत की गलती के लिए कानून नहीं है। है, न वही कानून है कि यदि आप का पड़ौसी या भाई आप पर ईंट फैंकने के लिए जो कानून है वही पत्नी के लिए भी है। लेकिन एक स्त्री जो अपना परिवार छोड़ कर दूसरे परिवार को अपनाती है उसे उस परिवार में शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना मिलती है तो उस के लिए धारा 498ए आईपीसी है, उस में पति और उस के सम्बंधियों को गिरफ्तार भी किया जा सकता है और सजा भी हो सकती है। आप कहेंगे कि पुरुष के लिए भी समान कानून होना चाहिए, लेकिन मैं आप से पूछूंगा कि हमारे समाज में कितने पुरुष अपने ससुराल में बहू बन कर जाते हैं। वे जाते भी हैं तो जमाई बन कर जाते हैं। उन के लिए ऐसे कानून की जरूरत नहीं जब कि स्त्रियों के लिए वास्तव में है।

किसी को जबरन विवाह के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

marriageसमस्या-

अयोध्या फैजाबाद, उत्तरप्रदेश से रोहित शर्मा ने पूछा है-

मेरा एक लड़की के साथ चार साल से रिश्ता था। उस ने मुझ से विवाह करने का वादा किया था। हमारा एक दूसरे के घरों पर आना जाना भी था। लेकिन अब वह अपने वादे से मुकर रही है और शादी के लिए शर्त रख रही है। इस रिश्ते के बारे में हम दोनों के मित्र और कालेज के सभी लोग जानते हैं। हम दोनों के साथ में चित्र भी हैं। मैं ने उस के संबंध के कारण उस के घर वालों के लिए बहुत कुछ किया है। वह मेरे घर पर भी रहती थी लेकिन अब अपने घर चली गई है। पहले वह होस्टल में रहती थी फिर मैं ने उसे रूम दिलवाया। अब आप बताइये इस विषय में क्या कानूनी कार्यवाही कर सकता हूँ जिस से मेरी उस से शादी हो जाए?

समाधान-

रोहित जी, इस तरह की समस्याएँ लड़कियों की ओर से तो मेरे सामने पहले आती रही हैं लेकिन कभी ऐसा नहीं सुना कि किसी लड़के को ऐसी समस्या हुई हो।

किसी लड़की या लड़के को जबरन विवाह करने को बाध्य नहीं किया जा सकता। विवाह तो दो वयस्क और विवाह योग्य व्यक्तियों के बीच उन की इच्छा से होता है। यदि उस लड़की ने आप से विवाह करने से मना कर दिया है या विवाह के लिए कोई शर्त रख रही है तो ऐसा वह कर सकती है। आप ने उस के लिए बहुत कुछ किया हो सकता है, लेकिन वह सब आप ने अपनी इच्छा से किया। उस के कारण आप उसे विवाह के लिए बाध्य नहीं कर सकते। ऐसा कोई कानूनी उपाय नहीं कि जिस से किसी लड़की या लड़के को विवाह के लिए बाध्य किया जा सके। आप किसी से विवाह के लिए कोई कानूनी कार्यवाही नहीं कर सकते।

मकान मालिक से किराया भुगतान की रसीद जरूर लें अन्यथा किराया बकाया माना जाएगा।

समस्या-

जबलपुर, मध्यप्रदेश से आशीष गांगुली ने पूछा है-

मैं चार वर्ष से दो कमरे के किराए के मकान में रहता हूँ। अब मकान मालिक हम से दिसंबर में मकान खाली करने को कह रहा है।  हम किराया समय पर देते हैं पर मकान मालिक किराए की रसीद नहीं देता है। हमें इस समय कुछ समस्या है। इस कारण से हम मकान कुछ समय बाद खाली करना चाहते हैं। अभी किराया 2200/- प्रतिमाह दे रहा हूँ जो अधिक है। मकान मालिक रुपए 3000/ प्रतिमाह चाहता है।  मैं अगले वर्ष मकान खाली करना चाहता हूँ।  मुझे क्या करना चाहिए जिस से मैं मकान में कुछ दिन और रह सकूँ।

समाधान-

प चार वर्ष से किराए पर रह रहे हैं, किराया अदा करते हैं और मकान मालिक किराए की रसीद नहीं देता है। कानून यह है कि यदि किराएदार के पास रसीद नहीं है तो यह माना जाएगा कि किराया अदा नहीं किया गया है। इस तरह यदि झगड़ा अदालत तक पहुँचा तो आप का पिछले चार वर्ष का किराया बकाया माना जाएगा। हालांकि तीन वर्ष से अधिक का बकाया किराया वसूलने के लिए कोई दावा नहीं किया जा सकता। आप के मामले में 36 महिने का बकाया किराया रुपए 79200/- की वसूली का वाद कभी भी मकान मालिक आप के विरुद्ध कर सकता है। इस लिए सभी किराएदारों के लिए यह जरूरी है कि वे मकान मालिक से किराए की रसीद अवश्य प्राप्त करें।  रसीद न देने पर किराया चैक से, मकान मालिक के बैंक खाते में जमा करवा कर अथवा मनिआर्डर से भेज कर अदा करें या किराया अदा न करें।

वास्तव में देश में ऐसी परिस्थितियाँ हैं कि आवास योग्य मकान कम हैं और निवासी अधिक। इन परिस्थितियों में किराए पर मकान देने के समय हर बार मकान मालिक का पलड़ा भारी रहता है और वह किराए की रसीद नहीं देता।  इस से वह अपना आयकर भी बचाता है।  इन परिस्थितियों में रसीद न होने पर किराया बकाया माने जाने का कानून  मकान मालिक के पक्ष में खड़ा हो जाता है साथ ही सरकार को आयकर का नुकसान भी होता है। यह कानून किराएदारों के लिए दमनकारी है। वास्तव में जब परिस्थितियाँ ऐसी हों कि मकान मालिक का पक्ष बलवान हो तो कानून यह होना चाहिए कि कोई भी बिना किराएनामे के मकान किराए पर नहीं देगा और किराएदार चाहे किराया दे या न दे पर किराए पर मकान उठाने पर किराएनामे में अंकित किराया मकान मालिक की आय मान कर उस पर आयकर देना होगा।  इस के साथ ही किराया कानून में यह उपबंध भी होना चाहिए कि यदि माह समाप्त होने के पन्द्रह दिनों में किराएदार द्वारा किराया अदा न करने के 30 दिनों में यदि मकान मालिक बकाया किराए का कोई लिखित नोटिस किराएदार को नहीं देता है तो उस माह का किराया भुगतान किया हुआ माना जाएगा।  लेकिन किसी भी देश में कानून हमेशा जन समूहों के दबाव से बनते हैं। आज कल सरकारों पर हमेशा मकान मालिक वर्ग का प्रभाव है।  इस कारण इस तरह का कानून बनाए जाने की संभावना बिलकुल नहीं है।

प की परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आप को मकान मालिक के दबाव में रहना ही होगा। उसे उस का इच्छित किराया देना होगा। अन्यथा मकान खाली करना होगा। हाँ, मकान खाली कराने के समय इतना अवश्य करें कि मकान मालिक से ऐसी रसीद प्राप्त कर लें कि मकान का कब्जा प्राप्त कर लिया है और कोई किराया बकाया नहीं है। अन्यथा मकान मालिक दावा करने की तिथि से 36 माह पहले तक के किराए का दावा कभी भी कर सकता है।

कानून, नियम और उन के अंतर्गत जारी अधिसूचनाएँ अंतर्जाल पर उपबल्ध क्यों नहीं ?

पिछले दिनों ‘तीसरा खंबा’ से पटना, बिहार के महेश कुमार वर्मा ने पूछा कि  “प्रा. कं., लि. कं., प्रा. लि. कं. इत्यादि कंपनी में क्या अंतर है?  यह भी बताएं कि ये सब कंपनी किस स्थिति में अपने कामगार को पी.एफ. की सुविधा देने के लिए बाध्य है तथा यदि कंपनी द्वारा पी. एफ. की सुविधा नहीं दी जाती है तो क्या करनी चाहिए?  यह भी बताएं कि पी.एफ. के अलावा अन्य कौन सी सुविधा देने के लिए कंपनी बाध्य है?”

हेश जो जानना चाहते हैं वह भारत का कोई भी नागरिक जानना चाह सकता है और यह जानकारी सहज ही प्राप्त होना प्रत्येक भारतीय नागरिक का कानूनी अधिकार होना चाहिए।  आखिर देश के प्रत्येक नागरिक को यहाँ के कानून जानने का अधिकार है और यह देश की सरकारों का कर्तव्य होना चाहिए कि वे नागरिकों के इस महत्वपूर्ण अधिकार की पूर्ति के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध कराएँ।  लेकिन देश के कानून, नियम और राजकीय अधिसूचनाएँ आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।  उन की प्रकाशित प्रतियों को बाजार का माल बना दिया गया है।  जिस का अर्थ यह है कि यदि कोई नागरिक इन्हें जानना चाहता है तो उसे बाजार जा कर इन्हें खरीदना पड़ेगा।

ज अंतर्जाल तक प्रत्येक नागरिक की पहुँच सब से आसान चीज है।  जो जानकारी अंतर्जाल पर उपलब्ध है उस तक पहुँचना आम नागरिक के लिए दुरूह और अधिक व्ययसाध्य नहीं है।  यूँ तो भारत सरकार का यह कर्तव्य होना चाहिए कि संसद द्वारा पारित सभी कानूनों और नियमों को अंग्रेजी और हिन्दी के अतिरिक्त सभी भारतीय भाषाओं में अंतर्जाल पर उपलब्ध कराए।  क्यों कि किसी भी कानून की पालना तभी संभव हो सकती है जब कि उस का नागरिकों को ज्ञान हो, या कम से कम जब भी वह इन के बारे में जानना चाहे उसे अपनी भाषा में आसानी से उपलब्ध हो।  इसी तरह सभी प्रदेशों को भी प्रादेशिक कानूनों और नियमों को अपने प्रदेशों की भाषाओं में उपलब्ध कराना चाहिए।  पर न तो केन्द्र सरकार ही इसे अपना कर्तव्य और दायित्व    मानती है और न ही राज्य सरकारें।  संसद और विधानसभाएँ कानून पारित करती हैं और सरकारी गजट में प्रकाशित कर छोड़ देती हैं।  गजट की प्रतियाँ सीमित होती हैं उतनी ही जितनी कि राजकीय विभागों के लिए आवश्यक हों।  इसी से वे लगभग अप्राप्य होते हैं।

किसी भी कानून को अंतर्जाल पर उपलब्ध कराना सरकारों के लिए कोई बड़ा व्यय साध्य काम नहीं है।  गजट में प्रकाशन के लिए आज कल सब से पहले कंप्यूटरों पर कानूनों और नियमों की सोफ्टकॉपी तैयार होती है।  सभी सरकारों के पास एनआईसी की अंतर्जाल व्यवस्था उपलब्ध है, उन के अपने सर्वर हैं और देश भर में फैला पूरा तामझाम है। सरकारों को करना सिर्फ इतना है कि राजकीय मुद्रणालय गजट प्रकाशन के लिए जो सोफ्टकॉपी तैयार करें उसे एनआईसी को उपलब्ध कराएँ और एनआईसी उसे तुरंत अन्तर्जाल पर उपलब्ध करा दे।  होना तो यह चाहिए कि प्रत्येक सरकार का राजकीय गजट मुद्रित रूप के साथ साथ अंतर्जाल पर भी प्रकाशित हो।

अंग्रेजी में तो यह काम आसानी से हो सकता है।  हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं की समस्या यह है कि राजकीय मुद्रणालय गजट की सोफ्टप्रति जिन फोण्टों में तैयार करते हैं वे यूनिकोड के नहीं हैं और उन्हें सीधे सीधे अंतर्जाल पर डालना संभव नहीं है।  इस के लिए सब से पहले तो एक ऐसे प्रशासनिक निर्णय की जरूरत है जिस से हिन्दी और क्षेत्रीय भाषाओं का कंप्यूटरों पर होने वाला सारा सरकारी कामकाज केवल यूनिकोड फोण्टों में होने लगे।  यदि हमें देश के तमाम कामकाज को कंप्म्प्यूटरों पर लाना है तो यह एक न एक दिन करना ही पड़ेगा तो फिर अविलम्ब क्यों न किया जाए?

ब तक सारा काम यूनिकोड़ फोण्टों में न होने लगे तब तक एनआईसी यह कर सकती है कि जिन फोण्टों में काम होता है उन से टेक्स्ट को यूनिकोड फोण्टों में परिवर्तित करने के लिए फोण्ट परिवर्तक तैयार कर ले और राजकीय मुद्रणालयों से सोफ्टकॉपी मिलने पर उस का फोण्ट परिवर्तित कर अंतर्जाल पर उन्हें प्रकाशित कर दे।  यह व्यवस्था बिना किसी विशेष खर्च के उपलब्ध साधनों के आधार पर सरकारें लागू कर सकती हैं।  देरी केवल सरकारों की इच्छा की कमी और निर्णय लेने अक्षमता में छुपी है। शायद हमारी सरकारें ही नहीं चाहतीं कि देश के नागरिकों को देश का कानून जानना चाहिए। शायद वे हमेशा इस बात से आतंकित रहती हैं कि यदि देश के कानून तक आम लोगों की पहुँच होने लगी तो वे अपना अंधाराज कैसे चला सकेंगे?

 

पत्नी पतिगृह छोड़, मुकदमा क्यों करती है?

समस्या-

मैंने आज तक जहाँ भी देखा है हर मामले में पत्नी अपने मायके में जाकर पति के ऊपर मुकदमा करती हुई मिली है।  आपके तीसरा खंबा में भी जितने मामले मैंने पढ़े है उन में भी पत्नी ने किसी न किसी कारण से पति का घर छोड़ अपने मायके जाकर पति के ऊपर मुकदमा किया है।  लेकिन मेरे मामले में बिलकुल उलट है मेरी पत्नी ने मेरे ही घर में रह करके मेरे ऊपर 498ए और घरेलू हिंसा अधिनियम में झूठे मुकदमे किए हैं।  मुझे मेरे ही घर से निकाल दिया है और खुद मेरे ही घर में मेरे बच्चों के साथ रह रही है। खुद 10,000/- रुपए महिने की नौकरी कर रही है।  क्या इस तरह के मामलों के लिए कोई खास धारा नहीं है? ये तो सभी जानते हैं कि पति के साथ गलत हो रहा है, पर पुलिस और प्रशासन कुछ करने को तैयार नहीं होता है।  मेरी सुनने वाला कोई नहीं है। घरेलू हिंसा अधिनियम में तो अदालत ने एक-तरफ़ा कार्यवाही करते हुए मुझ से अंतरिम खर्चा दिलाने की अंतिम 24.07.2012 दी है।  अब आप ही बताएँ मैं क्या करूँ?

-कमल हिन्दुस्तानी, हिसार, हरियाणा

समाधान-

त्नी क्यों पतिगृह छोड़ कर मायके जाती है और वहाँ जा कर मुकदमा क्यों करती है?  यह प्रश्न कानूनी कम और सामाजिक अधिक है।  इस मामले में सामाजिक अध्ययन किए जाने चाहिए जिस से उन कारणों का पता लगाया जा सके कि ऐसा क्यों हो रहा है?  जब तक इस तरह के सामाजिक अध्ययन समाज विज्ञानियों द्वारा नहीं किए जाएंगे और कोई अधिकारिक रिपोर्टें समाज के सामने नहीं होंगी तब तक उन कारणों के उन्मूलन और कानूनो के कारण हो रहे पति-उत्पीड़न का उन्मूलन संभव नहीं है।  वर्तमान में कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है यह सभी मानते और समझते हैं।  लेकिन कानूनों में कोई त्रुटि भी नहीं है जिस से उन्हें बदले या संशोधित करने का मार्ग प्रशस्त हो।  धारा 498-ए में बदलाव लाने के प्रयास जारी हैं।  इस संबंध में विधि आयोग ने प्रयास किए हैं और हो सकता है कि उन प्रयासों के नतीजे शीघ्र आएँ।  लेकिन यदि कानूनों में परिवर्तन हुए तो वे परिवर्तन की तिथि से ही लागू होंगे।  आज जिन लोगों के विरुद्ध मुकदमे चल रहे हैं उन्हें उन परिवर्तनों का लाभ नहीं मिलेगा।

कानूनों के दुरुपयोग की समस्या दो तरह की है।  धारा 498-ए में कोई बुराई नहीं है लेकिन पहली समस्या तो सामाजिक है। किसी पत्नी या बहू के साथ इस धारा के अंतर्गत मानसिक या शारीरिक क्रूरता का बर्ताव किए जाने पर अपराध बनता है।   लेकिन यदि आप ने एक बार भी अपनी पत्नी पर थप्पड़ मार दिया या किसी और के सामने यह कह भर दिया कि थप्पड़ मारूंगा तो वह भी क्रूरता है।  अब आप देखें कि भारत में कितने पुरुष ऐसे मिलेंगे जिन्हों ने इस तरह का बर्ताव अपनी पत्नी के प्रति नहीं किया होगा? ऐसे पुरुषों की संख्या नगण्य होगी। इस का अर्थ हम यही ले सकते हैं कि हमारा समाज हमारे कानून की अपेक्षा बहुत पिछड़ा हुआ है।  लेकिन भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा भी है जिस के लिए यही कानून उपयुक्त है।  हमारे सामने यह चुनौती है कि हम हमारे समाज को कानून की इस स्थिति तक विकसित करें।  एक बार एक प्रगतिशील कानून का निर्माण करने के बाद उस से पीछे तो नहीं ही हटा जा सकता।  कुल मिला कर यह एक सामाजिक समस्या है।

दूसरी समस्या पुलिस के व्यवहार के संबंध में है।  जब कोई महिला अपने पति के विरुद्ध शिकायत करना चाहती है तो वह किसी वकील से संपर्क करती है।  वकील को भी काम चाहिए।  वह महिला को उस के पति को परेशान करने के सारे तरीके बताता है, यहाँ तक कि वकीलों का एक ऐसा वर्ग विकसित हो गया है जो इस तरह के मामलों का स्वयं को विशेषज्ञ बताता है।  वह महिला को सिखाता है और सारे प्रकार के मुकदमे दर्ज करवाता है।  मामला पुलिस के पास पहुँचता है तो पुलिस की बाँछें खिल जाती हैं।  पुलिस को तो ऐसे ही मुकदमे चाहिए जिस में आरोपी जेल जाने से और सामाजिक प्रतिष्ठा के खराब होने से डरता है।  ऐसे ही मामलों में पुलिसकर्मियों को अच्छा खासा पैसा बनाने को मिल जाता है।  जो लोग धन खर्च कर सकते हैं उन के विरुद्ध पुलिस मुकदमा ही खराब कर देती है, उन का कुछ नहीं बिगड़ता और जो लोग पुलिस को संतुष्ट करने में असमर्थ रहते हैं उन्हें पुलिस बुरी तरह फाँस देती है।  इस तरह यह समस्या कानून की नहीं अपितु पुलिस और सरकारी मशीनरी में फैले भ्रष्टाचार से संबंधित है।  कुल मिला कर सामाजिक-राजनैतिक समस्या है।  इस के लिए तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ना पड़ेगा।

क बार पुलिस जब न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत करती है तो न्यायालयों का यह कर्तव्य हो जाता है कि वे उस मामले का विचारण करें।  देश में न्यायालय जरूरत के 20 प्रतिशत से भी कम हैं।  विचारण में बहुत समय लगता है और यही समय न केवल पतियों और उन के रिश्तेदारों के लिए भारी होता है अपितु पति-पत्नी संबंधों के बीच भी बाधक बन जाता है।  तलाक का मुकदमा होने पर वह इतना लंबा खिंच जाता है कि कई बार दोनों पति-पत्नी के जीवन का अच्छा समय उसी में निकल जाता है।  जब निर्णय होता तो नया जीवन आरंभ करने का समय निकल चुका होता है। कुल मिला कर समस्या सामाजिक-राजनैतिक है और सामाजिक-राजनैतिक तरीकों से ही हल की जा सकती है।  न्यायालय केवल कानून की व्याख्या कर सकते हैं, वे कानून नहीं बना सकते।

ब आप के मामले पर आएँ।  आप की पत्नी ने आप को अपने ही घर से कैसे निकाल दिया यह बात समझ नहीं आती।  या तो आप ने किसी भय से खुद ही घर छोड़ दिया है, या फिर आप ने वह घऱ अपनी पत्नी के नाम से बनाया हुआ हो सकता है।  मुझे कोई अन्य कारण नहीं दिखाई देता है।  यदि घर आप का है तो आप को वहाँ रहने से कौन रोक रहा है?  जब तक वह आप की पत्नी है आप उसे निकाल भी नहीं सकते।  आप पत्नी से तलाक ले लें तो फिर आप को यह अधिकार मिल सकता है कि आप उसे अपने मकान में न रहने दें। यह सब निर्णय हो सकते हैं लेकिन अदालतें कम होने के कारण इस में बरसों लगेंगे। यही सब से बड़ा दुख है और समस्या है।  पर इस का हल भी राजनैतिक ही है।  पर्याप्त संख्या में न्यायालय स्थापित करने का काम तो सरकारों का ही है और सरकारें सिर्फ वे काम करती हैं जिन के कारण राजनैतिक दलों को वोट मिलते हैं। जिस दिन राजनैतिक दलों को यह अहसास होगा कि पर्याप्त अदालतें न होने के कारण उन्हें वोट नहीं मिलेंगे उस दिन सरकार पर्याप्त अदालतें स्थापित करने का काम कर देंगी।

रेलू हिंसा के मामले के एक-तरफा होने का कारण तो केवल यही हो सकता है कि आप स्वयं सूचना होने के बाद भी न्यायालय में उपस्थित नहीं हुए हैं या हो गए हैं तो फिर अगली पेशियों पर आप स्वयं या आप का कोई वकील न्यायालय में उपस्थित नहीं हुआ।  ऐसे में न्यायालय के पास इस के सिवा क्या चारा है कि वह एक-तरफा कार्यवाही कर के निर्णय करे।  आप को सूचना है तो आप स्वयं न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो कर एक-तरफा सुनवाई किए जाने के आदेश को अपास्त करवा सकते हैं।  उस के बाद न्यायालय आप को सुन कर ही निर्णय करेगा।  यदि आप की पत्नी की आय 10,000/- रुपया प्रतिमाह है और आप इस को न्यायालय के समक्ष साबित  कर देंगे तो न्यायालय आप की पत्नी को गुजारा भत्ता नहीं दिलाएगा।  लेकिन आप के बच्चे जिन्हें वह पाल रही है उन्हें पालने की जिम्मेदारी उस अकेली की थोड़े ही है।  वह आप की भी है।  न्यायालय बच्चों के लिए गुजारा भत्ता देने का आदेश तो आप के विरुद्ध अवश्य ही करेगा।

 

पुरुषों के प्रति महिलाओं की हिंसा के लिए कानून

समस्या-

ब घर में पत्नी या बेटी या किसी अन्य महिला के साथ हिंसा का व्यवहार होता है तो वह पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकती है। लेकिन यदि कोई महिला या लड़की अपने परिजनों के विरुद्ध हिंसा का व्यवहार करे तो क्या कोई कानून नहीं है क्या? यदि है तो कृपया जानकारी प्रदान करें।

-दीपक कुमार, पानीपत, हरियाणा

समाधान-

ब भी कोई व्यक्ति (स्त्री या पुरूष) किसी अन्य व्यक्ति (स्त्री या पुरुष) के प्रति हिंसा का व्यवहार करता है तो वह एक अपराध दोषी होता है। उस के द्वारा की गई हिंसा किस तरह का अपराध है, इस से यह तय होता है कि उस ने क्या अपराध किया है। भारतीय दंड संहिता के उपबंधों को पढ़ कर यह जाना जा सकता है कि उस ने क्या अपराध किया है। उस हिंसक घटना की रिपोर्ट पुलिस को की जा सकती है। यदि पुलिस समझती है कि किया गया कृ्त्य एक संज्ञेय अपराध है तो वह उस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के कार्यवाही कर सकती है। यदि वह समझती है कि किया गया कृत्य असंज्ञेय अपराध है तो वह रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति को सलाह देती है कि उस मामले में वह व्यक्ति सीधे न्यायालय के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकता है।  यदि मामला असंज्ञेय अपराध का हो या संज्ञेय अपराध में पुलिस रिपोर्ट दर्ज न  करे तो वह व्यक्ति न्यायालय के समक्ष शिकायत प्रस्तुत कर सकता है। न्यायालय मामले को पुलिस को अन्वेषण करने के लिए प्रेषित कर सकता है अथवा स्वयं साक्षियों के बयान दर्ज कर अपराधी के विरुद्ध कार्यवाही कर सकता है। भारतीय दंड संहिता के ये उपबंध स्त्री या पुरुष दोनों ही यदि हिंसा कर के कोई अपराध करें तो प्रभावी होते हैं।  इस मामले में स्त्री पुरुष का कोई भेद नहीं किया गया है। ये अपराध क्या हैं और इन में से कौन से संज्ञेय (Cognizable) हैं और कौन से असंज्ञेय ( Non Cognizable) हैं यह दंड प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूची देख कर जाना जा सकता है।

लेकिन इस बात को तो आप भी स्वीकार करेंगे कि लगभग सारी दुनिया में मानव समाज पुरुष प्रधान है और स्त्री चाहे घर में रहे या कामकाजी हो उसे घर में पुरुषों की हिंसा का सामना करना पड़ता है। इस कारण से संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में स्त्री के प्रति घरेलू हिंसा को रोकने के लिए कानून बनाए गए हैं। भारत में भी ऐसा कानून बनाया गया है। लेकिन उस कानून में की गई किसी कार्यवाही में किसी को दंडित नहीं किया जा सकता है लेकिन हिंसा को रोकने के लिए और हिंसा की शिकार महिला को आर्थिक सहायता प्रदान करने के लिए आदेश पारित किए जा सकते हैं। यदि इन आदेशों की अवहेलना की जाए तो फिर वह अवहेलना अपराध होगी। इस कानून का यह अर्थ कदापि नहीं है कि कोई स्त्री यदि हिंसा करती है तो उस के विरुद्ध कार्यवाही नहीं की जा सकती है।

स के अतिरिक्त भारत में दहेज प्रथा और उस के या अन्य कारणों से महिलाओं को अपनी ससुराल में  क्रूरता का शिकार होना पड़ता है। इस के लिए भारतीय दंड संहिता में धारा 498-अ जोड़ी गयी है जो एक संज्ञेय अपराध है। ऐसी परिस्थिति पुरुषों के साथ नहीं है इस कारण से यह धारा केवल स्त्रियों के प्रति की गई क्रूरता के लिए है, न कि पुरुषों के प्रति क्रूरता के लिए। यदि कभी यह आदर्श स्थिति भारतीय समाज में उत्पन्न हो जाए कि स्त्रियों को इस तरह की क्रूरता और हिंसा का शिकार न होना पड़े और यह अपवाद स्वरूप रह जाए तो संभव है कि भारत की संसद इन कानूनों और उपबंधों की आवश्यकता न समझे और समाप्त कर दे। लेकिन यह संभावना अभी दूर दूर तक दिखाई नहीं देती।

कानूनों के संबंध में भ्रम फैलाते टी.वी. धारावाहिक

पूरे देश में ऐसा कौन सा थाना है जो केवल टेलीफोन पर मिली बेनामी सूचना पर एफआईआर दर्ज कर लेता है और बिना कोई अन्वेषण किए बेनामी सूचना में बताए गए कथित अपराधी को गिरफ्तार कर लेता है? वह भी तब जब कि वारदात में घायल व्यक्ति जिस नाम के अस्पताल में भर्ती बताया जा रहा है शहर में उस नाम का कोई अस्पताल नहीं है। फिर अचानक अपराधी का एक रिश्तेदार सीधे मजिस्ट्रेट के पास पहुँच जाता है और इस गलती की ओर ध्यान दिलाता है। मजिस्ट्रेट फोन पर ही कथित अपराधी को रिहा कर देने का आदेश थानाधिकारी को दे देता है, लेकिन थानाधिकारी से यह भी नहीं पूछता कि इस तरह बिना किसी सबूत के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार क्यों किया गया।

देश में ऐसा पुलिस थाना मिले न मिले हिन्दी के मनोरंजन चैनलों के मशहूर धारावाहिकों में ऐसे दृश्य आम हैं जिनमें मनमर्जी से कानूनों और कानूनी प्रक्रियाओं को गलत रीति से दिखाया जाता है। इतना ही नहीं, भाई की जमानत के लिए भाई पिता से कुछ खाली कागजों पर अंगूठा करवा लेता है और उन कागजों के आधार पर वह अपने पिता की सारी अचल संपत्ति अपने नाम हस्तान्तरित करने का दस्तावेज उप पंजीयक के दफ्तर में पंजीकृत करवा लेता है।  इस तरह का दस्तावेज पंजीकृत होते ही भाई में इतनी ताकत आ जाती है कि वह जायदाद अपने कब्जे में कर अपने माता-पिता, दादी और भाभी को अपने घर से निकाल देता है और वे निकल भी जाते हैं।  लेकिन वास्तविक जीवन में देखें तो पाएंगे कि एक दस्तावेज पंजीकृत कराने के लिए न केवल दस्तावेज निष्पादित करने वाले व्यक्ति अपितु जिस के नाम जायदाद हस्तांतरित हो रही है उस व्यक्ति के और गवाहों तक के पहचान पत्र देखे जाते हैं, उन के छायाचित्र दस्तावेज और पंजिकाओं में चिपकाए जाते हैं, उन्हें पंजीयक के कार्यालय में उपस्थित होना जरूरी है जहाँ एक कैमरा उन के चित्र लेता है जो पंजीकृत होने वाले दस्तावेजों के साथ और पंजीयक के कार्यालय के रिकार्ड में रखे जाते हैं। बिना किसी व्यक्ति के उप पंजीयक के कार्यालय में उपस्थित हुए उस की जायदाद किसी अन्य व्यक्ति के नाम हस्तान्तरित नहीं की जा सकती। यदि कोई दस्तावेज ऐसा पंजीकृत हो भी जाए तब भी कोई किसी को उस के निवास स्थान से केवल दस्तावेज के आधार पर नहीं निकाल सकता और निकालने की कहे तब भी कोई क्यों निकलेगा? सब जानते हैं कि जब तक अदालत कब्जा दूसरे को सौंप देने का आदेश न दे दे तब तक किसी व्यक्ति से अचल संपत्ति का कब्जा हासिल नहीं किया जा सकता।

ये तो अक्सर टीवी दर्शक धारावाहिकों में देखते हैं कि एक हिन्दू पति अपनी पत्नी के हस्ताक्षर कुछ कागजों पर हासिल करता है और दोनों का तलाक हो जाता है। जब कि किसी भी हिन्दू दम्पति का विवाह विच्छेद केवल और केवल न्यायालय ही स्वीकृत कर सकता है। यदि यह तलाक दोनों स्वेच्छा से भी ले रहे हों तब भी अर्जी दाखिल करने की तारीख के छह माह की अवधि व्यतीत होने के पहले तलाक मंजूर किया जाना संभव नहीं है।

क और दृश्य है। एक खाद्य निरीक्षक मिठाई के दुकान मालिक को नोटिस भेजता है कि वह मिठाई के नमूने उस के दफ्तर में जमा कराए। फिर वह रिश्वत मांगने उस के घर पहुँच जाता है। दुकानदार की पत्नी उसे रिश्वत मांगने के लिए बेइज्जत कर घर से निकाल देती है। दुकानदार निर्धारित अवधि में मिठाई के नमूने खाद्य निरीक्षक के दफ्तर में जमा करवा देता है। नमूने जाँच के लिए प्रयोगशाला भेजे गए हैं या नहीं यह नहीं दिखाया जाता लेकिन अगले  दिन ही खाद्य निरीक्षक मिठाई वाले की दुकान पर ताला लगा कर उसे सील कर देता है। फिर निरीक्षक आ कर दुकानदार को कहता है, देख लिया रिश्वत न देने और पत्नी की बात मानने का नतीजा। जब कि खाद्य निरीक्षक को किसी भी खाद्य सामग्री विक्रय करने वाले दुकानदार को नोटिस भेजने की कोई आवश्यकता नहीं है।  वह सीधे दुकान पर आ कर दुकानदार की मौजूदगी में बेची जा रही खाद्य सामग्री के नमूने सील कर सकता है और उन्हें प्रयोगशाला भेज सकता है। प्रयोगशाला की रिपोर्ट में मिलावट पाए जाने पर दुकानदार के विरुद्ध मुकदमा चला सकता है लेकिन खाद्य सामग्री विक्रय करने के स्थान को बंद कर के सील नहीं कर सकता।

रोज ही ऐसे दृश्य टेलीविजन पर दिखाए जा रहे हैं जिन में कानूनी स्थितियों को गलत तरीके से दिखाया जाता है। ऐसा नहीं है कि यह कहानी की जरूरत हो। इस के पीछे सब से बड़ी वजह तो इन दृश्य लेखकों की अज्ञानता है। जब वे किसी दृश्य को लिखने बैठते हैं तो यह जानकारी करने की कोशिश नहीं करते कि जो दृश्य वे लिख रहे हैं उस में कानूनी बातों को सही ढंग से दिखाया जा रहा है या नहीं। सीरियलों के निर्माता भी इस बात का प्रयास नहीं करते। इन मामलों पर कोई शोध नहीं होता। यहाँ तक वे कानून के किसी साधारण जानकार से सलाह लेना तक जरूरी नहीं समझते। इस तरह हम पाते हैं कि हमारे लेखक और हमारा मीडिया कानून और कानूनी स्थितियों को सही रूप में दिखाने के प्रति बिलकुल लापरवाह है। वह इस बात की चिंता नहीं करता कि कानूनी स्थितियों को गलत रूप में दिखाने पर आम लोग यह समझने लगते हैं कि देश का कानून ऐसा ही है जैसा उन दृश्यों में दिखाया जा रहा है। टीवी और सिनेमा जो दृश्य माध्यम हैं उन पर जनता को शिक्षित करने का भी भार है। गलत तथ्यों का जनता के बीच प्रचार कर के वे कानूनों और कानूनी स्थितियों के बारे में भ्रम फैला रहे होते हैं। क्या ऐसा करना देश और समाज के प्रति एक गंभीर अपराध नहीं है?

कानून का सिद्धान्त है कि प्रत्येक व्यक्ति को उस पर लागू होने वाले कानूनों की जानकारी होना चाहिए। कभी किसी कार्यवाही में कोई व्यक्ति यह प्रतिरक्षा नहीं ले सकता कि उसे इस कानून की जानकारी नहीं थी। लेकिन यह भी सच है कि सारे कानून न तो सब वकील जानते हैं और न ही हमारे देश के मजिस्ट्रेट और न्यायाधीश। जब उन के सामने कानूनी मामले आते हैं तो उन्हें भी कानूनों को बार बार पढ़ना होता है। ऐसे में न केवल राज्य की यह जिम्मेदारी हो जाती है कि वह कानूनी जानकारियों को आम जनता को इस तरह उपलब्ध कराए कि जो भी कानूनी जानकारी प्राप्त करना चाहता है उसे वह मुफ्त और सहज उपलब्ध हो। अभी तक केन्द्र और राज्य सरकारें अपने इस कर्तव्य को पूरा करने में असफल रही हैं। लेकिन वे इतना तो कर ही सकती हैं कि किसी भी रूप में चाहे वह साहित्य, कहानी, उपन्यास या टीवी सीरियल आदि ही क्यों न हों जनता के बीच कानूनों और सामाजिक गतिविधियों को गलत रूप में प्रस्तुत करने से रोकें। हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे देश में ऐसा कोई कानून नहीं है जो कृतिकारों को अपनी कृतियों में कानून और कानूनी स्थितियों को सही रूप में दिखाने के लिए बाध्य करता हो और गलत रूप में दिखाने को रोकने के उपाय करता हो तथा इसे एक दंडनीय अपराध घोषित करता हो।

व्यर्थ सिद्ध हो रहे हैं क्रूरता से महिला और बच्चों के संरक्षण के कानून

त्तर प्रदेश के एक नगर से 24 वर्षीय नन्दिनी का फोन मिला, वह एम. ए. है। वह बता रही थी कि उस के पति रात के डेढ़-दो बजे तक किसी अन्य महिला से बात करते रहते हैं। उस के साथ उन के रिश्ते भी हैं। उसे उसका देवर ही बताता है कि पति कब और कहां उस महिला के साथ देखे गए। पति से बात करती है तो बदले में मारपीट मिलती है। उस के साथ सास का व्यवहार भी ठीक नहीं है। एक साल का बच्चा है। बच्चे के प्रति भी पति और सास का व्यवहार ठीक नहीं है। उसे लगता है कि न केवल उस का अपितु उस के बच्चे का भविष्य अंधकार में है। मायके में उसे कोई संरक्षण उपलब्ध नहीं है। उस का मोबाइल कभी भी छिन सकता है। वह अपने ससुराल से निकल जाना चाहती है और अपने पैरों पर खड़ी हो कर बच्चे को पाल-पोस कर किसी लायक बनाना चाहती है। वह पूछती है कि वह क्या करे?

स बीच मेरे पास एक महिला अपनी सत्रह वर्षीय पुत्री को साथ ले कर आती है। विवाह को तेईस वर्ष हो चुके हैं। पुत्री ने बारहवीं की परीक्षा दी है और इंजिनियरिंग करना चाहती है। एक बड़ी पुत्री बाहर किसी कॉलेज में पढ़ रही है। पति दुकानदार हैं। विवाह के बाद से ही अच्छा दहेज न लाने के कारण सास ने उस के साथ दुर्व्यवहार किया। पति रोज शराब के नशे में घर लौटता है। महिने में दो-बार पति उस की पिटाई कर देता है। दोनों पुत्रियों के साथ भी उस का व्यवहार ठीक नहीं है। अब तक वह दोनों पुत्रियों की पढ़ाई का खर्च उठा रहा था। घर खर्च के लिए उतना ही देता है जितने में मुश्किल से खर्च चल जाए। एक छोटे मकान में वे रहते हैं जो महिला के स्वयं के नाम है। एक रात को पति ने महिला और बेटी के साथ मारपीट की। दोनों माँ बेटी ने एक कमरे में बन्द रह कर रात बिताई। अगले दिन माँ बेटी ने खुद को घर में बंद कर लिया और पति को अंदर न आने दिया। पति ने तीन चार दिन चक्कर लगाए लेकिन अब घर आना बंद कर दिया है। दस वर्ष पहले महिला की रिपोर्ट पर 498-ए का मुकदमा पति के विरुद्ध बना था। लेकिन पति ने तब अच्छे व्यवहार का वायदा कर समझौता कर लिया। पति का व्यवहार कुछ महिने ठीक रहा, उस के बाद फिर से मार पिटाई आरंभ। महिला अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती। लेकिन यह भी चाहती है कि पति उस की बेटियों की पढ़ाई, उन के विवाह और उस का व बेटियों के पालन पोषण का खर्च देता रहे। पति ने खर्च देने से हाथ खींच लिया है। वह जानता है कि महिने भर में ही पत्नी और बेटियाँ मोहताज हो जाएंगी। इस महिला के पास भी मायके से कोई संरक्षण नहीं है और वह इस स्थिति में भी नहीं कि इस उम्र में वह अपने पैरों पर खड़ी हो जाए। होना भी चाहे तो भी उसे कुछ समय किसी न किसी की मदद मिलना जरूरी है। पति सारे हालात जानता है वह इसी तरह उन्हें ब्लेक मेल करता रहेगा।

संसद ने कानून बना रखा है। पति और ससुराल वाले शारीरिक या मानसिक क्रूरता का व्यवहार करें तो धारा 498-ए में पति को जेल भेजा जा सकता है उसे सजा दी जा सकती है। पत्नी को अलग रहने का अधिकार भी है। उक्त दोनों पत्नियाँ पति के विरुद्ध कार्यवाही चाहती हैं। लेकिन उन के जीने के साधन भी  केवल पति ही उपलब्ध कराता है। वे कोई कार्रवाई करें तो पति गिरफ्तार हो जाएगा। उसी के साथ पत्नी और बच्चों के भरण पोषण के साधन छिन जाएंगे। पति कुछ दिनों में जमानत करा लेगा और अपने काम पर लौट जाएगा। कानून यह भी है कि अदालत पत्नी और बच्चों का भरण पोषण हेतु  प्रतिमाह पर्याप्त राशि पत्नियों को देने का आदेश दे सकती है। इस तरह का आदेश प्राप्त करने में कुछ महीनों से ले कर कुछ साल लग सकते हैं। फिर भी पति यदि आदेश का पालन न करे तो उस का पालन करवाने के लिए पत्नी को अलग से कार्रवाई करनी पड़ेगी। हो सकता है पत्नियों को कुछ साल अदालतों के चक्कर काटने पर भरण-पोषण राशि मिलने लगे। लेकिन तब तक उन का जीवन कैसे चले?

कार्रवाई आरंभ करने के दो-तीन माह में ही वे मजबूर हो जाएंगी अपने अपने पतियों से समझौता करने लिए। वे हालात से समझौता कर लेंगी। पति उन्हें फिर से गालियां देने लगेंगे, फिर से उन के साथ मारपीट करेंगे। पत्नियां समझ जाएंगी कि गालियां खाकर, मारपीट सह कर पति की सेवा करते रहना ही उन के जीवन का सच है।  नन्दिनी पढ़ी लिखी है वह अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है। लेकिन उस के लिए उसे कुछ समय चाहिए। लेकिन तब तक वह पतिगृह त्याग कर कहां रहे? खुद को और बच्चे को कैसे बचाए रखे? दूसरी महिला के साथ भी यही समस्या है। दोनों महिलाएं जीना नहीं चाहतीं। मन करता है कि अपना जीवन समाप्त कर लें। लेकिन दोनों के बच्चे उन के प्रति ममता उन्हें रोक लेती है।

कानून के पास पतियों के विरुद्ध कार्यवाही करने और परिणाम  आने में लगने वाले समय में पत्नियों और बच्चों के संरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। समाज तो पुरुष प्रधान है ही। वह ऐसी व्यवस्था क्यों करने लगा? किसी सरकार ने भी ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की है जिस से पत्नी और बच्चों को इस काल में सरंक्षण मिल सके, पत्नी और बच्चों का जीवन बना रहे और बच्चों की पढ़ाई जारी रह सके। क्रूरता से महिलाओं और बच्चों के बचाव के सारे कानून इसी कारण से व्यर्थ सिद्ध हो रहे हैं। क्या सरकार और समाज को इस के लिए कोई व्यवस्था नहीं करना चाहिए? क्या इस पर कोई सोच भी रहा है?

कानूनी समस्या को किस तरह प्रस्तुत करना चाहिए?

समस्या-

मेरे पिताजी ने अपनी ३/४ जमीन अपने भाई की विवाहिता बेटी को रजिस्ट्री कर दी है। मैं उनका इकलौता पुत्र हूँ बाकी भी मुझे नहीं देना चाहते। मैं क्या करूँ ?

-इन्द्र कुमार, मऊ, उत्तर प्रदेश

समाधान-

प ने अधूरी समस्या सामने रखी है।  विधि से संबंधित कोई भी प्रश्न पूछने के साथ प्रत्येक विवरण देना चाहिए। इस प्रश्न में यह नहीं बताया गया है कि पिताजी के पास जो जमीन थी वह उन की स्वअर्जित थी या उन्हें उन के पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी या फिर उन के पास दोनों प्रकार की जमीन थी? यह भी स्पष्ट नहीं है कि उन्हों ने भाई की विवाहिता पुत्री के नाम रजिस्ट्री किस तरह की करवाई है वह दानपत्र है या रिलीज डीड है या फिर विक्रय पत्र है? प्रश्न वास्तव में इस प्रकार होना चाहिए कि ‘मेरे पिता के पास कुल 4.6 हैक्टर जमीन थी, जिसमें से 3.2 हैक्टर जमीन उन्हें उन के पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तथा 1.4 हैक्टर जमीन उन्हों ने स्वयं खरीदी थी। उन्हों ने 3.2 हैक्टर जमीन जो उन्हें पिता से प्राप्त हुई थी उस के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री अपने भाई की बेटी के नाम रजिस्ट्री करवा कर हस्तांतरित कर दी है। मैं उन का इकलौता पुत्र हूँ, वे मुझे कुछ भी नहीं देना चाहते। मुझे क्या करना चाहिए? ‘ 

मैं यह मान कर चलता हूँ कि आप के पिता के पास सारी जमीन ऐसी थी जो उन्हें अपने पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी। वैसी स्थिति में वह जमीन पुश्तैनी हुई तब उस जमीन में आप का हक भी है और आप के पिता आप की सहमति के बिना उसे विक्रय या हस्तांतरित नहीं कर सकते थे। आप को उस विक्रय पत्र के पंजीयन को निरस्त करवाने के लिए तथा जमीन के बंटवारे के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करना चाहिए। लेकिन यदि आप के पिता की जमीन स्वअर्जित है तो आप कुछ भी नहीं कर सकते। यदि उन के पास कुछ जमीन स्वअर्जित है और कुछ पुश्तैनी (उत्तराधिकार में प्राप्त) है तो आप पुश्तैनी जमीन के लिए उक्त कार्यवाही कर सकते हैं लेकिन पिता की स्वअर्जित जमीन के लिए कुछ भी नहीं कर सकते।

 मैं आशा करता हूँ कि आप को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा। यदि न मिला हो तो समस्या को स्पष्ट कर के भेजें।  समस्या का समाधान होगा। अन्य पाठकों को भी इस से समझ आ गया होगा कि समस्या को किस  तरह प्रस्तुत करना चाहिए।

औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 क्या है ?

ज जब किसी उद्योग के कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया जाए, उसे उस की नौकरी का लाभ न दिया जाए, या कर्मचारी अपनी सेवा शर्तों को गैरवाजिब मान कर हड़ताल कर दें या फिर स्वयं उद्योग के प्रबंधक ही उद्योग में तालाबंदी, छंटनी या ले-ऑफ कर दें तो हमें तुरंत औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 की याद आती है। मौजूदा औद्योगिक विवाद अधिनियम आजादी के तुरंत पहले 1 अप्रेल 1947 को अस्तित्व में आया था। इस के लिए केन्द्रीय असेम्बली में विधेयक 8 अक्टूबर 1946 को प्रस्तुत हुआ था तथा दिनांक 31 मार्च 1947 को पारित कर दिया गया था। तब से अब तक 1956, 1964, 1965, 1971, 1972, 1976, 1982, 1984,1996 तथा 2010 में इस अधिनियम में संशोधन किए गये हैं। इस के अतिरिक्त अन्य विधेयकों के द्वारा भी इस में 28 बार संशोधित किया गया है। इस तरह इस अधिनियम को कुल 38 बार संशोधित किया गया है।

ब्रिटिश भारत में सर्वप्रथम 1929 में ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल लाया गया था। इस बिल के द्वारा जनउपयोगिता के उद्य़ोगों में हड़ताल और तालाबंदी को प्रतिबंधित कर दिया गया था। लेकिन उन औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए कोई विकल्प प्रदान नहीं किया गया था और इसे दमनकारी माना गया था। युद्ध के दौरान इस अधिनियम के इस अभाव को दूर करने के लिए डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स के नियम 81-ए में प्रावधान किया गया था कि केन्द्र सरकार किसी भी ओद्योगिक विवाद को न्यायाधिकरण को सौंप सकती है और उस के द्वारा प्रदान किए गए अधिनिर्णय को लागू करवा सकती है। ये नियम युद्ध की समाप्ति के साथ ही दिनाक 1 अक्टूबर 1946 को समाप्त हो गये लेकिन नियम 81-ए को इमर्जेंसी पावर्स (कंटीन्यूएंस) ऑर्डीनेंस 1946 से इसे जारी रखा गया। इसी ऑरडीनेंस के स्थान पर बाद में औद्योगिक विवाद अधिनियम अस्तित्व में आया।

द्योगिक विवादों का अन्वेषण तथा उन का समाधान करना औद्योगिक विवाद अधिनियम-1947 का प्रमुख उद्देश्य है। इस अधिनियम के अंतर्गत दो तरह की संस्थाएँ बनाई गईं। बड़े उद्योगों में जहाँ 100 या उस से अधिक श्रमिक नियोजित हों श्रमिकों और नियोजकों के प्रतिनिधियों की संयुक्त वर्क्स कमेटी बनाने का उपबंध किया गया। वहीं औद्योगिक विवादों के समाधान केलिए समझौता अधिकारियों की नियुक्ति और बोर्डों का गठन करने के उपबंध किये गए। समझौता संपन्न न होने पर औद्योगिक विवादों के न्याय निर्णयन के लिए श्रम न्यायालय, औद्योगिक न्यायाधिकरण की व्यवस्था की गई तथा हड़तालों व तालाबंदियों को रोकने के लिए भी उपबंध किए गए हैं।

ब तक आप यह सोचने लगे होंगे कि ये औद्योगिक विवाद क्या हैं? इस का समाधान कैसे संभव होता है? क्या किसी एक श्रमिक के साथ उस के नियोजक द्वारा की गई हर नाइंसाफी का कोई इलाज इस अधिनियम में है? यदि नहीं तो फिर उन के लिए क्या मार्ग हैं? ऐसे ही अनेक और भी प्रश्न आपके जेहन में उभर रहे होंगे। हम तीसरा खंबा पर सप्ताह में एक बार इन्ही प्रश्नों से रूबरू होने का प्रयत्न करेंगे। संभवतः प्रत्येक शनिवार को। औद्योगिक विवादों की जानकारी में लेने वाले पाठक हर शनिवार को इस की प्रतीक्षा कर सकते हैं। यदि इस कानून से संबंधित कोई भी जिज्ञासा किसी पाठक को हो तो वह अपने प्रश्न हमें टिप्पणियों के माध्यम से रख सकता है। हर जिज्ञासा का उत्तर देने का प्रयत्न किया जाएगा।

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