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जमीन पर कब्जा प्राप्त करने के लिए राजस्व न्यायालय में वाद प्रस्तुत करें।

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

दीप नवेरिया ने ग्राम रानेह, तहसील हट्टा, जिला दमोह, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ ने एक कृषि की जमीन दो एक साल पहले खरीदी थी। एक साल बाद उसका सीमांकन करवाया तो पता चला कि वह जमीन दूसरा ब्यक्ति दस साल से जोत रहा है, उसकी जमीन उसी क्षेत्र में दूसरी तरफ है और उसकी जमीन कोई दूसरा जोत रहा है लेकिन यह न तो अपनी जमीन का सीमांकन करवा रहा है और न ही हमारी जमीन जो माँ ने खरीदी थी उसे छोड़ रहा है। इसके लिये मैंने पुलिस के पास रिपोर्ट की थी कि मेरी क्रय जमीन दूसरा जोत रहा है। इसके लिये पुलिस कार्यवाही कर रही है जिसमें पुलिस सबके बयान ले रही है। उसके भी बयान लिये गये जिससे हम ने जमीन खरीदी है लेकिन वह महिला जिसकी जमीन थी पुलिस के पास यह कह रही है कि मैंने जमीन नही बेची। यह मुझसे धोका में विक्रय की गई है। मेरे पास जमीन के पूर्ण सरकारी कागज हैं रजिस्ट्री है, बही है, खसरा नक्शा है, इंटरनेट पर रिकार्ड है। फिर भी वह महिला उस ब्यक्ति के दबाब में बयान दे रही है जो उस महिला की जमीन दस साल से जोत रहा है। महिला 80 साल की है क्या सर पुलिस के पास यह केस सुलझ सकता है या कोर्ट में केस कर सकते हैं? किस कोर्ट में केस करना सही होगा? वह महिला दबाब में पलट रही है जिसने हमे जमीन बेची। क्या यह हमारे लिये नुकसान पहुँचा सकता है? क्या उस महिला के बयान से रजिस्ट्री फेल हो सकती है जो एक साल पहले हमने खरीदी थी कृपा मुझे सुझाव दीजिये।

समाधान

प को इस मामले में तुरन्त स्थानीय वकील से संपर्क करना चाहिए। कुछ तथ्य हैं जो आप की समस्या से गायब हैं। जमीन आप खरीद चुके हैं लेकिन जमीन पर कब्जा किसी और का है। आप जमीन के स्वामी तो हो गए हैं लेकिन आप को कब्जा नहीं मिला है। नपवाने पर पता लगा कि दूसरा उस पर काबिज है। दूसरा काबिज है यह बात आप को सरकारी सीमांकन से पता लगी है तो वह सही है। आप को उस जमीन पर अपने मालिकाना हक के आधार पर कब्जा प्राप्त करने के लिए राजस्व न्यायालय में वाद प्रस्तुत करना चाहिए। इस के लिए स्थानीय स्तर पर किसी राजस्व मामले देखने वाले अच्छे वकील से संपर्क कर के उस की मदद लेना उचित होगा।

प उस जमीन के स्वामी हैं। उस महिला द्वारा बयान दे देने मात्र से पंजीकृत विक्रय पत्र निरस्त नहीं होगा। इस के लिए उस महिला को विक्रय पत्र निरस्त करवाने के लिए दीवानी वाद रजिस्ट्री की तिथि से 3 वर्ष की अवधि में प्रस्तुत करना होगा। जिस में जमीन की रजिस्ट्री में अंकित कीमत पर उसे कोर्ट फीस अदा करनी होगी। यह कोर्ट फीस कोई दे सकेगा इस में संदेह है। इस कारण हमें लगता है कि आप का उस जमीन पर स्वामित्व सुरक्षित है। आप ने जो रिपोर्ट कराई है उस से आप को या किसी अन्य व्यक्ति को कुछ हासिल होगा यह संदेहास्पद है. ऐसे मामलों में पुलिस दीवानी या राजस्व मामला बता कर अन्तिम रिपोर्ट प्रस्तुत कर देती है।

स कारण आप को चाहिए कि आप तुरन्त किसी राजस्व वकील से मिल कर अपने स्वामित्व की भूमि पर कब्जा प्राप्त करने हेतु कार्यवाही करें। देरी न करें।

उत्तर प्रदेश में विवाहित पुत्रियों को कृषि भूमि में उत्तराधिकार नहीं।

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

अनीता तिवारी ने बदरिया, सोरों, कासगंज, उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ को उनके मौसिया ससुर ने 22 बीघा (एग्रीकल्चर लैंड) कृषि भूमि सन् 1988 में वसियत कर दी थी। मेरी माँ की मृत्यु सन 2008 में हो गयी। ये 22 बीघा जमीन के साथ एक मकान है। मेरी माँ के मरने के बाद जमीन व मकान लेखपाल ने मेरे भाई के नाम कर दिए। हम तीन भाई बहन हैं हम तीनों ही शादीशुदा व बाल बच्चेदार हैं। हम दो बहनें एक भाई है। क्या मुझे माँ की पुश्तैनी जमीन व मकान में से हिस्सा मिल सकता है? हम ने कोर्ट में मुकदमा डाला हमारे एडवोकेट ने हम से कहा कि शादी शुदा बेटी के लिए जमीन व मकान में हिस्सा नही मिल सकता। वकील ने कहा कि कौन से कानून के तहत व कौन सी धारा में मुकद्दमा डालूँ? मुझे हर हालत में अपनी माँ की पुश्तैनी एग्रीकल्चर लैंड की जमीन व मकान में हिस्सा चाहिए। एडवोकेट बार बार मना कर रहा है कि यह एग्रीकल्चर लैंड की जमीन में हिस्सा मिलना कानून में ही नहीं है। कृपया कर धारा व कानून बताएँ।

समाधान

ब से पहले तो हम आप को बताना चाहते हैं कि आप की कृषि भूमि और मकान पुश्तैनी संपत्ति नहीं हैं। पुश्तैनी संपत्तियाँ केवल वही हैं जो 17 जून 1956 के पूर्व किसी हिन्दू पुरुष को अपने पुरुष पूर्वज अर्थात् पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। आप की माताजी को संपत्ति वसीयत से प्राप्त हुई है जो कि पुश्तैनी नहीं है। वैसे भी 1956 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी होने के बाद से स्त्रियों की संपत्ति उन की व्यक्तिगत संपत्ति ही मानी जाती है वह पुश्तैनी नहीं होती।

भारत में कृषि भूमि राज्यों के कानूनों से शासित होती है। कृषि भूमि का स्वामित्व राज्य का होता है, तथा कृषक उस पर केवल एक खातेदार होता है अर्थात उस की हैसियत किराएदार जैसी होती है। उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि पर हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी न हो कर जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी होता है जिस में विवाहिता पुत्रियों को उत्तराधिकार में सम्मिलित नहीं किया गया है, अविवाहित बेटियों को भी 2008 में सम्मिलित किया गया है। इस तरह आप के वकील सही कहते हैं कि विवाहित पुत्री को कृषि भूमि में उत्तराधिकार प्राप्त नहीं है। इस कृषि भूमि में आप का और आप की बहिन का कोई हिस्सा नहीं है। आप को उन की बात पर विश्वास करना चाहिए। यदि आप को विश्वास न हो तो आप किसी दूसरे वकील से मिल कर बात कर सकते हैं। यदि दो राय हो जाएँ तो जरूर एक गलत होगी, उस की पुष्टि किसी तीसरे से की जा सकती है।

कान यदि कृषिभूमि का हिस्सा है तो वह भी इसी अधिनियम से शासित होगा और उस में भी आप का हिस्सा नहीं है। लेकिन यदि मकान आबादी भूमि पर है तो उस में आप का हिस्सा हो सकता है क्यों कि आबादी भूमि पर स्थित संपत्ति पर हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी होगा। इस मामले में आप स्पष्ट रूप से स्थानीय वकील को बताएँ कि मकान आबादी भूमि पर है उस में आप का हिस्सा हो सकता है। वह आप को स्थानीय कानून के अनुसार राय दे देगा।

माता-पिता की सेवा करने मात्र से कोई पुत्र उन की संपत्ति का अधिकारी नहीं होता।

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

सुरेश प्रजापत ने डूंगरपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी का देहांत करीबन १५ वर्ष पहले हो चुका है। हम तीन भाई हैं और हमारे पिताजी से प्राप्त सभी भूमि का बटवारा राजस्व के अनुसार हमारे तीनों भाइयों के नाम है। उक्त भूमि अपने अपने हिस्से का उपयोग या बेचान हेतु तीनों की बिना अनुमति से उपयोग लिए क्या करना चाहिए? क्योंकि मेरे दो भाई किसी भी मामले में साथ नहीं दे रहे हैं ओर मेरे हिस्से की जमीन भी मुझसे हस्तान्तरण नहीं करने दे रहे हैं और वक्त पर कहीं भी हस्ताक्षर नहीं करने आते हैं। मेरी माताजी अभी मेरे पास ही रहती हैं लेकिन वो हमेशा मेरे बड़े भाई का पक्ष लेती हैं। इस मामले में क्या हमारी माताजी किसी एक पुत्र को हमारी जमीन नाम कर सकती है ? उक्त मामले में मुझे क्या करना चाहिए? मेरे माताजी करीबन २० वषों से मेरे पास ही है उन का पालन पोषण मैं ही करता हूँ मेरे बड़े भाई अपनी अपनी शादी करके पहले से अलग हो गए हैं। आज से २० वर्ष पहले मुझे माँ के नाम अलग से हिस्सा देने की बात की थी लेकिन वो मोखिक बात थी। अभी बड़े भाई इस बात को मानने को राजी नहीं हैं, माताजी मेरे पास रहती है उसका प्रमाण मेरे पास अपना मुखिया का राशन कार्ड है। क्या मैं राशन कार्ड को आधार मानते हुए माँ का अलग से हिस्सा ले सकता हूँ? बल्कि हमारी माँ को मैं ने २० साल तक सेवा की है मगर फिर भी वे मेरे पक्ष में नहीं है उसका कारण मेरे बड़े भाई ने माँ को अभी विदेश घुमाने का लालच दे रखा है माँ अभी गुमराह हो रही है। बल्कि २० वर्ष पहले दोनों भाई हमें माता पिता की सम्पति से कुछ भी हिस्सा नहीं चाहिए एसा कह करके अपनी शादी करके माताजी को मेरे भरोसे छोड़ करके परिवार से अलग हो गए थे। मेरे पास लिखित प्रमाण नहीं होने का अभी वो फायदा उठा रहे हैं। आप बताएँ मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान

प के पिताजी के देहान्त के उपरान्त राजस्व विभाग में आप के पिता के भूमि के खाते का इन्तकाल, नामान्तरण हुआ होगा। जिस में आप तीनों भाइयों और आप की माताजी का नाम  हिस्से दर्ज हुए होंगे। लेकिन इसे बंटवारा नहीं कहा जा सकता। आज भी राजस्व रिकार्ड में जमीन संयुक्त होना चाहिए। यह आप खाते की नकल के माध्यम से या राजस्थान का अपना खाता इंटरनेट पर खोल कर खुद देख सकते हैं।

लग अलग खाते करने और अपनी अपनी जमीन पर पृथक कब्जा प्राप्त करने के लिए आप चारों को आपस में मिल कर पारिवारिक समझौता कर के बंटवारा करना होगा और उस के आधार पर अलग अलग खाते कराए जा सकते हैं या फिर बंटवारे का दावा कर के न्यायालय से निर्णय कराना पड़ेगा। लेकिन कोई भी खातेदार संयुक्त खाते में अपने हिस्से की जमीन को बिना बंटवारा किए भी हस्तान्तरित कर सकता है। उस में सहखातेदारों के हस्ताक्षर की कोई आवश्यकता नहीं है। अपने हिस्से की जमीन या उस का कोई भी हिस्सा वह विक्रय कर सकता है इस के लिए वह विक्रय पत्र निष्पादित कर उसे पंजीकृत करवा सकता है और अपने कब्जे की जमीन में से विक्रय की गयी जमीन के बराबर जमीन क्रेता के कब्जे में दे सकता है।

स से क्रेता को जमीन पर कब्जा भी मिल जाता है और वह उस का टीनेंट भी हो जाता है। संयुक्त खाते में उस का नाम एक हिस्सेदार के रूप में दर्ज हो जाता है। बाद में क्रेता स्वयं या कोई भी हिस्सेदार संयुक्त खाते का बंटवारा करवा कर सब के खाते अलग अलग करवा सकता है।

हाँ तक माता जी और भाइयों का प्रश्न है वह भावनात्मक अधिक है। पुत्रों का फर्ज है कि वे माता पिता की उन के जीवन काल में उन की सेवा करें। आप कर रहे हैं और आप के भाई नहीं कर रहे हैं। फिर भी आप की माता जी बड़े भाई का पक्ष लेती हैं तो आप कुछ नहीं कर सकते। आप उन का भरण पोषण कर रहे हैं इस कारण माता जी का हिस्सा आप का नहीं हो सकता। कर्तव्य निभाने से अधिकार नहीं मिलता है। पहले भाई कुछ कहते थे अब कुछ कहते हैं इस से भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। माताजी किसी भी पुत्र को अपना हिस्सा दे सकती हैं या फिर किसी को नहीं दे सकती हैं। यदि किसी को नहीं देती हैं या वसीयत भी नहीं करती हैं तो उन का हिस्सा उन के जीवनकाल के उपरान्त तीनों भाइयों को बराबर मिल जाएगा। लेकिन वह सारी भूमि को किसी एक को नहीं दे सकतीं क्यों कि वे भी एक हिस्से की ही टीनेंट हैं अर्थात यदि आप तीन भाई और माताजी के अलावा कोई हिस्सेदार नहीं है तो उन का हिस्सा भी चौथाई ही है और पास तीनों भाइयों के हिस्से भी चौथाई ही हैं। मेरा तो मानना है कि आप की माताजी समझदार हैं। वे आप के साथ रहती हैं। लेकिन आप को यह नहीं कहना चाहतीं कि उन का सारा हिस्सा आप का है। इस से वे अपने दो बेटों से सदा के लिए दूर हो जाएंगी जो कोई भी माँ नहीं चाहती। बल्कि आप को हमेशा चिन्ता में बनाए रखती हैं और दोनों बेटों को इस लालच में रखती हैं कि वे उन्हें भी हिस्सा दे सकती हैं।

म ने अपनी राय रख दी आगे आप को क्या करना है? यह निर्णय तो आप को खुद ही करना होगा।

छल पूर्वक बेची-खरीदी गयी जमीन का विक्रय पत्र निरस्त हो सकता है।

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

बबलू अहिरवार ने इन्दौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मामला जिला गुना म.प्र. कीा है। हम 3 भाई, 1 बहिन, और विधवा माँ हैं। पिताजी की मृत्यु बाद उनकी पुश्तैनी 30 बीघा ज़मीन के 5 हिस्सों में से (मेरा, मझले भाई, बाहिन, और मां) 4 हिस्सा ज़मीन को एप्रिल-1992 मई बेंच दिया। उस समय मैं नाबालिग था। बड़ा भाई जो कि मानसिक रोगी था और अपनी पत्नी के ग़लत चालचलन, दुष्कर्मों के कारण शक कर के पागल हुआ था। एप्रिल-1991 मई में उस ने अपनी पत्नी को घायल कर दिया था। 2 बच्चों को मार दिया था और अपने आप को घायल कर लिया था। एप्रिल 1991 से ही सेंट्रल जैल ग्वालियर में सज़ा पर था और पागल होने के कारण उसका इलाज मानसिक रोगी चिकित्सालय ग्वालियर में चल रहा था। जून-2011 को जब पता चला की उसकी सज़ा पूरी हो गई है तो उसकी पत्नी, मेरी मां और मैं बड़े भाई को लेने के लिए मानसिक रोगी चिकित्सालय ग्वालियर गये, परंतु उसकी हालत जैसी की तैसी थी। ना तो हम को पहचान रहा था ना ही बात कर रहा था, ना ही कुछ खा रहा था, उसकी ऐसी हालत देखकर मैंने मानसिक रोगी चिकित्साल्या ग्वालियर के अधीक्षक से उसका और इलाज़ करने की बात कही। परन्तु अधीक्षक ने मेरी बात नहीं सुनी और मानसिक रोग चिकित्सालय ग्वालियर के अधीक्षक ने 1 माह की गोली दवाएं के साथ जबरदस्ती बड़े भाई को उसकी पत्नी को सोंप दिया। इंदौर आने के बाद लगभग 1 महीना जब तक दवाएं चली तब तक ठीक रहा। फिर से उसकी मानसिक हालत बिगड़ गई और फिर से उसने वही हरकतें करना शुरू कर दिया जो कि 1991 में की थी। उस ने पत्नी को जलाने की कोशिस की। पत्नी ने उसे घर से बाहर भगा दया और सड़क पर मरने के लिए छोड़ दिया। उसका घर हमारे घर से 8 किलोमीटर दूर था। जब मझले भाई को पता चला कि बड़ा भाई सड़क पर 2 दिन से भूखा प्यासा पड़ा हुआ है तो वह उसे ऑटो में बिठा कर अपने पास ले आया। मैं इन्दौर से बाहर महाराष्ट्र में सर्विस करता हूँ। जब मुझे पता चला तो मैं इन्दौर आया और बड़े भाई का मानसिक रोगों के डाक्टर से इलाज चालू कराया। इस बीच उसकी पत्नी से इन्दौर कोर्ट में स्टांप पेपर के द्वारा बड़े भाई को इलाज के लिए हमें सौंप दिया। अगस्त 2011 से दिसम्बर 2011 तक लगातार उसका इलाज करवाया। जिस से उसके मानसिक स्थिति ठीक हो गई, बात करने लगा। उसकी मानसिक हालत नॉर्मल हो गई और दिनांक 12.01.2012 को घर से भाग गया। जिसकी गुमशुद्गी की रिपोर्ट हमने पुलिस थाने में लिखवाई, उसे ढूंढने की मैंने हर संभव कोशिश की परन्तु कहीं नहीं मिला और आज तक लापता है। 4 हिस्सा ज़मीन 1992 में बिकने के बाद, बड़े भाई की 1 हिस्सा की ज़मीन को भी वही लोग बटाई से जोतते रहे जिन्होने 4 हिस्सा ज़मीन खरीदी थी और बटाई का 1/2 हिस्सा मां और बड़े भाई की पत्नी को गुना से इंदौर 20 साल एअर तक भेजते रहे। 12.01.2012 को बड़े भाई के लापता हो जाने के बाद जिन लोगो ने 4 हिस्सा ज़मीन खरीदी थी और बड़े भाई की ज़मीन बटाई से जोतते रहे थे। उन्हों ने बड़े भाई की पत्नी और लड़की को केवल 70 हज़ार का लालच देकर बड़े भाई की मृत्यु का फर्जी सर्टिफिकेट ग्रामपंचायत ज़िला गुना से 16.05.2013 को बनवा लिया बड़े भाई के नाम की ज़मीन उसकी पत्नी और एक लड़की जिसकी शादी हो चुकी है के नाम पर आ गई। 13.09.2013 को इन्दौर जिला पंजीयक के ऑफीस से बड़े भाई की पत्नी और लड़की ने 2 लोगों को पावर (बहसियत मुख़्तरेआम) दे दिये जो बड़े भाई के हिस्से की ज़मीन को बटाई से जोतते रहे थे। इन दोनो लोगों ने जिनको बड़े भाई की पत्नी और लड़की ने मुख़्तार आम बनाया था में से एक ने 3.5 बीघा ज़मीन को 195000 रु. में अपने लड़के के नाम पर रजिस्ट्री ज़िला पंजीयक गुना में 16.09.2013 को करवा दी और दूसरे ने 2.5 बीघा ज़मीन को 207000 रु. में रजिस्ट्री उप पंजीयक गुना से अपने लड़के की पत्नी के नाम पर 16.09.2013 को करवा दी। मेरा सवाल है कि कितने साल बाद लापता व्यक्ति को मृत माना जा सकता है? तथा किस के सर्टिफिकेट के आधार पर। क्या ग्रमपंचायत से बना हुए मृत्यु सर्टिफिकेट के आधार पर ग्राम पटवारी और ज़िला पंजीयक, बड़े भाई की ज़मीन को उसकी पत्नी और लड़की के नाम पर कर सकता है? क्या बड़े भाई की ज़मीन का एक हिस्सा उत्तराधिकार क़ानून के अन्तर्गत उसकी विधवा मां को मिलना चाहिए था? क्या बड़े भाई की पत्नी को, परिवार के बाहर के व्यक्तियों पावर देने का अधिकार है? क्या बड़े भाई की पत्नी और ज़मीन खरीदने वालों पर फर्जी सर्टिफिकेट बांटने के आधार पर मर्डर का केस लगाया जा सकता है? इस के अंतर्गत कौन सी धारायें लगाई जा सकती हैं? क्या फर्जी बनवाए गये कागज़ातों के आधार पर किया गया नामन्तरण और रजिस्ट्री केंन्सल होकर बड़े भाई के नाम पर ज़मीन वापिस आ सकती है? मेरा बड़ा भाई अभी जीवित है और लगभग 50 वर्ष का होगा।

समाधान

प का भाई 12.01.2012 को लापता हुआ है। इस तिथि से सात वर्ष तक अर्थात 11.01.2019 तक उसे कानूनी रूप से मृत माना जाना संभव नहीं है। ग्राम पंचायत ने उस का मृत्यु प्रमाण पत्र फर्जी शपथ पत्रों और दस्तावेजों के आधार पर बनाया होगा। यह एक फर्जी कार्यवाही है। आप को उस ग्रामपंचायत पर अधिकारिता रखने वाले पुलिस थाने में फर्जी प्रमाण पत्र बनाने के मामले में रिपोर्ट दर्ज करवानी चाहिए। यदि पुलिस इस पर कार्यवाही न करे तो आप को सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में अपना परिवाद दर्ज कराना चाहिए। यह एक गंभीरतम अपराध है। केवल कोई न्यायालय ही किसी लापता व्यक्ति को मृत घोषित कर सकता है।

ग्राम पंचायत द्वारा जारी मृत्यु प्रमाण पत्र को अवैध व अकृत घोषित कराने के लिए आप को उस ग्राम पंचायत पर अधिकारिता रखने वाले दीवानी न्यायालय में घोषणा का दावा प्रस्तुत करना चाहिए। इस के साथ ही उक्त दोनों विक्रय पत्र जो आप की भाभी और उस की पुत्री ने निष्पादित कर रजिस्ट्री कराई है उसे निरस्त करने के लिए अलग से दीवानी वाद प्रस्तुत करना चाहिए।

ह सही है कि आप की विधवा माँ को भी भाई की भूमि का एक हिस्सा उत्तराधिकार में प्राप्त होना चाहिए। फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र के आधार पर खोला गया नामांतरण इस कारण भी गलत है आप को इस नामांतरण को निरस्त करने के लिए भी अपील प्रस्तुत करनी चाहिए।

कोई भी व्यक्ति किसी को भी पावर ऑफ अटार्नी दे सकता है, यह जरूरी नहीं है कि अटार्नी (मुख्तार) परिवार का ही सदस्य हो।

ड़े भाई की पत्नी और जमीन खरीदने वालों पर मर्डर केस नहीं लगाया जा सकता। क्यों कि हत्या का मामला दर्ज होने के लिए पहले यह सुनिश्चित होना चाहिए कि किसी की मृत्यु किसी अन्य व्यक्ति द्वारा कारित की गयी है। इन लोगों ने फर्जी दस्तावेज बनवाए हैं और रजिस्ट्री करवा कर संपत्ति का हस्तान्तरण कराया है। उस के लिए अलग धाराएँ हैं जिन का आप उपयोग कर सकते हैं। इस मामले में 420, 464, 465, 466, 467, 468 तथा 120 बी आईपीसी की धाराओं का उपयोग किया जा सकता है।

मृत्यु प्रमाण पत्र व उस के आधार पर किए गए नामान्तरण तथा विक्रय पत्रों की रजिस्ट्री व उन के आधार पर किए गए नामान्तरण निरस्त किए जा सकते हैं और जमीन वापस आप के भाई के नाम आ सकता है।

जमीन के कब्जे का वाद प्रस्तुत करें।

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

कुलदीप सिंह ने बावड़ी,राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी माताजी अपने पिता की इकलौती संतान हैं। उन के नाम से राजस्थान के बीकानेर जिले के पुगल तहसील में 25 बीघा जमीन है। यह जमीन मेरे नानाजी के देहांत के बाद माताजी के नाम हुई थी। इस सम्पत्ति के बारे में हमें 2014 में पता चला। जब एक व्यक्ति ने मेरे पिताजी को अवगत करवाया कि आपके ससुर की इस जगह जमीन है और आपके ससुर को वो जमीन आर्मी में उन की रिटायरमेंट के बाद मिली थी जिसकी सालाना किस्त जमा करवानी थी। उस व्यक्ति ने पिताजी को दस्तावेजो पर हस्ताक्षर के बदले 4 लाख रुपये देने की बात कही, किन्तु पिताजी ने मना कर दिया। बाद में जानकारी करने पर जमीन मेरी माताजी के नाम निकली। परंतु उस जमीन पर पिछले 20-25 वर्षो से कब्जा बीकानेर के स्थानीय निवासी का जो कि भूमफिया से जुड़ा हुआ बदमाश किस्म का व्यक्ति है उसका है। दस्तावेजों में वो जमीन मेरी माताजी के नाम है। समस्या ये है कि इस जमीन से जुड़ा हुआ नाम मात्र का दस्तावेज भी हमारे पास नहीं है। ना ही मेरे नानाजी द्वारा जमा करवाई गई जमीन की किस्त की कोई रसीद है। बस e-mitra से जमीन के खसरा नंबर लगा कर निकाले गए दस्तावेज हैं। जिन से ये पता चलता है कि वो जमीन मेरी माताजी की सम्पति है। माननीय से निवेदन इस प्रकार है कि मेरे पिताजी एक गरीब किसान हैं व मैं एक विद्यार्थी हूँ। भूमाफिया से लड़ने ओर महंगा वकील करने की हमारी हमारी बस की बात नहीं, न ही कोई राजनीतिक पहुंच है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

प ने नहीं बताया कि आप के नानाजी का देहान्त कब हुआ था। फिर भी आप अपने यहाँ के किसी स्थानीय वकील से जो कि राजस्व के मामले देखता हो राय कीजिए। क्यों कि मुकदमा तो कोई स्थानीय वकील ही लड़ेगा। यदि फिर भी कोई परेशानी हो तो तीसरा खंबा पर अपनी समस्या को रखिए।

प के पास जमीन के दस्तावेज न होने से कोई फर्क नहीं पड़ता। सरकारी रिकार्ड में जमीन आप के माता जी की है। वे उस की खातेदार कृषक हैं। आप की माताजी उक्त जमीन का कब्जा प्राप्त करने के लिए राजस्व न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर सकती हैं, जो बिना किसी देरी के आप की माताजी को कर देना चाहिए।

क बार कब्जे के लिए वाद संस्थित हो जाए। उस के बाद क्या परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं उन पर विचार कर के आगे के लिए निर्णय लिया जा सकता है। मुकदमा करने में किसी भू-माफिया से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि कोई आप के परिवार के किसी सद्स्य को धमकाता है तो तुरन्त उस की रिपोर्ट पुलिस में कराएँ और पुलिस द्वारा इस बात की सुनवाई न करने पर मजिट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उसे धारा 156 (3) दं.प्र.सं. के अन्तर्गत पुलिस को जांच के लिए भिजवाएँ।

कृषि भूमि के बँटवारे का वाद प्रस्तुत कराएँ।

rp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

विक्की ने नागौर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी की मृत्यु १९९७ में होने के बाद मेरे पिताजी एवं मेरे ताउजी जो की दो ही संतान थी बंटवारा करते समय एक असिचिंत खेत लगभग १० बीघा है का भी सहमति से बिना नाप बंटवारा किया गया बाद में सीमा ज्ञान कराने पर पता चला की ताउजी के पास कुछ हिस्सा लगभग १ बीघा ज्यादा है अब वो नाप में बराबर नहीं करवाना चाहते कहते हैं कि यही सही है। अब हमें सलाह दें कि बिना उनके राजीनामा के यह नाप अनुसार बंटवारा करा सके किस न्यायलय में आवेदन करना होगा?

समाधान-

प की कृषि भूंमि का जो बंटवारा हुआ है वह या तो मौखिक है या लिखित है तो भी पंजीकृत नहीं। हो सकता है आप के पिता जी और ताऊजी के नाम नामान्तरण हो गया हो लेकिन रिकार्ड में बँटवारा नहीं हुआ होगा। यदि ऐसा है तो आप को बँटवारे के लिए न्यायालय के समक्ष वाद संस्थित करना होगा।

प को एसडीएम या एसीएम कोर्ट में बँटवारे का वाद संस्थित करना पड़ेगा जिस में आप को यह आवेदन करना होगा कि बराबर हिस्से किए जाएँ और दोनों को भूमि का नाप कर के उन के हिस्से पर पृथक कब्जा दिलाया जाए।

अपने हिस्से की जमीन प्राप्त करने के लिए बँटवारे का वाद संस्थित करें।

Arp_land-demarcation-150x150.jpgसमस्या-

रत्नेश के पारख ने मन्दसौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी को बँटवारे में पास हमारे पैतृक गांव लसुडिया ईला,तहसील-दलौदा, जिला मंदसौर में पैतृक मकान और कृषि भूमि प्राप्त हुई थी। अब पिताजी के देहावसान के बाद मेरी माता जी के नाम उन संपत्तियों का नामांतरण करवाना है । परंतु समस्या यह है कि वे कृषि भूमियाँ हमारे परिवार में कई बार बँट चुकी हैं और मेरे दादाजी के हिस्से में आई थीं।विगत ५० वर्षों से हमारे ही कब्जे में है फिर भी उनके खाते में मेरे दादाजी के चचेरे भाइयों का नाम चला आ रहा है । इस पर पटवारी से संपर्क करने पर उसने कहा कि ये गोल खाता है और नाम नहीं हट सकते किसी के भी। पर अगर कल किसी परिजन की नियत बिगड़ जाने पर हम क्या कर सकते हैं क्योंकि दादाजी के समय हुआ बँटवारा मौखिक था और दादाजी के चचेरे भाई तो अपने हिस्से की जमीन ना जाने कैसे बेच चुके हैं जबकि उनके भी गोल खाते थे और मेरे दादाजी का नाम भी था उन खातों में। ये तनाव हमें खा रहा है। हम क्या करें????

समाधान –

हाँ समस्या में आप ने सिर्फ इतना तथ्य बताया है कि आप के चचेरे भाई अपने हिस्से की जमीन बेच चुके हैं। यह सिर्फ एक सूचना है। इस के साथ आप को यह भी बताना चाहिए था कि यह जमीन उन्हों ने कैसे बेची है? जमीन की बिक्री केवल रजिस्टर्ड विक्रय पत्र से बेची जा सकती है। इस रजिस्टर्ड विक्रय पत्र की प्रति आप को उप रजिस्ट्रार कार्यालय से प्राप्त करनी चाहिए। यह जानकारी करनी चाहिए कि उस विक्रय पत्र के आधार पर नामांतरण हुआ है या नहीं। हुआ है तो वह विक्रय पत्र के अनुसार है या नहीं। यदि उन्हों ने अपना हिस्सा बेचा है तो उन के हिस्से की जमीन का नामांतरण क्रेता के नाम हो चुका होगा। इस से आप को सही स्थिति पता लग जाएगी।

मौखिक बँटवारा वास्तव में केवल कब्जों का बँटवारा है। उस से खातेदारी अधिकारों का बंटवारा नहीं होता है। खाते में सभी के नाम और हिस्से बराबर चलते रहते हैं। इस का एक ही उपाय है कि आप बंटवारे का वाद संस्थित करें। जिस में जमीन के सभी संयुक्त खातेदारों को विपक्षी पक्षकार बनाया जाएगा। अपने कब्जे की जमीन पर कब्जा बनाए रखिए। इस से आप के हिस्से मे जितनी भी जमीन आएगी उसे आप के हिस्से की जमीन में से आप को मिल जाएगी। आप के हिस्से की जमीन कम पड़ी तो आप को अन्य के कब्जे की जमीन से जमीन मिलेगी और आप के पास अपने हिस्से से अधिक जमीन हुई तो आप को देनी पड़ेगी।

उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि पर उत्तराधिकार की व्यक्तिगत विधि प्रभावी नहीं है।

ऊसरसमस्या-

आमिर ने शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मारे पास 10 एकड़ पुश्तैनी कृषि भूमि है। परिवार में तीन लोग हैं, मेरी माता, मेरी विवाहित बहन और मैं। पिता जी का एक वर्ष पहले निधन हो गया। जमीन और घर का अभी तक विरासतन नामान्तरण नहीं हुआ है। माता जी चाहती हैं कि बँटवारा मुस्लिम शरीयत के अनुसार हो और बेटी को १/३ भाग ज़मीन और घर दोनों में मिले। मुझे इस में आपत्ति नहीं है। हम ने एक वकील से बात की थी तो उन्होंने कहा की कृषि भूमि विवाहित बहन के नाम नहीं हो सकती। कुछ जानने वाले बड़े बूढ़े लोगों ने भी कहा की आगे चल के पचड़े हो सकते हैं अपने नाम कराइये। क्या कृषि भूमि विवाहित बहन के नाम हो सकती है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

कृषि भूमि के सम्बन्ध में कानून बनाने का अधिकार राज्यों का है। उत्तर प्रदेश में जमींदारी विनाश अधिनियम इन मामलों को शासित करता है। कृषि भूमि का स्वामी तो राज्य है। कृषक सिर्फ कृषक होता है उसे उस पर खेती करने का अधिकार होता है जिस के लिए राज्य उस से लगान वसूल करता है। इस तरह खेती की जमीन एक वैसी संपत्ति नहीं है जिस पर उत्तराधिकार का व्यक्तिगत कानून अपने आप लागू हो।

त्तर प्रदेश में व्यक्तिगत उत्तराधिकार कानून प्रभावी नहीं है और कृषि भूमि का उत्तराधिकार जमींदारी विनाश अधिनियम से ही शासित होगा। इस अधिनियम में पुत्र तथा विधवा प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों में सम्मिलित हैं, लेकिन विवाहित पुत्री सम्मिलित नहीं है। इस कारण नामान्तरण तो आप की माता जी और आप के नाम ही खुलेगा। कृषि भूमि के सिवा जो भी संपत्ति है उस में शरीयत के हिसाब से आप के हिस्से होंगे।

भू-हस्तान्तरण का पंजीकरण करवाएँ, उस के तथा बंटवारे के हिसाब से नामान्तरण करवाएँ।

partition of propertyसमस्या-

कठिया, जिला रायपुर, छत्तीसगढ़से मुकेश वर्मा ने पूछा है-

मेरे पिता और उनके तीन भाई मेरे बड़े पिता जी और दो चाचाओं के बीच मौखिक बटवारासन् 89-90 में हुआ (सभी के हिस्से में लगभग 22-22 एकड़) है। हमारी जमीनदो गांवो में बंटा है। जिस में से लगभग 12 एकड़ एक गांव (कठिया) व 12 एकड़दूसरें गांव (डिघारी) में हिस्सेदारी में मिला है। सभी अपने अपने हिस्सेपर खेती-किसानी कर रहेहै। मेरे पिता जी और मेरे छोटे चाचा जी आपसी सहमतिसे एक-एक गांव की जमीन पर (मेरे पिता जी कठिया में और मेरे चाचा जी डिघारीमें) खेती कर रहे है। लेकिन मेरे पिता जी और मेरे छोटे चाचा का सम्मिलातखाता है। अब मैं भी खेती किसानी का काम सम्भालने वाला हूँ और सम्मिलितखातिको अलग-अलग करवाना चाहता हूं। वही कठिया की कुछ जमीने गांव के हीएक अन्य किसान से बदली किया गया है लेकिन उसका भी अभी तक नामांतरण नहीं हुआहै। कृपया मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प की जमीन रिकार्ड के हिसाब से अभी तक शामलाती ही है, अर्थात सारी जमीन पर सभी भाई काबिज हैं। बस आप लोगों ने पारिवारिक जरूरतों के हिसाब से उन पर कब्जा कर लिया है और अपना काम चला रहे हैं। आप के पिता और उन के भाइयों को चाहिए कि वे अपनी जमीन के बंटवारे का समझौता कर के उसे राजस्व विभाग में प्रस्तुत कर अलग अलग नामांतरण करवा लें। नामान्तरण अलग अलग हो जाने पर सब अपनी अपनी जमीन पर काबिज हो जाएंगे और राजस्व विभाग में भी खाते अलग अलग हो जाएंगे।

ठिया की जमीन जो किसी किसान से बदली की गई है वह सीधे सीधे स्थाई संपत्ति का हस्तान्तरण है जिस का पंजीकरण होना आवश्यक है। जब जमीन के बदले जमीन ली जाती है तो उस के हस्तान्तरण के विलेख का पंजीकरण होना आवश्यक है। इस तरह के पंजीकरण में स्टाम्प ड्यूटी कम लगती है। जिस किसान की जमीन है उस के साथ मिल कर आप को जमीन के हस्तान्तरण का विलेख उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवा लेना चाहिए और उस पंजीकृत विलेख को राजस्व विभाग में प्रस्तुत कर उस के हिसाब से नामान्तरण करवा लेने चाहिए। इस से आगे आप को परेशानी नहीं होगी। इस सम्बन्ध में आप को किसी स्थानीय राजस्व वकील से सलाह ले कर सब कार्य करने चाहिए।

मामला जटिल है, बहुत सावधानी से लड़ना पड़ेगा।

agricultural-landसमस्या-
भैरूलाल जाट ने इन्दौर मध्यप्रदेश से पूछा है-

 मेरे दादाजी के पास 60 बीघा जमीन उनके पिताजी से प्राप्त हुई 1963 दादाजी के निधन के उपरांत उनके 5 लड़को के नाम से हो गई। इस जमीन में से 3 लड़को ने बिना बंटवारा किये अपनी जमीन बेच दी। जिन तीन लड़को ने जमीन बेची उन तीनो का देहांत हो चूका है। मेरे पिताजी के देहांत के उपरांत मेरी 4  बहनों, मेरा और मेरी माताजी का नाम राजस्व विभाग में मेरे पिताजी के नाम की जगह नामांतरण हो कर हमारे नाम से पासबुक बनाकर पटवारी ने दे दी। हमारी कृषि भूमि एक सहदायिक सम्पति है बाप दादाओ के ज़माने से चली आ रही है।  मेरे दादाजी के कोई लड़की नहीं थी एवं दादीजी का देहांत दादाजी से पहले हो चुका है। मेरे पिताजी ने उनके छोटे भाई के 2 लड़को के नाम से 19.05.1977 को अपने हिस्से कि जमीन की रजिस्ट्री करवाई, उस समय दोनों लड़के नाबालिग थे एवं पालनकर्ता के रूप में लड़कों की माँ का नाम लिखा गया। 01.01.2012 को मेरे पिताजी का देहांत हो गया। अब इस 24 बीघा जमीन जो दो भाइयो के पास है एवं कब्ज़ा भी उन्ही का है इसमे 4 भाई एवं मेरी माताजी,  मेरी बहनों और मेरा नाम है।  मैं ने राजस्व विभाग में बंटवारे का दावा लगा दिया एवं एक पेशी भी हो चुकी है।  मेरा सवाल ये है कि क्या मेरी माँ , बहन और मेरे नाम से जो जमीन आ रही है बंटवारे में हमें प्राप्त हो सकती है।

 

समाधान-

कृषि भूमि की स्वामी तो राज्य सरकार है। किसान उस का केवल खातेदार कृषक है, अर्थात उस की हैसियत किराएदार जैसी है। किसी खातेदार कृषक की मृत्यु, या जमीन के खातेदारी अधिकार को विक्रय कर देने या अन्य किसी प्रकार से हस्तान्तरित कर देने पर जब नामान्तरण होता है तो राज्य सरकार के राजस्व अभिलेख में अंकन मात्र होता है। आप के मामले में आप के पिता जी ने जो उन के हिस्से की रजिस्ट्री भाई के दो बेटों के नाम कराई है वह किस किस्म की है यह आप ने नहीं बताई है, वह दान या विक्रय या कुछ और हो सकती है। आप के प्रकरण का निर्णय बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि उस रजिस्टर्ड डीड में क्या लिखा है।

प के प्रश्न से यह भी स्पष्ट हो रहा है कि आप के पिता ने जो रजिस्ट्री कराई उस के आधार पर कोई नामान्तरण राजस्व विभाग में नहीं हुआ। इसी कारण आप के पिता की मृत्यु के उपरान्त आप के नाम नामान्तरण खुल गया।

दि आप की संपत्ति सहदायिक थी तो आप के दादा जी के बाद उस के बराबर के हिस्से पाँचों पुत्रों को मिल गई तथा उन के नामान्तरण भी हो गए। सहदायिक होने के कारण पिता जी के हिस्से में उन के पुत्रों के हिस्से भी शामिल थे। अर्थात आप का व आप के भाइयों का भी उस में हिस्सा था। आप की बहनो का हिस्सा वर्ष 1977 तक नहीं था। बहनों का हिस्सा सहदायिक संपत्ति में हिन्दू विवाह अधिनियम में 2005 के संशोधन से पैदा हुआ और तब आप भाइयों के हिस्से कम हो गए।

1977 में यदि आप के पिता ने रजिस्टर्ड डीड से उन के हिस्से का कोई हस्तान्तरण किया है तो वह केवल उन के हिस्से का हुआ है। मसलन आप चार भाई हैं तो उस समय उन का हिस्सा मात्र 1/5 था केवल वही वे हस्तान्तरित कर सकते थे। इस कारण उस रजिस्ट्री का कोई असर हुआ तो यही होगा कि उस वक्त जो हिस्सा आप के पिता का कहा जा रहा था उस का 4/5 हिस्सा तो उस से हस्तान्तिरत भी नहीं हुआ था।

प के मामले में आप को यह साबित करना होगा कि जिस कृषि भूमि का विवाद है वह सहदायिक है। इस के अतिरिक्त अन्य जटिल प्रश्न और भी हो सकते हैं, मसलन यह कि यदि आप के पिता अपना हिस्सा हस्तान्तरित कर चुके थे तो फिर उन के देहान्त के बाद आप की माता का हिस्सा कहाँ से उत्पन्न हुआ। उन के नाम हुआ नामान्तरण भी त्रुटिपूर्ण है। इस कारण आप को तथा आप के वकील को यह मुकदमा बहुत सावधानी से बिना कोई गलती किए लड़ना पड़ेगा तभी आप को सफलता प्राप्त हो कर अपना हिस्सा प्राप्त हो सकेगा।

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