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आप ने मकान का स्वामित्व नहीं बल्कि केवल कब्जा खरीदा है।

समस्या-

राधेश्याम ने इंदौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी ने २०१२ में इंदौर में एक मकान ३०० वर्गफुट जिस पर चद्दर का शेड है, 1,25,000/- रूपये में ख़रीदा था, जिसकी १०० रूपये के स्टाम्प पर नोटरी करायी गयी थी! उस वक़्त पिताजी के पास रजिस्ट्री कराने के पैसे उपलब्ध नहीं थे इसलिए उस वक़्त सिर्फ नोटरी कराकर कब्ज़ा हासिल कर लिया था, बाद में पैसे आने पर जब पुराने मकान मालिक से रजिस्ट्री कराने के लिए कहा तो उसने साफ़ इनकार कर दिया और कहा कि मकान का अब न तो हमारे पास पट्टा है और न हॉं कोई लिखा पढ़ी है ! जबकि पुराना मकान मालिक उस मकान में पिछले बीस वर्षों से रह रहा था! और नगर पालिका में संपत्ति कर भी भर रहा था, जो की अब हम भर रहे हैं, लेकिन मकान मालिक के नाम से (हस्ते में पिताजी का नाम)। एक नयी बात पता चली कि उस मकान सम्बन्धी और आसपास के मकान पर जमीन विवादित कोर्ट में केस चल रहा है। लेकिन अभी तक हमारे पास उक्त सम्बन्ध में कोई भी नोटिस या कानूनी तौर पर किसी ने कुछ भी नहीं कहा। सिर्फ आसपास वाले ही हमें भयभीत करते है कि आपने यह मकान क्यों लिया यह तो कभी भी टूट सकता है। मेरे पिताजी मकान में दूसरी मंजिल बनाना चाहते हैं परन्तु अनचाहे डर से भयभीत हैं! मेरे पिताजी की उम्र ७५ वर्ष है, और इस विषय को लेकर वो बहुत चिंतित रहते हैं! इस स्थिति में हमें क्या कदम उठाना चाहिए?

समाधान-

प के पिताजी ने 300 वर्गफुट जमीन और उस पर बने मकान को खरीदा नहीं है बल्कि केवल खरीदने का सौदा किया है। किसी भी अचल संपत्ति का जिस का मूल्य 100 रुपये या उस से अधिक का हो खऱीदना तभी पूर्ण हो सकता है जब कि उस का विक्रय पत्र पंजीकृत करवा दिया हो। इस कारण जो नोटेरी से प्रमाणित दस्तावेज है वह केवल मकान खरीदने का एग्रीमेंट या अनुबंध है।

किसी भी वस्तु को वही विक्रय कर सकता है जिस का वह स्वामी हो या स्वामी से उसे उस वस्तु को विक्रय करने का लिखित अधिकार मुख्तार नामे से प्राप्त हो। आप बता रहे हैं कि विक्रेता के पास न तो पट्टा है और न ही कोई लिखा पढ़ी है। इस से पता लगता है कि उक्त विक्रेता के पास भी उस मकान का कब्जा ही है हो सकता है यह कब्जा बीस वर्ष से बना हुआ हो। इस प्रकार आप के पिताजी ने उस व्यक्ति से केवल उस मकान का कब्जा खरीदा है जो उस व्यक्ति के पास था।

अब आप को यह पता करना चाहिए कि वह जमीन किस की है और उस पर कैसा मुकदमा चल रहा है। यह तो स्थानीय रूप से पता करने पर ही पता चल सकता है। नगर निगम आदि से यह पता किया जा सकता है कि वह जमीन किस की है। उसी से यह भी पता लग सकता है कि यदि कोई मुकदमा चल रहा है तो वह किस का किस के विरुद्ध हो सकता है। आम तौर पर यदि वह जमीन किसी की निजी हुई तो उस पर से आप को कोई हटा नहीं सकेगा। बस आप को प्रमाणित करना पड़ेगा कि जिस व्यक्ति ने आप को कब्जा बेचा है वह उस पर बीस वर्ष से काबिज था। और उस जमीन या मकान से संबंधित मुकदमे से बेचने वाले का कोई लेना देना नहीं था। वैसे भी जिस मूल्य में आप के पिताजी ने मकान लिया है उस में इसी तरह का विवादित भूखंड मिल पाना इंदौर नगर में  मुमकिन था। हो सकता है कभी उस मामले में निर्णय हो जाए और बाद में नगर निगम या न्यास आदि वहाँ काबिज लोगों को पट्टे जारी कर दे। तब आप के पिताजी उस संपत्ति के स्वामी हो जाएँ। पर इस सब के लिए सतर्क रहना होगा और पट्टा जारी करने की कार्यवाही करते रहना होगा। तब तक यदि आप दूसरी मंजिल बनाना चाहते हैं तो बना कर रह सकते हैं। जितना रिस्क इस संपत्ति के छिनने का है उतना ही दूसरी मंजिल का भी होगा। पर कब्जा बना कर उसी मकान में रहते रहेंगे तब ही इस संपत्ति को आप बचा सकेंगे।

किराएदार को परिसर खरीदने का कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता।

समस्या-

राधेश्याम सिंह ने सीरमपुर, पश्चिम बंगाल से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी करीब 50 साल से किराएदार हैं, घर के मालिक का निधन के बाद किराया नियंत्रण न्यायालय में जमा कराते हैं। अब हम लोगों का प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत नम्बर आया है। हम ये घर खरीदना चाहते हैं लेकिन दिवंगत मकान मालिक के छह बेटों में से कोई राजी नहीं हो रहा है। कृपया बताएँ कि क्या कानूनी तरीके से हम इस घर को खऱीद सकते हैं कि नहीं?

समाधान-

संपत्ति का अधिकार एक मूल अधिकार है। इसे बाधित किया जाना संभव नहीं है। यदि कोई मकान मालिक अपना मकान बेचना नहीं चाहता है तो उसे बाध्य नहीं किया जा सकता है।  मैं यहाँ अनेक बार लिख चुका हूँ कि किराएदार हमेशा किराएदार ही रहेगा चाहे वह पूरे सौ साल तक किराये पर उस संपत्ति में रह ले। उसे किराए वाले मकान का मालिक बनने का कोई अधिकार नहीं है। एक लंबे समय तक किसी परिसर में किराए से रह लेने से कोई अधिकार उत्पन्न नहीं होता है।

इस तरह जब तक स्वयं मकान मालिक ही अपना मकान बेचने को तैयार न हो तो किराएदार को यह अधिकार भी नहीं कि वे किसी भी प्रकार से मकान मालिक पर घर बेचने के लिए कोई दबाव  बना सकें। इस तरह का कोई कानून नहीं है। हमारी राय है कि आप को प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत घर खरीदने की सुविधा मिल रही  है तो उस का उपयोग कर कैसा भी घऱ जो कहीं भी हो खऱीद लें और इस मकान में जिस में आप लोग रह रहे हैं उस के मोह में न पड़ें।

कच्ची बस्ती में बने सरकारी पट्टे वाले मकान को खरीदने के पहले क्या सावधानी जरूरी है?

समस्या-

गोपाल शर्मा ने जयपुर, राजस्थान से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-


मैंने एक मकान देखा है जिसको में लेना चाहता हूँ, वह मकान कच्ची बस्ती में है, जिसका पट्टा सरकारी बना हुआ है।  तो क्या मैं उसे खरीद सकता हूँ? क्या वो पट्टा मेरे नाम हो जायेगा? कृपया मुझे सही सलाह बताएँ।

 

समाधान-

गोपाल शर्मा जी, कच्ची बस्तियों में जो मकान स्थित हैं उन के भूखंडों की लीज सरकार नगर निगम अथवा विकास न्यास/ प्राधिकरण के माध्यम से 99 वर्षीय पट्टों के आधार पर जारी करती है। इस तरह जारी किए गए पट्टों में अक्सर यह शर्त होती है कि पट्टाकर्ता इस लीज को हस्तान्तरित नहीं कर सकता। कभी कभी यह शर्त भी होती है कि 10 या 12 वर्ष तक लीज को हस्तान्तरित नहीं किया जा सकता। ऐसी शर्त होने पर अहस्तांतरणीय अवधि में विक्रय पत्र का पंजीकरण कराया जाना संभव नहीं होता है।

कोई भी मकान जिस का भूखंड लीज/ पट्टे पर हस्तान्तरित किया गया है उस का विक्रय करने के पूर्व नगर निगम/ विकास न्यास/ प्राधिकरण से भूखंड के हस्तान्तरण की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक है। इस कारण आप को मकान के वर्तमान मालिक और विक्रेता से कहें कि वह नगर निगम/ विकास न्यास/ प्राधिकरण से भूखंड को विक्रय करने की अनुमति प्राप्त कर ले। आम तौर पर किसी भी मकान को खरीदने का एग्रीमेंट/ इकरारनामा कुछ अग्रिम राशि (साई) दे कर किया जा सकता है। उस में एक निश्चित समय जो तीन माह के आसपास का होता है विक्रेता को इस बात के लिए दिया जाता है कि वह भूखंड को विक्रय करने की अनुमति प्राप्त कर सके। यह शर्त भी होनी चाहिए कि यदि तीन माह या जो भी अवधि निर्धारित हो उस में विक्रेता भूखंड के विक्रय की अनुमति प्राप्त नहीं कर सका तो जो धनराशि उस ने अग्रिम या साई बतौर प्राप्त की है उस की डेढ़ी या दुगनी राशि वह क्रेता को लौटाएगा। यदि विक्रेता विक्रय की अनुमति प्राप्त करने में असफल रहता है तो आप इकरारनामे के अनुसार अग्रिम की डेढ़ी या दुगनी राशि विक्रेता से प्राप्त कर सकते हैं।

कभी कभी ऐसा भी होता है कि सरकार (नगर निगम/ विकास न्यास/ प्राधिकरण) पट्टा जारी करते हैं जिसे उपपंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत कराना होता है लेकिन  जो पट्टा प्राप्त करता है वह उस की उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकरण (रजिस्ट्री) नहीं करवाता है। इस से वह पट्टा बेकार हो जाता है। यदि आप ने जो पट्टा देखा है वह पंजीकृत है तो ठीक है अन्यथा विक्रेता (मकान के वर्तमान स्वामी) को कहें कि वह पट्टे का पंजीकरण (रजिस्ट्री) कराए और भूखंड को विक्रय करने की अनुमति प्राप्त कर ले। ये दोनों बातें होने पर ही आप उस मकान को खरीदने का इकरारनामा (एग्रीमेंट) करें अन्यथा नहीं।

स्वामित्व खरीदें, सम्पत्ति का केवल कब्जा न खरीदें।

समस्या-

एजाज ने चम्पारन, बिहार से समस्या भेजी है कि-

क व्यक्ति 1969 के पूर्व से एक खाली प्लॉट पर घर बना कर रह रहा है और उसी समय 1969 से बिजली बिल उसके नाम से है। म्युनिसिपेलिटी की रसीद भी उसके नाम से है। लेकिन अंचल से म्यूटेशन अभी नहीं हुआ है। क्या यह घर मैं उससे खरीद सकता हूँ। जबकि इस प्लाट का असली मालिक वो नहीं है। असली मालिक कहाँ है यह पता नहीं चल पा रहा है जमीन लेकिन निजी है सरकारी नहीं है।

समाधान-

ब आप खुद जानते हैं कि जो व्यक्ति जमीन बेच रहा है वह उस जमीन का मालिक नहीं है उस पर मकान जरूर उस ने बनाया है। कोई भी जो किसी संपत्ति का मालिक नहीं है वह उस संपत्ति को किसी भी प्रकार विक्रय नहीं कर सकता है। वह व्यक्ति केवल वे अधिकार बेच सकता है जो उसे प्राप्त हुए हैं।

यह व्यक्ति आप से इस तरह का एग्रीमेंट कर सकता है कि जब उसे स्वामित्व मिलेगा तब वह आप को उक्त जमीन  बेच देगा। तब तक वह आप से धनराशि ले कर उस संपत्ति का कब्जा दे सकता है। उस व्यक्ति का तो उस जमीन पर प्रतिकूल कब्जा है जिस के कारण उसे वहाँ से कोई हटा नहीं सकता। लेकिन आप का कब्जा तो फिर भी नया होगा।

हमारी राय में ऐसी संपत्ति लेने का विचार त्याग दें।  आप यदि केवल कब्जा खरीदना चाहें तो खरीद लें, उस पर हमेशा कब्जा बनाए रखने के लिए सतर्क रहना पड़ेगा और प्रतिकूल कब्जे के आधार पर नगर पालिका से कभी पटटा जारी करा सकें तो आप उस के वैध स्वामी हो सकते हैं।   हमारा मानना है कि जब भी खरीदें संपत्ति का स्वामित्व खरीदें, केवल उस का कब्जा न खरीदें। बिना स्वामित्व का कब्जा तो हमेशा ही रिस्की होता है।

विक्रय पश्चात सेवाएँ प्रदान नहीं करना उपभोक्ता की सेवा में कमी है, उपभोक्ता प्रतितोष मंच को शिकायत करें।

समस्या-

कोटा, राजस्थान से महेन्द्र ने पूछा है-

मैं ने मेसर्स जनरल मोटर्स कंपनी से एक कार खरीदी है लेकिन वे अब कार की उचित सर्विस नहीं कर रहे हैं।  कंपनी का कस्टमर केयर मेरे पत्रों का कोई उत्तर भी नहीं दे रहा है। मैं उन्हें 456 पत्र लिख चुका हूँ।  मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प का प्रश्न बहुत अधूरा है।  आप ने अपने प्रश्न में यह तथ्य नहीं बताया है कि कार विक्रेता कंपनी ने आप को कार की सर्विस करने के संबंध में क्या क्या वायदे किए थे? कंपनी कार विक्रय करने के उपरान्त ग्राहक को क्या क्या विक्रय पश्चात सेवाएँ प्रदान करती है यह सब वारंटी कार्ड पर लिखा होता है। आप ने यह नहीं बताया कि कंपनी ने जो सेवाएँ प्रदान करने का वायदा किया था उन में से क्या सेवाएँ प्रदान नहीं की हैं।

फिर भी यदि कंपनी ने जो सेवाएँ प्रदान करने का वायदा किया था उन में से कोई भी एक सेवा भी कंपनी ने नहीं दी है तो कंपनी ने सेवा में चूक की है।  कंपनी ने सेवा प्रदान नहीं करने के साथ साथ आप के इतने सारे पत्रों में से एक का भी उत्तर नहीं दिया है। यह भी सेवा में चूक है।  आप का मामला उपभोक्ता की सेवा में चूक का मामला है। आप इस संबंध में जिला उपभोक्ता प्रतितोष मंच के समक्ष अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं जहाँ से आप को राहत प्राप्त हो सकती है। यह शिकायत प्रस्तुत करने में किसी अनुभवी वकील की सेवाएँ प्राप्त करने से आप को राहत प्राप्त करने में आसानी होगी।

भूमि को पूर्व में खरीदने का दावा करने वाले व्यक्ति के कार्यवाही करने तक प्रतीक्षा करें

समस्या-

फतेहपुर, उत्तर प्रदेश से अफ़सर सिद्दीकी ने पूछा है –

मेरे पास राजू नाम का व्यक्ति आया और कहने लगा मेरे पास 4 बीघे खेत है।  1982 से 1986 तक 16 बीघे ज़मीन मैं रामू वकील की पत्नी को बेच चुका हूँ, अब मेरे पास 4 बीघे और है। यह बात 2012 की है।  मैं ने खतौनी देखी सब कुछ उसके और मेरे सलाहकारों के हिसाब से ठीक था।  मैं ने जून में फतेहपुर मे बैनामा करवा लिया। बैनामे के 40 दिन के बाद दाखिल खारिज हो कर मेरा नाम ख़तौनी में आ गया।  फिर 5 दिन बाद मैं ने नाप के लिए वकील से हदबंदी के लिए दायरा किया।  मेरे 4 बीघा की नाप हुई।  नाप के वक्त कुछ लोग आए और कहने लगे कि मेरे पास इसी नम्बर के खेत का 4 बीघे का जनवरी 2006 का बैनामा है।  यह कहकर फोटो कॉपी दिया और नाप रोकने के लिए क़ानूनगो को कहा।  पर क़ानूनगो ने कहा कि मैं क़ानून के हिसाब से अफ़सर की खतौनी के हिसाब से हदबंदी कर रहा हूँ।  वहा पर मैं परेशान हुआ कि अब क्या होगा?  मेरे साथ एक बगल के खेत वाले ने उस आदमी से सवाल किया कि आपने अभी तक दाखिल खारिज (नामान्तरण) क्यूँ नहीं कराया?  इस बेचारे को क्या मालूम कि यह खेत पहले बिक चुका है?  मैं ने उसी जगह पर उसके बैनामे की फोटो-कॉपी पढ़ी।  मैं ने पूछा अपने किससे लिया है तो मैं ने पढ़ा कि बेचने वाला पप्पू है।  उसके पास मुख्तारनामा जैसा कि बैनामे में लिखा है कि उसके पास 25-01-1997 में राजू ने पप्पू को मुख़्तार-आम बनाया है।  उस ने कहा कि उस ने पप्पू से 2006 में बैनामा करवाया है और वह आपत्ति लगवा कर मेरा बैनामा खारिज करवा देगा। मैं ने राजू को फोन किया कि यह कैसा धोका है?  इस वक्त राजू की आयु 75 साल की होगी और मेरी 40 साल। राजू कहने लगे मैं ने मुख्तार नियुक्त नहीं किया। मेरे 3 लड़के हैं मुझे पप्पू को मुख्तार नियुक्त करने की क्या जरूरत थी? फिर मैं उसी दिन पप्पू से मिला तो उस ने कहा कि मुझे याद नही है। हाँ मैं ने अभी तक बहुत ज़मीन बेची है।   इस खेत की पॉवर ऑफ अटॉर्नी मुझे रामू वकील के ज़रीए मिली है और काग़ज़ उन्हीं के पास हैं।  फिर उसी वक्त मैं रामू वकील के पास गया तो वकील साहब कहते हैं कि हाँ मैने राजू से अपनी पत्नी के नाम 16 बीघे खेत लिए हैं और राजू ने पॉवर ऑफ अटॉर्नी मेरे सामने पप्पू को दी थी। फिर मैं रात में राजू के घर गया और पूछा तो राजू ने कहा कि मैं ने किसी को भी अपने हिसाब से कोई मुख़्तार नामा नहीं लिखा है।  अगर लिखा होता तो मैं तुमको ज़मीन (खेत) क्यों बेचता? मैं तुम्हारे साथ हूँ जहाँ कहोगे मैं हर अदालत में कहूंगा।  पर इतना ज़रूर है कि मैं उर्दू में साइन बना लेता हूँ, हिन्दी मुझको लिखना पढ़ना नहीं मालूम है।  रामू मेरा वकील है 1972 से 2002 तक 16 बीघे जमीन कई बार में उसकी पत्नी के हाथ बेचे हैं। मेरे उपर एक लोन का मुक़दमा और घर का मुक़दमा के चक्कर में वकील के पास बराबर तारीखों में जाता था।  कई बार वकील साहब किस में साइन के लिए कहते थे तो मैं करता था।  मेरी माली हालत खराब होती थी तो ज़मीन बेच देता था।  मुक़दमा हार ना जाऊँ इसलिए जिस काग़ज़ में साइन को कहते थे करता था।  कभी अदालत के बाहर काग़ज़ दिए या कभी तहसील में तो मैं साइन करता था।  अब रामू वकील ने मुझसे मुख़्तार नामा लिखवा लिया हो तो मैं नहीं बता सकता।  लेकिन अभी भी मैं बहलफ कहता हूँ.  मुझको चाहे जिसके सामने पेश कर दो, मैं ने हूँस हवस में कोई मुख़्तार आम नही किया है।  यह धोका किया गया है।  फिर मैं ने दूसरे दिन राजू को अपने पास बुलाया और कहा चलो मेरे साथ क्यों कि वकिल रामू ने कहा है की मुख़्तार नामा रजिस्टर्ड है मैं आज 25-10-2012 को गया तो रजिस्ट्री ऑफीस में मोआयना में लोगों ने बताया की यह रजिस्टर्ड राजू तुम्ही ने किया होगा। साइन पहचानो राजू ने कहा साइन मेरी ही लग रही है लेकिन मैने मुख़्तार नामा नही लिखा है।  यह सब धोका किया गया है। मैं पप्पू को जानता भी नहीं हूँ।  हाँ, एक बार रामू को बस्ती में देखा है अब मैं क्या करूँ? मेरे खरीदे हुए खेत 4 बीघे जिसका दाखिल खारिज हो चुका है, हदबंदी भी हो गई है, पप्पू ने जिसको 2006 में बैनामा किया है, जिसका दाखिल खारिज नहीं है यह खेत उसको मिलेंगे या मुझको? मेरे साथ अभी भी राजू बयान देने को तैयार है।  मैं अपनी पत्थर-गड़ी करवा सकता हूँ और क़ब्ज़ा ले सकता हूँ और मैं ही असली मालिक हूँ।  मुझको सही रास्ता दिखाएँ।

समाधान-

प के पास भूमि का स्वामी खुद आया और जमीन बेचने का प्रस्ताव किया। आप ने रिकार्ड में देखा कि जमीन उसी के नाम है। यहाँ आप ने केवल एक गलती की कि आप ने केवल राजस्व रिकार्ड ही देखा। यदि आप ने विगत 12 वर्षों का रजिस्ट्रेशन विभाग का रिकार्ड भी देखा होता तो संभवतः आप को यह पता लग जाता कि उस जमीन के विक्रय पत्र का पंजीयन पहले ही हो चुका है।

प ने पूरी एहतियात बरतने के उपरान्त उक्त भूमि को खरीदा है। विक्रय पत्र का निष्पादन आप के पक्ष में हो चुका है।  राजस्व रिकार्ड में उक्त भूमि का नामान्तरण (दाखिल खारिज) आप के नाम से हो चुका है। राजस्व अधिकारियों से आप भूमि का नाप करवा चुके हैं और मौके पर विक्रेता से कब्जा प्राप्त कर चुके हैं। इस तरह आप उक्त भूमि के सद्भाविक क्रेता हैं और भूमि का कब्जा आप के पास है। आप को सभी प्रकार के भय मन से निकाल कर उक्त भूमि को अपने काम में लेना चाहिए।

जो व्यक्ति यह दावा कर रहा है कि भूमि को वह पूर्व में खरीद चुका है तो अब उसे इस भूमि पर दावा करना चाहिए। यही वह कह रहा है। लेकिन उस के दावे में दम नजर नहीं आ रहा है।  यदि उस ने भूमि पहले खरीदी है तो कब्जा क्यों नहीं लिया?  चाहे भूमि मुख्तार के माध्यम से बेची हो पर यदि कब्जा मूल स्वामी का है तो फिर कब्जा भी मूल स्वामी से प्राप्त करेगा।  इतने वर्ष पहले विक्रय पत्र का पंजीयन होने पर भी उस ने राजस्व रिकार्ड में नामान्तरण अपने नाम क्यों नहीं कराया? ये वे प्रश्न हैं जिन से उस व्यक्ति को जूझना पड़ेगा।

भूमि का पूर्व मालिक स्पष्ट रूप से कहता है कि उस ने उक्त जमीन का मुख्तार नियुक्त करने और जमीन बेचने का अधिकार किसी को नहीं दिया तो वह सही है।  उसे यह कहने की भी आवश्यकता नहीं है कि उस पर हस्ताक्षर उस के हस्ताक्षर जैसे लगते हैं।  जब उस ने खुद कोई मुख्तारनामा निष्पादित नहीं किया तो उसे स्पष्ट कहना चाहिए कि वे हस्ताक्षर उस के नहीं हैं, वह मुख्तारनामा फर्जी है।  यदि उस पर दस्तखत उस के हों भी तो भी वे धोखे से कराए गए हैं और उस वक्त तक कथित मुख्तार को वह जानता तक नहीं था।  उस के खुद के तीन बेटे हैं यदि मुख्तार ही नियुक्त करना होता तो उन में से किसी को करता। एक अजनबी को क्यों करता?  आप इसी आशय का एक शपथ पत्र मूल स्वामी से निष्पादित करवा कर उसे दो साक्षियों के समक्ष नोटेरी से सत्यापित करवा कर रखें। यह आप के काम आएगा।

चूंकि भूमि पर स्वामित्व और कब्जा आप का है, इसलिए आप को उक्त भूमि का उपयोग जो भी करना चाहते हैं करना चाहिए।  आप निश्चिंत हो कर पत्थरगड़ी करवाएँ। यदि कोई व्यक्ति उस भूमि पर अपने स्वामित्व का दावा करता है तो उसे न्यायालय जाना चाहिए, तब आप अपने बचाव के अधिकार का उपयोग कर सकते हैं।  जब तक कोई व्यक्ति आप के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही नहीं करता तब तक आप को अपनी ओर से कानूनी कार्यवाही नहीं करनी चाहिए। यदि वह व्यक्ति आप के कब्जे में दखल देता है या भूमि का आप की इच्छानुसार वैध उपयोग में बाधा डालता है तो भूमि के खातेदार होने के नाते आप न्यायालय में निषेधाज्ञा हेतु दावा प्रस्तुत कर उस के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। यदि वह व्यक्ति आप के विरुद्ध उस के पास के दस्तावेजों के आधार पर कार्यवाही करता है तो उसे कार्यवाही करने दें।  उस के द्वारा ये दस्तावेज या उन की प्रतियाँ न्यायालय मे प्रस्तुत करने पर उन के फर्जी होने के आधार पर आप पुलिस थाने के माध्यम से या सीधे अपराधिक न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें जो आप मूल स्वामी के शपथ पत्र के आधार पर कर सकते हैं।

विक्रय पत्र में बेची गयी संपत्ति का पूरा वर्णन न हो तो विक्रेता से संशोधन विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर पंजीकृत करवाएँ

समस्या-

पानीपत, हरियाणा से दीपक ने पूछा है-

 हम ने पानीपत में एक मकान खरीदा है, 28 अगस्त को उस के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री हुई है।  ह्मारे मकान का प्लाट कुल 78 गज का है। लेकिन मकान के ग्राउंड फ्लोर की 17 गज जमीन बेची हुई है जिस में अब एक डाक्टर की दुकान है। इस तरह भूतल पर प्लाट और निर्माण 61 गज का है और प्रथम तल 78 गज में ही बना हुआ है। अब हमारी रजिस्ट्री केवल 61 गज की हुई है जिस में प्रथम तल 78 गज में निर्मित है। क्या यह हमारे लिए भविष्य में परेशानी का कारण बन सकता है? इसी बात को सोच कर पिताजी बहुत तनाव और अवसाद में हैं। क्या हमें यह गलती ठीक करवानी चाहिए? यदि ठीक करवाएँ तो कैसे होगी?

 समाधान-

दीपक जी, तीसरा खंबा कोई प्रोफेशनल सेवा नहीं है। तीसरा खंबा पर जो भी समस्याएँ आती हैं उन में से अनेक अनुत्तरित भी रह जाती हैं।  कोशिश यह की जाती है कि सभी समस्याओं का हल जल्दी से जल्दी प्रस्तुतद किया जाए। आप ने कल शाम को प्राप्त हुआ, आज आप ने तुरंत उस का उलाहना भी दिया। यदि आप को बहुत ही शीघ्रता थी तो इस का हल तुरंत आप को उसी वकील या रजिस्ट्री कराने वाले डीडराइटर से पूछ लेना चाहिए था। वह निश्चित रूप से बता देता।

दि आप को बेचा गया भूखंड रजिस्टर्ड विक्रय पत्र में केवल 61 गज का ही अंकित है और यह अंकित नहीं है कि प्रथम तल पर 78 गज में निर्माण है। तो निश्चित रूप से यह आप के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। वास्तव में विक्रय पत्र में बेचे जाने वाली संपत्ति का पूर्ण विवरण अंकित होना चाहिए था। उस में अंकित होना चाहिए था कि भूखंड 78 गज का था जिस पर दो मंजिला मकान बना हुआ है। इस में से ग्राउंड फ्लोर का 17 गज का भूखंड और उस पर भूतल पर बना निर्माण किसी अन्य व्यक्ति को विक्रय किया जा चुका है लेकिन उस पूर्व में बेच दिए गए 17 गज के भूखंड पर बने निर्माण की छत वर्तमान में आप को बेची जा रही संपत्ति में सम्मिलित है। विक्रय पत्र में प्रत्येक तल पर निर्मित क्षेत्रफल अलग अलग लिखा जाता है जिस में आप के मामले में लिखा जाना चाहिए था कि भूतल पर 61 गज का भूखंड और उस पर निर्मित क्षेत्रफल 61 गज, प्रथम तल पर पूर्व में बेचे गए 17 गज भूखंड व प्रथम तल की छत सहित निर्मित क्षेत्रफल 78 गज है। इस  तरह संपूर्ण निर्मित क्षेत्रफल 139 गज है।

प को विक्रय पत्र को एक बार ध्यान से जाँच लेना चाहिए कि उस में यह स्पष्ट है कि नहीं कि पूर्व में बेचे गए भूखंड के भाग और उस पर निर्मित भूतल के निर्माण की छत तथा उस छत पर निर्मित हो रहे निर्माण सहित आप को विक्रय की जा रही है। यदि यह स्पष्ट नहीं है तो निश्चित रूप से आप के लिए परेशानी का कारण है। आप को इसे तुरंत दुरुस्त करवा लेना चाहिए।

स त्रुटि को ठीक करवाने में न्यायालय का कोई काम नहीं है। कोई भी विक्रय विक्रेता और क्रेता के मध्य हस्तांतरण है। जिस का पंजीयन पंजीयक के यहाँ होना आवश्यक है।  उस विक्रय पत्र से उतनी ही संपत्ति पर आप को अधिकार प्राप्त हुआ है जितनी उस में स्पष्ट रूप से अंकित है।  इस अस्पष्टता का लाभ उठा कर 17 गज भूखंड और उस पर निर्मित भूतल का स्वामी प्रथम तल के उस के ऊपर निर्मित हिस्से पर अपना अधिकार जता कर आप को परेशान कर सकता है।  अब चूंकि यह मामला क्रेता और विक्रेता के बीच का है तो दोनों के बीच ही सुलझ सकता है। इस के लिए आप को विक्रेता से कहना पड़ेगा कि प्रथम तल के 17 गज के निर्माण के बारे में विक्रय पत्र में कुछ नहीं लिखा है इस लिए उस 17 गज के भूतल के निर्माण की छत तथा उस पर प्रथम तल पर निर्मित निर्माण के लिए एक और विक्रय पत्र उसे निष्पादित कर पंजीकृत करवानी होगी। यदि यह केवल विक्रय पत्र के प्रारूपण या टंकण की त्रुटि है तो एक संशोधन विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर उस का पंजीयन करवाना पड़ेगा।  इस के लिए आप विक्रेता से बात करें और 17 गज के प्रथम तल की छत तथा उस पर निर्मित प्रथम तल के निर्माण के विक्रय पत्र अथवा संशोधन विक्रय पत्र की रजिस्ट्री जितना शीघ्र हो करवाएँ। यदि विक्रेता आनाकानी करे तो फिर आप को पूर्व में हुए विक्रय की संविदा (सेल एग्रीमेंट) में यह बात लिखे होने के आधार पर विक्रेता के विरुद्ध दीवानी न्यायालय में संविदा के विशिष्ट पालन का मुकदमा यह अतिरिक्त विक्रय पत्र निष्पादित कराने और उस का पंजीयन करवाने के लिए लाना पड़ेगा।

बड़े भाई के नाम से खरीदा गया मकान खुद के नाम से कैसे होगा?

समस्या-

इन्दौर, मध्यप्रदेश से सुश्री रेखा ने पूछा है-

मेरी माताजी द्वारा एक मकान वर्ष 1970 में इन्दौर में लिया गया था। चूंकि उस समय संपत्ति घर के बडों के नाम से ली जाती थी।  इसलिए मेरे पापा द्वारा उक्त मकान अपने बडे भाई के नाम से रजिस्टर कराया गया था।  बडे पापा जबलपुर में रहते हैं, वहीं उनकी नौकरी भी पूरी हुई है।  घर खरीदने के सारे धन की व्यवस्था मेरे पापा द्वारा ही की गई थी।  वह मकान खरीदने के बाद से ही हमारे कब्जे में है।  इस मकान के बारे में मेरे बडे पापा को कोई ज्ञान नहीं है।  मैं यह जानना चाहती हूँ कि क्या बड़े पापा की जानकारी में लाए बिना, कब्जे के आधार पर/ जल एवं विद्युत कनेक्शन के अपने नाम होने / नगर पालिका में जमा कराये जा रहे संपत्ति कर की रसीदों के आधार पर मकान को अपने नाम कराया जा सकता है अथवा नहीं।  क्या कोर्ट के द्वारा उक्त मकान को हासिल किया जा सकता है?

समाधान-

प का यह तर्क बेमानी है कि 1970 में संपत्ति बड़ों के नाम से खरीदी जाती थी।  केवल संयुक्त परिवार होने पर ही संपत्ति परिवार के मुखिया के नाम से खरीदी जा सकती थी।  संपत्ति भी परिवार की संयुक्त संपत्ति होती थी।  आप का यह तर्क यदि तथ्यों के आधार पर साबित भी कर दिया जाए तो भी संपत्ति संयुक्त परिवार की मानी जाएगी। ऐसे संयुक्त परिवार में आप के दादा के सभी पुरुष वंशज और उन के परिवार सम्मिलित हो जाएंगे।  मकान फिर भी आप की माता जी को प्राप्त नहीं हो सकेगा।

प ने यह नहीं बताया कि आप के पिताजी मौजूद हैं अथवा नहीं।  क्यों कि इस मामले में यह तथ्य बहुत महत्व रखता है।  आप ने यह नहीं बताया कि आप की माता जी क्यों चाहती हैं कि मकान अब उन के नाम हो जाए?  मकान पर उन का अबाधित कब्जा वर्ष 1970 से चला आ रहा है।  उस में रह रही हैं।  मकान के टैक्स की रसीदें उन के नाम से हैं और नल-बिजली के कनेक्शन भी उन्हीं के नाम से हैं तो 1970 से उन का कब्जा तो है ही।  बात का कोई भी दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है कि कब्जा आप के पिता जी और माता जी के पास कैसे आया? ऐसी स्थिति में आप की माता जी को क्या आवश्यकता है कि वे इसे अपने नाम कराना चाहती हैं?  वे उस का उपभोग करती रहें।  यदि कभी आप के पिता के बड़े भाई या उन के उत्तराधिकारी आपत्ति करें और कोई कानूनी कार्यवाही करें तो यह तर्क रखा जा सकता है कि यह मकान वास्तव में आप के माता पिता ने अपनी स्वयं की आय से अपने लिए बड़े भाई के नाम से खरीदा था।   इस तथ्य से बड़े भाई भी परिचित थे और उन्हों ने इसीलिए आप के कब्जे में आज तक कोई दखल नहीं किया।  वैसे भी बयालीस वर्ष से आप की माताजी के कब्जे में होने से इस पर आप की माता जी का प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) हो चुका है।   तर्कों के आधार पर कोई भी आप की माता जी का कब्जा उन से नहीं ले सकता।

हाँ, यदि आप की माता जी चाहें और आप के पिता के बड़े भाई मान जाएँ तो उन से आप की माता जी के नाम वसीयत लिखवा सकती हैं जिस में उन की यह स्वीकारोक्ति हो कि उक्त मकान आप के पिता ने ही अपनी स्वयं की आय से खरीदा था आप के पिता का ही था और अब आप के पिता के उत्तराधिकारियों का ही है।  केवल बड़े भाई को सम्मान प्रदान करने मात्र के लिए उन के नाम से खरीदा गया था। इसी कारण से अब वे उस मकान की वसीयत आप की माता जी के नाम कर रहे हैं।  इस के अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है।  फिर भी आप को समस्त दस्तावेज दिखा कर किसी अच्छे और विश्वसनीय स्थानीय वकील से इस मामले में विधिक राय प्राप्त कर लेनी चाहिए।

भूमि सौदे में छल की गंध आते ही तुरन्त कार्यवाही करें

समस्या-

मेरी दिवंगत माताजी ने एक प्लॉट 14-01-2009 को खरीदा था जिस का नोटरी के यहाँ प्रमाणित अनुबंध में उल्लेख है कि 75% रकम अभी और शेष 25% रकम 5 माह बाद देय होगी तभी रजिस्ट्री की जाएगी।  किंतु उसके बाद मेरी माता का स्वाथ्य खराब रहने लगा।  मेरी माता जी ने 5 माह बाद जब उस व्यक्ति को रकम देते हुए रजिस्ट्री कराने को कहा तो उसने कहा पहले आप अपनी तबीयत सही कर लो।  रजिस्ट्री तो बाद में भी  हो जाएगी।  किंतु 03-10-2009 को मेरी माता का देहांत हो गया उसके पश्चात मैं ने कई बार उससे अपने प्लाट की रजिस्ट्री कराने को कहा पहले तो वह टालता रहा, फिर कहने लगा मैं ने उसे बेच दिया और तुम्हारा पैसा भी मैं नहीं दूँगा।  इसी बीच मेरे पिताजी का देहांत भी 04-08-2011 को हो गया।  मेरी  दो बहिनें हैं।  जिनका विवाह हो चुका है।  मैं अकेला हूँ, मैं प्लाट कैसे प्राप्त कर सकता हूँ?

-आशीष पँवार, उज्जैन, मध्यप्रदेश

समाधान-

प का प्रारंभिक अनुबंध 14 जनवरी 2009 को हुआ था, उस के 5 माह बाद आप की माता जी ने शेष राशि का भुगतान किया।  इन दोनों भुगतानों की रसीद का बड़ा महत्व है।  आप को संविदा के विशेष पालन के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करना चाहिए।  लेकिन यह वाद कारण उत्पन्न होने के तीन वर्ष की अवधि में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए। जनवरी से पाँच माह जून में हो जाते हैं। यदि जून 2009 में शेष राशि का भुगतान किया है तो वाद प्रस्तुत करने का समय निकल चुका है।  हो सकता है किसी कारण से अभी भी वाद प्रस्तुत करने का समय शेष हो।  लेकिन इस के लिए आप को तुरन्त किसी अनुभवी वकील से मिलना होगा वह आप से तमाम तथ्यों की पूछताछ करने के बाद यह पता कर सकेगा कि आप के मामले में दीवानी वाद अब किया जा सकता है अथवा नहीं।

लेकिन विक्रेता ने आप से सौदा करने के बाद भी उस भूखंड को विक्रय कर दिया है तो यह आप के साथ छल करने का अपराध है।  इस अपराध के लिए आप पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज करवा सकते हैं।  थाने द्वारा कार्यवाही न किए जाने पर पुलिस अधीक्षक को डाक से भिजवा सकते हैं।  सप्ताह भर में कोई कार्यवाही न होने पर आप न्यायालय में शिकायत प्रस्तुत कर सकते हैं।  यह आप को अवश्य करना चाहिए।  आज कल संपत्ति के विशेष रूप से भूखंडों के सौदों में बहुत छल-कपट हो रहा है।  इस कारण से बहुत सावधान रहना चाहिए और धोखे की संभावना की गंध आते ही तुरन्त कार्यवाही भी करनी चाहिए।   आप इस मामले को बिलकुल भी न टालें, तुरंन्त किसी अच्छे वकील से मिल कर कार्यवाही कराएँ।

दान क्या है? क्या दान में प्राप्त संपत्ति को बेचा जा सकता है?

समस्या-

दान क्या है और क्या दान में प्राप्त संपत्ति को बेचा जा सकता है?

-भव्या, उदयपुर, राजस्थान

समाधान-

प को दान के सम्बन्ध में जानना चाहिए कि विधिक रूप से दान क्या है?

दान भी एक तरह का स्वेच्छा से किया गया चल या अचल संपत्ति का हस्तान्तरण है जिस में संपत्ति हस्तान्तरित करने वाला व्यक्ति संपत्ति प्राप्त करने वाले व्यक्ति से कोई प्रतिफल प्राप्त नहीं करता है। संपत्ति हस्तान्तरित करने वाला व्यक्ति दाता तथा प्राप्त करने वाला व्यक्ति दानग्रहीता कहा जाता है। दानग्रहीता द्वारा दान को ग्रहण करने की स्वीकृति दाता  के जीवनकाल में दिया जाना आवश्यक है। दानग्रहीता द्वारा स्वीकृति देने के पूर्व दाता की मृत्यु हो जाए तो ऐसा दान निरस्त हो जाता है। दान के आवश्यक तत्व संक्षेप में निम्न प्रकार हैं-

  1. दान को स्वेच्छा से किया गया होना चाहिए तथा कोई प्रतिफल प्राप्त किया गया नहीं होना चाहिए;
  2. दाता केवल वही संपत्ति दान कर सकता है जिस का वह एक मात्र स्वामी है;
  3. दानग्रहीता को दान स्वीकार होना चाहिए, यह स्वीकृति दाता के जीवन काल में ही दी जानी चाहिए। एक अवयस्क भी दानग्रहीता हो सकता है। संरक्ष अपने अवयस्क प्रतिपाल्य की ओर से दान ग्रहण को स्वीकार कर सकता है लेकिन तभी जब कि दान के साथ कोई दायित्व भी न हो।
  4. चल संपत्ति का दान केवल पंजीकृत विलेख के माध्यम से ही हो सकता है।
  5. दान के साथ दान की गई संपत्ति के उपयोग के संबंध में शर्तें हो सकती हैं।

दान की गई संपत्ति को दानग्रहीता द्वारा विक्रय किए जाने पर कोई कानूनी प्रतिबंध नहां है लेकिन दान के साथ उस के उपयोग के संबंध में कोई शर्त हो सकती है। आप ने आप के द्वारा इंगित संपत्ति के संबंध में यह नहीं बताया कि संपत्ति क्या है? किस ने किस व्यक्ति को दान की है? क्या दान को स्वीकार किया जा चुका है? और क्या दान के साथ कोई शर्त भी है? यदि दान के साथ कोई शर्त नहीं है तो दान में प्राप्त की गई संपत्ति को विक्रय किया जा सकता है। लेकिन दान में प्राप्त संपत्ति को विक्रय करने और क्रय करने के पहले विक्रेता और क्रेता को यह जान लेना चाहिए कि संपत्ति हस्तान्तरण योग्य है अथवा नहीं।

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