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अंतिम प्रसव में जुड़वाँ जन्म लेने से तीन संताने हो जाने के कारण माता पिता को किसी सुविधा से वंचित नहीं होना पड़ता।

समस्या-

दीपक के. बगौरिया ने श्रीमाधोपुर, सीकर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


मैं अनुसूचित जाति से हूँ।  मेरे 4 साल का बेटा है और मेरी बीवी 4 माह की गर्भवती है जिसके गर्भ में जुड़वाँ बच्चे (twins) हैं। इस तरह मेरे 3 बच्चे हो जाएंगे। मैं राजनीति में भी सक्रिय हूँ तथा सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर रहा हूँ।  3 बच्चे होने की वजह से मुझे कोई दिक्कत तो नही होगी न? कृपया मार्गदर्शन करें।


समाधान-

स मामले में आप को बिलकुल भी परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को एक संतान है और एक संतान के होते हुए उसे या उस की पत्नी को कोई प्रसव होता है और उस से जुड़वाँ बच्चों का जन्म होता है जिस से उस के तीन संतानें हो जाती हैं तो उन्हें राजनीति में चुनाव लड़ने अथवा इसी कारण से सरकारी नौकरी से वंचित नहीं होना पड़ेगा।

आप के दिमाग में जो प्रश्न है वही प्रश्न उक्त कानून और नियम बनाने वाले विधायकों के मन भी रहा होगा। इस कारण उन्होंंने इस नियम को  इस तरह बनाया है कि इस तरह अंतिम प्रसव से यदि जुड़वाँ सन्तानें जन्म लेती हैं तो इस तरह के जन्म से हुई तीसरी संतान का कोई असर इस कानून पर नहीं होगा।

अपना वकील सावधानी से चुनें

क्सर ही मैं यह कहता हूँ कि ‘जब भी आप को कभी किसी वकील की आवश्यकता हो तो आप वकील का चुनाव करने में सावधानी बरतें।’  यह ठीक वैसे ही है जैसे आप मकान का निर्माण कराने के लिए एक अनुभवी और प्रतिष्ठित बिल्डर का चुनाव करते हैं। यूँ तो कानून की व्यवसायिक डिग्री हासिल करने के बाद किसी राज्य की बार कौंसिल में अपना पंजीयन कराते ही एक व्यक्ति वकालत करने का अधिकार प्राप्त कर लेता है। लेकिन वकालत के व्यवसाय में पैर जमा पाना इतना आसान नहीं। कानूनन किसी वरिष्ठ वकील के पास ट्रेनिंग जरूरी न होते हुए भी एक नए वकील को जल्दी ही यह पता लग जाता है कि उस के पास के ज्ञान के भरोसे वकालत कर पाना संभव नहीं है, उसे जल्दी ही किसी वरिष्ठ वकील के कार्यालय में स्थान बनाना पड़ता है। कोई भी वरिष्ठ वकील अपने कार्यालय में नए वकील को सहज स्वीकार नहीं करता क्यों कि इस तरह वह अपने ही कार्यालय में अपने ही एक प्रतिस्पर्धी को स्थान दे रहा होता है। लेकिन हर वरिष्ठ वकील को भी जिस के कार्यालय में पर्याप्त काम है, अपनी सहायता के लिए हमेशा ही कुछ सहयोगी वकीलों की जरूरत होती है। यही जरूरत नए वकीलों के वरिष्ठ वकीलों के कार्यालयों में प्रवेश को सुगम बनाती है। नए वकील को किसी भी वरिष्ठ वकील के कार्यालय में पहले छह माह तक न तो कोई काम मिलता है और न ही कोई आर्थिक सहायता। इस काल में वह केवल कार्यालय और अदालत में अपने वरिष्ठ वकील के काम का निरीक्षण कर सीखता है और खुद को इस काबिल बनाता है कि वह वरिष्ठ वकील के काम में कुछ सहायता करे। इस बीच उसे केवल वही काम करने को मिलते हैं जो एक वरिष्ठ वकील का लिपिक (मुंशी) करता है। इस बीच वह अपने वरिष्ठ वकील का अनुसरण करते हुए काम करना सीखता है और उस की पहचान बनने लगती है। छह माह में उसे अदालत के न्यायाधीश, लिपिक, अन्य वकील, उन के मुंशी और वरिष्ठ वकील के मुवक्किल उसे नए वकील के रूप में पहचानने लगते हैं। इस बीच वह जितना काम करने के लायक हो जाता है उतनी ही आर्थिक सहायता उसे वरिष्ठ वकील के माध्यम से प्राप्त होने लगती है जो अक्सर अनिश्चित होती है।

च्च माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण करते करते किसी भी युवक की उम्र 17-18 वर्ष हो जाती है। उस के बाद तीन वर्ष स्नातक बनने में और तीन वर्ष विधि-स्नातक बनने में कुल 23-24 वर्ष की आयु का होने पर ही कोई व्यक्ति वकालत के व्यवसाय में पैर रखता है। यह वह उम्र है जब वह विवाह कर चुका होता है या करने वाला होता है। उसे अपने भावी जीवन की चिंता सताने लगती है। इस उम्र में आते-आते उस पर यह दबाव बन जाता है कि वह अपने परिवार (पत्नी और बच्चे) को चलाने के लायक आमदनी अवश्य करने लगे। यह दबाव ही एक नए वकील को शीघ्र कमाने लायक बनने को प्रेरित करती है। अगले छह माह के दौरान वह यह पता लगाने का प्रयत्न करता है कि शीघ्र कमाई के साधन क्या हो सकते हैं। नए वकीलों में पाँच प्रतिशत ऐसे व्यक्ति भी होते हैं। जो सुदृढ़ आर्थिक स्थिति आते हैं या जिन के पास कोई अन्य आय का साधन होता है। इन में वे वकील भी सम्मिलित हैं जिन के पिता या परिवार का कोई सदस्य पहले से वकालत के व्यवसाय में होता है। इस श्रेणी के वकीलों पर कमाई का दबाव नहीं होता है। वे आराम से अपना अभ्यास जारी रखते हैं। उन की कमाई धीरे धीरे आरंभ होती है। उन का काम भी अच्छा होता है और वे विश्वसनीय वकील साबित होते हैं। 
शेष लोग जिन पर कमाई का दबाव होता है। उन में से अधिकांश शीघ्र कमाई का जुगाड़ करने के चक्कर में छोटे-छोटे काम करने लगते हैं और जल्दी ही वरिष्ठ वकील के कार्यालय से पृथक अपना अस्तित्व कायम कर लेते हैं। लेकिन उन का अभ्यास कमजोर रह जाता है। वे जो भी काम मिलने का अवसर उन्हें मिलता है उसे नहीं छोड़ते, चाहे उस काम को करने में वे स्वयं सक्षम हों या नहीं। वे ऐसे कामों को करने में बहुधा ही त्रुटियाँ करते हैं जो कभी बहुत गंभीर होती हैं और जिन्हें किसी भी तरह से ठीक नहीं किया जा सकता है। ऐसे वकील अक्सर मुवक्किल के लिए खतरा-ए-जान सिद्ध होते हैं। इस श्रेणी के वकील भले ही अपने काम में सिद्ध हस्तता हासिल न कर सके हों लेकिन किसी मुवक्किल को यह विश्वास दिलाने की कला सीख लेते हैं कि वे ही उस के काम के लिए सब से उपयुक्त वकील हैं। इस तरह के वकीलों से सावधान रहने की सब से अधिक आवश्यकता है। इन वकीलों के मुवक्किल को जल्दी ही पता लग जाता है कि वह गलत स्थान पर फंस गया है। वह वहाँ से जान छुड़ाने की कोशिश करता है। अक्सर ही उसे अपनी अदा की जा चुकी वकील फीस का मोह त्याग कर अपने मुकदमे को किसी काबिल वकील को देना पड़ता है। किसी भी काबिल वकील के लिए ऐसा मुकदमा लेना आसान नहीं होता। पहली अड़चन वह नियम है जिस के अंतर्गत किसी भी मुकदमे में कोई भी वकील पूर्व में नियुक्त किए गए वकील की अनुमति के बिना अपना वकालत नामा प्रस्तुत नहीं कर सकता जब तक कि न्यायालय स्वयं ही परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इस की अनुमति न दे दे। इस कारण से दूसरा वकील नियुक्त करने के पहले किसी भी शर्त पर मुवक्किल को पहले वाले वकील से नए वकील के लिए अनुमति प्राप्त करनी पड़ती है। जो काबिल वकील इस तरह बिगड़े पुराना लेना स्वीकार करता है, वह पहले यह देख लेता है कि जो नुकसान उस के मुवक्किल को हो चुका है उस में से कितना सुधारना संभव है? और वह यह बात अवश्य ही अपने मुवक्किल को बता भी देता है। इस तरह के बिगड़े हुए मुकदमों में काबिल वकील को अतिरिक्त श्रम करना होता है। इसी कारण से वह अपनी शुल्क भी अधिक ही लेता है। 
प समझ ही गए होंगे कि किसी भी काम के लिए किसी वकील का चुनाव करना क्यों आवश्यक है?

मतदाताओं को बहुत बहुत बधाइयाँ

देश के उन करोड़ों मतदाताओं को तीसरा खंबा की बहुत बहुत बधाइयाँ जिन्हों ने अपने अपने मत का प्रयोग कर देश को एक स्थिर और पाँच साल चलने वाली सरकार बनाने का निर्देश दिया है।  सभी को बहुत बहुत शुभकामनाएँ भी कि नई बनने वाली सरकार जनता की समस्याओं के निराकरण पर पूरी तरह से ध्यान दे और उन्हें हल करने के लिए आवश्यक और प्रभावी कदम उठाए और देश की जनता को राहत पहुँचाए।

पिछली संघीय सरकार ने देश में न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए आवश्यक कदम उठाए थे।  लेकिन वे नाकाफी थे।  देश में 10 लाख की जनसंख्या पर 50 अदालतें स्थापित करने का जो लक्ष्य सरकार ने स्वतः ही निर्धारित किया हुआ है।  उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सरकार शीघ्र कदम उठाए।  इस लक्ष्य की पूर्ति में देश की न्यायपालिका और राज्य सरकारों की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।  तीसरा खंबा यह आशा कर सकता है कि वे भी इस मामले में अपने अपने दायित्वों को अवश्य ही निभाएँगे।

स अवसर पर मैं यह स्मरण कराना चाहता हूँ कि किसी भी न्यायपूर्ण समाज में व्यक्ति अभावों में जीने की क्षमता विकसित कर लेते हैं।  लेकिन अभाव न होते हुए भी अन्याय को सहन नहीं किया जा सकता।  समाज में न्याय की स्थापना अभावों से जूझने के लिए शक्ति प्रदान करता है।  इन तथ्यों पर ध्यान दे कर सरकारें न्याय व्यवस्था को शीघ्र पटरी पर लाने का काम करेंगी जिस से सस्ता और शीघ्र न्याय जनता को सुलभ हो सके।

न्याय में देरी : लोकसभा चुनाव में कोई मुद्दा ही नहीं

जब भी कोई मुवक्किल मुकदमा करने के लिए या कानूनी सलाह हासिल करने के लिए मेरे पास आता है तो वह यह प्रश्न जरूर करता है, कि उस को कब तक राहत मिल सकेगी?  लेकिन इस का जवाब मैं नहीं दे सकता। यदि मैं इस का कोई भी जवाब दे भी दूँ तो वह सिरे से ही मिथ्या होगा।  मैं किसी मुकदमे की उम्र का हिसाब नहीं लगा सकता और न यह कह सकता हूँ कि उस के मुकदमे का निर्णय पहली अदालत से कब हो जाएगा। ऐसे में मैं यह तो बिलकुल भी नहीं बता सकता कि उस व्यक्ति को कब राहत मिल सकेगी?

मैं रोज अदालत में किसी न किसी मुवक्किल को अपने वकील से इस बात के लिए उलझते देखता हूँ कि  मुकदमा पाँच साल गिरह मना चुका है, मुकदमे का अब तक फैसला क्यो नहीं हुआ है? जब कि मुकदमा करते समय वकील साहब ने कहा था कि दो साल में मुकदमा निपट जाएगा।  कई बार तो हाथापाई भी हो जाती है और दूसरे वकीलों को बीच बचाव भी करना पड़ जाता है।

सब को और खास तौर पर वकीलों को पता है कि मुकदमो की उम्र बढ़ने के क्या कारण हैं? वे जानते हैं कि एक एक अदालत में उस की शक्ति से चार से दस गुना तक मुकदमे हैं। उसे सब मुकदमों और न्यायार्थियों से समान व्यवहार करना पड़ता है। नतीजा यह है कि मुकदमों की सामान्य उम्र बहुत अधिक बढ़ गई है।  इस का एक नतीजा यह भी हुआ है कि अब महज न्याय पाने के लिए कोई मुकदमा नहीं करता, बल्कि तब करता है जब उस के लिए मुकदमा करना एक मजबूरी हो जाती है।  पाँच-दस हजार की रकम की वसूली के लिए तो मुकदमा करने के लिए कोई वकील तक तैयार नहीं होता। वह जानता है कि इस मुकदमे में उसे जितना श्रम करना पड़ेगा उस के मुकाबले उसे फीस नहीं मिलेगी।  इस स्थिति से न्यायार्थियों की संख्या भी घटी है।  जिस का प्रभाव यह भी है कि वकीलों को अब कम मुकदमे मिल रहे हैं।  मेरा अनुमान है कि आधे से अधिक मुकदमे तो अदालत तक पहुँचते ही नहीं हैं।

इस स्थिति से वकीलों के व्यवसाय पर भी विपरीत असर हुआ है।  लेकिन इस के बावजूद यह देखने में आता है कि इस समस्या से निपटने के लिए वकील खुद सजग नहीं हैं।  एक तरह से वे इस के विरुद्ध आवाज न उठा कर वे अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं।  खुद विधि मंत्री संसद में स्वीकार कर चुके हैं कि देश में प्रति 10 लाख आबादी पर 50 न्यायालय होने चाहिए। जब कि वर्तमान में इन की संख्या मात्र 11-12 है। यह एक अत्यन्त दयनीय स्थिति है।  अदालतों की संख्या बढ़ाने की जिम्मेदारी सरकारों की है जो उस के लिए पर्याप्त धन की व्यवस्था कर सकती है।  लेकिन सरकारें इस ओर से उदासीन रही हैं।

सरकारों की उदासीनता का जो प्रमुख कारण है वह यह कि न्याय का विषय सरकार के चुने जाने पर कोई प्रभाव नहीं डालता।  कोई दबाव समूह नहीं है जो लोकसभा या विधान सभा चुनाव के समय राजनीति और वोटों को प्रभावित करता हो।  वर्तमान में लोकसभा चुनाव चल रहे हैं।  एक चौथाई इलाकों में वोट डाले जा चुके हैं और कल तक देश का आधा मतदान संपन्न हो चुका होगा।  लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान एक बार भी यह मुद्दा नहीं उठा कि कोई उम्मीदवार या पार्टी देश में न्याय व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए अदालतों की संख्या में वृद्धि करेगी।  वास्तविकता तो यह है कि इस चुनाव में
जनता के हितों से सम्बन्धित मुद्दे सिरे से गायब हैं।  जब तब इस मुद्दे पर लिखते रहने और हल्ला करते रहने वाले पत्रकार और मीडिया भी चुनाव में चुप हैं।

मुझे लगता है कि आने वाली लोकसभा में भी यह विषय कभी चर्चा का विषय नहीं बनेगा और सरकार भी जनता की उदासीनता को देख कर इस मुद्दे पर चुप्पी ही साधे रहेगी।  जब तक वकील समुदाय खुद इस मुद्दे पर किसी संघर्ष में नहीं उतर आती है। तब तक दशा में कोई भी सुधार होने की संभावना तक नजर नहीं आती है।

अदालतों में सन्नाटा व्याप्त है, सकून है ,शांति है।

कल सोमवार था और वकीलों के न्यायिक कामकाज के बहिष्कार का समाचार अखबार में छप चुका था। इस लिए जब अदालत में रोज ही आने वाले लोगों की संख्या 20 प्रतिशत से भी कम नजर आयी तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं हुआ। केवल वकील, मुंशी, टाइपिस्ट, दुकानदार, पुलिस वाले और अदालती स्टाफ के अलावा वहाँ इक्का-दुक्का व्यक्ति ही नजर आ रहे थे। हालत ऐसी थी जैसे ईद के अवकाश के दिन ईद न होने के कारण काम का दिन निकल आया हो।

लेकिन आज उस से भी बदतर स्थिति थी। कल जितने लोग अपने कामों के लिए नजर आ रहे थे उन से भी कम लोग अदालत में थे और दोपहर के समय जब आधे घंटे का अवकाश होता है तो चाय-पान के क्षेत्र में तलाशने पर ही मुवक्किल लगने जैसा कोई व्यक्ति दिखाई पड़ रहा था। यह एक आश्चर्यजनक बात थी। वकीलों के बीच चर्चा भी हुई। मैं ने जानबूझ कर इस चर्चा को अनेक लोगों तक चलाया। एक मत से जो कारण निकल कर आया वह आप सब से बांटना मैं ने जरूरी समझा।

मेरे एक साथी वकील फौजदारी के मशहूर वकील हैं और आज कल सब से अधिक फौजदारी मुकदमें उन्हीं की डायरी में दर्ज हैं। मैं ने उन से बात की तो सीधे सीधे शब्दों में उन्हों ने बताया कि दीवानी और दीगर मामलों में तो केवल गवाही आदि के लिए ही लोग आते हैं। बाकी पेशियों पर तो वकील ही सब काम संभाल लेता है। एक फौजदारी मामले ऐसे हैं जिन में अभियु्क्तों का आना जरूरी होता है। नहीं आने पर अदालत को वाजिब और विश्वसनीय कारण बताते हुए हाजरी मुआफ करने के लिए अदालत को दरख्वास्त देनी पड़ती है। वे सब लोग जो अपराधिक मामलों में अदालतों में आते हैं इन दिनों चुनाव में इस या उस प्रत्याशी के लिए प्रचार में व्यस्त हैं। आज ही लगभग सभी फौजदारी मुकदमों में उन्हें हाजरी मुआफी की दरख्वास्तें पेश करनी पड़ी हैं। फिर नज़दीक आ कर फुसफुसाया कि “सारे गुंडे मवाली चुनावों में व्यस्त हैं”

कुछ अन्य लोगों से बात करने पर एक तथ्य और सामने आया कि बहुत से लोग जेल से पेशी पर आए लोगों से मिलने और अभियुक्तों को देखने के लिए अदालत आते हैं। क्यों कि उन्हें अदालत परिसर में स्थित हवालात से अदालत तक लाने ले जाने के वक्त उन से बात करने का अवसर मिल जाता है। कभी कभी भारी अपराधी व्यक्ति फंस जाता है तो उस के तमाम समर्थक वहाँ उस का हौसला या ठसका बढ़ाने के लिए भी अदालत आते हैं। वे सब भी आज कल चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं।

मुझे यदि अदालत पहुँचने में 11 बजे से ऊपर का समय हो जाता है तो अक्सर मुझे अपनी कार खड़ी करने के लिए स्थान तलाशना पड़ता है। लेकिन दो दिनों से उस के लिए स्थान खाली मिल रहा है। इस से यह भी लगने लगा है कि वे रसूख वाले लोग जो अदालत में कारें ले कर आते हैं वे भी आज कल इसी लिए अदालत का रुख नहीं कर रहे हैं क्यों कि वे भी चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं।

अदालतें जैसी ही हालत इन दिनों कलेक्ट्री और उस के साथ अनिवार्य रूप से जुड़े दफ्तरों की है। वहाँ भी अदालतों जैसा ही माहौल है।  कुल मिला कर अदालतों में सन्नाटा व्याप्त है, सकून है, शांति है। अदालतें चल रही हैं, काम बिना किसी रुकावट के चल रहा है और तेजी से भी चल रहा है। और दिनों की अपेक्षा अधिक काम हो रहा है।

जनता के धन के अपव्यय के सवाल पर कोई ध्यान देता है?

कल जिला उपभोक्ता मंच में एक मुकदमे में अंतिम बहस थी। लगभग डेढ़ वर्ष से मंच में सदस्यों की नियु्क्ति न होने से काम नहीं हो रहा था। डेढ़ वर्ष तक मंच का खर्च बिना किसी उपयोगिता के चलता रहा, जज साहब और सारा स्टाफ खाली बैठा रहा। जनता का लाखों रुपया पानी में बह गया। यह राज्य सरकार का काम था लेकिन राज्य सरकार ने इसे त्वरित गति से क्यों नहीं किया? इस सवाल को राज्य सरकार से कौन पूछे? और पूछ भी ले तो राज्य सरकार इस का उत्तर क्यों दे? जिस राजनैतिक दल (भाजपा) की सरकार है वह राज्य में चुनाव लड़ रहा है। उस के किसी उम्मीदवार से पूछा जाए तो उस का जवाब यही होगा कि यह मुख्यमंत्री के स्तर का मामला था वे क्या कर सकते थे? फिर चुनाव में इस प्रश्न और इस तरह के अनेक प्रश्नों का क्या महत्व है?

ये नियुक्तियाँ क्यों नहीं हुईं? सब जानते हैं कि ये नियुक्तियाँ राजनैतिक आधार पर होती हैं। सत्ता दल के कार्यकर्ताओं को इन पदों पर स्थान मिलता है। चुनाव के वक्त बहुत से कार्यकर्ताओं को इन पदों का लालच दिया जाता है और वे दलों के लिए काम करते हैं। हालत यह है कि एक एक पद के लिए अनेक कार्यकर्ता जोर लगाते हैं। अब मुख्यमंत्री किसे खुश रखे और किसे नाराज करे? राजस्थान में सैंकड़ो पद इसी लिए खाली रहे और जनता का करोड़ों रुपया बरबाद किया गया।  चुनाव के ठीक दो-चार माह पहले इन पदों में से कुछ पर नियुक्तियाँ कर दी गई हैं। इस तरह जनता के धन के का अपव्यय करने वाली राज्य सरकार के मुख्यमंत्री को किसी भी चुनाव में भाग लेने के अयोग्य ठहराने संबंधी संशोधन संविधान में नहीं किया जा सकता है?

कल भी मंच में बहस नहीं सुनी गई। मामला हाउसिंग बोर्ड से संबंधित था। किसी को 1987 में मकान आवंटित हुआ। 1999 में जब उस मकान का सारा पैसा जमा कर दिया गया और 2004 में जब मकान की लीज डीड का पंजीयन कराने का अवसर आया तो बताया गया कि गलती से 1983 की दर से कीमत ले ली गई है जब कि कीमत आवंटन की तारीख से लेनी चाहिए थी। कीमत में 15000 रुपयों का फर्क आ गया लेकिन 1999 वर्षों का ब्याज जोड़ कर वह पचपन हजार हो गया। अब तक तो वह लाख से ऊपर जा चुका है। सवाल था कि क्या इस तरह से कीमत बढ़ा कर इतने दिनों के उपरांत धन ब्याज सहित वसूल किया जा सकता है।

जज साहब ने कहा हाउसिंग बोर्ड सारे हिसाब का चार्ट बना कर पेश करे। जो हिसाब पेश है वह उन की समझ में नहीं आ रहा है। इस के लिए एक माह की तारीख पड़ गई क्यों कि बीच में चुनाव है और हाउसिंग बोर्ड का स्टॉफ चुनाव की ड़्यूटी पर है।  मेरा मुवक्किल अदालत के बाहर आ कर फट पड़ा कि मुझे तारीख जल्दी लेने के मामले में अदालत से तकरार करनी चाहिए थी। मुझे उस मुवक्किल को समझाना पड़ा जिस में मेरा आधा घंटा खर्च हो गया। अब मुकदमे की बहस एक माह बाद होगी। तब तक नई सरकार चुनी जा चुकी होगी।  मुझे पता है कि वह खुद वर्तमान मुख्यमंत्री के दल का समर्थक है और संभवतः इस चुनाव में भी वह उसी दल को मत देगा। क्यों कि उस के उसी दल में संपर्क हैं और उसे यह विश्वास है कि उस के किसी भी बुरे वक्त में उसी दल के लोग काम आ सकते हैं। चाहे वे बुरा वक्त आने पर वे सब मुहँ ही क्यों न फेर लें।

उम्मीदवारों के चुनावी खर्च का हिसाब कहाँ से कहाँ तक ?

सम्माननीय साथी विष्णु बैरागी जी का कल एक प्रश्न तीसरा खंबा को प्राप्त हुआ…

यह समस्‍या नहीं, जिज्ञासा है ।
विधान सभा चुनावों की प्रक्रिया शुरु हो गई है । नामांकन पत्र प्रस्‍तुत करने के लिए उम्‍मीदवार, खर्चीले जुलूस के साथ जा रहे हैं । यह खर्च उनके चुनावी खर्च में जुडेगा या नहीं – यही जानने की जिज्ञासा है ।

मुझे बताया गया है कि नाम वापसी के बाद, उम्‍मीदवारी का अन्तिम निर्धारण हो जाने के बाद ही, उम्‍मीदवार द्वारा किए गए खर्च को हिसाब-किताब में लिया जाएगा ।

बैरागी जी का प्रश्न  न केवल सामयिक है अपितु महत्वपूर्ण है। कोई भी व्यक्ति जो किसी निर्वाचन में उम्मीदवार है, उसे अपने खर्चों का हिसाब जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 के अध्याय 8 जो निर्वाचन व्यय के संबंध में है रखना होता है।
जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 के अध्याय 8 इस प्रकार है ….

अध्याय 8
निर्वाचन व्यय
76. अध्याय का लागू होना – यह अध्याय केवल लोकसभा के और राज्य की विधानसभा के लिए निर्वाचन पर लागू होगा।
77. निर्वाचन व्ययों का लेखा और उनकी अधिकतम मात्रा-
(1) निर्वाचन में हर अभ्यर्थी निर्वाचन संबंधी उस सब व्यय का, जो उस तारीख के, जिसको वह नाम निर्दिष्ट किया गया है और उस निर्वाचन के परिणाम की घोषणा की तारीख के, जिनके अन्तर्गत ये दोनों तारीखें आती हैं, बीच स्वयं द्वारा या उसके निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा उपगत या प्राधिकृत किया गया है, पृथक और सही लेखा या तो वह स्वयं रखेगा या अपने निर्वाचन अभिकर्ता द्वारा रखवायेगा।
स्पष्टीकरण:
(1) किसी सन्देह के निवारण के लिए यह एतद्द्वारा घोषित किया जाता है कि-
(क) किसी राजनीतिक दल के नेताओं के द्वारा, उस राजनीतिक दल के कार्यक्रम का प्रचार करने के लिए वायुमार्ग से या परिवहन के किन्हीं अन्य साधनों के द्वारा यात्रा किए जाने के कारण उपगत व्यय, इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, उस राजनीतिक दल के अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता के द्वारा निर्वाचन के सम्बन्ध में उपगत या प्राधिकृत व्यय नहीं समझा जाएगा।
(ख) धारा 123 के खंड (7) में उल्लिखित वर्गों में से किसी वर्ग और सरकार की सेवा में के किसी व्यक्ति द्वारा, उस
खण्ड के किसी शर्त में उल्लिखित अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन या तात्पर्यित निर्वहन में, कोई व्यवस्था करने या सुविधा उपलब्ध कराने या कोई अन्य कार्य करने से सम्बन्धित किसी भी प्रकार का उपगत व्यय, इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए किसी अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता के द्वारा निर्वाचन के संबंध में उपगत या प्राधिकृत व्यय नहीं समझा जाएगा।
स्पष्टीकरण:
(1) स्पष्टीकरण 1 के खण्ड (क) के प्रयोजनों के लिए, किसी निर्वाचन के सन्दर्भ में “राजनीतिक दल के नेताओं” पर का अर्थ है- 
(i) जहां ऐसा राजनीतिक दल एक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है, वहां ऐसे व्यक्तियों की संख्या चालीस से अधिक नहीं है, और
(ii) जहां ऐसा राजनीतिक दल, किसी मान्यताप्राप्त राजनीतिक दल से भिन्न कोई अन्य दल है, वहां ऐसे व्यक्तियों की संख्या बीस से अधिक नहीं है
जिनके नाम, ऐसे निर्वाचन के प्रयोजन से नेता होने के लिए, निर्वाचन आयोग को तथा राज्यों के मुख्य निर्वाचन अधिकारियोंको, इस अधि

सतरह साल से न्याय नहीं मिला फिर भी न्याय-प्रणाली पर विश्वास है।

 मुझे भी सतरह साल से न्याय नहीं मिला है। मेरे पिता के हत्यारों को आज तक सजा नहीं मिल पायी है। इस के लिए हमारे देश की न्याय प्रणाली दोषी है। लेकिन फिर भी मुझे उस पर भरोसा है।

यह बात राहुल गांधी कह सकते हैं और  लालकृष्ण अडवानी भी। क्यों कि वे जानते हैं कि दोष वास्तव में न्यायप्रणाली का नहीं है। उस के आकार को सुखा देने वाली सरकारों का है जिन में वे भागीदारी कर चुके हैं तथा कर रहे हैं।

संसद हमले के दोषी अफ़ज़ल गुरु को फांसी देने में हो रही देरी पर सरकार पर हो रहे हमले के जवाब में राहुल गांधी ने कही है कि मेरेपिता की हत्या के 17 साल बाद भी हमें न्याय नहीं मिला है। राहुल से एक छात्र ने पूछा था कि अफज़ल को अब तक फांसी क्यों नहीं दी गई। राहुल ने पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के दोषियों को नहीं दी गई मौत की सज़ा के लिए देश की न्याय प्रणाली को दोषी ठहराया।

राहुल ने एच. एन. बहुगुणा विश्वविद्यालय में छात्रों के सामने कहा कि मेरे पिता प्रधानमंत्री थे, मेरी दादी भी प्रधानमंत्री थीं लेकिन मुझे इन्साफ नहीं मिला। मेरे पिता बम हमले में मारे गए। उसमें 40 लोग शामिल थे। इस बात को 17 साल हो गए लेकिन अब तक भी कोई सज़ा नहीं दी गई है।कांग्रेस महासचिव ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि अफज़ल को फांसी क्यों नहीं दी गई। हमारी न्याय प्रणाली काफी धीमी है। राहुल ने यह भी कहा कि इसके लिए भारत की न्याय प्रणाली को दोषी है, लेकिन मुझे न्यायपालिका में भरोसा है।

जरा सोचिए कि न्याय प्रणाली धीमी क्यों है? जब खाना पकाने वाला एक होगा और खाने वाले बहुत सारे तो यही होने वाला है। क्यों नहीं अदालतों की संख्या बढ़ाई जा रही है? क्यों नहीं जजों की संख्या बढ़ाई जा रही है? क्यों कि न्याय होने लगा तो सब से बड़ा असर राजनीति पर ही पड़ेगा। जितने भी अण्ट-शण्ट काम हैं उन पर रोक लगेगी।

आप सोचें या न सोचें अब जनता को जब बरसों न्याय नहीं मिलता तो वह सोचती है। लालकृष्ण अडवानी घोषणा कर चुके हैं कि वे न्याय पालिका पर होने वाले खर्च को हर साल बढ़ाएँगे और पांच साल में पाँच गुना कर देंगे।   जरा आप भी अपने दल की ओर से कुछ तो घोषणा कर दीजिए कि आप के दल की सरकार आने पर न्याय प्रणाली के सुधार के लिए आप क्या कर रहे हैं। जरा जल्दी सोचिए। कही ऐसा न हो कि आप को सोचने में देर हो जाए और चुनाव सर पर आ जाएँ।

सरकारी ठेकेदार ठेके के चलते नहीं हो सकते चुनाव में प्रत्याशी

कोई भी व्यक्ति जिसने अपने व्यवसाय या काम के सिलसिले में सरकार को माल सप्लाई करने या किसी काम का निष्पादन करने के लिए कोई कंट्रेक्ट किया हो और वह कंट्रेक्ट चालू हो तो वह चुनाव में उम्मीदवार नहीं हो सकता। जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 9-ए के अंतर्गत इस तरह के व्यक्तियों को अयोग्य घोषित किया गया है। यह धारा निम्न प्रकार है ….
 
9A. Disqualification for Government contracts, etc.
A person shall be disqualified if, and for so long as, there subsists a contract entered into by him in the course of his trade or business with the appropriate Government for the supply of goods to, or for the execution of any works undertaken by, that Government.

Explanation.

For the purposes of this section, where a contract has been fully performed by the person by whom it has been entered into with the appropriate Government, the contract shall be deemed not to subsist by reason only of the fact
that the Government has not performed its part of the contract either wholly or in part.

इस के स्पष्टीकरण के अनुसार यदि ऐसे कंट्रेक्टर ने कंट्रेक्ट का अपना दायित्व पूरा कर लिया है और केवल सरकार को उस का दायित्व पूरा या आंशिक रूप से पालन करना शेष है। उदाहरणार्थ किसी व्यक्ति ने माल सप्लाई का कंट्रेक्ट सरकार के साथ किया और माल सप्लाई कर दिया या किसी सड़क को बनाने का कंट्रेक्ट सरकार के साथ किया और सड़क निर्माण पूरा कर दिया और अब सरकार से उस माल की सप्लाई का या सड़क निर्माण का पूरा या आंशिक भुगतान उसे प्राप्त होना शेष है तो इसे अयोग्यता नहीं माना जाएगा और ऐसा व्यक्ति चुनाव में प्रत्याशी हो सकता है।

विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी होने के लिए शासकीय निगमों और कंपनियों के कर्मचारियों के लिए पूर्व शर्तें

तीसरा खंबा के 19 अक्टूबर के आलेख भारत सरकार या राज्य सरकार में लाभ का पद धारण करने वाला विधानसभा प्रत्याशी नहीं हो सकता ? पर टिप्पणी करते हुए विष्णु बैरागी जी ने  भारतीय जीवन बीमा निगम का उल्लेख करते हुए प्रश्न किया कि भारतीय जीवन बीमा निगम के कुछ कर्मचारियों ने चुनाव से पर्याप्‍त समय पूर्व, चुनाव लडने की अनुमति मांगी थी । उन्‍हें अनुमति मिली तो जरूर, लेकिन चुनाव हो जाने के बाद । क्‍या यह सम्‍भव है कि चुनाव से, महीने-दो महीने पहले अनुमति मांगने वाला कर्मचारी, अनुमति न मिलने पर चुनाव लड़ सके? उसने तो भरपूर समय पहले अनुमति मांगी । अनुमति मिलने में देर हो तो उसका क्‍या दोष? 

बैरागी जी के प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए हमें जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा-10 को देखना होगा। जो निम्न प्रकार है-

10. Disqualification for office under Government company.  

A person shall be disqualified if, and for so long as, he is a managing agent, manager or secretary of any company or corporation (other than a cooperative society) in the capital of which the appropriate Government has not less than twenty-five percent share. 

इस अधिनियम की यह धारा-10 सहकारी समितियों के अलावा किसी भी ऐसी कंपनी या कारपोरेशन के प्रबंधकीय अभिकर्ताओं या प्रबंधकों या सचिवों को, जिस की पूँजी में  उचित सरकार की पच्चीस प्रतिशत से अधिक शेयर लगे हों चुनाव में प्रत्याशी होने से रोकती है। 

लेकिन जो अधिकारी और कर्मचारी उक्त श्रेणी में नहीं आते वे शौकिया चुनाव लड़ सकते हैं यदि उन की सेवा शर्तें उन के चुनाव में प्रत्याशी होने में बाधा नहीं डालती हों। उन्हें चुनाव में प्रत्याशी होने के लिए अपने नियोजक की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। वे बिना अनुमति चुनाव में प्रत्याशी हो सकते हैं। कोई भी रिटर्निंग अधिकारी उन का नामांकन इस आधार पर निरस्त नहीं कर सकता। 

हाँ, यदि उन की सेवा शर्तों के अनुसार विधानसभा चुनाव में प्रत्याशी होने के लिए अनुमति लेना आवश्यक हो ते यह सेवा शर्तों का एक उल्लंघन होगा और प्रत्याशी होने पर एक दुराचरण माना जाएगा। इस कारण से प्रत्याशी होने के कारण चुनाव के दौरान या उस के बाद उन्हें इस दुराचरण के लिए आरोप पत्र मिले और जाँच के उपरांत नौकरी पर आँच आए तो उस के लिए प्रत्याशी कर्मचारियों को तैयार रहना होगा। 

यहाँ मैं यह स्पष्ट कर देना उचित समझता हूँ कि जब भी कोई व्यक्ति किसी नियोजक के यहाँ नियोजन प्राप्त करता है तो वह नियोजन की सारी शर्तों को स्वीकार करता है। यदि वह उन शर्तों में से किसी एक या एकाधिक का उल्लंघन करता है तो उसे उस के परिणामों के लिए तैयार रहना चाहिए।

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