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बिना किसी दायित्व के किसी को भी चैक नहीं दें।

rp_cheque-dishonour-295x300.jpgसमस्या-

सुनील सिंह सिसोदिया ने गोविन्द कॉलोनी, टिगरिया बादशाह रोड, इंदौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैंने अपना एक चेक किसी कंसलटेंट को दिया था नौकरी लगवाने के बदले और मुझ से एक फॉर्म फिल करवाया था कि जैसे ही आप को अपना ऑफर लेटर मिलेगा आप मुझे अपने एक माह का वेतन देंगे, उसने मुझे कुछ इंटरव्यू दिलवाए और ऑफर लेटर भी मिले और ऑफर लेटर के बदले में मैं ने उसे एक रुपए 5000/- चेक दे दिया। पर सैलरी कम होने की वजह से मैंने वह ज्वाइन नहीं किया और वह कोई और नौकरी नहीं लगवा पाया मैंने इसी बीच किसी और कंपनी में जॉब कर ली है! मैं जहाँ जॉब कर रहा हूँ वो जॉब उसने नहीं दिलवाई है और मेरी कंपनी वालो ने कहा है कि हम किसी प्रकार का फीस अमाउंट किसी भी कैंडिडेट से नहीं लेते हैं जो भी फीस अमाउंट होता है हम वो एम्प्लायर से चार्ज करते हैं ना कि किसी कैंडिडेट से और इसके अगेंस्ट में उन्होंने मुझे मेल भी कर दिया है कि हम स्वयं एक थर्ड पार्टी कंसलटेंट हैं और मेन पॉवर प्रोवाइड करते हैं बहुत सी कंपनी को अपने पे रोल पे मेन पॉवर प्रोवाइड करते हैं। मैंने अपना चेक तो स्टॉप करवा दिया है पर अब वो मुझे धमकी दे रहा है कि आप मुझे अपने चेक में लिखा अमाउंट चुकाएँ नहीं तो में आपके खिलाफ सेक्शन १३८ का केस लगाउँगा। कृपया मुझे उचित समाधान बताएँ।

समाधान-

प ने किसी व्यक्ति को चैक दिया है। जिस के बारे में आप के पास कोई सबूत नहीं है कि वह आप ने किसी दायित्व के अधीन न दे कर किसी और कारण से दिया है तो यही माना जाएगा कि आप ने किसी दायित्व के अधीन चैक दिया है। यदि वह व्यक्ति चैक बैंक में लगाता है और वह बाउंस हो जाता है तो वह आप के विरुद्ध मुकदमा कर सकता है। वैसी स्थिति में आप यदि यह साबित नहीं कर पाते हैं कि उक्त चैक किसी दायित्व के अधीन नहीं दिया गया था तो आप को सजा हो सकती है। स्टॉप पेमेंट भी चैक बाउंस की ही श्रेणी में आता है।

प ने जो चैक दिया है वह मात्र रु.5000/- का है। यदि वह व्यक्ति चैक को बाउंस करवा कर आप को नोटिस भिजवाता है तो बेहतर है कि आप उसे नोटिस मिलने के 15 दिनों में चैक की राशि का भुगतान कर दें और रसीद के साथ बाउंस हुआ चैक वापस प्राप्त कर लें। अन्यथा उस के मुकदमा करने पर मुकदमा लड़ने में ही इस से अधिक का खर्च हो जाएगा। आप ने चैक देने की गलती की है तो इतना तो भुगतना ही होगा। भविष्य में बिना किसी दायित्व के कोई चैक किसी को न दें।

क्या138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के मामलों में नोटिस का अभियुक्त को प्राप्त होना आवश्यक है?

rp_permanent-address.jpgसमस्या-

संतोष ने रूपवास, भऱतपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम (N I Act) के मामले में अभियुक्त को नोटिस का प्राप्त होना आवश्यक है?

समाधान-

दि चैक अनादरित हो जाए तो चैक धारक चैक जारी करने वाले को अनादरण की सूचना प्राप्त होने के 30 दिनों में लिखित रूप से सूचित करेगा कि चैक की राशि उसे 15 दिनों की अवधि में भुगतान की जाए। यह नोटिस चैक जारी करने वाले को मिलने के 15 दिनों की अवधि में भुगतान न करने पर 16वें दिन उक्त धारा में अपराध है तथा 16वें दिन वाद कारण पैदा होता है। इस के एक माह की अवधि में नोटिस जारीकर्ता के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

कानून का मंतव्य तो यही है कि नोटिस चैक जारीकर्ता को प्राप्त होना चाहिए। लेकिन चैक जारीकर्ता इस नोटिस से बचने का उपाय कर सकता है। वह नोटिस का अनुमान होने पर डाक वितरण समय पर पूरे एक माह गायब रह सकता है और वहाँ उपस्थित लोगों से कह सकता है कि वह बाहर गया हुआ है। वह डाकिए से यह भी नोट लगवा सकता है कि पते पर ताला लगा हुआ है आदि।

स कारण यह मामला विवादित हो गया कि नोटिस मिलना चाहिए कि नहीं और क्या नोटिस भेजना पर्याप्त है?

स मामले पर अनेक मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने विचार किया है। C.C. Alavi Haji vs Palapetty Muhammed & Anr on 18 May, 2007 के प्रकरण में विचार के बाद यह माना कि चैक धारक के द्वारा दिया गया नोटिस सही पते पर भेजा जाना चाहिए। यदि चैक जारी कर्ता नोटिस से बचने की कोशिश करता है तो फिर सही पते पर से नोटिस लौटने पर भी यह माना जाएगा कि नोटिस चैक जारीकर्ता को प्राप्त हो गया है। परिवाद के विचारण के समय परिवादी को न्यायालय में साक्ष्य प्रस्तुत करना चाहिए कि उस ने नोटिस अभियुक्त के सही पते पर प्रेषित किया लेकिन स्वयं अभियुक्त द्वारा नोटिस से बचने की कोशिश के कारण उक्त नोटिस लौट कर प्राप्त हो गया जिसे नोटिस का मिलना मानते हुए तथा वाद कारण उत्पन्न होना मानते हुए परिवाद प्रस्तुत किया गया है।

चैक अनादरण मामलों का क्षेत्राधिकार किस मजिस्ट्रेट को है? कानून में ताजा संशोधन क्या है?

rp_cheque-dishonour-295x300.jpgसमस्या-

संतोष शर्मा ने भरतपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

रक्राम्य विलेख अधिनियम Negotiable Instrument Act मेँ सरकार द्वारा सन 2015 मेँ जून माह मेँ जो संशोधन किया गया है क्या वह प्रभाव मेँ आ गया है और वह क्या संशोधन किया गया है?

समाधान

रक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 के द्वारा चैक अनादरित होने की तिथि के 30 दिनों के भीतर नोटिस देने पर चैक की धनराशि नोटिस मिलने से 15 दिनों में चैक धारक को अदा न करने को अपराधिक कृत्य बनाया गया था। नोटिस के उपरान्त 15 दिन की अवधि समाप्त होने के दिन उक्त अपराध के लिए वाद कारण उत्पन्न होता है। वाद कारण उत्पन्न होने के दिन से एक माह में चैक धारक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकता है। दशरथ रूपसिंह राठौर के मामले में सुप्रीमकोर्ट द्वारा 01.08.2014 को दिए गए निर्णय से यह विवादित हो गया था कि यह परिवाद किस मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इस निर्णय में कहा गया था कि जिस शाखा द्वारा चैक अनादरित किया जाता है उस शाखा के स्थित होने के क्षेत्र के मजिस्ट्रेट के न्यायालय में यह परिवाद प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इस मामले में एक व्याख्या यह थी कि जब चैक भारत की सभी शाखाओं में भुगतान योग्य हो तो अक्सर जहाँ चैक प्रस्तुत किया जाता था उसी नगर की शाखा द्वारा वह अनादरित किया जाता है, और इस तरह जिस नगर में चैक समाशोधन हेतु प्रस्तुत किया जाता है उसी नगर में अनादरित होने के कारण उसी नगर के मजिस्ट्रेट के न्यायालय को यह परिवाद सुनने का क्षेत्राधिकार होगा। लेकिन इस व्याख्या को कोई भी न्यायालय स्वीकार नहीं कर रहा था।

सुप्रीम कोर्ट के उक्त निर्णय में इस तथ्य का विस्तार से उल्लेख किया गया था कि किस तरह चैक अनादरण के मुकदमों ने देश भर के मजिस्ट्रेट न्यायालयों में मुकदमों की बाढ़ पैदा की है। उस के मुकाबले मजिस्ट्रेट न्यायालयों की संख्या अतिन्यून है। (भारत में पहले ही जरूरत की चौथाई से भी कम अदालतें हैं।) इस से अपराधिक न्याय व्यवस्था संकट में आ गयी है। इस तरह सुप्रीमकोर्ट के इस निर्णय का एक उद्देश्य यह भी प्रतीत होता था कि यदि चैक जारीकर्ता बैंक शाखा में प्रस्तुत करने की बाध्यता होगी तो इस तरह के मुकदमे प्रस्तुत करने की संख्या बहुत कम हो जाएगी। एक तरह से यह फैसला सरकारों और न्याय व्यवस्था के बीच एक अंतर्विरोध को प्रकट करता है। इस निर्णय से इस तरह के मुकदमों के विचारण में अराजकता सी आ गयी। अदालतें मुकदमों को चैकजारीकर्ता शाखा के न्यायक्षेत्र के मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए लौटाने लगीं।

रकारें कभी यह नहीं सोचतीं कि आबादी के हिसाब से पर्याप्त न्यायालय स्थापित करने चाहिए। ब्रिटेन के मुकाबले हमारे यहाँ आबादी के अनुपात में एक चौथाई से भी कम और अमरीका के मुकाबले 1/10 से भी कम अदालतें स्थापित हैं। इन की संख्या तुरन्त बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। लेकिन इस दिशा में कभी किसी सरकार ने गंभीरता से नहीं सोचा है और न्याय व्यवस्था पंगु हो गयी है। उस की यह पंगुता दिनों दिन बढ़ती जा रही है।

स मामले में सरकार ने तय किया कि कानून में संशोधन कर के चैक को समाशोधन के लिए प्रस्तुत किए जाने वाली शाखा के न्याय क्षेत्र को अन्तिम रूप से धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के परिवाद प्रस्तुत करने का क्षेत्राधिकार प्रदान कर दिया जाए। इस के लिए दिनांक 15 जून 2015 को अध्यादेश जारी कर संशोधन कर दिया गया। वर्तमान में यह संशोधन प्रभावी है और अब केवल इस संशोधन के अनुसार चैक को समाशोधन के लिए प्रस्तुत किए जाने वाली शाखा के न्याय क्षेत्र के मजिस्ट्रेट के न्यायालय को ही प्रस्तुत किया जा सकता है। लेकिन इस अध्यादेश का प्रभाव केवल 14 दिसंबर 2015 तक ही रहेगा। यदि इस बीच संसद इस कानून को पारित कर उसे अधिसूचित नहीं करती है तो यह अध्यादेश निष्प्रभावी हो सकता है और यह कानून उसी पटरी पर आ जाएगा।

प संदर्भित निर्णय व अध्यादेश निम्न लिंकों को क्लिक कर के पढ़ सकते हैं-

  1. निर्णय दशरथ रूप सिंह राठौर
  2. अध्यादेश परक्राम्य विलेख अधिनियम 15.06.2015

चैक दिया है तो राशि का भुगतान करना ही होगा, अन्यथा सजा भुगतनी होगी।

rp_cheque-dishonour-295x300.jpgसमस्या-

सोनिया शर्मा ने अजमेर राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति ने बहुत सारे लोगों से धन ले रखा है और उसे अदा करने के लिए चैक दे रखे हैं। अब वे पैसा वापस नहीं दे पा रहे हैं। लोगों ने उन के विरुद्ध चेक बाउंस के नोटिस वकीलों के माध्यम से भिजवाना आरंभ कर दिए हैं जो हमारे घर पर आने लगे हैं। किसी वकील ने मेरे पति को कहा है कि वह खुद नोटिस को रिसीव नहीं करे बल्कि किसी दूसरे व्यक्ति से प्राप्त करवा लें। पर हम लोगों ने ऐसा नहीं किया बल्कि पोस्ट मेन को कहा है कि वह इस पते पर नहीं रहते हैं। नोटिस की डाक वापस चली गयी है। क्या मेरे पति का बचाव का कोई तरीका है?

समाधान-

प के पति ने लोगों से पैसा लिया है। इस कारण उन का यह दायित्व है कि वे उन का पैसा लौटाएँ। जिन लोगों को आप के पति ने चैक दिए हैं वे तो उन का पैसा न मिलने पर और चैक बाउंस होने पर आप के पति के विरुद्ध मुकदमा करेंगे उसी के लिए वकीलों के नोटिस आप के पास आ रहे हैं। यदि आप नोटिस न लेंगे तो भी किसी न किसी तरह वे यह साबित करेंगे कि उन्हों ने आप के पति के ज्ञात पते पर नोटिस भिजवाए थे।

चैक बाउंस मामले में एक बार चैक बाउंस हो जाने पर केवल एक ही बचाव हो सकता है कि आप के पति उस व्यक्ति का पैसा लौटा कर अपने चैक वापस प्राप्त कर लें। अन्यथा किसी न किसी प्रकार से आप के पति को नोटिस भेजा जाना कानून द्वारा माना जाएगा और चैक बाउंस होने के कारण आप के पति को सजा हो सकती है। फिर तो एक ही मार्ग शेष रह जाएगा कि आप के पति अदालत द्वारा दी गयी सजा भुगत लें। हमारी सलाह तो यही है कि आप अपने पति को सलाह दें कि जिन लोगों को चैक दे रखे हैं उन्हें धन का भुगतान कर के अपने चैक वापस प्राप्त कर लें। यही एक मात्र बचाव का उपाय है, अन्य कोई नहीं।

धोखाधड़ी, छल व ब्लेकमेलिंग का मुकदमा दर्ज कराएँ।

cheque dishonour1समस्या-

सुनील ने  हिरनमगरी, उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं ने दुकान की आवश्यकता के लिए डेली बेस पर डायरी खुलवाने हेतु एक खाली चैक डायरी वाले को दिया। उस के बदले उस ने एक बीस हजार का चैक दिया। जब मैं ने चैक बैंक में डाला तो उसने चैक स्टॉप करा दिया। जब मैं उसके पास गया तो उस ने रूपया नहीं होना बताया। कुछ समय बाद दूसरा चैक देने की बात की। मैं ने भी जरूरत के कारण हाँ भर दी कॉफी समय निकलने के बाद भी उस ने चैक नहीं दिया। जब फिर से उसके आफिस गया तो पता चला कि उसने आफिस खाली कर दिया। फिर मैं ने उसे बहुत तलाश किया पर उसका कोई पता नही चला। करीब दो साल बाद उस ने मेरे चैक में राशि भरकर मुझ पर केस कर दिया। उस से मिलने पर वह बात करने को भी तैयार नहीं है। बात जिरह तक पहुँच गई है। मुझे कानूनी ज्ञान बिलकुल नहीं है और वकील साब भी कुछ नहीं बताते। कृपया उचित सलाह दें।

समाधान-

ह समझ नहीं आया कि दैनिक आधार पर यह किस तरह की डायरी खुलवाने की बात आप कर रहे हैं। उस व्यक्ति ने आप को 20000/- हजार का चैक दिया और आप ने उसे खाली चैक हस्ताक्षर कर के दे दिया। फिर उस का चैक डिसऑनर हो गया। उसी वक्त आप उस के विरुद्ध चैक डिसऑनर के लिए नोटिस दे कर कार्यवाही कर सकते थे लेकिन उस ने आश्वासन दे कर आप को टाल दिया। फिर दो साल का वक्त निकाल कर उस ने चैक में राशि भर कर बैंक में प्रस्तुत किया और डिस ऑनर करवा कर मुकदमा लगा दिया।

स तरह के मुकदमों में कोई मजबूत डिफेंस नहीं होता। सजा और चैक की राशि से अधिक राशि जुर्माना होता है। इसी परिस्थिति के आधार पर वह व्यक्ति आप को ब्लेक मेल कर रहा है। जब वह व्यक्ति आप का हस्ताक्षर युक्त खाली चैक ले कर फरार हुआ था तभी आप को पुलिस में उस के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराना चाहिए था। खैर।

ब भी जब कि आप जान चुके हैं कि आप के साथ छल हुआ है और वह व्यक्ति ब्लेकमेलिंग कर रहा है आप को चाहिए कि आप पुलिस में उस के छल, धोखाधड़ी और ब्लेकमेलिंक के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए। यदि पुलिस इस तरह कोई मुकदमा दर्ज करने से इन्कार करे तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उसे पुलिस को जाँच के लिए भेजा जाना चाहिए तभी आप को कोई राहत इस मुकदमे में मिल सकती है। यदि आप के पास उस का डिसऑनर हुआ चैक हो तो उसे तथा आप के बैंक खाते में उस चैक के डिसऑनर होने का जो रिकार्ड है उसे भी प्रतिरक्षा में न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है। लेकिन इन सब का लाभ आपको तभी मिलेगा जब आप उस व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करा देंगे।

हस्ताक्षरित रिक्त चैक किसी को न दें, राशि लिखा हुआ दें तो भी बिना प्रयोजन अंकित रसीद के न दें।

cheque dishonour1समस्या-

मन ने अजमेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं ने एक जने से रूपये उधार लिये, उसके बदले दो चैक दिये। एक खाली, एक भरा, दोनों की फोटो कापी कर के। रुपये देने के बाद उसने भरा चैक लोटा दिया। पर खाली चैक बाद में देने को कहा। मैं बहुत दिनों तक उस के घर के चक्कर काटता रहा। वह हर बार टालता रहा। फिर उस ने मकान खाली कर दिया। कभी मिल भी जाता तो कहता कहीं मिस हो गया है। मिलते ही दे दुंगा तीन साल बाद मुझे पता चला कि उस ने वही चैक किसी और को दे, उस में बडी रकम भर मुझ पर केस कर दिया है। मैं थाने गया वहाँ जवाब मिला कि तुमने रूपये लिये चैक दिया इस में हम कया करें। सभी बडे अफसरों को लिख कर दिया कि इस ठग पर कार्यवाही हो। पर सभी कार्यवाही चल रही है कहते हैं, करता कोई नहीं। अदालत में कार्यवाही चल रही है अब शायद जिरेह चालू होगी आप ही बतायें मैं कया करूँ जिस से उस ठग पर कार्यवाही हो।

समाधान-

ब से पहले तो कोई भी खाली चैक हस्ताक्षर कर के किसी भी व्यक्ति को देना नहीं चाहिए। भरा हुआ चैक दें तो उस की रसीद अवश्य प्रप्त कर लें जिस में उस का प्रयोजन स्पष्ट अंकित हो। फोटो प्रति रखने से कुछ नहीं होता। जब आप ने रुपए चुकाए तभी दोनों चैक वापस प्राप्त कर लेने चाहिए थे। जब उस ने दो या तीन बार टाल मटोल की तभी उस व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करनी चाहिए थी। आप ने नहीं की, तो भी जब उस ने मकान खाली कर दिया तब करनी चाहिए थी। लेकिन आप ने नहीं की।

कोई भी चैक का केस धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अन्तर्गत तभी हो सकता है जब चैक अनादरित होने के बाद उस की राशि के भुगतान का नोटिस आप को मिल जाए। यदि आप को यह नोटिस मिला है तो उस का सही से जवाब यह होना चाहिए था कि यह चैक मैं ने आप को नहीं अपितु किसी अन्य व्यक्ति को दिया था और उस ने न्यास भंग कर के आप को दे दिया। आप के विरुद्ध मेरा कोई दायित्व नहीं है। जिस व्यक्ति को चैक दिया था उस के व आप के विरुद्ध धारा 406 आईपीसी में मुकदमा दर्ज करवा रहा हूँ।

प ने इस तरह के नोटिस व उस के उत्तर का कोई उल्लेख अपने प्रश्न में नहीं किया है। हो सकता है नोटिस आप को नहीं मिला हो। तो आप को जैसे ही धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम का समन मिला तब तुरन्त कार्यवाही करनी थी। यदि पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की थी तो रजिस्टर्ड एडी डाक से पुलिस अधीक्षक को शिकायत भेजनी थी और उस के द्वारा भी दो सप्ताह में कोई कार्यवाही न करने पर आप को न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर पुलिस को अन्वेषण के लिए भेजने हेतु प्रार्थना करनी चाहिए थी और न्यायालय के न मानने पर आप को खुद अपनी साक्ष्य से मुकदमा दर्ज करवाना चाहिए था। कुल मिला कर आप ने बहुत गलतियाँ की हैं और बहुत सुस्ती बरती है।

प को अब भी चाहिए कि आप उन दोनों व्यक्तियों के विरुद्ध मजिस्ट्रेट के न्यायालय में धारा 420, 406 आईपीसी में परिवाद दर्ज कराएँ। आप का धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम का मुकदमा साक्ष्य में आ गया है। उस में बचाव के अनेक बिन्दु हो सकते हैं। जैसे कि आप को नोटिस नहीं मिला, जिस व्यक्ति ने चैक का मुकदमा किया है उस के प्रति आप का कोई दायित्व नहीं है, आदि आदि। आप का वकील इन बचाव के बिन्दुओं पर जिरह कर के आप की प्रतिरक्षा कर सकता है। इस मामले में हम कोई भी ठोस सुझाव नहीं दे सकते। क्यों कि सुझाव केवल पूरे मामले की पत्रावली के समस्त दस्तावेजों का अध्ययन कर के ही दिए जा सकते हैं। यदि आप का वकील अच्छा हुआ तो वह अच्छी प्रतिरक्षा कर सकेगा, उस के साथ ही वह आप का परिवाद प्रस्तुत करवा कर भी उन दोनों व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही कर सकेगा।

खोए चैक के आधार पर मुकदमा करने वाले के विरुद्ध धोखाधड़ी का मुकदमा चलाएँ।

समस्या-

इटारसी, मध्यप्रदेश से रामप्रसाद पटेल ने पूछा है-

मेरा एक चैक जिस पर सेल्फ़ 2 बार लिखा था, एक सेल्फ़ को मेरे द्वारा काट कर दस्तखत किए थे, राशि नहीं लिखी थी, मेरे पुत्र को दिया था कि वह बैंक में जा कर अकाउंट देख कर राशि लिख कर पैसा निकाल लाए। मेरे पुत्र ने वह चैक गुमा दिया। नेटबैंकिंग के द्वारा उस चैक नंबर का स्टॉप पेमेंट किया था जिस की बैंक ने रु. 51 की कटौती मेरे खाते से की थी। इस चैक को व्यक्ति ने उस चैक पर रु.5,00,000 लिख कर अपने बैंक खाते में जमा किया। जो बैंक द्वारा वापिस कर दिया। बैंक की चैक रिटर्न पर्ची में 2 नोट लिखे थे (1)फंड इन्सफिशियंट (12) ऑल्टरेशन्स रिक्वाइयर ड्रॉयर्स ऑथेन्टीकेशन उस व्यक्ति द्वारा एक लीगल नोटिस मेरे स्थाई पाते पर भेजा था जो मुझे नहीं मिला क्योंकि मैं वहाँ नहीं रहता, परंतु वह लीगल नोटिस किसी अन्य व्यक्ति ने प्राप्त कर लिया। इस नोटिस के आधार पर मेरे खिलाफ परक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 का मुक़दमा कोर्ट में लगा दिया गया है। कोर्ट द्वारा मुझे जो नोटिस दिया गया वह मुझे मेरे वर्तमान पते पर मिला है।

समाधान-cheque dishonour1

प को कोर्ट का नोटिस मिल गया है। अब आप केवल नोटिस न मिलने के आधार पर अपना बचाव नहीं कर सकेंगे। कोर्ट कहेगी। आप को अब नोटिस मिला है तो अब 15 दिन में चैक की राशि दे दीजिए।

प के पास पर्याप्त सबूत हैं कि आप पुत्र से चैक खो गया। जिस के कारण आप ने स्टॉप पेमेंट कराया। यह सब आप को मजबूत साक्ष्य से साबित करना होगा। साथ ही यह भी साबित करना होगा कि परिवादी को 500000 रुपए चुकाने का आप पर कोई दायित्व नहीं था। यदि आप यह सब साबित कर सके तो आप इस मुकदमे में अपना बचाव कर सकेंगे।

दि आप ने जो कुछ अपनी समस्या में लिखा है वह सच है तो फिर जिस व्यक्ति ने चैक को बैंक में लगाया है उस व्यक्ति द्वारा आप के साथ छल किया जा रहा है। जो कि धारा 420 आईपीसी में दंडनीय अपराध है। आप अपने वकील को कहिए कि वह तथ्यों सहित इस बात की जाँच करे कि क्या उस व्यक्ति के विरुद्ध धारा 420 आईपीसी में प्रकरण दर्ज कराया जा सकता है क्या। यदि आप का वकील सलाह दे तो आप को उक्त धारा में उक्त व्यक्ति के विरुद्ध परिवाद प्रस्तुत कर अभियोजन चलाना चाहिए।

सीक्योरिटी के बतौर दिए गए चैक के मामले में दण्डित नहीं किया जा सकता।

समस्या-cheque dishonour1

डिण्डोरी, मध्यप्रदेश से नीरज तिवारी ने पूछा है-

मेरे पिताजी ने सीमेंट का व्यापार करते समय अपने जिल के व्यापारी को सब डीलर बनाते समय चार चैक सीक्योरिटी के बतौर दिए थे जिस में केवल हस्ताक्षर उन्हों ने किए थे।  परन्तु एक साल बाद हम ने उन से सीमेंट का व्यापार बन्द करने को कहा और हम ने एक नया सीमेंट का ब्राण्ड ले लिया। जिस कारण उस ने हमारी छवि खराब करने और द्वेषता के कारण उन चैकों में रकम भर कर उन को बाउंस करा कर हमारे ऊपर आठ लाख का कर्ज बता रहा है। हमें क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के पिता और परिवादी के बीच व्यापारिक संबंध रहे हैं। माल भेजने आदि के हर लेन देन का हिसाब रहा होगा। यदि आप अपने हिसाब से यह साबित कर सकते हों कि आप के पिता ने उक्त चैक केवल सीक्योरिटी के बतौर दिए थे तथा कोई लेन-देन शेष नहीं है तो आप के पिता उक्त मुकदमों में अपना बचाव कर सकते हैं।

चैक बाउंस के मुकदमों में मुख्य बात यह है कि यदि चैक बाउंस हुआ है और उस पर चैक दाता के हस्ताक्षर हैं तो यह माना जाएगा कि चैक किसी दायित्व के अधीन दिया गया होगा। अब यह साबित करना कि चैक किसी दायित्व के अधीन नहीं दिया गया था बल्कि किसी अन्य उद्देश्य से दिया गया था, मसलन इस लिए दिया गया हो कि व्यापार बंद करने की स्थिति में कोई धनराशि बकाया हो तो उसे चैक के माध्यम से वसूल कर लिया जाए तो इस मामले में बचाव किया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने 11 जनवरी 2008 को Krishna Janardhan Bhat vs Dattatraya G. Hegde  के प्रकरण में अपने निर्णय में कहा है कि बिना किसी दायित्व के सीक्योरिटी के बतौर दिया गए चैक के आधार पर यदि दोनों के बीच कोई लेन देन शेष नहीं है तो धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम में दण्डित नहीं किया जा सकता।

फर्जी चैक अनादरण का अभियोजन निरस्त होने पर क्षतिपूर्ति के लिए दुर्भावनापूर्ण अभियोजन का वाद प्रस्तुत करें।

malicious procecutionसमस्या-

उज्जैन, मध्यप्रदेश से मिलन गुप्ता ने पूछा है –

मेरे विरुद्ध एक व्यक्ति ने  5, 25, 000 रु. का चैक बाउंस का प्रकरण चलाया था, जो कि पूरी तरह से फर्जी था। करीब 5 साल तक प्रकरण चलने के बाद अंतत: मुझे बरी कर दिया गया। इस दौरान मुझे करीब 60 हजार रुपए वकील फीस व अन्य खर्च करने पड़े, इस के साथ ही मुझे बहुत परेशानी भी झेलनी पड़ी। अब इस केस में मैं बरी हो गया हूँ तो मुझे आगे क्या कार्रवाई करना चाहिए जिससे उसे सबक मिले और जितना भी खर्च मेरा हुआ है वह मुझे मिले।

समाधान –

प के विरुद्ध जो प्रकरण चलाया गया था वह एक अपराधिक अभियोजन था। इस अभियोजन के निरस्त हो जाने से यह सिद्ध हुआ है कि यह दुर्भावना पूर्ण अभियोजन था। इस अभियोजन से आप को बहुत खर्च करना पड़ा और लगातार पेशियों पर जाने से काम का नुकसान हुआ। इस के अतिरिक्त मानसिक और शारीरिक पीड़ा भी भुगतनी पड़ी। समाज में भी आप की प्रतिष्ठा इस अपकीर्ति के साथ कम हुई कि आप चैक दे कर उसे अनादरित करवा देते हैं जिस से समाज में आप का भरोसा टूटा और पाँच वर्षों तक आप को अपकीर्ति का दोष भुगतना पड़ा।

मुकदमे में हुए खर्च अर्थात वकील की फीस की रसीद और अन्य खर्चों का विवरण तैयार करें। मानसिक व शारीरिक पीड़ा व अपकीर्ति से हुई क्षतियों का अपनी हैसियत के अनुसार मूल्यांकन करें और एक विधिक नोटिस उस व्यक्ति को प्रेषित करवाएँ जिस ने उक्त अभियोजन चलाया था। इस नोटिस में लिखें कि आप को जो क्षतियाँ हुई हैं, आप ने उस का मूल्यांकन इस प्रकार किया है और वह व्यक्ति आप को उतनी धनराशि क्षतिपूर्ति के रूप में अदा करे। यदि वह नियत समय में यह क्षतिपूर्ति अदा नहीं करता है तो आप उस के विरुद्ध दुर्भावना पूर्ण अभियोजन के लिए वाद प्रस्तुत कर उक्त क्षतिपूर्ति राशि की वसूली करेंगे। उक्त वाद में जो खर्च आएगा और जो हर्जा होगा वह भी उसे भुगतना पड़ेगा।

ह नोटिस उक्त व्यक्ति को मिल जाने तथा आप के द्वारा क्षतिपूर्ति के भुगतान के लिए दिया गया समय व्यतीत हो जाने पर आप दुर्भावनापूर्ण अभियोजन तथा क्षतिपूर्ति का वाद उक्त व्यक्ति के विरुद्ध प्रस्तुत कर दें।

चैक बाउंस के मुकदमे में समन और वारंट की तामील पुलिस ही कराएगी, लेकिन परिवादी को शुल्क के साथ आवेदन देना होता है।

समस्या-

दिल्ली से शारदा ने पूछा है –

मैं ने एक परिवाद धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तुत किया है। अब अभियुक्त को समन कोर्ट भेजेगी या मुझे भेजना होगा?

Code of Criminal Procedure
समाधान-

प ने जो परिवाद प्रस्तुत किया है उस पर जो कार्यवाही आरंभ हुई है वह अपराधिक प्रकृति की है और दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार ही समस्त कार्यवाही होगी। पहले आप को शपथ पत्र प्रस्तुत कर के अपने परिवाद के तथ्यों को साबित करना होगा। तब न्यायालय आप के परिवाद पर प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्त को समन से बुलाने का आदेश करेगा। तब आप को समन जारी करने के लिए आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा। जिस पर मामूली न्यायशुल्क लगेगा। तब न्यायालय अभियुक्त व्यक्ति के लिए समन जारी करेगा। इस समन को पुलिस द्वारा अभियुक्त को पहुँचाया जाएगा। यह हो सकता है कि अभियुक्त किसी दूरस्थ स्थान पर रहता हो तो न्यायालय आप को समन दस्ती देने का आदेश दे दे। तब भी समन आप को एक बंद लिफाफे में सिर्फ इतना करने के लिए दिया जाएगा कि आप उसे उस पुलिस थाने तक पहुँचा दें जिस के अंतर्गत अभियुक्त रहता है।

ब तक अभियुक्त को समन प्राप्त नहीं हो जाता है तब तक आप को समन जारी करने के लिए हर पेशी पर समन जारी करने का आवेदन शुल्क सहित देना पड़ सकता है। यदि समन मिलने पर भी अभियुक्त उपस्थित नहीं हो तो उसे जमानती या गिरफ्तारी वारंट से बुलाए जाने का आदेश न्यायालय दे सकता है। तब भी वारंट जारी करने के लिए सशुल्क आवेदन आप को ही देना होगा। लेकिन वारंट की तामील पुलिस ही कराएगी। वही अभियुक्त को गिरफ्तार कर के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगी।

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