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नॉमिनी केवल ट्रस्टी है, उसे राशि सभी उत्तराधिकारियों को उन के अधिकार के अनुसार देनी चाहिए।

समस्या-

राजेश ने इसराना, पानीपत, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

म चार भाई बहन हैं हमारे पिता जी एक सरकारी अधिकारी थे उनकी मृत्यु के बाद, nomination होने के कारण सारे पैसे मेरी माँ के नाम हो गए हैं। बहन की शादी हो चुकी है मेरी माँ हम दोनों छोटे भाइयों के पास रहती है। बड़ा भाई 10 साल से अलग है, वो सरकारी नौकरी पर है और अलग राशन कार्ड है, और अलग मकान है। हम दोनों छोटे भाई बेरोजगार हैं पिता की खरीदी हुई गाड़ी भी वही चलाता है जो कि मेरी माँ के नाम है और अब पिता की मृत्यु के एक महीने बाद वो हमसे अपना हिस्सा मांगने लगा है, जबकि वो हमसे 10 साल से अलग है तो क्या पिता के retirement वाले और pension वाले पेसों में उसका हिस्सा है? बताइये हमें क्या करना चाहिये?.

समाधान-

प के भाई ने आप के पिता की संपत्ति में क्या क्या अधिक ले लिया है यह एक अलग विषय है। पिता की संपत्ति में आप की माँ, आप तीनों भाई और आप  की बहन सब का बराबर का हिस्सा है। आप को बराबरी से बांटने की बात करना चाहिए था। यदि आपके भाई इस से अधिक ले लिए हैं तो गलत है, यदि शादी होने के बाद बहिन को कम दिया गया है या कुछ नहीं दिया गया है तो वह भी गलत है।

किसी भी मामले में नोमिनेशन का अर्थ होता है कि नामिनेशन करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उस के नोमिनी को उस की राशि दे दी जाए। लेकिन इस राशि को प्राप्त करने वाला केवल एक ट्रस्टी होता है उसे वह राशि मृत व्यक्ति के उत्तराधिकारियों में समानता से बाँटनी होती है।

पेंशन पर को आप की माता जी के सिवा किसी का अधिकार नहीं है क्यों कि आप भाई बहनों में कोई भी नाबालिग नहीं है। रहा सवाल रिटायर होने पर मिलने वाली ग्रेच्युटी व भविष्य निधि और अन्य राशियों की तो यह सभी उत्तराधिकारियों तीनों भाइयों, माँ और बहिन में बराबर बाँटी जानी चाहिए।

नॉमिनी केवल ट्रस्टी होता है, मृतक की संपत्ति का स्वामी नहीं…

muslim inheritanceसमस्या-

लखनऊ, उत्तर प्रदेश से वीर बहादुर ने पूछा है-

मेरे पिताजी की घर के बाहरी हिस्से में दो दुकाने थी। एक मुझे और एक मेरे बड़े भाई को दी थी। पिताजी को आशंका थी कि हम दोनों अपनी दुकाने किराये पर किसी अन्य व्यक्ति को न दे दें, इस हेतु उन्होने सन् 1986 में हम दोनो भाइयों से अलग अलग 10 रुपये के स्टाम्प पर किरायानामा लिखा लिया जिसमें पिता जी द्वारा लिखाया गया कि हमें पैसे की आवश्यकता है अतः मै 100@- किराये पर दुकान और दो कमरे इनको रहने हेतु दे रहा हूँ, ये अन्य किसी सिकमी किरायेदार को नही रखेंगे, उस एग्रीमेन्ट में कोई समय सीमा भी नही लिखी गयी। जिस व्यक्ति से स्टाम्प पर एग्रीमेन्ट लिखवाया था उसी को गवाह भी बना दिया इस प्रकार एक ही गवाह है एग्रीमेन्ट भी अनरजिस्टर्ड है। उपरोक्त एग्रीमेन्ट के अतिरिक्त दुबारा एग्रीमेन्ट नही कराया गया। 7 नवम्बर 2012 को पिताजी का देहान्त हो गया पिताजी सरकारी कर्मचारी थे ट्रेजरी द्वारा जारी पेन्शन फार्म में उनके द्वारा भरा गया कि (मेरी मृत्यु होने की दशा में पेन्शन सम्बन्धी अवशेष भुगतान ज्योति बहादुर अर्थात छोटे भाई को किया जाय) इस आधार पर छोटे भाई द्वारा पिता जी के बैंक सेविंग एकाउण्ट में पिताजी के जीवनकाल में आये पेंशन धनराशि को भी अपना बता कर नही दिया जा रहा है जबकि बैंक में पिताजी द्वारा किसी को नामित नही किया गया है। साथ ही हम दोनो भाइयों को छोटे भाई द्वारा घर में भी हिस्सा नहीं दिया जा रहा है, कहा जा रहा है कि हम दोनो किरायेदार हैं और वह मालिक है हम 3 भाई एवं 3 बहन हैं पिता द्वारा किसी को वसीयत नही की गयी है। कृपया बतायें क्या हम दोनो भाइयों को बैंक में जमा धनराशि एवं घर में हिस्सा मिल पायेगा?

समाधान-

प दोनों भाइयों के पास जो दुकानें हैं वे आप के कब्जे में हैं उन पर कब्जा बनाए रखें। आप के पिता जी की समस्त चल अचल संपत्ति में आप छहों भाई बहिनों का हिस्सा है। आप के छोटे भाई के कहने से कि वह मालिक है और आप किराएदार हैं कुछ नहीं होता। जो भी पेन्शन आदि राशि आप के पिताजी के बैंक खाते में पहले आ चुकी है वह भी आप सब की है और यदि बाद में कोई राशि मिलने वाली है तो वह भी आप सब की है। किसी भी मामले में नोमिनेशन का अर्थ सिर्फ इतना होता है कि नोमिनी उस धन को प्राप्त कर सकता है। लेकिन नोमिनी उस धन का ट्रस्टी मात्र होता है और उस का दायित्व होता है कि वह उस धन को मृतक के उत्तराधिकारियों में उन के हिस्सों के मुताबिक बाँट दे।

प को चाहिए कि आप उक्त संपत्ति के बँटवारे के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करें साथ में एक अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन भी प्रस्तुत करें कि जो चल-अचल संपत्ति आपके पिता की है उसे खुर्द बुर्द न किया जाए। इस से संपत्ति अपने मूल स्वरूप में बनी रहेगी और दावा डिक्री होने पर प्रत्येक हिस्सेदार को उस का हिस्सा प्राप्त हो जाएगा।

नामिति केवल ट्रस्टी है, उस का कर्तव्य है कि वह प्राप्त राशियों को मृतक के उत्तराधिकारियों को कानून के अनुसार प्रदान करे

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियमसमस्या-

ब्यावरा, जिला राजगढ़, मध्य प्रदेश से रवि सोनी ने पूछा है-

मेरी उम्र २९ वर्ष हे सर मेरे परिवार में कुल 8 सदस्य हैं। मेरे पिता मेरी माता मेरी दो बहिनें जिनका विवाह हो गया है और मेरा छोटा भाई। मेरे चाचा और मेरी चाची के कोई संतान नहीं हुई।  मेरे चाचा श्री श्याम कुमार सोनी का देहांत 19.07.2012 को हो गया। मेरी चाची श्रीमती सुधा सोनी का देहांत उनके पूर्व दिनांक 9.12.2011 को हो गया था। मेरे चाचा का स्वर्गवास हुआ तब वे सिंचाई विभाग में स्थल सहायक के पद पर शासकीय नोकरी में थे। मेरे चाचा ने उनकी सेवा पुस्तिका में उन की मृत्यु के उपरांत मिलने वाले स्वत्वों में मेरी चाची को नामित किया हुआ था और मेरी चाची के बाद उन्होंने अपने दोस्त की बेटी को नामित किया था।  यह  नामितिकरण लगभग 30 वर्ष पुराना है जबकि मेरा भी जन्म नहीं हुआ था।  मेरे जन्म के बाद मेरे चाचा चाची ने मुझे गोद ले लिया परन्तु उसका कोई पंजीयन नहीं कराया। उन्होंने मेरा पुत्र की तरह पालन पोषण किया और मैं ने भी उनकी सेवा पुत्र की तरह की। परन्तु चाची की मृत्यु के बाद चाचा अपनी सेवा पुस्तिका में नामितिकरण में परिवर्तन नहीं करा पाए और हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गयी। चाचा की मृत्यु के बाद जब मैं ने उनके शासकीय क्लेम के लिए सम्बन्धित विभाग में आवेदन दिया तो उन्होंने किसी और का नाम यानि बातुल बानो नामीनेशन में दर्ज होना बतलाया जो कि उनके मित्र अब्बास की बेटी है। उतराधिकार प्रमाण पत्र कोर्ट से लाने को कहा है। मेरे और परिवार के सामने समस्या यह है कि अब मुझे उक्त क्लेम राशि कैसे मिले? क्योंकि अब्बास जो की नामिती के पिता हैं क्लेम की राशि मुझे देने में आधी राशि मांग रहे  हैं। तब जाकर सहमति देने को तैयार हैं नहीं तो पूरी राशि पर अपना दावा कर रहे हैं।  बातुल को ना तो मेरे चाचा ने कोई वैधानिक गोद लिया है न ही हमारा कोई रक्त सम्बन्ध है फिर भी वह इस राशि पर क्लेम कर रहे हैं। मुझे बताएँ कि मैं किस तरह से उक्त क्लेम को प्राप्त कर सकता हूँ और जो बरसों पुराना नामीनेशन है उसे कैसे अवैधानिक घोषित करवा सकता हूँ क्योंकि इस प्रकार के नामितिकरण के बारे में मेरे चाचा ने कभी हमें नहीं बताया।  सिर्फ इतना बताया कि मुझे नामितिकरण में रवि यानि की मेरा नाम दर्ज कराना है। इस बीच ही उनकी मृत्यु हो गयी। मैं ने कोर्ट में धारा 372 भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 में आवेदन प्रस्तुत किया है और बातुल बनो को इसमें पार्टी बनाया है और सम्बंधित कार्यालय को भी पार्टी बनाया है। उन को नोटिस भी तामील हो चुके हैं पर बातुल बानो कोर्ट में उपस्थित नहीं हो रही है। क्या इसका लाभ मुझे मिल सकता है? क्या मेरे प्रकरण का मेरे पक्ष में फैसला हो सकता है? मुझे यह राशि प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए? क्योंकि हमें संदेह है कि यहाँ जो नामितीकरम है वह फर्जी है। किसी ने षडयंत्र के तहत बनाया है। क्या अब इस क्लेम राशी पर कोई अधिकार नहीं बनता जब कि मेरे चाचा की परिवार सूचि में मेरा और मेरे परिवार का नाम सम्मिलित है और उनका अन्तिम संस्कार व समस्त मोक्ष कर्म मेरे द्वारा किया गया है। समाज की पगडी रस्म में भी मुझे उतराधिकारी मानकर मुझे पगड़ी बांधी गयी है। हम सब मेरे चाचा श्री श्याम कुमार सोनी के आश्रित थे। क्या उनके स्वत्वों पर हमारा हक नहीं बनता है? यह भी बताएँ कि क्या मैं अनुकम्पा नियुक्ति के लिए दावा कर सकता हूँ।  कृपया मार्ग दर्शन करने की कृपा करें।

समाधान-

प के चाचा का कोई प्रथम श्रेणी का उत्तराधिकारी नहीं है। उन्हों ने कोई वसीयत की हो ऐसा उल्लेख आप ने नहीं किया है। इस कारण से उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 की अनुसूची के अनुसार प्रथम श्रेणी में तथा दूसरी श्रेणी की उपश्रेणी प्रथम में आप के चाचा का कोई उत्तराधिकारी जीवित नहीं है। अनुसूची की दूसरी श्रेणी की तीसरी उपश्रेणी में चाचा के भाई अर्थात् आप के पिता जीवित हैं। आपने नहीं बताया कि आप की कोई बुआ भी मौजूद है। यदि आप की कोई एक या अधिक बुआएँ मौजूद हैं तो आप के पिता और बुआएँ आप के चाचा की समस्त संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। सभी अधिकार समान है।

प बातुल बानो के नाम के नामितिकरण से बिलकुल भी परेशान नहीं हों। नामितिकरण का केवल इतना अर्थ होता है कि विभाग उस नामिती को उन की बकाया राशियों का भुगतान कर सकता है लेकिन नामिति उन्हें केवल एक ट्रस्टी के बतौर ही स्वीकार कर सकता है उस समस्त राशि को नामिति द्वारा मृतक के उत्तराधिकारियों को उन के अधिकार के बतौर देने का कर्तव्य होता है। नामिति का मृतक की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं होता यदि वह उत्तराधिकारी नहीं है। आप ने बातुल बानो को जो उत्तराधिकार प्रमाण पत्र हेतु आवेदन में पक्षकार बनाया है उस की कोई आवश्यकता नहीं थी। आप चाहें तो अब भी उस कार्यवाही में से उस का नाम हटाए जाने का आवेदन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। आप उस प्रकरण में अपनी गवाहियाँ करवा कर उस का निर्णय कराएँ। लेकिन आप खुद चाचा के उत्तराधिकारी नहीं होने से उत्तराधिकार प्रमाण पत्र आपके पिता के नाम से बनेगा। यदि आप की बुआएँ हैं और वे न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो कर उत्तराधिकार प्रमाण पत्र आप के पिता के नाम करने में सहमति प्रकट करने का बयान नहीं देती हैं तो उन का हिस्सा उन के नाम होगा।

हाँ, यदि आप न्यायालय के समक्ष गवाहियों के माध्यम से यह साबित कर दें कि रीति रिवाज और कानून के अनुसार आप के चाचा ने आप को गोद लिया था और उस का कोई समारोह किया था तो न्यायालय आप को उन का एक मात्र उत्तराधिकारी मान कर उत्तराधिकार प्रमाण पत्र आप के नाम जारी कर देगा।

दि आप यह साबित करने में सक्षम हैं कि आप गोद पुत्र हैं तो आप को तुरन्त ही विभाग में गोद पुत्र और आश्रित की हैसियत से अनुकम्पा नियुक्ति हेतु आवेदन करना चाहिए। यदि आप को विभाग ने गोद पुत्र मान लिया और सात वर्षों में विभाग में आप के लायक कोई रिक्त पद हुआ तो आप को अनुकम्पा नियुक्ति प्राप्त हो सकती है। यदि आप को अक्षम मान कर विभाग आप को अनुकम्पा नियुक्ति देने से इन्कार कर दे तो आप स्वयं को गोदपुत्र घोषित करने और विभाग द्वारा अनुकम्पा नियुक्ति दिए जाने के लिए योग्य घोषित करने के लिए और नियुक्ति देने के लिए व्यादेश जारी करने के लिए दीवानी न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

दि आप को आशंका हो कि विभाग न्यायालय में उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र जारी करने के पहले ही आप के चाचा के लाभों और बकायों की राशियों का भुगतान बातुल बानो को कर सकता है तो आप को सिविल न्यायालय में एक स्थाई व्यादेश हेतु वाद प्रस्तुत करना चाहिए कि आप ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया हुआ है उस के निर्णय तक विभाग के विरुद्ध इस आशय का अस्थाई व्यादेश पारित किया जाए कि विभाग बातुल बानो को किसी लाभ व बकाया की राशि का भुगतान न करे।

चल-अचल संपत्ति के बँटवारे के लिए एक ही दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा।

समस्या-

लखनऊ उत्तर प्रदेश से वंश बहादुर ने पूछा है –

मेरे पिताजी सरकारी कर्मचारी थे। उनका 80 वर्ष की उम्र में नवम्बर 2002  में देहान्त हो गया।  पिताजी ने कोई भी वसीयत नहीं छोड़ी थी। हम 3 भाई 3 बहन हैं और सभी विवाहित हैं। मैं घर के 1/4 हिस्से में निचले भाग में रहता हूँ और मेरा मझला भाई मेरे वाले भाग के ऊपर के भाग में रहता है।  छोटा भाई पिताजी के साथ रहता था।  उनके देहान्त के बाद घर के 3/4 भाग में कब्जा कर के रहने लगा, बँटवारे के लिए राजी नही था है। इस कारण से मैं ने जनवरी 2013 में घर के बँटवारे हेतु सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया। जिसकी अलग अलग माह में तारीखें पड़ चुकी हैं। किन्तु कोर्ट ने अभी तक समन नहीं भेजा है।  9 अप्रैल 2013 को मैं ने समन का शुल्क भी कोर्ट में जमा कर दिया फिर भी कोर्ट से समन नहीं भेजा जा रहा है। अब मुझे प्रतिवादी को समन जारी कराने के लिए क्या करना चाहिए? कितने  समन जारी होने के बाद उसे हाजिर होना पड़ेगा? मेरे पिताजी द्वारा पोस्टआफिस तथा बैंक में मेरे छोटे भाई को नामित किया है उस ने समस्त पैसा आहरित कर लिया है। क्या मुझे और मेरे मझले भाई को इसमें हिस्सा मिल सकता है? पिताजी का घरेलू सामान एवं जेवर आदि छोटे भाई के कब्जे में हैं उन में अपना हिस्सा लेने के लिए हमें क्या करना होगा?

समाधान-

Partition of propertyमुख्य रूप से आप का मामला पिता जी की संपत्ति के बँटवारे का है। पिताजी का मकान, उन के द्वारा बैंक व पोस्ट ऑफिस में छोड़ा गया धन, जेवर और घरेलू सामान सभी आप के पिता जी की चल-अचल संपत्ति का हिस्सा हैं। इन का बँटवारा या तो आपसी सहमति से हो सकता है या फिर बँटवारे का दीवानी वाद प्रस्तुत कर न्यायालय के निर्णय से।

प के पिता जी का जो धन पोस्टऑफिस और बैंक में था उस के लिए उन्हों ने अपना नामिती भले ही आप के छोटे भाई को बना दिया हो। लेकिन वह नामितिकरण केवल उस धन को बैंक से प्राप्त करने के लिए ही था। नामिति की जिम्मेदारी एक ट्रस्टी की तरह होती है। वह जो धन प्राप्त कर लिया गया है उस का ट्रस्टी होता है उसे उस धन को उस के हकदार जो कि आप के पिता जी के उत्तराधिकारी हैं में कानुन के अनुसार बाँट देना चाहिए। इसी तरह पिताजी के घरेलू सामान और जेवर आदि का बँटवारा भी उत्तराधिकार के कानून के अनुसार होना चाहिए।

स बँटवारे के लिए भी वही तरीका है जो आपने मकान के बँटवारे के लिए अपनाया है। अर्थात आप ने जो दीवानी वाद प्रस्तुत किया है उसी में मकान के साथ ही बैंक व पोस्टऑफिस से प्राप्त धन, घरेलू सामान और जेवर आदि का भी विवरण अंकित करते हुए उन सब का बँटवारा करने की प्रार्थना की जानी चाहिए थी। मेरे विचार में यदि आप का वकील समझदार हुआ तो उस ने ऐसा अवश्य किया होगा। यदि ऐसा नहीं किया गया है तो आप को चाहिए कि आप अपने दीवानी वादपत्र में संशोधन करवा कर इस सारी चल संपत्ति को भी उसी में सम्मिलित करवाएँ। आप 3 भाई और 3 बहनें हैं इस प्रकार कुल 6 हिस्से होंगे जिन में एक हिस्से अर्थात पिता जी की कुल संपत्ति का 1/6 हिस्सा आप प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

क बार वाद पंजीकृत हो जाने और वादी द्वारा समन का खर्च दाखिल कर देने के उपरान्त न्यायालय समन स्वयं ही जारी करती है। आप ने खर्च अदा कर दिया है तो समन जारी हो चुका होगा। यदि समन जारी नहीं हुआ है तो आप अगली पेशी पर न्यायालय के न्यायाधीश से निवेदन कर सकते हैं कि समन जारी किया जाए। न्यायाधीश तुरंत समन जारी करने की हिदायत अपने कार्यालय को कर देंगे जिस से समन जारी हो जाएगा। जब तक सभी प्रतिवादियों पर समन की तामील नहीं हो जाती है समन जारी होते रहेंगे। एक बार सभी प्रतिवादियों को समन मिल जाने पर फिर समन जारी करने की जरूरत नहीं है। यदि प्रतिवादी उपस्थित नहीं होंगे तो उन के विरुद्ध एक तरफा कार्यवाही की जा कर मुकदमे की सुनवाई की जाएगी।

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