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एकता, संगठन और संघर्ष ही मजदूर को विजय दिला सकते हैं।

rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-

मानव ने वेलकम-3, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

म 10 सफाई कमॅचारी दैनिक वेतन पर केन्द्र सरकार की संस्था में कार्य कर रहे हैं। हम पहले ठेकेदारी में काम करते थे। हमें संस्था के अधिकारी ने दैनिक वेतन पर संस्था की तरफ रख लिया था। अप्रेल 2012 से सितम्बर 2015 तक 1100 हाजिरी हो गई है। अब हमें ठेकेदारी में काम करने को कहा जा रहा है। टेन्डर भी निकाल दिया है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान

हले आप ठेकेदार के माध्यम से संस्था में काम कर रहे थे। उस के बाद संस्था ने स्वयं आप को नियोजन दे दिया। करीब ढाई वर्ष तक आप लोग संस्था में लगातार काम कर चुके हैं और निरन्तर सेवा में हैं। यदि आप के स्थान पर यह काम ठेकेदार को सौंप दिया जाता है तो निश्चित ही संस्था को आप को छंटनी करना होगा। नोटिस देना होगा या फिर नोटिस वेतन व मुआवजा एक साथ सेवा समाप्ति के साथ देना होगा। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो यह छंटनी होगी।

लेकिन आज कल ऐसा होता है कि काम ठेकेदार को दे दिया जाता है। कर्मचारी वही काम करते रहते हैं। बाद में माह पूरा होने पर ठेकेदार के नाम बिल बना कर उस के नाम से वेतन का भुगतान उठा कर मजदूरों को भुगतान कर दिया जाता है। मजदूरों को पता ही नहीं लगता है कि उन का नियोजक बदल दिया गया है।

स तरह जो काम आप कर रहे हैं वह नियोजक का काम है जिस में उस ने पिछले ढाई वर्ष से आप को नियोजित कर रखा है। संस्था इस काम को ठेकेदार को नहीं दे सकती। ऐसा करना श्रमिकों की सेवा शर्तों में परिवर्तन है। इस से श्रमिक काम तो उसी उद्योग का वही कर रहे होते हैं लेकिन उन का वेतन भुगतान का तरीका और नियोजक दोनों ही बदल जाते हैं। ऐसा करने के लिए संस्थान को एक नोटिस अन्तर्गत धारा 9 औद्योगिक विवाद अधिनियम देना आवश्यक है। यदि ऐसा नोटिस कोई संस्थान/ नियोजक श्रमिकों और श्रम विभाग को देता है तो उस पर औद्योगिक विवाद उठाया जा सकता है।

दि आप की संस्था संविधान के अन्तर्गत राज्य की परिभाषा में आती है तो आप सभी लोग एक रिट याचिका प्रस्तुत कर इस काम को ठेकेदार को देने तथा आप को छंटनी करने या आप की स्टेटस बदलने पर रोक लगवाई जा सकती है। इस के लिए आप को दिल्ली उच्च न्यायालय के किसी वकील से संपर्क करना चाहिए जो कि श्रम संबंधी मामले देखता है।

बेहतर तो यह होगा कि किसी पुरानी ट्रेड युनियन के पदाधिकारियों से आप मिलें और उन्हें अपनी समस्या बताएँ। वे स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कोई अच्छा हल निकालने में आप की मदद कर सकते हैं। इस से भी बेहतर यह है कि आप सब अपने जैसा काम करने वाले उद्योगों की यूनियन में शामिल हो कर इस काम को करें। मजदूर के पास कोई और ताकत नहीं होती। वह लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने में अक्षम होता है उस की एक मात्र ताकत उस का संगठन और बिरादराना मजदूर संगठनों के साथ उस की एकता होती है। आप को उस दिशा में बढ़ना चाहिए। एकता, संगठन और संघर्ष की राह ही उसे विजय दिला सकती है।

ठेकेदार कर्मचारी क्या पार्ट टाइम जॉब कर सकता है?

समस्या-

दिल्ली से राकेश सरकारी कार्यालय में प्राईवेट ठेकेदार द्वारा लगाये कर्मचारियों की समस्‍या के संबंध में पूछते हैं –

ब प्राइवेट ठेकेदार द्वारा नियोजित कर्मचारी किसी सरकारी कार्यालय में काम करता है तो क्या उस पर भी सरकारी नियम लागू होते हैं?  क्यों कि एक प्राईवेट कर्मचारी सरकारी कार्यालय में जॉब करने के बाद पार्ट टाईम्‍ जॉब कर सकता है।  कुछ सरकारी आफिसर कहते हैं कि आप सरकारी कार्यालय में काम करने के साथ-साथ पार्ट टाईम्‍ जॉब नहीं कर सकते।  क्या यह गैर कानूनी है?  आफिस का कार्य समय सुबह 9:30 से शाम 5:00 बजे तक है।  पार्ट टाईम जॉब का समय शाम 7 बजे से 10 रात बजे तक।  मेरी जॉब केवल आफिस के डाटा एन्ट्री कम्प्यूटर आपरेटर की है।  कई बार कार्य समय (9:30 से शाम 5:00 बजे तक) के बाद भी हम से कार्य लिया जाता है उस अवस्था में हम क्या कर सकते है? कृपया बताएँ?   हम मानते हैं कि सरकारी आफिस में कई बार जरूरी कार्य होने पर रुकना चाहिए।  लेकिन जब हम रुकते हैं तो उसकी हाजरी भी कहीं दर्ज होनी चाहिए। ताकि भविष्य में इसके बदले हमें कोई धनराशि मिले।  लेकिन उसमें हमें यह कहकर मजदूरी नहीं दिया जाता क्यों कि हम प्राईवेट कर्मचारी हैं।

 समाधान-

प सरकारी कर्मचारी नहीं हैं।  आप उस ठेकेदार के कर्मचारी हैं जिस ने आप को सरकारी कार्यालय में काम करने के लिए भेजा है, वही आप का वेतन चुकाता है।  आप एक दिन में आठ घंटों से अधिक काम करने के लिए बाध्य नहीं हैं।  यदि आप को किसी दिन आठ घंटे और सप्ताह में 48 घंटों से अधिक काम करने के लिए कहा जाता है तो आप आदेश देने वाले से कह सकते हैं कि आप को लिखित आदेश दिया जाए। जिस से आप के पास यह साक्ष्य रहे कि आप ने आठ घंटे से अधिक काम किया है। किसी सप्ताह में आप के काम के घंटे 48 से अधिक हो जाते हैं तो आप अपने नियोजक ठेकेदार से कह सकते हैं कि अतिरिक्त समय काम करने के लिए आप को ओवरटाइम की दर से जो संस्थान के प्रकार के अनुसार सामान्य वेतन दर से डेढ़ से दो गुना तक हो सकती है। यदि आप का ठेकेदार इस पर भी आप को अतिरिक्त समय का ओवरटाइम की दर से वेतन देने को तैयार न हो तो आप अपने अतिरिक्त वेतन के लिए (यदि आप का वेतन 10000 रुपए प्रतिमाह या उस से कम है तो न्यायालय प्राधिकारी वेतन भुगतान अधिनियम के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

प की सेवा शर्तें आप के नियोजक ठेकेदार और आप के बीच हुई सेवा संविदा से शासित होते हैं। आम तौर पर यह सेवा संविदा नियुक्ति पत्र के रूप में होती है जिस पर नियोजक या उस के किसी अधिकारी के हस्ताक्षर होते हैं और अक्सर नियोजन प्रदान करने के समय इस नियुक्ति पत्र पर कर्मचारी के हस्ताक्षर करवा कर नियोजक वापस ले लेता है। कोई नियोजक उस की एक प्रति कर्मचारी को भी देता है और कई नियोजक ऐसे है जो उस की कोई प्रति कर्मचारी को नहीं देते। यदि इस सेवा संविदा में यह शर्त शामिल हुई कि आप इस नियोजन के अतिरिक्त कोई अन्य नियोजन नहीं करेंगे तो निश्चित रूप से आप के अन्यत्र पार्ट टाइम नियोजन प्राप्त करने के पर प्रतिबंध है। ऐसी अवस्था में आप यदि अन्यत्र पार्ट टाइम कार्य करते हैं तो यह दुराचरण होगा और इस के लिए आप को दुराचरण का आरोप लगा कर सेवा से पृथक किया जा सकता है।

लेकिन यह प्रतिबंध केवल नियोजन के संबंध में है। यदि आप अपनी आमदनी में वृद्धि करने के लिए स्वयं का कोई काम करते हैं तो उस पर प्रतिबंध नहीं होगा। सेवा संविदा में अन्यत्र पार्ट टाइम नियोजन में काम करने पर प्रतिबंध न होने पर आप ठेकेदार की सेवा में रहते हुए पार्ट टाइम नियोजन में काम कर सकते हैं।

निराश न हों, कोशिश में कमी न रखें, बुरे दिन अक्सर अच्छे समय का आरंभ होते हैं।

समस्या-

मैंने 1998 में हिंडाल्को इंडस्ट्रीज लिमिटेड रेणुसागर पावर डिविजन रेणुसागर सोनभद्र में केजुअल वर्कर राइटिंग पेंटर के रूप में कार्य करना शुरू किया।  तीन चार साल तक ईमानदारी से कार्य करने के पश्चात मैंने एक इंजिनियर की मदद से उसी कार्य को कॉंट्रेक्ट पर लेकर करना शुरू कर दिया।  रजिस्ट्रेशन ना होने के कारण सब कोन्ट्रेक्टर के रूप में कार्य करता रहा।  मैं खुद वर्कर भी था और सब कोन्ट्रेक्टर भी था।  उस जमाने में 2000-4000 का वर्क ऑर्डर बनता था और वो 4000 का कार्य पूरा करने में 10000 खर्च हो जाता था।  लेकिन मैं लगा रहा कि आज नहीं तो कल बचेगा।  धीरे धीरे क्वांटिटी बढ़ती रही और बचत भी कुछ होने लगी।   8 साल तक सब कोन्ट्रेक्टर के रूप में कार्य करने के पश्चात मैंने 2010 में रजिस्ट्रेशन कराया और अपनी फर्म (मेसर्स एम. पिंटू एंटरप्राइज़ेज) के नाम से कार्य करने लगा।  अब क्वांटिटी भी बढ़ गयी।  मुझे लगा कि अब मेरी 10 साल की मेहनत रंग लाएगी।   पहले जो फॉरमेन थे वे जानते थे कि मैं ने इस काम में कितनी मेहनत की है और वे को-ऑपरेट भी करते थे।  उनका ट्रांसफर हो जाने के बाद दूसरे फॉरमेन को मेरे कार्य का चार्ज दे दिया गया।  अब जब मुझे लगा कि मैं अब इस कार्य से जीविकोपार्जन कर सकता हूँ तो उस फॉरमेन (अनिल पांडे) ने कांट्रेक्ट सेल के अधिकारियों को मेरे खिलाफ भड़काया और दूसरे ठेकेदार से घूस लेकर उस ठेकेदार के नाम से वर्क ऑर्डर बनवा दिया। मेरा काम बंद कर दिया गया।  अब आप ही बताइये कि मैं 12 सालों से इस कंपनी में लगा रहा।  क्या इसका यही ईनाम है।  चूँकि मेरी जीविका का यही एकमात्र साधन था और अब मेरे पास आत्महत्या के सिवा कोई रास्ता नहीं है। अब आप ही कोई क़ानूनी सलाह दीजिए।

अब्दुल बारी, अनपारा, सोनभद्र, उत्तर प्रदेश

 

समाधान-

प एक ईमानदार फोरमेन की मदद से एक साधारण वर्कर से पहले पेटी कॉन्ट्रेक्टर और फिर पंजीकृत कॉन्ट्रेक्टर बन गए।  यह आप का विकास है।  पहले आप सिर्फ मजदूर थे, फिर मजदूर से एक व्यवसायी का काम करने लगे।  यह दूसरी बात है कि वास्तव में आप पहले मजदूरी कर के जीवनयापन करते थे और अब एक व्यवसायी के रूप में भी स्वयं ही मजदूरी कर रहे हैं। जब व्यक्ति मजदूरी करता है तो काम की पूरी मजदूरी उसे ही मिलती है।  लेकिन एक व्यवसायी स्वयं मजदूरी नहीं करता।  वह एक दर पर काम लेता है और उस काम को उस दर से काफी कम मजदूरी पर दूसरे मजदूरों से कराता है। वास्तव में एक ठेकेदार जितनी कम मजदूरी वर्कर को देता है उतना ही लाभ कमाता है। आप स्वयं ही काम करते रहे और पूरी मजदूरी लेते रहे आप को चाहिए था कि आप भी काम ले कर कम मजदूरी पर दूसरे मजदूर लगाते और अपना लाभ कमाते। तब आप में भी प्रवृत्ति विकसित होती कि ठेके पर अधिक से अधिक काम लिया जाए और अधिक से अधिक लाभ कमाया जाए।  तब आप उस एक कारखाने के साथ साथ अन्य उद्योगों में भी ठेके लेने लगते और तब एक स्थान पर ठेका समाप्त हो जाने पर आप को फर्क तो पड़ता लेकिन इतना नहीं पड़ता कि आप आत्महत्या करने की सोचने लगते। आप की काम तलाशने की आदत पड़ती तो आप एक ठेका समाप्त होने पर दूसरा ठेका जल्दी ही पा लेते और फिर आप को कोई हानि नहीं होती। व्यवसायी कभी भी हानि से घबराता नहीं है वह अन्यत्र व्यवसाय तलाश लेता है। लेकिन आप केवल मजदूरी करते रहे।  व्यवसाय की ओर आप ने कदम ही नहीं बढ़ाया।

प ने एक ठेकेदार के रूप में काम किया है। ठेका हमेशा निर्धारित अवधि के लिए होता है और वह अवधि समाप्त हो जाने पर ठेका समाप्त हो जाता है। कोई भी कंपनी किसी ठेकेदार से बंधी नहीं है। इस कारण आप के पास आप की समस्या का कोई कानूनी उपाय नहीं है।  लेकिन वास्तव में ऐसा नुकसान और दुर्दिन अक्सर ही आने वाले अच्छे समय का आरंभ होते हैं।  इन्हें आप को अच्छे दिनों के आरंभ के रूप में ही देखना चाहिए और निराशा व आत्महत्या जैसे घृणित सोच को त्याग देना चाहिए। यह जीवन एक ही बार मिलता है, बार बार नहीं।  आप के मजहब के मुताबिक भी आत्महत्या एक जघन्य कृत्य है। इस विचार को बिलकुल त्याग दें।  प्रकृति ने आप को जीवन को नए सिरे से सँवारने का अवसर प्रदान किया है उस अवसर के बारे में सोचना चाहिए।

ब मौजूदा काम तो समाप्त हो गया है।  आप को सोचना चाहिए कि यह आप के अच्छे के लिए हुआ है।  इस तरह आप एक कंपनी से छुटकारा पा चुके हैं।  आप एक अच्छे कामगार हैं, आप को इतने वर्षों से काम करने के कारण हर तरह के काम का बड़ा अनुभव हो चुका है। आप यदि काम तलाशेंगे तो आप को जल्दी ही काम मिल जाएगा। आप को अन्यत्र काम तलाशना चाहिए।  यदि आप को ठेके पर काम न मिले तो इसी काम को करने वाले किसी बड़े ठेकेदार के यहाँ चाहे कम दर पर ही सही काम ले लेना चाहिए। इस से आप को कुछ तो आमदनी होगी।  इस के साथ आप को अवसर की तलाश में रहना चाहिए कि आप को ठेके पर कहीँ और काम मिल जाए।  आप को यह विचार भी त्याग देना चाहिए कि आप उसी स्थान पर उसी नगर में काम तलाशें और आप को मिल जाए।  यदि काम किसी और नगर में या औद्योगिक क्षेत्र में मिले तो भी आप को तलाश कर पकड़ लेना चाहिए।  आजकल आप के काम की बहुत मांग है। यदि आप कोशिश करेंगे तो आप को जल्दी ही अच्छा काम मिल जाएगा और आप पहले अधिक और कई गुना कमाने लगेंगे।  आप गंभीरता से विचार करेंगे तो मेरी सलाह को सही पाएंगे।  आप कोशिश करेंगे तो आप जीवन पहले से अधिक बेहतर हो जाएगा। आप को अवसर मिला है उसे हाथ से न जाने दें।

वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर मानव शोषण को अनुमति नहीं दी जा सकती : सर्वोच्च न्यायालय

ठेकेदार श्रमिक उन्मूलन अधिनियम 1970 के नाम से ऐसा प्रतीत होता है, जैसे इस कानून का निर्माण उद्योगों में ठेकेदार श्रमिकों को नियोजित करने की प्रथा का उन्मूलन करने के लिए हुआ है। यह सही है कि इस का उपयोग इस काम के लिए किया जा सकता है। लेकिन उस के लिए प्रक्रिया इतनी दुष्कर बना दी गई है और निर्णय करने का अधिकार केन्द्र/राज्य सरकारों को प्रदान किया गया है कि इस प्रथा का उन्मूलन किया जाना असंभव जैसा हो चुका है। सब से पहले तो कोई इस के लिए तथ्य एकत्र करे, फिर राज्य सरकार के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करे। फिर राज्य सरकार इस प्रश्न पर आवेदनकर्ता और उद्योग के स्वामियों/प्रबंधकों की सुनवाई करे। आवेदक का उद्योग के श्रमिकों का उचित प्रतिनिधि होना भी आवश्यक है। कानून बना कर ठेकेदार श्रमिक प्रथा का उन्मूलन करने की शक्तियाँ सरकार को प्रदान कर देने के कारण न्यायालय भी इस मामले में सुनवाई नहीं कर सकते क्यों कि उन्हें इस का क्षेत्राधिकार ही नहीं है।
स कानून का उपयोग नियोजकों द्वारा श्रमिकों के विरुद्ध किया जा रहा है। नियोजक अपनी प्रत्येक स्थाई और नियमित प्रकृति की आवश्यकताओं के लिए श्रमिकों को नियोजित करते हैं, उन का चयन स्वयं करते हैं, उन्हें वेतन भी नियोजक का कार्यालय ही देता है और उन के कार्यों पर नियंत्रण भी नियोजक का ही होता है। लेकिन कागजों में उन्हें ठेकेदार का कर्मचारी बताया जाता है। ऐसे श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी तक प्राप्त नहीं होती, यदि वे कानूनी अधिकारों और सुविधाओं की मांग करते हैं तो नियोजक तुरंत कहते हैं कि श्रमिक उन के कर्मचारी न हो कर ठेकेदार के कर्मचारी हैं। विवाद बढ़ता दिखाई देता है तो ठेकेदार का ठेका समाप्त कर दिया जाता है और उस के साथ ही इन श्रमिकों का नियोजन समाप्त हो जाता है।
क सितंबर 2011 को सर्वोच्च न्यायालय ने भीलवाड़ा दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति बनाम विनोद कुमार शर्मा के मामले में निर्णय पारित करते हुए कहा है कि न्यायालय कानून के इस तरह के दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं कर सकता वैश्वीकरण और उदारीकरण के नाम पर मानव शोषण को अनुमति नहीं दी जा सकती। इस मामले में नियोजक द्वारा ठेकेदार के कर्मचारी घोषित किए गए श्रमिकों को मूल उद्योग के कर्मचारी घोषित करते हुए उन्हें मूल उद्योग में मिलने वाली सुविधाएँ दिलाने के श्रम न्यायालय के निर्णय को उचित ठहराया गया है।

ठेकेदार का कर्मचारी कानून के माध्यम से कंपनी का स्थाई कर्मचारी नहीं हो सकता

 देवेन्द्र कर्मा पूछते हैं –

मैं दस वर्षों से कॉन्ट्रेक्टर के द्वारा कंपनी में नौकरी कर रहा हूँ, परन्तु अभी तक स्थाई नहीं किया गया है। क्या मैं कानून की मदद से अपनी नौकरी स्थाई करवा सकता हूँ? कृपया मेरी मदद कीजिए।

 उत्तर – 

देवेन्द्र जी,

र कंपनी यह चाहती है कि उस के उद्योग के लिए जितने कर्मचारियों को नियोजित किया जाना है उन में से अधिक से अधिक कर्मचारी ठेकेदारों के माध्यम से नियोजित किए जाएँ। इस तरह से वे कर्मचारियों के प्रति बहुत सी कानूनी जिम्मेदारियों से बच जाते हैं। उन के लिए यह आर्थिक रूप से भी बहुत लाभकारी होता है। क्यों कि ठेकेदार के कर्मचारियों को बहुत कम वेतन पर काम पर रखा जा सकता है। यदि ठेकेदार के कर्मचारी अपनी सेवा शर्तों में सुधार और वेतन वृद्धि के लिए कोई मांग रखें तो उस से आसानी से इन्कार किया जा सकता है। उन्हें कर्मचारियों को नौकरी से हटाने की भी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। वे ठेकेदार का ठेका समाप्त कर देते हैं। उसी ठेकेदार को किसी अन्य नाम से नया ठेका आवंटित कर नए लोगों को नौकरी दे देते हैं। इस तरह कंपनियों ने श्रमिकों को संगठित हो कर अपनी सेवाशर्तों के लिए सौदेबाजी करने का जो अधिकार कानून से प्राप्त हुआ है उस का तोड़ निकाल लिया है।
ठेकेदार कंपनी का कर्मचारी न हो कर ठेकेदार का कर्मचारी होता है। इस कारण से वह कंपनी के विरुद्ध किसी तरह की कोई कार्यवाही नहीं कर सकता है। वह कंपनी में स्थाई होने की मांग भी नहीं कर सकता है। कानून में भी ऐसा कोई मार्ग नहीं है कि कोई ठेकेदार का कर्मचारी अदालत के माध्यम से कंपनी में स्थाई होने के लिए कोई मांग कर सके और उसे मनवा सके। 
वैसे भारत में एक कानून बना हुआ है, जिस का नाम ठेकेदार श्रमिक (उन्मूलन) अधिनियम 1970 है। इस के अंतर्गत यह प्रावधान बना हुआ है कि यदि उचित सरकार चाहे तो वह किसी भी उद्योग के किसी भी प्रोसेस में ठेकेदार द्वारा श्रमिक नियोजित किए जाने को प्रतिबंधित कर सकती है। लेकिन सरकार को इस में कोई रुचि नहीं है, स्वयं सरकारी संस्थान इन दिनों सारे काम ठेकेदार श्रमिकों से करवाने लगे हैं। ट्रेड यूनियन आंदोलन इतना बिखरा हुआ है कि इस ओर कोई ध्यान ही नहीं देता कि उद्योगों में ठेकेदार द्वारा श्रमिकों को नियोजित करने पर पाबंदी लगाने के लिए सरकार के समक्ष कार्यवाही करे। इस का नतीजा यह है कि अधिकांश उद्योगों में सभी प्रकार के कामों के लिए ठेकेदार के श्रमिक नियोजित किये जा सकते हैं। इस कानून का उपयोग श्रमिकों के लाभ के लिए होने के स्थान पर शतप्रतिशत श्रमिकों के विरुद्ध होता है।
कुछ वर्ष पूर्व सर्वोच्च न्यायालय ने एक निर्णय अवश्य यह दिया है कि फैक्ट्री के केंटीन में काम करने वाले कर्मचारियों को चाहे वे ठेकेदार द्वारा नियोजित किए गए हों कंपनी का ही कर्मचारी माना जाएगा। क्यों कि किसी भी फैक्ट्री में केंटीन चलाना फेक्ट्री के मालिक का कानूनी दायित्व है। इस निर्णय के उपरांत जिन केंटीन कर्मचारियों ने कानून के अंतर्गत आवश्यक कार्यवाही की उन्हें कंपनी के कर्मचारी मान लिया गया है।&n
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कुछ ऐसे मामलों में जिन में कंपनी ने कुछ ऐसे कर्मचारियों को नियोजित किया है जिन का सुपरविजन सीधे कंपनी के हाथों में है, जो अपने द्वारा किए गए कार्यों के लिए कंपनी के प्रति जिम्मेदार हैं और सीधे कंपनी को रिपोर्ट करते हैं, जिन के काम की सूची कंपनी बनाती है। जो प्रकृति से कंपनी के ही कर्मचारी हैं और ठेकेदार केवल नाम का व छाया मात्र है। न्यायालयों ने यह माना है कि वे कंपनी के ही कर्मचारी हैं और उन्हें कंपनी के कर्मचारी का अधिकार दिलाया है। 
स के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है जिस से एक ठेकेदार का कर्मचारी कंपनी में स्थाई हो सके। यदि आप समझते हैं आप इन में से किसी श्रेणी के कर्मचारी हैं तो आप अपने नजदीक के किसी ऐसे वकील से मिलें जो लंबे समय से श्रम कानून की प्रेक्टिस कर रहा है। वह आप की पूरी बात जान कर आप को बता सकता है कि आप को कानूनी मदद मिल सकती है अथवा नहीं। वैसे सामान्य उत्तर यह है कि ठेकेदार का कर्मचारी सदैव ही ठेकेदार का कर्मचारी ही रहेगा, कंपनी का कर्मचारी नहीं हो सकता। यह दूसरी बात है कि कंपनी को नए कर्मचारियों की भर्ती करनी हो और वह ठेकेदार के कर्मचारियों में से कुछ लोगों की भरती कर ले। लेकिन तब कंपनी में उस की नौकरी एकदम नई होगी और उसे ठेकेदार की नौकरी छोड़नी पड़ेगी, वह ठेकेदार के यहाँ लंबे सेवा काल के लाभों से वंचित हो जाएगा।

ठेकेदार श्रमिकों के लिए न्याय की कोई कानूनी व्यवस्था नहीं

बालकिशन पूछते हैं–

मैं एक कंपनी में 6 साल से कार्यकर रहा हूँ, मेरा केवल ठेकदार बदला जाता है और कार्मिकों को नहीं बदला जाता है।  जब संविदा समाप्‍त होता है तब हम ठेकेदार से बोलते है तो वह कहता है कि आप मेरे कार्मिक नहीं हैं मैने तो कंपनी के संविदा एवं कंपनी के कहने पर रखा क्‍या हम कंपनी पर कोई केस कर सकते हैं?
 
 उत्तर–
 
भारत में 1970 में ठेकेदार श्रमिक (नियमितिकरण और उन्मूलन) अधिनियम 1970 पारित किया गया था। जिस का उद्देश्य उद्योंगों में ठेकेदार श्रमिकों का नियमितिकरण करना और आवश्यक होने पर उस का उन्मूलन करना था। लेकिन यह अधिनियम अपने उद्देश्यों के सर्वथा विपरीत सिद्ध हुआ। इस में प्रावधान है कि कोई भी उद्योग प्रतिबंधित श्रेणी के अतिरिक्त अन्य सभी स्थानों पर ठेकेदार श्रमिक नियोजित कर सकेगा। प्रतिबंध लगाने का काम केन्द्र और राज्यों की सरकारों के जिम्मे छोड़ दिया गया। केंद्र ने कुछ नियोजनों में ठेकेदार श्रमिकों के नियोजन को प्रतिबंधित किया। लेकिन राज्यों ने इस में कोई रुचि नहीं दिखाई। आज स्थिति यह है कि कोई भी उद्योग कितने ही ठेकेदार श्रमिक नियोजित कर सकता है। हालत यह है कि पूरे के पूरे कारखाने ठेकेदार श्रमिकों से चलाए जा रहे हैं। न कोई देखने वाला है न कोई पूछने वाला है।
किसी भी उद्योग के किन्हीं नियोजनों में ठेकेदार श्रमिकों के नियोजन के उन्मूलन के लिए कार्यवाही तभी संभव है जब कि उस उद्योग के श्रमिक किसी यूनियन में संगठित हों और वह यूनियन राज्य सरकार के समक्ष इस तरह की मांग करे। राज्य सरकार उस मांग पर विचार कर के ठेका श्रमिकों के नियोजन को प्रतिबंधित कर सकती है। यह प्रक्रिया ऐसी है कि मजदूरों की मांग पर कभी भी किसी उद्योग में ऐसा प्रतिबंध लगाया ही नहीं जा सकता। 
प के मामले में स्थिति यह है कि आप यदि अपने नियोजन के मामले में ठेकेदार श्रमिक उन्मूलन के लिए किसी यूनियन के माध्यम से उपयुक्त सरकार को आवेदन करें तो भी दो-तीन वर्ष इस कार्यवाही में लग जाएंगे और फिर भी आवश्यक नहीं है कि राज्य सरकार ठेका श्रमिक नियोजन का उन्मूलन कर ही दे। यदि ऐसा हो भी जाए तो वर्तमान में ठेकेदार के माध्यम से काम कर रहे श्रमिकों को ही कंपनी के नियोजन में लिया जाएगा यह बाध्यकारी नहीं है। कंपनी अपने हिसाब से नए श्रमिकों का नियोजन कर लेगी और आप को नौकरी से निकालने की जरूरत भी नहीं। ठेकेदार के साथ ही आप का उन्मूलन भी हो जाएगा।
दि आप के पास ऐसे सबूत और गवाहियाँ हों जिन से आप लोग यह साबित कर सकते हों कि वास्तव में आप का नियोजन कंपनी द्वारा किया गया है और ठेकेदार की उपस्थिति केवल आड़ लेने के लिए की गई है तो आप इस मामले में अपनी ट्रेडयूनियन के माध्यम से औद्योगिक विवाद उठा सकते हैं। लेकिन देश भर में औद्योगिक न्यायाधिकरणों और श्रम न्यायालयों की हालत यह है कि इस विवाद को निपटने में इतना समय लग जाएगा कि आप के लिए यह विवाद उठाना निरर्थक हो जाएगा। 

ज ठेकेदार श्रमिकों के लिए देश में न्याय का कोई वास्तविक अवसर उपलब्ध नहीं है। ठेकेदार श्रमिकों  को न्याय केवल ठेकेदार श्रमिक (नियमितिकरण और उन्मूलन) अधिनियम 1970 को हटा कर उस के स्थान पर एक नया कानून बनने पर ही प्राप्त हो सकता है जिस में प्रावधान हो कि कोई भी उद्योग केवल उन्हीं नियोजनों में ठेकेदार श्रमिक नियोजित कर सकता है जिन के लिए उस ने सरकार से ऐसी अनुमति प्राप्त कर ली हो। लेकिन इस तरह का कानून बनाए जाने की मांग न तो किसी श्रम संगठन ने अभी तक उठाई है और न ही किसी राजनैतिक दल का इस ओर ध्यान है। उन राजनैतिक दलों का भी नहीं जो घोषित रूप से स्वयं को श्रमिक वर्ग का दल कहते हैं।

ठेकेदार श्रमिक कभी मूल नियोजक का स्थाई या नियमित कर्मचारी नहीं हो सकता।

श्री बाबूलाल काँकरेलिया का प्रश्न है….
मैं दिनांक 20.12.2005 से केन्द्रीय सरकार के कार्यालय में मैं एक ऐजेंसी के माध्यम से डाटा कंप्यूटर ऑपरेटर के पद पर काम कर रहा हूँ। ऐजेंसी के बिल के साथ कार्यालय नोट शीट पर भेजा गया है और ऐजेंसी के लेटरहेड पर मेरी उपस्थिति को सहायक निदेशक तक प्रत्येक माह सत्यापित कर हस्ताक्षर कर दिया गया है। यह क्रम दिनांक 20.08.2007 तक चला है। क्या मैं सरकारी कर्मचारी बन सकता हूँ? मेरा उचित मार्गदर्शन करें।
उत्तर 

बाबू लाल जी !
आप ने अपनी जो वर्तमान स्थिति बताई है, वह ठेकेदार द्वारा उपलब्ध कराए गए कर्मचारी की है। आप सरकारी संस्थान के नहीं, अपितु उस ठेकेदार ऐजेंसी के कर्मचारी हैं, जिस ने आप को सरकारी संस्थान को उपलब्ध कराया है, और जो आप को वेतन देती है। सरकारी संस्थान के अधिकारियों द्वारा इसी कारण से आप की उपस्थिति प्रमाणित कर के आप की नियोक्ता ऐजेंसी को भेजी जाती है और वहाँ से आप की उपस्थिति के आधार पर आप को वेतन प्राप्त होता है।
पहले यह काम केवल बड़े निजि संस्थान किया करते थे। किसी भी संस्थान द्वारा नया कर्मचारी रखने पर वह अन्य कर्मचारियों के बराबर वेतन की मांग करने लगता है, कर्मचारी संगठन भी उस के साथ खड़े होते हैं, और यह कानून की भी मांग है कि किसी भी संस्थान में एक जैसा काम करने वाले कर्मचारियों को भिन्न वेतन नहीं दिया जा सकता। हाँ, वरिष्ठता के आधार पर कुछ कम-अधिक हो सकता है।  लेकिन निजि संस्थान नए कर्मचारी न्यूनतम वेतन पर श्रमिकों से काम लेना चाहते हैं।  इस के लिए उन्होंने ऐजेन्सियों जिन्हें ठेकेदार (contractor) भी कहा जाता है, के माध्यम से कर्मचारियों से काम लेना आरंभ कर दिया। अब वही काम जो मूल नियोजक के कर्मचारी करते थे, ठेकेदार के कर्मचारी करने लगे। धीरे-धीरे यह भी होने लगा कि बहुत से संस्थानों में प्रबंधन के अतिरिक्त सारा काम ठेकेदार कर्मचारियों के माध्यम से लिया जाने लगा।  इस का नियोजकों को लाभ यह था कि जब भी ठेकेदार के कर्मचारी वेतन बढ़ाने या नियमित करने की मांग करें। ठेकेदार का ठेका ही निरस्त कर दिया जाए। उसी ठेकेदार को नए नाम से या किसी अन्य ठेकेदार को नया  ठेका दे दिया जाए।  इस से सारे कर्मचारी एक साथ नौकरी से निकाले जा सकते थे। 
इस प्रथा ने मानव श्रम के असीम शोषण का मार्ग प्रशस्त कर दिया।  ठेकेदार मजदूरों और उन की यूनियनों ने अदालतों के समक्ष  उन्हें मूल उद्यम का कर्मचारी माने जाने और उन के समान वेतन व अन्य लाभ देने की राहत मांगी तो अदालतों ने इस आधार पर कि वास्तव में ये कर्मचारी मूल संस्थान के ही हैं और ठेका एक छद्म व्यवस्था है कर्मचारियों  के पक्ष में निर्णय देने आरंभ किए। इस प्रथा को समाप्त किए जाने के लिए श्रम संगठनों ने  भी आंदोलन करने आरंभ किए और सरकार पर दबाव बनाया तो संसद  द्वारा ठेका श्रमिक (नियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम-1970 The Contract Labour (Regulation & Abolition) Act, 1970  पारित किया गया।  इस अधिनियम में यह व्यवस्था है कि उपयुक्त
सरकार किसी भी संस्थान में कुछ कार्यों के लिए ठेका श्रमिक नियोजित करने पर प्रतिबंध लगा सकती है और कुछ को ठेका श्रमिकों के लिए खुला छोड़ सकती है। कानून बनने के बाद सरकारों ने अनेक कार्यों में ठेका श्रमिकों का नियोजन प्रतिबंधित भी किया।
लेकिन सरकार के पास कुंजी होने का परिणाम यह हुआ कि धीरे-धीरे ठेका श्रमिक उन्मूलन का काम नगण्य हो गया है। उक्त कानून ठेका श्रमिक उन्मूलन के स्थान पर ठेका श्रमिक पद्धति को मजबूत करने वाला सिद्ध हुआ।  1975 से 1985 तक के दशक में जिन पहले सरकारे अपने यहाँ आकस्मिक कामों पर दैनिक वेतन भोगी  कर्मचारी  नियोजित करती थी। लेकिन विकास कार्यों की गति के चलते वे दो वर्ष या उस से भी अधिक समय तक लगातार काम करते रहते थे। बाद में उन्हें नोकरी से बर्खास्त किया जाता तो वे औद्योगिक विवाद अधिनियम का सहारा लेकर अदालती निर्णय से वापस नौकरी पर आ जाते थे और उन्हें नियमित करना पड़ता था।  इस का इलाज सरकारों ने निजि मालिकों से सीखा। अब सरकारें भी ठेका श्रमिक रखने लगीं। यह सरकारी मशीनरी के भी हित में था। अब कर्मचारी सप्लाई करने के ठेके देने के लिए सरकारी अफसर अच्छी खासी रिश्वत ले सकते थे। यह सरकारों के भी हित में था कि इस तरह वे अनेक योजनाओँ का खर्च कम रख सकती थीं। आज स्थिति यह है कि जितनी भी नई सरकारी योजनाएँ हैं उन में ठेकेदार द्वारा उपलब्ध कराए गए कर्मचारियों से ही काम चलाया जा रहा है।  सिद्धांततः इन नियोजनों में ठेकेदार कर्मचारियों को नियोजन देना गलत है, लेकिन यह भी सरकार को ही तय करना है कि इन नियोजनों में ठेकेदार श्रमिकों का नियोजन वर्जित किया जाए अथवा नहीं, तो वह क्यों यह काम करे?
तीसरा खंबा के पिछले आलेख सरकारी नौकरी में नियमानुसार नियुक्त व्यक्ति ही नियमित हो सकता है, आकस्मिक या संविदा कर्मचारी नहीं में बताया था कि सरकारी नौकरी में नियुक्ति के लिए हमेशा कानून  और नियम बने होते हैं और उन नियम कानूनों के अनुसार ही कोई व्यक्ति सरकारी नौकरी में प्रवेश पा सकता है, अन्यथा नहीं। इस तरह यह लगभग नामुमकिन ही है कि कोई आकस्मिक या संविदा कर्मचारी किसी सरकारी उद्यम में काम पा ले और फिर तमाम कायदे-कानूनों को ताक पर रख कर वहाँ स्थाई और नियमित नौकरी प्राप्त कर ले।  आकस्मिक और संविदा कर्मचारी का नियोजक तो सरकार या उस का कोई विभाग अथवा संस्थान होता है। ठेकेदार द्वारा उपलब्ध कराए गए कर्मचारी का तो सरकार से कोई संबंध ही नहीं है। ऐसी अवस्था में यह बिलकुल नामुमकिन है कि किसी ठेकेदार कर्मचारी को सरकारी संस्थान में नियमित नौकरी प्राप्त हो जाए।  अच्छे कर्मचारी अपने यहाँ बनाए रखने के लिए सरकारी अफसर यह हवा बनाते रहते हैं कि इस तरह दो-चार साल काम कर लेने पर उन्हें सरकारी नौकरी में नियमित कर दिया जाएगा। इस लालच के भरोसे वे कर्मचारियों से सरकारी कामों के अलावा निजि सेवाएँ भी खूब प्राप्त करते हैं।
बाबूलाल  जी !  यदि आप योग्य हैं और प्रतियोगिता में टिके रह सकते हैं तो आप को लगातार स्थाई नौकरी के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए और अवसर मिलते ही वर्तमान नियोजन त्याग कर उसे पकड़ लेना चाहिए।
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