Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अनुबंध अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

बिना न्यायालय की डिक्री के हिन्दू विवाह विच्छेद संभव नहीं है।

समस्या-

प्रियंका जैन ने उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी नवंबर 2016 में हुई थी शादी के कुछ दिनों बाद ही मुझे ससुराल में मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताण्डित किया जाने लगा। एक दो महीने तक तो बर्दाश्त किया लेकिन फिर मैं ने अपने माता पिता को यह बात बताई और शादी के 5 महीने बाद अलग हो जाने का निर्णय लिया। आपसी रज़ामंदी एवं सामाजिक स्तर पर स्टाम्प वगैरह लिखवाकर हम अलग हो गए। न्यायालय का इस में कोई योगदान नहीं था। अब घरवाले मेरे लिए लड़का ढूंढ रहे हैं, मुझे इस बात का डर है कि मेरा तलाक वैध है या नहीं? कहीं इस तरह शादी कर के मैं अपने होने वाले पति की मुसीबत तो नही बढ़ा रही हूँ?  डिक्री क्या है? इसका होना आवश्यक है क्या? कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प जैन हैं और आप पर हिन्दू विवाह विधि प्रभावी है। हिन्दू विवाह विधि में कोई भी विवाह विच्छेद बिना न्यायालय के निर्णय और डिक्री के संभव नहीं है। आपसी समझौते से आप लोग अलग हो गए हैं लेकिन वैवाहिक संबंध वैध रूप से समाप्त नहीं हुआ है। अभी भी कानूनी रूप से आप के पूर्व पति ही आप के पति हैं और आप उन की पत्नी हैं। यदि आप विवाह विच्छेद के न्यायालय के निर्णय व डिक्री के बिना विवाह करती हैं तो वह पूरी तरह अवैध होगा। क्यों कि इस के बाद आप के नए पति से यौन संबंध स्थापित होंगे जो आप के पूर्व पति की सहमति के बिना होंगे तो आप के नए पति भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अंतर्गत दोषी माने जाएंगे। इस कारण आप के लिए यह आवश्यक है कि आप न्यायालय से विवाह विच्छेद का निर्णय व डिक्री प्राप्त करें।

न्यायालय का निर्णय कई पृष्ठ का होता है। उस में विस्तार से दोनों पक्षों के अभिकथन, साक्ष्य व उन की विवेचना के साथ निर्णय अंकित होता है। जब कि डिक्री किसी भी दीवानी (सिविल) मामले में हुए निर्णय की प्ररूपिक अभिव्यक्ति है जिस में वाद के पक्षकारों के अधिकारों को प्रकटीकरण होता है। किसी विवाह विच्छेद के मामले में डिक्री दो पृष्ठ की होगी जिस में पक्षकारों का नाम पता लिखा होगा तथा यह लिखा होगा कि इन दोनों के बीच विवाह विच्छेद हो चुका है। कहीं भी आप को बताना हो कि आप का विवाह समाप्त हो गया है तो दो पृष्ठ की इस डिक्री की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करना पर्याप्त होगा।

किसी भी मामले में सामान्य रूप से विवाह के एक वर्ष तक विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। इस कारण आप के मामले में भी नवंबर 2017 में पूरा एक वर्ष व्यतीत हो जाने तक यह आवेदन प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यदि दोनो पक्ष सहमत हों तो जिस समय आप के विवाह को एक वर्ष पूर्ण हो आप और आपके पति मिल कर सहमति से विवाह विच्छेद के लिए न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करें। आवेदन प्रस्तुत करने के छह माह बाद न्यायालय से विवाह विच्छेद का निर्णय व डिक्री मिल जाएगी। यदि दोनो पक्ष सहमति से तलाक के लिए अर्जी प्रस्तुत नहीं करते तो फिर आप को अकेले किसी आधार पर संभवतः क्रूरता के आधार पर विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना होगा। उस में विवाह विच्छेद में समय लग सकता है।

हिन्दू विवाह विच्छेद केवल न्यायालय की डिक्री से ही संभव है।

hindu-marriage-actसमस्या-

सतवन्त जी ने आर्यपुरा सब्जीमंडी, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मैं जम्मू की रहने वाली हूँ, मेरी शादी 1993 मे दिल्ली निवासी से हुई थी। शादी जम्मू में हुई थी, उनके रिश्तेदार भी वहीं रहते हैं। शादी के बाद वो मुझे दिल्ली ले आए। शुरू से ही मुझे परेशान रखा। मारना, पीटना, डिमांड करते। माँ-बाप ग़रीब थे, सहती रही। साल गुज़रे, दो बेटे हो हुए। जिंदगी यूँ ही चलती रही, खुशी नहीं मिली। 1998 में मुझे टीबी की बीमारी हो गयी तो मेरे पति ने मुझे जम्मू भेज दिया। मैं एक बेटे के साथ जम्मू अपने माँ बाप के पास रहने लगी। पति ने कभी मेरी ना अपने बच्चे की खबर ली, ना कभी पैसे भेजे। जम्मू में मेरा इलाज चला, 2 साल में ठीक हुई। फिर मेरी माँ ने जम्मू कोर्ट में तलाक़ का केस फाइल कर दिया। काफ़ी नोटिस भेजे लेकिन पति नहीं आया। ना ही मैं जाना चाहती थी, पति के पास। फरवरी 2003 में जम्मू कोर्ट में वकील ने आपसी सहमति के पेपर तैयार करवाए और पति के रिश्तेदार और हमारे रिश्तेदारो ने आपसी समझौते के तहत हमारे डाइवोर्स पेपर पर साइन करवा दिए, दो गवाहों के भी इस शर्त पर कि बेटे को पति अपने साथ ले जाएगा। उस वक़्त यही तय हुआ था कि अब हमारी जिंदगी अलग हो गयी है। मैं ओर पति कहीं भी दूसरी शादी कर सकते हैं। वो दिन था और आज का दिन है, ना तो अपने बच्चों की ओर ना पति की तरफ देखा। 2004 में मैं ने दूसरा विवाह कर लिया दिल्ली में। इन शादी से मेरे दो बच्चे भी हैं। अब 11 साल बाद अक्टूबर 2014 में पता नहीं कहाँ से पहला पति आ गया। परेशान करने कि मुझे अब दोबारा तलाक़ और डिग्री चाहिए। मैं पुलिस के पास गयी। तो पुलिस ने कहा कि आपके दूसरे पति पर कार्यवाही हो सकती है। ये 11 साल पुराने रज़ामंदी के कागज अवैध हैं। अब मुझे क्या करना चाहिए मैं बहुत परेशान और दुखी हूँ।

समाधान-

पूर्व में जो सहमति से विवाह विच्छेद की प्रक्रिया हुई थी वह सही नहीं है। हिन्दू विवाह में 1955 से पहले तलाक जैसी कोई चीज नहीं थी। कानून से विवाह विच्छेद की प्रक्रिया आई। कानून कहता है कि हिन्दू विवाह का विच्छेद केवल और केवल मात्र न्यायालय की डिक्री के माध्यम से ही हो सकता है। इस कारण पहले वाला विवाह विच्छेद कानून की निगाह में विवाह विच्छेद नहीं था। आप के और आप के पूर्व के पति के बीच कानूनी निगाह में विवाह अभी तक भी बना हुआ है। कानून की निगाह में आप अभी भी पूर्व पति की पत्नी हैं। आप ने जो दूसरा विवाह किया है वह कानून की निगाह में अवैध है क्यों कि कोई भी विवाहित पति या पत्नी अपने पति या पत्नी के जीवित रहते हुए उस से विवाह विच्छेद हुए बिना दूसरा विवाह नहीं कर सकता।

भी भी आप अपने पूर्व पति की कानूनन पत्नी हैं, इस कारण से यदि कोई व्यक्ति आप के साथ आप के पूर्व पति की सहमति या मौन सहमति के बिना यौन संबंध स्थापित करता है तो यह आईपीसी की धारा 497 के अन्तर्गत एक अपराध है। आप के साथ यौन संबंध बनाने का पक्का सबूत यह है कि आप के दूसरे पति से बच्चे हैं और वे उसे पिता हैं। इसी आधार पर पुलिस ने कहा है कि आप के वर्तमान पति परेशानी में पड़ सकते हैं और आप के पूर्व पति की शिकायत पर कार्यवाही हो सकती है। लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है।

प ने पूर्व पति के विरुद्ध विवाह विच्छेद का आवेदन दिया जो कि उस की तामील न होने से खारिज हो गया। फिर आप के पूर्व पति ने तलाक के दस्तावेज बना कर उन पर हस्ताक्षर करवा कर आप को यह विश्वास दिलाया कि तलाक हो गया है और अब दोनों विवाह कर सकते हैं। इस तरह उस ने आप को तलाक हो जाने का धोखा दिया। लेकिन चूंकि आप के पति का लिखित दस्तावेज आप के पास है कि आप दूसरा विवाह कर सकती हैं। यह दस्तावेज यह कहता है कि आप दूसरा विवाह कर सकती हैं और दूसरे पति के साथ यौन संबंध स्थापित कर सकती हैं। इस तरह आप के पति ने आप के साथ दूसरा विवाह करने वाले व्यक्ति को आप के साथ यौन संबंध स्थापित करने की मौन ही नहीं लिखित सहमति दी हुई है। इस कारण से धारा 497 आईपीसी के अन्तर्गत कोई अपराध आप के दूसरे पति के द्वारा किया जाना साबित नहीं होता है। यह सही है कि आप का पहला पति आप के दूसरे पति के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकता है, उन पर मुकदमा चला सकता है। लेकिन यह साबित नहीं कर सकता कि उन्हों ने कोई अपराध किया है।

धारा 494 आईपीसी के अन्तर्गत पहले पति या पत्नी के जीवनकाल में दूसरा विवाह करना अपराध है। लेकिन उस में आप के पहले पति को यह साबित करना होगा कि आप ने दूसरा विवाह किया है, जिसे साबित करना दुष्कर है। विवाह का अर्थ यह है कि आप के और आप के दूसरे पति के बीच सप्तपदी हुई हो। लेकिन हमारे यहाँ किसी भी स्त्री का दूसरा विवाह होता है तो सप्तपदी की रस्म नहीं की जाती है। इस दूसरी प्रकार के विवाह को नाता या नातरा कहते हैं। नाता या नातरा करना दूसरे विवाह की श्रेणी में नहीं आता इस कारण आप के दूसरे विवाह को साबित नहीं किया जा सकता और आप के विरुद्ध कोई अपराध साबित नहीं किया जा सकता।

स तरह आप के पास डर का कोई कारण नहीं है। आप के विरुद्ध आप का पहला पति अदालती कार्यवाही तो कर सकता है लेकिन वह आप को या आप के दूसरे पति को दंडित नहीं करवा सकता। लेकिन यह भी जरूरी है कि अब जो कुछ अवैधानिक हो गया है उसे वैधानिक रूप दिया जाए। इस के लिए आप को चाहिए कि आप अपने पहले पति के तलाक देने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लें और उस के साथ हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13ख मे पारिवारिक न्यायालय को आवेदन प्रस्तुत कर विधिवत विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर लें।

किराएदार से मकान केवल न्यायालय की डिक्री से ही खाली कराया जा सकता है।

House Rentसमस्या-

सुमन जायसवाल ने वाराणसी, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरा वाराणसी में मकान है और काफी समय से एक किरायेदार इस में रह रहा है जिस कोहमारे पिता जी किराये पर दिया था। अब वह आदमी मेरा मकान खाली नहीं कर रहा है। पता चला है कि उस ने कोर्ट से किसी तरह का स्टे ले लिया है। क्या कोई ऐसीयुक्ति है जिसके माध्यम से मैं अपना मकान वापस पा सकूँ।

समाधान-

म अनेक बार बता चुके हैं कि किराएदार कभी मकान का मालिक नहीं हो सकता। उक्त मकान के स्वामी आप हैं तो आप ही रहेंगे। लेकिन वाराणसी नगरीय क्षेत्र है। जहाँ नगरीय किराया कानून लागू होता है। नगरीय क्षेत्र में किसी भी किराएदार से मकान तभी खाली कराया जा सकता है जब कि कानून के अन्तर्गत आधार आप को उपलब्ध हों। इन आधारों में किराया न देना और छह माह से अधिक लगातार किराया देने में चूक करना, मकान मालिक को खुद के लिए सद्भाविक आवश्यकता होना, न्यूसेंस करना आदि हैं। उत्तर प्रदेश किराया कानून आप खुद देखेंगे तो आप को पता लग जाएगा कि आप के पास मकान खाली कराने के क्या आधार हो सकते हैं। आप चाहें तो इस के लिए वाराणसी में किसी वकील से मिल कर पता कर सकते हैं कि आप के पास क्या आधार उपलब्ध है जिस के कारण आप मकान खाली करवा सकते हैं। यदि आप का आधार साबित कर सके तो न्यायालय से आप को मकान खाली करने की डिक्री मिल जाएगी।

न्यायालय में मकान खाली करने के मुकदमे में समय लगता है। इसी कारण लोग बरसों बरस मकान खाली करने का मुकदमा नहीं करते। लेकिन जितनी वे देरी करते हैं उतनी ही मुसीबत में उलझते जाते हैं। मकान खाली कराने का और कोई तरीका नहीं है सिवा इस के कि आप मुकदमा करें। अक्सर किराएदार को भी यह भय रहता है कि मकान मालिक किसी तरह जोर जबरदस्ती मकान खाली न करा ले। इस कारण किराएदार न्यायालय में वाद प्रस्तुत कर इस आशय का स्टे प्राप्त कर लेता है कि मकान मालिक उसे किराएदारी परिसर से न्यायालय की डिक्री के सिवा अन्य तरीके से बेदखल न करे। ऐसा ही कोई स्थगन आप के मामले में किराएदार ने लिया हो सकता है। लेकिन मकान मालिक को स्थगन के मुकदमे की नोटिस तामील हुए बिना ऐसा स्थगन होना लगभग असंभव है। इस कारण स्टे वाली बात मात्र अफवाह भी हो सकती है।

प को चाहिए कि आप वाराणसी में किराएदारी के मुकदमे करने वाले किसी अच्छे वकील से मिलें और उस से राय करें। वह आप को मकान खाली कराने के लिए उचित सलाह और रास्ता सुझा सकता है। एक बार राय ले लेने के उपरान्त देरी न करें। मुकदमा अवश्य कर दें। क्यों कि जितनी आप देरी करेंगे उतनी ही देरी आप को आप का मकान खाली कराने में होगी।

मुस्लिम तलाक की डिक्री के लिए दीवानी/परिवार न्यायालय में घोषणा का वाद प्रस्तुत करें।

तलाकसमस्या-
विजयेन्द्र मेघवाल, पाली, राजस्थान ने पूछा है-

मेरे एक सेवार्थी मुस्लिम हैं। उन का समाज के सामने 100 रुपए के स्टाम्प पेपर पर तलाक नामा लिखा गया है। अब उन्हें न्यायालय से डिक्री चाहिए। इस के लिए क्या करना होगा?

समाधान-

मुस्लिम तलाक के मामले में भारतीय न्यायालय केवल तीन बार तलाक होने पर ही तलाक को वैध मानते हैं। शमीम आरा के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि तलाक किसी उचित कारण से होना चाहिए तथा पहले तलाक और तीसरे व अंतिम तलाक के बीच में दोनों पक्षों के बीच दो मध्यस्थों के माध्यम से समझौते की वाजिब और ईमानदार कोशिश होना चाहिए जिस में एक एक मध्यस्थ दोनों पक्षों द्वारा चुना गया हो। यदि ऐसा कुछ आप के द्वारा बताए इस मामले में हुआ है तो आप दीवानी न्यायालय में तलाक की घोषणा का वाद प्रस्तुत कर के न्यायालय से तलाक की घोषणा की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं।  राजस्थान में जिन जिलों में परिवार न्यायालय स्थापित है वहाँ यह वाद परिवार न्यायालय को ही इस तरह के वाद सुनने और डिक्री पारित करने का क्षेत्राधिकार है।

लेकिन केवल समाज के सामने निष्पादित किए गए तलाकनामे के आधार पर तलाक की डिक्री पारित नहीं की जा सकती है। उस में आप को निश्चित रूप से यह अभिकथन करने होंगे कि वादी ने पहला तलाक किस दिन, किस समय दिया, उस के बाद किस तरह मध्यस्थता के प्रयत्न किए गए और कब दूसरा और तीसरा तलाक हुआ। इन कथनों को दस्तावेजों और मौखिक साक्ष्य से साबित भी करना होगा। इस दावे में तलाकशुदा बीवी आवश्यक पक्षकार होगी। यदि वह इस तलाक से सहमत नहीं है तो उस वाद में अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकती है।

बिना न्यायालय की डिक्री के कब्जा नहीं हटाया जा सकता

समस्या-

बाँसवाड़ा, राजस्थान से सकीना रतलामी ने पूछा है –

मेरे पापा का 1976 से एक प्लाट पर मकान बना हुआ है जिस में बिजली का कनेक्न भी मेरे पापा के नाम से लगा है। मगर अभी मार्च 2012 में मेरे पापा ने जमीन के मालिक से एक एग्रीमेंट कर लिया था जिस के अनुसार हमें उसे आठ लाख रुपया देना था। पर हम समय से वह राशि अदा नहीं कर सके। अब वह एग्रीमेंट के आधार पर पुलिस में रिपोर्ट लिखवा रहे हैं। क्या हमें वह मकान खाली करना पड़ेगा? पापा को क्या करना चाहिए?

समाधान-

eviction of houseदि आप के पापा ने मकान खुद बनाया है और उस पर 1976 से कब्जा है बिजली कनेक्शन भी इतना ही पुराना है तो कब्जे के आधार पर उक्त मकान उन से खाली नहीं कराया जा सकता है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि आप के पापा ने भू-स्वामी से किस तरह का एग्रीमेंट किया है और उस में क्या लिखा है? फिर भी बिना कानूनी कार्यवाही के मकान खाली नहीं कराया जा सकता। यह एक दीवानी मामला है और पुलिस इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

प के पापा चाहें तो मकान से बेदखली के विरुद्ध न्यायालय से निषेधाज्ञा प्राप्त करने हेतु दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं, जिस में न्यायालय यह आदेश दे सकता है कि आप के पापा से मकान न्यायालय के बेदखली के आदेश या डिक्री के बिना खाली न कराया जाए। इस मामले में आप के पापा को किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह कर के कार्यवाही करनी चाहिए।

एक तरफा निर्णय व डिक्री साक्ष्य के आधार पर मामला साबित कर देने पर ही प्रदान किए जा सकते हैं।

समस्या-

सिरोही, राजस्थान से मांगीलाल चौहान ने पूछा है-

मेरी पत्नी और मेरे बीच मे एक साल से किसी तरह का कोई रिश्ता नहीं है।  क्यों कि वह शुरू से संदिग्ध चरित्र की है।  फिर भी मैं ने उसको अपनाया।  लेकिन अब मैं सहन नहीं कर पा रहा हूँ।  इसलिए मैं ने कोर्ट में तलाक़ के लिए आवेदन प्रस्तुत कर दिया है।  जिसकी 16-02-2013 को पेशी है।  इस कार्यवाही का नोटिस मेरी पत्नी को मिल चुका है।  लेकिन वह कोर्ट मे पेशी के लिए आने को तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या एक तरफ़ा फ़ैसला सुनाया जा सकता है? या नही?

समाधान-

justiceकिसी भी मामले में यदि प्रतिवादी / प्रतिपक्षी को न्यायालय का समन / नोटिस प्राप्त हो गया हो और वह पक्षकार न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता है तो न्यायालय सब से पहले इस बात की जाँच कर के संतुष्ट होता है कि क्या उस पक्षकार को समन / नोटिस उचित और विधिपूर्ण रीति से तामील हो गया है अथवा नहीं।  न्यायालय के संतुष्ट होने पर कि पक्षकार को समन / नोटिस उचित और विधिपूर्ण रीति से तामील हो चुका है तो वह मुकदमे की पत्रावली पर आदेश देता है कि उस पक्षकार के विरुद्ध मुकदमे की एक तरफा सुनवाई की जाए।

स आदेश के उपरान्त वादी / प्रार्थी को अपने दावे /आवेदन के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान किया जाएगा।  वादी / प्रार्थी द्वारा साक्ष्य प्रस्तुत कर देने के उपरान्त न्यायालय वादी / प्रार्थी के तर्क सुनेगा और तय करेगा कि क्या वादी / प्रार्थी की साक्ष्य से उस का मामला साबित हुआ है अथवा नहीं।  न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि वादी / प्रार्थी ने उस के द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य से उस का मामला साबित कर दिया है तो फिर वादी / प्रार्थी को उस के द्वारा चाहा गया निर्णय और डिक्री प्रदान कर दी जाएगी।

न्यायालय द्वारा किसी पक्षकार के विरुद्ध एक तरफा सुनवाई का आदेश दे देने के उपरान्त निर्ण्य होने तक किसी भी समय वह पक्षकार जिस के विरुद्ध ऐसा आदेश दिया गया है आवेदन प्रस्तुत कर एक तरफा सुनवाई के आदेश को निरस्त कर उसे सुनवाई का अवसर प्रदान करने के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर सकता है।  आम तौर पर इस तरह के प्रार्थना पत्र निर्धारित अवधि में प्रस्तुत होने पर तथा उचित कारण होने पर स्वीकार कर लिये जाते हैं।  यह वादी / प्रार्थी के लिए भी उचित है क्यों कि एक तरफा निर्णय या डिक्री को इस आधार पर कि उसे समन /नोटिस की तामील नहीं हुई थी तथा उसे मामले का ज्ञान  नहीं था चुनौती दी जा सकती है तथा उसे निरस्त कराया जा सकता है।

प के मामले में आप की साक्ष्य से आप के आवेदन के तथ्य आप की साक्ष्य से साबित हो जाने पर विवाह विच्छेद की एक तरफा डिक्री आप को प्राप्त हो सकती है तथा।  डिक्री की अपील या उसे अपास्त किए जाने का आवेदन निर्धारित अवधि में प्रस्तुत नहीं होने पर वह अंतिम हो सकती है।

एक-तरफा डिक्री कैसे अपास्त हो सकती है?

समस्या

मेरे एक मित्र का प्रश्न लेकर उपस्थित हुआ हूँ।  वो उ.प्र. के रहने वाले हैं। उनकी शादी हरियाणा के भिवानी में हुई थी, शादी को 14 साल हो गए हैं।  अब पिछले 4 सालों से उनका विवाद अपनी पत्नी से चल रहा है।  उनकी पत्नी ने भिवानी में उनके ऊपर 498-ए और घरेलू हिंसा अधिनियम के अंतर्गत का मुकदमे कर रखे हैं।   उन्होंने उ.प्र. में तलाक का मुकदमा किया था, जिसकी जानकारी कोर्ट ने रजिस्ट्री पत्र के माध्यम से तीन बार उनकी पत्नी को दी।  लेकिन वहाँ से जवाब आया कि घर पर कोई मिला नहीं।  उसके बाद कोर्ट ने राष्ट्रीय समाचार पत्र में सूचना निकलवा दी।  फिर भी उपस्थित नहीं होने पर कोर्ट ने एक-तरफा सुनवाई कर के  मेरे मित्र को तलाक की डिक्री प्रदान कर दी।  उधर दूसरी तरफ भिवानी में दोनों केस चल रहे है।  अब आपसे ये जानना है की इस तलाक से मेरे मित्र को क्या कोई फायदा उन दोनों केसों में भी मिल सकता है?  क्या ये तलाक की एक-तरफा डिक्री मान्य होगी?  इस एक-तरफा तलाक की डिक्री को उनकी पत्नी चुनौती देती है तो उसकी कोई समय सीमा भी होती है क्या?

-कमल शर्मा, हिसार, हरियाणा

समाधान-

मारे देश में दीवानी मुकदमों की सुनवाई की प्रक्रिया दीवानी प्रक्रिया संहिता से शासित होती है।  इस संहिता के आदेश 5 में मुकदमे का समन प्रतिवादी/प्रतिपक्षी पर तामील कराने की प्रक्रिया निर्धारित की गयी है।  आम तौर पर समन न्यायालय का तामील कराने वाला व्यक्ति स्वयं ले जा कर तामील कराता है।  लेकिन समन किसी दूसरे प्रान्त या जिला जज के न्याय क्षेत्र में तामील कराना हो तो न्यायालय आदेश 5 के नियम 20 में प्रतिस्थापित तामील के लिए आदेश दे सकता है।

प्रतिस्थापित तामील का पहला तरीका रजिस्टर्ड डाक द्वारा तामील कराने का है। जब इस तरह का आदेश दे दिया गया हो तब डाक द्वारा समन भेजा जाता है।  डाक द्वारा समन तामील न हो सकने की स्थिति में न्यायालय किसी समाचार पत्र में प्रकाशन के माध्यम से प्रतिस्थापित तामील कराने के लिए आदेश दे सकता है।  इस तरह तामील हो जाने पर भी जब प्रतिवादी/प्रतिपक्षी न्यायालय के समक्ष नियत तिथि पर उपस्थित न हो तो यह मान कर कि समन तामील हो चुका है और प्रतिवादी/प्रतिपक्षी मुकदमे में कोई भी प्रतिवाद नहीं करना चाहता है, दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 9 नियम 6 के अंतर्गत एक-तरफा सुनवाई का आदेश देता है, एक-तरफा सुनवाई कर के निर्णय, आदेश और डिक्री पारित करता है।

कोई भी एक-तरफा डिक्री पारित हो जाने पर यह संभावना बनी रहती है कि वास्तव में प्रतिवादी/प्रतिपक्षी पर समन/नोटिस की तामील नहीं हुई हो।  ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति के विरुद्ध एक पक्षीय-डिक्री पारित हुई है वह दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 9 नियम 13 के अंतर्गत उस डिक्री को अपास्त (Set-aside)  करने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकता है।  इस आवेदन को प्रस्तुत करने के लिए समय सीमा अवधि अधिनियम 1963 की अनुसूची के क्रमांक 123 पर निर्धारित की गई है।  इस में यह उपबंध किया गया है कि एक-तरफा डिक्री को अपास्त कराने के लिए आवेदन डिक्री पारित किए जाने के 30 दिनों की अवधि में प्रस्तुत किया जा सकता है।  लेकिन जहाँ समन/नोटिस की तामील सम्यक रूप से नहीं हुई है, वहाँ डिक्री पारित होने का ज्ञान प्रतिवादी/प्रतिपक्षी पर होने की तिथि से 30 दिनों में ऐसा आवेदन प्रस्तुत कर सकता है।

ब प्रतिस्थापित तामील के बाद एक-तरफा डिक्री पारित की गई हो तो उसे सदैव ही इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि उसे मुकदमे का ज्ञान नहीं था।  लेकिन प्रतिवादी/प्रतिपक्षी को ऐसे आवेदन में यह कथन करना होगा कि उसे मुकदमे या डिक्री की सर्वप्रथम जानकारी किस प्रकार हुई और उस के 30 दिनों की अवधि में वह यह आवेदन प्रस्तुत कर रहा है।  तब वादी/प्रार्थी को भी यह अवसर रहता है कि वह इस कथन का प्रतिवाद कर सके कि प्रतिवादी/प्रतिपक्षी को मुकदमे का ज्ञान था और वह जानबूझ कर न्यायालय में उपस्थित नहीं हो सका था।  इसे वादी साक्ष्य प्रस्तुत कर के साबित कर सकता है।  यदि न्यायालय यह समझता है कि प्रतिवादी को तामील सम्यक प्रकार से नहीं हुई थी तो वह डिक्री को अपास्त करने का आदेश खर्चों आदि के सम्बन्ध में उचित शर्तों के साथ पारित कर सकता है और मामले की पुनः सुनवाई कर सकता है।

प के मित्र की पत्नी ने उन पर घरेलू हिंसा और 498-ए के मुकदमे कर रखे हैं।  हो सकता है कि आप के मित्र ने घरेलू हिंसा के मुकदमे में आवेदन का उत्तर देते समय प्रकट किया हो कि उन्हों ने पत्नी के विरुद्ध तलाक का मुकदमा कर रखा है।  यदि ऐसा है तो फिर आप के मित्र का जवाब उन की पत्नी के वकील को प्राप्त होने पर आप के मित्र की पत्नी को तलाक के मुकदमे की जानकारी हो चुकी है और वैसी स्थिति में वह डिक्री को अपास्त कराने के लिए यह कथन करती है कि उसे मुकदमे की जानकारी नहीं थी तो उस कथन का इस आधार पर प्रतिवाद किया जा सकता है कि पत्नी को घरेलू हिंसा के मामले में प्राप्त हुई जवाब की प्रतिलिपि से मुकदमे की जानकारी प्राप्त हो गई थी और वह उस मुकदमे के समन/नोटिस की तामील प्राप्त करने से बचती रही थी।  आप के मित्र के मामले में तो यह भी हो सकता है कि पत्नी स्वयं ही तलाक की इच्छा रखती हो और अधिक पचड़े में न पड़ कर मुकदमे में गैर हाजिर हो कर एक तरफा तलाक हो जाने दिया हो।

लाक के मामले में डिक्री पारित होने के उपरान्त अपील की अवधि व्यतीत हो जाने पर डिक्रीधारी पक्ष दूसरा विवाह करने के लिए स्वतंत्र हो जाता है। यदि डिक्रीधारी के पास यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण हो कि विपक्षी को तामील सम्यक रीति से हुई थी और उसे मुकदमे की जानकारी थी तो वह प्रतिवादी/प्रतिपक्षी द्वारा संहिता के आदेश 9 नियम 13 के अंतर्गत डिक्री को अपास्त करने का आवेदन प्रस्तुत होने और उस की तामील उसे होने से पूर्व विवाह कर लेता है तो उस का ऐसा विवाह वैध होता है जिसे न्यायालय अपास्त नहीं कर सकता।  वैसी स्थिति में उक्त डिक्री को अपास्त किया जाना भी असंभव हो जाता है।

विवाह विच्छेद की डिक्री सक्षम न्यायालय से प्राप्त किए बिना दूसरा विवाह वैध नहीं होगा

समस्या-

मेरी शादी फरवरी 2008 में हुई थी। लेकिन मेरे प्रति पति के यौन उदासीन रहने और विवाह के भुक्त होने के कारण पति के साथ नोटेरी के समक्ष प्रमाणित अनुबंध कर के मेरा तलाक हो गया है। अब मैं दूसरा विवाह करना चाहती हूँ। यदि मैं विवाह करती हूँ तो क्या यह विवाह वैध होगा?

-रीता सिंह, मुरादाबाद, उत्तरप्रदेश

समाधान-

दि कोई व्यक्ति जिस पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है और वह आदिवासी नहीं है तो उस का विवाह बिना सक्षम न्यायालय की डिक्री के विच्छेद नहीं हो सकता। एक हिन्दू विवाह को विच्छेद करने के लिए न्यायालय की डिक्री प्राप्त करना आवश्यक है।

 

दि आप बिना सक्षम न्यायालय से विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त किए केवल नोटेरी द्वारा प्रमाणित किए गए अनुबंध को विवाह विच्छेद मान कर दुबारा विवाह करती हैं तो यह दूसरा विवाह कानूनन अवैध होगा। यह विवाह भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के अन्तर्गत अपराध भी होगा जिस के लिए आप को सात वर्ष तक के कारावास के दंड से दंडित किया जा सकता है।

संयुक्त संपत्ति में निहित हित की कुर्की की जा कर डिक्री की राशि की वसूली की जा सकती है

 गगन जायसवाल, फैजाबाद, उ.प्र. ने पूछा है –

क व्यक्ति से मेरा व्यापारिक लेनदेन चलता था। बाद में उसने मेरा 880000 रुपया नहीं दिया तो मैंने उस के द्वारा दिए गए चैकों के अनादरण के आधार पर उसके ऊपर धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम का मुकदमा किया है। अभी  सुनने में आया है कि वह व्यक्ति बहुत ज्यादा बीमार हो  गया है और उसके बचने की उम्मीद बहुत कम है। उसकी अभी शादी नहीं हुई है और उसकी कोई स्वार्जित संपत्ति नहीं है।उसके पिता के पास काफी संपत्ति है और वह उसे बेचने पर अमादा है। यह संपत्ति जिस व्यक्ति के ऊपर मैंने मुकदमा किया है उसके दादा के द्वारा अर्जित की गई थी। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर क्या इस संपत्ति से कोई वसूली हो सकती है? क्या मैं किसी तरह उसके पिता को संपत्ति बेचने से रोक सकता हूँ। मुझे क्या करना चाहिए? यदि उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई तो मेरा पैसा कैसे मिलेगा? क्या मेरा पैसा डूब भी सकता है?

 उत्तर –

गगन जी,
प ने उस व्यक्ति के विरुद्ध चैक अनादरण के लिए धारा 138 परक्राम्य अधिनियम के अंतर्गत मुकदमा किया है। यह मुकदमा एक फौजदारी मुकदमा है। इस में चैक दे कर उस के भुगतान की व्यवस्था न कर पाने के लिए दंडित किया जा सकता है। यह दंड कारावास के साथ अर्थ दंड भी होता है। इस अर्थदंड का एक भाग शिकायतकर्ता को दिलाया जा सकता है, दिलाया जाता है। लेकिन यदि अभियुक्त की मृत्यु हो जाती है तो उस का अपराधिक दायित्व किसी अन्य व्यक्ति को उत्तराधिकार आदि से हस्तांतरित नहीं होता है और अभियुक्त की मृत्यु के साथ ही अपराधिक मुकदमा समाप्त हो जाता है। वैसी स्थिति में शिकायतकर्ता को कुछ भी प्राप्त होना संभव नहीं है।

पनी बकाया राशि को प्राप्त करने के लिए यदि कोई व्यक्ति दीवानी मुकदमा करता है तो उस दीवानी मुकदमे में हासिल की गई डिक्री के निष्पादन के लिए निर्णीत ऋणी की संपत्ति को कुर्क कर के डिक्री का रुपया वसूल किया जा सकता है। यदि दीवानी मुकदमे के लंबित रहने की अवधि में उस व्यक्ति की संपत्ति को हस्तांतरित किए जाने की संभावना हो तो उस संपत्ति को अटैच कराने के लिए न्यायालय को आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है। न्यायालय उस आवेदन पर संपत्ति को अटैच कर सकता है और उस संपत्ति को हस्तांतरित किया जाना संभव नहीं रहता है। जिस व्यक्ति के विरुद्ध धन वसूली के लिए मुकदमा किया गया है उस व्यक्ति का किसी संयुक्त संपत्ति में कोई हित हो तो उस के उस हित को कुर्क कर के भी डिक्री की वसूली की जा सकती है। यदि उस व्यक्ति के संयुक्त संपत्ति में हित को हस्तांतरित करने का प्रयास किया जा रहा हो तो उस हित को अटैच करने के लिए न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है। न्यायालय सुनवाई के पश्चात उचित आदेश दे सकता है। 
दि आप ने उक्त धनराशि की वसूली के लिए कोई दीवानी वाद प्रस्तुत किया हो तो आप की बकाया की वसूली को सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय उस व्यक्ति की संपत्ति या संयुक्त संपत्ति में उस के हित

संपत्ति का स्वामित्व राजकीय रिकार्ड में कैसे दर्ज कराएँ?

 राबिया अछनेरा, आगरा से प्रवीण गोयल पूछते हैं________________

हमारे गाँव में हमारे पूर्वजों द्वारा हमारे स्वामित्व की भूमि पर बनाया गया एक मंदिर है।  जिस की व्यवस्था हमारा परिवार ही देखता आ रहा है।  लेकिन सरकारी रिकार्ड में कहीं भी वह हमारी संपत्ति के रूप में दर्ज नहीं है।  यह मंदिर किसी अन्य का स्वामित्व भी रिकार्ड में दर्ज नहीं है। हम रिकार्ड में अपना स्वामित्व कैसे दर्ज करवा सकते हैं?

उत्तर____________________

प्रवीण जी,
मंदिर और जिस भूमि पर वह स्थित है वह एक संपत्ति है।  संपत्ति के स्वामित्व का प्रारंभिक महत्वपूर्ण साक्ष्य उस पर लम्बे समय से कब्जा है।  आप के पूर्वजों ने इस मंदिर का उन की स्वयं की भूमि पर निर्माण किया है और तब से ले कर आप का परिवार उस मंदिर की व्यवस्था देखता है।  इस तरह से मंदिर पर आप का कब्जा लम्बे समय स्थापित है।  इस कारण से उस संपत्ति पर आप का कानूनी स्वामित्व भी है। अब केवल इस बात का प्रश्न रह गया है कि राजकीय रिकार्ड में कैसे यह दर्ज हो कि वह संपत्ति आप के स्वामित्व की है?

आप दीवानी अदालत में इस आशय का घोषणा हेतु एक वाद प्रस्तुत कर सकते हैं कि यह मंदिर और इस की भूमि आप के स्वामित्व की है।  एक बार आप दीवानी अदालत के समक्ष अपनी मौखिक साक्ष्य और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत कर यह साबित करें कि उस संपत्ति पर आप का लम्बे समय से कब्जा है, आप ही उक्त मंदिर की देखभाल करते आए हैं।  तो दीवानी न्यायालय इस बात की घोषणा की डिक्री पारित कर देगी कि यह संपत्ति आप के परिवार के स्वामित्व की है।  इस घोषणात्मक डिक्री के आधार पर आप राजकीय रिकार्ड में उक्त संपत्ति पर अपने स्वामित्व का अंकन करवा सकते हैं।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada