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गोदनामा कानून के अनुसार न हो तो उसे निरस्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित किया जा सकता है।

समस्या-

संगीता ने प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं शादी शुदा हूँ और मेरी एक बहन है, वो भी शादी शुदा हैं। मेरे पिता जी सरकारी नौकरी पर कार्यरत थे। दोनों बेटियों की शादी कर देने पर उन्होंने हम दोनों बहनो को बिना बताये अपने सगे भतीजे के बेटे को पंजीकृत गोद ले लिया। उसे  अपनी सम्पति का मालिक बना दिया सेवा के दौरान उनका देहांत हो गया तो क्या हम दोनों बहनो गोद नामा कैंसल करवा सकती हैं और अनुकम्पा के आधार पर नौकरी किसे मिल सकती है? हम को या दत्तक पुत्र को और मेरी सहमति के बिना दत्तक पुत्र को नौकरी मिल सकती है?

समाधान-

आप कैसे कहती हैं कि दत्तक पुत्र को आप के पिता ने संपूर्ण संपत्ति का स्वामी बना दिया? क्या उन्हों ने कोई वसीयत की है। यदि कोई वसीयत नहीं की है तो जैसे एक पुत्र के होते हुए विवाहित पुत्रियों को जो अधिकार प्राप्त हैं वे सभी अधिकार आपको प्राप्त हैं। आप कृषि भूमि के अतिरिक्त तमाम संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार हैं और दत्तक पुत्र भी। आप तीनों  में से प्रत्येक पिता की छोड़ी हुई संपत्ति में एक तिहाई हिस्से की हकदार हैं। अनुकंपा के आधार पर उस आश्रित को नियुक्ति मिल सकती है जो शेष आश्रितों की अनापत्ति ले आए।  आप की आपत्ति करेंगी या अनापत्ति नहीं देंगी तो दत्तक पुत्र अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त नहीं कर सकेगा। गोदनामा आप तभी निरस्त करवा सकती हैं जब कि वह कानून के अनुसार न हो। इस के लिए आप गोदनामा की प्रति प्राप्त कर किसी स्थानीय वकील से सलाह कर सकती हैं और गोद के नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो उसे निरस्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं।

विधवा द्वारा ग्रहण की गई दत्तक संतान का पिता कौन कहलाएगा?

समस्या-

पुरुषोत्तम शर्मा ने हनुमानगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

श्रीमती कमला पत्नी स्व. लालचन्द कमला देवी की आयु 45 वर्ष थी और कमला देवी के कोई औलाद नहीं थी और ना ही होने की सम्भावना थी। कमला के पति लालचन्द की मृत्यु हो चुकी.थी। कमला.ने अपने जेठ लक्ष्मीनारायण के लड़के धर्मवीर को हिन्दू रीति रिवाज के अनुसार बचपन से गोद ले रखा है। गोदनामा बना हुआ है कमला.ने अपनी सम्पति का त्याग कर धर्मवीर के नाम कर दी है। तो आप मुझे ये बताएँ कि पहले सभी डाँक्यूमेन्ट में धर्मवीर पुत्र श्री  लक्ष्मीनारायण था अब पि.मु./दत्तक पुत्र होने के बाद भविष्य में सभी धर्मवीर के डाक्युमेन्ट में क्या नाम करवाया जाए? लालचन्द की मृत्यु के बाद कमला ने धर्मवीर को गोद लिया था। अब.पहचान पत्र, आधार कार्ड, राशन कार्ड, भामाशाह कार्ड, बैक खाता, लाईसेन्स, सभी डाक्युमेन्ट में क्या नाम करवाया जाए, जो भविष्य मे पूर्ण रुप से सही हो और कोई समस्या ना आए? कोई कहता है. धर्मवीर पि.मु./दत्तक पुत्र कमला करवा लो और कोई कहता है धर्मवीर पि.मु./दत्तक पुत्र लालचन्द करवा लो। तो आप ही बताएँ कि भविष्य में क्या नाम पूर्ण रूप से सही होगा? आपका सुझाव यह था कि बच्चे का दत्तक ग्रहण होने के उपरान्त उस के पिता के स्थान पर उस के दत्तक पिता का ही नाम होना चाहिए। अन्यथा अनेक प्रकार की परेशानियाँ हो सकती हैं। मुझे थोड़ा समझने मे समस्या आ रही है कि धर्मवीर को कमला देवी ने गोद लिया था, ना कि लालचन्द ने। धर्मवीर को गोद लेने से पहले ही लालचन्द की मृत्यु हो चुकी थी। लालचन्द की मृत्यु होने के कुछ समय बाद कमला देवी ने धर्मवीर को गोद लिया था।

समाधान-

मारा जो सुझाव था वही सही है। यदि विधवा किसी पुत्र को दत्तक ग्रहण करती है तो उस का दत्तक पिता दत्तक ग्रहण करने वाली स्त्री का पति ही होगा। उस के पिता के स्थान पर उस के जन्मदाता पिता का नाम तो इस कारण अंकित नहीं किया जा सकता कि वह तो अपनी पत्नी की सहमति से अपने पुत्र को दत्तक दे चुका होता है और पिता होने की हैसियत को त्याग देता है।

हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम 1956 की धारा 14 की उपधारा (4) में उपबंधित किया गया है कि जब एक विधवा या अविवाहित स्त्री किसी बालक को दत्तक ग्रहण करती है और बाद में किसी पुरुष से विवाह करती है तो जिस पुरुष से वह विवाह करती है वह उस दत्तक बालक का सौतेला पिता कहलाएगा।

इस उपबंध से स्पष्ट है कि किसी विधवा द्वारा दत्तक ग्रहण करने पर दत्तक ग्रहण किए गए बालक का पिता उस विधवा स्त्री का मृत पति ही होगा। इस मामले में दत्तक ग्रहण किए गए बालक के दस्तावेजों में धर्मवीर पुत्र स्व. श्री लालचंद लिखवाना होगा। जो कि दत्तक ग्रहण विलेख की प्रति प्रस्तुत कर परिवर्तित कराया जा सकता है। हर दस्तावेज में परिवर्तन की प्रक्रिया भिन्न भिन्न हो सकती है जो आप संबंधित विभाग से पता करें।

दत्तक ग्रहण पंजीकृत दत्तक विलेख या दत्तक ग्रहण समारोह की मौखिक साक्ष्य से ही साबित किया जा सकता है।

adoptionसमस्या-

अमित ने नई दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मेरी बुआ फूफा ने मुझे २ वर्ष कि आयु से गोद ले कर पालन पोषण किया। अब मेरी आयु २८ वर्ष है फूफा की मृत्यु पहले ही हो गई थी, बुआ कि मृत्यु अब हो गई है। उनकी दवा, ईलाज, अंतिम संस्कार मैं ने ही किया। उन की कोई औलाद नहीं थी। वोटर कार्,ड अधार कार्ड, राशन कार्ड, सब जगह पिता के स्थान पर फूफा का नाम है। क्या मुझे संम्पत्ति में अधिकार मिल सकता है?

 

समाधान-

प को फूफा और बुआ की संपत्ति में अधिकार तभी प्राप्त हो सकता है जब कि आप अपने फूफा के गोद लिए हुए पुत्र हों या फिर आप के फूफा या बुआ दोनों में से किसी ने उन की संपत्ति आप को वसीयत कर दी हो। आप ने वसीयत का उल्लेख नहीं किया है जिस का अर्थ है कि उन दोनों ने आप के हक में कोई वसीयत नहीं की है।

प ने तीन दस्तावेजों में पिता के स्थान पर अपने फूफा का नाम दर्ज होना अंकित किया हुआ है। इन में से वोटर कार्ड और आधार कार्ड ऐसे दस्तावेज हैं जिन में पिता का नाम बिना पिता की सहमति के भी अंकित किया जा सकता है। इस कारण इन दस्तावेजों से यह साबित करना संभव नहीं है कि आप अपने फूफा के गोद पुत्र हैं। राशन कार्ड एक ऐसा दस्तावेज है जिस में आप के फूफा का नाम मुखिया के रूप में दर्ज हो सकता है यदि ऐसा है तो उस के आधार पर यह माना जा सकता है कि उन्हों ने आप को पुत्र का दर्जा दिया है।

लेकिन फिर भी वास्तविक तथ्य यह है कि आप उन के पुत्र न थे। आप का स्वयं का कथन यह है कि उन्हों ने आप को 2 वर्ष की उम्र से गोद लिया था। तब आप को यह प्रमाणित करना होगा कि उन्हों ने आप को गोद लिया था। गोद लेना अर्थात दत्तक ग्रहण को प्रमाणित करने का प्राथमिक साक्ष्य तो यह है कि दत्तक ग्रहण को कोई दस्तावेज लिखा गया हो और उसे उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत कराया गया हो। यदि ऐसा होता तो आप को यहाँ सलाह लेने की आवश्यकता न होती।

त्तक ग्रहण को एक और तरीके से साबित किया जा सकता है। कोई विवाद होने पर आप न्यायालय में मौखिक साक्ष्य से साबित कर सकते हैं कि जब आप दो वर्ष के थे तो आप की बुआ और फूफा ने वाकई गोद लेने का समारोह आयोजित कर आप को गोद लिया था जिस में आप के माता-पिता और आप को बुआ-फूफा की सहमति थी। इस अवसर पर लोगों को बुलाया गया था और उस में शामिल लोगों को नेग जैसे बताशे, नारियल आदि कुछ वितरित किया गया था और लोगों ने आप को कुछ उपहार दिए थे आदि आदि जो भी आप के यहाँ परंपरा से गोद लेते समय किया जाता हो। यदि दत्तक ग्रहण की यह मौखिक गवाही उपलब्ध हो तो न्यायालय के समक्ष उन के बयानों से दत्तक ग्रहण को साबित किया जा सकता है। तब आप के ये तीनों दस्तावेज वोटर कार्ड, आधार कार्ड और राशन कार्ड सहायक साक्ष्य के रूप में दत्तक ग्रहण के तथ्य को मजबूती से साबित कर सकते हैं।

पत्नी के सहमत न होने पर या बालक के 15 वर्ष से अधिक उम्र का होने के कारण दत्तक ग्रहण संभव नहीं है।

Willसमस्या-

रिरमल ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे बड़े पिताजी हैं। उन की पत्नी उन से अलग रहती है। उन के एक पुत्री है जिस का पिताजी ने विवाह कर दिया है। मेरी उम्र 22 वर्ष है। मेरे बड़े पिताजी ने मुझे सामाजिक रूप से अपना गोद पुत्र घोषित कर रखा है। बड़े पिताजी की पत्नी इस गोदनामे से सहमत नहीं है। इस कारण से मुझे राय दें कि वे गोदनामा को कानूनी रूप से कैसे संपादित कर सकते हैं?

समाधान-

प के बड़े पिताजी का उन की पत्नी से विवाह विच्छेद नहीं हुआ है और वे अब भी उन की पत्नी हैं। किसी भी दत्तक ग्रहण में यह आवश्यक है कि पत्नी की सहमति हो। दूसरा कोई भी व्यक्ति जिस की उम्र् 15 वर्ष से अधिक हो उसे द्त्तक ग्रहण नहीं किया जा सकता जब तक कि इस तरह की परिवार या समाज में कोई परंपरा न हो। इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है कि आप के बड़े पिताजी द्वारा आप को दत्तक ग्रहण किया जाना कानूनी रूप से संभव नहीं है।

त्तक ग्रहण का कानूनी परिणाम यह होता है कि दत्तक ग्रहण किए जाने वाला व्यक्ति दत्तक ग्रहण किए जाने वाले व्यक्ति का उसी प्रकार पुत्र माना जाता है जैसे कि वह दत्तक ग्रहण करने वाले की औरस संतान हो। आप को दत्तक ग्रहण किए जाने पर आप को बड़े पिताजी के जीवनकाल के उपरान्त उन के औरस पुत्र की ही भाँति आप उन के उत्तराधिकारी होते। उन की एक विवाहित पुत्री भी है। इस प्रकार पिताजी के जीवनकाल के उपरान्त तीन उत्तराधिकारी होते। बड़े पिताजी की पत्नी, पुत्री और एक आप। इस तरह उत्तराधिकार में आप को उन की एक तिहाई संपत्ति प्राप्त होती।

ब आप को दत्तक ग्रहण कानूनी रूप से नहीं कर पाने के कारण आप के बड़े पिताजी आप के नाम एक तिहाई संपत्ति वसीयत कर सकते हैं तथा पत्नी और पुत्री को भी एक तिहाई संपत्ति वसीयत कर सकते हैं। यह व्यवस्था भी वसीयत द्वारा की जा सकती है कि तीनों वसीयतियों में से किसी एक का देहान्त उन के जीवनकाल में हो जाने पर उन की संपत्ति शेष दो व्यक्तियों में बराबर बाँटी जाएगी। वसीयत में किसी अन्य प्रकार की व्यवस्था भी की जा सकती है।

विधवा द्वारा दत्तक ग्रहण

lawसमस्या-
बाबू साहब ने दरभंगा, बिहार से पूछा है-

मेरे मामाजी तीन भाई थे। पहले (उम्र- 58 वर्ष) को एक पुत्र और तीन पुत्री हैं। इन का पुत्र 18 वर्ष से कम उम्र का है एवं सभी पुत्रियों का विवाह हो चुका है। दूसरे (उम्र-45) वाले नि:संतान थे जिन की मृत्यु दो साल पहले हो गई। तीसरे (उम्र-4०) वाले को पॉच पुत्र और दो पुत्रियाँ हैं। सभी संतान 18 वर्ष से नीचे के उम्र के हैं। दूसरे वाले मामा की मृत्यु के बाद उनको अग्नि तीसरे वाले मामा के तीसरे पुत्र ने दिया। कर्म समाप्त होने के बाद पंचो के समक्ष उस लड़के को दूसरी मामी को गोद दिया गया और कोर्ट से गोदनामा भी बनाया गया। दूसरी मामी स्वभाव की ठीक नहीं है। मामा की असमय मृत्यु (45 वर्ष के उम्र में) उसी के कारण हुआ। पुरे परिवार से बराबर झगड़ा किया करती थी। गोद लेने के दो महिने बाद झगड़ा करके उसने लड़के को तीसरे मामा को वापस कर दिया। अब वह जमीन बेच कर कहीं और जाना चाहती है। मामा की मृत्यु के बाद मिले बीमा के पैसों को भी इधर-उधर कर रही है। सारा खेत का जमीन पहले वाले मामा के नाम से है जो किसी तीसरे व्यक्ति से खरिदा गया था। घर वाला जमीन उनके पिता के नाम से है एवं घर के पीछे की जमीन तीनों भाइयों के नाम से है। कृपया बतायें कि क्या वो जमीन बेच सकती है। उस गोद लिये बच्चे का क्या हक है? आप को बता दें कि मेरी माँ दो बहन हैं। मैं नानी गॉव मे ही बसा हूँ। कुछ दिन पह्ले गॉव की एक अभद्र औरत के साथ मिलकर मामी ने अपराधिक मामला में फँसाने का धमकी भी दी है।

समाधान-

प के मामा का देहान्त होते ही आप के मामा की जो व्यक्तिगत संपत्ति थी वह तो उत्तराधिकार में आप की मामी को प्राप्त हो चुकी है क्यों कि मामा के कोई संन्तान नहीं थी। अब आप के तीसरे मामा की सन्तान को उस ने गोद लिया है। जिसे आप कहते हैं कि उसे वापस तीसरे वाले मामा को दे दिया है। लेकिन एक बार किसी सन्तान को गोद ले लिया जाए तो उसे वापस नहीं दिया जा सकता। इस कारण वह लड़का अभी भी मामी का गोद पुत्र है। गोद ली हुई संतान मामी ने मामा की मृत्यु के बाद गोद ली है इस कारण वह केवल मामी का गोद पुत्र है मामा जी का नहीं। इस कारण उस का मामी पर वही अधिकार है जो कि केवल मामी के पुत्र का होता। किसी भी स्त्री की संपत्ति पूरी तरह से उसी की होती है। इस कारण से आप की मामी को जो संपत्ति मामा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है उस पर उस का पूरा अधिकार है उसे वह बेच सकती है या किसी को दे सकती है। बीमा के पैसे उस के ही हैं, वह उन का कुछ भी कर सकती है।

खेत की जमीन पहले वाले मामा के नाम है तो उन की ही है। इस कारण दूसरी मामी उस को नहीं बेच सकती। घर की जमीन मामा के पिता जी अर्थात आप के नाना के नाम है इस कारण वह उसे भी नहीं बेच सकती। यदि आप के नाना नहीं हैं तो वह उस घऱ में अपना हिस्सा जरूर मांग सकती है। लेकिन वह संपत्ति पुश्तैनी हो जाने के कारण उस में दूसरे मामा के हिस्से में मामी के साथ साथ मामी द्वारा गोद लिए पुत्र का भी बराबर का हक है। पीछे की जमीन जो तीनों भाइयों के नाम है उस में भी मामी का हिस्सा है। लेकिन उस में गोद लिए पुत्र का कोई हिस्सा नहीं है। मामी चाहे तो इस जमीन में हिस्सा मांग सकती है लेकिन इस हिस्से को प्राप्त करने के लिए उसे न्यायालय में कार्यवाही करनी होगी। मामी की मृत्यु के बाद यदि कोई संपत्ति बचती है तो उस का उत्तराधिकार उन के द्वारा गोद लिए पुत्र को प्राप्त होगा।

दत्तक का पूर्व संपत्तियों पर अधिकार

Mother Holding Child's Handसमस्या-
अखिलेश चौधरी ने जोधपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादाजी के 7 संताने हैं मेरे ताउजी के कोई संतान नहीं हैं उनके पास काफी चल और अचल संपति हैं, जिस में से कुछ तो मेरी ताउजी के नाम से हैं उन्‍होने मेरे छोटे भाई को गोद ले रखा है। किन्‍तु मेरी जानकारी में किसी प्रकार का गोदनामा/ इकरारनामा अथवा वसीयत या गोद लेने का पंजीयन नहीं है।  लोक नजर में वह उनका गोदपुञ है व उसका परिवार उनके साथ रहता है। आप मुझे यह अवगत करावें कि वह ताउजी की संपति के साथ साथ मेरे पिताजी की संपति में भी उत्‍तराधिकार हक रखता है या अथवा दोनों में। इस प्रकार का गोद नियम सम्‍मत होगा या नहीं?  क्‍योंकि मेरी ताईजी कहती हैं कि वह हमारी जमीन में भी हिस्‍सा लेगा अथवा उनके रहमोकरम पर हमारे लिये हिस्‍सा छोडेगा। इस संबंध में मुझे कानूनी राय दें।

समाधान-

त्तक ग्रहण दत्तक के दस्तावेज को पंजीकृत करवा कर भी किया जा सकता है। लेकिन इस दस्तावेज का पंजीकृत होना जरूरी नहीं है। लेकिन यह आवश्यक है कि दत्तक ग्रहण के समय दत्तक ग्रहण किए जाने वाले व्यक्ति की आयु 15 वर्ष से अधिक नहीं हो। इस कारण यदि आप के भाई को अभी तक गोद नहीं लिया गया है तो अब गोद लेना संभव नहीं है। यदि दत्तक ग्रहण का दस्तावेज पंजीकृत न हो तो गोद लेने की रस्म रिवाज के अनुसार होना जरूरी है। यदि यह रस्म समारोह नहीं हुआ है और उस की कोई साक्ष्य नहीं है तो उस का गोद लिया जाना प्रमाणित होना कठिन है।

दि किसी व्यक्ति को कानूनी तरीके से गोद नहीं लिया गया है तो वह अपने दत्तक पिता की संपत्ति को उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं कर सकता। उसे संपत्ति प्राप्त होने का केवल वसीयत के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है।

प के मामले में आप के भाई को गोद लेना प्रमाणित नही है। हो सकता है उसे गोद पुत्र कहा जाता हो लेकिन केवल उस के नाम वसीयत ही कर रखी हो जो कि पंजीकृत नहीं हो। वसीयत का पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है।

गोद जाने वाले व्यक्ति की अपने मूल परिवार में जो भी प्रास्थिति होती है वह समाप्त हो जाती है। अर्थात उस का अपने मूल परिवार से उत्तराधिकार का अधिकार समाप्त हो जाता है। लेकिन यदि वह गोद जाने के पहले ही कोई संपत्ति प्राप्त कर चुका है या किसी संपत्ति में अधिकार प्राप्त कर चुका है तो उस पर उस का अधिकार समाप्त नहीं होता।

प के मामले में आप के भाई का आप के पिता की संपत्ति में अधिकार बना हुआ है क्यों कि उस के गोद जाने का कोई प्रमाण नहीं है। इस कारण वह अपने कथित गोद पिता की संपत्ति को तो प्राप्त करेगा ही वह अपने मूल परिवार की संपत्ति भी उत्तराधिकार में प्राप्त करेगा।

दत्तक संतान और उत्तराधिकार

Mother Holding Child's Handसमस्या-
अजय शर्मा ने श्योपुर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरी मौसी अभी मेरे मामाजी के साथ रहती है ओर आंगनबाड़ी में जॉब करके अपना पालन पोषण करती है। शादी के कुछ महीने बाद मौसजी से उनका संबंध खराब होने के कारण वह मामाजी के पास ही रहती है। उन्होंने मुझे (अजय शर्मा) अपने दत्तक् पुत्र के रूप में रखा है। मेरे नानाजी की ज़मीन है जो अभी तक मेरे नानाजी के नाम पर ही है। क्या मेरी मौसी उस ज़मीन में से हिस्सा लेने का अधिकार रखती है? अगर हाँ तो प्लीज मुझे इसके बारे में सूचना उपलब्ध करवाएँ।

समाधान-

प की समस्या में यह स्पष्ट नहीं है कि आप के नाना जी जीवित हैं या नहीं हैं। दूसरे यह स्पष्ट नहीं है कि आप को मामाजी ने दत्तक लिया है या फिर मौसी ने।

खैर¡ दत्तक ग्रहण लिए जाने का समारोह होना आवश्यक है तथा दत्तक देने वाले जन्मदाता माता-पिता की तथा दत्तक लेने वाले माता पिता की सहमति से ही दत्तक ग्रहण हो सकता है। इस के अतिरिक्त उपपंजीयक के यहाँ दत्तक ग्रहण का दस्तावेज पंजीकृत कराने से भी दत्तक ग्रहण हो सकता है। यदि आप इन दोनों तरीकों में से किसी एक से दत्तक ग्रहण नहीं किए गए हैं तौ आप को दत्तक नहीं रखा गया है। आप गलत समझ रहे हैं कि आप को दत्तक ग्रहण कर लिया गया है। यदि उक्त तरीकों में से किसी एक से आप का दत्तक ग्रहण हुआ है तो आगे चला जाए।

संपत्ति आप के नाना की है। यदि वे जीवित हैं तो संपत्ति उन्हीं की है। किसी का कोई अधिकार नहीं है वे अपने जीवनकाल में किसी को भी वसीयत कर सकते हैं या बेच सकते हैं या फिर दान आदि दे सकते हैं। यदि आप के नाना उक्त में से किसी प्रकार से कोई हस्तान्तरण नहीं करते हैं और उन का देहान्त हो जाता है या फिर वे अभी भी जीवित नहीं हैं तो फिर वह संपत्ति उत्तराधिकार में आप के मामा, मौसी, आप की माँ तथा उन के अन्य भाई बहनों की संयुक्त संपत्ति है तथा उन में से कोई भी बँटवारे का वाद संस्थित कर के संपत्ति का कानून के अनुसार बँटवारा करवा कर अपना हिस्सा प्राप्त कर सकता है।

प किसी के भी दत्तक पुत्र हों भी तो भी आप को उसी प्रकार से अपने दत्तक पिता/माता की संपत्ति पर अधिकार प्राप्त होगा जैसे उन के खुद के औरस पुत्र को प्राप्त होता। आप को उन की संपत्ति पर अधिकार उन के द्वारा संपत्ति आप को हस्तान्तरित कर देने पर या उन की वसीयत से या फिर उन के देहान्त के उपरान्त उत्तराधिकार में प्राप्त होने पर ही हो सकता है।

विवाह, दत्तक आदि से जाति परिवर्तन आरक्षण हेतु मान्य नहीं . . .

lawसमस्या-
दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल से जॉन लेप्का ने पूछा है –

मैं एक अनुसूचित जाति से हूँ। मेरा विवाह 16 फरवरी 2007 को मन्दिरा प्रधान से हुआ है जो कि अन्य पिछड़ी जाति से है। मैं जानना चाहता हूँ कि मेरी पत्नी श्रीमती मन्दिरा प्रधान की जाति क्या होगी? वह अनुसूचित जाति की मानी जाएगी या फिर अन्य पिछड़ी जाति की मानी जाएगी। क्या उसे अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र प्राप्त हो सकता है?

समाधान-

भारत में जाति का महत्व वैवाहिक और पारिवारिक मामलों में काफी समय से रहा है। अब अन्तर्जातीय विवाहों के बाद उन कारणों से जाति का कोई महत्व नहीं रह गया है। लेकिन भारतीय संविधान में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ी जातियों को शैक्षणिक संस्थानों व नौकरियों में आरक्षण प्रदान किया गया है। इस कारण से इस तरह के विवाद हुए भी हैं और न्यायालयों तक पहुँचे भी हैं। जाति प्रमाण पत्र का भी इसी कारण से महत्व है।

स तरह के मामलों में सर्वोच्च न्यायालय का नवीनतम मत यह है कि एक व्यक्ति को आरक्षण का लाभ इस कारण से मिलता है कि वह किसी जाति में उत्पन्न हुआ है और उस ने उस जाति की असुविधाओं को झेला है या उसे विरासत में प्राप्त हुई हैं। लेकिन कोई यदि ऐच्छिक रीति से विवाह, या दत्तक ग्रहण के माध्यम से अपनी जाति बदलता है और फिर उसे इस कारण से आरक्षण का लाभ दिया जाता है तो इस से फर्जी जाति परिवर्तन के मामले बहुत बढ़ जाएंगे और लोग इस तरह जाति बदल कर आरक्षण का लाभ उठाने लगेंगे। वैसे भी जब एक व्यक्ति वयस्क होने तक एक जाति के लाभ प्राप्त कर लेता है और फिर सोच समझ कर विजातीय से विवाह करता है तो यह उस का  ऐच्छिक कृत्य है। इस कारण से उस का लाभ उसे प्राप्त नहीं होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय द्वारा 4 जनवरी 1996 को श्रीमती वलसम्मा पॉल बनाम कोचिन विश्वविद्यालय व अन्य के प्रकरण में दिए गए निर्णय में इस संबंध में विस्तृत रूप से विचार किया गया है।

प दोनों का वयस्क होने के उपरान्त विवाह हुआ है जो दोनों की इच्छा से संपन्न हुआ है। इस कारण से इस ऐच्छिक कृत्य से आप दोनों की ही जाति का परिवर्तन होना मान्य नहीं हो सकता। आप की पत्नी की जाति पूर्व की तरह अन्य पिछड़ी जाति (ओबीसी) बनी रहेगी। उन का अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र नहीं बन सकेगा। यदि किसी तरह बनवा भी लिया जाता है और उस के आधार पर कोई लाभ प्राप्त किया जाता है तो उसे कोई भी चुनौती दे सकता है तथा वैसी स्थिति में वह जाति प्रमाण पत्र सही नहीं माना जाएगा और उस के आधार पर प्राप्त लाभ भी आप की पत्नी से छिन जाएगा।

दत्तक ग्रहण से क्या जाति परिवर्तित हो जाएगी और आरक्षण के लाभ छिन जाएंगे?

Adoption
समस्या-

दौसा (राजस्थान) से राजेश कुमार ने पूछा है-

मेरे मौसी अन्य पिछड़ी जाति की हैं मेरी मौसी कोई संतान नहीं होने के कारण मुझे गोद लेना चाहती हैं। उनका दतक पुत्र बनने में मुझे और मेरी माँ को कोई आपति नहीं है, मेरे पिता जी का भी देहांत हो चुका है| जिस अनुसूचित जाति वर्ग से मैं सरकारी कर्मचारी हूँ।  क्या अन्य जाति वर्ग के गोद जाने से सरकारी विभाग में भी वो जाति वर्ग भी बदल जायेगा? यदि हाँ तो कौन से नियम के तहत ऐसा संभव होगा? केंद्रीय सरकार और राजस्थान सरकार के क्या अलग अलग नियम हैं? यदि जाति बदल जाती है तो इसमें सरकार को कोई आपत्ति तो नहीं होगी और क्या सर्विस बुक में भी मेरी जाति बदल जायेगी|

समाधान-

प का प्रश्न अत्यन्त जटिल है। इस में विधि के अनेक पहलू और सिद्धान्त छिपे हैं। सब से पहला प्रश्न तो यह है कि क्या आप को दत्तक ग्रहण किया जा सकता है? हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम के अनुसार केवल 15 वर्ष तक की आयु के बालकों को ही दत्तक ग्रहण किया जा सकता है वह भी उस के माता-पिता की सहमति और दत्तक ग्रहण करने वाले माता-पिता की सहमति से। 15 वर्ष से अधिक के व्यक्ति और विवाहित व्यक्ति को भी दत्तक ग्रहण किया जा सकता है लेकिन तभी जब कि उस परिवार या जाति में ऐसी परंपरा हो। इस परंपरा को साबित करना दुष्कर है। इस के अलावा जब कोई स्त्री किसी पुरुष को दत्तक ग्रहण करती है तो यह भी आवश्यक है कि दत्तक ग्रहण किए जाने वाले पुरुष से दत्तक ग्रहण करने वाली स्त्री की उम्र कम से कम 21 वर्ष अधिक हो। आप को दत्तक ग्रहण के पूर्व इन सब बातों को जाँचना होगा।

दि यह मान लिया जाए कि आप का दत्तक ग्रहण हो जाता है तो समस्या यह होगी कि आप की जाति दत्तक ग्रहण के उपरान्त क्या होगी। भारत का संविधान जाति के आधार पर भेद करने की मनाही करता है इस कारण से संविधान की दृष्टि में जाति का कोई महत्व नहीं है। लेकिन दूसरी ओर संविधान हिन्दू विधि से शासित होने वाले लोगों को पाँच भिन्न जाति आधारित श्रेणियों में विभाजित करता है। अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति, अन्य पिछड़ी जाति और सवर्ण जातियाँ। इन में से पहली चार श्रेणियों को शिक्षा, नौकरी, निर्वाचन आदि मामलों में आरक्षण प्राप्त है। इस कारण इन लाभों को प्राप्त करने के दृष्टिकोण से जाति परिवर्तन के प्रश्न पर विचार करना आवश्यक है।

हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम की धारा 12 के अनुसार दत्तक ग्रहण होते ही एक व्यक्ति प्रत्येक मामले में अपने दत्तक ग्रहण करने वाले माता-पिता की संतान समझा जाता है। इस हिसाब से उस की जाति भी बदल जानी चाहिए। लेकिन इस धारा में जो संदर्भ हैं वे केवल विवाह की वर्जित श्रेणियों तथा संपत्ति से संबंधित हैं। जब कि जाति का मामला सामुदायिक है। किसी व्यक्ति की जाति तभी परिवर्तित हो सकती है जब कि जाति का संपूर्ण समुदाय उसे अपनी जाति में सम्मिलित कर ले। यह काम केवल जाति की पंचायत कर सकती है।

स के अलावा एक बिन्दु भी है कि अब तक भारतीय न्यायालयों का दृष्टिकोण इस मामले में क्या रहा है। एक बालक यदि छोटी उम्र में द्त्तक ग्रहण कर लिया जाता है और उस का पालन पोषण दत्तक ग्रहण करने वाले माता पिता के यहाँ होता है तो यह माना जा सकता है कि उस ने उन असुविधाओं को भी झेला है जो कि दत्तक ग्रहण करने वाले माता पिता की जाति झेलती है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति बड़ी उम्र् में दत्तक ग्रहण किया जाए तो इस बात को मानना संभव नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने In Murlidhar Dayandeo Kesekar v. Vishwanath Pandu and R. Chandevarappa v. State of Karnataka , के मामले में 22 फरवरी 1995 को पारित निर्णय में निम्न सिद्धान्त प्रतिपादित किया है –

Therefore, when a member is transplanted into the Dalits, Tribes and OBCs, he/she must of necessity also undergo have had same the handicaps, and must have been subject to the same disabilities, disadvantages, indignities or sufferings so as to entitle the candidate to avail the facility of reservation. A candidate who had the advantageous start in life being born in forward caste and had march of advantageous life but is transplanted in backward caste by adoption or marriage or conversion, does not become eligible to the benefit of reservation either under Article 15(4) and 16(4), as the case may be. Acquisition of the Status of Scheduled Caste etc. by voluntary mobility into these categories would play fraud on the Constitution, and would frustrate the benign constitutional policy under Articles 15(4) and 16(4) of the Constitution.

स निर्णय और अन्य सभी निर्णयों में विवाद इस बात पर हुआ है कि क्या दत्तक ग्रहण से जाति परिवर्तन के बाद कोई व्यक्ति परिवर्तित जाति को प्राप्त आरक्षण के लाभ प्राप्त कर सकता है? और उत्तर नहीं में दिया गया है। लेकिन आप का मामला उलटा है आप अनुसूचित जाति वर्ग से हैं जिन्हें आरक्षण की अधिक सुविधाएँ प्राप्त हैं तथा आप अन्य पिछड़ी जाति में  दत्तक ग्रहण होना चाहते हैं। आप को भय है कि दत्तक ग्रहण से आप को प्राप्त आरक्षण की सुविधाएँ छिन न जाएँ।

र्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित उक्त सिद्धान्त के अनुसार तो आप की सुविधाएँ छीनी नहीं जानी चाहिए। पर यदि कोई शिकायत करे तो वे सुविधाएँ विवाद में अवश्य आ जाएंगी फिर मामला जब न्यायालय में जाएगा तो क्या निर्णय होगा यह अभी से नहीं कहा जा सकता।

मेरी राय यह है कि आप की मौसी केवल सामाजिक रूप से इस कारण से दत्तक ग्रहण करना चाहती हैं कि धार्मिक रूप से उनका क्रिया कर्म करने वाला और उन का श्राद्ध करने वाला उन का पुत्र हो और जो कुछ संपत्ति है वह उसे मिल जाए। तो इस मामले में यह किया जा सकता है कि वे सामाजिक-धार्मिक रूप से आप को दत्तक ग्रहण कर लें जिस से उन की इच्छा पूरी हो जाए और संपत्ति जो भी उन के पास है उसे वे आप को वसीयत कर दें जो आप को उन के जीवन काल में आप की हो जाएगी। लेकिन दत्तक ग्रहण करने का दस्तावेज पंजीकृत न कराया जाए। जब तक दस्तावेज पंजीकृत न होगा तब तक आप को सरकारी रूप से दत्तक नहीं माना जाएगा और आप की मौसी और आप का उद्देश्य भी पूरा हो लेगा। वैसे भी इस दस्तावेज को पंजीकृत कराने में अनेक बाधाएँ हैं जिस से उस का पंजीकरण असंभव प्रतीत होता है।

दत्तक पुत्र, दत्तक ग्रहण की तिथि के पूर्व उसे प्राप्त संपत्ति का स्वामी बना रहता है।

Adoptionसमस्या-

सीकर, राजस्थान से कुशल शर्मा ने पूछा है –

मैं एक मंदिर के महंत के गोद गया हुआ हूँ जिसका गोदनामा रजिस्टर्ड है। मगर मेरे गोद लिए पिता की अपनी कोई सम्पति नहीं है सारी सम्पति मूर्ति मंदिर के नाम से है मंदिर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं है हालांकि मंदिर के नाम से करीब 60 बीघा कृषि भूमि अभी भी है मगर उसे बेचने का अधिकार मेरे पास नहीं है। उधर मेरे जन्मदाता पिता के पास बहुत सम्पति है जिसका मूल्य करोड़ों में है तथा उनका अभी कुछ दिन पहले स्वर्गवास हो गया है वे काफी चल एवं अचल सम्पति छोड़कर गये हैं।  मैं यहाँ यह भी उल्लेख कर देना चाहता हूँ क़ि मेरे शैक्षणिक  प्रमाण पत्रों में मेरे पिता के नाम की जगह गोद लेने वाले पिता का नाम ही है मगर मैं हमेशा से ही अन्य भाई बहिनों के साथ मेरे वास्तविक पिता (जन्मदाता) के साथ ही रहता आया हूँ मेरे राशन कार्ड एवं कुछ बैंक खातों में मेरे जन्मदाता पिता का नाम है तथा कुछ खातों में मेरे दत्तक पिता का नाम है।  मेरे जन्मदाता पिता के पास स्वयं की सम्पति होने के कारण मेरे दूसरे भाइयों का रहन सहन काफी ऊँचा है। जब कि मेरे गोद चले जाने के कारण मेरी आर्थिक स्थिति एकदम ख़राब है मंदिर की तो कोई आमदनी नहीं है। ऊपर से उस में हर महीने 500-700 रुपये का खर्चा आ जाता है।  चूँकि मंदिर की पूजा दोनों समय करनी पड़ती है अतः मैं कहीं बाहर जाकर कमा भी नहीं सकता हूँ।  क्या अब मैं मेरे जन्म देने वाले पिता की सम्पति में कोई हिस्सा प्राप्त कर सकता हूँ?

मैं यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैंने अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहन गोद पिता तथा जन्मदाता पिता दोनों के लिए किया है।  मुझे गोद लेनेवाले पिता जब मैं १० साल का था तभी चल बसे थे तथा मैं सदा ही अपने जन्मदाता पिता, माता तथा मेरे सगे भाई बहिनों के साथ ही रहा हूँ मेरी शिक्षा दीक्षा भी मेरे सगे पिता ने ही करवाई है।  गोद पिता का तो मुझे चेहरा भी याद नहीं है। 4 साल पहले मेरी सगी माता का देहांत हो गया।  अब मेरे सगे पिता का भी देहांत हो गया है उनके अंतिम क्रियाकर्म मेरे द्वारा ही किया गया है तथा उनकी पगड़ी भी मेरे ही बंधी है तथा मेरे जन्मदाता माता-पिता ने कभी भी मुझे दत्तक पुत्र नहीं समझा है मगर अब मेरे भाई लोग जिनकी जीवन में मैंने बहुत सहायता की है वे ही मुझे सम्पति में हकदार नहीं मानते हैं और मुझे इस सम्पति में कुछ भी नहीं देना चाहते हैं।  आप बताएँ कि क्या मैं अपने जन्मदाता पिता की सम्पति में हक प्राप्त कर सकता हूँ।  यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मेरे गोद पिता की मूर्ति मंदिर की सम्पति में कुछ लोगों ने मिलकर झूठे दस्तावेज तैयार करवा कर हडपने की कोशिश की थी जिसके कारण से मुझे उन लोगों के खिलाफ न्यायालय में वाद दायर करना पड़ा जिस के कारण वो लोग मुझसे नाराज हो गये तथा वे काफी प्रभावशाली लोग हैं। जिन में एक पूर्व MLA , पूर्व प्रधान तथा  पूर्व सरपंच हैं, प्रशासन भी इन्हीं लोगों का साथ दे रहा है।  वे लोग मुझे गाँव से निकालना चाहते हैं तथा मेरे गोदनामा होते हुए भी मुझसे मूर्ति मंदिर की जमीन जायदाद हडपना चाहते हैं।  इस प्रकार देखा जाये तो मैं तो किधर का भी नहीं रहा।  मेरे जन्मदाता पिता की सम्पति में मुझे मेरे भाई लोग कोई हिस्सा नहीं देना चाहते तथा दत्तक पिता की सम्पति में गांववाले नहीं देना चाहते हैं। इन प्रभावशाली लोगों के डर से मेरे लिए कोई भी गवाही देने के लिए भी तैयार नहीं है।  जब कि आमने सामने बात करते है तो सब मुझे अपने साथ बताते हैं। मगर गवाही के लिए कोई तैयार नहीं है। अब आप ही मुझे सलाह दीजिये की मैं क्या करूँ?

समाधान-

ब आप को गोद दिया गया उस के पहले की स्थिति यह थी कि मंदिर की भूमि को भी पुजारी की भूमि ही समझा जाता था। आखिर वही तो उस का लाभ लेता था। आप के गोद पिता भी आप के ही परिवार के रहे होंगे। तब आप के पिता का सोचना यह था कि उन के सन्तान न होने से वह भूमि किसी और की हो जाएगी। यदि आप को गोद दिया तो उस भूमि का लाभ भी आप का परिवार ले सकेगा। आप को गोद दे दिया गया। लेकिन मंदिर की भूमि तो मंदिर की मूर्ति के नाम रहती है। पहले भूमि से आय बहुत कम थी भूमि की कीमत भी लेकिन पिछले तीस-चालीस बरसों में दोनों में ही वृद्धि हुई है। अब पूरे देश में हर मंदिर का ट्रस्ट बनता जा रहा है। गाँव वाले भी उस मंदिर का ट्रस्ट बनाना चाहते होंगे, और क्यों न चाहें? उन की इस इच्छा में कुछ भी गलत नहीं कि मन्दिर की भूमि की आय मन्दिर और गाँव के काम आए। पुजारी तो बहुत कम मेहनताने में रखा जा सकता है।

धर आप के भाई लोगों का कहना भी गलत नहीं है। आप गोद चले गए तो मूल पिता के परिवार में आप के अधिकार समाप्त हो गए और आप अपने पिता की सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकते। कुल मिला कर आप की मुसीबत आप के गोद जाने के कारण है।

प के पास उपाय यही है कि मन्दिर के एक मात्र ट्रस्टी बने रहें और मन्दिर की जमीन का लाभ उठाएँ। बेशक आप उसे बेच नहीं सकते लेकिन 60 बीघा भूमि की आय से मजे में एक परिवार का निर्वाह हो सकता है और कुछ बचाया भी जा सकता है जिस से भविष्य में सम्पन्नता हासिल की जा सकती है।

क और बात आप के लाभ की हो सकती है। दत्तक पुत्र, दत्तक ग्रहण की तिथि के पूर्व उसे प्राप्त संपत्ति का स्वामी बना रहता है अर्थात् जिस दिन व्यक्ति गोद जाता है उसे अपने पूर्व पिता का उत्तराधिकार प्राप्त नहीं होता लेकिन उस दिन के पहले यदि उस के नाम कोई सम्पत्ति हो तो वह उसी की रहती है। यदि आप के पिता के पास जो सम्पत्ति है वह पुश्तैनी/सहदायिक संपत्ति थी अर्थात वह आप के दादा जी से आप के पिता को प्राप्त हुई थी तो उस सम्पत्ति में उस दिन भी आप का हिस्सा हो सकता है जिस दिन आप को गोद दिया गया था। उस हिस्से के आज भी आप स्वामी हो सकते हैं। उसे आप प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यह तय करना आसान नहीं है कि आप के पिता की संपत्ति में आप को गोद दिए जाने के पहले ही आप का हिस्सा था या नहीं। इस के लिए आप को उक्त संपत्ति की 1956 से पहले के स्वामित्व की स्थिति और उस के बाद आज तक उस के स्वामित्व की स्थिति का पूरा विवरण ज्ञात करना होगा उस के दस्तावेजी सबूत इकट्ठे करने होंगे। फिर आप को इस तरह के मामलों के जानकार किसी अच्छे वकील से सलाह करनी होगी।

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