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दत्तक ग्रहण से क्या जाति परिवर्तित हो जाएगी और आरक्षण के लाभ छिन जाएंगे?

Adoption
समस्या-

दौसा (राजस्थान) से राजेश कुमार ने पूछा है-

मेरे मौसी अन्य पिछड़ी जाति की हैं मेरी मौसी कोई संतान नहीं होने के कारण मुझे गोद लेना चाहती हैं। उनका दतक पुत्र बनने में मुझे और मेरी माँ को कोई आपति नहीं है, मेरे पिता जी का भी देहांत हो चुका है| जिस अनुसूचित जाति वर्ग से मैं सरकारी कर्मचारी हूँ।  क्या अन्य जाति वर्ग के गोद जाने से सरकारी विभाग में भी वो जाति वर्ग भी बदल जायेगा? यदि हाँ तो कौन से नियम के तहत ऐसा संभव होगा? केंद्रीय सरकार और राजस्थान सरकार के क्या अलग अलग नियम हैं? यदि जाति बदल जाती है तो इसमें सरकार को कोई आपत्ति तो नहीं होगी और क्या सर्विस बुक में भी मेरी जाति बदल जायेगी|

समाधान-

प का प्रश्न अत्यन्त जटिल है। इस में विधि के अनेक पहलू और सिद्धान्त छिपे हैं। सब से पहला प्रश्न तो यह है कि क्या आप को दत्तक ग्रहण किया जा सकता है? हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम के अनुसार केवल 15 वर्ष तक की आयु के बालकों को ही दत्तक ग्रहण किया जा सकता है वह भी उस के माता-पिता की सहमति और दत्तक ग्रहण करने वाले माता-पिता की सहमति से। 15 वर्ष से अधिक के व्यक्ति और विवाहित व्यक्ति को भी दत्तक ग्रहण किया जा सकता है लेकिन तभी जब कि उस परिवार या जाति में ऐसी परंपरा हो। इस परंपरा को साबित करना दुष्कर है। इस के अलावा जब कोई स्त्री किसी पुरुष को दत्तक ग्रहण करती है तो यह भी आवश्यक है कि दत्तक ग्रहण किए जाने वाले पुरुष से दत्तक ग्रहण करने वाली स्त्री की उम्र कम से कम 21 वर्ष अधिक हो। आप को दत्तक ग्रहण के पूर्व इन सब बातों को जाँचना होगा।

दि यह मान लिया जाए कि आप का दत्तक ग्रहण हो जाता है तो समस्या यह होगी कि आप की जाति दत्तक ग्रहण के उपरान्त क्या होगी। भारत का संविधान जाति के आधार पर भेद करने की मनाही करता है इस कारण से संविधान की दृष्टि में जाति का कोई महत्व नहीं है। लेकिन दूसरी ओर संविधान हिन्दू विधि से शासित होने वाले लोगों को पाँच भिन्न जाति आधारित श्रेणियों में विभाजित करता है। अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति, अन्य पिछड़ी जाति और सवर्ण जातियाँ। इन में से पहली चार श्रेणियों को शिक्षा, नौकरी, निर्वाचन आदि मामलों में आरक्षण प्राप्त है। इस कारण इन लाभों को प्राप्त करने के दृष्टिकोण से जाति परिवर्तन के प्रश्न पर विचार करना आवश्यक है।

हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण पोषण अधिनियम की धारा 12 के अनुसार दत्तक ग्रहण होते ही एक व्यक्ति प्रत्येक मामले में अपने दत्तक ग्रहण करने वाले माता-पिता की संतान समझा जाता है। इस हिसाब से उस की जाति भी बदल जानी चाहिए। लेकिन इस धारा में जो संदर्भ हैं वे केवल विवाह की वर्जित श्रेणियों तथा संपत्ति से संबंधित हैं। जब कि जाति का मामला सामुदायिक है। किसी व्यक्ति की जाति तभी परिवर्तित हो सकती है जब कि जाति का संपूर्ण समुदाय उसे अपनी जाति में सम्मिलित कर ले। यह काम केवल जाति की पंचायत कर सकती है।

स के अलावा एक बिन्दु भी है कि अब तक भारतीय न्यायालयों का दृष्टिकोण इस मामले में क्या रहा है। एक बालक यदि छोटी उम्र में द्त्तक ग्रहण कर लिया जाता है और उस का पालन पोषण दत्तक ग्रहण करने वाले माता पिता के यहाँ होता है तो यह माना जा सकता है कि उस ने उन असुविधाओं को भी झेला है जो कि दत्तक ग्रहण करने वाले माता पिता की जाति झेलती है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति बड़ी उम्र् में दत्तक ग्रहण किया जाए तो इस बात को मानना संभव नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने In Murlidhar Dayandeo Kesekar v. Vishwanath Pandu and R. Chandevarappa v. State of Karnataka , के मामले में 22 फरवरी 1995 को पारित निर्णय में निम्न सिद्धान्त प्रतिपादित किया है –

Therefore, when a member is transplanted into the Dalits, Tribes and OBCs, he/she must of necessity also undergo have had same the handicaps, and must have been subject to the same disabilities, disadvantages, indignities or sufferings so as to entitle the candidate to avail the facility of reservation. A candidate who had the advantageous start in life being born in forward caste and had march of advantageous life but is transplanted in backward caste by adoption or marriage or conversion, does not become eligible to the benefit of reservation either under Article 15(4) and 16(4), as the case may be. Acquisition of the Status of Scheduled Caste etc. by voluntary mobility into these categories would play fraud on the Constitution, and would frustrate the benign constitutional policy under Articles 15(4) and 16(4) of the Constitution.

स निर्णय और अन्य सभी निर्णयों में विवाद इस बात पर हुआ है कि क्या दत्तक ग्रहण से जाति परिवर्तन के बाद कोई व्यक्ति परिवर्तित जाति को प्राप्त आरक्षण के लाभ प्राप्त कर सकता है? और उत्तर नहीं में दिया गया है। लेकिन आप का मामला उलटा है आप अनुसूचित जाति वर्ग से हैं जिन्हें आरक्षण की अधिक सुविधाएँ प्राप्त हैं तथा आप अन्य पिछड़ी जाति में  दत्तक ग्रहण होना चाहते हैं। आप को भय है कि दत्तक ग्रहण से आप को प्राप्त आरक्षण की सुविधाएँ छिन न जाएँ।

र्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित उक्त सिद्धान्त के अनुसार तो आप की सुविधाएँ छीनी नहीं जानी चाहिए। पर यदि कोई शिकायत करे तो वे सुविधाएँ विवाद में अवश्य आ जाएंगी फिर मामला जब न्यायालय में जाएगा तो क्या निर्णय होगा यह अभी से नहीं कहा जा सकता।

मेरी राय यह है कि आप की मौसी केवल सामाजिक रूप से इस कारण से दत्तक ग्रहण करना चाहती हैं कि धार्मिक रूप से उनका क्रिया कर्म करने वाला और उन का श्राद्ध करने वाला उन का पुत्र हो और जो कुछ संपत्ति है वह उसे मिल जाए। तो इस मामले में यह किया जा सकता है कि वे सामाजिक-धार्मिक रूप से आप को दत्तक ग्रहण कर लें जिस से उन की इच्छा पूरी हो जाए और संपत्ति जो भी उन के पास है उसे वे आप को वसीयत कर दें जो आप को उन के जीवन काल में आप की हो जाएगी। लेकिन दत्तक ग्रहण करने का दस्तावेज पंजीकृत न कराया जाए। जब तक दस्तावेज पंजीकृत न होगा तब तक आप को सरकारी रूप से दत्तक नहीं माना जाएगा और आप की मौसी और आप का उद्देश्य भी पूरा हो लेगा। वैसे भी इस दस्तावेज को पंजीकृत कराने में अनेक बाधाएँ हैं जिस से उस का पंजीकरण असंभव प्रतीत होता है।

दत्तक पुत्र, दत्तक ग्रहण की तिथि के पूर्व उसे प्राप्त संपत्ति का स्वामी बना रहता है।

Adoptionसमस्या-

सीकर, राजस्थान से कुशल शर्मा ने पूछा है –

मैं एक मंदिर के महंत के गोद गया हुआ हूँ जिसका गोदनामा रजिस्टर्ड है। मगर मेरे गोद लिए पिता की अपनी कोई सम्पति नहीं है सारी सम्पति मूर्ति मंदिर के नाम से है मंदिर की आर्थिक स्थिति भी अच्छी नहीं है हालांकि मंदिर के नाम से करीब 60 बीघा कृषि भूमि अभी भी है मगर उसे बेचने का अधिकार मेरे पास नहीं है। उधर मेरे जन्मदाता पिता के पास बहुत सम्पति है जिसका मूल्य करोड़ों में है तथा उनका अभी कुछ दिन पहले स्वर्गवास हो गया है वे काफी चल एवं अचल सम्पति छोड़कर गये हैं।  मैं यहाँ यह भी उल्लेख कर देना चाहता हूँ क़ि मेरे शैक्षणिक  प्रमाण पत्रों में मेरे पिता के नाम की जगह गोद लेने वाले पिता का नाम ही है मगर मैं हमेशा से ही अन्य भाई बहिनों के साथ मेरे वास्तविक पिता (जन्मदाता) के साथ ही रहता आया हूँ मेरे राशन कार्ड एवं कुछ बैंक खातों में मेरे जन्मदाता पिता का नाम है तथा कुछ खातों में मेरे दत्तक पिता का नाम है।  मेरे जन्मदाता पिता के पास स्वयं की सम्पति होने के कारण मेरे दूसरे भाइयों का रहन सहन काफी ऊँचा है। जब कि मेरे गोद चले जाने के कारण मेरी आर्थिक स्थिति एकदम ख़राब है मंदिर की तो कोई आमदनी नहीं है। ऊपर से उस में हर महीने 500-700 रुपये का खर्चा आ जाता है।  चूँकि मंदिर की पूजा दोनों समय करनी पड़ती है अतः मैं कहीं बाहर जाकर कमा भी नहीं सकता हूँ।  क्या अब मैं मेरे जन्म देने वाले पिता की सम्पति में कोई हिस्सा प्राप्त कर सकता हूँ?

मैं यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि मैंने अपने सभी कर्तव्यों का निर्वहन गोद पिता तथा जन्मदाता पिता दोनों के लिए किया है।  मुझे गोद लेनेवाले पिता जब मैं १० साल का था तभी चल बसे थे तथा मैं सदा ही अपने जन्मदाता पिता, माता तथा मेरे सगे भाई बहिनों के साथ ही रहा हूँ मेरी शिक्षा दीक्षा भी मेरे सगे पिता ने ही करवाई है।  गोद पिता का तो मुझे चेहरा भी याद नहीं है। 4 साल पहले मेरी सगी माता का देहांत हो गया।  अब मेरे सगे पिता का भी देहांत हो गया है उनके अंतिम क्रियाकर्म मेरे द्वारा ही किया गया है तथा उनकी पगड़ी भी मेरे ही बंधी है तथा मेरे जन्मदाता माता-पिता ने कभी भी मुझे दत्तक पुत्र नहीं समझा है मगर अब मेरे भाई लोग जिनकी जीवन में मैंने बहुत सहायता की है वे ही मुझे सम्पति में हकदार नहीं मानते हैं और मुझे इस सम्पति में कुछ भी नहीं देना चाहते हैं।  आप बताएँ कि क्या मैं अपने जन्मदाता पिता की सम्पति में हक प्राप्त कर सकता हूँ।  यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना चाहता हूँ की मेरे गोद पिता की मूर्ति मंदिर की सम्पति में कुछ लोगों ने मिलकर झूठे दस्तावेज तैयार करवा कर हडपने की कोशिश की थी जिसके कारण से मुझे उन लोगों के खिलाफ न्यायालय में वाद दायर करना पड़ा जिस के कारण वो लोग मुझसे नाराज हो गये तथा वे काफी प्रभावशाली लोग हैं। जिन में एक पूर्व MLA , पूर्व प्रधान तथा  पूर्व सरपंच हैं, प्रशासन भी इन्हीं लोगों का साथ दे रहा है।  वे लोग मुझे गाँव से निकालना चाहते हैं तथा मेरे गोदनामा होते हुए भी मुझसे मूर्ति मंदिर की जमीन जायदाद हडपना चाहते हैं।  इस प्रकार देखा जाये तो मैं तो किधर का भी नहीं रहा।  मेरे जन्मदाता पिता की सम्पति में मुझे मेरे भाई लोग कोई हिस्सा नहीं देना चाहते तथा दत्तक पिता की सम्पति में गांववाले नहीं देना चाहते हैं। इन प्रभावशाली लोगों के डर से मेरे लिए कोई भी गवाही देने के लिए भी तैयार नहीं है।  जब कि आमने सामने बात करते है तो सब मुझे अपने साथ बताते हैं। मगर गवाही के लिए कोई तैयार नहीं है। अब आप ही मुझे सलाह दीजिये की मैं क्या करूँ?

समाधान-

ब आप को गोद दिया गया उस के पहले की स्थिति यह थी कि मंदिर की भूमि को भी पुजारी की भूमि ही समझा जाता था। आखिर वही तो उस का लाभ लेता था। आप के गोद पिता भी आप के ही परिवार के रहे होंगे। तब आप के पिता का सोचना यह था कि उन के सन्तान न होने से वह भूमि किसी और की हो जाएगी। यदि आप को गोद दिया तो उस भूमि का लाभ भी आप का परिवार ले सकेगा। आप को गोद दे दिया गया। लेकिन मंदिर की भूमि तो मंदिर की मूर्ति के नाम रहती है। पहले भूमि से आय बहुत कम थी भूमि की कीमत भी लेकिन पिछले तीस-चालीस बरसों में दोनों में ही वृद्धि हुई है। अब पूरे देश में हर मंदिर का ट्रस्ट बनता जा रहा है। गाँव वाले भी उस मंदिर का ट्रस्ट बनाना चाहते होंगे, और क्यों न चाहें? उन की इस इच्छा में कुछ भी गलत नहीं कि मन्दिर की भूमि की आय मन्दिर और गाँव के काम आए। पुजारी तो बहुत कम मेहनताने में रखा जा सकता है।

धर आप के भाई लोगों का कहना भी गलत नहीं है। आप गोद चले गए तो मूल पिता के परिवार में आप के अधिकार समाप्त हो गए और आप अपने पिता की सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकते। कुल मिला कर आप की मुसीबत आप के गोद जाने के कारण है।

प के पास उपाय यही है कि मन्दिर के एक मात्र ट्रस्टी बने रहें और मन्दिर की जमीन का लाभ उठाएँ। बेशक आप उसे बेच नहीं सकते लेकिन 60 बीघा भूमि की आय से मजे में एक परिवार का निर्वाह हो सकता है और कुछ बचाया भी जा सकता है जिस से भविष्य में सम्पन्नता हासिल की जा सकती है।

क और बात आप के लाभ की हो सकती है। दत्तक पुत्र, दत्तक ग्रहण की तिथि के पूर्व उसे प्राप्त संपत्ति का स्वामी बना रहता है अर्थात् जिस दिन व्यक्ति गोद जाता है उसे अपने पूर्व पिता का उत्तराधिकार प्राप्त नहीं होता लेकिन उस दिन के पहले यदि उस के नाम कोई सम्पत्ति हो तो वह उसी की रहती है। यदि आप के पिता के पास जो सम्पत्ति है वह पुश्तैनी/सहदायिक संपत्ति थी अर्थात वह आप के दादा जी से आप के पिता को प्राप्त हुई थी तो उस सम्पत्ति में उस दिन भी आप का हिस्सा हो सकता है जिस दिन आप को गोद दिया गया था। उस हिस्से के आज भी आप स्वामी हो सकते हैं। उसे आप प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यह तय करना आसान नहीं है कि आप के पिता की संपत्ति में आप को गोद दिए जाने के पहले ही आप का हिस्सा था या नहीं। इस के लिए आप को उक्त संपत्ति की 1956 से पहले के स्वामित्व की स्थिति और उस के बाद आज तक उस के स्वामित्व की स्थिति का पूरा विवरण ज्ञात करना होगा उस के दस्तावेजी सबूत इकट्ठे करने होंगे। फिर आप को इस तरह के मामलों के जानकार किसी अच्छे वकील से सलाह करनी होगी।

संतान दत्तक ग्रहण करने पर दत्तक ग्रहण विलेख को पंजीकृत अवश्य कराएँ।

समस्या-

दिल्ली से सुनील कुमार ने पूछा है –

मैं अपने भाई का बच्चा गोद लेने वाला हूं जो अभी पैदा होने वाला है और वे अपनी सहमति से अपना बच्चा हमें गोद दे रहे हैं। कल को मेरा भाई अपना बच्चा वापस न मांग ले इसके लिए मुझे किसी ने बताया कि कोर्ट से एडोप्शन डीड (दत्तकग्रहण विलेख) बनवा लें। एडोप्शन डीड क्या होती है?  उसके लिए हमें क्या दस्तावेज देने हैं? कितनी फीस लगती है, क्या सबूत देने होते हैं?  क्या मेरे भाई और उसकी धर्मपत्नी को व मुझे और मेरी धर्मपत्नी को भी कोर्ट जाने की जरूरत है या नहीं? कृपया हमारा मार्गदर्शन करें कि हम क्या करें? जिस से हमें बच्चा गोद लेने के बाद भविष्य में कोई परेशानी न हो।

समाधान-

adoptionकिसी भी बच्चे को गोद तभी लिया जा सकता है जब कि वह पैदा हो चुका हो। इस कारण से आप को दत्तक ग्रहण करने के लिए बच्चे के जन्म की प्रतीक्षा करनी होगी। किसी भी बच्चे को गोद लेने के लिए  गोद लेने वाले बच्चे के माता-पिता और लेने वाले पति-पत्नी की सहमति आवश्यक है। इस के लिए आप को दत्तक ग्रहण विलेख लिखना होगा। जिस में यह उल्लेख किया जाएगा कि बच्चा किन माता पिता का है, वे गोद देना चाहते हैं और कौन पति-पत्नी बच्चा गोद लेना चाहते हैं। चारों की सहमति है। आप दत्तक ग्रहण विलेख किसी वकील या डीडरायटर से लिखवा लेंगे तो उत्तम रहेगा। हर राज्य में इस के लिए अलग अलग स्टाम्प ड्यूटी और पंजीयन शुल्क निर्धारित है। वकील या उप पंजीयक कार्यालय से पता किया जा सकता है कि कितनी स्टाम्प ड्यूटी लगेगी और कितनी फीस लगेगी। दत्तक ग्रहण को जरूरी नहीं कि पंजीकृत कराया ही जाए। घर में परंपरागत रीति से समारोह कर के भी दत्तक ग्रहण किया जा सकता है। लेकिन ऐसे दत्तक ग्रहण को साबित करने के लिए बहुत परेशानी उठानी पड़ती है। इस कारण दत्तक ग्रहण विलेख पंजीकृत कराना उचित है, अवश्य ही करवा लेना चाहिए। इस से भविष्य में होने वाली अनेक परेशानियों से बचा जा सकता है।

निर्धारित ड्यूटी के स्टाम्प पेपर पर दत्तक ग्रहण विलेख लिखा या टाइप किया जा कर आवेदन के साथ उप पंजीयक के कार्यालय में प्रस्तुत होगा। वहाँ गोद देने वाले माता-पिता से तथा गोद लेने वाले पति-पत्नी से पूछा जाएगा कि वे क्या सहमति से ऐसा कर रहे हैं। इस के लिए दो साक्षियों का भी उपस्थित रहना आवश्यक है जिन के दत्तक ग्रहण विलेख पर हस्ताक्षर होंगे। गोद देने वाले और लेने वाले दम्पतियों और साक्षीगण की फोटो आईडी और निवास के पते के सबूत आवश्यक हैं। दोनों दम्पतियों के छाया चित्र और बच्चे का छाया चित्र भी आवश्यक है।

प के द्वारा दत्तक ग्रहण विलेख उप पंजीयक के पास प्रस्तुत होने पर उस की संतुष्टि होने पर कि दत्तक ग्रहण स्वेच्छा से किया जा रहा है और किसी तरह का लेन देन इस में सम्मिलित नहीं है उप पंजीयक पंजीयन शुल्क जमा करवा कर विलेख को पंजीकृत कर देगा तथा पंजीकृत प्रलेख आप को दे देगा। इस प्रलेख की एक प्रति उप पंजीयक के कार्यालय में रखी जाएगी जिस का भविष्य में निरीक्षण किया जा सकेगा तथा जिस की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त की जा सकेगी।

नाम या पिता का नाम परिवर्तन की प्रक्रिया

समस्या-

दिल्ली से मनोज शर्मा ने पूछा है –

मेरा पहली पत्नी से तलाक होने के बाद मेरा दूसरा विवाह हुआ,  मेरी दूसरी पत्नी मुझसे विवाह पूर्व {विधवा} थी ,तथा उनके पास एक दस वर्षीय बिटिया भी थी, जो अब हमारे साथ ही है,  तथा केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ती है,  मेरा पहली पत्नी से एक [दस वर्षीय] बेटा है,  अब हमारे दोनों बच्चे हमारे साथ रहते हैं , मगर दोनों बच्चों के स्कूल रिकॉर्ड में माता/पिता का नाम भिन्न है जैसे बिटिया के उन [मृत] पिता के नाम के साथ [ Late.sh….] लगाया जाता है, जो मुझे और मेरी पत्नी को ठीक नहीं लगता,  मैंने कुछ अध्यापकों से बात कर , प्रिंसिपल से मिला और उनके कहने पर पहले नोटरी से ,फिर रजिस्ट्रार दफ्तर से अडॉप्ट डीड रजिस्टर करवा कर, तथा शादी के फोटो, और प्रार्थना पत्र [ पत्नी की तरफ से] पूरी फाईल बनाकर स्कूल में दे दी,  दो-तीन महीने बाद प्रिंसिपल महोदय ने कहा कि ये फाईल कमिश्नर साहब ने रोक दी है, कि ऐसे नाम नहीं बदला जाता है, इससे थक कर मैंने बेटे के स्कूल [जो DAV में पढता है] में पिता का नाम बदलवाने की अपनी कोशिश रोक दी ,कृपया मार्गदर्शन करे क्या हम ये काम कानूनन करवा सकते है …यदि हाँ …तो कैसे?

समाधान-

name changeकिसी भी बालक को दत्तक ग्रहण के बाद माता पिता का नाम कभी भी बदलवाया जा सकता है। लेकिन प्रत्येक राज्य में उस की एक निर्धारित प्रक्रिया होती है। आप ने उस का प्रारंभिक चरण दत्तक विलेख को पंजीकृत करवा कर पूरा कर भी लिया है। लेकिन यह सब अधूरा है। आप के नाम बदलने के आवेदन की पत्रावली कमिश्नर कार्यालय में अटकी है। आप को कमिश्नर कार्यालय में पूछना चाहिए कि नाम बदलवाने के लिए क्या प्रक्रिया और होनी शेष है और उन के द्वारा बताई गई प्रक्रिया को पूर्ण कर लेना चाहिए। तब फिर नाम बदलने में कोई बाधा नहीं रहेगी।

म तौर पर नाम परिवर्तन के लिए प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के समक्ष इस आशय का एक शपथ पत्र तस्दीक करवाना पड़ेगा जिस में आप यह लिखेंगे के आप ने उक्त बालक को दत्तक ग्रहण कर लिया है। इस कारण पिता का नाम बदल गया है। अब इसे रिकार्ड में बदलवाना चाहते हैं। इस शपथ पत्र को अपने पास रखें और इस की एक सूचना स्थानीय अखबार में प्रकाशित करवाएँ कि दत्तक ग्रहण के कारण पिता का नाम परिवर्तित हो गया है। शपथ पत्र और अखबार में प्रकाशित सूचना की कटिंग के साथ आप सरकारी प्रेस से फार्म ले कर उसे भर कर वहाँ दे दें आवश्यक फीस जमा करवा दें। इस से दिल्ली/भारत सरकार के गजट में नाम परिवर्तन की सूचना प्रकाशित होगी। इस गजट सूचना को संभाल कर रखें। अब आप शपथ पत्र, अखबार की सूचना और गजट प्रकाशन की प्रतियों के साथ विभाग में आवेदन करें। रिकार्ड में नाम परिवर्तित हो जाएगा। लेकिन इस प्रक्रिया में प्रत्येक राज्य में मामूली हेर-फेर हो सकता है, इस कारण पहले कमिश्नर कार्यालय से पता कर लें कि उक्त प्रक्रिया के अतिरिक्त और क्या क्या करना होगा। यदि कमिश्नर कार्यालय तुरंत जवाब न दे तो आरटीआई के अंतर्गत एक आवेदन प्रस्तुत कर दत्तक ग्रहण विलेख के आधार पर नाम परिवर्तन की प्रक्रिया पूछ लें।

दत्तक ग्रहण विलेख अवश्य पंजीकृत कराएँ

समस्या-

कुक्षी , मध्यप्रदेश से श्रीमती परवीन ने पूछा है-

मेरी कोई संतान नहीं है तथा मैं व मेरे पति संतान गोद लेना चाहते हैं।  मेरी छोटी बहिन का पुत्र है,  छोटी बहिन व उसका पति भी पुत्र को गोद देना चाहते हैं , मेरी समस्या ये है कि गोदनामे की लिखा-पढ़ी कैसे व किस प्रारूप में व कितने रूपये के स्टाम्प पेपर पर की जाये?  तथा गोद नामा की लिखा- पढ़ी में क्या जरूरियात होनी चाहिए?  क्या सिर्फ नोटरी किया हुआ गोदनामा मान्य होगा?

समाधान-

Adoptionप के प्रश्न से यह पता नहीं लग रहा है कि आप का धर्म क्या है जिस से यह पता लगाया जा सके कि आप कौन सी व्यक्तिगत विधि से शासित होंगी।  आप ने अपना नाम परवीन लिखा है।  यह नाम मुस्लिम भी हो सकता है और हिन्दू भी।  लेकिन मुस्लिम विधि में गोद लेने का कोई प्रावधान नहीं है और किसी भी प्रकार से किसी संतान को गोद नहीं लिया जा सकता।  यदि आप मुस्लिम विधि से शासित होतीं हैं तो संतान गोद नहीं ले सकती हैं।  आप अधिक से अधिक संतान को उस के माता-पिता की सहमति से स्वयं के संरक्षण में ले सकती हैं और इस के लिए नोटेरी से सत्यापित किया हुआ एक अनुबंध (एग्रीमेंट) पर्याप्त होगा।  लेकिन इस एग्रीमेंट से केवल बच्चा आप के संरक्षण में आ जाएगा। न तो उस बालक को और न ही आप पति-पत्नी को कोई अधिकार प्राप्त होंगे और न ही कोई दायित्व तीनों पर उत्पन्न होंगे। वह सिर्फ बालक के पालन-पोषण और संरक्षण की सिविल संविदा होगी जो आप पति-पत्नी पर दायित्व तो उत्पन्न करेगी किन्तु बालक पर किसी तरह का अधिकार आप को प्राप्त नहीं होगा।

लेकिन यदि आप हिन्दू हैं तो आप के पति आप की सहमति से उस बालक को गोद ले सकते हैं तथा उस बालक के पिता अपनी पत्नी की सहमति से उसे गोद दे सकते हैं।  इस के लिए हिन्दू दत्तक ग्रहण एवं भरण-पोषण अधिनियम में प्रावधान दिए गए हैं।   जिस के अनुसरा यह आवश्यक है कि बालक की आयु 15 वर्ष से कम की हो।   लिखा-पढ़ी के लिए अच्छा यह  होगा कि आप दत्तक-ग्रहण के लिए दत्तक अभिलेख अपने यहाँ के किसी स्थानीय वकील से लिखवाएँ और उसे उप पंजीयक के कार्यालय में जहाँ मकानों के बेचने खरीदने के विक्रय पत्रों का पंजीयन होता पंजीकृत करवाएँ।  इस के लिए प्रत्येक राज्य में पृथक पृथक स्टाम्प ड्यूटी व पंजीयन शुल्क निर्धारित है जिस की जानकारी आप अपने क्षेत्र के उपपंजीयक कार्यालय से प्राप्त कर सकती हैं।  दत्तक ग्रहण विलेख पर मामूली स्टाम्प ड्यूटी जो राज्य सरकार द्वारा निर्धारित होती है ली जाती है तथा कुछ पंजीयन शुल्क लिया जाता है।  दत्तक ग्रहण के लिए निर्धारित मूल्य के स्टाम्प पर दत्तक ग्रहण विलेख लिखा जाएगा और पंजीकृत किया जाएगा।  दत्तक ग्रहण विलेख पंजीकृत हो जाने पर वह दत्तक ग्रहण का अविवादित साक्ष्य होता है, उसे किसी प्रकार खंडित किया जाना संभव नहीं होता।

आप दत्तक पुत्र हैं, आप को अपने अधिकार के लिए कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए

समस्या-

झझ्झर , हरियाणा से कृष्ण कुमार ने पूछा है –

मुझे 12 जनवरी 1965 को बचपन मे ही गोद ले लिया गया था। दत्तक ग्रहण करने वाले व्यक्ति मेरे पिता के फूफा जी थे। अब उन की मृत्यु हो चुकी है।  दत्तक प्रदान करते समय माता-पिता और संरक्षक भी सक्षम हैं।  गोद देते समय बही-खाता में सादे कागज पर पचाय़त द्वारा लिखा पढ़ी की गई थी, उस वक़्त की फोटो भी बनवाई गई है।  क्या इस पर मुझे जमीन का हक मिला है या नहीं।  इस पर कौन सी आई पीसी का कानून लागू होता है, मुझे क्या करना होगा?

समाधान-

गोद देने वाले अर्थात जन्म देने वाले पिता बालक की माता की सहमति से बालक को दत्तक प्रदान कर सकते हैं। दत्तक ग्रहण करने वाले पिता अपनी पत्नी की सहमति से बालक को दत्तक ग्रहण कर सकते हैं। यदि जन्मदाता माता-पिता जीवित न हों तो बालक के संरक्षक उसे दत्तक प्रदान कर सकते हैं। आप को दत्तक प्रदान करते समय पंचायत ने द्स्तावेज लिखा था तो उस पर मौजूद व्यक्तियों के हस्ताक्षर भी होंगे। चित्र तो है ही। आप अपना दत्तक ग्रहण करना न्यायालय में साबित कर सकते हैं।

प को वे सभी अधिकार हैं जो फूफाजी के औरस पुत्र के होते। यदि फूफाजी के पास जमीन और अन्य संपत्तियाँ थीं तो वे आप को उत्तराधिकार में प्राप्त हो चुकी हैं। यदि किसी और ने उन पर अधिकार किया हुआ है तो आप को अपना अधिकार स्थापित करने के लिए कार्यवाही करनी चाहिए। यदि कृषि भूमि है तो आप को सब से पहले उस का इंतकाल (नामान्तरण) करवाना चाहिए फिर कब्जा प्राप्त करना चाहिए। यदि कब्जा नहीं मिल सकता है तो कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। आईपीसी केवल अपराधिक मामलों पर प्रभावी होती है। आप के मामले में नहीं। आप को तुरन्त खेती की जमीन से संबंधित काम करने वाले किसी स्थानीय वकील से सलाह ले कर आगे कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए।

एक ही व्यक्ति द्वारा दो दत्तक ग्रहण संभव हैं।

समस्या-

जयपुर, आँन्ध्रप्रदेश से रविराज ने पूछा है –

मेरे ताउजी जो 1960-1970 में जिसकी तारीख मेरे पास नहीं है 10-20 साल के बीच की उम्र के थे, तब ताउजी व पिताजी की विधवा भाभी के गोद चले गए थे। जिसका रजिस्टर्ड गोदनामा है।  लेकिन मेरे ताउजी अपनी भाभी के पास नहीं रहे व अपने पिता के पास वापस आ गये व उनके साथ रहने लगे।  कुछ समय पश्चात पापाजी की भाभी जी ने पापा जी को 1985 में गोद ले लिया व रजिस्टर्ड गोदनामा बना लिया, तब पापाजी की उम्र लगभग ३० वर्ष थी व शादी हो चुकी थी व भाइयों से अलग हो चुके थे। मेरे पिताजी ने उनकी खूब देखभाल की जो एक पुत्र करता है।  उनका अंतिम संस्कार तथा अन्य सामाजिक कार्य भी बड़ी अच्छी तरह किया था। सब लोगो को पता है कि मेरे पिताजी ने ही अपनी भाभी की सम्पति (यह एक कृषि भूमि है जो मेरे पिता की भाभी को अपने पति से मिली थी व भाभी के पति को यह भूमि अपने पिता से मिली थी) के असली हक़दार हैं, यह भूमि जब से पिताजी गोद गए हैं तब से हमारे कब्जे में है व हम इस पर काश्तकारी का कार्य कर रहे हैं, 1998 में पापाजी की भाभी जी का देहांत हो गया व भूमि राजस्व रिकॉर्ड में 1998 से पापाजी के नाम हो चुकी है।  अब मेरे पापाजी की भाभी, मेरे ताउजी, मेरे पापाजी के पापाजी (मेरे दादाजी व दादीजी का देहांत हो चूका है) मेरे पापाजी जीवित हैं।  हमारे व ताउजी के परिवार जिस में (ताईजी व उनके २ पुत्र व् उनकी उनकी २ पुत्र वधु हैं) से हमारी बनती नहीं है (मनमुटाव हैं)। मेरे सवाल हैं कि क्या कभी मेरे ताउजी का परिवार हमारी सम्पति पर दावा कर सकता है कि-

1. यह हमारी सम्पति है (क्यूंकि ताउजी पापाजी से पहले गोद जा चुके थे)?
२. क्या हमें हमारे असली दादाजी यानि पापाजी की पैतृक पिता की सम्पति से भी बेदखल कर सकते हैं? (इस आधार पर कि आप के पिता गोद गए हुए हैं) जो की सहदायिक है जिसमे पापाजी का नाम गोद जाने के बाद यानि 1989 (इस समय पापाजी के पैत्रक पिता का का देहांत हुआ था) से राजस्व रिकॉर्ड में मौजूद है।
३. क्या पापाजी का गोद जाना गैर क़ानूनी है क्यूंकि गोद जाते वक्त उनकी उम्र ३० वर्ष थी तथा विवाह हो चुका था? अगर गैर क़ानूनी है तो गोदनामा रजिस्टर्ड कैसे हुआ?
४.यदि हमारे ऊपर कभी ऐसी परेशानी आये तो हमारा बचाव कैसे हो सकता है? क्या निम्न प्रकार हम या पिता जी बचाव कर कर सकते हैं जैसा कि (क) पिताजी भाइयों से अलग होने के बाद गोद गए हैं (ख) परिवार के सभी सामाजिक कार्यों में बराबर हिस्सा देते रहे हैं या अन्य कोई उपाय है तो बताये।

समाधान-

की समस्या एक ही व्यक्ति द्वारा किए गए दो दत्तक ग्रहण से संबंधित है। ग्रहण किए गए दत्तक की उम्र 15 वर्ष से अधिक होने या विवाहित होने मात्र से उसे अवैध नहीं ठहराया जा सकता है। यदि परिवार और बिरादरी में 15 वर्ष से अधिक उम्र और विवाहित व्यक्ति को गोद लेने की परंपरा रही है तो यह संभव है और यह वैध होगा। इस तरह आप के ताऊजी का और आप के पिताजी का दत्तक ग्रहण दोनों ही वैध हो सकते हैं।

त्तक लिए गए पुत्र को पैतृक संपत्ति का जो भाग दत्तक ग्रहण के पूर्व प्राप्त हो चुका है वह उस से नहीं छीना जा सकता है।  इस तरह दत्तक ग्रहण से पूर्व के परिवार की संपत्तियों में उन्हें दत्तक ग्रहण के पूर्व जो अधिकार प्राप्त हो चुका है वह उन का ही रहेगा। लेकिन दत्तक ग्रहण की तिथि के उपरान्त उन्हें कोई भी अधिकार अपनी पूर्व के पैतृक परिवार से प्राप्त नहीं होगा। इस तरह पूर्व के पैतृक परिवार से प्राप्त कौन सी संपत्ति दोनों के हिस्से में आएगी यह दोनों के दत्तक ग्रहण की तिथियों से निर्धारित होगा।

क्यों कि दोनों ही दत्तक हैं इस कारण से दत्तक माता की संपत्ति पर दोनों का बराबर का अर्थात आधा आधा अधिकार रहेगा।

लेकिन यदि कोई भी संपत्ति आप के पिता के नाम आ चुकी है और विगत 12 वर्ष से अधिक समय से उन का उस पर कब्जा है तो उस के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही किसी न्यायालय में इस लिए संस्थित नहीं की जा सकती है कि अवधि विधान के अनुसार कार्यवाही किया जाना बाधित है। यदि आप के पिताजी पर कोई कार्यवाही की जाती है तो उस का मुकाबला अन्य आधारों के साथ साथ अवधि विधान के आधार पर किया जा सकता है।

दत्तक पुत्र के संपत्ति में वे ही अधिकार हैं जो औरस पुत्र के हैं

समस्या-

डाल्टनगंज, झारखंड से संजय सिंह ने पूछा है –

मैं गोद लिया व्यक्ति हूँ जिस का कोई प्रमाण मेरे पास नहीं है। मेरे पिता ने अपनी कमाई संपत्ति अपनी औलादों में बाँट दी है। मुझे अपने गोद लिए पिता की संपत्ति में कोई अधिकार है अथवा नहीं?

समाधान-

प के पास गोद लिए जाने का कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन आप के स्कूल के प्रमाण पत्रों में, परिवार के राशनकार्ड आदि में पिता के स्थान पर आप को गोद लेने वाले पिता का नाम दर्ज होगा। इन्हें एकत्र कीजिए। जिन व्यक्तियों के सामने गोद लिया गया था उन से संपर्क कीजिए। आप को प्रमाण मिल जाएंगे।

क गोद लिए पुत्र को वे सभी अधिकार होते हैं जो कि एक औरस पुत्र को होते हैं। लेकिन कोई भी व्यक्ति अपनी स्वयं की कमाई हुई संपत्ति को स्वतंत्रता पूर्वक हस्तांतरित कर सकता है, जिसे चाहे दे सकता है और जिसे चाहे वसीयत कर सकता है। लेकिन यदि परिवार में कोई सहदायिक संपत्ति है जिस में आप के पिता का हिस्सा है तो आप भी गोद लिए जाने के समय से ही उस सहदायिक संपत्ति के हिस्सेदार बन गए हैं और उस में आपका अधिकार मौजूद है। इसी प्रकार आप को गोद लिए हुए पिता को कोई संपत्ति उन के पिता, दादा या परदादा से मिली है उस में भी आप का अधिकार है। लेकिन आप के गोद लिए पिता उन के द्वारा स्वयं अर्जित संपत्ति के साथ कुछ भी कर सकते हैं उस में दखल देने का  आप को कोई अधिकार नहीं है।

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