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विवाह के पूर्व जीवन के सभी पहलुओं पर विचार करना चाहिए।

समस्या-

दिशा शर्मा ने मुजफ्फरपुर उत्तरप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ने 7.3.2017 को घऱ से छिप कर रजिस्टर्ड मैरिज की, दो साल से हमारे बीच प्यार था। उस का घर बनारस में बहुत दूर था, हम ट्रेन में मिले थे। हमने सोचा था कि एक साल बाद घर वालों को बताएंगे। मैं शादी के दिन ही घर आ गई किसी को पता नहीं चला। लेकिन मेरे पति ने शादी के 5 दिन बाद ही ड्रामा कर दिया। मेरे घर आ कर घरवालों और सभी रिश्तेदारों को धमकी और गालियाँ दीं। सोशल साइट पर मैरिज की फोटो डाल दी। मेरे घर पुलिस भी भेज दी कि मेरी पत्नी को मार रहे हैं। मुझे थाने जाना पड़ा। पूरे एरिया को पता चल गया। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह वही व्यक्ति है। मैंने उस से बात की तो कहने लगा उस ने ड्रिंक कर ली थी इस कारण यह सब हो गया। मेरे घर वाले बोले कि घर वालों के साथ आ कर विदाई करा लो। पर वह नहीं आया। उस का परिवार शादी के खिलाफ है उन्हों ने उसे घर से निकाल दिया है। वह फिर भी मेरे घर वालों को धमकी देता है। मैं ने उसे कहा है कि तुमने जो कुछ किया है उस के बाद मैं तुम्हारे साथ नहीं आ सकती। फिर वह मुझे बहुत बुरा भला बोला और फिर कहा कि ड्रिंक कर ली थी। अभी 100 नंबर पर काल कर के फिर से पुलिस भेज दी है। अभी धारा 9 का केस कर दिया है। मेरे पापा नहीं हैं, माँ है और दो छोटे भाई हैं। मामा मदद कर रहे हैं। मैं क्या करूँ आप बताएँ। मैं घर वालों के साथ रहना चाहती हूँ।

समाधान-

प शायद पहले भी अपनी समस्या लिख चुकी हैं। उसी दिन आप के श्रीमान जी ने भी हमें अपनी समस्या लिख भेजी थी। हम ने शायद दोनों को उत्तर भी दिया था या हो सकता है न दिया हो।

शादी इतनी हलकी चीज नहीं होती कि छोटी मोटी घटना से टूट जाए। इस कारण वह हलके में नहीं करना चाहिए। आपने केवल लड़के का बनावटी व्यवहार और बातों, वायदों पर ध्यान दिया। जिन्दगी के अन्य पहलुओं पर सोचा ही नहीं। माँ के बाद आप ही परिवार में जिम्मेदार व्यक्ति थीं। आप को अपनी माँ और छोटे भाइयों के बारे में सोचना चाहिए था। भाइयों के आत्मनिर्भर होने तक आप को परिवार को सपोर्ट करना था यह भी भूल गयीं। धारा 9 के प्रकरण में कुछ नहीं होगा। डिक्री भी हो जाएगा तो भी कोई जबरन आप को उस के साथ रहने को बाध्य नहीं कर सकता। अधिक से अधिक आप न जाएंगी तो उसे तलाक लेने का अधिकार मिल जाएगा। वह तो आप भी चाहने लगी हैं। लेकिन आप को भी तलाक के पहले खूब सोचना चाहिए। मेरी राय में अपने छोटे भाइयों के पैरों पर खड़े होने तक की प्रतीक्षा करनी चाहिए।

विवाह से एक वर्ष तक की अवधि में तलाक का आवेदन नहीं दिया जा सकता। उस ने जो हरकतें की हैं वे क्रूरता की श्रेणी में आती हैं और विवाह का एक वर्ष पूर्ण होने पर इस आधार पर आवेदन दिया जा सकता है।

पत्नी से किसी तरह संपर्क साधने का प्रयत्न करें।

समस्या-

सूरज सिंह ने फ़ैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ने 16 फरवरी 2017 को रजिस्ट्री ऑफीस और आर्य समाज मंदिर में बिना फॅमिली को बताए शादी की। उसी दिन वाइफ अपने घर गई और फिर आने से मना कर दिया। उस के घर वाले किसी कीमत पर नहीं चाहते कि हम साथ रहें।  वो उन की बात मान रही है। उस के घऱ वाले मुझे गाली देते हैं। मैं ने डिप्रेशन में आ कर शराब पी ली। और गालियाँ दे ली और उल्टा पुल्टा बोल दिया और शादी के फोटो उस के घर वालों की फेसबुक आईडी पर पोस्ट कर दिए। जब मुझे लगा कि उसे कहीं कुछ न हो जाए तो 100 नंबर पर फोन कर दिया और पुलिस को वहाँ भेज दिया। उस के घर वालों ने मेरा गाली  गलौच वाला फोन उसे सुना दिया। अब वो भड़क गयी। ना कोई बात करती है ना उस के घऱ वाले बात करते हैं। मैं अब क्या करूँ उस के बिना नहीं रह सकता। हमारे घरों में 700 किलोमीटर की दूरी है। और उस के घर के पास मेरा कोई नहीं। क्या वह उस रिकार्डिंग से डाइवोर्स ले सकती है? कुछ भी हो जाए पर मैं डाइवोर्स नहीं देना चाहता।

समाधान-

प बेकार घबरा रहे हैं। एक फोन काल रिकार्डिंग के आधार पर कोई तलाक नहीं हो सकता। यदि आप की शादी का पंजीकरण हो गया है तो या तो आप की पत्नी को अपना विवाह किसी तरह से अकृत कराना होगा या फिर आप से तलाक लेना होगा। दोनों काम अदालत में आवेदन किए बिना संभव नहीं हैं। उस का आप को नोटिस आएगा। आप चाहें तो प्रतीक्षा कर सकते हैं।

प्यार में मिलन ही नहीं होता, विछोह भी होता है। आप  ने प्यार किया और विवाह कर लिया। अब कुछ दिन विछोह के भी गुजारें। दो चार सप्ताह में बात पुरानी होने पर अपनी पत्नी से किसी तरह संपर्क साधने का प्रयत्न करें और हो सके तो बातचीत आरंभ करिए। उस का जो भी थोड़ा बहुत विश्वास टूटा है उसे फिर से जोड़िए। आप को लगे कि पत्नी में आप के प्रति थोड़ी भी सकारात्मकता है तो अदालत में धारा 9 का आवेदन लगाएँ, दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए।

बहिन को वापस उस के ससुराल कैसे भेजा जाए?

समस्या-

अनिल सिंह ने कन्नोज, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरी विवाहित बहन के कमरे और चेंजिंग रूम में ससुराल वालों ने सीसीटीवी कैमरा लगाया।  जिस पर विवाद हुआ और पुलिस को लिखित सूचना देने के बाद मैं उसको अपने घर ले आया। इसकी रिकॉर्डिंग है मेरे पास। दहेज़ उत्पीड़न और घरेलू हिंसा का मुकदमा कर दिया है।  परंतु मै चाहता हूँ कि किसी भी तरीके से मेरी बहन ससुराल पहुँच जाये। क्या मेरी बहन बगैर ससुराल वालों की मर्ज़ी के ससुराल में रह सकती है।


समाधान-

ह एक जटिल समस्या है। किसी भी घर में उस घर के स्वामी की इ्च्छा के विरुद्ध निवास करना संभव नहीं है। विशेष रूप से उस स्थिति में जब कि उस घर के स्वामी आप की बहिन पर इतनी निगाह रखते हों कि उस के निजी कमरे व चेंजिंग रूम में सीसीटीवी लगा कर रखते हों। यह तो ऐसा क्रूर कृत्य है जिस के आधार पर कोई भी स्त्री अपने पति से विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त की जा सकती है। सीसीटीवी कैमरे से प्राप्त वीडियों व चित्रों के माध्यम से आपकी बहन को आप की बहन के पति व उस के ससुराल वाले ब्लेकमेल कर सकते हैं और उसे किसी भी तरह का घिनौना कृत्य करने पर बाध्य कर सकते हैं।

आप की बहिन ने घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत मुकदमा किया है। इस अधिनियम की धारा 19 में निवास का आदेश दिए जाने की शक्ति मजिस्ट्रेट को प्रदान की गयी है। आपकी बहिन के आवेदन में इस तरह की प्रार्थना नहीं की गयी है तो आप की बहिन उक्त आवेदन में संशोधन के माध्यम से यह प्रार्थना कर सकती है कि उसे ससुराल में अपने कमरे में निवास करने से न रोका जाए। यदि परिस्थितियाँ ऐसी हों कि यह संभव न हो तो उसे ससुराल वालों, पति से ऐसा आवास उपलब्ध कराया जाए जिस में वह निवास कर सके।

इतना कुछ हो जाने के बाद आप की बहिन का क्या उस घर में रहना सुरक्षित होगा? इस प्रश्न पर विचार अवश्य करें। आप की बहिन धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम में भी दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना काआवेदन कर सकती है। धारा 125 दंड प्रकिया संहिता में भरण पोषण के आदेश के लिए आवेदन कर सकती है। तमाम परिस्थितियों में पति के साथ उस का रह पाना तभी संभव है जब कि आपसी सहमति बने। धारा9 के प्रकरण में न्यायालय इस तरह के प्रयत्न करता है। शायद उस से बात बन जाए। दोनों के बीच वैधानिक समझौता हो कर शर्तें तय हों तभी बहिन को ससुराल भेजना संभव हो सकता है।

पत्नी पर चरित्रहीनता का आरोप लगाना अत्यन्त गंभीर है, इस से पति मुसीबत में फँस सकता है।

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हिमांशु ने दिल्ली से पूछा है-

मेरी शादी को 7 महीने हुए हैं। मेरी वाइफ का किसी और के साथ चक्कर है, मेरे पास उसके सबूत हैं, और परसों ही उसके घर वाले उसको यहां से लड़ाई कर के ले गए हैं। मैं टाइम से पहले सेक्शन 9 हिन्दू मैरिज एक्ट के द्वारा उसके खिलाफ शिकायत करना चाहता हूँ सर प्लीज मेरी हेल्प’ कीजिये मुझे सेक्शन 9 हिन्दू मैरिज एक्ट के बारे में गाइड कीजिये।

समाधान-

हिन्दू मैरिज एक्ट की धारा 9 में यह उपबंध किया गया है कि पति या पत्नी में से कोई भी बिना किसी उचित कारण के दूसरे के साथ रहने से इन्कार करता है तो पीड़ित पक्षकार न्यायालय में आवेदन कर के दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन की डिक्री पारित करने की राहत की मांग कर सकता है।

इस मामले में पीड़ित व्यक्ति को आवेदन दे कर मात्र इतना साबित करना होता है कि उस के जीवन साथी ने बिना किसी उचित कारण से उस के साथ रहने से इन्कार कर दिया है और साथ नहीं रह रहा है। जब कि साथ रहने से इन्कार करने वाले साथी के पास इस आवेदन के बचाव में यह कथन है कि उस के पास अपने जीवन साथी का साथ छोड़ने और उस के साथ न रहने का उचित कारण है। लेकिन ऐसा उचित कारण साबित करने का दायित्व उस पक्षकार पर होता है जिस ने अपने साथी का साथ छोड़ा है।

आप के मामले में आप की पत्नी आप का साथ छोड़ कर गयी है तो आप धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 में न्यायालय के समक्ष अपना आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन पत्नी के बेवफा होने का कथन न करें। यदि आप ने ऐसा किया तो आप के द्वारा उस के चरित्र पर संदेह करना आप का साथ छोड़ने का मजबूत कारण बन जाएगा और धारा 9 के आवेदन में आप को कोई भी राहत प्राप्त नहीं हो सकेगी। आप को अपनी पत्नी से तलाक लेने के लिए विवाह के बाद उस का किसी अन्य व्यक्ति से यौन संबंध स्थापित करना साबित करना होगा। जो लगभग असंभव है और आप साबित नहीं कर सकेंगे। इस कारण से इस तरह की बात तभी कहें जब आप मजबूत साक्ष्य से पत्नी का दूसरे व्यक्ति के साथ विवाह के बाद यौन संबंध स्थापित करना साबित कर सकें।

सब से पहले दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन प्रस्तुत कराएँ…

father daughterसमस्या-

अनाम अग्रवाल ने होशंगाबाद मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे दोस्त की शादी जुलाई 2012 में हुई। उस की पत्नी का पहले से किसी और से अफेयर था। दोस्त की सास उन के घर में ज़्यादा इंटरफेयर करती थी। इसी बात में एक दिन उसकी पत्नी 12 जुलाई 2013 को अपने माँ बाप के घर चली गई। वहीं 3 महीने बाद सितम्बर 2013 में एक बेटे को जन्म दिया। दोस्त के घर वाले और दोस्त पत्नी को देखने भी गये और लाने की कहने पर भी पर दोस्त की सास ने नहीं लाने दिया। फिर करीब 6 महिने बाद दोस्त और उसकी पत्नी की बात शुरू हुई और वो अपने पति की शर्तों पर आने तो तैयार हो गई। दोस्त बच्चे के खातिर सब बातें भुला के उस को वापस ले आया। फिर अगस्त 2014 में राखी पर उसके मायके गई और वहाँ उसके एक्स-ब्वायफ्रेंड से मिलने के लिए रुक गई। मन से झूठी कहानी बना कर कह दिया कि मुझे ससुराल में पति मारते हैं और परेशान करते हैं, वह पति के साथ नहीं चाहती। मेरे दोस्त ने अपने बेटे के जन्म दिन पर उसे फ़ोन लगाया तो उस ने बेटे से नहीं मिलने दिया। दो दिन पहले ही उसकी बड़ी बहन के घर बेटे को ले कर चली गई और कहा कि यदि तुमने किसी को मेरे अफेयर का बताया तो मैं बेटे को जान से मार दूँगी। मेरे दोस्त ने उस की ये बातें अपने घर वालों को बता दीं लेकिन बदनामी के दर से उस के अफेयर का किसी को कुछ नहीं बता पा रहा है क्यों कि उसके पास कोई पक्का सबूत नहीं है। ना कोई कॉल रिकॉर्डिंग है। वह बहुत डिप्रेस्ड है किसी से कुछ बोल नहीं पा रहा है। वो क्या करे जिस से कि उस का एक वर्ष दो माह का बच्चा उसके पास आ जाए।

समाधान-

र्तमान परिस्थिति में किसी भी प्रकार से यह संभव नहीं है कि आप के मित्र का पुत्र उसे मिल जाए।

प के मित्र केवल संतान को चाहते हैं। लेकिन पत्नी को वह भी अपने पास नहीं रखना चाहते। पत्नी स्वयं भी नहीं आना चाहती है। स्थिति ऐसी है कि दोनों का संबंध टूटने की तरफ बढ़ रहा है। ऐसी अवस्था में आप के मित्र को तुरन्त दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए।

स के प्रतिवाद में पत्नी 406, 498 ए आईपीसी के अपराधों के लिए मिथ्या परिवाद प्रस्तुत कर सकती है और आप के मित्र कुछ परेशानी में पड़ सकते हैं। लेकिन केवल इन धाराओं में मुकदमा और गिरफ्तारी के भय से पुरुष कोई कार्यवाही नहीं करते हैं और देर हो जाती है। देर सबेर पत्नियाँ इन धाराओं के अंतर्गत कार्यवाही करती हैं तो तब बचाव करना भी कठिन हो जाता है। बचाव में सब से पहले धारा 9 का आवेदन प्रस्तुत करने की जरूरत पड़ती है। इस कारण यह अधिक अच्छा है कि धारा 9 का आवेदन तुरन्त प्रस्तुत किया जाए। उस का परिणाम देखा जाए। अभी आप के मित्र के पास पत्नी से विवाह विच्छेद का कोई आधार नहीं है। लेकिन यदि धारा 9 के आवेदन स्वीकार हो कर डिक्री मिल जाने के बाद भी एक वर्ष तक पत्नी और पति के बीच कोई संपर्क नहीं होता है तो उसी आधार पर विवाह विच्छेद भी हो सकता है। एक बार धारा 9 का आवेदन लंबित हो जाने पर पुत्र की अभिरक्षा के लिए आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।

दाम्पत्य अधिकारों की स्थापना की डिक्री की पालना न करना तलाक का आधार है।

divorceसमस्या-

जयपुर, राजस्थान से संजय यादव ने पूछा है-

मेरी पत्नी ने मुझ पर विवाह विच्छेद का मुकदमा कर रखा था, जिसे कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया है। मैं ने धारा 9 के तहत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना का मुकदमा दायर कर रखा था जो मेरे पक्ष में डिक्री हो गया है। मतलब मैं दोनों जगह से मुकदमा जीत गया। मेरी पत्नी के घर वाले मुझे उस से बात नहीं करने देते। अब मुझे क्या करना होगा जिससे वह वापस आ जाये। अगर वह हाईकोर्ट में अपील करती है तो क्या होगा?

समाधान-

प ने दोनों मुकदमों में जीत हासिल की है। लेकिन आप की पत्नी को उच्च न्यायालय में इन निर्णयों के विरुद्ध अपील करने का अधिकार है। यदि वह अपील करती है तो जिन आधारों पर वह अपील करेगी आप को उन्हें गलत सिद्ध करना होगा। इस कारण से आप को चाहिए कि अपील होने पर अपनी पैरवी के लिए अच्छा वकील मुकर्रर करें।

किसी भी व्यक्ति को कानून के माध्यम से किसी अन्य के साथ रहने को बाध्य नहीं किया जा सका है। इस कारण से दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के मुकदमें में जो डिक्री पारित की गई है उसे मानते हुए आप की पत्नी आप के साथ आ कर नहीं रहती है तो आप के पास एक ही उपाय यह है कि आप इस डिक्री की पालना न करने के कारण उस के विरुद्ध विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करने हेतु आवेदन कर सकते हैं, यह तलाक का अतिरिक्त आधार है। इस आधार पर आप को विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त हो सकती है। आप को इस से लाभ यही होगा कि आप विवाह विच्छेद के उपरान्त अपनी पत्नी के भरण पोषण के दायित्व से मुक्त हो सकते हैं।

यदि वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना संभव न रह गई हो तो सहमति से विवाह विच्छेद श्रेयस्कर है।

liveinसमस्या-

जयपुर, राजस्थान से राजीव ने पूछा है –

मेरी शादी 2009 में हुई थी,  मेरी पत्नी अजमेर की रहने वाली हैं। हम ने प्रेम विवाह किया था। मैं ने तो अपने घर पर सब कुछ बता दिया था पर वो लड़की अपने घर वालों से अपनी शादी के बारे में बता नहीं पाई। उसकी नौकरी जयपुर में थी इसलिए उसे मेरे साथ रहने में कोई दिक्कत नहीं हुई। मेरे घर वालों ने उसे कहा कि तुम्हारे घर वालों से बात करे तो उसने कहा की वो टाइम आने पर खुद कर लेगी। पर मेरे चाचा जी ने उसके पापा से बात की तो उन्होंने कहा की मेरी बड़ी बेटी की शादी नहीं हुई है उसकी शादी हो जाएगी तब इनकी शादी की बात खोल देंगे । जब उनकी बड़ी बेटी की शादी हो गई तब हम ने उन्हें शादी की बाद सब को बताने को कहा तो उन होने 2011 में लड़की को घर भेजने को कहा और बोले तीन चार दिन बाद आकर ले जाना। में जब लेने गया तो लड़की ने कहा की मेरी मम्मी की तबीयत खराब हैं बाद में आउंगी।  कुछ टाइम बाद मुझे तलाक का नोटिस मिला , मैं ने जयपुर में धारा 9 के तहत वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना का केस किया। लड़की के न आने पर उसका फैसला मेरे हक में कर दिया गया। अजमेर में जो तलाक का केस लड़की ने मुझ पर किया उसका फैसला भी मेरा हक में हो गया।  अब लड़की ने हाईकोर्ट में अजमेर वाले फैसले के खिलाफ अपील की है। में ये जानना चाहता हूँ की आगे क्या होगा? एक बात और कि मैं अनुसूचित जाति का हूँ और लड़की सामान्य वर्ग की है।  इस बात को लेकर उसके पापा ने मुझ पर जाति सूचक शब्दों से संबोधित किया था जिस का मैं ने उन पर मुकदमा किया था, पर वो मुकदमा मैं ने वापस ले लिया था।  क्या अब मैं उन पर मानहानि का केस कर सकता हूँ। मैं एक व्यापारी हूँ मेरा सारा काम मेरी पत्नी के नाम की फर्म से चलता है। वो मेरी बहिन के साथ भी उसकी फर्म में पार्टनर है, मतलब कि वो मेरा साथ हर कागजी कार्यवाही में हैं। इन केस की वजह से मैं अपने काम में भी बराबर ध्यान नहीं दे पा रहा। हमारे बच्चे नहीं हैं, वो २ बार गर्भवती हुई थी, पर उसका दोनों बार गर्भपात हो गया था। उसने अपने तलाक के नोटिस में क्रूरता का या मारपीट का इल्जाम नहीं लगाया। न ही पैसे की लेन देन का बस वो बिना शर्त तलाक चाहती है। पर क्यों ये नहीं बताया। बाद में उसने अपने बयानों में पेसे का लेनदेन और मेरे द्वारा माँ बाप को डरना धमकाना बताया पर वो दोनों केस में जीत चुका हूँ। में ये जानना चाहता हो की अब हाईकोर्ट में क्या हो सकता है?

समाधान-

प के वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के मामले में आप के पक्ष में डिक्री हो चुकी है। जिस की कोई अपील नहीं हुई है तथा डिक्री की पालना में आप की पत्नी आप के साथ आ कर नहीं रहने लगी है। इस तरह आप के पास विवाह विच्छेद के लिए आधार मौजूद है। पत्नी द्वारा किए गए विवाह विच्छेद के मामले में आवेदन निरस्त हो गया। उस ने उच्च न्यायालय में अपील की है। उस मुकदमे में क्या आधार आप की पत्नी ने तलाक के लिए लिया था, क्या तथ्य वर्णित किए थे तथा उस पर क्या साक्ष्य ली गई थी यह तो आप के मामले की पूरी पत्रावली देखे बिना कोई भी वकील या विधिवेत्ता नहीं बता सकता। लेकिन जो तथ्य यहाँ आप ने प्रकट किए हैं उन से प्रतीत होता है कि आप की पत्नी के पास विवाह विच्छेद के लिए कोई मजबूत आधार नहीं है और उच्च न्यायालय भी इस मामले में विवाह विच्छेद की डिक्री पारित नहीं करेगा।

दि आप की पत्नी आप के साथ रहना नहीं चाहती है और विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त करना चाहती है तो मेरे विचार से आप का संबंध अब बना नहीं रह सकता। जब संबंध के जल्दी ही पुनः स्थापित न होने की कोई संभावना न हो तो उसे बनाए रखने का कोई लाभ नहीं। वैसी स्थिति में सहमति से अलग हो जाना सब से श्रेयस्कर है। इस से दोनों पक्षों के बीच कोई कटुता उत्पन्न नहीं होती और कम से कम मानवीय संबंध बरकरार रह सकते हैं। आप अपनी पत्नी से खुल कर बात करें और पूछ लें कि क्या साथ रहने की तनिक भी संभावना है? यदि नहीं तो आप को पत्नी की इच्छा का सम्मान करते हुए सहमति से विवाह विच्छेद की डिक्री हेतु आवेदन करने का प्रस्ताव अपनी पत्नी के समक्ष रखना चाहिए। इस के साथ आप शर्त ये रख सकते हैं कि आप के जिन जिन व्यवासायों में वह भागीदार है उन से वह बिना कुछ लिए दिए रिटायर हो जाएगी तथा भविष्य के लिए कोई खर्चे की मांग नहीं करेगी न भविष्य में कभी खर्चे की मांग करेगी।

बेहतर है, आप की पत्नी आप से सिर्फ तलाक चाहती है।

समस्या-

जयपुर, राजस्थान से हेमन्त यादव ने पूछा है –

मैं लिव इन रिलेशनशिप के आधार पर एक लड़की के साथ करीब ३ साल रहा।  फिर हमने आर्य समाज में 2009२००९ में अन्तरजातीय विवाह कर लिया।  मेरे परिवार वालों ने इस शादी को स्वीकार लिया, पर पत्नी के घर वाले इस शादी को स्वीकार नहीं कर पाए।  हमारे कोई संतान नहीं है। अगस्त 2011 में पत्नी अपने मायके गई, उसके बाद वापस नहीं आई।  उसने तलाक का नोटिस भेजा।  मैं ने धारा 9 मे जयपुर मे केस किया, पत्नी के लगातार नहीं आने के कारण। 26 फरवरी 2013 को एक तरफ़ा कार्यवाही करते हुए धारा 9 की डिक्री मेरे हक़ में कर दी।  पत्नी ने तलाक धारा 13 में जो केस अजमेर में लगा रखा है उस में मैं ने धारा 9 की डिक्री पेश कर दी।   तब पत्नी ने जयपुर में धारा 9 की डिक्री को अपास्त करने तथा पुनः सुनवाई करने के लिए अर्जी लगा दी है। अब मुझे क्या करना चाहिए? क्या मैं पत्नी के पापा के विरुद्ध कोई केस कर सकता हूँ?  धारा 13. में दिनांक 12.03.2013 को निर्णय होना था, लेकिन पत्नी ने तलाक के आवेदन में संशोधन की अर्जी लगाई है और निर्णय को अटका दिया है।  अब मैं क्या कर सकता हूँ?

समाधान-

प अपनी पत्नी के साथ तीन वर्ष तक लिव-इन में रहे, उस के बाद विवाह किया जिसे भी तीन से अधिक वर्ष हो चुके हैं।  जिस में दो वर्ष आप साथ रहे हैं। पाँच वर्ष किसी महिला के साथ इस तरह के निकटतम संबंध में रहने के उपरान्त एक दूसरे की समझ इतनी विकसित हो जाती है। कि एक दूसरे के मन की थाह मिलने लगती है। आप की पत्नी मायके से वापस नहीं लौटी और उस ने तलाक का मुकदमा कर दिया। आप ने दाम्पत्य संबंधों की पुनर्स्थापना की एकतरफा डिक्री प्राप्त कर ली। तलाक के मुकदमे में भी आप दोनों को लगातार पेशियों पर जाना पड़ा होगा। वहाँ आप लोगों की मुलाकात भी होती होगी। आप को अपनी पत्नी के मन में झाँक कर देखना चाहिए था कि वापस लौटने की कोई गुंजाइश बची है या नहीं। इस उम्र की कोई भी विवाहित महिला आसानी से पिता के बहकावे में आ कर ऐसा कदम नहीं उठाती है। आप ने तलाक के मुकदमे में क्या आधार आप की पत्नी ने लिए हैं उन का उल्लेख नहीं किया है। जिस से हम मामले को ठीक से समझ सकते।

प को अब भी आप की पत्नी से व्यक्तिशः बात करनी चाहिए। यदि वह वास्तव में तलाक लेना चाहती है, आप के साथ नहीं रहना चाहती और उस पर कोई दबाव नहीं है, तो आप को तलाक ले लेना चाहिए। इस से बेहतर पति धर्म और क्या हो सकता है? यदि आप की पत्नी किसी तरह की अनिच्छा से आप के साथ आ कर रहने भी लगती है तो भी आप का पारिवारिक जीवन सुखी नहीं रह सकेगा। क्यों कि उस में आप के ससुराल वालों का दखल हो चुका है। अनेक बार ऐसा होता है कि इन परिस्थितियों में पत्नी वापस आ कर पति के साथ रहने लगती है लेकिन बहुत सी शर्तें लाद दी जाती हैं जो कभी पूरी नहीं की जा सकतीं। वह वापस चली जाती है बाद में जिस तरह का अविराम युद्ध चलता है उस में सब कुछ बरबाद हो जाता है। यह अच्छी बात है कि आप की पत्नी आप से सिर्फ तलाक चाहती है।

प के ससुर का कसूर सिर्फ इतना है कि उन्हों ने आप की पत्नी को बहकाया। लेकिन इस का कोई प्रमाण नहीं हो सकता।  यह सिर्फ आप का कथन है। आप से तलाक आप की पत्नी चाहती है। उस का समर्थन उस के पिता कर रहे हैं। इसे कोई दोष नहीं कहा जा सकता। यदि आप अपने ससुर पर कोई मुकदमा करेंगे तो वह पूरी तरह से मिथ्या होगा। यह मुकदमा करने के बाद फिर जवाब में जो मुकदमे आप के विरुद्ध होंगे उन का कोई हल आप नहीं कर सकेंगे।

प की पत्नी ने धारा-9 की डिक्री को अपास्त कराने को जो अर्जी दी है वह उस का अधिकार है और उस ने समय से उस के लिए अर्जी लगा दी है।  संभावना यह है कि वह अपास्त हो जाएगी और पत्नी को सुनवाई का अवसर मिल जाने पर दुबारा पारित होना असंभव लगता है। वैसे आप की पत्नी उस प्रकरण को उस अदालत में भी स्थानान्तरित करवा सकती है जिस में अभी तलाक का मुकदमा चल रहा है।  आज आप की पत्नी आप से तलाक चाहती है। मेरी राय है कि आप विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करवा कर स्वतंत्र हों और आगे का जीवन अपने हिसाब से जीने की इच्छा पैदा करें। वरना समय निकलता जाएगा और उस के साथ ही आप के जीवन का बहुमूल्य समय नष्ट होता चला जाएगा।

पत्नी और ससुर ने विवाह विच्छेद का मन बना लिया है तो सहमति से विवाह विच्छेद हेतु आवेदन कर दें।

समस्या-

गुजरात से शिशिर ने पूछा है –
मेरी शादी 13 एप्रिल 2012 को हुई, जुलाई में मेरी पत्नी अपने मायके चली गयी। और अब वापस नहीं आना चाहती।  मैंने उसे कई बार फोन किया तो बोलती है कि मैं आपकी माँ के साथ नही रहूंगी। मैं ने उसे हाँ कह दिया, फिर भी वो आने को तैयार नहीं है।  मैने उसे वापिस बात की तो बोलती है की मैं ने दूसरा तलाश कर लिया है।  ( हो सकता है कि उस ने ऐसा गुस्से में कहा हो) अभी उसके घर वाले मुझ पर विवाह विच्छेद के लिए दबाव डाल  रहे हैं।  इसी बीच मैं ने उसे दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन का नोटिस दे दिया है।  वे लोग मुकदमा करने की धमकी दे रहे हैं।  मुझे क्या करना चाहिए?  उसके पिताजी ने पूरे गावों मैं घूम कर मुझे बदनाम कर दिया कि लड़का ना मर्द है उस में दम नहीं है।  जबकि ऐसा नहीं है।  मैं यह  जानना चाहता हूँ कि क्या मैं उन लोगों पर इसके लिए मानहानि का केस कर सकता हूँ?

समाधान-

alimonyप का अनुमान है कि पत्नी ने गुस्से में कह दिया होगा कि मैं ने दूसरा तलाश कर लिया है।  इस से यह मैं भी यह अनुमान कर सकता हूँ कि आप दोनों के बीच कुछ तो ऐसा हुआ है जिस से आप की पत्नी गुस्सा है। इतना कि उस ने पिता को बताया कि अब वह आप के साथ नहीं रहेगी।  जिस की प्रतिक्रिया में उन्हों ने आप पर तलाक के लिए दबाव डालना आरंभ कर दिया और आप को बदनाम भी किया। आप की पत्नी और उस के पिता की ये गतिविधियाँ ऐसी हैं जिन से लगता है कि वे इस रिश्ते को बना कर रखना नहीं चाहते।

प ने दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिए नोटिस दिया है। आप की पत्नी ने उस का कोई उत्तर नहीं दिया है तो आप दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के लिए मुकदमा भी कर सकते हैं।  आप का विवाह 13 अप्रेल 2012 को ही हुआ है इस कारण से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन अभी 12 अप्रेल 2013 तक नहीं किया जा सकता है। मेरी राय में आप को दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के लिए मुकदमा कर देना चाहिए और अपनी पत्नी व उन के पिता को बता देना चाहिए कि आप ये मुकदमा इस लिए कर रहे हैं क्यों कि विवाह विच्छेद का मुकदमा करना विवाह की तिथि से एक वर्ष तक संभव नहीं है। यह भी बता दें कि आप की मंशा तो यह है कि पत्नी आप के साथ आ कर रहे।

दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना की डिक्री प्राप्त कर लेने के उपरान्त भी यदि आप की पत्नी आप के साथ आ कर नहीं रहती है तो उसे जबरन इस के लिए मनाया नहीं जा सकता।  वह नहीं आती है तो आप को इसी आधार पर विवाह विच्छेद करने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा। मुझे नहीं लगता कि आप की पत्नी और उस के पिता विवाह विच्छेद के लिए मन बना चुके हैं।  वे फर्जी मुकदमे करें और आप परेशान हों इस से अच्छा है आप आपसी सहमति से विवाह विच्छेद करने की अर्जी दे दें।

दि आप के ससुर ने आप की बदनामी की है और उस से आप की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची है और आप के पास इस के सबूत हैं तो आप मानहानि के लिए फौजदारी मुकदमा आप की पत्नी और उन के पिता के विरुद्ध कर सकते हैं। मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति हेतु दीवानी मुकदमा भी किया जा सकता है।  पर मुझे नहीं लगता कि उस से कुछ हासिल हो सकता है।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत करना ही श्रेयस्कर होगा।

समस्या-

मैं ने विशेष विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत अन्तर्जातीय विवाह किया है।  मेरी शादी को एक वर्ष हो चुका है।  मैं सरकारी नौकरी में हूँ और मेरी पत्नी पढ़ाई कर रही है।  शादी के दस माह बाद जब मेरी पत्नी अपने घर गई तो उस के बाद से उस के पिता और उस के घर वाले उसे मुझ से नहीं मिलने देते हैं और न ही बात करने देते हैं।  उसे कालेज भी नहीं जाने दे रहे हैं।  जिस से उस की एमबीबीएस की पढ़ाई का नुकसान हो रहा है।  उन्हों ने मेरी पत्नी से न्यायालय में परिवाद दर्ज करवा दिया है कि मेरी शादी जबरन डरा धमका कर की गई थी।  इस पर मैं ने परिवार न्यायालय में दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन प्रस्तुत किया।  लेकिन मुझे अब यह विश्वास नहीं रहा है कि वह मेरे पक्ष में बयान देगी।  मुझे यह भी लगता है कि उस ने जो परिवाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के यहाँ दर्ज करवाया है वह दबाव में लिखवाया गया होगा।  अब मुझे क्या करना चाहिए? क्या मैं उच्च न्यायालय में बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत कर सकता हूँ? क्या इस से मेरी नौकरीपर आँच आएगी?

-राम पाल सिंह, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश

समाधान-

प का प्रश्न गफ़लत पैदा कर रहा है।  आप ने कहा है कि हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत विशेष विवाह किया है।  यह सही नहीं है। विशेष विवाह केवल विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत जिला विवाह पंजीयक के समक्ष जो कि आम तौर पर जिला मजिस्ट्रेट या कलेक्टर होता है, संपन्न होता है।  इस का पंजीयन होता है और विवाह का प्रमाण पत्र प्राप्त होता है।  यह हिन्दू विवाह नहीं होता। खैर आप ने कोई विवाह किया हो उस का कोई न कोई प्रमाण पत्र तो आप के पास अवश्य होगा जो कि विवाह को प्रमाणित कर सके।  आप का कहना है कि आप की पत्नी स्वैच्छा से अपने मायके गई और फिर नहीं लौटी।  उस ने यह मुकदमा किया है कि आप ने उसे डरा-धमका कर यह विवाह संपन्न कराया है।  उस के द्वारा यह कहना भी इस बात का प्रमाण है कि आप दोनों का विवाह हुआ है।  इस बात को साबित करने का दायित्व आप की पत्नी का है कि उस का विवाह डरा-धमका कर दबाव से किया गया।

प ने पहले ही धारा-9 हिन्दू विवाह अधिनियम के अंतर्गत दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया है।  लेकिन यदि आप का विवाह विशेष विवाह अधिनियम के अन्तर्गत हुआ है तो यह आवेदन पोषणीय नहीं है और निरस्त हो जाएगा।   दाम्पत्य की पुनर्स्थापना के लिए आप को विशेष अधिनियम की धारा 22 के अन्तर्गत यह आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए था।  लेकिन यदि आप का विवाह एक हिन्दू विवाह है तो आप का आवेदन सही है।  परन्तु आप ने इस आवेदन के माध्यम से यह अवश्य ही प्रकट कर दिया है कि आप की पत्नी स्वैच्छा से ही आप के पास नहीं आ रही है।

दि आप को विश्वास हो कि आप की पत्नी को जबरन रोका गया है और आप के विरुद्ध जबरन ही मुकदमा दर्ज करवाया गया है तो आप ऐसा कर सकते हैं।  आप का ऐसा सोचना गलत भी प्रतीत नहीं होता।  क्यों कि आप की पत्नी को जबरन नहीं रोका गया होता तो वह अवश्य ही अपनी एमबीबीएस की पढ़ाई का नुकसान नहीं करती।  मेरे विचार में आप को बंदीप्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत कर देनी चाहिए।  इस से आप के मामले के बहुत से तथ्य स्पष्ट हो जाएंगे।  या तो इस के माध्यम से आप को राहत प्राप्त हो जाएगी और या फिर समस्या की तस्वीर को स्पष्ट देखने के बीच जो बादल छाए हुए हैं वे छँट जाएंगे।  यह एक पारिवारिक विवाद है और इस विवाद से आप की नौकरी पर कोई आँच तब तक नहीं आएगी। जब तक कि आप की किसी अपराधिक मामले में गिरफ्तारी नहीं हो जाती है और आप 24 घंटों से अधिक हिरासत में नहीं रहते हैं।  फिर भी आप को केवल सेवा से निलंबित किया जा सकता है सेवा से हटाया नहीं जा सकता।

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