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मुकदमे के पक्षकार की मृत्यु पर वादी, प्रार्थी, अपीलार्थी का दायित्व …

समस्या-

अनिल ने पुनसावा, खंडवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या यह हे कि मेरे दादाजी ने मेरे पिताजी को वसीयत मे सँपूर्ण सँपत्ति का वारिस बनाया। लेकिन 2016 मेरे पिताजी के खिलाफ उनकी बहन, भाई तथा भाँजे ने न्यायालय के फैसले के विरोध में सत्र न्यायालय मे केस चला रखा है। लेकिन मेरे पिताजी की मौत 2017 मे हो गई। अब मैं दुविधा आ गया हूं कि बिना केस जीते मेरा नामांतरण केसे होगा? क्या मुझे फिर केस लगाना पड़ेगा? क्या करूँ?

समाधान-

प के द्वारा दिए गए विवरण से लगता है कोई मुकदमा आप के पिताजी या उन के बहन, भाई तथा भांजे ने किया था जिस में निर्णय हो गया और आप के पिता की बहन, भाई और भांजे ने जिला न्यायालय में उस की अपील कर रखी है जिस के दौरान ही आप के पिताजी का देहान्त हो गया।

इस तरह किसी भी मुकदमे में किसी पक्षकार का देहान्त हो जाने पर प्रक्रिया का उल्लेख दीवानी प्रक्रिया संहिता के आदेश 22 में वर्णित है।  किसी दीवानी वाद में मुकदमे को दायर करने वाले वादी, अपील में अपीलार्थी और आवेदन में प्रार्थी का यह दायित्व  है कि वह मरने वले पक्षकार की सूचना न्यायालय को दे और आवेदन करे कि उस के विधिक प्रतिनिथियों को रिकार्ड पर ले जिस से मुकदमा आगे चले।

आप के मुकदमे में यदि अपील आप के पिता की थी तो आप का दायित्व था कि आप उन के देहान्त के 90 दिनों में इस तरह का आवेदन प्रस्तुत करते। अन्यथा वह अपील एबेट हो कर खारिज हो जाती। आप के विवरण के अनुसार यह अपील आप के पिता के विरुद्ध अन्य अपीलार्थियों ने की थी। इस स्थिति में अपीलार्थियों का दायित्व है कि वे 90 दिनों में विधिक प्रतिनिधियों को रिकार्ड पर लिए जाने का आवेदन करें। यदि वे आवेदन नहीं करते हैं और आप के पिता को अनुपस्थित मान कर कोई निर्णय किया जाता है तो वह आप पर प्रभावी नहीं होगा। क्यों कि वह अपील ही एबेट हो चुकी होगी। लेकिन आप को तुरन्त अपने पिता के वकील से मिल कर उसे कहना चाहिए कि वह अदालत को आप के पिता के देहान्त की सूचना दे दे। जरूरत हो तो आप की ओर से विधिक प्रतिनिधि रिकार्ड पर लेने का आवेदन प्रस्तुत करे।

संपत्ति के बँटवारे के लिए जिला न्यायालय में वाद संस्थित करें।

समस्या-

रेणु भदोरिया ने अहमदाबाद गुजरात से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

म उत्तर प्रदेश के जसमई गाँव के निवासी थे पिछले 25 सालों से हम अहमदाबाद में निवास कर रहे हैं। हमारे गांव में हमारी पुश्तैनी ज़मीन है घर बनाने की उस में से कुछ ज़मीन पर हमारे परिवार के लोगों ने कब्जा कर लिया था, और हमारे घर के निकालने का रास्ता सिर्फ़ 2.5 फुट छोड़कर अपना निर्माण कर लिया और वो लोग कहते है हमने तुम्हारे ज़मीन पर कब्जा नहीं किया। हमारी घर की ज़मीन का बटवारा प्रधान द्वारा किया गया था, जो बाद में प्रतिपक्ष वालों ने मानने से इनकार कर दिया। इसके अलावा परिवार के दूसरे लोगों द्वारा भी हमारी ज़मीन निर्माण कर लिया गया है। अब मैं चाहती हूँ कि बिना लड़ाई झगड़े के हमें हमारी ज़मीन क़ानून के नियम के हिसाब से मिल जाए। मैं सरकारी बटवारा करना चाहती हूँ। उसके लिए हमें क्या करना पड़ेगा?

समाधान-

प का कहना सही है आप की संयुक्त संपत्ति का बँटवारा नहीं हुआ है। हमारे यहाँ ऐसे ही चलता रहता है। परिवार के कुछ लोग गाँव से बाहर चले जाते हैं। जो रह जाते हैं वे आपस में संपत्ति के अधिक से अधिक भाग पर कब्जा बनाए रखने की कोशिश करते हैं। जब बाहर जाने वाला बंधु वापस आता है तो वह फिर बंटवारे की बात करता है। लेकिन संपत्ति का बंटवारा बिना अदालत जाए नहीं हो पाता।

आप बंटवारा कराना चाहती हैं तो आप को जिला न्यायाधीश के न्यायालय में बंटवारे का वाद प्रस्तुत करना होगा। संयुक्त संपत्ति के सभी स्वामी उस वाद में पक्षकार बनेंगे। अदालत सभी पक्षों को सुन कर बंटवारा कर देगा। यह बंटवारा स्थाई होगा। इस के लिए आप जिला मुख्यालय के किसी दीवानी  मामलों के वकील से मिलें और उस की सहायता से संपत्ति के विभाजन तथा अपने हिस्से का अलग कब्जा दिलाए जाने का वाद संस्थित करें।

पुश्तैनी संपत्ति में अधिकार से वंचित करने के विरुद्ध वाद।

समस्या-

अखिल ने रायपुर छत्तीसगढ़ से पूछा है-rp_gavel5.jpg

कृपया हमारी शंका  का समाधान करें? क्या (1) यदि संपत्ति दादाजी के पिता की संपत्ति को बेचकर खऱीदी गयी थी तब वह संपत्ति पुश्तैनी मानी जायेगी। जिस पर हम सभी भाई बहनों का बराबर-बराबर अधिकार होगा (2) यदि संपत्ति  दादाजी ने अपनी कमाई से अर्जित की है तो क्या उस पर पिता का अधिकार है और वह चाहें तो उस संपत्ति को किसी को भी दे सकते हैं।

आशीष त्रिपाठी ने सिंगरौली मध्यप्रदेश से पूछा है-

क्या पिता के मृत्यु के पश्चात उस पुश्तैनी संपत्ति पर दावा किया जा सकता है जो पिता ने अन्य लोगों के नाम रजिस्ट्री कर चुका हो? यदि हाँ ! तो किस अधिनियम के तहत य

समाधान-

कोई भी संपत्ति पुश्तैनी या सहदायिक तभी मानी जाएगी जब कि वह 17 जून 1956 के पूर्व किसी पुरुष हिन्दू को अपने पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। यदि आप के दादा जी के पिता के पास वह संपत्ति उक्त तिथि से पूर्व उत्तराधिकार में आयी थी तो पुश्तैनी थी और उसे विक्रय कर के खरीदी गयी संपत्ति भी पुश्तैनी होगी और हर संतान का जन्म से उस में अधिकार होगा।

यदि संपत्ति दादा जी ने अपनी कमाई से खरीदी है और उन का देहान्त 17 जून 1956 के पूर्व हो गया था तो आप के पिता के पास वह संपत्ति पुश्तैनी होगी और उस में आप सभी भाई बहनों का भी अधिकार होगा। आप के पिता आप को उस अधिकार से वंचित कर के संपत्ति का विक्रय नहीं कर सकते थे। इस विक्रय को विक्रय की तिथि से 12 वर्ष की अवधि (मियाद) में दीवानी वाद कर के निरस्त कराया जा सकता है। यदि विक्रय के समय आप नाबालिग थे तो आप बालिग होने की तिथि से मियाद में ऐसा दावा कर सकते हैं। यदि आप को इस विक्रय की जानकारी न थी तो आप को जानकारी प्राप्त होने से मियाद में ऐसा वाद संस्थित कर सकते हैं।

किसी भी व्यक्ति को पुश्तैनी संपत्ति में उस के अधिकार से वंचित किए जाने के वि्रुद्ध वाद संस्थित करने की मियाद 12 वर्ष है। इसे मियाद अधिनियम में मिलने वाली छूटों के आधार पर कुछ और बढ़ाया जा सकता है। इस मामले में आप को किसी स्थानीय वकील से सलाह करना चाहिए।

बहुत आसान है झूठ से किसी का अपमान और बदनामी करना।

defamationसमस्या-

अंकित राय ने तहसील मुंगावली, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

म लोग किसान हैं। मेरे पिताजी अपने खेत पर पानी के लिए दिनांक 26/05/2015 को कुआ खुदवा रहे थे को। हमारा एक पड़ोसी है ओर वह लोकल पत्रकार है। उसने तहसील को अवैध उत्खनन करने की झूठी शिकायत कर दी। जिस के चलते एसडीएम ने कार्यवाही की तो उस पत्रकार ने वहाँ के लोकल न्यूज़ पेपर मे झूठी घटना को बड़ा चड़ा कर छापा है। जब कि जो खबर पेपर मे छपी है। वैसा कुछ भी नहीं है। और मेरे पास इस के सत्यापित दस्तावेज भी हैं और जिस दिन जो खबर पेपर मे छपी थी उस दिन का पेपर भी मेरे पास है। यदि मै उस पत्रकार के खिलाफ कोर्ट में एक आबेदन दूँ। जो खबर छपी है वह झूठी है। तो उस पत्रकार के खिलाफ कोर्ट की तरफ से एक्शन होगा?

समाधान-

खबारों में रोज ही अनेक मिथ्या खबरें छपती हैं और कोई कार्यवाही नहीं होती। अगले दिन फिर कुछ खबरें झूठी छप जाती हैं। यदि अदालतें इस के खिलाफ कार्यवाही करने लगतीं तो अखबारों के लिए इस तरह की झूठी खबरें छापना आसान नहीं होता। यदि आप समझते हैं कि इस झूठी खबर से आप का अपमान हुआ है और आप की बदनामी हुई है तो आप उस इलाके के थाने पर क्षेत्राधिकार रखने वाले मजिस्ट्रेट के न्यायालय में अपने अपमान और बदनामी के लिए परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं क्यों कि किसी व्यक्ति का अपमान करना और मिथ्या बदनामी करना अपराध है जो धारा 500 आईपीसी के अंतर्गत दंडनीय है।

लेकिन यह एक संज्ञेय अपराध नहीं है जिस पर पुलिस स्वयं कार्यवाही कर सकती हो। इस के लिए आप को स्वयं न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत करना होगा। अपने और गवाहों के बयान कराने होंगे। यदि मजिस्ट्रेट को लगता है कि प्रसंज्ञान लेने लायक मामला है तो वह प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्तों के विरुद्ध समन जारी करेगा। उस के बाद सुनवाई हो कर यदि पाया गया कि आप द्वारा लगाया गया आरोप सिद्ध होता है तो अभियुक्तों को दोष सिद्ध पाया जाने पर उन्हें दंडित किया जा सकता है।

ब तक न्यायालय द्वारा प्रसंज्ञान नहीं लिया जाता है तब तक अभियुक्त न्यायालय में नहीं आएंगे। लेकिन आप को तो मुकदमे का जब तक निपटारा नहीं होता न्यायालय में हर पेशी पर उपस्थित होना पड़ेगा। यदि आप किसी पेशी पर उपस्थित होने की स्थिति में नहीं हैं तो अपने वकील से उपस्थिति को माफ करवाने के लिए आवेदन प्रस्तुत कराना होगा। यह प्रक्रिया परिवादी के लिए इतनी तकलीफदेह है कि अक्सर लोग इस तरह का परिवाद ही नहीं करते। यही कारण है कि इस तरह झूठ फैला कर किसी का भी अपमान करना, बदनामी करना आसान हो गया है।

प चाहते हैं कि इस मामले में कार्यवाही की जाए तो आप पहले अखबार के संपादक, प्रकाशक और मुद्रक को नोटिस दें कि उन्हों ने गलत खबर छापी है जिस से आप अपमानित हुए हैं और आपकी बदनामी हुई है। यदि वे इस खबर का स्पष्टीकरण प्रकाशित करते हैं और आप को उचित प्रकार से क्षतिपूर्ति अदा करते हैं तो ठीक अन्यथा आप फौजदारी और दीवानी कार्यवाही करेंगे। इस नोटिस का समय गुजरने तक भी यदि अखबार आप को उचित प्रकार से संतुष्ट नहीं करते हैं तो आप ऐसा परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय को प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के साथ ही आप अपने अपमान और बदनामी करने के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद भी कर सकते हैं। लेकिन दीवानी वाद में आप जितनी क्षतिपूर्ति मांगेंगे उस के हिसाब से आप को न्यायालय की फीस भी अदा करनी होगी।

स्वयं को भूमि व मकान का स्वामी घोषित करने हेतु घोषणा की डिक्री के लिए वाद संस्थित करें।

rp_house1.jpgसमस्या-

शैलेन्द्र ने भंडारी फाटक, दतिया मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ने एक मकान शिवहरे जी से २७-६-२०१५ को रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के माध्यम से ख़रीदा। शिवहरे ने यह मकान एक सिंधी से रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के माध्यम से १२-११-२००९ में ख़रीदा था। जब सिंधी ने शिवहरे को बेचा था तो उसके पास रजिस्ट्री नहीं थी क्यों कि वह पाकिस्तान के बटवारे के समय हिंदुस्तान के दतिया जिले में आकर बस गया था १९४८ में। सिंधी १९४८ से २००९ तक उसी मकान में रहा और २००९ में शिवहरे को बेच दिया। अब निजुल ऑफिस वाले मुझे नोटिस देकर परेशान कर रहे है कि यह मकान सरकारी है। क्योकि सिंधी ने गलत बेचा था शिवहरे को और वर्तमान में आप के पास यह मकान है। जब सिन्धी दतिया में आये थे जो सरकारी जमीन खाली पड़ी थी। उस में बस गये थे बह जमीन १.१..१९५० में पीडल्बूडी के हवाले हो गयी थी और पीडब्लूडी ने १९७५ तक किराया लिया बाद में संपत्ति डेड घोषित कर दी और किराया लेना बंद कर किया। क्या मैं गलत हूँ? जब कि मैं ने खरीदी से पहले पेपर में न्यूज़ पब्लिश करायी थी कोई ऑब्जेक्शन नहीं आया तो मैं ने रजिस्ट्री कराई। मैं ने मकान बनवाने से पहले नगर पालिका से परमिशन ली थी। यह मकान नगरपालिका क्षेत्र में आता है।

समाधान-

प के पास मकान के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री है जो कि आप ने अखबार में आपत्तियाँ मांगने के बाद खरीदा है। इस तरह आप बोनाफाइड परचेजर हैं आप को किसी तरह की हानि नहीं होगी।

प कह रहे हैं कि पीडब्लूडी ने उक्त भूमि को डेड घोषित कर दिया। ऐसी घोषणा का कोई दस्तावेज हो तो संभाल कर रखें। 1975 से आज तक उस भूमि पर किसी का कब्जा नहीं है और इस अवधि को 40 वर्ष हो चुके हैं। ऐसे में मियाद अधिनियम के अन्तर्गत सरकार जमीन को आप से नहीं वापस नहीं ले सकती। नोटिस मिलता है तो उस का उत्तर दें।

बेहतर हो कि आप किसी स्थानीय वकील को अपने दस्तावेज दिखा कर उक्त भूमि और उस पर बने मकान का स्वयं को स्वामी घोषित कराने हेतु दीवानी वाद प्रस्तुत कर घोषणा की डिक्री प्राप्त करें।

मकान के हिस्से के कब्जे के लिए दीवानी वाद संस्थित करें।

rp_judgement.jpgसमस्या-

मुन्नी लाल जायसवाल ने वाराणसी, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे तीन भाई हैं। मेरे पिता जी की जो संपत्ति थी सबके नाम से वसीयत है। मेरे पिता जी की मृत्यु सन् 2008 मैं हुई है। मेरे तीन बेटे और दो बेटियाँ हैं। दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है। मैं ने बड़े लड़के की शादी सन् 2009 में कराई थी। तब से वो हमसे अलग रहता था। उस बीच छोटी लड़की की शादी मेरे दोनों बेटो ने मिल कर कराई थी। मेरा बार लड़का फऱवरी 2015 को मेरे घर में जबरदस्ती पुलिस की सहायता से घर में घुस कर रहने लगा और कोई खर्च भी सन् 2009 से नहीं दे रहा है और जब से आया है तब से मारता और गाली गलौज करता है थाने पर शिक़ायत करने पर कोई सुनवाई नहीं होती। पुलिस वाले उस के परिचित हैं उसे घर से निकालना चाहता हूँ, मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान

ब आप का बड़ा पुत्र जबरन घर में घुसा तभी आप को पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए थी। यदि पुलिस वाले नहीं सुन रहे थे तो तुरन्त अदालत में परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए था। इस तरह जब भी कोई संपत्ति के संबंध में जबरन कब्जा करने या हटाने संबंधी घटना हो पुलिस न सुने तो वकील की मदद लेते हुए धारा 145, 146 में इलाके के एसडीएम में आवेदन करना चाहिए। यह कार्यवाही घटना होने के दो माह में की जा सकती है। लेकिन आप ने वह समय गवाँ दिया है।

संपति आप चारों भाइयों के नाम वसीयत है। निश्चित रूप से अभी हिस्से नहीं हुए होंगे। इस तरह आप चारों मालिक हैं। आप के किसी बेटे या बेटी का आप के जीवित रहते मकान पर कोई हक नहीं है। आप को चाहिए कि इस तरह बेटा जो जबरन मकान मे जबरन घुस कर रहने लगा है उस से मकान के जिस हिस्से में वह रहता है उस का कब्जा लेने के लिए चारों भाइयों की ओर से कब्जा प्राप्त करने का दावा करें।

दि किसी तरह का झगड़ा या मारपीट करता है तो उस का कायदा यही है कि पहले आप पुलिस में रिपोर्ट लिखाने का प्रयत्न करें। जरूरी नहीं कि हमेशा पुलिस वाले उसी की सुनें। यदि पुलिस नहीं सुनती है तो आप न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उस के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराएँ। आप को वकील की सहायता की जरुरत है इस कारण आप को कोई अच्छा वकील कर लेना चाहिए।

कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करें।

rp_gavel-1.pngसमस्या-

मोहम्मद शाहिद ने मिर्जापुर, उत्तर प्रदेश से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरी सौतेली माँ मेरे खरीदे हुए मकान में कब्जेदार है। उस ने मेरे और मेरे भाई के खिलाफ एसपी के यहाँ आवेदन दिया है कि दोनों भाई ने घर में घुस कर मुझे गाली दी और जान से मारने की धमकी दी। कृपया कानूनी उपाय बताएँ।

समाधान

प ने अपनी समस्या का अधिक विवरण नहीं दिया है। यदि आप की सौतेली माँ की शिकायत झूठी है तो पुलिस जाँच कर के उस शिकायत का निस्तारण कर देगी। यदि आप के विरुद्ध किसी तरह का मुकदमा बनाती है तो आपको न्यायालय में अपना बचाव करना पड़ेगा।

प के खरीदे हुए मकान में आप की सौतेली माँ किस तरह कब्जे में आयी यह आप ने नहीं बताया। पर यदि वह कब्जे में है और कब्जा नहीं छोड़ना चाहती है तो जबरन तो उसे मकान से निकाला नहीं जा सकता। आप को मकान पर कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित करना होगा। न्यायालय से कब्जे की डिक्री प्राप्त करने के बाद उस के निष्पादन में ही न्यायालय के माध्यम से उस का कब्जा हटवा कर खुद कब्जा प्राप्त किया जा सकता है।

अपने हिस्से की संपत्ति के लिए बंटवारे का वाद संस्थित करें

partition of propertyसमस्या

डी डी ने सोनगाँव, नैनीताल, उत्तराखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता की मृत्यु (13 ऑगस्त) को हुई, उसके बाद मेरे परिवार मैं हम 3 बहनें, मम्मी और बड़ा भाई है। भाई को पिता के आश्रित के रूप में नौकरी प्राप्त हो गई है। मेरी 2 बड़ी बहने विवाहित हैं। और मेरी आयु भी 20 वर्ष से अधिक है। बात संपत्ति के बटवारे की है, भाई ने संपत्ति को केवल अपने नाम पे कर लिया है। वह भी चुपके से,बिना हमें कोई जानकारी दिए। लेकिन मैं चाहती हूँ कि संपत्ति का समान बंटवारा कानून के अनुसार हो। उस के लिए मुझे क्या करना होगा?

समाधान-

प के भाई यदि आप के पिता ने उन के नाम वसीयत न कर दी हो तो किसी भी प्रकार से संपत्ति को केवल अपने नाम आप तीनों बहनों और माँ की सहमति के बिना नहीं करवा सकते। ऐसा केवल वे तभी कर सकते हैं जब कि फर्जी दस्तावेज बना कर प्रस्तुत कर दें।

पिता की संपत्ति किस प्रकार की है यह जानकारी आप ने नहीं दी है। आप के राज्य में कृषि भूमि पर उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी है और उस में विवाहित बहनों को कृषि भूमि में प्रथम श्रेणी का उत्तराधिकारी नहीं माना है लेकिन पत्नी, पुत्र व अविवाहित पुत्री को समान अधिकार प्राप्त हुआ है। यदि आप की संपत्ति कृषि भूमि है तो आप का हिस्सा उस में 1/3 तथा आप की माता जी का हिस्सा भी 1/3 है। यदि अन्य संपत्ति है तो उस में आप की दोनों विवाहित बहनों सहित सभी का 1/5-1/5 हिस्सा है।

ब किसी आश्रित को नौकरी दी जाती है तो यह वचन उसे देना होता है कि वह पिता के आश्रितों का भरण पोषण करेगा तथा उन के हितों की रक्षा करेगा। आप अपने भाई को कह सकती हैं कि यदि उस ने सारी संपत्ति का कानून के अनुसार बंटवारा नहीं किया तो आप उस के विभाग को शिकायत कर सकती हैं जिस से उस की नौकरी जा सकती है।

दि संपत्ति केवल कृषि भूमि है तो उस के बंटवारे के लिए आप राजस्व न्यायालय में बंटवारे का वाद संस्थित कर सकती हैं यदि आप के पिता की संपत्ति कृषि भूमि और दूसरी संपत्तियाँ मकान आदि हैं तो आप को बंटवारे का वाद दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा। वाद प्रस्तुत करने के साथ ही आप अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर के पिता की संपत्ति को विक्रय करने, उसे खुर्द बुर्द करने, उस का स्वामित्व या कब्जा हस्तान्तरित करने पर रोक लगाने के लिए प्रार्थना कर सकती हैं जिस पर अस्थाई निषेधाज्ञा का आदेश पारित किया जा सकता है।

गलत निर्माण को रोकने या हटाने के लिए निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत करें

House demolishingसमस्या-

गोविन्द गौतम ने खजुराहो, छतरपुर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

किसी व्यक्ति द्वारा जबरन मेरी ज़मीन पर छत का छज्जा निकाला जाता है तो ऐसी स्थिति में मैं क्या कर सकता हूँ? पहले से पडौसी के पास दो दो दरवाज़े हैं फिर भी जबरन हमारी जमीन की तरफ तीसरा दरवाज़ा करना उस जगह दूसरे की ज़मीन आती है, वह भी परेशान है तो हम ऐसी स्थिति में क्या करें?

समाधान-

गरीय क्षेत्र में किसी भी आवासीय भूखंड पर निर्माण नगरपालिका या नगर विकास न्यास से बिना मानचित्र स्वीकृत कराए तथा अनुमति प्राप्त किए बिना नहीं किया जा सकता। नगर पालिका इस तरह के निर्माण कार्य की स्वीकृति प्रदान नहीं करती है जिस से पड़ौसियों को परेशानी हो या उन के अधिकारों का अतिक्रमण हो। ग्रामीण क्षेत्र में इस तरह का निर्माण किया जाए तो ग्राम पंचायत इसे रोक सकती है। इस तरह के निर्माण के विरुद्ध सब से आसान तरीका यह है कि जिसे परेशानी हो रही है उसे नगरपालिका अथवा ग्राम पंचायत को शिकायत करनी चाहिए। नगर और ग्राम में व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार इन संस्थाओँ को उचित कार्यवाही करनी चाहिए। लेकिन समस्या यह है कि इस तरह के निर्माण नगर पालिका और ग्राम पंचायत द्वारा उचित कार्यवाही समय पर नहीं करने के कारण ही होते हैं।

दि ऐसा कोई भी निर्माण होने की आशंका हो तो जिस से किसी को परेशानी हो रही हो या फिर किसी के अधिकारों का अतिक्रमण होने वाला हो तो वह सीधे न्यायालय में अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए वाद प्रस्तुत कर उसी वाद में अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर सकता है और न्यायालय से ऐसे कार्य को रोके जाने के लिए आदेश जारी करा सकता है। यदि ऐसे निर्माण का कोई भाग या निर्माण पूरा कर लिया गया हो तो आज्ञात्मक निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए जिस में यह राहत चाही गई हो कि इस तरह का निर्माण वैध नहीं है और इस से आवेदक के अधिकारों का अतिक्रमण हो रहा है। न्यायालय ऐसे मामलों में हो चुके निर्माण को हटाने रास्ते, दरवाजे, खिड़की और पनाले को बन्द करने का आज्ञात्मक आदेश दे सकती है और उस आदेश का पालन करवा सकती है।

दुर्भावना पूर्ण अभियोजन के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त करने हेतु दीवानी वाद करना होगा।

court-logoसमस्या-

रोहित ने करनाल, हरियाणा से पूछा है-+

मुझ पर धारा 376 भा.दंड संहिता का मुकदमा था। मैं केस जीत गया हूँ। मुझे अब क्या करना चाहिए जिस से मुझ पर गलत मुकदमा चलाने वालो को दंडित करवा सकूँ और जो नुकसान हुआ है उस की भरपाई कर सकूं?

समाधान-

प इस मुकदमे में निर्दोष साबित हो गए हैं यह बड़ी बात और बड़ी राहत है। यदि आप चाहते हैं कि जिन लोगों ने आप के विरुद्ध मुकदमा किया है तो आप को निर्दोष प्रमाणित करने वाली अदालत को ही यह आवेदन करना चाहिए कि वह पुलिस को निर्देशित करे कि जिन लोगों ने आप के विरुद्ध दुर्भावना से शिकायत की थी उन के विरुद्ध पुलिस अभियोजन चलाए। पर यह तभी संभव है जब आप पूरी तरह निर्दोष प्रमाणित हुए हों। यदि संदेह का लाभ मिलने के कारण या फिर किसी अन्य तकनीकी कारण से आप को बरी किया गया है तो शिकायत कर्ताओं के विरुद्ध अभियोजन चलाना संभव नहीं हो सकेगा।

प अपना हर्जा वसूल करना चाहते हैं तो आप को शिकायत करने वालों को दुर्भावना पूर्ण अभियोजन चलाने के फलस्वरूप हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए स्पष्ट रूप से नोटिस देना चाहिए कि आप कितना रुपया क्षतिपूर्ति के रूप में चाहते हैं। इस नोटिस का कोई उत्तर न आने पर आप को दुर्भावना पूर्ण अभियोजन के लिए क्षतिपूर्ति प्राप्त करने हेतु दीवानी वाद करना होगा जिस पर आप को न्याय शुल्क भी अदा करना होगा।

न दोनों ही मामलों में आप को अपने मामले में हुए निर्णय की प्रति ले कर अपने वकील से सलाह लेनी चाहिए और उस की सलाह के अनुरूप काम करना चाहिए। क्यों कि एक वकील उस निर्णय को पढ़ कर ही तय कर सकता है कि आप को इन दोनों मामलों में सफलता मिलेगी या नहीं।

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