Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अनुबंध अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

अज्ञात वाहन से दुर्घटना होने पर मुआवजे की व्यवस्था – सोलेशियम फंड

समस्या-motor accident

सूरज कुमार ने मंडावा, जिला झुंझुनूं से पूछा है-

मेरे रिश्तेदार की अज्ञात वाहन से पिलानी में दुर्घटन हो कर मौके पर मृत्‍यु हो गई क्‍या ऐसी स्थिति में क्‍लेम मिल सकता है?

 

 

समाधान-

किसी भी अज्ञात वाहन से होने वाली दुर्घटना में मारे जाने वाले व्यक्ति के आश्रितों व गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को सहायता प्रदान करने के लिए मोटर वाहन अधिनियम 1988 के अन्तर्गत सोलेशियम फंड की व्यवस्था की गयी है। इस अधिनियम की धारा 161 से 163 तक में इस फंड की स्थापना और इस के अंतर्गत मुआवजा देने के उपबंध किए गए हैं। इस योजना के अंतर्गत मृतक के आश्रितों को 25 हजार रुपये तथा गम्भीर रूप से घायल व्यक्ति को 12,500 रुपये की क्षतिपूर्ति देने की व्यवस्था की गयी है।

यह मुआवजा प्राप्त करने के लिए प्रत्येक जिले के कलेक्टर के कार्यालय में व्यवस्था है। वहाँ इस के लिए आवेदन प्राप्त किए जाते हैं। आवेदन के साथ प्रथम सूचना रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, चोट प्रतिवेदन, मर्ग सूचना, पंचनामा आदि दस्तावेजों की जरूरत होती है। सभी आवश्यक दस्तावेजों के साथ आवेदन करने पर मुआवजा प्राप्त हो सकता है।

वाहन बेचना और कब्जा देना साबित करना होगा।

motor accidentसमस्या-

रविन्द्रसिंह ने जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मैं ने एक मोटरवाहन बेचा जिस का बीमा नहीं था। जिसने वाहन खरीदा उस ने स्टाम्प पर लिखित में खरीदना और कब्जा प्राप्त करना दे रखा है। 15 दिन बाद वाहन से दुर्घटना हो गयी। एक व्यक्ति को फ्रेक्चर हुआ है। वाहन अभी तक ट्रान्सफर नहीं हुआ था और बीमा भी नहीं कराया था। इस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो गयी है।

समाधान-

प इस बात से चिन्तित हैं कि आप दुर्घटना के दिन तक वाहन के पंजीकृत स्वामी थे इस कारण से आप पर क्षतिपूर्ति का दायित्व आएगा।

मोटर यान दुर्घटना में प्राथमिक दायित्व चालक और वाहन स्वामी का होता है, यदि दायित्व बीमित हों तो बीमा कंपनी इन दायित्वों को वहन कर लेती है।

आप के मामले में पुलिस वाहन के नंबर से आप तक पहुँचेगी और जानना चाहेगी कि दुर्धटना के समय वाहन कौन चला रहा था। आप उसे बता दीजिए कि यह आप नहीं बता सकते क्यों कि आप वाहन को बेच चुके थे। इस के साथ ही आप के पास वाहन प्राप्ति की जो रसीद स्टाम्प पर आप के पास है उस की स्वहस्ताक्षरित फोटो प्रति पुलिस को दे दें।

इस के बाद आप के विरुद्ध कोई मोटर दुर्घटना दावा होता है तो आप को वाहन का विक्रय और कब्जा हस्तान्तरित होना साबित करना होगा। आप वहाँ आप यह जवाब दे सकते हैं कि दुर्घटना से आप का कोई लेना देना नहीं था, आप पहले ही वाहन बेच चुके थे। स्टाम्प पर उपलब्ध रसीद के माध्यम से इसे साबित भी कर सकते हैं। इस से आप पर आ रहा दायित्व वाहन क्रेता पर पहुँच जाएगा।

मोटर यान दुर्घटना क्षतिपूर्ति दावे कहाँ प्रस्तुत किए जा सकते हैं?

 

rp_Car-accident.jpgसमस्या-

अंश प्रताप ने उन्नाव, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी टैक्सी से एक दुर्घटना हो गया था जिस में एक आदमी की मृत्यु हो गयी थी। उस के परिवार वालों ने क्षतिपूर्ति के लिए आवेदन दिल्ली में प्रस्तुत किया है जब कि मरने वाला और उस के क्लेम का दावा करने वाले और मैं सब एक ही शहर उन्नाव के हैं। वकील का कहना है कि दिल्ली में बीमा कंपनी का दफ्तर है इस लिए वहाँ मुकदमा बनता है। क्या दिल्ली में मुकदमा खारिज हो सकता है?

 

समाधान

मोटर व्हीकल एक्ट ने मोटर यान दुर्घटना दावों के संबंध में यह प्रावधान दिया गया है कि क्षतिपूर्ति का दावा करने वाला व्यक्ति उस की इच्छा से तीन तरह के स्थानों पर स्थित मोटर यान दुर्घटना दावा अधिकरणों में से किसी एक में अपना दावा प्रस्तुत कर सकता है। ये तीन स्थान निम्न प्रकार हैं-

  1. वहाँ जहाँ दुर्घटना घटित हुई हो;
  2. वहाँ जहाँ दुर्घटना में किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई हो; तथा
  3. जहाँ दावे के विरोधी पक्षकारों में से किसी एक का कार्यालय हो या जहाँ वह व्यापार करता हो।

स तरह यदि दिल्ली में बीमा कंपनी का दफ्तर है तो वहाँ क्षतिपूर्ति का दावा प्रस्तुत किया जा सकता है और यह दावेदार पर निर्भर करता है कि वह उक्त स्थानों में से कहाँ अपना दावा प्रस्तुत करना चाहता है। आप के मामले में वकील की सलाह उचित है।

प के पास यदि बीमा है तो आप बीमा कंपनी को लिख कर दे सकते हैं कि आप बीमा धारी हैं और इस बीमा क्लेम को लड़ने का दायित्व आप का है। बीमा कंपनी आप की ओर से मुकदमा लड़ेगी यदि आप ने बीमा पालिसी की किसी शर्त का उल्लंघन नहीं किया है। यदि बीमा कंपनी कहती है कि आप ने बीमा प्रमाण पत्र की किसी शर्त का उल्लंघन किया है और आप समझते हैं कि ऐसा हुआ है तो आप को फिर अपना वकील कर के अपना पक्ष अधिकरण के समक्ष रखना चाहिए।

दुर्घटना की प्राथमिक जिम्मेदारी वाहन चालक की

accident car animalसमस्या-
महेश पुरी, अराँई (अजमेर) राजस्थान से पूछते हैं-

दिनांक 13-09-2011 को मैं और मेरे साथ श्री सुरेश चन्‍द पारीक कार द्वारा इनके पुत्र श्री अवधेश पारीक से मिलने के लिए बीकानेर जा रहे थें। रास्‍ते में दिन के करीबन 1 बजे कार के रास्‍ते में नील गायों (रोजडों) के आ जाने से कार  दुर्घटनाग्रस्‍त हो गई। इस कार दुर्घटना में मैं और श्री सुरेश पारीक  बुरी तरह से घायल हो गये। अस्‍पताल में श्री सुरेश चन्‍द पारीक की मृत्यु हो गई। दुर्घटना के समय कार कों मैं ही चला रहा था। इसलिए इसका पुरा ही मामला मेरे उपर डाल दिया गया। श्री सुरेश चन्‍द पारीक की पत्‍नी श्रीमती निमला देवी पारीक ने यह सारा मामला मेरे पर ही लगा दिया है।  इस दुर्घटना का जिम्‍मेदार मुझे ठहराया गया है, जबकि इस कार दुर्घटना में मुझे भी घायल हो कर मौत से जूझना पड़ा था। इस समस्‍या से बचने का उपाय बताएँ।

 

समाधान-

दुर्घटना के समय कार आप चला रहे थे। कार दुर्घटना में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई तथा आप भी घायल हुए हैं। कार दुर्घटना के केवल दो कारण हो सकते हैं। पहला कारण तो यह हो सकता है कि आप ने  कार चालन  में लापरवाही बरती, दूसरा कारण यह हो सकता है कि दैवीय संयोग से यह दुर्घटना हुई।

 इस मामले में एक मात्र प्रत्यक्षदर्शी साक्षी केवल आप हैं। पुलिस अवश्य किसी राह चलते व्यक्ति को प्रत्यक्षदर्शी साक्षी बना सकती है, और हो सकता है उस ने बनाया हो। यदि आप को पूरा विश्वास है कि यह दुर्घटना अचानक नील गायों के आप के सामने आने के कारण घटित हुई है और आप का कोई दोष नहीं है तब भी आप के विरुद्ध जो अपराधिक मुकदमा पुलिस द्वारा स्थापित किया है उस में आप को प्रतिरक्षा करनी पड़ेगी। यदि आपका वकील अच्छा हुआ तो आप को इस मामले से दोष मुक्त करवा देगा। आप को स्वयं ही साबित करना होगा कि आप का कोई दोष नहीं था और यह दुर्घटना एक दैवीय संयोग थी।

स दुर्घटना में आपके साथी सुरेश चन्द्र पारीक का देहान्त हुआ है। उस की पत्नी और बच्चों को उन की क्षति हो गई है। उन्हें इस दुर्घटना में पर्याप्त मुआवजा केवल तभी प्राप्त हो सकता है जब कि वे इस दुर्घटना का दोष चालक का बताएँ। एक यह भी कारण है कि वे आप को दोषी बता रहे हैं। इस में उन का कोई दोष नहीं है। यदि वाहन बीमित था और आप के पास पर्याप्त ड्राइविंग लायसेंस था तो आप को दुर्घटना के मुआवजे की चिन्ता नहीं करनी चाहिए उस का भुगतान बीमा कंपनी करेगी। यदि इन दोनों में कोई कमी होगी तो वह भुगतान भी आप को करना होगा।

स आप यह ध्यान रखें कि अपराधिक मुकदमे में वकील अच्छा करें जो आपकी प्रतिरक्षा ठीक से प्रस्तुत करे। जिस से आप दण्ड से बच सकें।

सच का साथ लिया है तो उस पर डटे रहें …

motor accidentसमस्या-

नांदेड़, महाराष्ट्र से साधना थोराट ने पूछा है-

नांदेड शहर में मेरे पति को चक्कर आने से चलती गाडी से गिरे और बेहोश हो गये। कुछ लोगों ने उन्हें उठा कर अस्पताल पहुँचाया। घटना होने के बाद दूसरे दिन एक आदमी ने हमारे मोबाईल पर संपर्क कर के कहा कि तुम्हारे पति ने हमारे रिश्तेदार को टक्कर मार दी है। अगर तुम हमें पैसे नहीं दोगे तो हम थाने में केस दर्ज करायेंगे तुम्हारे पति की नौकरी जायेगी। हम डॉक्टर को पैसे देकर झूठे बिल बनायेंगे और तुमसे पैसे लेंगे।  इस तरह उसने दस बारह दिन फोन किया। हम ने पैसे देने से इन्कार किया और थाने में उसके खिलाफ  केस दर्ज करा दिया। उस ने हमारे बाद मेरे पति के खिलाफ केस दर्ज कराया मेरे पति ने गाडी का तृतीय पक्ष बीमा नहीं कराया हुआ है। मेरे पति को जमानत मिली है और हमने गाड़ी भी छुडवा ली है। उन्होने झूठे गवाह खड़े कर के मेरे पति को सजा दिलायी तो उनकी नौकरी जा सकती है क्या? या उसे पैसे देकर उसे चुप करना चाहिये? अब हमें क्या करना चाहिए?

समाधान-

प ने यह सही किया कि उस ब्लेक मेलर को कोई धन न दे कर पुलिस में रिपोर्ट करवा दी। पुलिस ने उस व्यक्ति की रिपोर्ट पर आप के पति की जमानत थाने में ही ले ली होगी क्यों कि यह मामला जमानतीय अपराध का है। आप को तुरन्त एस.पी. पुलिस से मिल कर बात करनी चाहिए और उन्हें बताना चाहिए कि मामला क्या है और आप ने पहले रिपोर्ट दर्ज करवा दी थी। आप के पति को जिन लोगों ने अस्पताल पहुँचाया था उन में से किसी को आप जानती हों तो उसे साथ ले जाइए या फिर उस का शपथ पत्र लगा कर एस.पी. को आवेदन दीजिए। आप की शिकायत की जाँच के बाद यदि आप की बात सही पायी जाती है तो हो सकता है पुलिस ही इस मामले मे अन्तिम रिपोर्ट में आरोप पत्र न्यायालय के सामने प्रस्तुत न करे और मामला यहीं निपट जाए।

दि पुलिस आप के पति के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत करती है तो आप को चाहिए कि आप अच्छा वकील करें और मामले में अपनी प्रतिरक्षा प्रस्तुत करें। मेरी समझ में आप के पति को न्यायालय सही समझेगा और दोषमुक्त करार कर देगा। आप को सच के साथ डटना चाहिए और न्याय पर विश्वास करना चाहिए। वैसे भी आप को घबराने की जरूरत नहीं है। इस तरह के मामले में सजा हो जाने पर भी नौकरी नहीं जाती है। मजिस्ट्रेट अदालत के फैसले की अपील सेशन न्यायालय में की जा सकती है।

ज कल तृतीय पक्ष नाम का कोई बीमा नहीं होता है। केवल एक्ट बीमा होता है जो करवाना अनिवार्य है। यदि किसी भी तरह का वाहन का बीमा आप के पति ने करवा रखा है तो तीसरे पक्ष की हानि की क्षतिपूर्ति की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की होती है।  इन दिनों यह बड़े पैमाने पर हो रहा है कि किसी व्यक्ति को एक्सीडेंट में चोट लग जाती है तो और एक्सीडेंट करने वाले का पता नहीं लगता है तो हर्जाना वसूल करने के लिए किसी भी व्यक्ति को फँसा देते है। लेकिन अदालतें भी इस बात को जानती हैं। आप के पति अपने बेकसूर होने की साक्ष्य प्रस्तुत करेंगे तो उन्हें कुछ नहीं होगा।

लालच के शिकारों को बचाने के लिए कानून मे बदलाव निहायत जरूरी

ब जा कर यह स्थिति बनने लगी है कि निर्माण कंपनियाँ कानून के प्रति जो असावधानियाँ बरतती है उस के खिलाफ कार्यवाही होने लगी है। हालाँ कि इस स्थिति के निर्माण में मीडिया की भूमिका प्रमुख है, क्यों कि दुर्घटना होने के तुरंत बाद जिस तरह से मीडिया संवाददाता खोज बीन कर कानूनी कमियों को खोज निकालते हैं और पुलिस व अन्य एजेन्सियों के लिए कानूनी कार्यवाही करना आवश्यक हो जाता है अन्यथा ठेकेदारों, अफसरों और नेताओं के कृष्ण धनबंधन उजागर होने लगते हैं। लेकिन कानूनी कार्यवाही की जो तलवार लटकी है उस से निपटने के लिए अब अफसरों ने हड़ताल का सहारा लिया है कि उन के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही न की जाए। 

कुछ ही दिनों पहले राजस्थान के झालावाड़ जिले के नीमोदा के पास निर्माणाधीन 1200 मेगावाट के सुपर थर्मल पावर स्टेशन पर 6.7 टन की एल्बो उठाते समय रोप टूट जाने से हुए हादसे में तीन श्रमिकों की दब कर मृत्यु हो गई। बात राष्ट्रीय स्तर तक मीड़िया में गई तो पुलिस ने आनन फानन में सदोष मानव वध मानते हुए निर्माण उप कंपनियों के अफसरों को गिरफ्तार कर लिया और अदालत ने फिलहाल उन की जमानत लेने से इन्कार कर दिया। थर्मल के निर्माण में जुटे ठेकेदारों और निर्माण उपकंपनियों के अफसरों ने इस कदम के विरुद्ध हड़ताल कर दी है और थर्मल इकाई का निर्माण कार्य रुक गया है।

यह एक नई परिस्थिति है, और लगता है हमारे प्रशासन के पास इस नई परिस्थिति से निपटने के लिए केवल यही एक रास्ता बचा है कि कानून को अपना काम करने से रोक दिया जाए। वैसे भी जमीन के नीचे धन की जो नहरें बहती हैं उन के कारण कानून अपना काम कभी कभी ही कर पाता है। इस नई परिस्थिति का कारण यह है कि कानून ठेकेदारों और निर्माण उपकंपनियों के प्रबंधकों को इन लापरवाहियों के लिए दोषी मानता है। जब कि ये प्रबंधक वास्तव में साधारण वेतन पर रखे गए कर्मचारी होते हैं। उन की स्थिति मजदूरों की अपेक्षा कुछ ही बेहतर होती है और रोजगार बनाए रखने के लिए अपने नियोजक की हर अच्छी बुरे काम को अंजाम देते रहते हैं। वास्तव में होना तो यह चाहिए कि इस तरह की दुर्घटना होने पर मुख्य निर्माण कंपनी के निदेशकों/मालिकों और उप निर्माण कंपनी के मालिकों और ठेकेदारों को ही इस तरह की दुर्घटना के लिए जिम्मेदार मानने के लिए कानन बनना चाहिए। क्यों कि असल में सुरक्षा की आवश्यकता को दरकिनार करने का काम धन बचाने के लिए उन्हीं के निर्देशन पर संपन्न होता है औऱ बचे हुए धन के स्वामी भी वे ही बनते हैं। इस तरह यदि किसी दुर्घटना के लिए कोई अपराधिक लापरवाही का मामला बनता है तो सजा का भागी भी वस्तुतः उन्हीं लोगों को बनना चाहिए जो कि उस व्यवसाय से अधिक से अधिक धन कमाते हैं। उन्हीं की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि जिस कार्य से वे धन कमा रहे हैं उस से मनुष्य के प्रति कोई अपराध घटित न हो।

लेकिन अब तक जो कानून हैं उन में  हमेशा कुछ विशिष्ठ पदों पर नियुक्त अधिकारियों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है। ये अधिकारी बड़ी कंपनियों में तो बड़े वेतन पाते हैं लेकिन मंझोले कारोबारों और उद्योगों में ये अधिकारी बहुत मामूली वेतनों पर काम कर रहे होते हैं। यही वजह है कि जब ठेकेदार कंपनियों के अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया तो वे ही हड़ताल पर उतर आए। उन का हड़ताल पर जाना बहुत वाजिब लगता है। क्यों कि वे सारे काम तो अपने मालिकों के निर्देशो

हत्या भी मोटर यान दुर्घटना है यदि उस का संबंध किसी मोटर यान के उपयोग से संबंधित हो

ब्लागर और अधिवक्ता साथी श्री भुवनेश शर्मा ने एक बहुत ही दिलचस्प प्रश्न मुझे प्रेषित किया – 

दि किसी मोटर सायकिल सवार की कोई अपने चौपहिया वाहन से टक्कर मार कर हत्या कर देता है तो क्या मृतक के विधिक प्रतिनिधि मोटरयान दुर्घटना दावा अधिकरण के समक्ष क्षतिपूर्ति के लिए दावा कर सकते हैं? यदि कर सकते हैं तो उन के पास दोनों वाहनों के बीमाकर्ता में से किस के विरुद्ध वाद प्रस्तुत करने का विकल्प है? हत्या के मामले में अदालत में प्रस्तुत आरोप पत्र और निर्णय का क्षतिपूर्ति दावे पर क्या असर होगा?
उत्तर —
भुवनेश जी ने जो प्रश्न सामने रखा है उस के कुछ मुख्य बिंदु हैं। इस में सब से पहले ध्यान देने वाली बात यह है कि हत्यारे ने चौपहिया वाहन का उपयोग हत्या के हथियार के रूप में किया है। दूसरी बात यह है कि क्या मोटर यान का हत्या के हथियार के रूप में उपयोग करने मात्र से एक हत्या को मोटर यान दुर्घटना कहा जा सकता है? यह प्रश्न अनेक मामलों में अदालतों के सामने आया है और उन के निर्णय उपलब्ध हैं।
स मामले में सब से दिलचस्प मामला मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के सामने खैरुन्निसा व अन्य बनाम सुभाष उर्फ पंजाबी व अन्य के मुकदमे में आया। इस मामले में दो ट्रकों में टक्कर हुई। एक ट्रके ड्राइवर ने दूसरे ड्राइवर को दोषी मानते हुए बंधक बना लिया। दोनों में झगड़ा हुआ और बंधक ड्राइवर को ट्रक से कुचल करक मार डाला गया। इस मामले में मृत्यु एक हत्या थी। लेकिन इस मृत्यु को प्रारंभिक दुर्घटना से संबंधित होने के कारण इस घटना को दुर्घटना-हत्या का मामला मानते हुए इस में मृत व्यक्ति के आश्रितों को तीन लाख साठ हजार रुपए मुआवजा देने का आदेश पारित किया और इस भुगतान के लिए बीमा कंपनी को जिम्मेदार माना।

क्सर इस तरह की घटनाएँ होती रहती हैं कि किसी वाहन को ड्राइवर सहित अगवा कर लिया गया और फिर ड्राइवर की हत्या कर के वाहन को ले भागे। ऐसे मामलों में चालक के आश्रितों को मुआवजा भुगतान की जिम्मेदारी वाहन स्वामी पर आ पड़ती है क्यों कि चालक तो अपनी ड्यूटी कर रहा होता है और इस तरह की हत्या को नियोजन के दौरान उस के क्रम में हुई दुर्घटना माना गया है। वाहन की कानूनन  आवश्यक बीमा पॉलिसी में चालक को हुई हानि और मृत्यु के लिए कर्मचारी क्षतिपूर्ति अधिनियम के अंतर्गत आने वाले क्षतिपूर्ति दायित्व सम्मिलित होते हैं और इस के लिए बीमा कंपनी प्रीमियम प्राप्त करती है। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने रीता देवी बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी के मामले में यह निर्धारित किया कि ऐसी हत्यायें मोटर यान के उपयोग के कारण हुई दुर्घटनाएँ मानी जानी चाहिए और मोटर यान अधिनियम के अंतर्गत भी मृतक के आश्रित मुआवजा प्राप्त करने के अधिकारी हैं।

अदालत का सुझाव : नशे में दुर्घटना कर मृत्यु कारित करने को अजमानतीय और दस वर्ष तक की कैद की सजा से दंडनीय बनाने के लिए कानून बनाया जाए

सड़क दुर्घटना में कु. बबिता चौधरी की मृत्यु का प्रकरण  आखिर अदालत में रंग लाया।  14 दिसम्बर 2008 को कोटा के एक कॉलेज की कुछ छात्राएं शिक्षण टूर पर बहरोड़ से जयपुर पहुँची थीं और बस से उतर कर ज़ेब्रा क्रासिंग से सड़क पार कर रही थीं कि एक कार ने उन्हें टक्कर मार दी, कुछ छात्राएँ घायल हो गईं और उन में से एक बबिता चौधरी की मृत्यु हो गई।  किसी ने टक्कर मारने वाली कार का पीछा किया और पुलिस ने कार को रोक लिया।  चालक को पकड़ा गया और उस का डाक्टरी मुआयना कराया गया तो वह अल्कोहल के नशे में था।  पता लगा अभियुक्त चालक महोदय जयपुर की भूतपूर्व महारानी जिनके सौन्दर्य के जलवे इतिहास में अंकित हैं, श्रीमती गायत्री देवी के पौत्र विजित सिंह हैं।

पुलिस ने विजित सिंह को जमानत पर छोड़ दिया क्यों कि इन्हें धारा 279,337 व 304-ए भा.दं.सं. में गिरफ्तार किया गया था।  बाद में हंगामा हुआ कि पुलिस ने इन्हें रसूख के कारण छोड़ दिया।  उन्हीं दिनों सरकार बदली थी तो नए मुख्य मंत्री ने बयान दिया कि उचित कार्यवाही की जाएगी।  मामले में धारा 338 और बढ़ गई तथा 304-ए को बदल कर 304 में परिवर्तित कर दिया गया।  क्यों कि एक बार विजित सिंह को जमानत पर छोड़ा जा चुका था इस कारण से सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के अनुसार उन्हें पुलिस दुबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती थी। इस कारण से न्यायालय से जमानत खारिज करने का आवेदन राजस्थान सरकार की पुलिस ने किया।  सरकार का यह आवेदन निरस्त कर दिया गया।  सरकार ने इस निर्णय के विरुद्ध राजस्थान उच्चन्यायालय के समक्ष रिवीजन प्रस्तुत किया।  यह रिवीजन सुनवाई के लिए न्यायमूर्ति महेश भगवती के समक्ष रखा गया जिन्हों ने सुनवाई के उपरांत 3 मार्च को अपना निर्णय सुनाया।  यह निर्णय 55 पैरा और 24 पृष्टों का है।

न्यायमूर्ति महेश भगवती ने निर्णय में अनेक कानूनी बिन्दुओं पर विचार किया है।  सब से पहले तो यह निश्चित किया कि क्या ये रिविजन याचिकाएं पोषणीय हैं? मुद्दा यह उठाया गया था कि अदालत का जमानत निरस्त नहीं करने का निर्णय एक अंतिम आदेश नहीं हो कर विचारकालीन आदेश है जिस का रिवीजन नहीं हो सकता।  लेकिन इस निर्णय में यह माना गया कि यह आदेश एक अंतिम आदेश था जिस के कारण इस के विरुद्ध रिवीजन याचिका पोषणीय हैं।

इस मामले में उपलब्ध तथ्यों पर विचार करते हुए सब से महत्वपूर्ण बिंदु यह सामने आया कि एक ही मामले में अनेक घायलों में से एक की मृत्यु हो गई।  अन्य घायलों के मामले में पुलिस इस नतीजे पर पहुँचती है कि वे लापरवाही और असावधानी से वाहन चालन के मामले थे तो उसी घटना में एक की मृत्यु हो जाने पर इरादतन मृत्यु कारित करने का मामला कैसे हो सकता है।  न्यायमूर्ति महेश भगवती ने कहा कि क्या यह संभव हो सकता है कि एक व्यक्ति एक साथ दो विपरीत दिशाओं में गमन करे।  यदि लापरवाही और असावधानी का मामला है तो वह धारा 304 भा.दं.सं. का हो ही नहीं सकता। वह धारा 304-ए का ही हो सकता है जो कि जमानतीय अपराध है।  राज्य और पुलिस अधिकारियों को कानून से खेलने की इजाजत नहीं दी जा सकती है।  अनेक अन्य बिंदुओं पर विचार करते हुए पुलिस और सरकार की रिवीजन याचिकाएँ खारिज कर दी गईं।  नतीजा यह रहा कि विजित सिंह अ

पहले माँ के हाजिर न होने से खारिज दुर्घटना दावा क्या अब 18 वर्ष बाद चल सकता है?

प्रीति शुक्ला पूछती हैं…..

लगभग 18 साल पहले मेरे पिताजी का रोड एक्सीडेंट में देहान्त हो गया।  तब मैं लगभग 3 वर्ष की थी।   माँ मुझे ले कर नानी (माँ के मायके) के यहाँ आ कर रहने लगी।  जिस वैन से मेरे पिता जी का एक्सीडेण्ट हुआ था उस वैन को पुलिस द्वारा पकड़ा भी गया  था और क्लेम के लिए सम्बन्धित कोर्ट में मुकदमा भी चलाया गया था। परन्तु मेरी माँ अकेले होने के कारण ज्यादा दौड़ भाग नहीं कर सकी और मुकदमा दो-तीन साल के बाद रुक गया।   क्या ये मुकदमा पुनः चल सकता है?  यदि हाँ, तो मुझे और मेरी माँ को क्या करना होगा?  मुझे उचित सलाह देने की कृपा करें, मैं आप की बहुत आभारी रहूँगी।  कृपा कर के जवाब जल्दी से जल्दी देना। आप की अति महान कृपा होगी। 
( यह मेल मैं अपनी सहेली की सहायता से भेज रही हूँ)

उत्तर

प्रीति बहन!
यह पत्र आप का है या आप की मित्र का यह पता नहीं लग पा रहा है।  लेकिन यह उत्तर आप की ही समस्या मान कर दिया जा रहा है।

आप का मुकदमा नए सिरे से किया जा सकता है।  लेकिन यह देखना होगा कि जिस वैन से टक्कर हुई थी उस का जिस दिन दुर्घटना हुई थी उस दिन बीमा था या नहीं।  यदि बीमा हुआ तो मुआवजा मिलना आसान होगा, अन्यथा कुछ कठिन अवश्य हो जाएगा।

पहले कानून में यह बाधा थी कि मोटर एक्सीडेण्ट का मुकदमा दुर्घटना के बाद एक निश्चित अवधि तक ही पेश किया जा सकता था।  लेकिन अब बाधा नहीं है।  मुकदमा कभी भी पेश किया जा सकता है।  पहले किया हुआ मुकदमा आप की माता जी के उपस्थित न होने से खारिज हो गया होगा।  तो भी आप नए सिरे से यह मुकदमा दायर करवा सकती हैं।  आप यह मुकदमा उस क्षेत्र के मोटर दुर्घटना अधिकरण  में पेश कर सकती हैं जहाँ आप खुद रहती हैं।  इस के लिए आप को अदालत में पेशियों पर उपस्थित भी नहीं होना पड़ेगा।

आप को करना यह होगा कि जिस पुलिस थाने ने दुर्घटना कारित करने वाली वैन को पकड़ा था वहाँ से पता करना होगा कि वैन के ड्राइवर के विरुद्ध आरोप पत्र किस अदालत में पेश किया गया था।  वहाँ ड्राइवर के विरुद्ध मुकदमा चला होगा।  उस मुकदमें में पेश आरोप पत्र और उस के साथ संलग्न दस्तावेजों की नकलें लेनी पड़ेंगी।  उन के आधार पर क्लेम मुकदमा हो जाएगा। 

आप को अपने क्षेत्र की मोटर दुर्घटना के दावे सुनने वाले अधिकरण ( न्यायालय) में दावे लड़ने वाले किसी वकील से संपर्क करना चाहिए।  उस से मुकदमा दायर करने की फीस तय कर लेनी चाहिए।  आम तौर पर इस तरह के मुकदमे लड़ने वाले वकील फीस तभी लेते हैं जब दावे में निर्णय हो जाने पर दावेदार को पैसा मिल जाता है।  यह फीस स्थान भेद से 10 से 15 प्रतिशत होती है।  प्रारंभ में वकील को केवल दावा करने का खर्च ही देना पड़ता है।  जो लगभग एक-दो हजार रुपया होता है।  यह खर्च मुकदमे के लिए आवश्यक द्स्तावेज एकत्र करने और दावा पेश करने में होता है। 

आप वकील से संपर्क करें और जल्दी ही दावा पेश कराएँ।  फिर भी आप को किसी प्रकार की परेशानी हो तो आप तीसरा खंबा से सलाह कर सकती हैं। 

टक्कर मारने वाले वाहन के पास बीमा न होने पर मुआवजे की वसूली का मामला

 लोकेश मोनापुरी पूछते हैं….

 
मैं पेशे से एक इंजिनियर हूँ और एक ऑटोमोबाइल कंपनी में नियोजित हूँ।  28 अगस्त 2008 को अपने ऑफिस से मेरे मित्र की बाइक पर घर आते समय एक माल भरे डम्पर ने टक्कर मार दी।  मेरी बाइक और डम्पर दोनों के पास ही बीमा नहीं था।  हम ने वकील किया जिस ने हमें यह विश्वास दिया कि यह मामला डेढ़ दो वर्ष में निपट जाएगा और हमें क्षतिपूर्ति दावे की आसानी से राशि मिल जाएगी।  लेकिन अब वह कोई साफ बात नहीं बता रहा है और रुचि नहीं ले रहा है।  वह कह रहा है कि दावा राशि मिलना कठिन है क्यों कि डम्पर मालिक के पास बीमा नहीं है।  और हमें राशि वसूलने के लिए अलग मुकदमा लगाना पड़ेगा।  
मुझे सही राय प्रदान करें जिस से मैं सही दिशा में उपाय कर सकूँ।

उत्तर…



लोकेश जी, 
 आप का मामला शीशे की तरह साफ है।  मोटर दुर्घटना के मामले डेढ़ दो वर्ष में निर्णीत हो जाते हैं। मेरी समझ में आप के मामलें में निर्णय हो चुका होगा या होने वाला होगा।  इन मामलों में दुर्घटना में लिप्त वाहन के चालक, मालिक और बीमाकर्ता के विरुद्ध दावा किया जाता है और दुर्घटना अधिकरण जो भी मुआवजा दिलाता है, आप तौर पर उस के भुगतान का दायित्व इन तीनों पर संयुक्त रूप से तथा पृथकतः होता है।   यदि ऐसा वाहन बीमित हुआ तो बीमा कंपनी निर्णय के दो माह के भीतर मुआवजे की राशि अधिकरण में जमा करा देती है और वह दावा करने वाले को प्राप्त हो जाती है।  यदि तीनों में से कोई या तीनों अपील करना चाहें तो भी दिलाए गए मुआवजे की राशि का एक अंश उन्हें जमा कराना पड़ता है जो दावेदार को प्राप्त हो जाता है। 

जहाँ दुर्घटना में लिप्त वाहन का बीमा नहीं होता वहाँ मुआवजे के भुगतान का दायित्व केवल चालक और मालिक का रह जाता है।  यदि बीमा कंपनी दो माह में मुआवजे की राशि अदा न करे तो उसे वसूल करने के लिए दुर्घटना अधिकरण को वसूली आवेदन प्रस्तुत करना पड़ता है और अधिकरण उस आवेदन पर बीमा कंपनी को नोटिस देती है, नोटिस के बाद भी मुआवजा राशि जमा न होने पर बीमा कंपनी का बैंक खाते से राशि की वसूली कर ली जाती है।  बीमा कंपनी के विरुद्ध अनेक मुकदमे होते हैं, और उस का खातों के विवरण अदालत में ही उपलब्ध होते हैं, जिस के कारण यह काम बहुत आसान होता है।   आम तौर पर बीमा कंपनी से मुआवजा वसूली के लिए कोई भी आवेदन  देने की कोई आवश्यकता नहीं होती राशि अपने आप जमा हो जाती है।


लेकिन जहाँ  बीमा ही नहीं होता।  वहाँ चालक और मालिक कभी मुआवजा जमा नहीं कराते हैं।  उन से मुआवजा राशि की वसूली के लिए आवेदन प्रस्तुत करना ही पड़ता है।  आप इसी वसूली आवेदन को एक अलग मुकदमा समझ रहे हैं।  वस्तुतः यह न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय का निष्पादन करने की कार्यवाही है।  इस मामले में आप को न्यायालय को यह बताना होता है कि दुर्घटना में संलिप्त वाहन के मालिक और चालक के नाम क्या संपत्ति है जिस से आप को दिलाई गई मुआवजे की राशि वसूल की जा सकती है।  आप को उस के मकान या अचल संपत्ति का अथवा चल संपत्ति मसलन डंपर या अन्य ऐसे वाहन जिन की कुर्की से मुआवजे की राशि वसूल की जा सकती हो का विवरण अदालत को बताना होता है। अदालत तब उस संपत्ति को कुर्क कर लेती है।  फिर भी मालिक और चालक द्वारा धन जमा न कराए जाने पर उस संपत्ति की नीलामी कर अदालत मुआवजे की राशि वसूल कर आप को दिला देती है।  वसूली की यह प्रक्रिया बहुत मुश्किल इस लिए होती है कि दावेदार को स्वयं वाहन मालि
क की संपत्ति का पता करना पड़ता है।  यह काम कठिन तो है ही समय भी लगता है।  वकीलों के लिए भी यह काम कष्ट साध्य होता है जिस के कारण जैसे ही उन्हें पता लगता है कि टक्कर मारने वाले वाहन के पास बीमा नहीं था, उन की रुचि कम हो जाती है।   वे ऐसे मामलों में अपना समय जाया करने के स्थान पर ऐसे अन्य मामलों में रुचि लेने लगते हैं जिन में बीमा होता है और मुआवजे की वसूली आसान होती है, क्यों कि उन मामलों में उन्हें तुरंत फीस मिल जाती है। 



आप के मामले में यदि आप टक्कर मारने वाले वाहन के मालिक की संपत्ति का ब्यौरा तलाश कर लें विशेष रुप से उस के मकान या वाहनों की सूचि तो आप का काम आसान हो जाएगा।  यदि आप के मुआवजे की राशि अभी अदालत ने तय नहीं की है तो भी आप संपत्ति का ब्यौरा अदालत को पेश कर एक आवेदन कर सकते हैं कि वाहन मालिक मुआवजे की रकम की वसूली से बचने के लिए उस की संपत्ति को स्थानांतरित कर सकता है।  इस कारण से उसकी संपत्ति का अटैचमेंट किया जाए।  अदालत वाहन मालिक की संपत्ति को अटैच कर सकती है। 



पर यह सही है कि आप को मुआवजा राशि की वसूली में आम मुकदमों की अधिक कठिनाई होगी।  लेकिन आप यदि वाहन मालिक की संपत्ति का पता कर अपने वकील को बता सके तो वसूली में कठिनाई कम होगी। आप अपने वकील को कहिए कि वह मुकदमा चलने दे और उस में रुचि ले जिस से आप मुआवजा प्राप्त कर सकें। 




Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada