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व्यर्थ धमकियों से न डरें, आवश्यकता होने पर कार्यवाही करें।

समस्या-

अहमद ने जिला देवरिया, (उत्तर प्रदेश) समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी के पिता जी के नाम पर एक पुश्तैनी जमीन थी जिसका बंटवारा 37 साल पहले मेरे पिता और उनके छोटे भाई ने आपसी रजामंदी से कर लिया था। मेरे पिता ने अपने हिस्से के 15*40 स्क्वायर फुट के प्लाट पर 37 साल पहले ही पक्का मकान बनवा लिया, कितु उनके भाई ने अपने हिस्से के 15*40 पर कोई निर्माण नहीं करवाया। अब मेरे पिता उनके भाई एवं भाई की पत्नी तीनों की मृत्यु हो चुकी है। मेरी माँ जीवित और स्वस्थ है। अभी तक उस पुश्तैनी जमीन के खसरे मे पिता के पिताजी का ही नाम दर्ज है,लेकिन मकान के पिछले 37 सालों की टैक्स पावती,37 साल पुरानी मकान की नंबर प्लेट की पावती मे भी पिताजी का ही नाम है।पिता की मृत्यु के बाद घर का जल कर/बिजली बिल मेरे ही नाम से आ रहा। मेरे परिवार के सद्स्यो का नाम भी राशन कार्ड में है तथा सभी के जाति/ निवास पत्र भी बने है। पिताजी के मकान का नगर निगम टाउन एरिया से स्वीकृत नक्शा भी पिताजी के नाम पर है। अब विवाद का विषय यह है कि मेरे पिता के भाई का इकलौता पुत्र 37 साल पहले हुए बंटवारे को मान नही रहा, उसका कहना है कि जमीन के खसरे मे उसके पिता के पिता का नाम है तथा बंटवारे की कोई बात नही लिखी। अब वह छल कपट मारपीट पर उतारू है। मकान और उसके पीछे मौजूद उसके खुद के प्लाट का बंटवारा करने को कह रहा। मैं ने उससे कहा कि यदि 37 साल पहले बंटवारा नही हुआ होता तो तुम्हारे पिताजी क्या यह मकान बनाने देते,अपने भाई पर केस न कर दिये होते? लेकिन वह नही मान रहा और न ही मुझ पर बंटवारे विवाद पर कोर्ट केस कर रहा क्यों कि वह जानता है कि उसका मकान मे कोई हक नहीं।  वह यही कह रहा कि अपना मकान हमको बेच दो या आधा हिस्सा दो, नहीं तो झूठे केस मे फंसाकर सबको जेल करवा देंगे। महोदय इन परिस्थितियो में मुझे क्या कदम उठाना चाहिये। इस समय मैं मध्यप्रदेश में नौकरी कर रहा हूँ,  मेरा परिवार भी साथ में है और गांव के मकान में मेरा ही ताला लगा है। किस तरह से मकान का खसरा अपने नाम से बनवा सकता हूँ। जिससे  कि भविष्य मे कभी उसे बेच सकूँ। क्या चाचा का पुत्र मेरे पिता का आधा मकान हड़प लेगा? क्या मेरे पास मौजूद डाक्युमेंट से मेरे नाम से खसरा बन जाएगा??  कृपया उचित सलाह दीजिए मै क्या करूं?

समाधान-

कानून और अदालत से तो वह आप के मकान में हिस्सा लेने में असमर्थ है। इसी से वह आप को उलझाने की धमकी देता है। यह सब वह स्थानीय दोस्तों आदि के सिखाए में कहता है। उसे लगता है कि आप परदेसी हो गए हैं। मकान बेचेंगे ही, उसे सस्ते में पल्ले पड़ जाएगा। आप सख्त बने रहें, और यदि वे लोग न्यूसेंस करने की कोशिश करे तो उस की पुलिस को रिपोर्ट कराएँ। साथ के साथ गाँव में मित्र बनाए रखें जिस से आप को वहाँ के हालात की जानकारी मिलती रहे। कोरी धमकियों के आधार पर कोई भी कार्यवाही करना उचित नहीं है, धमकियों को आप प्रमाणित नहीं कर सकेंगे। बेहतर है दृढ़ता बनाए रखें। चचेरा भाई यदि कुछ न्यूसेंस करे तो उस के विरुद्ध अपराधिक कार्यवाही तो करें ही। मकान पर कब्जा करने की उस की कोशिश के विरुद्ध न्यायालय से स्थगन भी प्राप्त करें। आप का मामला परिस्थितियों के अनुसार कार्यवाही करने का है। इस कारण गाँव के जिले के किसी अच्छे वकील से सलाह ले कर जिस तरह की कार्यवाही वे उचित समझें करें। व्यर्थ मुकदमेबाजी में भी न पड़ें।

अभियुक्त द्वारा अपने खिलाफ गवाही देने से रोकने के लिए धमकी देना गंभीर अपराध है।

समस्या-

सुनील ने दौसा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


गर कोई किसी को अपने खिलाफ किसी अपराध की गवाही देने के लिए रोकता है और धमकी देता है तो क्या उसके विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है?


समाधान-

किसी को अपने खिलाफ किसी अपराध की गवाही देने से रोकना और इस के लिए धमकी देना भारतीय दंड संहिता की धारा 201 के अन्तर्गत एक गंभीर अपराध है और इस के लिए दंड भी अधिक है। जैसे जैसे गवाही से संबंधित अपराध की गंभीरता बढ़ती है वैसे ही दंड भी बढता जाता है।

आप को तुरन्त सम्बधित पुलिस थाना में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। यदि पुलिस रिपोर्ट पर कार्यवाही करने में कोताही करे तो अगले ही दिन एसपी से मिल कर उसे कार्यवाही करने के लिए कहना चाहिए। यदि एस पी भी इस मामले में कोताही करता है तो आप न्यायालय को तुरन्त प्रतिवाद प्रस्तुत करें। न्यायालय तुरन्त कार्यवाही करेगा।

गाली गलौज, अपशब्द और झूठी गवाही दे कर मुकदमे में फँसा देना गंभीर अपराध है पुलिस को रिपोर्ट करें।

समस्या-

नीतिश कुमार ने कटिहार बिहार से समस्या भेजी है कि-


मेरी चाची हमेशा मेरे परिवार (मुझसे और मेरी मम्मी) से लड़ती रहती है और हम लोगों को परेशान करती है, गाली देना, अपशब्द कहना तो रोज की बात हो गई है।  वो हमेशा मुझे धमकी देती है कि मुझे झूठे केस में फँसा देगी क्योंकि मेरे घर में मैं और मेरी माँ ही रहते है और दूसरा कोई मर्द सदस्य नहीं है। मुझे डर लगा रहता है कि अगर वो झूठा केस कर देगी तो मेरा जीवन बर्बाद हो जायेगा क्योंकि मैं एक छात्र हूँ और मुझे कहीं नौकरी नही मिलेगी। बिहार की कानून व्यवस्था कैसी है ये बताने की जरुरत नही है। ऐसे में मुझे क्या करना चाहिए कृपा कर बताएं।


समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि आप की चाची ऐसा क्यों करती है। क्या आप लोग एक ही मकान में एक साथ रहते हैं और वह चाहती है कि आप लोग मकान से निकल जाएँ, या क्या कोई संपत्ति है जिसे हड़पने के लिए वह ऐसा करती है? या फिर कोई और कारण है? यदि आप ने कारण बताया होता तो बात स्पष्ट होती और समाधान भी उतना ही स्पष्ट होता। पूरा जरूरी विवरण हमेशा समस्या को सही समाधान की और ले जाता है। खैर।

किसी को भी गाली देना और अपशब्द कहना अपराध है। लेकिन इतना बड़ा अपराध भी नहीं है जिस के लिए पुलिस कोई कार्यवाही करे। इस तरह के अपराध की सूचना पुलिस दर्ज कर लेती है और फिर सीधे न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करने को कहती है। लेकिन झूठी गवाही दे कर किसी मुकदमे में फँसा कर उस के सम्मान या धन को क्षति पहुँचाने की धमकी देना धारा 195ए आईपीसी के अंतर्गत गंभीर अपराध है जिस की शिकायत आप पुलिस को कर सकते हैं, पुलिस इस मुकदमे को दर्ज कर जाँच कर सकती है तब गाली देने और अपशब्द कहने का अपराध भी उस के साथ जुड़ जाएगा। लेकिन आप को इस धमकी का सबूत और गवाही पुलिस को देनी होगी।

इस तरह के कृत्य का बड़ा सबूत इस तरह की धमकी, गालीगलौज व अपशब्दों की रिकार्डिंग हो सकती है। आज कल हर फोन में बातचीत को रिकार्ड करने की सुविधा होती है। अब जब भी चाची ऐसा करें तब उस की आवाज को रिकार्ड करें। जब धमकी सहित गालीगलौज व अपशब्दों की दो चार रिकार्डिंग इकट्ठा हो जाएँ तो पुलिस को रिपोर्ट कराएँ। पुलिस कार्यवाही करेगी। इस तरह आप का डर तो निकलेगा ही चाची को भी मुकदमा झेलना पडे़गा हो सकता है सजा ही हो जाए। आप की समस्या हल हो जाएगी।

स्त्री को उपहार में मिली हर वस्तु उस का स्त्री-धन है।

rp_gavel-1.pngसमस्या-

मुकेश सिंह ने मथुरा उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरी भी और उस के मायके वाले मेरे परिवार को धमकाते हैं, कहते हैं कि दहेज का केस कर देंगे। हम ने उस से आज तक एक बात नहीं बोली है। वह हमारे ऊपर भी रेप के केस की धमकी देती है। वह सारा जेवर चुरा कर ले गयी है और अपने पापा के यहाँ रह रही है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

प ने अपनी समस्या में नहीं बताया कि आप की भाभी जेवर किस का चुरा कर ले गयी है। यदि वह वही जेवर साथ ले गयी है जो उसे आप के परिवार से, अपने मायके से तथा अन्य मित्रों व लोगों से उपहार में मिला था तो यह चोरी नहीं है। यह सारा जेवर और अन्य सामान जो उसे कहीं से भी उपहार में मिला है वह सब उस का स्त्रीधन है और उसे जहाँ चाहे ले जा सकती है।

कोई तो कारण रहा होगा जिस के कारण आप की भाभी ने आप के भाई का साथ छोड़ा है। आप उस कारण को नहीं बताना चाहते। फिर भी हमारी राय यह है कि मूल कारण तलाश करें और उस का उपाय तलाशें। यदि आप की भाभी और उस के मायके वाले आप को धमकी देते हैं और भाभी रेप का मुकदमा लगाने की धमकी देती है तो आप इन धमकियों के ठोस प्रमाण एकत्र करें और साबित करने लायक प्रमाण एकत्र हो जाने पर किसी स्थानीय वकील की मदद से भाभी और उस के परिजनों के विरुद्ध मिथ्या अपराध में फँसाने की धमकी देने के अपराध में मुकदमा दर्ज करवाएँ। मुकदमा दर्ज करवाने के पहले कोई ऐसा कार्य न करें जिस से व्यर्थ की उत्तेजना फैले और आप की भाभी अनेक मुकदमे आप के और आप के परिजनों के विरुद्ध दर्ज करवा दे।

धमकी भरे एसएमएस के लिए पुलिस को रिपोर्ट कराएँ …

police stationसमस्या-

शिव कुमार व्यास ने पाली, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

म दो भाई अपने स्वर्गीय पिताजी के मकान में अलग अलग प्रेम से रहते हैं। बडे भाई का बड़ा लड़का प्रेमविवाह कर हम सभी से नाता तोड उदयपुर मे रहता है। उस ने पत्नी से झूठा परिवाद महिला थाना मे भा.दं.स. की धारा 344,323,313,366 498अ में करवाया जो अनुसंधान के बाद अदम वकु (झूठ) में मुर्तिब कर एफ आर पञावली माननीय न्यायालय में पेश कर दी जिस पर समन तामील के बाद भी वो उपस्थित नहीं हो रहे हैं। उल्टा तरह तरह के धमकी भरे एसएमएस भेज परेशान कर रहे हैं। मेरा विन्रम निवेदन है कि इन एसएमएस के खिलाफ मुझे किस प्रकार की कारवाई ओर कहाँ करनी चाहिये? जिस से उन्हे सबक और हमें राहत मिल सके।

समाधान-

प को इन धमकी वाले एसएमएस की सूचना जहाँ आप को एसएमएस प्राप्त हो रहे हैं अर्थात आप के निवास स्थान पर क्षेत्राधिकार रखने वाले पुलिस थाना में देनी चाहिए और पुलिस से कार्यवाही करने का निवेदन करना चाहिए। धमकी किस तरह की दी जा रही है उस के आधार पर यह तय किया जा सकता है कि इस मामले में क्या अपराध बनता है।

स के साथ ही आप को जिस न्यायालय में एफआर मंजूरी हेतु लंबित है उस न्यायालय को निवेदन करना चाहिए कि परिवादी तामील के बाद भी उपस्थित नहीं हो रहा है इस कारण एफआर मंजूर की जाए। साथ ही इस मामले में भी अंतिम प्रतिवेदन (एफआर) पत्रावली से आवश्यक दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर यह तय करना चाहिए कि क्या परिवादी के विरुद्ध मिथ्या परिवाद प्रस्तुत करने या प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के मामले में कोई अपराध गठित होता है? यदि ऐसा अपराध गठित होता है तो न्यायालय से निवेदन करना चाहिए कि वह पुलिस को परिवादी के विरुद्ध कार्यवाही करने का निर्देश दे। यदि वह न्यायालय ऐसा निर्देश नहीं देता है तब भी आप उक्त दस्तावेजों के साथ किसी अच्छे वकील से सलाह कर यह निर्धारित कर सकते हैं कि क्या परिवादी के विरुद्ध किसी तरह का अपराधिक अभियोजन चलाया जा सकता है तथा क्या क्षतिपूर्ति के लिए किसी तरह की दीवानी कार्यवाही की जा सकती है। यदि वकील यह सलाह दें कि इस तरह का दीवानी या अपराधिक अभियोजन चलाया जा सकता है तो आप वैसी कार्यवाही अपनी इच्छा व सुविधा अनुसार करें।

ओवरटाइम मांगने पर धमकी, क्या करें?

trade unionसमस्या-
सौरभ कुमार ने भागलपुर, मायागंज, बिहार से समस्या भेजी है कि
मैं भागलपुर डेयरी, भागलपुर  में जूनियर टेक्नीशियन के पद पर काम करता हुँ ! मुझे १ साल से अतिकाय भुगतान नहीं मिला है। आवेदन कई बार दे चुका हूँ कोई सुनवाई नहीं होती है। शाखा प्रभारी को कहने पर नौकरी से निकालने, प्रमोशन रोकने जैसी धंमकी मिलती है। बताएँ मैे क्या कर सकता हूँ?

समाधान-

वरटाइम काम करने पर दुगनी दर से मजदूरी प्राप्त करना कामगार का कानूनी अधिकार है। जो सीधे सीधे एक दिन में 8 घंटे से अधिक काम न लिए जाने के अधिकार के साथ जुड़ा है। कानून बन जाने के बाद भी कोई भी नियोजक चाहे वह बड़ा पूंजीपति हो या छोटा, कोई सहकारी संस्था हो या फिर सरकारी, अर्धसरकारी संस्था, इस अधिकार को नहीं देना चाहती। वह ओवरटाइम काम कराती है, जब कामगार उस की मजदूरी मांगता है तो उसे इस तरह की धमकियाँ देती है।

नौकरी से गैर कानूनी तरीके से नहीं निकाला जा सकता। लेकिन यदि निकाल दिया जाए तो कामगार क्या करे? वह केवल मुकदमा कर सकता है। मुकदमा भी केवल श्रम न्यायालय के माध्यम से कर सकता है। श्रम न्यायालय जरूरत से इतने कम हैं कि कई मुकदमे 30 सालों से भी अधिक समय से वहाँ लंबित हैं। पूरा जीवन मुकदमा लड़ने में गुजर जाता है और अदालत फैसला नहीं देती।  दे भी दे तो आगे उच्च न्यायालय है, उच्चतम न्यायालय है। नियोजक कुछ भी कर लेंगे लेकिन कामगार को उस का कानूनी अधिकार न देंगे। यही इस युग का सच है। यह पूंजी का युग है, उस की तूती बोलती है, इस पूंजी का निर्माण श्रम से होता है, लेकिन श्रम करने वाला पूंजी पर कब्जा जमाए पूंजीपतियों के सामने लाचार, बेबस है।

15-20 वर्ष पूर्व तक अदालतें गैर कानूनी तरीके से नौकरी से निकाले कामगार को उस के पिछले पूरे वेतन समेत नौकरी पर लेने का फैसला देती थी। धीरे धीरे यह पूरा वेतन 3/4, 1/2, 1/4 तक हो गया और अब 1/5 तक पहुँच चुका है। मुकदमे के निर्णय में देरी अदालत के पास काम की अधिकता के कारण होती है लेकिन अब अदालत मानती है कि देरी हो जाने से कामगार का फिर से नौकरी पर जाने का अधिकार खत्म हो गया है। उसे मुआवजा दिलाया जा सकता है। यह मुआवजा 10-20-40-50 ह्जार तक हो सकता है। किसी किसी मामले में लाख तक हो जाता है। न्याय इतना मंहगा हो गया है कि इतना पैसा मुकदमा लड़ने, वकील को देने और आने जाने में खर्च हो जाता है।

कुल मिला कर हालात ऐसे बना दिेए गए हैं कि कामगार सिर्फ और सिर्फ नियोजक की शर्तों पर काम करे, खटता रहे। वर्ना नौकरी करने की बात न सोचे। इन हालात के लिए किसे जिम्मेदार कहा जाए? वास्तव  में इस के लिये खुद श्रमजीवी वर्ग जिम्मेदार है। उस के पास सिर्फ एक ताकत होती है, वह होती है एकता और उस के बल पर संघर्ष। उस ने इस ताकत को खो दिया है। इसी कारण पूंजी ने सारी सत्ता हथिया ली है श्रमजीवी और कामगार उन के सामने मजबूर हैं।

मित्र, मैं ने वास्तविक हालत यहाँ बताए हैं। लेकिन इस का अर्थ ये तो नहीं कि आप न्याय के लिए लड़ना छोड़ दें। आप नहीं लड़ेंगे तो हालात और बदतर होते जाएंगे। अब श्रमजीवी वर्ग के लिए कानूनी और व्यक्तिगत लड़ाई का वक्त नहीं रहा है। अब श्रमजीवी वर्ग  के पास संगठित होने और अपनी खुद की राजनीति को मजबूत कर राज्य पर अपना वर्गीय आधिपत्य स्थापित करने के  सिवा कोई मार्ग इस देश में शेष नहीं बचा है। आप इसे अभी समझना चाहें तो अभी समझ लें। न समझना चाहें तो न समझें। देर सबेर आप को परिस्थितियाँ यह सब समझा देंगी।

आप को अपने अधिकारों के लिए लड़ना तो होगा। नौकरी से निकाले जाने और प्रमोशन न होने के खतरों को दर किनार कर के लड़ना होगा। आप के आस पास मजदूरों की जो भी मजबूत यूनियन हो उस से संपर्क करें। उन की मदद से श्रम विभाग को शिकायत करें कि आप को ओवरटाइम मजदूरी नहीं दी जा रही है और नौकरी से निकालने, प्रमोशन रोकने की धमकी दी जा रही है। ओवर टाइम मजदूरी जो नहीं दी जा रही है उस के लिए वेतन भुगतान अधिनियम में आवेदन प्रस्तुत करें। यदि आप इन परिणामों से डरते हैं तो कुछ न करें। एक मध्यकालीन गुलाम की तरह जीने के लिए तैयार रहें।

फर्जी मुकदमे की धमकी देना अपराध है, अभियोजन चलाएँ.

Havel handcuffसमस्या-

आदित्य ने इन्दौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा एक दोस्त ने घर में एक किरायेदार रखा है। जब वह किराएदार से मकान खाली करने का कहता है तो किराएदार कहता है कि मैं हरिजन समाज का हूँ और तुम पर केस कर दूंगा और मान हानि का दावा कर दूँगा, झूठा केस लगा दूँगा। मेरा दोस्त बहुत परेशान है कि अब वह मकान कैसे खाली करवाए?

समाधान-

प के मित्र किराएदार से मकान खाली कराना चाहते हैं तो उन के पास मकान खाली कराने का कोई वैध कारण होना चाहिए। यदि समस्या इन्दौर की है तो वह मध्यप्रदेश किराया नियंत्रण कानून में जो वैध कारण दर्शाए गए हैं उन्हीं के आधार पर मकान खाली करवा सकते हैं। यदि किराएदार मकान खाली करने को स्वेच्छा से तैयार नहीं है तो उस का एक ही उपाय है कि आप के मित्र मकान खाली कराने के लिए न्यायालय में दावा करें। यदि न्यायालय ने पाया कि आप के मित्र के पास मकान खाली कराने का कोई वैध आधार है तो न्यायालय मकान खाली करने की डिक्री पारित कर देगा। तब उस डिक्री का निष्पादन करवा कर ही मकान खाली कराया जा सकता है। आप के मित्र को चाहिए कि वे स्थानीय वकील से सलाह करें कि किन आधारों पर मकान खाली कराया जा सकता है यदि उन में से कोई आधार आप के मित्र के पास हुआ तो मकान खाली करने के लिए वाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

गली बात आप के मित्र को किराएदार द्वारा दी जाने वाली मिथ्या और फर्जी मुकदमों की है तो किराएदार अवश्य ऐसा कर सकता है। लेकिन ऐसी धमकी देना स्वयं में अपराध है जो भारतीय दंड संहिता की धारा 506 के अन्तर्गत दंडनीय अपराध है। आप के मित्र को चाहिए कि वे किराएदार की ऐसी धमकी को रिकार्ड कर लें और कम से कम दो-तीन लोगों के सामने किराएदार से मकान खाली करने की बात करें। इस से यदि किराएदार उस बात को उन के सामने दोहराएगा तो उन्हें इस मामले में साक्षी बनाया जा सकता है। जब इस बात के पक्के सबूत और गवाह हों कि किराएदार फर्जी और मिथ्या मुकदमों की धमकी दे रहा है तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर किराएदार के विरुद्ध फौजदारी मुकदमा दर्ज करवाएँ। इस मुकदमे के दर्ज हो जाने के बाद मकान को खाली करने के लिए कार्यवाही आरंभ की जा सकती है।

किसी तथ्य को स्वीकार करने के लिए फौजदारी मुकदमा करने की धमकी देना उद्दापन का अपराध है।

समस्या-

भिलाई, छत्तीसगढ़ से अनुतोष मजूमदार ने पूछा है-

मेरी समस्या के बारे में मैं आप से पहले सलाह ले चुका हूँ। आप की सलाह से मैं ने अपने वकील साहब को अवगत करा दिया है।  एक समस्या और आ गई है कि पिछले 9 वर्षों से एक मुस्लिम महिला के साथ निवास कर रहा था।  हमारी शादी कभी नहीं हुई। हमारे बीच विवाद होने पर दिनांक 17.10.2011 से हतम अलग रह रहे थे। अब उस ने मुझे पर एवं मेरे माता पिता पर धारा 498अ, 506, 294, 323, 34 भा.दं.संहिता तथा धारा 125 दं.प्र.संहिता के मुकदमे किए हैं।  धारा 125 का मुकदमा निर्णय की स्थिति में है और उस महिला का व्यवहार उग्र होता जा रहा है।  उस ने मुझे धमकी दी है कि अगर मैं ने उसे पत्नी नहीं स्वीकारा या न्यायालय द्वारा पत्नी साबित न होने की स्थिति में वह मुझ पर एवं मेरे पिता व भाई पर धारा 376 का मुकदमा दायर करवाएगी।  क्या ऐसा किया जा सकता है? ये लांछन तो सहन नहीं हो पाएगा। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान

Code of Criminal Procedureस तरह किसी महत्वपूर्ण तथ्य की संस्वीकृति प्राप्त करने के लिए फर्जी फौजदारी मुकदमा दायर करने की धमकी देना धारा 388  भा.दंड संहिता के अंतर्गत संज्ञेय अपराध है। धारा 388 भा.दं.संहिता निम्न प्रकार है-

388. मॄत्यु या आजीवन कारावास, आदि से दंडनीय अपराध का अभियोग लगाने की धमकी देकर उद्दापन–जो कोई किसी व्यक्ति को स्वयं उसके विरुद्ध या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध यह अभियोग लगाने के भय में डालकर कि उसने कोई ऐसा अपराध किया है, या करने का प्रयत्न किया है, जो मॄत्यु से या 1[आजीवन कारावास] से या ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय है, अथवा यह कि उसने किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा अपराध करने के लिए उत्प्रेरित करने का प्रयत्न किया है, उद्दापन करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और जुर्माने से भी दंडनीय होगा, तथा यदि वह अपराध ऐसा हो जो इस संहिता की धारा 377 के अधीन दंडनीय है, तो वह 1[आजीवन कारावास] से दंडित किया जा सकेगा ।

प को तुरंत पुलिस को इस की सूचना दे कर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाना चाहिए। यदि पुलिस ऐसी सूचना दर्ज करने से इन्कार करे तो तुरंत इस मामले में मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर मामला दर्ज कराना चाहिए।

सा परिवाद धारा 156 (3) के अंतर्गत न्यायालय पुलिस को कार्यवाही के लेय़ भेज सकता है या फिर स्वयं जाँच कर के उस पर प्रसंज्ञान ले सकता है। इस कार्यवाही से धमकी देने वाले पर फौजदारी मुकदमा दर्ज हो जाएगा। वैसी स्थिति में वह कोई मुकदमा आप के या आप के पिता व भाई के विरुद्ध दर्ज भी करवाती है तो आप के पास उसे फर्जी कह कर रद्द करवाने का पूरा अवसर रहेगा और आप मिथ्या बदनामी से बचेंगे।

धौंस जमाने पर आयकर अधिकारी की शिकायत उस के उच्चाधिकारियों और वित्त मंत्रालय से करें

 दीपक कुमार ने पूछा है –

क आयकर अधिकारी पर अनुसूचित जाति जनजाति के व्यक्ति को परेशान और अपमानित करने का मुकदमा चला और उसे छह माह का कठोर कारावास हुआ है। अपील में मुकदमा 2003 से आज तक चल रहा है और उच्चन्यायालय से अभी तक कोई निर्णय नहीं हुआ है। यह अधिकारी हम पर आयकर विभाग की धौंस जमा कर परेशान कर रहा है। हम उस अधिकारी की सारी जानकारी आयकर विभाग से कैसे प्राप्त कर सकते हैं? क्या इस मुकदमे का आयकर अधिकारी की सेवा में कोई अंतर नहीं पड़ता। या इस पर क्या कार्यवाही की जा सकती है?
 उत्तर –
दीपक जी,
यकर विभाग से आप उस अधिकारी के बारे में क्या जानकारी चाहते हैं? जो भी जानकारी चाहते हैं आप सूचना के अधिकार के अंतर्गत मांग सकते हैं। लेकिन उस जानकारी का आप क्या और कैसे उपयोग करना चाहते हैँ? यह स्पष्ट नहीं है। वैसे विभाग में उस अधिकारी के बारे में शायद ही कोई ऐसी जानकारी उपलब्ध हो जो आप के काम आ सके। 
ह अधिकारी आप पर धौंस जमा रहा है तो उस की शिकायत पुलिस में अवश्य करें। समस्या यह है कि सरकार के सभी उच्च स्तरों पर इतना भ्रष्टाचार है कि मुश्किल से ही कोई अधिकारी दूध का धुला हो। सभी काली कमाई करते हैं। आयकर यदि उन की सम्पत्ति की जाँच करे तो अघोषित आय पकड़ी जाए। इस कारण से उन से सभी डरते हैं और यही कारण है कि आयकर अधिकारियों के हौंसले भी बहुत बढ़े हुए हैं। लेकिन वास्तव में इन की धौंस में कोई दम नहीं होता। आप उक्त अधिकारी की ऐसी धौंस देने की शिकायत पुलिस में दर्ज करवाएँ और यदि पुलिस कुछ न करे तो आप सीधे न्यायालय में उस के विरुद्ध शिकायत दर्ज करवा कर मुकदमा दर्ज करवा सकते हैं। 
क्त आयकर अधिकारी के संबंध में मुख्य आयकर आयुक्त को तथा वित्त मंत्रालय को शिकायत की जा सकती है कि वह एक सजायाफ्ता मुजरिम है लेकिन निर्णय की अपील लंबित है। ऐसी अवस्था में उस की सेवाएँ समाप्त भी की जा सकती हैं और निलंबित भी की जा सकती हैं। निलंबन कोई दंड नहीं होता। लेकिन इस तरह के अधिकारियों के लिए यह दंड से कम नहीं होता। फिर धौंस नहीं चलती। वैसे यह आयकर विभाग पर निर्भर करता है कि वह अपील के चलते अधिकारी को निलंबित करे या न करे। फिर भी आप को उस की शिकायत अवश्य करनी चाहिए। वैसे एक साधारण व्यक्ति को ये धौंस ही दे सकते हैं कुछ कर नहीं सकते।

मकान मालिक बिना नोटिस मकान से बेदखल कर देने की धमकी देता है, क्या करें?

 दिल्ली से राकेश कुमार पूछते हैं –

मैं किराए के घर में रहता हूँ। मेरा मकान मालिक मुझे हमेशा धमकी देता है कि वह मुझे बिना नोटिस के बेदखल कर देगा। मैं क्या कर सकता हूँ?

उत्तर –

राकेश जी,

प निश्चिंत रहें। आप को आप का मकान मालिक दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम 1958 की धारा 14 में वर्णित आधार उपलब्ध हुए बिना मकान से बेदखल नहीं कर सकता। बेशक, इस के लिए उसे आप को कोई नोटिस देने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन इस के लिए उसे न्यायालय में आप के विरुद्ध मकान खाली करने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करना होगा। न्यायालय आप को समन भेजेगा और सुनवाई का पूरा अवसर प्रदान करेगा। वाद में यह सिद्ध हो जाने पर ही कि उस के पास आप से मकान खाली कराने का इस धारा के अंतर्गत वर्णित कोई आधार उपलब्ध है, आप से मकान खाली कराने की डिक्री पारित करेगा। यदि आप के विरुद्ध मकान खाली करने की डिक्री पारित की जाती है तो आप को कम से कम एक अपील प्रस्तुत करने अवसर पुनः प्राप्त होगा। यदि आप अपील करते हैं और अपील में भी डिक्री बनी रहती है निरस्त नहीं की जाती है तो ही मकान मालिक आप के विरुद्ध उस डिक्री का न्यायालय के माध्यम से निष्पादन करवा कर ही मकान खाली करा सकता है।
प को सिर्फ यह करना है कि आप अपनी ओर से कोई ऐसा कारण उत्पन्न न होने दें जिस से मकान मालिक को उक्त कानून की धारा-14 में वर्णित कोई आधार उपलब्ध हो। आप नियमित रूप से किराया अदा कर के उस की रसीद मकान मालिक से प्राप्त करते रहें। यदि मकान मालिक रसीद नहीं देता है तो आप न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर वहाँ किराया जमा कराते रहें। यदि मकान मालिक द्वारा आप को धमकी देना जारी रहता है तो आप सब से पहले तो इलाके के पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखाएँ। यदि पुलिस रिपोर्ट लिखने से मना करती है तो रिपोर्ट को इस आशय के आवेदन के साथ कि पुलिस थाना ने आप की रिपोर्ट दर्ज नहीं की है, संलग्न कर इलाके के एस.पी. को रजिस्टर्ड ए.डी़. डाक से प्रेषित कर दें। आप यह रिपोर्ट इंटरनेट के माध्यम से अपने इलाके के एस.पी, को ई-मेल के माध्यम से भी प्रेषित कर सकते हैं, लेकिन रजिस्टर्ड ए.डी. के माध्यम से अवश्य भेजें। आप चाहें तो अपनी ओर से वाद प्रस्तुत कर इस बात की निषेधाज्ञा मकान मालिक के विरुद्ध न्यायालय से प्राप्त कर सकते हैं कि वह आप को अकारण तंग न करे और बिना वैधानिक रीति अपनाए आप को अन्य किसी रीति से बेदखल न करे। आप दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम संपूर्ण यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

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