Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Judge Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Supreme Court wife Will अदालत अनुबंध अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक दीवानी वाद न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

न्याय प्राप्ति एक दुःस्वप्न …पूर्व मुख्य न्यायाधीश वी.एन.खरे

भारत में न्याय प्राप्ति का स्वप्न एक दुःस्वप्न बन चुका है। उस का कारण न्याय प्राप्ति में देरी है। हर वर्ष सरकार उस के लिए अनेक कदम उठाती है लेकिन मूल कारण अदालतों और जजों की कमी को समाप्त करने में वह स्वयं को अक्षम पाती है। इस समस्या और न्याय पालिका से संबद्ध अन्य मामलों पर वर्षारंभ पर उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश सुप्रीम कोर्ट श्री वीएन खरे ने अपने विचार प्रकट किए हैं। देखिए वे क्या कहते हैं? …

यक्ष प्रश्न

स साल भी आम आदमी को राहत नहीं मिली। साल की शुरुआत में न्यायपालिका के सामने एक यक्ष प्रश्न था कि आखिर कब तक मामले टलते रहेंगे? साल के अंत में भी यह सवाल अपनी जगह पर कायम है। टू-जी स्पेक्ट्रम आबंटन, काला धन, सीवीसी की नियुक्ति, बेल्लारी खनन घोटाला, गोदामों में अनाज का सड़ना, भू-अधिग्रहण और सलवा जुडुम जैसे मसले साल भर सुर्खियों में रहे। जाहिर है, इस साल को न्यायिक सक्रियता (कुछ लोगों के मुताबिक अति सक्रियता) के तौर पर याद किया जा सकता है, पर चुनौतियां बदस्तूर बनी हुई हैं। पहली चुनौती है कि मौजूदा न्याय प्रणाली साल भर मानव संसाधन की कमी से जूझती रही। यह एक बड़ी वजह है, जिससे हमारे यहां न्यायिक फैसले लंबित रहते हैं। हमारे देश में प्रति दस लाख की आबादी पर महज 13.5 न्यायाधीश हैं। यह अनुपात काफी कम है, जबकि पश्चिमी देशों में यह अनुपात 140 से लेकर 150 के बीच में है। इससे देश की न्यायिक स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसमें दो-राय नहीं कि याचिका से लेकर सुनवाई, कानूनी प्रक्रिया और फैसले तक पहुंचते-पहुंचते एक लंबा वक्त गुजर जाता है। बावजूद इसके लोग इंसाफ से दूर ही रहते हैं, क्योंकि एक न्यायाधीश एक बार में कई फैसलों को निपटाता है। जब  मैं सुप्रीम कोर्ट का प्रधान न्यायाधीश था, तो सुझाव दिया था कि इस अनुपात  को कम से कम 40 किया जाए। पर इससे जो आर्थिक बोझ बढ़ेंगे, उसे सहने को हमारी व्यवस्था तैयार नहीं है। आज हालत यह है कि देश भर के 21 हाईकोर्ट में कुल 895 जजों के पद हैं, जिनमें से 285 रिक्त हैं। दूसरी तरफ, हर साल याचिका व मुकदमों को दर्ज कराने की सूची लंबी होती जा रही है। अनुमानत: भारत के एक छोटे-से शहर में दुर्घटना के 25 मामले रोज दर्ज होते हैं। अपने यहां अपराध की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। इस वजह से आपराधिक मुकदमे बढ़े हैं। इस तरह से एक जिले में प्रत्येक साल रेप, मर्डर, डकैती व हादसों की हजारों रिपोर्टे दर्ज होती हैं। फिर इसके बाद वित्तीय अनियमितताओं की मोटी फाइलें हैं। इनमें सबसे सामान्य है, चेक बाउंस का मामला।  देखा जाए, तो मौजूदा वक्त में लगभग 20 लाख मामले चेक बाउंस के ही हैं। ये सब देखते हुए कहा जा सकता है कि आम आदमी को अगर त्वरित न्याय देना है, तो जजों की और नियुक्तियां करनी होगी।

इन्फ्रास्ट्रक्चर

दूसरी चुनौती इंफ्रास्ट्रक्चर की है। जब एपीजे कलाम हमारे राष्ट्रपति थे, तो उनसे मेरी एक बार इस सिलसिले में बात हुई। मैंने उनसे पूछा, ‘क्या निर्णय लेने की प्रक्रिया में कंप्यूटर शामिल नहीं हो सकता है?’ वह हंसने लगे, उन्होंने कहा कि  इंसाफ देने का काम तो इंसान ही कर सकता है, कंप्यूटर तो हमारी सहूलियत के लिए है। इससे हमारी प्रक्रिया में बस तेजी आ सकती है, लेकिन इस दिशा में खर्च की जरूरत है। आप निचली अदालतों में जाएं, तो पता पड़ेगा कि जज पेड़ के नीचे बैठकर खुले मैदान में सुनवाई कर रहे हैं।  जिस तरह से मुक्त अर्थव्यवस्था को हमने प्रश्रय दिया, उस अनुपात में न्याय  प्रणाली के बुनियादी ढांचे का विकास नहीं हुआ। हां, कोर्ट-कचहरी से उम्मीदें जरूर बढ़ गईं।

भ्रष्टाचार और लोकपाल

साल भर भ्रष्टाचार का मुद्दा गरम रहा। जितने भ्रष्टाचार के मामले आए, उतनी ही सशक्त मांग लोकपाल की बढ़ी। देश की दूसरी व्यवस्थाओं की तरह न्यायपालिका  के लिए भी यह अहम चुनौती है। हालांकि बीते वर्ष की तुलना में हालात ठीक  थे, क्योंकि उस वक्त न्यायाधीशों की संपत्ति को सार्वजनिक करने का मसला गरमाया हुआ था। जहां तक बात लोकपाल के दायरे में न्यायपालिका को लाने की  तो मैं इससे कतई सहमत नहीं हूं। न्यायपालिका की जवाबदेही एक अलग विषय है और इसे लोकपाल की छतरी के नीचे लाना ठीक नहीं होगा, क्योंकि इससे न्यायपालिका की निष्पक्षता खत्म हो सकती है और लोकपाल के आने भर से ही पूरी व्यवस्था भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हो जाएगी। आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू ने लॉर्ड माउंटबेटन को कहा था कि मैं इससे चिंतित हूं कि हमारे यहां भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। माउंटबेटन ने कहा, अगर घर की सफाई करनी है, तो छत से करो। इससे दो बातें साफ हो जाती हैं। पहली, भ्रष्टाचार आजादी के वक्त भी चिंता का विषय था और दूसरा, जब तक व्यवस्था के ऊपर के पायदान को रिश्वतखोरी से मुक्त नहीं किया जाएगा, तब तक वह खत्म नहीं हो सकता। फिर चाहे कोई भी विधेयक क्यों न आ जाए। इसी तरह न्यायपालिका से भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए एक अलग प्रणाली विकसित करनी होगी। जब प्रत्येक नागरिक कुदरती  तौर पर जवाबदेह है, तो व्यवस्थागत सुधार के जरिये जजों की जवाबदेही तो सुनिश्चित होनी ही चाहिए। न्यायिक पारदर्शिता की दिशा में हम इस साल आगे बढ़े जरूर हैं। लेकिन एक बड़ी समस्या यह है कि न्यायिक फैसले अंग्रेजी भाषा  में अंकित होते हैं, जिसे आम आदमी खुद न तो पढ़ पाता है और न समझ पाता है।  इसलिए न्यायिक फैसलों को हिंदी में उपलब्ध कराया जाए। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी।

सब कुछ सरकार और उस के प्रशासन पर निर्भर

स साल हमने देखा कि अनाज सड़ने से लेकर काले धन तक के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने विधायिका व कार्यपालिका को दिशा-निर्देश दिए। मीडिया ने इस प्रवृत्ति को न्यायिक सक्रियता का नाम दिया है। जबकि कुछ लोग इसे अति सक्रियता कह रहे हैं। खैर, यह खुशी की बात है कि हमारी न्याय प्रणाली सजग है और वह जनहित के मुद्दों को सुन रही है। वरना यों ही जमीन अधिग्रहण के मसले पर किसान के पक्ष में व्यावहारिक फैसले नहीं आते। इस मामले पर मेरा बस  इतना ही कहना है कि इसे अहं के टकराव के तौर पर नहीं देखा जाए, बल्कि इसे ‘चेक ऐंड बैलेंस’ समझों।

सब कुछ निर्भर सरकार के प्रशासन पर

साल बीतने को है और हम टू-जी स्पेक्ट्रम, ग्रेटर नोएडा जमीन विवाद जैसे मुद्दों की चर्चा न करें, यह नहीं हो सकता है। जमीन अधिग्रहण जैसे मसलों पर  हमें और व्यावहारिक नीति अपनानी होगी। एक ऐसे कानून की जरूरत है, जो किसानों को जमीन के बदले उचित मुआवजा दिलाए और उनके भविष्य को सुरक्षित रखे। हम जानते हैं कि मुआवजे की रकम उम्र भर नहीं रहती, इसलिए सरकार किसानों को फ्यूचर बॉन्ड मुहैया कराए। टू-जी स्पेक्ट्रम के कथित घपलों ने सोती हुई जनता को जगाया है। इसलिए सरकारी आबंटनों के लिए भी एक ठोस कानून बनाने होंगे, जिसका सिद्धांत हो ‘वन लाइन ऑक्शन।’ इसमें बोली लगाने वाली कंपनियों की हैसियत आंकने के लिए बैंक गारंटी को जमा करना अनिवार्य किया जाए। काला धन व मनी लॉड्रिंग एक बड़ा मसला है। इसके लिए हमें संबंधित देश  के साथ पुरानी संधियों को बदलने पर जोर देना होगा। अगर हमने अपने कार्यान्वयन को दुरुस्त नहीं किया, तो ये चुनौतियां अगले साल भी कायम रहेंगी। कानून बनने भर से हालात नहीं सुधरेंगे,  उनके अमल पर भी जोर देना होगा। यह प्रशासन के हाथ में है।

न्याय प्रणाली में सुधार आवश्यक है जिस से पक्षकार या वकील उसे लंबा न कर सकें

बिजनेस स्टेंडर्ड के 18 सितंबर 2011 के अंक में एम. जे. एंटनी के एक लेख का हिन्दी अनुवाद वकीलों की चालबाजी से लंबी खिंच जाती है मुकदमे बाजी शीर्षक से प्रकाशित किया है। इस आलेख में उन्हों ने उच्चतम न्यायालय के दो निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा है कि सभी न्यायाधीश अतीत में अधिवक्ता की भूमिका अदा कर चुके होते हैं, इसी तरह सभी अधिवक्ताओं के भविष्य में न्यायाधीश बनने की संभावना रहती है। इस तरह वे समूची न्याय प्रणाली को अंदरूनी तौर पर जानते हैं। ऐसे में अगर न्यायाधीश उन कुछ युक्तियों का खुलासा करते हैं जिनको अपना कर विधि पेशे के लोग न्याय प्रक्रिया में देरी करते हैं तो लोगों को उनकी बातों को गौर से सुनना चाहिए। 
ल्लखित मामलों में से एक मामला तो दिल्ली उच्च न्यायालय में वर्ष 1977 में शुरू हुआ था।
यह मामला इतने न्यायालयों में घूमता रहा कि सर्वोच्च न्यायालय को इन का आकलन करने में छह पन्ने लग गए। रामरामेश्वरी देवी बनाम निर्मला देवी के इस मामले में अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘यह इस बात का शानदार नमूना है कि कैसे हमारे न्यायालयों में मामले चलते हैं और किस तरह बेईमान वादी इनके जरिए अनंतकाल तक अपने विरोधियों तथा उनके बच्चों को परेशान करने के लिए न्याय प्रणाली का दुरुपयोग कर सकते हैं।’
ह मामला एक व्यक्ति को भूखंड आवंटन से आरंभ हुआ था, बाद में तीन छोटे भाई भी उसके साथ रहने लगे। छोटे भाइयों ने संपत्ति के बँटवारे की मांग की। बँटवारे का मामला तो बहुत पहले ही निपट गया था लेकिन न्यायाधीशों के मुताबिक मामले की लागत कौन वहन करेगा जैसेतुच्छ तथा महत्त्वहीन प्रश्न शेष रह गए। आखिर ये मामले भी सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच ही गए। इस मामले में एक पक्ष द्वारा पेश किए गए बहुत सारे आवेदनों को देखकर (जिनमें से कुछ गलत तथ्यों पर आधारित थे) न्यायालय ने पहले कहा था, ‘याचिकाकर्ताओं का एक मात्र उद्देश्य मुकदमे में देरी करना है, जबकि यह मामला पहले ही 18 वर्षों से लंबित है। यह बात साबित हो चुकी है कि ऐसी तुच्छ मुकदमेबाजी न्याय प्रक्रिया को शिथिल बनाती है और इसकी वजह से सही वादियों को आसानी से और तेज गति से न्याय मिलने में देरी होती है।’
र्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में आगे कहा, ‘और अधिक समय गँवाए बिना प्रभावी उपचारात्मक उपाय नहीं अपनाए गए तो समूची न्यायपालिका की विश्वसनीयता दाँव पर लग जाएगी।’ मामले में न्याय मित्र की भूमिका निभा रहे एक वरिष्ठ अधिवक्ता की किताब “जस्टिस, कोट्र्स ऐंड डिलेज” का हवाला देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि न्यायालयों का 90 फीसदी समय और संसाधन अनचाहे मामलों की सुनवाई में निकल जाते हैं। यह हमारी मौजूदा प्रणाली की कमियों के चलते होता है जिसमें गलती करने वाले को सजा के बजाय प्रोत्साहन मिलता है। यदि न्यायालय इस मामले में चौकस रहें तो मुकदमेबाजी का गलत फायदा उठाने वालों की संख्या को काबू किया जा सकता है। 
पुस्तक के मुताबिक हर लीज अथवा लाइसेंस अपनी नियत तिथि की समाप्ति पर किसी न किसी मामले की वजह बन जाते हैं। न्यायालय ऐसे मामलों से भरे हुए हैं क्योंकि इनमें गलत करने वालों को स्वाभाविक तौर पर लाभ हासिल हो

हमारी सरकारें अभी भी भारत को अपना देश नहीं समझतीं

कुछ दिन पूर्व एक समचार चैनल पर एक वरिष्ठ अधिवक्ता का साक्षात्कार प्रस्तुत किया जा रहा था। समस्या थी जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की। इन कैदियों को जेलों में रखने के लिए हर वर्ष केंद्र और राज्य सरकारों को बहुत धन खर्च करना पड़ता है। सूचनाओं के अनुसार भारत की जेलों में रह रहे कैदियों में से 70 प्रतिशत अपने मुकदमों के फैसले के इंतजार में हैं। अधिवक्ता महोदय का कहना था कि ऐसे कैदियों के लिए यह एक राहत का विषय है कि जिन कैदियों ने अपील की हुई है और निचली अदालत से जो सजा उन्हें दी गई है उस की आधी सजा काटने पर उन्हें रिहा किया जा रहा है। इस तरह की रिहायगी को मानवता की दृष्टि से जायज ठहराया जा सकता है। लेकिन उन का क्या जिन्हें सजा नहीं हुई है और केवल विचारण  में दो से दस वर्ष तक लग रहे हैं? कभी-कभी तो उन्हें जितनी सजा मिलनी होती है उतनी ही वे पहले ही जेलों में काट चुके होते हैं। जो जमानत पर रिहा हो जाते हैं उन्हें अपने मामलों के निर्णयों के लिए बरसों अदालतों में चक्कर काटने पड़ते हैं, आने जाने में ही इतना खर्च करना पड़ता है कि विचारण उन के लिए अदालत द्वारा दी जाने वाली सजा से कम नहीं।

लिए यह कहा जा सकता है कि विचारण में समय तो लगता ही है। आखिर आरोप तय किए जाएंगे, गवाह के बयान होंगे फिर ही निर्णय दिया जा सकता है।  लेकिन अपील में तो यह सब कुछ नहीं होता। वहाँ तो निचली अदालत से पत्रावली जाती है और दोनों पक्ष अपनी अपनी बहस करते हैं और फिर अदालत को फैसला देना होता है। यह काम तो सप्ताह भर में निपटाया जा सकता है। लेकिन उस में भी कई कई वर्ष लग जाते हैं, सजा पाया हुआ व्यक्ति जिस ने अपील की होती है वह जेल  में अपने निर्णय की प्रतीक्षा करता रहता है।
दीवानी मामलों की हालत और बुरी है। एक मकान मालिक है उस ने अपनी दो दुकानें किराए पर दे रखी हैं, उसे दुकानों की जरूरत है लेकिन किराएदार दुकानें खाली नहीं कर रहे हैं। उलटे न्यूसेंस पैदा करते हैं। उन्होंने मकान मालिक का जीना हराम कर रखा है। अब मकान मालिक के पास अदालत जाने के सिवा क्या चारा है? लेकिन वह अदालत जाने से भय खाता है, इसलिए कि वहाँ दस या बीस या तीस बरसों में फैसला होगा। वह अदालत के बाहर तरकीब तलाशने लगता है। वहाँ दो ही तरीके हैं। एक तो किराएदार को मुहँ मांगा धन दे कर अपनी दुकान खाली कराए। दूसरा ये कि पुलिस को रिश्वत दे कर या गुंडों को पैसा दे कर अपनी दुकान खाली करा ले। दोनों ही मामलों में अपराध को बढ़ावा मिल रहा है वह भी सिर्फ इसलिए कि न्याय जल्दी नहीं मिल रहा है। इस तरह हमारी न्यायव्यवस्था की कमी खुद अपराधों को बढ़ावा दे रही है। खुद मुझे अपने मकान को खाली कराने में 19 वर्ष लगे थे।

 म यह सोच सकते हैं कि कैसे विचाराधीन कैदियों को जेल से बाहर निकाला जाए। किन्हें जमानत पर छोड़ा जाए और किन्हें अंदर रखा जाए? मुकदमों के निपटारे के लिए समझौतों को प्रोत्साहन दिया जाए, लोक अदालतें लगाई जाएँ। हम सब कुछ कर सकते हैं, लेकिन ऐसी न्याय व्यवस्था देने की बात पर विचार नहीं कर सकते कि कैसे अदालतों में विचारण एक वर्ष में पूरा होने और अपील की एक माह में सुनवाई की स्थिति लाई जाए। यह स्थिति लाई जा सकती है लेकिन उस के लिए अदालतों की संख्या बढ़ानी पड़ेगी,

पैबंद लगी पैरहन

ल के आलेख न्यायालयों की श्रेणियाँ और उन में न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ पर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की टिप्पणी थी कि “इसमें परिवार न्यायालयों, उपभोक्ता फोरम व विविध ट्रिब्यूनल्स के बारे मे भी बता दें तो अच्छा रहेगा”। लेकिन मैं उस से पहले यह बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि आखिर इतने सारे भाँति-भाँति के न्यायालयों की आवश्यकता क्या है? और है भी या नहीं?  किसी भी देश की न्याय प्रणाली के लिए दो ही तरह के दीवानी और अपराधिक न्यायालय पर्याप्त हैं। एक तरह के न्यायालय अपराधों की रोकथाम के लिए तथा दूसरे तरह के न्यायालय सामाजिक व्यवहार को बनाए रखने के लिए। इन के माध्यम से सभी प्रकार के मामलों का निपटारा किया जा कर समाज में न्यायपूर्ण व्यवहार को स्थापित किया जा सकता है और उसे बनाए रखा जा सकता है।
किसी शरीर को चलाने के लिए यह आवश्यक है कि उसे उस की आवश्यकतानुसार आवश्यक खुराक मिलती रहे। यदि पर्याप्त खुराक न मिले तो शरीर कुपोषण का शिकार हो जाता है और फिर अनेक प्रकार के संक्रमण उसे घेर लेते हैं। तब इन संक्रमणों के लिए अनेक प्रकार की चिकित्सा पद्धतियाँ विकसित होने लगती हैं। हमारी न्याय व्यवस्था की स्थिति ऐसी ही है। हमारी न्याय व्यवस्था कभी भी आवश्यकता के अनुरूप नहीं रही है, अपितु उस का आकार जितना होना चाहिए उस का चौथाई भी नहीं है। यह बात अनेक बार इस ब्लाग पर कही जा चुकी है। हमें दस लाख की आबादी पर कम से कम पचास अधीनस्थ न्यायालय चाहिए। आबादी के ताजा आँकड़ों 121 करोड़ के लिए हमें देश में 65000 अधीनस्थ न्यायालयों  की आवश्यकता है लेकिन हमारे पास वर्तमान में 15000 न्यायालय भी नहीं हैं। हम हरदम अपनी तुलना अमरीका से करना चाहते हैं, लेकिन उन के पास 10 लाख की आबादी पर 111 न्यायालय हैं और ब्रिटेन में 55 न्यायालय। 
ब पर्याप्त संख्या में न्यायालय नहीं हैं तो हर क्षेत्र में अन्याय की उपस्थिति और उस से निपटने का अभाव दिखाई देता है। वैसी स्थिति में सरकारें जहाँ भी वस्त्र फटा हुआ दिखाई देता है वहीं पैबंद लगाने की कोशिश करती है। श्रमिकों के साथ अन्याय है तो श्रम-न्यायालय स्थापित कर दिए गए। अनुसूचित जाति के लोगों के साथ अन्याय है तो उन के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना कर दी गई। वैवाहिक और पारिवारिक मामलों में जल्दी निर्णय नहीं हो रहे हैं तो पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना कर दी गई। चैक बाउंस के मामले बढ़ गए तो उन के लिए विशेष न्यायालय स्थापित कर दिए गए। मकान मालिक-किराएदारों के विवादों के लिए, टैक्स न चुकाने के मामलों के लिए, बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के कर्जों के मामलों के लिए, उपभोक्ता मामलों के लिए, भ्रष्टाचार के मामलों आदि के लिए अलग अलग न्यायालय स्थापित कर दिए गए। लेकिन इन सब की उत्पत्ति का कारण एक ही है कि हमारी सामान्य दीवानी और अपराधिक न्याय व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। 
विशेष रुप से स्थापित किए गए इन न्यायालयों की प्रकृति या तो दीवानी है या फिर अपराधिक। इन की प्रक्रिया भी या तो दीवानी है या फिर अपराधिक। इन सभी न्यायालयों के निर्णयों की अपील या पुनरीक्षण उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय कर सकता है। जब सारे प्रकार के मामले उच्च न्यायालय कर सकता है तो फिर केवल दीवानी और अपराधिक न्यायालयों से ही न्याय की स्थापना की जा सकती है।  इस से यह स्पष्ट है कि ये न्यायालय केवल यह संतुष्टि प्रदान करने के लिए हैं कि जनता यह महसू

अगले दस वर्षों में एक लाख जज नियुक्त करने होंगे

रकारी आँकड़ों के अनुसार भारत में 4,30,000 लोग जेलों में बंद हैं, जिन में से तीन लाख बंदी केवल इसलिए बंद हैं कि उन के मुकदमे का निर्णय होना है। 2007 में यह संख्या केवल 2,50,727 थी। केवल तीन वर्षों में विचाराधीन बंदियों की संख्या में 50,000 का इजाफा हो गया। इन विचाराधीन बंदियों में से एक तिहाई से अधिक 88,312 अनपढ़ हैं, इन में माध्य़मिक स्तर से कम शिक्षित बंदियों की संख्या जोड़ दी जाए तो यह संख्या विचाराधीन बंदियों की कुल संख्या का 80% (1,96,954) हो जाएगी।  2007 में विचाराधीन बंदियों की कुल संख्या 2,50,727 थी जिस में से 1891  पाँच वर्ष से भी अधिक समय से बंद थे।
गस्त 2010 में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि सभी विचारण न्यायाधीशों ने मुकदमों के निस्तारण की गति में उच्चस्तर बनाये रखा है। ऐसे में हमारे अपराधिक न्याय तंत्र के लिए यह एक भयावह स्थिति है। इन में ऐसे बंदी भी सम्मिलित हैं कि जिन पर चल रहे मुकदमे में जितनी सजा दी जा सकती है, उस से कहीं अधिक वे फैसले के इन्तजार में जेल में रह चुके हैं।  52 हजार से अधिक बंदी ऐसे हैं जिन पर हत्या करने का आरोप है। हो सकता है कि पाँच वर्ष से अधिक समय से बंद 1891 विचाराधीन बंदी हत्या के ही अपराध में बंद हों. लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि इन में से कितने ऐसे हैं जिन पर हत्या का आरोप संदेह के परे साबित किया जा सकेगा। 
वास्तविकता यह है कि जब भारत का संविधान निर्मित हो रहा था, और अनुच्छेद 21 पर चर्चा हुई तो अपराधिक मुकदमों की प्रक्रिया, निष्पक्ष विचारण, जीवन के मूल अधिकार तथा अन्य बिंदुओं पर विचार किया गया। लेकिन तेज गति से विचारण का बिंदु चर्चा में सम्मिलित ही नहीं था। यह बात पहली बार तब सामने आई जब 1979 में हुसैन आरा खातून के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा कि तेजगति से विचारण अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अभियुक्त का मूल अधिकार है। इस के उपरांत इस बात को न्यायालयों ने अनेक बार दोहराया है, लेकिन अभी तक विचाराधीन बंदियों के लिए यह अधिकार एक सपना ही बना हुआ है। 1970 के बाद  विचारधीन बंदियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। लेकिन उन में सजा काटने वाले कम हैं और अदालत में अपने दिन की प्रतीक्षा करने वाले अधिक। 
खिर इस स्थिति का हल क्या है? विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने मामूली आरोपों के बंदियों को 2010  के अंत तक रिहा किए जाने की एक योजना घोषित की थी,  जिस से  विचाराधीन तीन लाख बंदियों में से दो तिहाई को रिहा किया जा सके और जेलों की भीड़ को कम किया जा सके। लेकिन इस योजना पर कितना अमल हुआ है? इस की जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस के अलावा विभिन्न कमेटियों और सरकारी दस्तावेजों के आधार पर जो हल सुझाए गए हैं वे इस प्रकार हैं-
1. अपराधिक न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जाए जिस से मुकदमों का शीघ्र निस्तारण किया जा सके।
2. अदालतों की तकनीकी और आधारभूत सुविधाओं को बढ़ाया जा सके जिस से मुकदमा निस्तारण की गति बढ़ सके।
3. पुलिस व्यवस्था में सुधार लाया जाए जिस से

न्यायिक सुधार – ऊँट के मुहँ में जीरे के समान भी नहीं



बार एंड बैंच, एक भारतीय अंग्रेजी  वेबसाइट है जो भारत में विधि और न्यायिक पत्रकारिता के क्षेत्र में नए आयाम स्थापित करने में जुटी है। इसी ने कल अपनी वेबसाइट पर भारतीय न्यायिक प्रणाली के गंभीर संकट को प्रकट करते आँकड़े जारी किए हैं। आप भी अवलोकन कीजिए कि हमारे यहाँ न्याय प्रणाली की स्थिति क्या है? ……

भारतीय न्यायालयों में लंबित मुकदमों की स्थिति का त्रिवर्षीय आकलन …
स सारणी से स्प्ष्ट है कि लंबित मुकदमों की संख्या प्रतिवर्ष 3.4 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। लंबित मुकदमों की संख्या जजों की कमी की संख्या की समानुपाती है।  इस से स्पष्ट है कि न्यायालयों की संख्या बढ़ाया जाना आवश्यक है। जरा हम यह भी देखें कि हमारे यहाँ के न्यायालयों में न्यायाधीशों के कितने पद रिक्त पड़े हैं? ……
न्यायाधीशों के स्वीकृत और रिक्त पद
च्चतम न्यायालय में रिक्त प

मोइली साहब! मौजूदा से चार गुनी नहीं, तो दुगनी ही दे दीजिए

ब मोइली साहब ने कह तो दिया है कि छह माह में फैसला मिलना ही चाहिए। लेकिन जरा ये तो बताएँ कि ये होगा कैसे? हमारे यहाँ की सब अधीनस्थ दांडिक अदालतें 138 परक्राम्य अधिनियम (चैक बाउंस) के मुकदमों से अटी थीं। ट्रेफिक कतई जाम था। राज्य सरकार ने एक विशेष अदालत इसी काम के लिए स्थापित कर दी जैसे ट्रेफिक जाम के लिए हाई वे पर बाई पास बनाया हो।  सारे मुकदमे उधर ट्रांसफर हो गए। पता लगा उस अदालत में मुकदमों की संख्या दस हजार से अधिक हो गई है। उधऱ तो ट्रेफिक सरकने के बजाए बिलकुल खड़ा हो गया है। अब सुना है कि एक अदालत और स्थापित की जा रही है। पर उस से क्या होगा? ऊँट के मुहँ में जीरा है वह। मुकदमों और जनसंख्या के हिसाब से अदालतें स्थापित करना जरूरी बनाइए राज्य सरकारों के लिए। मोइली साहब! देश में जितनी अदालतें अभी मौजूद हैं, कम से कम उस से चार गुनी और चाहिए। आप अपने कार्य काल में दुगनी ही दे दीजिए। 

मद्रास में दांडिक न्याय प्रशासन : भारत में विधि का इतिहास-65

सदर निजामत अदालत
द्रास प्रेसीडेंसी में भी कलकत्ता के सदर निजामत अदालत की तर्ज पर सदर निजामत अदालत के नाम से 1802 के आठवें विनियम के अंतर्गत मुख्य दंड न्यायालय स्थापित किया गया। इस की अध्यक्षता सपरिषद गवर्नर को सौंपी गई। गवर्नर और परिषद के सदस्यों को अपराधिक मामलों का प्रसंज्ञान करने का अधिकार दिया गया। वे न्यायाधीशों के रूप में अपराधिक मामलों का विचारण कर के दण्ड अधिरोपित कर सकते थे। उन्हें मृत्युदंड देने का भी अधिकार प्रदान किया गया था।  
सर्किट न्यायालय
लकत्ता के प्रान्तीय न्यायालयों की तरह ही मद्रास में भी सर्किट न्यायालयों की स्थापना की गई थी। ये न्यायालय चल न्यायालय के रूप में काम करते थे और वर्ष में दो बार जिलों का दौरा कर के अपराधिक मामलों का निपटारा करते थे। इन न्यायालयों को सामान्य प्रकृति के अपराधों के लिए दंड देने करने की शक्ति प्रदान की गई थी। जघन्य अपराधों के लिए दंड देने के लिए मुख्य दंड न्यायालय का अनुमोदन आवश्यक था।
मजिस्ट्रेट और सहायक मजिस्ट्रेटों के न्यायालय
1802 के छठे विनियम के अंतर्गत मजिस्ट्रेट और सहायक मजिस्ट्रेट नियुक्त करने का उपबंध किया गया था। उन का काम अभियुक्त को बंदी बनाना, अपराध की आरंभिक जाँच करना, अभियुक्तों को विचारण के लिए उपयुक्त न्यायालयों के सुपुर्द करना आदि थे। मजिस्ट्रेट और सहायक मजिस्ट्रेट चोरी, हमला कर चोट पहुँचाना आदि सामान्य अपराधों के लिए 15 दिन तक के कारावास और 200 रुपए तक का दंड प्रदान कर सकते थे। 
1802 की योजना के अंतर्गत न्यायालयों में मुस्लिम दंड विधि का उपयोग होता था। सिविल मामलों में हिन्दू व मुस्लिम पक्षकारों के लिए उन की व्यक्तिगत विधियों का प्रयोग किया जाता था। यदि पक्षकार विभिन्न धर्मावलंबी हों तो प्रतिवादी की व्यक्तिगत विधि का प्रयोग होता था। इस के साथ ही साम्य, विवेक और शुद्ध अंतःकरण के सिद्धांतों का उपयोग किया जाता था।

मद्रास प्रेसीडेंसी में न्यायिक प्रशासन का विकास : भारत में विधि का इतिहास-64

बंगाल के गवर्नर को गवर्नर जनरल बना देने के बाद इस प्रेसीडेंसी में आने वाले प्रान्तों बंगाल, बिहार और उड़ीसा में न्याय व्यवस्था का विकास तेजी के साथ हुआ लेकिन मद्रास और मुम्बई में यह कुछ धीमी गति से हुआ। हालांकि इन प्रेसीडेंसियों में भी विजित क्षेत्रों को सम्मिलित कर लिए जाने के कारण उन का विस्तार हो रहा था। वहाँ कलकत्ता में प्रचलित न्याय व्यवस्था का ही अनुशीलन किया जा रहा था। हमें इस बीच वहाँ की न्यायिक व्यवस्था में हुए परिवर्तनों पर भी एक नजर अवश्य डालनी चाहिए।

मद्रास का न्याय प्रशासन

र्ष 1797 के अधिनियम द्वारा मद्रास में 26 दिसंबर 1801 में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना हुई जिस ने वहाँ पूर्व में स्थित अभिलेख न्यायालय को प्रतिस्थापित किया। सुप्रीम कोर्ट में एक मेयर, तीन एल्डरमैन और एक अभिलेखक को सम्मिलित किया गया था। इस न्यायालय को भी कलकत्ता के सुप्रीम कोर्ट की ही तरह अधिकारिता प्राप्त थी जिन का विस्तार नगर और संबद्ध क्षेत्रों पर किया गया था। 
1802 की न्यायिक योजना
 इस योजना के तहत कलेक्टर को प्रशासकीय और भू-राजस्व से संबंधित दायित्व सोंपे गए थे। उसे न्यायिक दायित्वों से मुक्त रखा गया था जिस से वह राजस्व संग्रह के काम में प्रवृत्त हो सके। विनियम-3 के अंतर्गत जिला दीवानी अदालततों की स्थापना की गई थी। इस अदालत में किसी भी मूल्य का दीवानी वाद प्रस्तुत किया जा सकता था तथा एक हजार रुपए मूल्य तक के निर्णय बाध्यकारी होते थे। इससे अधिक मूल्य के वादों में निर्णयों की अपील प्रान्तीय न्यायालय को की जा सकती थी। इस न्यायालय को भू-राजस्व के मामलों का निपटारा करने की भी अधिकारिता थी। 
विनियम-4 के अंतर्गत चार प्रान्तीय न्यायालयों की स्थापना की गई थी। ये अपील अदालतें थीं। ये जिला दीवानी अदालत द्वारा 1000 रुपए मूल्य से अधिक के वादों के निर्णयों की अपील सुनते थे। 5000 रुपए मूल्य तक की अपीलों के निर्णय बाध्यकारी होते थे तथा इस से अधिक मूल्य के मामलों की सदर दीवानी अदालत में प्रस्तुत की जा सकती थी। सदर दीवानी अदालत को विनियम-5 के अंतर्गत स्थापित किया गया था। जिस की अध्यक्षता सपरिषद गवर्नर द्वारा की जाती थी। यह 5000 रुपए मूल्य से अधिक के मामलों की सुनवाई करता था। 45000 रुपए मूल्य तक के मामलों के निर्णय बाध्यकारी होते थे। इस से अधिक मूल्य के मामलों की अपील इंग्लेंड स्थित किंग इन कौंसिल को की जा सकती थी। 
विनियम-16 के अंतर्गत स्थानीय कमिश्नर के न्यायालय भी स्थापित किए गए थे जो लघुवादों का निपटारा करते थे।   इन में भारतीय व्यक्तियों को कमिश्नर नियुक्त किया जाता था। ये वैयक्तिक संपत्ति से संबंधित 80 रुपए तक मूल्य के मामलों की सुनवाई कर सकते थे। इस न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध जिला दीवानी अदालत में अपील की जा सकती थी। विनियम-12 के अंतर्गत रजिस्ट्रार के न्यायालय जिलों में स्थापित किए गए थे। इन न्यायालयों की अधिकारिता में 200 रुपए मूल्य तक के सिविल मामले आते थे। 25 रुपए मूल्य तक के मामंलों में रजिस्ट्रार का निर्णय बाध्यकारी होता था, इस से अधिक मूल्य के मामलों में अपील जिला दीवानी अदालत को की जा सकती थी।

न्याय के प्रति राज्य सरकार की चिंता

कोटा नगर जहाँ मैं वकालत का व्यवसाय कर रहा हूँ राजस्थान के प्रमुख औद्योगिक नगरों में से एक है। यहाँ औद्योगिक विवादों का होना स्वाभाविक था। इन की संख्या को देखते हुए राजस्थान सरकार ने यहाँ 1978 में श्रम न्यायालय एवं औद्योगिक न्यायाधिकरण की स्थापना की जिसे कोटा संभाग के सभी जिलों के मामले सुनने का अधिकार दिया गया। मेरी रुचि इन मामलों में थी इस कारण मैं सितंबर 1979 में अपने गृहनगर बाराँ को छोड़ कर कोटा चला आया और मुख्य रुप से इस अदालत में वकालत का आरंभ किया। हालांकि मैं ने राजस्व मामलों को छोड़ कर सभी प्रकार के मामलों की वकालत की और अब तक करता आ रहा हूँ। लेकिन मेरे पास लगभग आधे मामले हमेशा श्रम और औद्योगिक मामले रहे।
वास्तव में यह अदालत एक आदर्श अदालत थी, और अनेक अर्थों में अब भी है। प्रारंभ में इस अदालत में तीन दिन श्रम मामले सुने जाते थे। दो दिन मोटर यान दुर्घटना दावा अधिकरण का काम होता था और एक दिन भ्रष्टाचार निरोधक अदालत का काम होता था। लेकिन श्रम मामले बढ़ते चले गए। मोटरयान दुर्घटना मामले पहले जिला जज को स्थानांतरित किए गए और भ्रष्टाचार निरोधक न्यायालय पृथक स्थापित हो गया। यह अदालत सप्ताह के छहों दिन औद्योगिक विवादों की सुनवाई करने लगी। उस समय इस अदालत में पन्द्रह दिन से अधिक की पेशी किसी मुकदमे में नहीं होती थी। अब छह-सात माह की तारीख पड़ती है। इस न्यायालय की इस दुर्दशा के लिए पूरी तरह राज्य सरकार जिम्मेदार है।
स न्यायालय के मुकदमे कुछ जटिल प्रकार के होते हैं। इस कारण से औसतन एक मुकदमे के निपटारे में दो दिन लग सकते हैं। वर्ष में यह न्यायालय लगभग 220 दिन काम करता है। ऐसी अवस्था में यदि यह अपनी सामान्य गति से काम करे तो वर्ष में 110 मुकदमों का निपटारा कर सकता है। वर्तमान में इस न्यायालय में लगभग चार हजार मुकदमे लंबित हैं। मेरे निवेदन पर अदालत ने वर्ष 2003 से ले कर 2009 तक के मुकदमों के निपटारे के आंकड़े उपलब्ध कराए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार वर्ष ……

  • 2003 के आरंभ में 2988 मामले लंबित थे, इस वर्ष 531 नए मामले प्राप्त हुए, 320 का निर्णय किया गया और 3199 में शेष रहे। 
  • 2004 के आरंभ में 3199 मामले लंबित थे, इस वर्ष 305 नए मामले प्राप्त हुए, 84 का निर्णय किया गया और 3420 मामले शेष रहे।      
  • 2005 के आरंभ में 3420 मामले लंबित थे, इस वर्ष 310 नए मामले प्राप्त हुए, 168 का निर्णय किया गया और 3562 मामले शेष रहे।      
  • 2006 के आरंभ में 3562 मामले लंबित थे, इस वर्ष 180 नए मामले प्राप्त हुए, 267 का निर्णय किया गया और 3475 मामले शेष रहे।  
  • 2007 के आरंभ में 3475 मामले लंबित थे, इस वर्ष 424 नए मामले प्राप्त हुए, 215 का निर्णय किया गया और 3684 मामले शेष रहे।
  • 2008 के आरंभ में 3684 मामले लंबित थे, इस वर्ष 288 नए मामले प्राप्त हुए, 138 का निर्णय किया गया और 3834 मामले शेष रहे।
  • 2009 के आरंभ में 3834 मामले लंबित थे, इस वर्ष 283 नए मामले प्राप्त हुए,218  का निर्णय किया गया और 3899 मामले शेष रहे।
प स्वयं ही देख सकते हैं कि यह अदालत औसतन वर्ष में 200 मामलों में निर्णय पारित कर सकती है और वर्तमान में लगभग चार हजार मामले लंबित हैं। ऐसी स्थिति में यदि इस अदालत में एक भी मामला नया नहीं दिया जाए तो भी इस अदालत को लंबित मामलों के निपटारे में बीस वर्ष लग सकते हैं। ये सब आँकड़े प्रत्येक वर्ष राज्य सरकार को उपलब्ध कराए जाते हैं और प्रत्येक तिमाही पर उन्हें अपड़ेट किया जाता है। लेकिन लगता है कि ये सब आँकड़े राज्य सरकार के गोदाम में जा कर दफ्न हो जाते हैं। न तो न्यायालय में काम की गति को बढ़ाने के लिए कोई उपा
य किए जाते हैं और न ही एक और इसी तरह का न्यायालय स्थापित किए जाने के लिए कोई सिलसिला आरंभ किया जाता है। आरंभ में इस न्यायालय में जितने कर्मचारी थे उन में से दो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी एक रीडर और एक लिपिक कम कर दिए गए हैं। इसी वर्ष एक और लिपिक सेवा निवृत्त होने वाला है। लगता है कि उस का स्थान भी रिक्त ही रहेगा। 
स न्यायालय में दो टाइप मशीनें 32 वर्ष पुरानी हैं जो जर्जर हो चुकी हैं और कभी भी  जवाब दे सकती हैं। कंप्यूटर स्थापित करने के लिए पिछले दस वर्षों से राज्य सरकार को लिखा जा रहा है लेकिन राज्य सरकार उस के लिए बजट ही नहीं दे रही है। आप इस न्यायालय की दशा को देख कर अनुमान लगा सकते हैं कि राज्य सरकारें सब से कमजोर तबके को न्याय प्रदान करने के लिए कितनी चिंता करती है।