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लिव इन रिलेशन न्यायपालिका की कम समय में वैवाहिक विवादों का निपटारा करने की अक्षमता से उपजा है।

समस्या-

मनोज राठोड़ ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या ऐसा कोई प्रावधान है? जिस में पत्नी पति के साथ 5 वर्षो से साथ न रहती हो तो लिव इन रिलेशनशिप के तहत किसी अन्य महिला के साथ कानूनी रूप से एक नियत समय के एग्रीमेंट के साथ वह पुरुष रह सके? यदि ऐसा हो सकता है  तो किस कानून के तहत और ना तो किस कानून के तहत नहीं रह सकते?

समाधान-

ह समस्या बड़ी व्यापक है। पहले इस के कारणों पर कुछ रोशनी डाना चाहूंगा। यदि पति पत्नी के बीच विवाद हो और पति पत्नी का साथ रहना संभव नहीं रहा हो तो दोनों के बीच इन सब समस्याओं का हल केवल और केवल न्यायालय के माध्यम से ही संभव है। इस के लिए पति या पत्नी दोनों में से कोई एक को या दोनों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी। अब आप की जो समस्या है उस का मूल इस तथ्य में है कि न्यायालय कम समय में वैवाहिक विवादों का हल नहीं कर पा रहे हैं। यदि वे एक दो साल में विवाद को अंतिम रूप से हल कर दें तो यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

एक बार जब यह तय हो गया है कि न्यायालय की मदद के बिना कोई वैवाहिक विवाद हल नहीं किया जा सकता और न्यायालयों के संचालन के लिए साधन जुटाने की जिम्मेदारी सरकार की है तो उसे पर्याप्त संख्या में पारिवारिक न्यायालय स्थापित करने चाहिए जिस से किसी भी वैवाहिक विवाद का समापन कम से कम समय में व अधिकतम एक वर्ष की अवधि में अन्तिम रूप से किया जा सके। यदि ऐसा हो सके तो यह आदर्श स्थिति होगी। लेकिन न तो इस आदर्श स्थिति में देश को पहुँचाने की मानसिकता किसी राजनैतिक पार्टी और सरकार में है और न ही सिविल सोसायटी या जनता की ओर से इस तरह का कोई आंदोलन है। इस कारण यह स्थिति फिलहाल कई सालों तक बने रहने की संभावना है। यह भी सही है कि जब हमारी न्याय व्यवस्था किसी समस्या का हल कम समय में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहती है तो लोग न्याय व्यवस्था से इतर  उस के लिए अस्थाई हल तलाशने लगते हैं। अनेक बार ये अस्थायी हल ही लगभग स्थायी हल का रूप ले लेते हैं। लिव इन रिलेशन वैवाहिक मामलों में वर्तमान विधि और न्याय व्यवस्था की असफलता का ही परिणाम हैं।

आप ने समस्या का जो हल सुझाया है उस पर विचार करें तो पाँच वर्ष से पत्नी किसी पति से अलग रह रही है और यह अकारण है तो यह विवाह विच्छेद का एक मजबूत आधार है। यदि पृथक रहने का कोई कारण भी है तो भी इस से सप्ष्ट है कि विवाह पूरी तरह से असफल हो चुका है और न्यायालय को तलाक की डिक्री पारित कर देनी चाहिए। लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था यह सब समय रहते नहीं कर सकती उस के पास इन कामों के लिए जज बहुत कम लगभग चौथाई हैं और समस्याएँ चार गुनी। इस कारण ऐसे पति और पत्नी लिव इन रिलेशन की बात सोचते हैं। यदि आप एग्रीमेंट के साथ किसी स्त्री के साथ लिव इन रिलेशन बनाते हैं तो उस में यौन संबंध बनना अनिवार्य होगा और आप का तलाक नहीं हुआ है तो विवाह में रहते हुए दूसरी स्त्री से यौन संबंध बनाना ऐसा कृत्य होगा जिस के कारण तलाक के लिए आप की पत्नी के पास एक मजबूत आधार तैयार हो जाएगा। चूंकि आप एक नियत समय के लिए यह एग्रीमेंट कर रहे हैं इस कारण इसे विवाह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वैसी स्थिति में यह आईपीसी या किसी अन्य कानून के अंतर्गत  किसी तरह का अपराध  तो नहीं होगा, लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता की श्रैणी में रखा जा सकता है। जिस से पत्नी या पति मानसिक रूप से पीड़ित हो कर आत्महत्या के लिए प्रेरित हो सकता/ सकती है।  तब यह धारा 498-ए का अपराध हो सकता है। हमारी राय यह है कि तलाक होने के पूर्व किसी भी तरह किसी भी पक्ष द्वारा एग्रीमेंट के माध्यम से लिव इन रिलेशन में रहना अपराध हो सकता है। इस से बचना चाहिए।

फिर भी जो वर्तमान परिस्थितियाँ हैं उन में लोग ऐसे वैकल्पिक मार्ग निकालते रहेंगे जिन से जीवन को कुछ आसान बनाया जा सके। यह तब तक होता रहेगा जब तक हमारी न्याय व्यवस्था पर्याप्त और कानून सामाजिक परिस्थितियों के लिए पूरी तरह उचित नहीं हो जाएंगे।

निर्णय में देरी का प्रमुख कारण कम न्यायालय और कम न्यायाधीश हैं।

समस्या-

आर. के.  ने नदबई, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरा तलाक के केस को लगभग चार साल हो चुके हैं और अभी तक फैसला नहीं हुआ है। मैं यही जानना चाहता हूं कि क्या मैं आरटीआई के माध्यम से केस से सम्बनधित प्रश्न न्यायालय से पूछ सकता हूँ?

समाधान-

प स्वयं उस प्रकरण में पक्षकार हैं इस कारण आप को तलाक के केस में देरी का कारण पता होना चाहिए। किसी भी मुकदमे में जो समय लगता है उस का विवरण प्रत्येक पेशी पर लिखी जाने वाली आदेशिका में होता है। आप को आदेशिका की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त करने का अधिकार है आप स्वयं अदालत में आवेदन दे कर पता कर सकते हैं कि आप के मामले में क्यों देरी हो रही है। उस का कारण आप स्वयं भी हो सकते हैं और अन्य कोई कारण भी हो सकता है। यदि आप स्वयं कारण हैं तो उन कारणों को दूर करने का प्रयत्न करें।

यदि अन्य कोई कारण है तो न्यायालय से निवेदन करें कि वह उन कारणों का उपाय कर के उन्हें दूर करने की कोशिश करे। फिर भी किसी कारण से देरी हो रही हो तो आप संबंधित उच्च न्यायालय को अपना परिवाद भेज सकते हैं। उच्च न्यायालय उसे हल करने का प्रयत्न करेगा। यदि न्यायालय के पास क्षमता से अधिक मुकदमें हों तो अधिक न्यायालय खोलने का कार्य राज्य सरकार का है। उस के लिए राज्य सरकार से मांग की जा सकती है। राजस्थान सरकार अधिक मुकदमे होने के कारण दो नए पारिवारिक न्यायालय कोटा में खोले हैं। जिस से अब इस तरह के मुकदमों के निस्तारण में इस जिले में तेजी आई है।

श्रमिकों, कर्मचारियों को भारत के कानून और न्याय व्यवस्था से किसी तरह के न्याय और राहत की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

rp_retrenchment-300x300.jpgसमस्या-
दिलीप सेठिया ने खंडवा, मध्यप्रदेश से  समस्या भेजी है कि-

मैं एक निजी कंस्ट्रेक्सन कंपनी में 4 साल से मार्केटिंग एवं फील्ड का पूरा काम देख रहा हूँ। मेरे 2 बच्चे भी हैं जो स्कूल में अध्यनरत हैं और किराये के मकान में रहते हैं। मुझे कंपनी ने 1 जनवरी 2011 को ऑफर लैटर दे कर काम पर रखा है। मुझे जिस मासिक वेतन 13625/= पर आरंभ में रखा था, वर्तमान मई 2015 में भी वही वेतन बैंक द्वारा दे रहे हैं। 1 जनवरी 2012 को मुझे वेतन बढ़ाने का बोल कर, आज तक मुझे बढ़ी हुई वेतन नहीं दी है। अब मांगता हूँ तो जवाब मिलता है, काम छोड़ दो। मेरे दोनों बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो गया है। मैँ अब क्या करूँ?

समाधान-

निजि कम्पनी में आप की नौकरी आप को दिए गए ऑफर लैटर की शर्तों पर निर्भर करती है। आप ने उस ऑफर लैटर को स्वीकार किया और वह एक संविदा में परिवर्तित हो गया। उस में यदि वेतन निश्चित है और वेतन बढ़ाने की कोई शर्त नहीं है तो आप को कोई कानूनी अधिकार नहीं है कि आप अपने वेतन को बढ़ाने की मांग करें। वैसे भी मार्केंटिंग के लोगों को औद्योगिक विवाद अधिनियम के अन्तर्गत वर्कमेन साबित करना बहुत कठिन काम है। यदि किसी तरह की कानूनी लड़ाई लड़ना चाहेंगे तो अदालतों की हालत यह है कि उन का निर्णय आप के जीवनकाल में हो जाए तो समझिए आप को सरकार ने खैरात दे दी। यूँ भी नियोजन क्षेत्र से संबंधित कानून अब कर्मचारियों के पक्ष में नहीं है। इस कारण कोई भी कानूनी उपाय आप के पास इस के लिए उपलब्ध नहीं है। यदि आप बच्चों का भविष्य खराब होने की दुहाई दे कर कुछ राहत की मांग करेंगे तो आप की विवशता देख कर नियोजक आप का वेतन बढ़ाना तो दूर काम की कमी बता कर आप का वेतन कम करने का प्रयत्न करते दिखाई देंगे।

निजि क्षेत्र में काम करने वाले कर्मचारियों को चाहिए कि वे अपना स्किल बढ़ाएँ, अपना अनुभव बढ़ाएँ और अपने काम की मांग पैदा करें। और एक कंपनी की नौकरी को अपना जीवन बनाने से बचें। आप के नियोजक हर काम अपने मुनाफे के लिए करते हैं। जिस दिन उन्हें आप की जरूरत नहीं होगी या आप से कम वेतन में आप का काम करने वाला व्यक्ति मिल जाएगा वे आप को काम से बाहर कर देंगे। इस कारण आप को निरन्तर काम की तलाश भी जारी रखनी पड़ेगी। जैसे ही आप को वर्तमान से बेहतर काम मिले आप तुरन्त छोड़ कर दूसरा नियोजन पकड़ लें।

च्छी तरह समझ लें कि भारत में श्रमिकों और कर्मचारियों के लिए कोई भी सामाजिक सुरक्षा नहीं है। उन्हें उचित वेतन देने के लिए कोई कानून नहीं है। उन के नियोजन की सुरक्षा के लिए कोई कानून नहीं है। यदि कोई कानून की किताब खोल कर बताए कि यह कानून है तो उस कानून के आधार पर किसी तरह की राहत पाना आसान नहीं है। एक श्रम न्यायालय में तीन कर्मचारियों की सेवा समाप्ति के विवाद 1983 से चल रहे हैं जिन्हें हम खुद देख रहे हैं। लेकिन आज तक श्रम न्यायालय उन का निर्णय नहीं कर सका। श्रम न्यायालय 32 वर्ष में जब तीन कर्मचारियों को उन के विवाद का निर्णय नहीं दे सकता तो फिर इस देश के न्यायालयों से श्रमिक कर्मचारी वर्ग न्याय की आशा नहीं कर सकता। अब तो श्रमिक वर्ग के लिए इस देश में न्याय तभी संभव होगा जब वे एक जुट हो कर देश की सत्ता को अपने और मित्र वर्गों के हाथों में ले लेंगे। वर्तमान में तो पूंजीपतियों और भूस्वामियों का बोल बाला है। इस व्यवस्था से कुछ भी आशा करना मजदूरों, किसानों, रिटेलरों आदि मेहनतकश वर्गों के लिए मूर्खता सिद्ध हो रहा है।

न्याय प्रणाली में सुधार आवश्यक है जिस से पक्षकार या वकील उसे लंबा न कर सकें

बिजनेस स्टेंडर्ड के 18 सितंबर 2011 के अंक में एम. जे. एंटनी के एक लेख का हिन्दी अनुवाद वकीलों की चालबाजी से लंबी खिंच जाती है मुकदमे बाजी शीर्षक से प्रकाशित किया है। इस आलेख में उन्हों ने उच्चतम न्यायालय के दो निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा है कि सभी न्यायाधीश अतीत में अधिवक्ता की भूमिका अदा कर चुके होते हैं, इसी तरह सभी अधिवक्ताओं के भविष्य में न्यायाधीश बनने की संभावना रहती है। इस तरह वे समूची न्याय प्रणाली को अंदरूनी तौर पर जानते हैं। ऐसे में अगर न्यायाधीश उन कुछ युक्तियों का खुलासा करते हैं जिनको अपना कर विधि पेशे के लोग न्याय प्रक्रिया में देरी करते हैं तो लोगों को उनकी बातों को गौर से सुनना चाहिए। 
ल्लखित मामलों में से एक मामला तो दिल्ली उच्च न्यायालय में वर्ष 1977 में शुरू हुआ था।
यह मामला इतने न्यायालयों में घूमता रहा कि सर्वोच्च न्यायालय को इन का आकलन करने में छह पन्ने लग गए। रामरामेश्वरी देवी बनाम निर्मला देवी के इस मामले में अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, ‘यह इस बात का शानदार नमूना है कि कैसे हमारे न्यायालयों में मामले चलते हैं और किस तरह बेईमान वादी इनके जरिए अनंतकाल तक अपने विरोधियों तथा उनके बच्चों को परेशान करने के लिए न्याय प्रणाली का दुरुपयोग कर सकते हैं।’
ह मामला एक व्यक्ति को भूखंड आवंटन से आरंभ हुआ था, बाद में तीन छोटे भाई भी उसके साथ रहने लगे। छोटे भाइयों ने संपत्ति के बँटवारे की मांग की। बँटवारे का मामला तो बहुत पहले ही निपट गया था लेकिन न्यायाधीशों के मुताबिक मामले की लागत कौन वहन करेगा जैसेतुच्छ तथा महत्त्वहीन प्रश्न शेष रह गए। आखिर ये मामले भी सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच ही गए। इस मामले में एक पक्ष द्वारा पेश किए गए बहुत सारे आवेदनों को देखकर (जिनमें से कुछ गलत तथ्यों पर आधारित थे) न्यायालय ने पहले कहा था, ‘याचिकाकर्ताओं का एक मात्र उद्देश्य मुकदमे में देरी करना है, जबकि यह मामला पहले ही 18 वर्षों से लंबित है। यह बात साबित हो चुकी है कि ऐसी तुच्छ मुकदमेबाजी न्याय प्रक्रिया को शिथिल बनाती है और इसकी वजह से सही वादियों को आसानी से और तेज गति से न्याय मिलने में देरी होती है।’
र्वोच्च न्यायालय ने इस मामले में आगे कहा, ‘और अधिक समय गँवाए बिना प्रभावी उपचारात्मक उपाय नहीं अपनाए गए तो समूची न्यायपालिका की विश्वसनीयता दाँव पर लग जाएगी।’ मामले में न्याय मित्र की भूमिका निभा रहे एक वरिष्ठ अधिवक्ता की किताब “जस्टिस, कोट्र्स ऐंड डिलेज” का हवाला देते हुए न्यायाधीश ने कहा कि न्यायालयों का 90 फीसदी समय और संसाधन अनचाहे मामलों की सुनवाई में निकल जाते हैं। यह हमारी मौजूदा प्रणाली की कमियों के चलते होता है जिसमें गलती करने वाले को सजा के बजाय प्रोत्साहन मिलता है। यदि न्यायालय इस मामले में चौकस रहें तो मुकदमेबाजी का गलत फायदा उठाने वालों की संख्या को काबू किया जा सकता है। 
पुस्तक के मुताबिक हर लीज अथवा लाइसेंस अपनी नियत तिथि की समाप्ति पर किसी न किसी मामले की वजह बन जाते हैं। न्यायालय ऐसे मामलों से भरे हुए हैं क्योंकि इनमें गलत करने वालों को स्वाभाविक तौर पर लाभ हासिल हो

लोक अदालतें : मुक्ति यज्ञ

राजस्थान की अदालतों के लिए यह सप्ताह लोकअदालतों का है। सभी अदालतों ने अपने यहाँ लंबित मुकदमों में से छाँट छाँट कर एक सूची बनाई है और पक्षकारों को नोटिस भेजें हैं कि यदि वे समझौते से अपने मामलों के हल के उत्सुक हों तो अदालत में निर्धारित तिथि पर आएँ और मुकदमे को निपटाने का प्रयत्न करें। इस दौरान मुकदमों की सामान्य सुनवाई बाधित हो रही है। अदालतें चाहती हैं कि उन के यहाँ लंबित मुकदमों में से कुछ कम हो जाएँ। यह उच्च न्यायालय का निर्देश है। अदालतों को काम तो दो व्यक्तियों के बीच तथ्यों और कानूनी समझ के फेर और जिद के कारण उत्पन्न विवादों का निपटारा करना है। उन का काम यह है कि पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत अभिवचनों, साक्ष्य और विधि के आधार पर वे मामले का निपटारा अल्पतम समय में करे। किसी भी आबादी में विवादों की संख्या  हमेशा जनसंख्या की समानुपाती होती है। जनसंख्या के हिसाब से भारत में न्यायालयों की संख्या अत्यन्त कम है।  दस लाख की आबादी पर जहाँ अमरीका में 111 और ब्रिटेन में 55 न्यायालय हैं वहाँ भारत में यह संख्या 12-13 ही है। अमरीका के मुकाबले हमारे यहाँ केवल 14-15 प्रतिशत न्यायालय हैं। हम इस से यह नतीजा निकाल सकते हैं कि अमरीका की फेडरल और राज्य सरकारें अपनी जनता को न्याय उपलब्ध कराने को जितनी चिन्तित रहती है और प्रणाली उपलब्ध कराती है, भारत सरकार उस के मुकाबले केवल 14-15 प्रतिशत चिंता करती है और उतनी ही प्रणाली उपलब्ध कराती है।  
मारी न्याय प्रणाली का आकार देश की आबादी को न्याय प्रदान करने में पूरी तरह असमर्थ है, इस बात को हमारी जनता भी अब अच्छी तरह जानने लगी है। जब किसी के साथ अन्याय होता है तो वह न्यायालय जाने में झिझकती है। वह जानती है कि न्यायालय से उसे न्याय नहीं मिलेगा। उस की फरियाद तो ले ली जाएगी। लेकिन फिर तारीख पर तारीख के कारण उसे इतने चक्कर लगाने पड़ते हैं, जिस की पीड़ा के सामने न्याय न मिलने की पीड़ा छोटी हो जाती है, धीरे-धीरे वह और छोटी होती जाती है। अंत में वह न्यायालय से पीछा छुड़ाने की सोचने लगता है। इस तरह के बहुत लोग हैं जो न्याय प्राप्त करने के इस झंझट से मुक्त होना चाहते हैं। उधर मुकदमों के बोझ से दबे न्यायालय भी चाहते हैं कि उन के यहाँ मुकदमे कम हो जाएँ तो वे बचे हुए मुकदमों की तरफ ध्यान दे सकें और कम से कम उन में तो न्याय कर सकें। हमारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों  के लिए वस्तुतः ये लोक अदालतें एक तरह का मुक्ति यज्ञ है। इस यज्ञ से पक्षकार न्याय के झंझट से मुक्ति प्राप्त कर के हर तरह का अन्याय सहने की सीख प्राप्त करते हैं। कभी जरूरत हो तो बाहुबलियों को उन का शुल्क अदा कर मनचाहा न्याय प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं। अब ये तो सब जानते हैं कि बाहुबलियों को शुल्क अदा करने की शक्ति किन के पास है और उन की संख्या कितनी है। अदालतें भी इस यज्ञ से बहुत सारे मुकदमों से मुक्त हो जाती है। इसी कवायद में वह वास्तविक अपराध करने वाले लोगों को न्याय के झंझट से मुक्त कर देती है। वे अपनी छाती चौड़ी कर के फिर से समाज में इतराने के लिए पहुँच जाते हैं।

हमारी सरकारें अभी भी भारत को अपना देश नहीं समझतीं

कुछ दिन पूर्व एक समचार चैनल पर एक वरिष्ठ अधिवक्ता का साक्षात्कार प्रस्तुत किया जा रहा था। समस्या थी जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों की। इन कैदियों को जेलों में रखने के लिए हर वर्ष केंद्र और राज्य सरकारों को बहुत धन खर्च करना पड़ता है। सूचनाओं के अनुसार भारत की जेलों में रह रहे कैदियों में से 70 प्रतिशत अपने मुकदमों के फैसले के इंतजार में हैं। अधिवक्ता महोदय का कहना था कि ऐसे कैदियों के लिए यह एक राहत का विषय है कि जिन कैदियों ने अपील की हुई है और निचली अदालत से जो सजा उन्हें दी गई है उस की आधी सजा काटने पर उन्हें रिहा किया जा रहा है। इस तरह की रिहायगी को मानवता की दृष्टि से जायज ठहराया जा सकता है। लेकिन उन का क्या जिन्हें सजा नहीं हुई है और केवल विचारण  में दो से दस वर्ष तक लग रहे हैं? कभी-कभी तो उन्हें जितनी सजा मिलनी होती है उतनी ही वे पहले ही जेलों में काट चुके होते हैं। जो जमानत पर रिहा हो जाते हैं उन्हें अपने मामलों के निर्णयों के लिए बरसों अदालतों में चक्कर काटने पड़ते हैं, आने जाने में ही इतना खर्च करना पड़ता है कि विचारण उन के लिए अदालत द्वारा दी जाने वाली सजा से कम नहीं।

लिए यह कहा जा सकता है कि विचारण में समय तो लगता ही है। आखिर आरोप तय किए जाएंगे, गवाह के बयान होंगे फिर ही निर्णय दिया जा सकता है।  लेकिन अपील में तो यह सब कुछ नहीं होता। वहाँ तो निचली अदालत से पत्रावली जाती है और दोनों पक्ष अपनी अपनी बहस करते हैं और फिर अदालत को फैसला देना होता है। यह काम तो सप्ताह भर में निपटाया जा सकता है। लेकिन उस में भी कई कई वर्ष लग जाते हैं, सजा पाया हुआ व्यक्ति जिस ने अपील की होती है वह जेल  में अपने निर्णय की प्रतीक्षा करता रहता है।
दीवानी मामलों की हालत और बुरी है। एक मकान मालिक है उस ने अपनी दो दुकानें किराए पर दे रखी हैं, उसे दुकानों की जरूरत है लेकिन किराएदार दुकानें खाली नहीं कर रहे हैं। उलटे न्यूसेंस पैदा करते हैं। उन्होंने मकान मालिक का जीना हराम कर रखा है। अब मकान मालिक के पास अदालत जाने के सिवा क्या चारा है? लेकिन वह अदालत जाने से भय खाता है, इसलिए कि वहाँ दस या बीस या तीस बरसों में फैसला होगा। वह अदालत के बाहर तरकीब तलाशने लगता है। वहाँ दो ही तरीके हैं। एक तो किराएदार को मुहँ मांगा धन दे कर अपनी दुकान खाली कराए। दूसरा ये कि पुलिस को रिश्वत दे कर या गुंडों को पैसा दे कर अपनी दुकान खाली करा ले। दोनों ही मामलों में अपराध को बढ़ावा मिल रहा है वह भी सिर्फ इसलिए कि न्याय जल्दी नहीं मिल रहा है। इस तरह हमारी न्यायव्यवस्था की कमी खुद अपराधों को बढ़ावा दे रही है। खुद मुझे अपने मकान को खाली कराने में 19 वर्ष लगे थे।

 म यह सोच सकते हैं कि कैसे विचाराधीन कैदियों को जेल से बाहर निकाला जाए। किन्हें जमानत पर छोड़ा जाए और किन्हें अंदर रखा जाए? मुकदमों के निपटारे के लिए समझौतों को प्रोत्साहन दिया जाए, लोक अदालतें लगाई जाएँ। हम सब कुछ कर सकते हैं, लेकिन ऐसी न्याय व्यवस्था देने की बात पर विचार नहीं कर सकते कि कैसे अदालतों में विचारण एक वर्ष में पूरा होने और अपील की एक माह में सुनवाई की स्थिति लाई जाए। यह स्थिति लाई जा सकती है लेकिन उस के लिए अदालतों की संख्या बढ़ानी पड़ेगी,

पैबंद लगी पैरहन

ल के आलेख न्यायालयों की श्रेणियाँ और उन में न्यायाधीशों की नियुक्तियाँ पर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी की टिप्पणी थी कि “इसमें परिवार न्यायालयों, उपभोक्ता फोरम व विविध ट्रिब्यूनल्स के बारे मे भी बता दें तो अच्छा रहेगा”। लेकिन मैं उस से पहले यह बात स्पष्ट करना चाहूंगा कि आखिर इतने सारे भाँति-भाँति के न्यायालयों की आवश्यकता क्या है? और है भी या नहीं?  किसी भी देश की न्याय प्रणाली के लिए दो ही तरह के दीवानी और अपराधिक न्यायालय पर्याप्त हैं। एक तरह के न्यायालय अपराधों की रोकथाम के लिए तथा दूसरे तरह के न्यायालय सामाजिक व्यवहार को बनाए रखने के लिए। इन के माध्यम से सभी प्रकार के मामलों का निपटारा किया जा कर समाज में न्यायपूर्ण व्यवहार को स्थापित किया जा सकता है और उसे बनाए रखा जा सकता है।
किसी शरीर को चलाने के लिए यह आवश्यक है कि उसे उस की आवश्यकतानुसार आवश्यक खुराक मिलती रहे। यदि पर्याप्त खुराक न मिले तो शरीर कुपोषण का शिकार हो जाता है और फिर अनेक प्रकार के संक्रमण उसे घेर लेते हैं। तब इन संक्रमणों के लिए अनेक प्रकार की चिकित्सा पद्धतियाँ विकसित होने लगती हैं। हमारी न्याय व्यवस्था की स्थिति ऐसी ही है। हमारी न्याय व्यवस्था कभी भी आवश्यकता के अनुरूप नहीं रही है, अपितु उस का आकार जितना होना चाहिए उस का चौथाई भी नहीं है। यह बात अनेक बार इस ब्लाग पर कही जा चुकी है। हमें दस लाख की आबादी पर कम से कम पचास अधीनस्थ न्यायालय चाहिए। आबादी के ताजा आँकड़ों 121 करोड़ के लिए हमें देश में 65000 अधीनस्थ न्यायालयों  की आवश्यकता है लेकिन हमारे पास वर्तमान में 15000 न्यायालय भी नहीं हैं। हम हरदम अपनी तुलना अमरीका से करना चाहते हैं, लेकिन उन के पास 10 लाख की आबादी पर 111 न्यायालय हैं और ब्रिटेन में 55 न्यायालय। 
ब पर्याप्त संख्या में न्यायालय नहीं हैं तो हर क्षेत्र में अन्याय की उपस्थिति और उस से निपटने का अभाव दिखाई देता है। वैसी स्थिति में सरकारें जहाँ भी वस्त्र फटा हुआ दिखाई देता है वहीं पैबंद लगाने की कोशिश करती है। श्रमिकों के साथ अन्याय है तो श्रम-न्यायालय स्थापित कर दिए गए। अनुसूचित जाति के लोगों के साथ अन्याय है तो उन के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना कर दी गई। वैवाहिक और पारिवारिक मामलों में जल्दी निर्णय नहीं हो रहे हैं तो पारिवारिक न्यायालयों की स्थापना कर दी गई। चैक बाउंस के मामले बढ़ गए तो उन के लिए विशेष न्यायालय स्थापित कर दिए गए। मकान मालिक-किराएदारों के विवादों के लिए, टैक्स न चुकाने के मामलों के लिए, बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के कर्जों के मामलों के लिए, उपभोक्ता मामलों के लिए, भ्रष्टाचार के मामलों आदि के लिए अलग अलग न्यायालय स्थापित कर दिए गए। लेकिन इन सब की उत्पत्ति का कारण एक ही है कि हमारी सामान्य दीवानी और अपराधिक न्याय व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। 
विशेष रुप से स्थापित किए गए इन न्यायालयों की प्रकृति या तो दीवानी है या फिर अपराधिक। इन की प्रक्रिया भी या तो दीवानी है या फिर अपराधिक। इन सभी न्यायालयों के निर्णयों की अपील या पुनरीक्षण उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय कर सकता है। जब सारे प्रकार के मामले उच्च न्यायालय कर सकता है तो फिर केवल दीवानी और अपराधिक न्यायालयों से ही न्याय की स्थापना की जा सकती है।  इस से यह स्पष्ट है कि ये न्यायालय केवल यह संतुष्टि प्रदान करने के लिए हैं कि जनता यह महसू

प्रणव दा! सिंह साहब! और सोनिया जी! न्याय के लिए कुछ नहीं, मतलब अन्याय जारी रहेंगे ?

तीसरा खंबा में 26 जनवरी, 2009 की पोस्ट थी, न्याय रोटी से पहले की जरूरत है, ….
जीवन के लिए जितना हवा और पानी आवश्यक है उतना ही न्यायपूर्ण जीवन और समाज भी।  यदि परिवार में खाने को पूरा न हो तो भी परिवार आधे पेट भी प्रेम से जीवन बिता सकता है।  बस लोगों को विश्वास होना चाहिए कि जितनी रोटियाँ हैं, उन का बंटवारा न्यायपूर्ण हो रहा है।   यदि यह विश्वास टूट गया तो परिवार बिखऱ जाएगा।   परिवार के बिखरने का अंजाम सब जानते हैं।  गट्ठर को कोई नहीं तोड़ सकता लेकिन एक एक लकड़ी को हर कोई तोड़ सकता है।  इस लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था परिवार के एकजुट रहने की पहली शर्त है। इसीलिए न्याय रोटी से पहले की जरूरत है।  कम रोटी से काम चलाया जा सकता है, लेकिन न्याय के बिना नहीं।   लेकिन हमारी न्याय प्रणाली अपंग है।   वह हमारी जरूरत का चौथाई भी पूरा नहीं करती।  एक न्यायार्थी को उस के जीवन में न्याय मिलना असंभव होता जा रहा है।  यदि इस स्थिति से युद्ध स्तर पर नहीं निपटा गया तो।  समझ लीजिए कि परिवार खतरे में है।  गणतंत्र खतरे में है।
र्तमान में देश में लगभग16000 अदालतें हैं उन में भी 2000 से अधिक अदालतों में  जज नहीं हैं।  स्वयं संसद  में सरकार  द्वारा निर्धारित  क्षमता  के अनुसार प्रत्येक दस लाख जनसंख्या पर पचास अधीनस्थ न्यायालय  होने चाहिए। भारत की  वर्तमान आबादी लगभग एक  अरब बीस करोड़ के लगभग है, इस आबादी की न्याय की जरूरतों को पूरा करने को अदालतों की  संख्या 60 हजार होनी चाहिए। यही हमारी वास्तविक आवश्यकता है।  अधीनस्थ न्यायालयों की स्थापना का  काम राज्य सरकारों का है। लेकिन किसी  भी राज्य सरकार में इस बात पर चिंता और हलचल तक नहीं दिखाई पड़ती  है कि उन के यहाँ न्याय और न्यायालयों की क्या स्थिति है और  वे घोषित लक्ष्य की  प्राप्ति  के लिए क्या कदम  उठाने जा रहे हैं।
भारत का 2011-12 का संघीय बजट संसद में प्रस्तुत किया जा चुका है। देश और समाज में न्याय की स्थापना के लिए सरकार और संसद कितनी चिंतित है इस का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हों ने इस के लिए क्या प्रावधान अपने बजट में किए हैं। विभिन्न संघीय मंत्रालयों और विभागों का कुल खर्च  इस वर्ष 1216575.73 करोड़ रुपए था। जो आगामी वर्ष के लिए 1257728.83 करोड़ रुपयों का रखा गया है। इस तरह इन मंत्रालयों और विभागों के कुल खर्च में चालीस हजार करोड़ की वृद्धि की गई है। लेकिन वस्तुओं के महंगा हो जाने से  यह वृद्धि न केवल बराबर हो जाती है अपितु बजट में बढ़ाई गई इस राशि में पहले जितनी वस्तुएँ और सेवाएँ नहीं खरीदी जा सकेंगी। 
न्याय के लिए इस वर्ष के लिए 944 करोड़ का प्रावधान किया गया था, अब अगले वर्ष के लिए 1432 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस तरह करीब 488 करोड़ रुपयों की वृद्धि की गई है। इस वर्ष योजना खर्च में रुपए 280 करोड़ रुपए रखे गए थे जिन्हें अगले वर्ष के लिए बढ़ा कर 1000 करोड़ कर दिया गया है। इस में से अधिकांश धनराशि कंप्यूटराइजेशन, इन्फ्रास्ट्रक्चर और ग्रामीण न्यायालय स्थापित करने के लिए राज्यों की सहायता के लिए रखी गई है। लेकिन गै

क्यों उठते हैं न्यायिक व्यवस्था पर प्रश्न, बार-बार

पिछले दिनों मेरे ही एक संबंधी के पुत्र को 498-ए में गिरफ्तार किया गया। हम करीब साल भर पहले से यह जानते थे कि ऐसी स्थिति आ सकती है। लेकिन हमारा प्रयास था कि गृहस्थी टूटे ना। हमारे वे सारे सामाजिक प्रयास असफल हुए और नौबत यहाँ तक आ गई। आम तौर पर जैसा मुकदमा था, उस की जमानत विचारण मजिस्ट्रेट द्वारा ही ले लेनी चाहिए थी। लेकिन उस की पत्नी और उस के वकील ने विरोध किया। न्यायालय में जो मेलोड्रामा उपस्थित हुआ उस से पत्नी के प्रति उपजी सहानुभूति ने जमानत नहीं होने दी। एक सप्ताह बाद यही बात सत्र न्यायालय में हुई। और करीब तीन सप्ताह उपरांत यही दृष्य जब उच्च न्यायालय में उपस्थित हुआ तो न्यायाधीश ने पत्नी के वकील से प्रश्न पूछने आरंभ किए और सारा मामला पंक्चर हो गया। अभियुक्त की जमानत हुई और पत्नी के वकील को एक लंबा भाषण अदालत से सुनना पड़ा। इस मामले में आरोप पत्र दाखिल हो चुका है, लेकिन यह मामला अब सालों चलेगा। क्यों कि अदालत को फुरसत नहीं है, वह चार अदालतों के बराबर भार उठा रही है। इस बीच दोनों ने ही अपनी अपनी ओर से विवाह-विच्छेद के आवेदन प्रस्तुत कर दिये हैं, अर्थात दोनों अलग होना चाहते हैं। फिर भी जल्दी यह मामला निपट लेगा इस के आसार नजर नहीं आते। अभी लेन-देन पर खींचतान होगी, आदि आदि। 
न्यायालयों की कमी अब नासूर बन चुकी है, और उस ने बहुत सी नई बीमारियाँ खड़ी की हैं। पक्षकारों से ले कर न्यायाधीश तक यह मानने लगे हैं कि किसी भी अपराधी को उस के किए की सजा देना इस न्यायिक व्यवस्था में आसान नहीं है। फरियादी यह समझता है कि उस के कसूरवार को जितना परेशान कर सको इस प्रक्रिया से ही कर लो। न्यायालय समझता है कि कुछ दिन जमानत नहीं होगी तो मुलजिम को अकल आ जाएगी। पुलिस या प्रशासन को किसी से निपटना होता है तो वह उस पर मुकदमा बना देती है, वह भी ऐसा कि जिस में जमानत कई दिनों तक न हो सके। मुकदमा ऐसी चीज बन गया है जो व्यक्ति को उस का मकसद पूरा करने में बाधा पैदा करता है। अधीनस्थ अदालत के न्यायाधीश जरा भी विवादित मामलों में ऐसी धारणा के शिकार होने लगे हैं कि हम तो सजा सुना देते हैं। यदि अभियुक्त को तकलीफ होगी तो अपील कर लेगा। वकीलों की जजों के मामले में इस तरह की धारणाएँ आम हैं कि यह जज सजा देने की मानसिकता वाला है और दूसरा उदार जो मुश्किल से ही किसी को सजा देता है। यह भी कि एक खास जज जमानत के मामले में उदार है और दूसरा बहुत सख्त। जितने भी लोग सरकार या व्यवस्था के विरुद्ध जनता के अधिकारों के संघर्ष में उतरते हैं उन के साथ यही होने लगा है। इस तरह यह न्यायिक व्यवस्था न्याय देने के स्थान पर जनता को पीड़ा पहुँचाने और जन-अधिकारों की लड़ाई में बाधा खड़ी करने का औजार बनने लगी है। जब न्यायपालिका की स्थिति यह बना दी गई हो तो वह किसी भी भांति चाहते हुए भी निष्पक्ष नहीं रह सकती। 
से में ये सवाल उठाना बेमानी है कि, “लोकतंत्र में रहना है तो न्यायिक प्रक्रिया को मानना होगा” और कि “न्यायिक निर्णयों की आलोचना नहीं होनी चाहिए”। आज बिनायक सेन मामले के माध्यम से ये सवाल उठ रहे हैं। लेकिन वहाँ लोग मनोगत आधार पर दो खेमों में बँटे हैं, एक वे जो बिनायक को नक्सलियों का सहायक मानते हैं और दूसरे वे जो उन्हें वास्तविक

अगले दस वर्षों में एक लाख जज नियुक्त करने होंगे

रकारी आँकड़ों के अनुसार भारत में 4,30,000 लोग जेलों में बंद हैं, जिन में से तीन लाख बंदी केवल इसलिए बंद हैं कि उन के मुकदमे का निर्णय होना है। 2007 में यह संख्या केवल 2,50,727 थी। केवल तीन वर्षों में विचाराधीन बंदियों की संख्या में 50,000 का इजाफा हो गया। इन विचाराधीन बंदियों में से एक तिहाई से अधिक 88,312 अनपढ़ हैं, इन में माध्य़मिक स्तर से कम शिक्षित बंदियों की संख्या जोड़ दी जाए तो यह संख्या विचाराधीन बंदियों की कुल संख्या का 80% (1,96,954) हो जाएगी।  2007 में विचाराधीन बंदियों की कुल संख्या 2,50,727 थी जिस में से 1891  पाँच वर्ष से भी अधिक समय से बंद थे।
गस्त 2010 में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा था कि सभी विचारण न्यायाधीशों ने मुकदमों के निस्तारण की गति में उच्चस्तर बनाये रखा है। ऐसे में हमारे अपराधिक न्याय तंत्र के लिए यह एक भयावह स्थिति है। इन में ऐसे बंदी भी सम्मिलित हैं कि जिन पर चल रहे मुकदमे में जितनी सजा दी जा सकती है, उस से कहीं अधिक वे फैसले के इन्तजार में जेल में रह चुके हैं।  52 हजार से अधिक बंदी ऐसे हैं जिन पर हत्या करने का आरोप है। हो सकता है कि पाँच वर्ष से अधिक समय से बंद 1891 विचाराधीन बंदी हत्या के ही अपराध में बंद हों. लेकिन यह नहीं कहा जा सकता है कि इन में से कितने ऐसे हैं जिन पर हत्या का आरोप संदेह के परे साबित किया जा सकेगा। 
वास्तविकता यह है कि जब भारत का संविधान निर्मित हो रहा था, और अनुच्छेद 21 पर चर्चा हुई तो अपराधिक मुकदमों की प्रक्रिया, निष्पक्ष विचारण, जीवन के मूल अधिकार तथा अन्य बिंदुओं पर विचार किया गया। लेकिन तेज गति से विचारण का बिंदु चर्चा में सम्मिलित ही नहीं था। यह बात पहली बार तब सामने आई जब 1979 में हुसैन आरा खातून के मुकदमे में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कहा कि तेजगति से विचारण अनुच्छेद 21 के अंतर्गत अभियुक्त का मूल अधिकार है। इस के उपरांत इस बात को न्यायालयों ने अनेक बार दोहराया है, लेकिन अभी तक विचाराधीन बंदियों के लिए यह अधिकार एक सपना ही बना हुआ है। 1970 के बाद  विचारधीन बंदियों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है। लेकिन उन में सजा काटने वाले कम हैं और अदालत में अपने दिन की प्रतीक्षा करने वाले अधिक। 
खिर इस स्थिति का हल क्या है? विधि मंत्री वीरप्पा मोइली ने मामूली आरोपों के बंदियों को 2010  के अंत तक रिहा किए जाने की एक योजना घोषित की थी,  जिस से  विचाराधीन तीन लाख बंदियों में से दो तिहाई को रिहा किया जा सके और जेलों की भीड़ को कम किया जा सके। लेकिन इस योजना पर कितना अमल हुआ है? इस की जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस के अलावा विभिन्न कमेटियों और सरकारी दस्तावेजों के आधार पर जो हल सुझाए गए हैं वे इस प्रकार हैं-
1. अपराधिक न्यायालयों में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जाए जिस से मुकदमों का शीघ्र निस्तारण किया जा सके।
2. अदालतों की तकनीकी और आधारभूत सुविधाओं को बढ़ाया जा सके जिस से मुकदमा निस्तारण की गति बढ़ सके।
3. पुलिस व्यवस्था में सुधार लाया जाए जिस से