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वैकल्पिक उपाय होने पर रिट याचिका पोषणीय नहीं है।

समस्या-

राजगढ़, मध्यप्रदेश से ममता नामदेव पूछती हैं-

दालत के आदेशानुसार मेरे पति द्वारा मुझे धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भरण-पोषण की राशि 1500/- रुपए प्रतिमाह पिछले 36 माह से प्रदान की जा रही है। धारा 24 में अन्य अदालत द्वारा 30 माह पूर्व स्वीकृत अंतरिम भरण पोषण की राशि 1200/- रुपए प्रतिमाह बार बार मांगे जाने और अदालत के निर्देशों के बावजूद अभी तक नहीं दी गई है।  पेशी पर मेरे पति के हाजिर ना होने और उन के गवाहों के हाजिर ना होने के कारण मेरे पति का धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम विवाह विच्छेद का मुकदमा परिवार अदालत ने 3 माह पहले खारिज कर दिया है। खारिजी आदेश तथा मुकदमा चलने के दौरान दिए गए खर्चे व भरण पोषण व स्थाई पुनर्भरण के आवेदनों को को मेरे पति द्वारा अनुच्छेद 227 सपठित धारा 24/25/28 हिन्दू विवाह अधिनियम के तहत उच्च न्यायालय में चुनौती दी है। मुझे उच्च न्यायालय में अपना पक्ष रखना है। मैं कोई नौकरी नहीं करती मेरी कोई आय नहीं है।  क्या धारा 24 अंतरिम भरण-पोषण की राशि को धारा 13 के खारिजी आदेश के साथ 32 माह बाद चुनौती दी जा सकती है? कृपया मार्गदर्शन दें।

समाधान-

प के पति ने सभी आदेशों के विरुद्ध रिट याचिका प्रस्तुत की है। रिट याचिका के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है। इस कारण उसे प्रस्तुत किया जा सकता है। हालांकि अत्यधिक देरी कर के प्रस्तुत की गई रिट याचिका को उच्च न्यायालय स्वीकार नहीं करते हैं। इस मामले में 32 माह की देरी अत्यधिक देरी है और रिट याचिका को विचारार्थ भी स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

कोई भी रिट याचिका तब भी स्वीकार नहीं की जा सकती है जब कि उस मामले में याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक उपाय उपलब्ध हो।  परिवार न्यायालय के किसी भी आदेश व निर्णय के विरुद्ध परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 19 के अंतर्गत अपील का प्रावधान है। इस तरह आप के मामले में अधिनियम के अंतर्गत अपील का वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है।  किसी भी वैकल्पिक उपाय के उपलब्ध रहते हुए किसी मामले में रिट याचिका स्वीकार्य नहीं हो सकती।  इस के लिए सर्वोच्च न्यायालय का United Bank Of India vs Satyawati Tondon & Ors. के मामले में on 26 July, 2010 को दिया गया निर्णय आप की सहायता कर सकता है। इसे आप यहाँ क्लिक कर के पढ़ सकती हैं। 

तलाक का 498-ए से कोई संबंध नहीं

लीना फिर पूछती हैं …

लीना ने पूछा था और मैं ने अपने आलेख मैं सिर्फ तलाक लूँ? या एक लड़ाई लड़ूँ? पर उत्तर दिया था कि “तलाक की कार्यवाही तुरंत कीजिए, स्थाई पुनर्भरण की मांग कीजिए। शीघ्रता से तलाक लीजिए, स्थाई पुनर्भरण जो अदालत दिलाए उसे स्वीकार कीजिए, लेकिन उसे अपनी नाक का सवाल मत बनाइए। शीघ्रता से एक शांतिपूर्ण जीवन की ओर बढ़िए।”
लेकिन लीना ने फिर पूछा है कि वह तलाक लेगी तो 498-ए की कार्यवाही का क्या होगा?

उत्तर

मैं ने लीना को उत्तर ई-मेल से दे दिया है। लेकिन यहाँ कुछ शंकाओं का समाधान सार्वजनिक रूप से करना चाहता हूँ। पति-पत्नी के बीच दो तरह के मामले होते हैं। एक वे जिनमें सुलह हो कर गृहस्थी बच जाती है। दूसरे वे जिनमें आप जितना गृहस्थी बचाने की कोशिश करते हैं उतनी ही बिगड़ती जाती है। मुकदमे बाजी इतनी लंबी खिंचती है कि दोनों ही नया जीवन शुरु करने के लायक नहीं रहते।

मुझे पहली ही बार में लगा कि यह विवाह कदापि नहीं बचेगा। लीना खुद केन्द्रीय सरकार की नौकरी में हैं। उन्हों ने उन के विरुद्ध हुए क्रूरतापूर्ण व्यवहार की शिकायत की और 498-ए का मुकदमा दर्ज हो गया है। अब वे तलाक के लिए पूछ रही हैं। मैंने उन्हें कहा कि वे तुरंत तलाक के लिए अर्जी दें और तलाक हासिल करें। उन्हों ने पूछा है कि तलाक की अर्जी के बाद 498-ए के मुकदमे का क्या होगा?

यह प्रश्न यहाँ गौण है। तलाक आप के द्वारा दिए गए सबूतों पर होता है तो 498-ए चलता रहेगा। अदालत जो भी सजा देगी वे क्रूरता करने वाले भुगतेंगे। यह मामला अदालत पर क्यों न छोड़ दिया जाए?

और यदि तलाक की अर्जी के बाद पति पक्ष सहमति से तलाक लेने का प्रस्ताव रखता है इस आधार पर कि आप 498-ए हटा लें। तो आप चाहें तो अपनी स्थाई पुनर्भरण की राशि बता दें। वे देने को तैयार हों और आप 498-ए वापस लेने को तो समझौते से सब कुछ हो जाएगा और दोनों अपना जीवन अपने तरीके से बिताने बनाने को स्वतंत्र होंगे। यदि आप चाहें कि क्रूरता का अपराध करने वालों को सजा अवश्य मिलनी चाहिए तो आप अपने सबूतों के आधार पर तलाक ले लें। 498-ए चलता रहेगा। पर थोड़ा समय अधिक लगेगा। नया जीवन आरंभ करने में देरी होगी। लीना जी या जो भी कोई और हों, अपने जीवन का निर्णय करने को स्वतंत्र हैं।

लिव-इन-रिलेशनशिप और पत्नी पर बेमानी बहस

आठ अक्टूबर को जैसे ही महाराष्ट्र सरकार ने घोषणा की कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के स्पष्टीकरण में पत्नी शब्द में लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को भी सम्मिलित किया जाना प्रस्तावित है, वैसे ही समाचार पत्रों, टीवी चैनलों और समाचार वेब साइटस् पर बहस छिड़ गई कि इस के क्या असर होंगे? कुछ लोगों ने इस का स्वागत किया है। कुछ को लगा कि भारत में हिन्दू शब्द से परिभाषित समुदायों में विवाह को पवित्र संस्था माना जाता है, उस विवाह की पवित्रता नष्ट हो जाएगी, पुरुष अनियंत्रित हो जाएंगे, विधिक रूप से विवाहित पत्नी के अधिकार संकट में पड़ जाएंगे, इत्यादि।

इस विषय पर चल रही यह सब बहस पूरी तरह से बेमानी है। धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता पत्नी, संतान व माता-पिता के स्वयं अपना भरण पोषण करने में असमर्थ होने पर उन के भरण पोषण का दायित्व उठाने के संबंध में है। अब इस में लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को और सम्मिलित किया जाने का प्रस्ताव है और वह भी केवल मात्र महाराष्ट्र राज्य में।(महाराष्ट्र में वर्तमान में लागू धारा-125 दंड प्रक्रिया संहिता का अंग्रेजी पाठ यहाँ  [Baseless Discussions on live-in-relationship & wife] पर देखा जा सकता है।) हो सकता है बाद में अन्य राज्य भी महाराष्ट्र का अनुसरण करें या फिर स्वयं केन्द्र सरकार केन्द्रीय कानून में ही इस संशोधन की बात पर विचार करे।

लिव-इन-रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं को ‘पत्नी’ शब्द के स्पष्टीकरण में सम्मिलित कर देने से कोई पहाड़ नहीं टूटने जा रहा है। लोग पहले से ऐसे रिलेशनशिप में रह रहे हैं। उस में यह था कि संबन्ध जब तक मधुर हैं तब तक पुरुष स्वेच्छा से इस दायित्व को निभा रहा था या नहीं निभा रहा था। लेकिन इस संशोधन के बाद यह स्थिति हो जाएगी कि ऐसे पुरुष को जो कि एक उचित अवधि तक किसी महिला के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में रहा है, उस की साथी महिला यदि स्वयं अपना भरण पोषण कर सकने में असमर्थ हो जाए तो वह किसी भी जुडिशियल मजिस्ट्रेट या पारिवारिक न्यायालय में अर्जी दाखिल कर सकेगी कि उसे उचित भरण पोषण राशि दिलाई जाए।

इस तरह की अर्जी देने वाली महिला को पहले तो यह साबित करना पड़ेगा कि वह उस पुरुष के साथ जिस पर वह अपने भरणपोषण का दायित्व डालने के लिए अर्जी दे रही है उस के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में उचित अवधि तक रही है। इस के बाद उसे यह साबित करना पड़ेगा कि वह अपना भरण पोषण कर सकने में असमर्थ है। इस के बाद भी अदालत इस बात पर विचार करेगी कि उस पुरुष की वास्तविक आर्थिक स्थिति क्या है और वह भरण पोषण के लिए कितनी राशि उस महिला को दे सकता है अपने अन्य दायित्वों को निभाते हुए।

इस संशोधन से विवाह की संस्था पर जरा भी असर होने वाला नहीं है। केवल लिव-इन-रिलेशनशिप पुरुषों पर कुछ आर्थिक दायित्व कानूनी रूप से आ जाएगा। इस से लिव-इन-रिलेशनशिप जैसे संबंधों को कम करने में मदद ही मिलेगी। इस से विवाह जैसी संस्था पर कोई असर नहीं होने जा रहा है। एक बात और कि यह कानून सभी भारतीयों पर समान रूप से लागू होगा। चाहे वे किसी भी धर्म के मानने वाले क्यों न हों।

मेरे विचार में इस विषय पर माध्यमों द्वारा चलाई जा रही बहस सिरे से ही बेमानी है और केवल टीआरपी बढ़ाने का एक और सूत्र मात्र है।

शो-पीस बना, घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण का कानून

क्या यह कड़ुआ सच नहीं कि सरकारें सामाजिक समस्या के प्रति बस इतना ही दायित्व निभाती हैं कि उस पर कानून बना दें और उस का प्रचार कर लें कि उस ने बहुत बड़ा तीर मार लिया है। अब समाज में से यह अन्याय जल्दी ही उठ जाएगा या कानून और सरकार से भयभीत हो कर अन्याय करने वाले चुप बैठ जाएँगे।

ऐसा ही कुछ महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा को रोकने के मामले में हो रहा है। संसद ने घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण का कानून बनाया है। इस कानून के अंतर्गत सरकारों, उन की पुलिस और अदालतों की जिम्मेदारियाँ तय कर दी गई हैं।  कानून के अन्तर्गत इस बात का भी प्रावधान है कि घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को तत्काल सहायता प्रदान की जाए। लेकिन अधिकांश सरकारों ने न तो इस कानून के अंतर्गत संरक्षण अधिकारियों की नियुक्ति की है। बस समाज कल्याण विभाग या महिला व बाल विकास विभाग के कुछ अधिकारियों को संरक्षण अधिकारी घोषित कर अपने कर्तव्य की इति श्री कर दी है। ये अधिकारी अपने विभाग के कामों को इस अधिनियम के अंतर्गत मिली जिम्मेदारियों पर तरजीह देते हैं, जिस का नतीजा यह है कि उन के पास पहुंची शिकायतें या अदालतों द्वारा जाँच करने के लिए दिए गए मामले उन के दफ्तरों की किसी अलमारी में धूल खा रहे होते हैं। अदालतें उन की रिपोर्ट के इन्तजार में तारीखें पलटती रहती हैं।

पुलिस का मामला तो इस से भी अजीब है। तमिलनाडु से मिले एक समाचार से पता लगता है कि तमिलनाडु सरकार के गृह विभाग ने 2008-09 के पॉलिसी दस्तावेज में यह तो स्वीकार किया है कि महिलाओं के प्रति अपराध खतरनाक अनुपात तक पहुँच चुके हैं।  लेकिन, सरकार ने इस मुद्दे से निपटने के लिए कोई भी कदम उठाने की घोषणा नहीं की है।  न तो सरकार के समाज कल्याण विभाग  ने और न ही गृह विभाग ने इस तरह के अपराधों को रोके जाने के लिए कोई नीति घोषित की है, अलावा इस के कि घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम में दायर मामलों के निपटारे के लिए  के अन्तर्गत सभी जिलों में  संरक्षण अधिकारियों और कनिष्ठ सहायकों की नियुक्ति की जाए.

चेन्नई शहर की पुलिस द्वारा महिलाओं के लिए संचालित की जाने वाली हेल्पलाइन के एक ऑपरेटर ने एक समाचार पत्र के संवाददाता को बताया  को प्रतिदिन औसतन 10 शिकायतें प्राप्त होती हैं। यहाँ तक कि आधी रात को भी उन के पास ह्स्तक्षेप के लिए फोन कॉल्स आती हैं जिन में अधिकांश कॉल घरेलू हिंसा के बारे में होती हैं, उन में भी ज्यादातर दहेज उत्पीड़न की होती हैं।  50 % से अधिक शिकायतकर्ता उच्च मध्य वर्ग या उच्च वर्ग के होती हैं. यदि शिकायत तत्काल हस्तक्षेप के योग्य नहीं होती तो काल सेंटर उन्हें पुलिस आयुक्त के यहाँ जा कर शिकायत करने या उन्हें सलाहकारों (कौंसलर्स) को सोंपने के लिए कहते हैं। नगर पुलिस आयुक्त कार्यालय को की गई शिकायत उपायुक्त के पास भेजी जाती है, जो उसे उपायुक्त को भेजता है, जहाँ से वह सहायक आयुक्त को भेजी जाती है और वहाँ से  यह पुलिस स्टेशन को भेजी जाती है। अधिकतर मामलों मे इस तरह बहुत समय व्यर्थ हो जाता है। अधिकांश मामलों में तो महिलाएँ कमिश्नरी के बजाए निकट के स्थानीय पुलिस के पास ही पहुँचती हैं।  चेन्नई की वकील गीता रमेशन ने बताया है कि,  "यदि कोई महिला अपने पति, ससुराल वालों या परिजनों के खिलाफ शिकायत करती है तो उसे एक सामाजिक बहिष्कृत समझा जाता है। नतीजतन वह हिंसा का शिकार होने के बावजूद भी उसी परिवार के साथ रहने को सुरक्षित समझती है। कमोबेश यही हालत सभी राज्यों में है।

इस कानून का लाभ अपने मुवक्किलों को देने के लिए वकीलों ने परिवार न्यायालय का रुख करने के बजाए इस अधिनियम के अंतर्गत मुकदमें दर्ज कराना शुरू कर दिया, और जल्दी ही निचली अदालतों में मुकदमे बढ़ने लगे। इन अदालतों के पास पहले ही मुकदम
ों की संख्या स्टेण्डर्ड से चार से सात गुना तक थी। नतीजा वही कि न्याय में देरी! जिस का अर्थ कोई न्याय नहीं। इस के अलावा निचली अदालतों के अधिकांश जजों ने यह धारणा भी बना ली कि महिलाएँ जानबूझ कर इस तरह की शिकायतें कर रही हैं। आखिर जज भी तो उसी पुरुषीय अहंकार से ग्रस्त हैं जिस से सारा समाज। नतीजा यह है कि घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण का कानून एक शो-पीस बन कर रह गया है।

बीना ससुराल गई और वापस भी लौटी

बीना का ससुर पहले एक फैक्ट्री में काम करता था वहाँ से नौकरी छूटी तो जुगाड़ कर एक मंदिर पर पुजारी हो गया। पति किसी दुकान में नौकरी करता था। जिस तरह से बीना की सास के भाई ने कुछ अनजान व्यवसायों में काम करते हुए अचानक ही खूब सारा धन कमा लिया था, उस से परिवार में अचानक धन प्राप्ति की आकांक्षा भी बढ़ चुकी थी। उसी का परिणाम बीना के पिता से धन की मांग के रुप में सामने आया था। लेकिन जैसे ही स्त्री-धन लौटाने का नोटिस उन्हें मिला वे सकते में आ गए। नयी योजनाएँ बनने लगीं। पहले नोटिस का लिखित जवाब भिजवा कर दहेज की मांग करने और बीना क्रूरता पूर्ण व्यवहार से इन्कार किया। जवाब मिलने के दूसरे ही दिन सास ने फोन कर बीना और उस की सास को धमकया। बीना ने पुलिस को रिपोर्ट की तो पुलिस ने उस के ससुराल वालों को धमका कर उसे वापस ले आने की हिदायत दे दी कि उसे नहीं लिया तो सब फंस जाओगे। जिस का असर यह हुआ कि इस तरह के प्रयास किए जाने लगे कि किसी तरह से बीना वापस ससुराल आ कर रहने लगे। इस के लिए सम्बन्धियों का भी उपयोग किया गया। सब के सामने एक समझौता लिखा गया जिस में यह आश्वासन दिया गया कि बीना के साथ किसी प्रकार का क्रूरतापूर्ण व्यवहार नहीं किया जाएगा और दहेज की मांग का तो सवाल ही नहीं है। दोनों पति-पत्नी अलग से रहेंगे। इस तरह एक बार फिर से बीना अपने ससुराल पहुँच गई। वहाँ उसी घर में एक कमरा अलग से उसे दे दिया गया और उस की रसोई अलग कर दी गई।

वे बीना को वापस तो ले आए लेकिन बिना कुछ किए अचानक धन प्राप्त करने की आकांक्षा बनी ही नहीं रही बल्कि और बढ़ गई। बीना की रसोई में इतना ही राशन रखा गया कि एक सप्ताह चल जाए। राशन समाप्त होने लगा तो बीना ने पति से कहा तो उसे जवाब मिला कि ये मेरी जिम्मेदारी नहीं। तू अलग रह रही है तो अपना इंतजाम खुद कर। बीना परेशान हो गई तो उस ने किसी तरह घर से बाहर जा कर अपनी माँ को फोन किया। उस के माता पिता रात पड़े उस के ससुराल पहुँचे तो उन्हें जलील करने को पूरा कुनबा मौजूद था। उन के साथ गालीगलौच की गई और घर से बाहर निकाल दिया गया। बीना ससुराल में रह गई। उस रात सास और पति ने महिला थाने को सूचना दी कि बीना घर छोड़ कर भाग गई है। वहाँ से लौट कर बीना के सभी गहने आदि सास ने छीन कर अपने कब्जे में किए इस के लिए उस के साथ मारपीट भी की। बीना को कुछ नहीं सूझा तो उस ने खुद को एक कमरे में बन्द कर लिया। आधी रात के बाद तक कमरे के दरवाजा खुलवाने को बहुत कोशिशें हुईं, लेकिन बीना ने रात में डर के मारे दरवाजा खोला। थक हार कर सभी ससुराल वाले सोने चले गए। सुबह के झुटपुटे में जब सब सोए पड़े थे तो बीना वहाँ से निकली और कहीं पीसीओ से माँ को फोन किया। माता-पिता अपने वार्ड के पार्षद को साथ लेकर पीसीओ पहुँचे और बीना को लेकर थाने पहुँचे।

पुलिस ने समझौता कराने के प्रयास किए। लेकिन बीना ने साफ मना कर दिया कि वह इस बार जो ससुराल गई तो या तो वे उसे मार डालेंगे या आत्महत्या पर मजबूर कर देंगे। पुलिस ने आखिर मुकदमा दर्ज किया और दहेज का सामान बरामद किया। जिस में भी ससुराल वालों ने कीमती जेवर इधर-उधर कर दिए। बीना के पति और सास-ससुर को गिरफ्तार होना पड़ा। अदालत से जमानत पर छूटे। पिछले छह वर्षों से दहेज के लिए क्रूरता बरतने और स्त्री-धन हड़पने का मुकदमा चल रहा है। लगभग सारी साक्ष्य हुए तीन वर्ष हो चुके हैं, एक दो औपचारिक गवाह और होने हैं, लेकिन अदालत में मुकदमों की संख्या अधिक होने से उस में निर्णय नहीं हो पा रहा है।

इस बीच बीना ने निर्णय किया कि वह अपने पैरों पर खड़ी होगी, उस के बाद ही अपने बारे में सोचेगी। उस के माता पिता ने अपनी गलती स्वीकारी कि उन्हों ने 18 वर्ष की होते ही बीना का विवाह कर गलती की। बीना ने परिवार न्यायालय में खर्चे के लिए अर्जी पेश की। (जारी)

कथा फैमिली कोर्ट तक पहुँचने के पहले की

बदरीनाथ मेरा पुराना मुवक्किल बहुत दिनों, करीब पाँच बरस बाद एक दिन मुझे अपने दफ्तर में दिखाई दिया, तो मैं पूछ बैठा- अरे! बदरी, आज कैसे?

जो किस्सा उस ने सुनाया वह बहुत पीड़ादायक था।

वह 26 अप्रेल 2001 को जब उस की पहली बेटी कुल जमा 18 की हुई ही थी कि उस ने उस की शादी कर दी। वह नगर निगम के चुंगी दफ्तर में नाका गार्ड होता था। चुंगी बन्द हुई तो उसे किसी गार्डन या निगम के ही अन्य किसी उप-संस्थान धर्मशाला वगैरा में चौकीदारी पर लगाया जाने लगा था। आमदनी बहुत थोड़ी थी। ऊपर की कमाई की न तो गुंजाइश थी और न ही उसे इस का सलीका। जैसे तैसे एक कच्ची बस्ती में मकान बना लिया था जो रेगुलाइज हो जाने पर कीमती दिखाई देने लगा था। कुल दो बेटियाँ थी, उसे।

विवाह बिरादरी के सम्मेलनों में होने लगे थे। तो  उन की सफलता के लिए सम्मेलन की कमेटियों के मेम्बर और उत्साही शादियाँ तय कराने की भूमिका भी निभाने लगे थे। कमेटी के लोग और कुछ उत्साही एक दिन उस के घर भी पहुँचे लड़की की शादी सम्मेलन में करने की सीख दी और रिश्ता भी बताया। कम खर्च और घर आया रिश्ता देख दोनों पति-पत्नी का मन ललचा गया। क्यों न ललचाता? लड़का सुंदर था। लड़की से सिर्फ एक बरस बड़ा। तो सम्मेलन में बीना नाम की बड़ी लड़की की शादी हो गई। हेमराज और उसकी पत्नी दोनों दिल से अच्छे। शादी में कम खर्च देख कर सोचा बेटी को कुछ अच्छा दे दिया जाए सो गहना-गाँठा दिया गया, जमाई को शहर की सड़कों पर शान से दौड़ाने के लिए एक अदद मोटर सायकिल भी, और लड़की व ससुराल के सभी रिश्तेदारों को अच्छा खासा कपड़ा-लत्ता और रुपए नारियल से नवाजा गया। बेटी चली गई ससुराल।

पहली बार चार दिन रही। इसी में बीना को सास का उलाहना सुनने को मिला कि उस के बाप ने जमाने को देखते हुए कम से कम एक कलर टीवी और एक सोने की चैन तो जमाई को देनी ही चाहिए थी। इस उलाहने को सुन कर ससुर टेक मिलाता था कि- भागवान कोई बात नहीं लड़की दे दी यही क्या कम है, उन के जिगर का टुकड़ा है और अभी कौन देर हुई है। सम्मेलन में ब्याह किया है, तो कैसे देते? अब की बार बहू को बिदा करेंगे तब जमाई को चैन और बेटी को टीवी के साथ ही भेजेंगे, तू काहे को फिकर करती है।

बीना मायके आई और दो माह बाद विदा हो कर ससुराल गई तो दो दिनों में ही वापस आ गई। इन  दो दिनों के दूसरे दिन उसे ‘अपने ही घर’ में दिन भर खाना ही नहीं मिला, कि टीवी और सोने की चैन तो लाई ही नहीं। बीना ने बात मुश्किल से माँ को बताई। पाँच माह बाद जमाई लेने आया तो उस की अच्छी आवभगत की गई और जमाई ने भी उत्तम भाव प्रदर्शित किये तो बेटी की फिर से विदाई हो गई।

नवम्बर के शुरु में गई बेटी जनवरी के मध्य में फिर से लौटी अपनी सास-ससुर के साथ। दोनों बदरी से लड़ कर गए, कि उन्होंने टीवी-चैन नहीं दी। अब वे लड़के की शादी का खर्च 25,000 रुपया लेंगे, मकान का आधा हिस्सा बीना के नाम करो और मोटर सायकिल जमाई के नाम कराओ। फिर बहू को बिदा कराने आएँगे। बदरी सदा का चुप्पा, बेचारा बोला तक नहीं। उन के जाने पर लड़की को संभाला तो वह दो दिन से बुखार में थी और कोई दवाई नहीं की गई थी। लड़की ने बताया कि उस के साथ इस बीच सास ने अनेक बार मारपीट भी की, उस के पति को उकसा कर उस से भी पिटवाया और उसे भूखा भी रखा। बार बार यह भी कहा कि कुछ खिला कर उसे पागल कर देंगे।

दो दिनों के बाद सास-ससुर फिर आए और सब को धमका कर और अपनी मांगें दोहरा कर चले गए। बीना सदमे से ऐसी बीमार पड़ी कि छह माह तक बीमारी ठीक नहीं हो पाई। उसे अस्पताल में दिखाया तो उन्हों ने उसे भर्ती कर लिया। खबर पा कर सास-ससुर मिलने अस्पताल पहुँचे और अपनी मांगें दोहरा कर चल दिये। बीना ठीक हो कर वापस घर पहुँची तो वहाँ फिर सास-ससुर हाजिर। अब की बार धमकी दे गए कि या तो उन की मांगे पूरी करो वरना तलाक दिलवा दो वे अपने लड़के की शादी दूसरी जगह कर देंगे।

बदरी की दास्तान सुन कर मैंने उसे उस की पत्नी और बेटी के साथ बुलाया। वे आए तो आपस में यह राय बनी कि इन हालात में बेटी को ससुराल भेजना तो उसे कुएँ में फैंकना होगा। मैं ने बीना की और से दिया गया दहेज का सामान वापस लौटाने का नोटिस भिजवा दिया। (जारी)

यह कथा जारी रहेगी आगे पुलिस थाना भी है और फैमिली कोर्ट भी………

सैर, फैमिली कोर्ट की – मुकदमा दाखिल होने से समझौते तक

फैमिली कोर्ट में मदद के लिए किसी न किसी तरह वकील तलाश कर ही लिया जाता है। अब आगे का सफर वैसा ही होता है जैसा मुकदमा करने या उस में सफाई पेश करने वाले ने गाइड चुना है, या मिला है।

मुझे पहले इस तरह के मामलों में बहुत रुचि थी, पूरी लगन होती थी। पूरा प्रयास होता था किसी तरह समस्या का समाधान किया जाए। लेकिन जब से फैमिली कोर्ट एक्ट अस्तित्व में आया और वकीलों को वहाँ प्रतिबन्धित किया गया, सारी लगन धूल में मिल गई। वकील की भूमिका ही बदल गई। अब उस की भूमिका वकील की न हो कर एक सलाहकार, ड्राफ्ट्स्-मैन और मुकदमा लड़ना सिखाने वाले शिक्षक भर की रह गई है। अब कोई सेवार्थी आता/आती है तो वकील उस का दावा/आवेदन तैयार कर सकता है, उस के आवश्यक तत्वों की पूर्ति कर सकता है और उसे अपने सेवार्थी के माध्यम से न्यायालय में प्रस्तुत करवा सकता है। इस के बाद हर पेशी पर पक्षकार को ही अदालत में हाजिर होना है, किसी अपरिहार्य कारण के होने पर भी किसी रिश्तेदार के माध्यम से ही अदालत में उपस्थिति माफ करने की अर्जी लगाई जा सकती है। वकील उस में कोई मदद नहीं कर सकता। अन्यथा गैर हाजरी में आप की अर्जी/मुकदमा खारिज हो सकता है या उस में एक तरफा सुनवाई हो कर फैसला हो सकता है।

मुंसरिम के पास अर्जी पेश हो जाने के पर वह एक पेशी रिपोर्ट के लिए देता है, जो कम से कम एक सप्ताह से महीने भर बाद की हो सकती है। इस पेशी तक अदालत का दफ्तर रिपोर्ट कर देता है कि अर्जी का प्रारूप सही है या नहीं, उस के साथ आवश्यक कागजात, कोर्ट फीस, फॉर्म वगैरा पूरे और कायदे के मुताबिक हैं या नहीं? वह यह भी रिपोर्ट करता है कि अर्जी पर क्षेत्राधिकार है या नहीं और वह मियाद अर्थात निर्धारित अवधि में प्रस्तुत की गई है अथवा नहीं? आदि आदि। इस अदालत का निश्चित पेशी पर रिपोर्ट नहीं हो पाने पर रिपोर्ट के लिए आगे की तारीक दे दी जाती है। इस रिपोर्ट में बताई गई कमियाँ पूरी कर देने पर मुकदमा दर्ज कर लिया जाता है और विपक्षी को अदालत में हाजिर होने के लिए नोटिस या सम्मन जारी किया जाता है। जब तक यह सम्मन या नोटिस विपक्षी को नहीं मिल जाता है तारीख बदलती रहती है, और हर तारीख पर नए सिरे से सम्मन व नोटिस न्याय शुल्क के साथ अदालत में प्रस्तुत करने पड़ते हैं। अगर अदालत डाक से इन्हें भिजवाने का आदेश देती है तो उस का खर्चा भी अदालत में पेश करना होता है।

विपक्षी के अदालत में हाजिर हो जाने पर उस को जवाब पेश करने को कहा जाता है। जिस के लिए विपक्षी को तीन पेशियाँ तो आसानी से मिल ही जाती हैं। इस से अधिक भी मिल जाती हैं। वकीलों की हड़ताल से इन अदालतों में काम बाधित नहीं होता लेकिन कभी जज के अवकाश पर होने से तो पेशी बदलती ही है। अधिकांश जिलों में एक ही फैमिली कोर्ट है और मुकदमों की संख्या तीन हजार से कम कहीं नहीं। जब कि अदालत की क्षमता केवल पाँच सौ की है। जिस के कारण एक पेशी तीन-चार माह की होती है। इस तरह जवाब आने में ही साल डेढ़ साल गुजर जाता है।

जब अर्जी का जवाब आ जाता है,  तो दोनों पक्षों को समझाने के लिए दो-तीन बैठकें होती हैं। कुछ ही नगण्य मामले इन में निपट पाते हैं। निपटते भी हैं तो अधिकांश मामलों में कम से कम एक पक्ष के सामने मामला नहीं निपटने के कष्टों के काल्पनिक पहाड़ों का भय खड़ा कर दिया जाता है और वह उन आभासी पहाड़ों के सामने अपने वास्तविक कष्टों को कम आँक कर और अपने अधिकारों का हवन कर, समझौता कर लेता है। अक्सर महिलाएं ही इस समझौते का शिकार होती हैं। 

अगर कोई समझौता सम्पन्न हो जाता है तो उसे रेकॉर्ड कर लिया जाता है, और मुकदमा यहीं खत्म हो जाता है। बाद में उस समझौते की पालना न हो तो पालना कराने के लिए या विवाद का हल न होने और अधिक गंभीर हो जाने पर नए सिरे से अर्जी लगानी पड़ती है। फिर से वही प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है।
  (जारी)

आओ परिवार न्यायालय घूम आऐं

चलिए आज आप को परिवार न्यायालय बोले तो “फैमली कोरट” घुमा लाते हैं। वैसे तो यह कोई घूमने की जगह नहीं, मगर जिस ने इस का पल्ला पकड़ा वह सालों साल यहीं घूमता रह जाता है। ये वो आदर्श अदालत है, जिस में न्याय मंदिर के विनायकों याने वकीलों का प्रवेश वर्जित है। हालाँकि कानून में लिखा है कि उचित हालात और मामलों में वकीलों के जरिए पक्षकारों को पैरवी करने इजाजत दी जा सकती है। लेकिन मैं ने तो कभी भी वैध तरीके से इस आदर्श अदालत में किसी पक्षकार को वकील के जरिए पैरवी की इजाजत मिलते नहीं देखा।

इस वर्जना के बावजूद भी ऐसा नहीं कि इस अदालत की चौखट तक वकीलों की पहुँच नहीं हो। ऐसा हो नहीं सकता कि कोई अदालत हो और वकील की पहुँच वहाँ तक न हो। वर्जना के बावजूद वकील वहाँ पहुँचते हैं, बल्कि यूँ कहिए कि वकीलों के बिना वहाँ तक पहुँच पाना वैसे ही असम्भव है जैसे बिना पासपोर्ट विदेश जाना। किसी को भरण पोषण भत्ते के लिए वहाँ जाना हो, या वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना के लिए, या न्यायिक अलगाव के लिए, या तलाक बोले तो डाय़वोर्स के लिए, या बच्चों की कस्टडी या संरक्षक नियुक्त कराने के लिए, या किसी और मकसद से। वहाँ पहुँचने का रास्ता केवल वकीलों को पता है। उस के बिना चले भी गए तो अदालत का मुंसरिम ही आप को वहाँ से वापस लौटा देगा। आप चाहे लाख कहें कि फैमली कोर्ट के कानून में लिखा है कि वकीलों से पैरवी नहीं कराई जा सकती। मुंसरिम पहले कहेगा। आप की अरजी सही साइज और रंग के कागज में नहीं है। उसे ठीक करा कर ले गए तो कहेगा। इस में टिकट पूरा नहीं लगा है। आप टिकट लगा कर ले जाएंगे तो बताएगा कि सम्मन और तलबाना ठीक से नहीं भरा है, दुबारा नया लगा कर लाओ। एक तो तीन चक्कर आप लगा चुके हैं, ऊपर से फैमली कोरट मेन अदालत से डेढ़ किलोमीटर दूर एक किराए के बंगले में चलती है, जिस के आस-पास चाय की गुमटी तो क्या पानी पीने का साधन तक नहीं। साढ़े चार किलोमीटर का सफर पहले ही आप कर चुके हैं। सफर भी ऐसा कि सीधा सलंग जाना हो तो कोई बात नहीं, आप को तो फिर फिर अदालत से फैमली कोरट ही आना-जाना है।

अब आपने पूछ कि क्या क्या कर के लाना है एक बार में ही बता दो, तो कहेगा उस पर इतनी फुरसत नहीं कि वह यह सब बताए। अगर सब कुछ जानना हो तो वकील क्यों नहीं कर लेते, और कि वकील तो आप को कर ही लेना चाहिए, वकील के बगैर तो आप एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। आखिर थक हार कर आप आ ही जाएंगे वकील के पास।

अब इस अदालत के लिए वकील तलाशना कोई आसान काम नहीं है। आप ने मेन अदालत के मेले में जा कर किसी से पूछने की जुर्रत कर ली, तो आप की खैर नहीं। इधर-उधर से दलाल आप को आ घेरेंगे। एक आप से बात करेगा तो दूसरा और तीसरा आप की उस से बात कर चुकने के बाद आप के सोचने की घड़ी का इन्तजार में आप को ताक रहा होगा। कब आप सोचना शुरू करें? और कब उस का आप की सोच में स्पीड ब्रेकर बनने का मौका लगे?

अब आप या तो इन दलालों के चक्कर में फँस-फँसा कर किसी वकील के यहाँ पहुँच ही जाएँगे या फिर उस दिन वापस घर की ओर वापस मुड़ लेंगे और वहाँ जा कर तसल्ली से सोचेंगे और अपने किसी परिचित वकील से मिलना तय करेंगे। कोई वकील परिचित नहीं हुआ तो किसी परिचित के परिचित के साथ वकील के दफ्तर पहुँचेंगे। लेकिन इस रास्ते पर चलने के पहले एक बात और विचार कर लेना कि जो परिचित आप ने उस के परिचित वकील के द्फ्तर ले जाने के लिए चुना है, वह कहीं वकील का इतना परिचित तो नहीं कि, पार्ट टाइम वकील साहब की मार्केटिंग टीम का कोई स्ट्रिंगर हो चुका हो। क्यों कि आजकल अनेक परिचित ये काम भी करने लगे हैं।

…………(जारी)

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