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सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों/ स्त्रियों का अधिकार

समस्या-

मोहिनी देवी ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

रदादा द्वारा खरीदी गयी कृषि भूमि है जो 1956 के पूर्व खरीदी गयी है, परदादा की मृत्यु 1956 के पूर्व हुई है, मृत्यु पश्चात दादा के नाम हो गयी, दादा की मृत्यु 1956 के बाद हुई है और मेरे पिता की मृत्यु 1993 में हुई है। कृपया मुझे ये बताये की उक्त भूमि में मेरे पिता की मृत्यु पश्चात पुत्रियों का अधिकार उक्त कृषि भूमि में है क्या? इस कृषि भूमि में मेरे पिता द्वारा कोई वसीयत नही बनायीं गयी है?

समाधान-

क्त कृषि भूमि में आप का तथा आपके पिता की अन्य पुत्रियों का अधिकार है।

17 जून 1956 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हुआ था। इस अधिनियम की धारा-6 में यह व्यवस्था थी कि जो संपत्ति सहदायिक है उस का उत्तराधिकार सर्वाइवरशिप से अर्थात प्राचीन हिन्दू विधि के अनुसार ही होता रहेगा न कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार।  सहदायिक संपत्ति का अर्थ था जो संपत्ति किसी पुत्र को उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हो वह सहदायिक है और उस में उस  पुरुष सन्तानों और उन की पुरुष सन्तानों को जन्म से अधिकार प्राप्त हो जाता है।

आपके परदादा की स्वयं की खरीदी हुई कृषि भूमि 1956 के पूर्व उन की मृत्यु के कारण आप के दादा को उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है। इस तरह यह संपत्ति सहदायिक हो गयी और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के उपरान्त भी उस में आप के पिता और यदि उन का कोई भाई हुआ तो उस को जन्म से ही अधिकार प्राप्त होता रहा। किन्तु आप को व आप की अन्य बहनों को यह अधिकार जन्मसे प्राप्त नहीं हुआ।

इस तरह की सहदायिक संपत्ति में हिस्सा रखने वाले किसी पुरुष की मृत्यु होने पर उस के हिस्से का उत्तराधिकार सहदायिक संपत्ति के दाय के उत्तरजीविता (सर्वाइवरशिप) के नियम के अनुसार होता था। किन्तु इसी अधिनियम की धारा-6 में यह प्रावधान था कि ऐसे पुरुष की मृत्यु के समय अधिनियम की अनुसूची प्रथम में वर्णित कोई ऐसी स्त्री उत्तराधिकारी या ऐसी स्त्री के माध्यम से अपना उत्तराधिकार क्लेम करने वाला पुरुष उत्तराधिकारी हुआ तो उस के हिस्से का दाय उस पुरुष की वसीयत के द्वारा और वसीयत न होने पर अधिनियम के अनुसार होगा।

आपके पिता की मृत्यु 1993 में हुई तब आप और आप की बहने मौजूद थीं। इस कारण आप के दादा की छोड़ी हुई संपत्ति में जो हिस्सा आप के पिता को प्राप्त हुआ था वह पुश्तैनी होने पर भी उस का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार हुआ और आप को तथा आप की बहनो को पिता की संपत्ति में उन की मृत्यु के उपरान्त हिस्सा प्राप्त हुआ।जब कि आप के भाई को उसी संपत्ति में जन्म से ही अधिकार प्राप्त था। उस को जितना अधिकार जन्म से प्राप्त हो चुका था। इस कारण आपके पिता की छोड़ी हुई अविभाजित संपत्ति में आप को आपके पिता की मृत्यु के दिन से ही उत्तराधिकार के कारण हिस्सा प्राप्त है। यदि आप का कोई भाई जीवित है  तो उसे भी उस संपत्ति में आप के ही समान अधिकार प्राप्त है। लेकिन आपके भाई की कोई पुत्री 2005 के पहले पैदा हो चुकी है तो उसे 2005 में धारा 6 में किए गए संशोधन के प्रभावी होने की तिथि से आप के भाई के जीवनकाल में ही अधिकार प्राप्त हो चुका है, और यदि भाई की कोई पुत्री 2005 के संशोधन के प्रभावी होने के बाद जन्मी है तो उसे जन्म से इस सहदायिक संपत्ति में अधिकार प्राप्त है।

पुत्रियों को पिता के उत्तराधिकार में पुत्रों के समान अधिकार है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियमसमस्या-

मोहित सूर्यवंशी ने छिन्दवाड़ा मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

चुन्‍नीलाल की स्‍व-अर्जित 4 एकड भूमि थी। चुन्‍नीलाल की म़त्‍यु 1977 में हदयघात से हो गई। चुन्‍नीलाल के 4 पुत्र एवं 3 पुत्री हैं। खसरे में, वर्तमान में चारों भाईयों का नाम है। क्‍या अब हिन्‍दू उत्‍तराधिकार 2005 के तहत तीनों पुत्रियों का नाम खसरे में आ सकता है? ताकि बटवारे में हिस्‍सा मिल सके, वर्तमान में किसी भी प्रकार का चारों भाईयों में कोई बटवारा नहीं हुआ है और न ही कोई विवाद है। क्या वर्तमान में चल रहे पुत्री उत्‍तराधिकार का लाभ मिल सकता है?

समाधान-

संदर्भित 4 एकड़ जमीन चुन्नीलाल की स्वअर्जित थी। इस कारण से उन के देहान्त का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 के अनुसार होना है। जिस में 2005 के संशोधन अधिनियम के पहले भी यह उपबंध था कि पिता की संपत्ति में पुत्री का अधिकार पुत्रों के समान ही है अर्थात उन का भी उक्त संपत्ति में 1/7 हिस्सा है। 2005 का जो संशोधन है वह पुत्रियों को केवल सहदायिक/पुश्तैनी संपत्ति में जन्म से अधिकार प्रदान करता है।

तीनों पुत्रियों को चाहिए कि वे अपने भाइयों के नाम खुले नामान्तरण आदेश की अपील प्रस्तुत करें और जमीन के हस्तान्तरण पर रोक लगाने के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा जारी कराएँ। इस के साथ ही कोई भी एक पुत्री अपने सभी भाइयों, बहिनों और राज्य सरकार को पक्षकार बनाते हुए उक्त संपत्ति के विभाजन का वाद प्रस्तुत करे और भूमि के हस्तान्तरण पर रोक के लिए अस्थाई निषेधाज्ञा जारी कराए।

आप वैध पत्नी नहीं लेकिन वैध पुत्रियों की माँ और संरक्षिका हैं, आप को पुत्रियों के अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ना चाहिए।

father & married daughter3समस्या-

सोनम वर्मा ने ब्‍यावरा,मध्यप्रदेश से पूछा है-

र, मेरा विवाह आज करीब 16-17 वर्ष पूर्व हिन्‍दू रीति से हुआ था। विवाह के करीब ए‍क साल बाद मेरे पति से मेरा झगडा बढ गया और मैं अपना ससुराल छोड कर अपने मायके में आ गई और उसके बाद करीब ३-४ साल में अपने ससुराल नहीं गई, न ही वहां से मुझे कोई लेने आया। उस के बाद मेरे घर वालों ने मेरा दूसरा विवाहकरा दिया।दूसरे पति के साथ मैं 8-10 वर्ष रही। करीब 2 वर्ष पहले पहले मेरे दूसरेपति का स्‍वर्गवास हो गया, जिन के दो बालिग २ पुत्र हैं। उनकी मां का यानी मेरे दूसरे पति की पहली पत्‍नी का देहान्त मेरी दूसरी शादी के 2 वर्ष पहले ही देहान्त हो गया था। मेरे दूसरे पति सरकारी कर्मचारी थे और मेरे पहलेपति भी सरकारी कर्मचारी थे अब मैं ने अपने दूसरे पति के स्‍थान पर अनुकंपानियुक्ति एवं उनके समस्‍त देय स्‍वत्‍वों के लिए आवेदन दिया है जिस पर मेरेदूसरे पति के बच्‍चों ने आपत्ति प्रकट की हैं। वे चाहते हैं कि अनुकम्‍पानियुक्ति उन दोनों भाइयों में से किसी एक भाई को मिले और में चाहती हूं किअनुकंपा नियुक्ति मुझे मिले। क्‍योंकि मेरी दो पुत्रियां हैं। लेकिन मेरेदूसरे पति के सर्विस बुक में उनकी पहली पत्‍नी का नाम है और बाकी सभीनोमीनेशन भी उनकी पहली पत्‍नी के दोनों बच्‍चों के नाम पर है जो कि अभी भीहै।मेरा नाम सर्विस बुक व किसी भी रिकार्ड में नहीं है। मेरादूसरा विवाह भी वैदिक हिन्‍दू रीति से नहीं हुआ है। मेरा पहला पति भीजीवित है जिन से मेरा डिवोर्स नहीं है और न ही मेरे पहले पति ने अभी तक शादीकी है। मेरे दूसरे पति के दोनों बच्चे मुझे उनकी पत्‍नी नहीं मानते हैं। में उनकी अनुकम्पा नियुक्ति एवं उनके सभी समस्‍त देय स्‍वत्‍व चाहती हूं।उस के लिए मुझे क्‍या करना चाहिए? क्‍योंकि अगर यह प्रकरण कोर्ट में पहुंचताहै तो मेरे पास मेरे पहले पति से डिवोर्स नहीं है इस बारे में आपकी राय चाहतीहूं। अगर यह प्रकरण कोर्ट में चला जाता है तो मुझे स्वयं को डिवोर्स पेपर और दूसरीपत्‍नी साबित करना होगा। मेरी दूसरी शादी का कोई वेलिडरजिस्‍ट्रेशन भी नहीं है ऐसी स्‍थिति में मुझे क्‍या करना चाहिए?

समाधान-

प की स्थिति से स्पष्ट है कि आप के पहले पति से आप का विवाह विच्छेद आज तक नहीं हुआ है। ऐसी स्थिति में आप कानूनी रूप से अपने पहले पति की पत्नी बनी हुई हैं। हिन्दू विधि में एक पति की वैध पत्नी होते हुए आप दूसरा विवाह नहीं कर सकती थीं। इस कारण आप का दूसरा विवाह वैध नहीं था। आप अपने दूसरे पति की पत्नी नहीं थीं। आप की दोनों पुत्रियाँ यदि दूसरे पति से हैं तो उन्हें तो दूसरे पति की पुत्री होने का अधिकार है लेकिन आप का पत्नी होने का नहीं। आप का दूसरे पति से जो भी सम्बन्ध था वह पति पत्नी का न हो कर लिव इन रिलेशन का था। आप के दूसरे पति भी इस सम्बन्ध को लिव इन रिलेशन ही मानते रहे अन्यथा वे अपनी सर्विस बुक आदि सेवा अभिलेख में पत्नी के स्थान पर आप का नाम अंकित करवाते। आप किसी भी स्थिति में अपने आप को अपने दूसरे पति की पत्नी साबित नहीं कर सकतीं। आप को अनुकम्पा नियुक्ति किसी स्थिति में नहीं मिल सकेगी इस कारण उस की लड़ाई लड़ना आप के लिए निरर्थक सिद्ध होगा।

प की दोनों बेटियाँ आप के दूसरे पति की पुत्रियाँ हैं, उन के परिवार का अभिन्न हिस्सा हैं और मृतक आश्रित हैं और आप उन की माता हैं इस कारण उन की संरक्षक हैं।

प की दोनों पुत्रियों का आप के दूसरे पति के सेवा में रहते हुए देहान्त हो जाने के कारण मिलने वाले परिलाभों पर पूरा अधिकार है। आप की पुत्रियाँ अवयस्क हैं इस कारण उन के हितों की रक्षा करने का पूरा दायित्व आप का है। इस कारण एक संरक्षक की हैसियत से आप अपनी पुत्रियों को उन के अधिकार दिला सकती हैं। आप के पति के सेवा संबंधी लाभों में पुत्रियों का हिस्सा मिले इस के लिए आप उन की ओर से आवेदन कर सकती हैं। आप की दोनों पुत्रियाँ नाबालिग हैं इस से वे परिवार पेंशन पाने की की भी अधिकारी हैं। आप को पति के लाभों में पुत्रियों के हिस्से और उन की परिवार पेंशन के लिए लड़ना चाहिए। इस मामले आप दूसरे पति के बालिग पुत्रों से बात कर के समझौता भी कर सकती हैं कि उन में से किसी एक को अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करने में आप आपत्ति नहीं करेंगी यदि वे पति के सेवा लाभों में पुत्रियों का हिस्सा, परिवार पेंशन और आप के पति की चल अचल संपत्ति में पुत्रियों का हिस्सा देने को तैयार हों। यदि वे इस के लिए तैयार न हों तो आप अपनी पुत्रियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ सकती हैं।

पिता की मृत्यु पर उन की निर्वसीयती संपत्ति में पुत्रियों को उत्तराधिकार 2005 के पूर्व भी था।

father daughterसमस्या-

जींद, हरियाणा से अमित कुमार ने पूछा है –

मारे दादा जी के नाम एक मकान है, दादा जी 2004 को स्‍वर्ग सि‍धार गए थे, उन्‍होंने कोई वसीयत नहीं बनाई, उनकी चार बेटि‍याँ और एक बेटा है। मरने से पहले उन्‍होंने अपने बेटे को मकान में आकर रहने के लि‍ए कहा था। उनके बेटे जो कि मेरे पि‍ता हैं, वर्ष 2000 में ही उक्‍त मकान में आ गए थे। यहां आने के बाद मेरे पि‍ता ने प्रथम तल का निर्माण कराया, जि‍समें दो कमरे, बरामदा, रसोई घर और बाथरूम शामि‍ल है। 2004 में दादा जी के स्‍वर्ग सि‍धारने के बाद हम दादी के साथ रहने लगे। दादा जी अपने जीवि‍त रहते ही चारों बेटि‍यों की शादी पहले ही कर चुके थे। जब तक दादी जीवि‍त थी, तब तक कि‍सी भी बेटी ने हि‍स्‍सा नहीं मांगा था। लेकि‍न 2009 में दादी के स्‍वर्ग सि‍धारने के 10 दि‍न बाद ही तीन बेटि‍यों ने केस कर दि‍या। केस में आरोप लगाया गया कि सबसे छोटी बेटी मकान के ग्राउंड फ़लोर पर अपनी मां के साथ रहती थी और केस दाखि‍ल होने तक रह रही है। हकीकत यह है कि उस वक्‍त सभी दादी की तेरहवीं के लि‍ए रूके थे। मेरे पि‍ता की बडी बहन अभी भी हमारी तरफ है। शेष तीनों बहनों ने केस कर रखा है, वर्तमान में मकान पर पहले की तरह हमारा ही कब्‍जा है, मैं जानना चाहता हूं कि –
1.  क्‍या दादा की संपत्‍ति पर मेरे पि‍ता की बहनों का भी हक है, वह भी तब,  जबकि मेरे दादा की मौत 2005 से पहले हो चुकी है?
2. मुझे कानून के एक जानकार से पता चला है कि हि‍दू उत्तराधिकार संशोधन अधिनियम 2005 के अनुसार 2005 के बाद ही बेटि‍यों को जन्‍म से पि‍ता की संपत्‍ति में हि‍स्‍से का अधि‍कार प्राप्‍त हुआ है, इससे पहले अगर कोई पि‍ता स्‍वर्ग सि‍धार गया है तो उसकी बेटि‍यां हि‍स्‍सा नहीं मांग सकती, क्‍या यह सही बात है?
3. वादी पक्ष पि‍छली चार सुनवाइयों में से एक में भी हाजि‍र नहीं हुआ, ऐसे में क्‍या कि‍या जा सकता है?
4 हमारे मकान की रजि‍स्‍ट्री गुम हो गई है, कोर्ट ने स्‍टे का आर्डर दे रखा है, हमे शक है कि रजि‍स्‍ट्री अभि‍योग पक्ष ने ही चुराई है, ऐसे में हमें क्‍या करना चाहि‍ए, वैसे रजि‍स्‍ट्री की नकल हमारे पास अभी तक सुरक्षि‍त है?
कृपया उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प ने सब कुछ बताया है लेकिन यह नहीं बताया कि दादाजी की विवादित संपत्ति उन की स्वयं की है अथवा पुश्तैनी है अर्थात् दादा जी को उन के पिता से मिली हुई तो नहीं है?

कोई भी हिन्दू पुरुष के पास दो तरह की संपत्ति हो सकती है। एक तो वह संपत्ति जो उस ने स्वयं अर्जित की है। दूसरी वह संपत्ति जो उसे अपने पिता, दादा या परदादा अर्थात खुद से चौथी पीढ़ी तक के पूर्वजों में से किसी से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है। पहले प्रकार की संपत्ति उस की निजि संपत्ति है तथा दूसरे प्रकार की संपत्ति एक पुश्तैनी अर्थात सहदायिक संपत्ति है।

हदायिक संपत्ति पर चाहे किसी व्यक्ति का पूर्ण स्वामित्व हो अथवा उस में केवल एक भाग उस का हो उस में उस के पुत्रों, पौत्रों और प्रपौत्रों का हिस्सा भी सम्मिलित होता है। मसलन यदि किसी पुरुष को अपने पिता से उत्तराधिकार में ऐसा मकान मिला है जो उस के पिता को भी दादा से मिला था तो उस का वह अकेला स्वामी नहीं है। उस में उसके पुत्रों व पौत्रों का बराबर का हिस्सा है वे सभी उस संपत्ति के सहदायिक हैं। यदि पिता की मृत्यु हो जाती है तो उस संपत्ति में पिता का हिस्सा कम हो कर शेष बचे सभी सहदायिकों का हिस्सा बढ़ जाएगा। यदि पिता सहित कुल पाँच सहदायिक थे तो सब का हिस्सा 1/5 था, पिता की मृत्यु के उपरान्त सब का हिस्सा ¼ हो जाएगा। इस के बाद यदि पुत्र या पौत्र के घर कोई लड़का जन्म लेता है तो उस संपत्ति में उस लड़के को जन्म से ही हिस्सा मिल जाएगा अर्थात उस लड़के समेत सभी का हिस्सा पुनः 1/5 हो जाएगा। इसे हम उत्तरजीविता कहते हैं।

2005 के पहले तक कानूनी स्थिति यह थी कि यदि परिवार में कोई लड़की जन्म लेती थी तो सहदायिक सम्पत्ति में जन्म से उसे कोई हिस्सा नहीं मिलता था लेकिन 2005 के संशोधन से यह हुआ कि परिवार में लड़की के जन्म लेने पर उसे भी सहदायिक संपत्ति में उसी तरह अधिकार मिल गया जैसे पुत्र को मिलता था।

लेकिन 2005 के पूर्व भी उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 में यह उपबंध था कि यदि सहदायिक संपत्ति में भागीदार किसी पुरुष की मृत्यु हो जाती है और उस का कोई स्त्री उत्तराधिकारी मौजूद है तो उस की संपत्ति का उत्तराधिकार  उत्तरजीविता के आधार पर न हो कर हिन्दू उत्तराधिकार की धारा 8 के अनुसार निश्चित होगा। जिस का अर्थ यह है कि सहदायिक संपत्ति में मृतक की पुत्रियों को भी उत्तराधिकार प्राप्त होगा।

प के दादा जी की संपत्ति सहदायिक हो या उन की स्वअर्जित हो। आप 2004 में भी आप के दादाजी के देहान्त के समय पुत्रियाँ जीवित थीं इस कारण उन की संपत्ति का उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार ही तय होगा, अर्थात आप की बुआएँ भी दादा जी की संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार हैं। आप के दादा जी की संपत्ति में आप के पिता जी और आप की बुआओं में से प्रत्येक को 1/5 हिस्सा प्राप्त होगा। 2005 के संशोधन का इस मामले में कोई असर नहीं होगा।

प के पिताजी ने उक्त मकान में जो कुछ निर्माण अपने धन से किया है यदि आप के पिता न्यायालय के समक्ष यह साबित कर सकें कि वह निर्माण उन के स्वयं के द्वारा ही करवाया गया था तो निर्माण की कीमत का मूल्यांकन किया जा सकता है तथा दादा जी की कुल संपत्ति में से पिताजी के द्वारा करवाए गए निर्माण की कीमत को कम कर के बँटवारा हो सकता है। और कम की गई कीमत के बराबर हिस्सा अलग से आप के पिता को प्राप्त हो सकता है।

संयुक्त संपत्ति के विभाजन का वाद एक दीवानी वाद है किसी भी पक्षकार की न्यायालय के समक्ष व्यक्तिगत उपस्थिति या अनुपस्थिति से कोई फर्क नहीं पड़ता उन के स्थान पर उन का वकील हाजिर हो ही रहा होगा। आप के पास यदि रजिस्ट्री की प्रति है तो कोई बात नहीं आप उस की प्रमाणित प्रति उपपंजीयक कार्यालय से प्राप्त कर सकते हैं। मूल उपलब्ध न होने पर प्रमाणित प्रति साक्ष्य में प्रस्तुत की जा सकती है। खोई हुई प्रति आप के किसी रिश्तेदार ने ही चोरी की है इस बात का कोई सबूत न होने पर आप किसी की शिकायत नहीं कर सकते। वह किस के पास है इस से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

कान पर बहिन का कब्जा है या नहीं इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ेगा। क्यों कि संपत्ति दादा जी की थी तथा उन की मृत्यु के साथ ही सभी उत्तराधिकारियों की संयुक्त संपत्ति हो चुकी है और सभी उत्तराधिकारी उस संपत्ति के भागीदार हैं। यदि एक भी भागीदार का संपत्ति पर कब्जा है तो सभी का संयुक्त कब्जा माना जाएगा।

सहदायिक सम्पत्ति में पुत्रियों को जन्म से अधिकार 9 सितंबर 2005 से ही

समस्या-

जयपुर, राजस्थान से विजय ने पूछा है –

मैं ने एक संपत्ति जिन से खरीदी है उन का एचयूएफ (हिन्दू अविभाजित परिवार) खाता है। हम ने चैक एचयूएफ के नाम से ही दिया है। जिस व्यक्ति के नाम से एचयूएफ है उस के केवल एक पुत्री है जिस के चार पुत्र हैं। सब से बड़ा लड़का अपने नाना के पास रहने लगा और एचयूएफ में शामिल हो गया। नाना के मरने के बाद एचयूएफ का कर्ता हो गया। अब उस के तीन भाई उस में हिस्सा लेंगे क्या?

समाधान-

में आप के प्रश्न में एक बात समझ नहीं आई कि जो संपत्ति जिस एचयूएफ के नाम थी उस के नाम से चैक दे कर आप ने उस सम्पत्ति को खरीद लिया।  इस तरह एचयूएफ की संपत्ति के विक्रय का मूल्य एचयूएफ खाते में पहुँच गया है। इस कारण आप के द्वारा खरीदी गई संपत्ति को तो किसी प्रकार का कोई खतरा नहीं है। आप सुरक्षित हैं। यदि कोई व्यक्ति यह दावा करता है कि एचयूएफ की संपत्ति के विक्रय का हिस्सा उसे नहीं मिला तो इस दावे से भी आप पर या आप की खरीदी हुई संपत्ति पर नहीं पड़ेगा। इस के बावजूद आप को क्या परेशानी है जो आप यह प्रश्न पूछ रहे हैं?

शायद आप को यह आशंका है कि कहीं संयुक्त हिन्दू परिवार के पूर्व मुखिया के अन्य नाती आप को उक्त संपत्ति बेचने पर आपत्ति न कर दें। लेकिन ऐसा नहीं है। किसी भी एचयूएफ का कर्ता एचयूएफ की तरफ से उस की संपत्ति विक्रय कर सकता है जिस पर एचयूएफ के सदस्य आपत्ति नहीं कर सकते। फिर जिन से आप को आशंका है वे सभी तीन भाई सहदायिक होने पर ही एचयूएफ की संपत्ति पर अपना अधिकार रख सकते हैं। उन का अधिकार सिर्फ अपनी माँ के माध्य़म से ही हो सकता है। उन की माँ एचयूएफ के कर्ता की विवाहित पुत्री है। पुत्रियों को 9 सितंबर 2005 से ही जन्म से सहदायिक संपत्ति में अधिकार प्राप्त हुआ है इस से पहले नहीं। आप का मामला इस से पहले का है। इस कारण पुत्री को सहदायिक संपत्ति में अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है। उस के पुत्रों को भी सहदायिक संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है। सब से बड़ा लड़का जो इस समय अपने नाना द्वारा निर्मित एचयूएफ का कर्ता है उसे भी उस सहदायिकी में प्रवेश एक गोद पुत्र के रूप में ही प्राप्त हुआ होगा। आप चाहें तो इस तथ्य की पुष्टि कर सकते हैं।

पुश्तैनी संपत्ति में पुत्रियों का हिस्सा

समस्या-

मारी पुश्तैनी जायदाद जयपुर में स्थित है। बीस वर्ष पहले पिताजी ने उस के तीन हिस्से किए। एक स्वयं रखा और एक-एक हिस्सा मुझे और मेरे भाई को दे दिया।  मेरी दो बहनें हैं जो बीस साल पहले अविवाहित थीं, लेकिन अब विवाहित हैं। क्या बीस साल पहले जो विभाजन हुआ था वह वैध था? अब पिताजी अपना हिस्सा मेरे भाई को देना चाहते हैं। क्या वे उन का हिस्सा मेरे भाई को दे सकते हैं?

-प्रशान्त शर्मा, जयपुर

समाधान-

बीस वर्ष पूर्व आप की बहनों को पुश्तैनी संपत्ति में भरण पोषण का अधिकार था। इस कारण से उन का हिस्सा पुश्तैनी संपत्ति में था। इस तरह बीस वर्ष पूर्व किया गया संपत्ति का विभाजन वैध नहीं कहा जा सकता। यदि आप की बहनें चाहें तो न्यायालय से उक्त विभाजन को निरस्त करवा सकती हैं।

भी आप के पिता जीवित हैं, वर्तमान कानूनी स्थिति में पुत्रियों को पिता की  तथा पुश्तैनी संपत्ति में उतना ही अधिकार है जितना कि  आप दोनो भाइयों को था। इस कारण से यदि आप के पिता अपने हिस्से को आप के भाई को किसी भी प्रकार से हस्तांतरित करते हैं तो वह भी वैध नहीं होगा।

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